Google celebrates women’s labour movement leader Anasuya Sarabhai’s 132nd birthday with a doodle
शुरुआती जीवन और शिक्षा

सोन नदी के तट पर सीधी खडी कैमूर पर्वतमाला के रोहतास पहाड़ के ऊपर निर्मित था उराँव का किला रोहतासगढ़ | दुर्गम ,दुर्जेय और दुसाध्य रोहतास के इस किले के कभी स्वामी थे उरांव | सहसराम (वर्तमान सासाराम) के पठान हसन सुर के बेटे फरीद खान की महत्वकांक्षा थी दिल्ली का ताज हासिल करना | अफगान पिता और कायमखानी राजपूतानी माँ का पुत्र फरीद खान का विजयरथ चल पड़ा और अब उसे शेरखान के नाम से जाना जाने लगा | दिल्ली की और कुच करने से पहले शेरखान अपनी जड़ो को मजबूत करना चाहता था | दूरदर्शी शेरशाह सूरी अपने घर के आसपास की भूमि पर कब्ज़ा जमाना चाहता था ताकि उसकी अनुपस्थिति में सहसराम से सटा कोई राजा या कबीला उसका लाभ न उठा सके |
शेरशाह का ध्यान उरांवो के किले रोहतासगढ़ पर टिक गयी | जब पठानों ने रोहतासगढ़ पर चढ़ाई की तो उस समय उराँव सरहुल का त्यौहार मानाने में व्यस्त थे | वैसे तो उराँव के लड़ाके युवक पराक्रम या शौर्य में पठानों से कम नहीं ठहरते थे पर पूजा के बाद हँड़िया पिने और नाचने गाने के बाद किले के भीतर इधर उधर लुढके पड़े थे | हठी पठानों ने जब रोहतास दुर्ग को घेर लिया तो उरांव स्त्रियाँ चौकन्नी हो गयी | स्त्रियों ने सहस संजोया और तिन महिला दस्ते गठित किये |
उरांव की स्त्रियों ने माथे पर पगड़ी बंधी और दुधमुहे बच्चे को चादर में लपेटकर शत्रुओ से लोहा लेने लगी |पठान पर्वत की दुर्गम चढ़ाई चढ़कर जब किले के मुख्य फाटक तक पहुंचे तो किले के ऊपर से तिरो की वर्षा होने लगी | अचंभित पठानों के पैर उखाड़ने लगे और उन्हें पीछे हटना पड़ा | उरांव स्त्रियों के प्रबल प्रतिरोध ने पठानों को किले की प्राचीरो के आसपास भी फटकने नहीं दिया | शेरशाह सूरी के पठानी सैनिक लज्जित और निराश हो गए | जिनकी आँखों में दिल्ली सल्तनत के सपने थे वे घर के पिछवाड़े में मुट्ठी भर वनवासी वीरांगनाओ के आगे नतमस्तक थे |अभेद्य रोहतासगढ़ पर पताका फहराने की लालसा सूखने लगी |
लेकिन कहते है न घर का भेदी लंका ढाहे | पठानों को नित्य दूध दही पहुचने वाली लुन्दारी ग्वालिन पर नजर पड़ी | लुन्दारी के पति को किलेदार बना देने का प्रलोभन देने पर लुन्दारी ने बता दिया की सारा मोर्चा स्त्रियों ने संभाल रखा है | पठान सैनिको ने अपना खोया आत्मविश्वास पा लिया | दिल्ली विजय का सपना संजोये शेरशाह के लिए चूड़ी बिंदी धारण करने वाली महिलाओ से हार कर लौटना असंभव था |
पठानों ने लुन्दारी से प्राप्त सूचनाओ के अनुसार सुरक्षित पगडंडियों का अनुसरण करते हुए रोहतासगढ़ किले पर आक्रमण किया |अचानक किले के पीछे, दाए ,बाये से एकदम निकट प्रकट हुयी पठानों की सशस्त्र टुकडियो को देखकर उरांव की सरदारन हताश हो गयी | अब किले की रक्षा करना उनके वश में नहीं रह गया | निश्चित पराजय उनके सामने मुह बाये खडी थी | अब उनकी प्राथमिकता थी उराँव के वंशजो की रक्षा करना | जुझारू स्त्रियों की एक टोली पहले की भांति पठानों पर तीर और पत्थर चला रही थी और शेष स्त्रियाँ अपने बच्चो को गुप्त रस्ते से लेकर किले से बाहर निकल रही थी |
