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Saturday, October 3, 2026
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दुनिया की सबसे प्रसिद्ध बंदूक AK-47 को एके-47 ही क्यों कहा जाता है, जानिए

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Mikhail Kalashnikov, with his AK-47, in 2002.

AK-47 से एक मिनट में बिना रूके 600 गोलियां दागी जा सकती है

 

परमाणु बम के बाद यदि कोई ज्यादा खतरनाक हथियार है तो वो है AK-47 l AK-47 के नाम सुनने से ही डर लगने लगता है। यह दुनिया के एकमात्र बंदूक जो सबसे ज्यादा बेची और नक़ल की गई है ।जितनी तरक्की और प्रसिद्धी AK-47 ने पाई है दुनिया में शायद ही कोई और बन्दुक भविष्य में इतनी प्रसिद्धी  पा सके  । आज हम   AK-47 से जुड़े हर महत्वपूर्ण तथ्य को हम आपके सामने रखेंगे और  बताएँगे की इसका नाम  AK-47 क्यों पड़ा

कैसे हुआ था इस बन्दुक का अविष्कार

AK–47 को  रूस के एक सैनिक मिखाइल कलाशनिकोव (Mikhail Kalashnikov )ने 1947 में बनाया था। जिस समय मिखाइल कलाशनिकोव ने AK–47 को बनाया था तब वह युद्ध में घायल होने की वजह से अस्पताल में भर्ती थे और उनकी आयु मात्र 21 साल थी।वह बताते  है-जब में अस्पताल में था तो मेरे बगल वाले बेड पर लेते जवान ने मुझसे प्रश्न किया की क्यों हमारे जवानों के पास केवल रायफल ही होते है  जबकि जर्मन के पास ऑटोमेटिक रायफल । इसलिए मैंने जवानों के लिए मशीन गन बनाने के बारे में सोचा  फिर 1942 से 1947 तक 5 साल की कड़ी मेहनत के बाद एक चीज़ बनाई जिसे आज हम AK–47 कहते है ।

कैसे पड़ा नाम AK–47

AK–47 का पूरा नाम है – Avtomat Kalashnikova (आटोमैटिक कलाशनिकोव )। इसमें ‘आटोमैटिक’ का अर्थ है – स्वैचालित, ‘कलाशनिकोव’ मिखाइल कलाशनिकोव के नाम पर है ।यानि मतलब AK का मतलब है – automatic weapon of Kalashnikov । इसका निर्माण 1947 में हुआ था इस तरह इसका नाम AK–47 पड़ा।

खेती के लिए उपकरण बनाना चाहते थे 

मिखाइल कलाशनिकोव जब छोटे थे तब वह ऐसे उपकरण बनाने के बारे में सोचा करते थे  जिन से खेती करने में आसानी हो, पर तकदीर ने उनके हाथ से  एक ऐसा हथियार बनवा दिया जिसके नाम संसार में सबसे ज्यादा हत्याएं करने का रिकार्ड दर्ज है। इस राइफल का सबसे ज्यादा गलत इस्तेमाल तालिबानी आतंकवादियों द्वारा अफ़गानिस्तान में हुआ था।

ठंढे मौसम को देख कर बनाया था

मिखाइल कैलाशनिकोव ने AK–47 का निर्माण उन रूसी सैनिकों के लिए बनाया था जिन्हें आर्कटिक (Arctic) के ठंडे मौसम में मोटे – मोटे दस्ताने पहन कर पुरानी किस्म की राइफल चलानी पड़ती थी। इस राइफल में सभी रायफलों का मिश्रण है यह  हर प्रकार के पर्यावरण में आसानी से चलाई जा सकती है और वहन की जा सकती है । AK–47 की खूबियों के कारण जल्द ही यह राइफल पूरी दूनिया में मशहूर हो गई और सभी देशों की सेनाएं इसका उपयोग करने लगी। AK–47 किसी भी मौसम में काम करने की क्षमता रखता है ।

क्यों करते है आतंकवादी AK–47 बंदूक का इस्तेमाल 

AK–47 को रिलोड होने में मात्र 2.5 सेकंड का समय लगता है. और बंदूक की नली से गोली छूटने की रफ्तार 710 मीटर प्रति सेकंड है. इसे चलाने के लिए किसी खास ट्रेनिंग की भी ज़रूरत नही है ।इस बंदूक का निशाना पानी के अंदर भी नहीं चूकता, इसकी गोली की रफ्तार इतनी तेज होती है कि पानी का घर्षण भी उसे रोक नहीं पाता और सीधा निशाने पर जाकर लगती है  इसकी साफ-सफाई और मेंटेनेंस करना भी बहुत आसान है. यही कुछ कारण है, जिनकी वजह से यह आतंकवादियों की पहली पसंद बनी हुई है.

AK-47 से जुडी कुछ  में कुछ रोचक जानकारी

1. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि वर्तमान में 106 देशों की सेना की ओर से AK-47 का  इस्तेमाल कीया  जाता  है।

2. AK-47 एकमात्र रायफल है  जो आज भी हाथों से बनाई जाती है जिसमें किसी भी प्रकार की मशीनें प्रयोग में नहीं लाई जाती।

3. AK-47 से हर साल ढ़ाई लाख लोगों की हत्याएं की जाती है। इनमें से 2 लाख हत्याएं इस्लामिक आतंकवादियों जैसे कि ISIS और अलकायदा द्वारा की जाती हैं।

4. AK-47 राइफल में आटोमैटिक और सैमीआटोमैटिक दोनो तरह के गुण होते है। आटोमैटिक का मतलब है एक बार ट्रिगर दबाकर रखने से गोलियां लगातार चलती रहती है और सैमी आटोमैटिक का मतलब है एक बार ट्रिगर दबाने से एक गोली ही चलती है।

5. AK-47 की लंबाई मात्र 3 फुट होती है और एक पूरी तरह से गोलियो से भरी हुई AK-47 का वज़न मात्र साढ़े 4 किलो होता है।

6. AK-47 से एक मिनट में बिना रूके 600 गोलियां दागी जा सकती है। मतलब कि एक सैकेंड में 10 गोलियां। इसका सेहरा AK-47 की शानदार गैस चेम्बर और स्प्रिंग को जाता है।

7. एक AK-47 की लाईफ 6000 से 15000 राउंड तक होती है. AK-47 की एक मैगज़ीन में 30 राउंड होते है.

8. AK-47 का AKM वर्जन, इस समय दुनिया का सबसे हल्का राइफल है. फुल लोड होने के बाद भी इस राइफल का वज़न केवल 3.1 किलो है. इससे एक मिनट में 640 राउंड किए जा सकते है.

9. AK-47 की रेंज 300 से 400 मीटर तक होती है . यदि शूटर जबरदस्त हुआ तो 800 मीटर पर भी लक्ष्य को मार सकता है.

10. मिखाइल कलाशनिकोव के अनुसार वह AK-47 से एक लाख से भी ज्यादा गोलियां दाग चुके हैं जिसके कारण वह बहरे हो गए हैं।

11. इस समय विश्व में लगभग 10 करोड़ AK-47 राइफलस हैं। यह संख्या बाकी किसी भी बड़े हथियार से कहीं ज्यादा है।

12. लगभग सभी देशों में किसी आम नागरिक का अपने पास AK-47 रखना गैरकानूनी है। भारत में यह कानून कितना सख्त है इस बात का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते है कि संजय दत्त को भी AK-47 रखने की वजह से 5 साल की सज़ा भुगतनी पड़ी।

13. AK-47 दुनिया की इकलौती ऐसी राइफल है जिसे बच्चे भी आसानी से चला सकते है। यही कारण है कि आप AK-47 चलाते हुए कई बच्चों की तस्वीर देख सकते है।

14. AK-47 की भेदन शक्ति इतनी ज्यादा है कि यह कुछ दीवारो, यहाँ तक की कार के धातु के दरवाजें को भेद कर उसके पीछे बैठे इंसान को मार सकती है।

15. केवल रूस ही दुनिया को AK-47 सप्लाई नही करता, बल्कि 30 अन्य देशों को भी इसे बनाने का लाइसेंस प्राप्त है। जैसे:- भारत, चीन, इज़रायल, मिस्त्र, नाइजीरिया आदि। इनमें चीन सबसे ज्यादा AK-47 बनाता है।.

16. AK-47 दुनिया की अकेली ऐसी राइफल है, जो किसी भी वातावरण में काम कर सकती है. मतलब पानी, रेत या मिट्टी etc. कही भी.

17. AK-47 दुनिया की इकलौती ऐसी राइफल है जिसे बच्चे भी आसानी से चला सकते है. यही कारण है कि आप AK-47 चलाते हुए कई बच्चों की तस्वीर देख सकते है.

18. किसी अन्य बंदूक की बज़ाय दुनिया में सबसे ज्यादा AK-47 को काॅपी किया जाता है.यह दुनिया की सबसे ज्यादा ब्लैक (अवैध) रूप से बेची जाने वाली राइफल है. यह केवल 8 पुर्जों से मिलकर बनी होती है और इन्हें एक मिनट से भी कम समय में जोड़ा जा सकता है.