पठानों ने उरांवो का पीछा नहीं किया क्योंकि उनका लक्ष्य रोहतासगढ़ पर कब्ज़ा करना था जो अब उनके पास था | बिना रक्तपात के मिली विजय के उल्लास में सैनिक किले के फाटक को ध्वस्त कर किले में प्रविष्ट हुए |पहाड़ के पांव तले मौन बह रहा सोन नदी इस जय पराजय का साक्षी था |
शेरशाह सूरी दिल्ली के बादशाह हुमायूँ को पराजित कर दिल्ली के सिंहासन पर बैठ तो गया परन्तु कालिंजर के किले पर उसके भाग्य ने दगा दे दिया | अपनी ही तोप फट पड़ी | शेरशाह सूरी की जीवनयात्रा थम गयी परन्तु उसकी राज्यलिप्सा ने उरांवो को बेघर कर डाला |
रोहतासगढ़ किले की लड़ाई में सहीद तिन सरदरिन सिनगी देई ,कईली देई ,और चम्पू देई की स्मृति में उरांव की स्त्रियों ने गोदने की तिन बिंदिया धारण करने की परम्परा डाली | रोहतासगढ़ की पराजय के प्रतिकार का पर्व मनाया जाने लगा | प्रतिक पर्व जनिशिकार | अब आखेट पर्व जनिशिकार |
ओरे छू गंगा ,पारे छू जमुना ,धीरे धीरे तुरका अवै रे
हाथा में तरवारे ,खांदा में बंदुका ,धीरे धीरे तुरका आंवे रे
गाछा केरा मैना लियो झोरा कान्दाय
नदी तीरे तीरे घोड़ा दाडय रे
25 फरवरी 1702 को वजीर खां के पुत्र अब्दुल कादिर को रोहतास का किलेदार नियुक्त किया गया। उसी समय रोहतास का किला अवांछित तत्वों के काम आने लगा। 1764 ई. में मीर कासिम को बक्सर युद्ध में अंग्रेजों से पराजय के बाद यह क्षेत्र अंग्रेजों के हाथ आ गया। 1774 ई. में अंग्रेज कप्तान थामस गोडार्ड ने रोहतास गढ़ को अपने कब्जे में लिया और उसे तहस-नहस किया। अकबर के समय से चली आ रही रोहतास सरकार में औरंगजेब ने कई परिवर्तन कर सातों परगना को पुनगर्ठित किया। शाहाबाद गजेटियर में पुन: 1784 में रोहतास जिला स्थापित होने का उल्लेख है। उसके अनुसार रोहतास, सासाराम व चैनपुर परगनों को मिलाकर जिला बनाया गया।
दोस्तों आज हम एक ऐसे शख्स के बारे में बताने जा रहे है जिनकी वजह से न जाने कितने लोग इंजिनियर बने | बच्चे जब इंटर में पहुचते है तो उनके आँखों में कई सपने होते है और अगर उनका विषय विज्ञान होता है तो उनमे से बहुत सारे लोग इंजिनियर बनना चाहते है | लेकिन विज्ञानं की मोटी मोटी किताबो को देखकर उन्हें डर लगने लगता है | लेकिन इस शख्स के लिखे किताब ने न सिर्फ उनके सपनो को पंख दिए बल्कि इंजिनियर भी बनाया | यह आम आदमी जरुर था लेकिन इनका हमारे दिलो में खास जगह है | जी हा हम बात कर रहे है भौतिकी विषय के मशहूर विद्वान व शिक्षक प्रो. हरिश्चन्द्र वर्मा यानि H. C. VERMA की |

भौतिकी विषय के मशहूर विद्वान व शिक्षक प्रो. हरिश्चन्द्र वर्मा को 11 नवम्बर 2017 को के मौलाना अबुल कलाम आजाद शिक्षा पुरस्कार से नवाजा जाएगा। 11 नवम्बर को शिक्षा दिवस समारोह में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उन्हें यह पुरस्कार देंगे। पुरस्कार के रूप में 2.50 लाख रुपए और प्रशस्ति पत्र दिये जाएंगे। ।
तो आईये जानते है उनके बारे में ………….