19. AK-47 एक गैस संचालित, सिलेक्टिव फायर राइफल है. सिलेक्टिव फायर मतलब, शूटर चाहे तो एक-एक करके फायरिंग कर सकता है या फिर एक ही बार में पूरी मैगज़ीन खाली कर सकता है.

20. आधुनिक एके-47 पर एक ग्रेनेड लांचर भी जोड़ा जा सकता है.

21. AK- 47, 300 मीटर की दूरी तक सटीक निशाना लगाती है. यदि शूटर जबरदस्त हुआ तो 800 मीटर पर भी लक्ष्य को मार सकता है.

22. सद्दाम हुसैन को एक सोने की एके-47 गिफ्ट में मिली थी. जो 2003 में इराक पर हुए आक्रमण के बाद अमेरिकी सैनिको द्वारा ज़ब्त कर ली गई.

23. ओसामा बिन लादेन अपने विडियो में एक AK- 47 पकड़े हुए दिखाई देता था. ऐसा माना जाता है, कि शायद अमेरिका ने ही लादेन की पहली एके-47 दी हो. अफगानिस्तान में सेवियत संघ से लड़ने के लिए.

24. किसी भी देश का आम नागरिक अपने पास एके-47 नही रख सकता. भारत में यह कानून और भी सख़्त है. एके-47 रखने के जुर्म में संजय दत्त को भी जेल हो गयी थी.

25. Mikhail Kalashnikov ने अपने सबसे बड़े अविष्कार AK- 47 की बिक्री से कभी पैसा नही कमाया. 2013 में 94 साल की उम्र में इनकी मौत हो गई.

अगर एक कागज़ को बीच में से 42 बार मोड दें, तो आप चांद पर पहुँच सकते है-कैसे तो पढ़े ये लेख

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कागज़ के टुकड़े को 7 जा 8 बार से ज्यादा मोड़ना संभव नहीं 

क्या आपको पता है की एक कागज के टुकड़े को बिच से 7 जा 8 बार से ज्यादा नही मोड़ा जा सकता है ।चाहे वह कागज कितना भी पतला हो या कितना भी लम्बा चौड़ा हो | यह बात तो  बहुत लोगो को पता ही  होगी क्योकि किसी साधारण कागज़ के टुकड़े को 7  या 8वीं बार मोड़ते समय वह या  तो वो बहुत छोटा हो जाता है या फिर कागज़ में खिचाव इतना हो जाता है कि उसे मोड़ना असंभव हो जाता है।

लेकिन यदि हम मान लेते है की  कागज़ के टुकड़े को 7 जा 8 बार से ज्यादा मोड़ना संभव हो जाए तो जानते है क्या होगा?

कागज़ को सिर्फ 42 बार मोड़ देने से उसकी मोटाई पृथ्वी और चंद्रमां के बीच की दूरी (3 लाख 84 हज़ार कि.मी.) से भी ज्यादा हो जाएगी ! हा ये बिलकुल सच है बिश्वास नहीं है तो हम आपको बताते है की कैसे होगा ये –

आइए जानते हैं कैसे ?

एक साधारण कागज़ की मोटाई एक सेंटीमीटर के 100वें हिस्से जितनी होती है यानि कि 1 मिलीमीटर का 10वां हिस्सा (0.1 मिलीमीटर)।

कागज़ को 1 बार मोड़ने से उसकी मोटाई 2 गुणा हो जाएगी, 2 बार मोड़ने से 4 गुणा, 3 बार मोड़ने से 8 गुणा और 4 बार मोड़ने से 16 पेज़ों जितनी मोटाई हो जाएगी। यानि कागज को केवल 4 बार मोड़ने पर उसकी मोटाई 1.6 mm हो जाएगी

कागज़ को इसी तरह मोड़ते जाने से 9 बार मोड़ने पर कागज़ की मोटाई 512 गुणा हो जाएगी यानि कि एक मोटी किताब जितनी (51.2 mm)। 13 बार मोड़ने पर कागज़ की मोटाई एक ढ़ाई फुट के टेबल जितनी हो जाएगी (819.2mm)। 20 बार मोड़ने पर 0.1 मिलीमीटर मोटाई वाले कागज़ की मोटाई कुतुबमीनार ( 72.5मीटर ) से भी 30 मीटर ज्यादा हो जाएगी (104.85m)।

इसी तरह से 30 बार मोड़ने पर कागज़ की मोटाई 107 किलोमीटर और 42 बार मोड़ने पर 4 लाख 39 हज़ार 804 किलोमीटर हो जाएगी जो कि पृथ्वी और चांद के बीच की दूरी से भी 55 हज़ार किलोमीटर ज्यादा है !

अब अगर कागज़ को 42 से ज्यादा बार मोड़ा जाए तो क्या होगा?

– 51 बार मोड़ देने से कागज़ पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी जितना मोटा हो जाएगा (2.25×10^8)
– 94 बार मोड़ देने से कागज़ अब तक के ज्ञात ब्रह्मांड जितना मोटा हो जाएगा।

क्या आप जानते है नई गाड़ी की नंबर प्लेट पर A/F का क्या मतलब होता है ?

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IAS इंटरव्यू में पूछा नई गाड़ी की नंबर प्लेट पर A/F का क्या मतलब है ?

भारत में आईएएस की परीक्षा सबसे मुश्किल परीक्षाओं में से एक मानी जाती हैं। आईएएस के इंटरव्यू में बहुत सारे ऐसे प्रश्न पूछे जाते है जिनका जवाब बहुत सारे लोगो को मालूम ही नहीं होता है | आईएएस के इंटरव्यू में कैंडिडेट से बहुत सारे ऐसे प्रश्न पूछे जाते है जिसके वजह से कैंडिडेट से कई बड़ी गलतियां भी हो जाती हैं, उनमें से एक गलती यह है कि कई लोग इस इंटरव्यू में अपना धैर्य नहीं रख पाते और सोचे बिना ही गलत जवाब दे देते है.आईएएस की परीक्षा में कई बार कुछ ऐसे सवाल पूछे जाते हैं जिनका कुछ मतलब भी नहीं होता है .

इसलिए मै आज आपको आईएएस इंटरव्यू में पूछे जाने वाले एक ऐसे सवालों के बारे में बताऊंगा. जिन्हें देखते तो बहुत लोग है और उनके बारे में सोचते भी है पर उनका जवाब उन्हें नहीं मालूम होता है

नई गाड़ी की नंबर प्लेट पर A/F का क्या मतलब है ?

जवाब-नयी गाड़ी की नंबर प्लेट पर A/F का मतलब “Applied For” होता है.इसका मतलब यह है कि गाड़ी के मालिक ने गाड़ी के नए नंबर के लिए अप्लाई किया हुआ है और जब तक गाड़ी का परमानेंट नम्बर नही मिल जाता है तब तक उसको नम्बर प्लेट पर A/F या Applied For लिखने की छूट दी गयी है.

Motor Vehicle Act 1989 के अनुसार सभी गाडियों को रजिस्ट्रेशन करवाना आवश्यक होता है | इसलिए जब तक नयी गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नंबर नहीं मिल जाता तब तक यह A/F के नंबर प्लेट पर चला सकते है | लेकिन अगर परमानेंट नंबर मिल गया है तो A/F नंबर के साथ गाड़ी चलाना गैर क़ानूनी हो जाता है |

क्या आप ट्रेन के डिब्बे के पीछे लिखे इस ‘X’ के अर्थ को जानते हैं?

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जानिए ट्रेन के आखिरी  डिब्बे के पीछे लिखे इस ‘X’ का  अर्थ

हर दिन लाखों लोग ट्रेन से यात्रा करते हैं क्या आपने कभी ट्रेन में आखिरी डिब्बे को देखा है? कई लोगों ने ट्रेन के आखिरी डिब्बे को देखा होगा लेकिन कभी गौर नहीं किया होगा लेकिन उस पर लिखे X का का अर्थ कोई नहीं जानता होगा । आज, हम आपको ट्रेन के आखिरी बोगी पर लिखे ‘एक्स’ का अर्थ बताएंगे।

यह निशान बनाया जाता है ताकि ट्रेन कर्मचारी जान सकें कि पूरी ट्रेन पूरी हो गई है।

अगर आपने कभी ध्यान दिया है, तो आपने देखा होगा कि ट्रेन के आखिरी बॉक्स में एक्स पर एक निशान है। क्या आपने कभी सोचा है कि इसका क्या मतलब है? यह एक्स चिह्न अंतिम बोगी पर पिला रंग से बना है।

इतना ही नहीं, कई ट्रेनों के अंतिम डिब्बे में, बिजली की दीपक भी शुरू हो चुकी है। 5 सेकंड में एक बार यह दीप चमकता है । नियम के मुताबिक, प्रत्येक ट्रेन के अंतिम दल पर यह निशान होना ज़रूरी है।

इसके अलावा, ट्रेन के अंतिम डिब्बे पर एक बोर्ड भी है जहां ‘एलवी’ लिखा जाता है। यह बोर्ड अंग्रेजी में लिखा जाता है और उसका रंग काला या सफेद होता है। इस बोर्ड का मतलब अंतिम वाहन(Last Vehicle) है

यदि कोई रेलगाड़ी बीत चुकी है और स्टाफ एलवी बोर्ड नहीं देखता है, तो इसका मतलब है कि पूरी ट्रेन नहीं आई है। इस स्थिति में आपातकालीन कार्रवाई शुरू की गई है।

मुंबई की मूक-बधिर लड़की का काम विदेशों में छाया

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अमेरिका तक से आते है  अमी द्वारा  तैयार किये कपड़ो के आर्डर

 
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कपड़ों पर कढ़ाई करती अमी
 
बुलंद हौसले हो तो कोई भी शारीरिक कमी आपको कामयाब होने से नहीं रोक सकती है | इस कथन को अक्षरशः सही साबित कर के दिखाई है मुंबई की एक लड़की ने . ये कहानी है मुंबई की अमी की, जो जन्म से ही सुन और बोल नहीं सकतीं | लेकिन ये शारीरिक कमी भी उनकी मंजिल को नहीं रोक पाई और आज अमी न सिर्फ अपने पैरो पर कड़ी है कढाई बुनाई का एक सफल कारोबार करती है | उनके तैयार किये कपड़ो के आर्डर अमेरिका तक से आते है तो चलिए जानते है उनका सफ़र 

 
इलाज की पर्याप्त सुविधा नहीं होने के कारण पैदा हुयी दिव्यांग 
अमी की माँ लता खारा बताती है – प्रेग्नेंसी के  तीसरे महीने में मुझे खसरे की समस्या हुई, उस समय हम ओडिशा में रहते थे. वहां इलाज की पर्याप्त सुविधाएं नहीं थी.जिसके कारण जब मेरी बेटी ने जन्म लिया तो वह सुन और बोल नहीं पा रही थी.”

अपनी ‘क्लास की जान’ थी अमी

अमी के स्कूल के दिनों को याद करते हुए उनकी मां लता ने बीबीसी को बताया, ” शुरुआत में अमी का दाखिला दिव्यांग स्कूल में करवाया गया, लेकिन उनकी प्रतिभा और कौशल को देखते हुए, जल्दी ही अमी सामान्य स्कूल में जाने लगीं.अमी बचपन से ही सबका ख्याल रखने वाली लड़की थी.  खुद शारीरिक कमजोरियों से जूझने के बावजूद वह अपने साथी बच्चों के साथ मिल-जुल कर रहती थी. उनके स्कूल के टीचर उन्हें ‘क्लास की जान’ कहा करते थे ”

ज़िंदगी की तमाम मुश्किलों से लड़ने के बाद भी हुयी  अपने पैरों पर खड़ा 

स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद अमी की ज़िंदगी में एक ऐसा  बुरा दौर भी आया, जब वे डिप्रेशन में चली गई थी. उस मुश्किल वक्त में    उनकी माँ ने उनका साथ दिया और उन्हें दोबारा  खड़े होकर लड़ने की हिम्मत दी. इसके बाद अमी ने दो साल का टेक्सटाइल का कोर्स किया,और  साथ  ही  ब्यूटीशियन का कोर्स भी किया.
धीरे-धीरे अमी ने अपने घर में कढ़ाई-बुनाई का काम शुरू कर दिया. उनके इस काम में पूरे परिवार ने उनका साथ दिया.

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अपनी मां लता खारा के साथ अमी
लोगो को उनका काम  आया   पसंद 
मुंबई के अंधेरी वेस्ट में रहनी वाली अमी को शुरुआत में आस-पास के लोगों के ऑर्डर  ही आते थे लेकिन  धीरे-धीरे लोग  उनके काम  को   पसंद करने लगे  फिर मुंबई समेत दूसरे राज्यों से भी लोगों ने उनकी कढ़ाई किए कपड़े ऑर्डर पर मंगवाने शुरू कर दिए.

विदेशो में भी उनके बनाये सामानों की हुयी तारीफ 
अमी की बहन रिद्दी अमरीका में रहती हैं. जब वे अमी के बनाए कुछ सामान को अपने साथ कैलिफोर्नियां लेकर गईं तो वहां भी लोगों ने अमी के बनाये सामान को  बहुत पसंद किया .अब  उन्हें इरवाइन और सैन डिएगो से भी कई ऑर्डर मिलने लगे हैं.

लोगों की डिमांड बढ़ने लगी

अमी कपड़ों पर कढ़ाई के अलावा खूबसूरत क्लिप और हेयर बैंड भी डिजाइन करती हैं. उनके ग्राहकों में हेयरबैंड की डिमांड बहुत ज़्यादा है. अमरीका से उन्हें सबसे ज़्यादा इन हेयरबैंड के ऑर्डर मिलते हैं. अमी की माँ बताती  हैं कि उन्हें रोजाना कई ऑर्डर की डिमांड आती है. लेकिन अभी अमी यह काम अकेले ही देख रही हैं, इसलिए महीने में कपड़ों पर कढ़ाई करने के 8-10 ऑर्डर ही ले पाती हैं. हर ऑर्डर की कीमत सामान पर निर्भर करती है, वह 2000-5000 रुपये प्रति ऑर्डर तक चार्ज करती हैं.

खुद का ट्रेनिंग स्कूल खोलने का इरादा

लगातार बढ़ती मांग के बाद अमी ने खुद का ट्रेनिंग स्कूल खोलने का इरादा किया है. इसके लिए उन्होंने नई मशीनें और जगह का चुनाव कर लिया है. वे बच्चों को कढ़ाई का काम सिखाना चाहती हैं साथ ही इसके जरिए वे ऑर्डर की बढ़ती डिमांड को भी जल्दी पूरा करने की कोशिश कर रही हैं.

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Bigg Boss में पहुचने वाली ज्योति ने कहा – शहर की छोरियों से बिहार के गांव की गोरियां कम नहीं

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 शहर की छोरियों से बिहार के गांव की गोरियां कम नहीं

बिग बॉस के घर में पहुंची ज्योति का कहना है कि वह इस घर में रहते हुए अपनी पर्सनालिटी दुनिया को दिखाना चाहती हैं कि बिहार के गांव की लड़कियां भी किसी से कम नहीं।

बिग-बॉस सीजन 11 की प्रतिभागी  बिहार की बेटी ज्योति कुमारी का कहना है कि गांव की लड़कियां किसी से कम नही होती है । बिग-बॉस के माध्यम से  वह कहती हैं कि ‘शहर वालों का मानना है कि गांव की लड़कियां सीधी साधी होती हैं। लेकिन मैं न तो सीधी हूं न तो सादी हूं। इस बार शहर की छोरियों के बीच में गांव की गोरी का होना भी जरूरी है।’

सभी कॉन्टेस्टेंट का बिग बॉस के घर में रहते घर के सदस्यों से जैसी उम्मीदें थीं वह वैसा ही कर रहे हैं। चारों तरफ घर में अशांति का माहौल छाया हुआ है। इस  में बिहार के छोटे से गांव गंगाचल मनकाने की रहने वालीं ज्योति भी घर-सदस्य बनकर बाकि घर सदस्यों के बीच हैं। ज्योति  आत्मनिर्भर है और उनका खुद पर विश्वास है ।  वह बच्चों को ट्यूशन देकर  खुद का खर्चा निकलती है ।

ज्योति की मां कहती  हैं कि ज्योति का स्वभाव ऐसा है कि जहां कुछ गलत हो रहा होगा वह वहां बीच में जाकर बोल देगी। वह खुद भी कहती हैं कि वह एक  मुंह-फट लड़की हैं। वह कहती हैं, ‘मै किसी के पीठ पीछे नहीं  बोलती हु ।  मुझे जिसके बारे में जो बोलना होता है मैं सामने बोलती हूं। जो लोग अमीर गरीब में फर्क करते हैं मैं उन्हें बिलकुल पसंद नहीं करती हूं।’

ज्योति  के पिता ने बताया,’ज्योति मुंबई जाकर हिरोइन बनना चाहती है ।

ज्योति बताती हैं कि उनके गांव में लड़कियों को ज्यादा छूट नहीं दी जाती, मैट्रिक के बाद ही उनकी शादी करा दी जाती है। उन्हें पढ़ने कामौका तक नहीं मिलता। लड़कियां यहां अपनी मर्जी का कुछ नहीं कर सकतीं। उनके सपनें क्या हैं कुछ मायने नहीं रखता। लेकिन एक चपरासी की बेटी के सपने मामूली हों यह जरूरी तो नहीं?