H. C. VERMA का जन्म 3 अप्रैल 1952 को बिहार राज्य के दरभंगा जिले में हुआ था |H. C. VERMA बचपन में वे पढने में तेज नहीं थे | H C VERMA के पिताजी शिक्षक थे | प्रारम्भ में गणित और विज्ञान की शिक्षा उनके पिताजी ने ही दी | स्कूल ले दिनों में इन्हे विज्ञान और गणित में ज्यादा रूचि नहीं थी |
स्नातक करने के लिए H C VERMA का दाखिला पटना पटना साइंस कॉलेज में हुआ | यहाँ के फैकल्टी से प्रभावित होकर H C VERMA के मन में विज्ञान और गणित विषय में रूचि बढ़ी | उनकी रूचि ऐसी बढ़ी की हाई स्कूल की परीक्षा में संघर्ष करने वाले लड़के ने पटना विश्वविद्यालय के Bsc Physics (Hounrs) में तीसरा स्थान ला दिया | स्नातक कम्पलीट करने के बाद H C VERMA ने GATE की परीक्षा निकाली और IIT KANPUR से MSC के लिए दाखिला लिया | IIT KANPUR में H C VERMA ने सभी लडको में टॉप किया और 10.0 में से 9.9 GPA हासिल किया | उसके बाद उन्होंने IIT KANPUR से ही डॉक्टरेट की पढाई की और तीन वर्षो से भी कम समय में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की |
IIT KANPUR में इस असाधारण प्रतिभा प्रदर्शन के कारन इन्हे अमेरिका में प्रोफेसर बनकर पढ़ने का ऑफर भी आया लेकिन इन्होने उसको अस्वीकार कर दिया | इन्होने अपने जड़ को नहीं भुला और 1980 में पटना साइंस कलेज में प्रोफेसर के रूप में ज्वाइन किया |
सायंस कॉलेज में बच्चो को पढ़ते हुए इन्होने देखा की बच्चे भौतिक विज्ञान की पढाई का आनंद नहीं ले रहे है बलि पढ़ पढ़ कर उब रहे है | जितना एक्सपेरिमेंट H C VERMA ने अपने पढाई के दिनों में फिजिक्स के किताबो (फिक्स्डमेंटल ऑफ़ फिजिक्स रेस्निक और हॉलिडे, जिन्होंने उन्हें एम.एस.सी. के दौरान पढ़ा था) के साथ किया था उतना एक्सपेरिमेंट तेज विद्यार्थी भी नहीं कर रहे थे | इसका कारण भाषा और सांस्कृतिक अंतर था | ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग पुस्तक की भाषा में उलझ कर रह जाते थे और वे उसकी अवधारणा और निष्कर्ष तक पहुचने से पहले ही अपनी रूचि खो बैठते थे |
एन सभी समस्याओ को दूर करने के लिए H C VERMA ने एक किताब लिखने की सोची जो भाषा के इस कठिनाई को आसान कर सके | इसके लिए उन्होंने 8 साल तक कठिन परिश्रम किया और फल क्र रूप में लोगो के बिच आया “Concepts of Physics” | यह पुस्तक भौतिक विज्ञानं की सुन्दरता की उजागर करने में सफल रही | इस पुस्तक की सफलता का कारण था इसकी सरल भाषा ,दिचास्प संख्यात्मक उदाहरण और भारतीय संस्कृति के साथ सम्बन्ध | यह पुस्तक आईआईटी-जेईई (संयुक्त प्रवेश परीक्षा) की तैयारी के लगभग सभी छात्रों द्वारा उपयोग की जाती है। यह H C VERMA द्वारा भारतीय छात्रों, विज्ञान और समाज को दिए गए एक महान उपहार था । आईआईटी कानपुर आने से पहले वह लगभग 15 वर्षों तक पटना विज्ञान महाविद्यालय में रहे।
डॉ एच सी वर्मा 1994 में सहायक प्रोफेसर के रूप में आईआईटी कानपुर में शामिल हुए। यहां, उन्होंने कई पाठ्यक्रमों के छात्रो को पढाया और “क्वांटम फिजिक्स” नामक एक पुस्तक भी लिखा | डॉ एच सी वर्मा ने प्रयोगात्मक परमाणु भौतिकी में अनुसंधान भी किया। आईआईटी कानपुर में नियमित कार्य के अलावा, उन्होंने शिक्षा और समाज के लाभ के लिए कई सामाजिक-शैक्षिक पहल भी की। इनमें से कुछ पहलुओं में स्कूल फिजिक्स परियोजना, शिक्षा सोपान शामिल हैं। उन्होंने 30 जून 2017 को औपचारिक रिटायरमेंट की घोषणा की | वे 38 सालो से लोगो को फिजिक्स की बारीकियो को समझा रहे थे |
आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर हरीश चंद्र वर्मा का कहना था साइंटिस्ट दुनिया को समझते हैं, इंजीनियर नई दुनिया बनाते हैं | दुनिया जैसी है साइंटिस्ट उसे उसी तरह समझते हैं, लेकिन इंजीनियर्स ऐसी दुनिया बनाते हैं जो पहले कभी नहीं थी.
उनके बारे में लोग कहते है की है प्रोफेसर फिजिक्स में इतना खोए रहते थे कि क्लास में लुंगी ही पहन कर पढ़ाने चले आते थे | उनकी हाथो में कोई किताब नहीं , साधारण कपडे और चेहरे पर मोटे लेंस का चश्मा होता था |उनके बारे में लोग यहाँ तक कहते है की 2000 के दशक में दो ही भगवान माने जाते थे एक क्रिकेट की दुनिया में सचिन तेंदुलकर और फिजिक्स की दुनिया में प्रोफेसर एचसी वर्मा |
फिजिक्स की पढ़ाई आसान बनाने के लिए आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिक प्रो. एचसी वर्मा ने घरेलू, दैनिक जीवन में प्रयोग आने वाले 300 क्लास रूम एक्सपेरिमेंट बनाए हैं। इनकी मदद से फिजिक्स पढ़ना-लिखना-समझना आसान हो जाएगा। ये एक्सपेरिमेंट बेलन, चमटा, कल्छुल, गिलास सहित तमाम घरेलू सामान से बनाए गए हैं, जो मेकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, माडर्न साइंस के उदाहरण को सरल बनाने में कारगर साबित हुए हैं।
भौतिकी विषय के मशहूर विद्वान व शिक्षक प्रो. हरिश्चन्द्र वर्मा को 11 नवम्बर 2017 को के मौलाना अबुल कलाम आजाद शिक्षा पुरस्कार से नवाजा जाएगा। 11 नवम्बर को शिक्षा दिवस समारोह में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उन्हें यह पुरस्कार देंगे। पुरस्कार के रूप में 2.50 लाख रुपए और प्रशस्ति पत्र दिये जाएंगे। । प्रो. वर्मा दरभंगा जिले के मूल निवासी हैं और वर्तमान में कानपुर में रहते हैं। पटना साइंस कॉलेज में इन्होंने 1980 से 1994 तक विद्यार्थियों को भौतिकी की शिक्षा दी है। उसके बाद आईआईटी कानपुर में अध्यापन किया। प्रो. वर्मा बिहार सहित पूरे देश में भौतिकी के सिद्धांत एवं व्यवहार को सरलता से जानने एवं समझने के लिए शिक्षकों तथा बच्चों के बीच काम कर रहे हैं।
हर बच्चे का सपना होता है की वो बड़ा आदमी बने | हर बच्चे को पढने और आगे बढ़ने का अधिकार है | लेकिन जिन लोगो के पास पैसा होता है वे इस बात को गंभीरता से नहीं लेते और अपने बच्चो पर ध्यान नहीं देते | वे नहीं जानते की इस देश में लाखो लोग पैसे और संसाधनों की कमी की वजह से अपने बच्चो को उस तरह की शिक्षा नहीं दिला पते जिसके वो हक़दार है | मै इस तरह के लोगो को मदद करना चाहता हु ताकि संसाधनों की कमी की वजह से किसी बच्चे की प्रतिभा बेकार न हो |

अंडर-19 वर्ल्ड कप जीतने के बाद विराट ने पीछे मुड़कर नहीं देखा । विराट एक के बाद एक कीर्तिमान स्थापित करते गए । पर शोहरत और कामयाबी के बीच वह बचपन के कठिन दिन को कभी नहीं भूले। वर्ष 2013 में उन्होंने विराट कोहली फाउंडेशन की शुरुआत की। विराट कहते हैं, हर बच्चे को पढ़ने और आगे बढ़ने का अधिकार है। जिन लोगों के पास पैसा है, वे इस बात को गंभीरता से नहीं लेते, वे नहीं जानते देश में लाखों लोग पैसे व साधनों की कमी के कारण बच्चों को शिक्षा नहीं दिला पाते। मैं इन बच्चों की मदद करना चाहता हूं।