बेटी के सम्मान में एक पौधा लगाने के अभियान के जनक -हरपाल सिंह

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हरपाल सिंह (HARPAL SINGH ) 

सेव द चिल्ड्रन, इंडिया के चेयरमैन

 
हरपाल सिंह (HARPAL SINGH )   सेव द चिल्ड्रन, इंडिया के चेयरमैन

दोस्तों आज हम बता रहे है  मशहूर हॉस्पिटल चेन के चेयरमैन और नन्ही छाह फाउंडेशन के संस्थापक हरपाल सिंह के बारे में जो पिछले एक दशक से पर्यावरण और महिला कल्याण के अभियान में जुटे हैं। वह सेव द चिल्ड्रन, इंडिया के चेयरमैन भी हैं। 

शुरू से ही मन में थी कुछ करने की तमन्ना 

हरपाल सिंह के मन में शुरू से पर्यावरण और बेटियों के लिए कुछ करने की तमन्ना थी। लेकिन उन्होंने  कभी नहीं सोचा था कि इस दिशा में कुछ खास कर पाएंगे ।उनके जीवन में एक ऐसी घटना घटी जिसने उनकी जिंदगी को नयी दिशा दी   उनका  मानना है कि जीवन में कुछ भी यों ही अचानक नहीं हो जाता। हर घटना के पीछे कोई न कोई मकसद जरूर होता है। खयाल नेक हो, तो सही रास्ता मिल ही जाता है

एक घटना ने बदला जिन्दगी का लक्ष्य 

 
यह घटना  जून, 2001 की है।   हरपाल सिंह  स्वर्ण मंदिर गए थे  उन्हें  अपने एक दोस्त से मिलना था। उसे आने में देर हो गई थी, इसलिए वह  मंदिर के बाहर इंतजार कर रहे थे । दोपहर का समय था, काफी तेज धूप थी। इसलिए वह पास के एक खाली पार्क में चले गए । लेकिन वह पार्क पूरी तरह वीरान वीरान था । वहां हरियाली नाम की कोई चीज नहीं थी। उन्होंने  सोचा  कि स्वर्ण मंदिर के पास ऐसी वीरान जगह नहीं होनी चाहिए।उनके  मन में आया, क्यों न इस जमीन को हरा-भरा बनाया जाए। उन्हीने अपने दोस्तों से बात की। वे उनकी  मदद करने को राजी हो गए, लेकिन इसके लिए उन्हें सरकारी विभाग की अनुमति की जरूरत थी। हमारे देश में अच्छा काम करना भी आसान नहीं होता। जाहिर है, यहां हर काम में प्रशासनिक अड़चनों का सामना करना पड़ता है। खैर, इन सबके बावजूद उन्होंने  आवेदन किया और छह महीने बाद ही उन्हें अपना काम शुरू करने की अनुमति भी मिल गई। सभी इस नेक कम  में जुट गएऔर अपना  पूरा-पूरा सहयोग दिया। आज अगर आप उस वीरान स्थान पर जाएं, तो वहां एक खूबसूरत, हरा-भरा पार्क देख सकते हैं।
नन्ही छाह

एक रविवार की सुबह हरपाल सिंह के  मन में खयाल आया कि क्यों न इस हरियाली अभियान को बेटियों के कल्याण से जोड़ा जाए। आखिर पौधा और बेटी, दोनों ही जननी हैं। एक प्रकृति को जन्म देता है, और दूसरी मानवता को। वे  सोचने लगा कि पौधा लगाने के अभियान को बेटियों से कैसे जोड़ा जाए। तभी खयाल आया कि अगर हर व्यक्ति बेटी पैदा होने पर एक पौधा लगाए, तो हमारे आस-पास की दुनिया कितनी खूबसूरत हो जाएगी। आइडिया क्लिक कर गया। उन्होंने  तय किया कि वह लोगों को इस बात के लिए प्रेरित करेंगे  कि वे अपने परिवार में बेटी पैदा होने पर एक पौधा लगाने का संकल्प लें। अब सवाल था कि इस अभियान को क्या नाम दिया जाए? उन्होंने अपनी पत्नी से बात की। उनकी पत्नी को भी उनकी यह बात बहुत पसंद आई उन्होंने ही उनके इस अभियान का नाम  नन्ही छाया सुझाया । हरपाल सिंह को भी  ये नाम नाम भा गया। नन्ही का मतलब बेटी और छाया का मतलब पौधा।
http://www.nanhichhaan.com/
http://www.nanhichhaan.com/
 
सभी धर्म के लोगो ने अपनाया उनका विचार 
 
स्वर्ण मंदिर के पास के पार्क को बहुत खूबसूरती से विकसित करने के बाद हरपाल सिंह के मन में विचार आया  कि हरियाली सिर्फ गुरुद्वारे के पास क्यों।  दूसरे धर्मों के बीच भी नन्ही छांव का प्रसार किया जाना चाहिए । इसलिए हरपाल सिंह ने  सभी धर्मो के प्रमुखों को एक मंच पर बुलाया। शुरुआत में डर लगा रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए। पर ये सारी आशंकाएं दूर हो गईं, जब तमाम धार्मिक नेता एक मंच पर एकत्र हुए। हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, यहूदी और जैन धर्मों के नेता एक मंच पर जुटे। हमने पर्यावरण और बेटियों के कल्याण पर चर्चा की। वे सब इस विचार से बहुत उत्साहित थे। सबने कहा कि वे नन्ही छांव अभियान को अमल में लाएंगे। उनका समर्थन पाकर हमारा उत्साह और बढ़ गया।हमने  उनसे कहा कि आप इस विचार को आगे बढ़ाने के लिए और सुझाव दें। यह अनुभव काफी सुखद रहा।

बेटी के जन्म पर पौधा लगाने का दिया संकल्प 

हरपाल सिंह ने  तय किया कि  इस अभियान को स्कूलों, अस्पतालों, सरकारी विभागों और औद्योगिक संस्थानों तक भी लेकर जाना चाहिए ।हरपाल सिंह कहते है – मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि दर्जनों संस्थानों ने इस अभियान को अपनाया है। एक अस्पताल ने तय किया कि वह अपने यहां बेटी पैदा करने वाली हर मां एक पौधा गिफ्ट करेगा। कई और अस्पतालों ने इस विचार को अपनाया। पंजाब और राजस्थान में तमाम स्कूलों ने गांवों को गोद लिया है, जहां वे पेड़ लगाने के साथ ही ग्रामीणों को बेटियों के कल्याण के बारे में जागरूक भी करते हैं।

बचपन में मिली प्रेरणा

हरपाल सिंह अपने पिता का इकलौता बेटे  थे । उनके दोनों चाचा का कोई बेटा नहीं था  इसलिए उन्हें अपनी तीनों माताओ  से भरपूर प्यार-दुलार मिला।वे कहते है – हमारे परिवार में हम भाई-बहनों के बीच कभी भेदभाव नहीं हुआ। सच कहूं, तो तीन माओं के दुलार और चार बहनों के प्यार ने मुझे महिलाओं के प्रति बहुत संवेदनशील बनाया। बचपन से बेटियों के लिए कुछ करने की तमन्ना थी। नन्ही छांव अभियान ने उस ख्वाहिश को पूरा किया है। आज मेरी तीन पोतियां हैं, जिनसे मैं बहुत प्यार करता हूं।  मैं यह उम्मीद करता हूं कि आप सभी अपनी बेटी के नाम पर पौधे जरूर लगाएंगे।
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रेप से लड़कर गायकी को अपना सब कुछ देने वाली मल्लिका-ए-ग़ज़ल- बेगम अख्तर साहिबा

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बेगम अख्तर साहिबा (मल्लिका-ए-ग़ज़ल)

BEGUM AKHTAR BIOGRAPHY IN HINDI

भारत में शास्त्रीय रागों पर आधारित गजल गायकी में बेगम अख्तर का प्रमुख स्थान है उनकी तारीफ में
उर्दू के अजीम शायर कैफी आजमी की कही यह पंक्ति ही काफी है- ‘गजल के दो मायने होते हैं, पहला गजल और दूसरा बेगम अख्तर। उनकी गायकी जहां एक ओर चंचलता और शोखी भरी थी, वहीं दूसरी ओर उसमें शास्त्रीयता और दिल को छू लेने वाली गहराइयां भी थीं। आवाज में गजब का लोच, रंजकता और भाव अभिव्यक्ति के कैनवास को अनंत रंगों से रंगने की क्षमता के कारण उनकी गाईं ठुमरियां बेजोड़ हैं।बेहद साफ आवाज और शुद्ध उर्दू उच्चारण रखने वाली बेगम अख्तर हिंदुस्तानी संगीत की कोहिनूर हीरा हैं।बेगम अख्तर के बारे में काफी कुछ लिखा और पढ़ा गया पर उनके व्यक्तित्व के बारे में बहुत कम लोग ही जानते है | आईये जानते है बेगम अख्तर के बारे में ——-

बचपन से ही  बनना चाहती थीं पार्श्व गायिका

बेगम अख्तर का जन्म सात अक्तूबर 1914 उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में हुआ था । उनके बचपन का नाम बीबी था । बेगम अख्तर बचपन से ही पार्श्व गायिका बनना चाहती थीं लेकिन उनके परिवार वाले उनकी इस इच्छा के सख्त खिलाफ थे।लेकिन उनके चाचा ने उनके शौक को आगे बढ़ाया। कुलीन परिवार से ताल्लुक रखने वाली अख्तरी बाई को संगीत से पहला प्यार सात वर्ष की उम्र में थियेटर अभिनेत्री चंदा का गाना सुनकर हुआ। उस जमाने के विख्यात संगीत उस्ताद अता मुहम्मद खान, अब्दुल वाहिद खान और पटियाला घराने के उस्ताद झंडे खान से उन्हें भारतीय शास्त्रीय संगीत की दीक्षा दिलाई गई।