जब धोनी ने संन्यास लिया तब वे भारतीय टीम के कप्तान बनाये गए। 2015 में विराट ने अपने करियर का दूसरा वर्ल्ड कप भी खेला। किसी भारतीय द्वारा सबसे तेज़ शतक और दुनिया में वन-डे क्रिकेट में सबसे तेज़ 5000 रन और सबसे तेज़ 10 वन-डे शतक मारने वाले कोहली ने कई रिकॉर्ड स्थापित किये हैं। कोहली ऐसे पहले खिलाड़ी हैं जिन्होंने लगातार 4 साल 1000 वन-डे रन बनाये और ऐसा करने वाले वह दुनिया के दूसरे खिलाड़ी बने। वे 20-20 में 1000 रन बनाने का रेकॉर्ड भी उन्ही के नाम हैं।
विराट बहुत आक्रमक किस्म के बैट्समैन है। जिनमें बहुत सी टेक्निकल स्किल भी है। विराट शॉट मरने के लिए फेमस है, अंडर प्रेशर में इन्हें खेलना बहुत अच्छा लगता है। विराट की बैटिंग स्टाइल बिल्कुल सचिन जैसी है, इसलिए उन्हें भविष्य का सचिन कहा जा रहा है। कुछ लोगों को मानना है कि विराट सचिन तेंदुलकर के रनों का स्कोर तोड़ देंगें।
विराट कोहली एक प्रसिद्ध क्रिकेटर के साथ एक फेमोस सेलिब्रिटीज भी हैं। फोबेर्स की सूचि में (2016) वे भारत 3 सबसे पॉपुलर सेलेब्रिटीस हैं। यही कारण है की वे कई कंपनियों के ब्रांड एम्बेसडर है|कोहली को क्रिकेट मे अपने बेहतरीन योगदान के लिए, कई पुरूस्कारो से नवाज़ा गया है जिनमे शामिल है आईसीसी वन-डे ‘प्लेयर ऑफ़ द ईयर’ 2012 और 2011 से 2012 तक ब्साइ इंटरनेशनल क्रिकेटर ऑफ़ द ईयर। 2013 में इन्हे अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में अपने अद्वितीय योगदान के लिए ‘अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। ब्रिटेन में प्रकाशित एक पत्रिका स्पोर्ट्स-प्रो ने विराट को 2014 में दुनिया का दूसरा सबसे अच्छा एथलीट बताया।
हम अक्सर ही सफ़र के दौरान रेलवे ट्रैक के किनारे जगह जगह पर विभिन्न प्रकार के सिग्नल बोर्ड पर लिखे चिन्हों को देखते है । और मन में सोचते रहते है की इसका क्या मतलब होगा । ये यहाँ किसलिए लगाया गया है । लेकिन हम नहीं जान पते है की इन सब शब्दों का क्या अर्थ है तो चलिए आज हम बताते है की रेलवे ट्रैक के किनारे लिखे कुछ चुनिदा सिगनल के मतलब जिनसे हमारा पला हर रोज पड़ता रहता है ।

W या W/L एक सिटी संकेतक शब्द है । आपने रेलवे ट्रैक के किनारे लगे पीले बोर्ड पर लिखे ‘W’ या ‘W/L’ शब्द को जरुर देखा होगा । W का मतलब होता है – Whistle यानि सिटी जबकि ‘W/L’ का मतलब होता है Whistle for level crossing यानि ‘W/L’ लेवल क्रॉसिंग के लिए सीटी सूचक शब्द है। सामान्यतः इस तरह का बोर्ड मानवरहित क्रॉसिंग से लगभग 250 मीटर की दूरी पर लगा हुआ देखा जा सकता है।
सी /फा भी एक सिटी संकेतक शब्द ही है यह ‘W/L’ का हिंदी रूपांतरण है सी /फा का मतलब है सिटी बजाओ आगे फाटक है ।
W/B का मतलब whistle for bridge यानि आगे पूल है सिटी बजाओ ।

‘ T’ एक सामान्य समाप्ति सूचक शब्द है। T/P का अर्थ-Termination of speeds restriction for passanger होता है । जबकि T/G’ का अर्थ-Termination of speeds restriction for passanger होता है ये शब्द ट्रेन की Speed Limitation के लिए दिया जाता है ।