गाने सिखने से किया मना

बचपन में संगीत सिखने के वक्त उस्ताद मोहम्मद खान और बेगम अख़्तर के बीच ऐसी घटना हुई कि बेगम अख़्तर ने गाना सीखने से मना कर दिया। उन दिनों बेगम अख़्तर सही सुर नहीं लगा पाती थीं। उनके गुरु ने उन्हें इसके बारे में कई बार सिखाया और जब वह नहीं सीख पाई तो उन्हें डांट दिया। जेसके कारन बेगम अख्तर रोने लगी और उन्होंने कहा की मुझसे नहीं हो पा रहा है मै गाना नहीं सीखूंगी । तब उनके उस्ताद ने कहा बस इतने में ही हार मान गयी | ऐसे हिम्मत नहीं हारते | मेरी बहादुर बिटिया चलो एक बार फिर से सुर लगाने में जुट जाओ। उनकी यह बात सुनकर बेगम अख़्तर ने फिर से रियाज़ शुरू किया और सही सुर लगाये।

गाना सुनकर उस्ताद के आँखों   में आया आंसू 

तिस में दशक में बेगम अख्तर ने पारसी थियेटर में कम करना शुरू किया जिसके कारन उनका रियाज छुट गया | इस बात से उनके गुरु अत खान बहुत नाराज़ हुए और उन्होंने कहा जब तक तुम नाटक में काम करना नहीं छोड़ती मैं तुम्हें गाना नहीं सिखाऊंगा। उनकी इस बात पर बेगम अख़्तर ने कहा आप सिर्फ एक बार मेरा नाटक देखने आईये उसके बाद आप जो कहेंगे,वह मैं करूंगी। उस रात मोहम्मद अता खान बेगम अख़्तर के नाटक तुर्की हूर देखने गये। जब बेगम अख़्तर ने उस नाटक का गाना ‘चल री मोरी नैय्या’ गाया तो उनकी आंखों में आंसू आ गये और नाटक समाप्त होने के बाद बेगम अख़्तर से उन्होंने कहा बिटिया तू सच्ची अदाकारा है जब तक चाहो नाटक में काम करो।

सरोजनी नायडू ने खुश होकर दी  साड़ी 

बेगम अख्तर ने 15 वर्ष की बाली उम्र में मंच पर अपनी पहली प्रस्तुति दी थी। यह कार्यक्रम वर्ष 1930 में बिहार में आए भूकंप के पीड़ितों के लिए आर्थिक मदद जुटाने के लिए आयोजित किया गया था, जिसकी मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कवयित्री सरोजनी नायडू थीं। वह बेगम अख्तर की गायिकी से इस कदर प्रभावित हुईं कि उन्हें उपहार स्वरूप एक साड़ी भेंट की।

रेप की वीभत्सता को हराने वाली बेगम अख्तर

बेगम अख्तर ने कई उस्तादों से सीखा मगर संगीत की तालीम का यह सफर कोई सुखद सफर नहीं था। सात साल की उम्र में बिब्बो के एक उस्ताद ने गायकी की बारीकियां सिखाने के बहाने उनकी पोशाक उठाकर अपना हाथ उनकी जांघ पर सरका दिया। इस प्रसंग के बहाने बताते चलें कि बेगम अख्तर पर किताब लिखने वाली रीता गांगुली ने एक जगह कहा है कि संगीत सीखने वाली करीब 200 लड़कियों से उन्होंने बात की और लगभग सभी ने अपने उस्तादों को लेकर इस प्रकार की शिकायत की। बेगम अख्तर के साथ बचपन में एक हादसा हुआ जिसमे मात्र 13 वर्ष की कची उम्र में ही वो माँ बन गयी हुआ ऐसा की बिहार के एक राजा ने उनका कदरदान बनकर उन्हें उनकी कला को देखने के लिए बुलाया और उनका बलात्कार किया इसके बाद अख्तरी बाई प्रेग्नेंट हो गई और एक बच्ची को जन्म दिया जिसका नाम शमीमा है परन्तु लोकलाज के डर से उन्होंने इस बात को दुनिया से छुपाए रखा और शमीमा को अपनी छोटी बहन बताती रही काफी लंबे समय बाद दुनिया को पता चला कि यह उनकी बहन नहीं बल्कि उनकी नाजायज बेटी है | लेकिन इस क्रूर हादसे के बावजूद बेगम अख्तर ने दोबारा खुद को समेटा और जीवन को नए सिरे से शुरू किया।

अख़्तरी बाई से बेगम अख़्तर

1945 में जब उनकी शौहरत अपनी चरम सीमा पर थी तब उन्हें शायद सच्चा प्यार मिला और उन्हों ने इश्तिआक अहमद अब्बासी, जो पेशे से वकील थे, से निकाह कर लिया और अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी से बेगम अख़्तर बन गयीं। गायकी छोड़ दी और पर्दानशीं हो गयीं। बहुत से लोगों ने उनके गायकी छोड़ देने पर छींटाकशी की, “सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली” लेकिन उन्होंने अपना घर ऐसे बसाया मानों यही उनकी इबादत हो। पांच साल तक उन्होंने बाहर की दुनिया में झांक कर भी न देखा।

सारे बंधन को तोड़कर संगीत को दिया अपना जीवन

शादी के बाद सामाजिक बंधनों की वजह से बेगम साहिबा को गाना छोड़ना पड़ा।बेगम अख्तर के लिए गायकी छोड़ना वैसा ही था, जैसे एक मछली का पानी के बिना रहना। वे करीब पांच साल तक नहीं गा सकीं, जिसके कारण उनका सेहत ख़राब हुआ और वह बीमार रहने लगीं। यही वह वक्त था जब संगीत के क्षेत्र में उनकी वापसी उनकी गिरती सेहत के लिए मददगार साबित हुई और 1949 में वह रिकॉर्डिग स्टूडियो लौटीं। उन्होंने लखनऊ रेडियो स्टेशन में तीन गजल और एक दादरा गाया। इस प्रस्तुति के बाद उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े और उन्होंने संगीत गोष्ठियों में गायन का रुख किया। गायकी का यह सिलसिला उनकी आखिरी सांस तक जारी रहा। बेगम साहिबा का आदर समाज के जाने-माने लोग करते थे। सरोजनी नायडू और शास्त्रीय गायक पंडित जसराज उनके जबर्दस्त प्रशंसक थे, तो कैफी आजमी भी अपनी गजलों को बेगम साहिबा की आवाज में सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

खुदा की नेमत बेगम अख्तर

उनकी गायकी जहां एक ओर चंचलता और शोखी भरी थी, वहीं दूसरी ओर उसमें शास्त्रीयता और दिल को छू लेने वाली गहराइयां भी थीं। आवाज में गजब का लोच, रंजकता और भाव अभिव्यक्ति के कैनवास को अनंत रंगों से रंगने की क्षमता के कारण उनकी गाईं ठुमरियां बेजोड़ हैं। बेगम अख्तर अपनी मखमली आवाज में गजल, ठुमरी, ठप्पा, दादरा और ख्याल पेश कर मशहूर होनेवाली एक सदाबहार गायिका थीं। उनकी गायकी आज भी लोगों को दीवाना बना देती है। बेहद साफ आवाज और शुद्ध उर्दू उच्चारण रखने वाली बेगम अख्तर हिंदुस्तानी संगीत की कोहिनूर हीरा हैं।

 मल्लिका-ए-गजल मिला उपनाम 

उन्होंने न सिर्फ़ संगीत की दुनिया में वापस कदम रखा बल्कि हिंदी फ़िल्मों में गायन के साथ अभिनय भी शुरू कर दिया। नाटकों से उनका रिश्ता 20 के दशक और हिंदी फ़िल्मों से 30 के दशक में ही जुड़ गया था।
बेगम अख्तर ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत एक दिन का बादशाह से की थी लेकिन दुर्भाग्य से उनकी यह फिल्म नहीं चल सकी. इसके कुछ समय बाद वो लखनऊ लौट आई और वहां पर उनकी मुलाकात निर्माता-निर्देशक महबूब खान से हुई बेगम अख्तर की प्रतिभा से महबूब खान काफी प्रभावित थे और उन्हें महबूब खान ने मुंबई बुलाया. अबकी बार मुंबई जाने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और फिल्मों के साथ साथ है अपने गायकी के शौंक को भी बरकार रखा और मल्लिका-ए-गजल के नाम से पहचानी जाने लगी

पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित 

अदाकारा के रूप में उनकी आखिरी पेशकश थी सत्यजीत रे की बंगाली फ़िल्म ‘जलसा घर’ जिसमें उन्होंने शास्त्रीय गायिका का किरदार निभाया था। उन्होंने करीब 400 रचनाओं को अपना स्वर दिया। ढेरों पुरस्कार मिलने और असंख्य प्रशंसक हासिल करने के बावजूद बेगम अख्तर में लेशमात्र भी घमंड नहीं था। वे पूरी उम्र मशहूर उस्तादों से सीखती रहीं। उनकी इच्छा थी कि केवल अच्छा ही नहीं गाना है, बल्कि बेहतर से बेहतर भी होते जाना है। बेगम अख्तर ने 1961 में पाकिस्तान, 1963 में अफगानिस्तानऔर 1967 में तत्कालीन सोवियत संघ में भी अपने सुरों का जादू बिखेरा। भारत सरकार ने इस सुर साम्राज्ञी को पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित किया था। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था।

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया

बेग़म अख्तर गजल, ठुमरी और दादरा गायन शैली की बेहद लोकप्रिय गायिका थीं। उन्होंने ‘वो जो हममें तुममें क़रार था, तुम्हें याद हो के न याद हो’, ‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया’, ‘मेरे हमनफस, मेरे हमनवा, मुझे दोस्त बन के दवा न दे’, जैसी कई दिल को छू लेने वाली गजलें गायी हैं।

एक महान गायिका की अप्रतिम विदाई

1974 में बेगम अख्तर ने 30 अक्तूबर, अपने जन्मदिन के मौके पर कैफी आजमी की यह गजल गाई- ‘वो तेग मिल गई, जिससे हुआ था कत्ल मेरा, किसी के हाथ का लेकिन वहां निशां नहीं मिलता।‘ इसे सुनकर वहां मौजूद कैफी सहित तमाम लोगों की आंखें नम हो गईं। किसी को नहीं मालूम था कि इस गजल का यह मिसरा इतनी जल्द सच हो जाएगा। बेगम अख्तर जब अहमदाबाद के मंच पर ये पर गा रही थीं तब उनकी तबीयत काफी खराब थी। उनसे अच्छा नहीं गाया जा रहा था। ज्यादा बेहतर की चाह में उन्होंने खुद पर इतना जोर डाला कि उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा, जहां से वे वापस नहीं लौटीं। हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया। लखनऊ के बसंत बाग में उन्हें सुपुर्दे-खाक किया गया। उनकी मां मुश्तरी बाई की कब्र भी उनके बगल में ही थी।

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अनुभवी लोग आपके आइडिया को गलत बताते है तो आपकी जिम्मेदारी है कि इसे सही साबित करके दिखाएं।

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नाकामी से निकला कामयाबी का रास्ता

अरुणाभ कुमार, संस्थापक, टीवीएफ

(ARUNABH KUMAR,FOUNDER-THE VIRAL FEVER)

दोस्तों आज हम बताने जा रहे है बिहार के एक ऐसे शख्स के बारे में जिसके क्रिएटिविटी को हर किसी ने नकार दिया मजबूरन उसे  यू-टयूब  का सहारा लेना पड़ा | 2010 में उसने  टीवीएफ नाम की कंपनी बनाई। उनका पहला वीडियो यू-टयूब पर हिट रहा। उनके दूसरे वीडियो राउडीज को पांच दिन के अंदर करीब दस लाख लोगों ने पंसद किया। 18 महीने के अन्दर 18 million views , 200,000 subscribers वो भी सिर्फ 40 विडियो अपलोड करके । इस तरह का पोपुलर होना हर यू-टयूब  यूजर चाहता है लेकिन यहाँ तक पहुचना अरुणाभ के लिए आसन नहीं था जानिए टीवीएफ के फाउंडर अरुणाभ कुमार के बारे में 

टीवी देखने का था  शौख

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के रहने वाले अरुणाभ कुमार को बचपन से ही टीवी देखने का बड़ा शौख था |लेकिन उनके पिताजी पढाई को लेकर सख्त थे उन्हें यह कतई पसंद नहीं था की बच्चे टीवी देखे | इसलिए जब अरुणाभ ने टीवी देखने की जिद की तो पहले उनके पिताजी ने मना किया फिर बाद में उन्होंने तय किया की टीवी सिर्फ रविवार को ही देखा जायेगा

पिताजी चाहते थे की बेटा  इंजीनियर बने 

अरुणाभ के पिताजी चाहते थे की बेटा बड़ा होकर इंजीनियर बने | इसलिए हाईस्कूल पास करने के बाद अरुणाभ आईआईटी जेईई की तैयारी में जुट गए | पहली कोशिश में वह नाकाम रहे जिससे उनके घरवाले बहुत नाराज हुए ।सबको यह लगा की शायद उनकी तैयारी में ही कमी थी उसके बाद अरुणाभ ने कोटा जाकर तैयारी करना शुरू कर दिया

समय के साथ उनकी पसंद बदलती गई

कोटा में अरुणाभ ने जम कर मेहनत की और दूसरी कोशिश में वह सफल रहे । आईआईटी खड़गपुर में उनका दाखिला हो गया। शुरुआत में तो उन्हें कैंपस बहुत पसंद आया, लेकिन समय के साथ उनकी पसंद बदलती गई।
अरुणाभ कहते हैं-
पहले सेमेस्टर के दौरान मेरे अंदर अर्थशास्त्री बनने की ख्वाहिश थी, दूसरे साल में मैंने सोचा कि एमबीए करूंगा, तीसरे साल मन में आया कि आईएएस बनने की कोशिश करते हैं। तय नहीं कर पा रहा था कि क्या करूं।

थिएटर की तरफ हुआ  रुझान

इस बीच उनका रुझान थिएटर की तरफ हुआ चौथे साल वह इंस्टीट्यूट की तरफ से एक सांस्कृतिक समारोह में हिस्सा लेने कोलकाता पहुंचे। उनके निर्देशन में तैयार एक लघु नाटक को वहां अवॉर्ड मिला। कोलकाता से जब वह वापस खड़गपुर पहुंचे, तो उनका मिजाज कुछ बदला-बदला सा था। उन्होंने लाइब्रेरी में फिल्म निर्माण से संबंधित कुछ किताबें पढ़ीं।अरुणाभ बताते हैं-

मैंने महसूस किया कि शायद फिल्म मेकिंग ऐसा काम है, जो मैं करना चाहता हूं। मैंने लाइब्रेरी से किताब लेने के लिए अपने एक प्रोफेसर को खत लिखा। उन्होंने उन्होंने यह कह कर खत फाड़ दिया कि इंजीनियरिंग के छात्र को फिल्म मेकिंग की किताब क्यों चाहिए?

इंटरनेट पर ही फिल्म निर्माण से सम्बंधित  जानकारीयां  की हासिल 

इन सब के बावजूद अरुणाभ के मन से फिल्म निर्माण का भूत नहीं उतरा । इसके बाद उन्होंने इंटरनेट पर ही फिल्म निर्माण से सम्बंधित तमाम जानकारीयां हासिल की। खड़गपुर से पढ़ाई पूरी करने के बाद वह मुंबई आ गए। यहां उन्हें एक अमेरिकी एयरफोर्स प्रोजेक्ट में बतौर रिसर्च कंसल्टेंट नौकरी मिल गई। इस दौरान उनका संपर्क मुंबई में लेखन और थिएटर से जुड़े कुछ युवाओं से हुआ ।

प्रोडक्शन हाउस ने नहीं दिया काम 

अच्छा वेतन और भरपूर सुविधाओं के बावजूद उनका मन नहीं लगा और उन्होंने नौकरी छोड़ दी ।उन्होंने तय किया कि वह निर्देशन करेंगे। अरुणाभ ने कई सारे प्रोडक्शन हाउस के चक्कर लगाए, पर किसी ने मौका नहीं दिया। यशराज के दफ्तर पर चौकीदार ने अंदर नहीं जाने दिया, तो सुभाष घई के प्रोडक्शन हाउस ने भी लौटा दिया। शाहरुख की रेड चिली कंपनी में भी यही हुआ। 

गैर-पंजीकृत सोसाइटी बनाई

अरुणाभ ने एक उपाय निकला । उन्होंने एक गैर-पंजीकृत सोसाइटी बनाई। इससे उन्होंने अमेरिका व फ्रांस में पढ़ने वाले दो दोस्तों को भी जोड़ा। इस सोसाइटी के नाम से 15 प्रोडक्शन हाउस को खत लिखे गए। खत में कहा गया कि वे प्रोडक्शन हाउस की मदद से भारतीय सिनेमा पर अध्ययन करना चाहते हैं। नतीजा सुखद था। सात प्रोडक्शन हाउस ने जवाब दिया।

अरुणाभ कहते हैं,

 ‘रेड चिली का दफ्तर मेरे घर के करीब था, लिहाजा मैंने उनके साथ काम करने फैसला किया। जब मैं रेड चिली के दफ्तर पहुंचा, तो गार्ड ने सर कहकर मेरा स्वागत किया।’ रेड चिली में उनकी मुलाकात फिल्म निर्देशक फराह खान से हुई। अरुणाभ को ओम शांति ओम फिल्म में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम करने का मौका मिला। यह अनुभव उनके लिए शानदार रहा। इस दौरान उन्होंने फिल्म मेकिंग से जुड़ी बारीकियों को समझा और सीखा।

Delhi Belly में   भी काम किया 

ओम शांति ओम फिल्म के समाप्ति के 9 दिन बाद आमिर खान के के बैनर तले बन रही फिल्म Delhi Belly में काम करने करने का ऑफर आया और उसी शाम उनकी लघु फिल्म “The wish divers” को Network18 और PnC Communications के तरफ से आयोजित कार्यक्रम में अवार्ड मिला

एमटीवी ने उनके आईडिया को किया ख़ारिज 


2009 में उन्होंने एमटीवी के लिए इंजीनियर्स डायरी नाम से एक शो तैयार किया। सभी लोगो को उनका आईडिया पसंद आया पर एमटीवी ने इसे खारिज कर दिया। फिर उन्होंने कॉलेज क्युटियापा नाम से दूसरा शो बनाया, उसे भी एमटीवी ने खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शक मूर्ख हैं। उन्हें ऐसे शो पसंद नहीं आएंगे। तब अरुणाभ ने सोचा कि किसी टीवी चैनल या प्रोडक्शन हाउस को आइडिया देने से बेहतर है कि वह खुद यू-ट्यूब पर अपने वीडियो अपलोड करें।

द वायरल फीवर (टीवीएफ) नाम की कंपनी बनाई

वर्ष 2010 में उन्होंने द वायरल फीवर (टीवीएफ) नाम की कंपनी बनाई। उनका पहला वीडियो यू-टयूब पर हिट रहा। उनके दूसरे वीडियो राउडीज को पांच दिन के अंदर करीब दस लाख लोगों ने पंसद किया। इसके बाद उन्होंने बेअरली स्पीकिंग नाम का शो बनाया।इसमें एक टीवी एंकर और आप नेता केजरीवाल की पैरोडी की गई। टीवीएफ आज ऑनलाइन एंटरटेनमेंट क्षेत्र की सबसे सफल कंपनियों में है।अरुणाभ कहते हैं-

अगर आप नए हो, तो अनुभवी लोग आपके आइडिया को आसानी से गलत साबित कर देते हैं। इसमें निराश होने की बात नहीं है। अगर आपको यकीन है कि आप सही हैं, तो यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप इसे साबित करके दिखाएं।

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भोजपुरी शब्दकोष-BHOJPURI SHABDKOSH

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भोजपुरी शब्दकोष-BHOJPURI SHABDKOSH


हमार  कोशिश बा की रउवा लोगन के भोजपुरी के प्रती लगाव बढ़ावल जाव वोही मकसद से  पर भोजपुरी शब्दकोश पेज बनावल गईल बा, भोजपुरी के शब्द के जानकारी बढ़े आ जे भोजपुरी नइखे जानत भा जाने के इच्छा रखत बा त वो लोग ख़ातिर भी इ पेज बहुत उपयोगी बा।

इ शब्दकोश भोजपुरी वेबसाइट जईसे की जोगीरा डॉट कॉम (http://www.jogira.com) से लिहल गईल बा
अगर रउओ -पास कवनो भोजपुरी शब्द बा त  भेजी ओकरा के शामिल कईल जाई

 
 
 अईसन = ऐसा 
अउसना = गर्मी के कारण किसी वास्तु का ख़राब होना
अँउघी –  नींद
अँकवार –  आलिंगन
अँकवार –  आलिंगन, गले लगाना
अगिला = आगे वाला , अग्रिम
अँगूरी –  ऊँगली
अँजोरिया –  चांदनी
अँहार –  अँधेरा
अंगेया –  भोज-निमंत्रण
अंजोर –  उजाला
अउर –  और
अउर का –  और क्या
अउस –  उष्ण
अकाज –  विलम्ब
अक्किल –  अक्ल, बुद्धि
अगतियार –  अख्तियार, अधिकार
अगराइल –  इतराना
अगोरल –  रक्षा करना, देख रेख करना
अछ्रंग –  दोष, इल्ज़ाम
अजवारल –  एक बर्तन का सामान दूसरे में सुरक्षित करना
अझूराइल –  उलझना, झगड़ना
अधिकई –  औकात या सीमा के बाहर काम करना, ज्ञान नहीं फिर भी किसी काम में हाथ डालना
अनखाती –  बहुत कम अन्न खाने वाला
अनघा –  बहुत
अनठिआवल –  सुनकर भी अनसुना करना
अनस –  ऊँब, खींज
अनेरिया –  अज्ञात व्यक्ति, लवारिस
अन्देशा –  पुर्वानुमान, आशा रखना
अन्हरिया –  अंधकार
अन्हरिया रात –  अँधेरी रात
अपटा पटौनी –  खेत में पानी पानी छोड़, अपने-आप सिंचाई
अबर –  कमजोर
अबेर –  देर
अभागा –  दुर्भाग्यशाली, जो कुछ काम ना करे खाकर पटाया रहे, अकर्मण्य
अमल –  नशा, आदत
अरगनी –  रेंगनी, हैंगर
अरिया –  किनारा
अलोता –  आड़ में
असों –  इस वर्ष
आँतर –  अन्तर, एक दिन बीच कर के
आइल गइल –  आना जाना
आगर –  गुणवान
आनकर –  दूसरे का
आनका –  अन्य
आनऽल –  सामान लाना, लाना
आयिल-गईल –  आना जाना
आव-भगत –  स्वागत
इच्छा –  रुचि, चाहत, दिलचस्पी
इतमिनान –  आराम
इनार –  कुआँ
इम्तिहान –  परीक्षा
इयाद –  याद
ईया/आजी  –  दादी
उकसावल –  उत्प्रेरित करना
उघरल –  खुला
उचकुन –  किसी वस्तु को थोड़ा ऊँचा या समतल करने के लिए उसके नीचे लगाया जाने वाला लकड़ी, पत्थर या मिट्टी का छोटा टुकड़ा।
उजिआइल –  उपजना, बढ़ना
उठौना –  किसी चीज का नियमित रूप से लेना जिसके मूल्य का भुगतान एक निश्चित समय पर किया जाता है।
उदःबेग –  बेचैनी
उनुकर –  उनका
उपरी बेरा –  दोपहर के बाद का समय
उलाड़ –  बैलगाड़ी पर जब अधिक माल लाद दिया जाता है, तब अगले हिस्से का ऊपर उठना, हल्का हो जाना उलाड़ कहलाता है
उसर –  बंजर, जहाँ उपज ना हो
ऊँभ-चूभ –  बेचैनी
एकइस –  इक्कीस, 21
एने –  इधर
एने ओने –  इधर उधर
एही कुल्ही –  यही सब
ओठँगना –  लेटना, सोना
ओठंगल –  लेटा हुआ, लेटना, पड़ा होना
ओरहन –  उलाहना
ओरिया –  तरफ, दिशा
ओलरना –  झुकना
ओसारा –  दलान
ओसारा –  बरामदा, मकान के आगे बना हुआ दालान, छज्जा
ओहरल –  पचकना
ओहिजा –  वहाँ, वहीं
कइसन –  कैसा
कइसे –  कैसे
कइसे भइल –  कैसे हुआ
कउआ –  कौआ
कउड़ा –  अलाव
ककही –  कंघी
कगरी –  किनारा
कचोरा –  कटोरा
कठेस –  कड़ा, कसा हुआ
कनिया –  दुल्हन
कबहूॅं –  कभी
कमासुत –  मेहनती
करजा –  कर्ज, उधार
करलूठा –  काला
करवाइन / किरवाइन –  जिस बर्तन में मांस-मंछली पकाया अथवा रखा जाता है, उस बर्तन को करवाइन बर्तन कहते हैं।
करिया –  काला
करेजा –  कलेजा
कलजुग –  कलयुग
कवन-कवन –  कौन कौन
कहनाम –  कथन, कहावत
कहवाँ –  कहाँ
कहार –  भार उठाने या ढ़ोने वाला
कांदो –  कीचड़
कान्ह –  कन्धा
काशी के फिरता –  चतुर, चालाक
किरपा –  कृपा
किरिन –  किरण
किरिन –  किरण
किरिया –  कसम
किसिम –  प्रकार
किस्सा –  कहानी
कीनना –  खरीदना
कुकुर –  कुत्ता
कुपातर –  अयोग्य
कुबत –  शक्ति
कुबेरा  –  गलत समय
कुल्ही –  सब
कूंची –  झाड़ू
केतना –  कितना
केने –  किधर, कहाँ
केवाड़ी –  दरवाजा
केहुए केहुए –  कोई कोई
केहू –  कोई
केहू तरेह –  किसी तरह
कोरा –  गोद
कोहनाना –  क्रुद्ध होना
कोहबर –  भीतर घर जहाँ वर वधू साथ बैठेते हैं।
खउराह –  नुकसान करने वाला, असभ्य
खखुआइल –  असंतोष, किसी चीज को पाने के बेचैन होना
खदकल –  उबलना
खदऽकल –  खौलना
खरकट्ल –  जूठा बर्तन जिसमें अन्न सूख गया हो।
खरिका –  दांतखोदनी
खातिर –  स्वागत, के लिए
खाल –  गढ्ढा, नीचा, छाल
खियाना –  घिसना
खिरकिट्टी –  दुबला – पतला
खुखुड़ी –  अन्नरहित भुट्टा
खुर –  पशु या जानवर के पैर का निचला भाग
खेलवना –  खिलौना
खोंट्ल –  चुनना, उपर से तोडना (धोती खोंट्ल, साग खोंट्ल)
खोंता –  घोंसला
खोइंछा –  विवाहिता के फांड़ (आँचल) में रखा जाने वाला अन्न-द्रव्य
खोइछा –  आँचल
गजन –  परेशानी, परेशान, दिक़्क़त
गतर –  छोटा सा भाग, अंश
गतान –  बांधने के लिए प्रयुक्त मूंज, पुआल आदि का ऐंठा हुआ रस्सा
गनल-गूथल –  सीमित, गिना हुआ
गाछ-विरिछ –  पेड़-पौधा
गाछी –  वृक्ष
गोनतारी –  खाट के पैर वाला स्थान
गोड़ –  पैर
घाम –  धुप
घीन –  नफरत
घोनसारी –  भूंजा भूंजनेवाला जगह
चउकस –  बढ़िया, अच्छा
चन्नन –  चन्दन
चरचा –  चर्चा
चहुँपल –  पहुंचना
चाउर –  चावल
चाकर –  चौड़ा, नौकर
चाम –  चमड़ा
चाव –  उत्साह, रुचि
चिउटी –  चींटी
चिरई –  चिड़िया
चिरकुट –  फटा कपडा
चिहाना –  आशचर्यचकित होना
चीखना –  स्वाद लेना
चीन्हना –  पहचानना
छाल –  छिलका, चमड़ा
छितराना –  बिखराना
छूँछ –  खाली
छेकना –  रोकना
जइसे  –  जैसे
जइसे तइसे  –  जैसे तैसे
जमकल –  जमा हुआ
जिआन –  बर्बाद
जीयरा –  ह्रदय
जोखना –  तौलना
जोन्ही –  तारा
जोरन –  जामन
जोहना –  खोजना
झापड़ –  थप्पड़
झुलुवा –  झूला
झोटा –  केश, बाल
झोप –  फलो का झुण्ड
झोरा –  झोला
टांगी –  कुल्हाड़ी
टिकूली –  बिंदी
टिकूली –  बिंदी
टिकोरा –  छोटा आम
टुटल –  टूटना
टूंगना –  ऊपर से काटना
ठेहुन –  घुटना
ठेहुन भर  –  घुटने तक
डंटा –  डंडा
डरार –  लकीर, मेढ़
डेग –  कदम
ढेबुआ –  पैसा
ढेर –  ज्यादा
तइयार –  तैयार
तनिका –  थोड़ा
तमेचा –  थप्पड़
तरकारी –  सब्जी
तरास –  प्यास
तहार –  तुम्हारा
तानना –  फैलाना
तुरना –  तोडना
तुरहा –  फल सब्जी तोड़ने वाला
तुराना –  बंधन से रहित होना
थरिआ –  थाली
थोपी –  थप्पड़

थेथर -जिद्दी, हठी

दवाई –  दवा
दस्तखत –  हस्ताक्षर
दाएॅं –  दाहिना, दाहिनी तरफ का, दाहिने हाथ का
दुआर –  द्वार, घर का अगला भाग
दुबराइल –  कमजोर, कमजोर होआ
दुलरुवा –  प्यारा
दोसर –  दूसरा
दोहरवनी –  दुबारा, फिर से
धनिक –  धनवान, पैसे वाला
धराइल –  पकड़ना, रखना
नइहर –  विवाहिता स्त्री की दृष्टि से उसके माता-पिता का घर और परिवार। नैहर। पीहर। मायका
नरम –  मुलायम, कोमल
नियर –  जैसा
नियरा –  नजदीक
निहारत –  देखना
निहोरा –  निवेदन
नीन –  नींद
नीमन –  अच्छा
नून –  नमक
पइसा –  पैसा
पईचा –  उधार
पतई –  पत्ता, पत्ती
पतियाना –  विश्वास करना
परसादी –  प्रसाद
परान –  प्राण
परिकना –  अभ्यस्त होना
परेवा –  कबूतर
परोजन –  उत्सव
पलानी –  झोपडी
पसिजल –  पिघलना, पिघला हुआ
पसेना –  पसीना
पहरुवा –  पहरा देने वाला
पहिले पहल –  पहली बार
पहुचल –  पहुचना, मिलना
पातर –  पतला
पारापारी –  एक बाद एक
पाहुन –  अतिथि, मेहमान
पिछुवारा –  घर का पिछला भाग
पियराना –  पीला होना
पिल्ला –  कुत्ता, कुत्ता के बच्चा
पिसान –  आटा
पुरान –  पुराना
पूरुब –  पूर्व, पूरब
पेहान –  ढ़क्कन
पैना –  छड़ी
पौंड़ना –  तैरना
फजीर –  सुबह
फाँड़ –  आँचल
फाटक –  दरवाजा, कपाट
फिकिर –  चिंता
फुहर –  गंदा
फूटल –  फूटना, निकलना
फेकरना –  रोना
फेन –  झाग, गाज
फेर –  फिर, दुबारा
फेर कबो –  फिर कभी
फेड़ –  पेड़
बउराह –  पागल
बगईचा –  बगीचा
बछरू –  बछड़ा
बटोरना –  एकत्रीत करना
बतइबऽ –  बताना, बतलाना
बतास –  हवा
बतियावत –  बात-चीत
बदरी –  बादल
बयार –  हवा, हल्की हवा
बरतुहार –  अगुवा, शादी के लिये घर आये लोग
बरफ –  बर्फ
बरियार  –  ताकवर
बरिस –  वर्ष
बरुआ –  ब्रह्मचारी
बसवारि –  बाँसो का जन्म स्थान
बसिया –  बासी
बहंगी –  भार ढोने वाला बांस का बत्ता
बाँचना –  पढ़ना
बाइली –  बाहरी (व्यक्ति) या बाहरी आदमी
बाएॅं –  उलटा हाथ, बायें तरफ
बाकिर –  लेकिन
बाचल –  बाकी
बारना –  जलाना
बारी –  पारी
बावग –  गन्ने/ऊँख की पहली बुआई
बिछना –  चुनना
बिछिली –  फिसलन
बिदेश –  विदेश, दूसरा देश
बियाह –  विवाह, शादी
बिसभोर –  भूल जाना
बिहाने –  सुबह
बुरबकs –  मुर्ख
बूकना –  पीसना
बेंवत –  औकात
बेजोड़ –  बहुत अच्छा
बेमारी –  बीमारी
बेरहनी –  कुसंस्कारी औरत
बेरा –  समय
बोखार –  बुख़ार
बोरल –  भींगोना
बोरसी –  अँगीठी
बड़का –  बड़, बड़ा
बड़का –  बड़े लोग, प्रतिष्ठित, बड़ा (आकार में)
बड़हन –  बड़ा
बड़ाई –  प्रसंसा
भइल –  हुआ
भईंस –  भैंस
भउजी –  भाभी
भउर –  आग
भकजोनी –  जुगनू
भरम –  भ्रम
भरसक –  शक्ति भर
भीजल –  भींगा हुआ
भुवर –  भूरा
भूईयाॅं –  नीचे, जमीन पर
भोर –  सबेरा, सुबह
भोर परल  –  भूल जाना
मइल –  मैल
मउअत –  मौत
मउगी –  स्त्री
मऊरी / मऊर –  सेहरा
मचिया –  छोटी खाट
मडइ –  झोपडी
मन परल  –  याद आना
मरद –  मर्द, पुरुष, पति
महकउआ –  सुंगन्धित, खुशबू देने वाला, खुशबूदार
महतारी –  माँ, माई
माहुर –  जहर
माड़ो –  मंडप
मुसकइल –  चूहे द्वारा बनाया गया बिल
मुस्मात –  विधवा
मुड़ी –  सिर
मेहरारू –  औरत, पत्नी
मोटरी –  गठरी
मोरी –  नाली
मोलायम –  मुलायम, नरम
रउरा / रउवा –  आप
रखवार –  रक्षक
रेक्सा –  रिक्शा
लइकाई –  बचपन
लक्कम –  आदत
लगले –  साथ ही, लगे हाथ
लगहर –  दूध देने वाली गाय या भैंस
लबजा –  झूठा
लमहर –  लंबा
ललना –  बच्चा
लाँगा –  नंगा, नीच
लाबरा –  झूठा
लिलार –  ललाट, माथा
लूर –  ढंग, तरीका
लेआवल –  किसी सामान को लाना
लेहना –  चारा
लेहना –  चारा
लोर –  आँसू
संघतिया –  यार, दोस्त
सउसे –  साबुत
सगरी –  सब
सनचित –  चुपचाप, शान्त
सबसे पहिले –  सब से पहले
सबुर –  संतुष्टि, धैर्य, सब्र, सहनशीलता
सभत्तर –  हर जगह
सहकल –  मन का बढ़ना
सहेजना –  ठीक करना
साँच –  सच
साँझ –  शाम
साइत –  शायद
सानल –  मिलाना, गूंथना
सार –  साला, श्यालक
साहेब –  साहब
सींझना –  पकना
सुकवार –  कोमल
सुन्नर –  सुन्दर
सुपुली –  छोट सुप
सुरती –  खैनी, तम्बाकू
सुरसती –  सरस्वती, हिन्दूधर्म में ज्ञान की दैवी
सूगा –  तोता
सेमरा –  खेत की दो बार जुताई
सेराइल –  ठंढा होना
हजाम –  बाल, दाढ़ी बनाने वाला, नाइ
हबर-हबर –  जल्दी-जल्दी
हरवाह –  हल चलाने वाला
हाली-हाली –  जल्दी-जल्दी
होखे वाला –  होने वाला
होरहा –  भुट्टा
फ़ानना –  कूदना
फ़ीचना –  निचोड़ना