आज यानि ३० अक्टूबर को भारत के मशहूर परमाणु वज्ञानिक डॉक्टर होमी जहाँगीर भाभा जी का जन्मदिन है |उन्हे भारत के परमाणु उर्जा कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। उन्होंने भारत में परमाणु कार्यक्रम की ऐसी नीव राखी जिसकी बदौलत भारत आज विश्व के प्रमुख परमाणु संपन्न देशों की कतार में खड़ा है | डॉक्टर होमी जहाँगीर भाभा उन वैज्ञानिकों में शामिल थे जिनके नाम से अमेरिका भी कांपता था। अमेरिका को दरअसल इस बात का खौफ पैदा हो गया था कि कहीं भारत उससे आगे न निकल जाए। यही कारण थी की भाभा को ख़त्म करने का प्लान अमेरिका ने बनाया और उसे पूरा भी किया | 24 नवंबर 1966 को फ्रांस के माउंट ब्लैंक के आसमान में एक विमान क्रैश हुआ और इसमें मौजूद सभी यात्री मारे गए। जिनमे डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा भी शामिल थे |
डॉक्टर होमी जहाँगीर भाभा का जन्म मुंबई के एक आमिर पारसी परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम जहाँगीर भाभा था और उन्होंने कैम्ब्रिज से शिक्षा प्राप्त की थी । वे वकील होने के साथ साथ टाटा इंटरप्राइजेज में भी कम कर चुके थे।भाभा बचपन से ही असाधारण प्रतिभा के धनि थे । शुरुआत से ही उनकी रूचि भौतिक विज्ञानं और गणितमें थी | उनकी प्रारंभिक शिक्षा कैथरैडल स्कूल में हुई और फिर आगे की शिक्षा के लिए जॉन केनन में पढने गये। इसके बाद होमी ने एल्फिस्टन कॉलेज मुंबई और रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से बीएससी की परीक्षा पास की। वर्ष 1927 में वो इंग्लैंड चले गए जहाँ उन्होंने कैंब्रिज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। सन् 1930 में स्नातक की उपाधि अर्जित की ।सन् 1934 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से ही उन्होंने डाक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की। अध्ययन के दौरान कुशाग्र बुद्धी के कारण होमी को लगातार छात्रवृत्ती मिलती रही। पीएचडी के दौरान उनको आइजेक न्यूटन फेलोशिप भी मिली। उन्हें प्रसिद्ध वैज्ञानिक रुदरफोर्ड, डेराक, तथा नील्सबेग के साथ काम करने का अवसर भी मिला।
डॉ. भाभा जब कैम्ब्रिज में अध्ययन और अनुसंधान कार्य कर रहे थे और छुट्टियों में भारत आए हुए थे तभी सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया। इस समय हिटलर यूरोप पर कब्ज़ा किये जा रहा था । इंग्लैंड के अधिकांश वैज्ञानिक युद्ध के लिये सक्रिय हो गए और पूर्वी यूरोप में मौलिक अनुसंधान लगभग ठप्प हो गया। ऐसी परिस्थिति में डॉ. भाभा के लिए इंग्लैंड जाकर अनुसंधान जारी रखना के लिए संभव नहीं था। डॉ. भाभा को समझ में नहीं आ रहा था कि वे भारत में क्या करें?
उनकी बहुमुखी प्रतिभा से परिचित कुछ विश्वविद्यालयों ने उन्हें अध्यापन कार्य के लिये आमंत्रित किया। अंततः डॉ. भाभा ने ‘भारतीय विज्ञान संस्थान’ (IISc) बैंगलोर को चुना जहाँ वे भौतिक शास्त्र विभाग के प्राध्यापक के पद पर रहे। यह उनके जीवन का महत्त्वपूर्ण परिवर्तन था। डॉ. भाभा के लिए कैम्ब्रिज की तुलना में बैंगलोर में काम करना मुश्किल था। कैम्ब्रिज में वे आसानी से अपने वरिष्ठ लोगो से सम्बन्ध बना लेते थे लेकीन बंगलौर में उनके लिए चुनौतीपूर्ण था। उन्होंने अपना अनुसंधान कार्य जारी रखा और धीरे-धीरे भारतीय सहयोगियों से संपर्क भी बनाना शुरू किया। उन दिनों ‘भारतीय विज्ञान संस्थान’, बैंगलोर में ‘सर सी. वी. रामन’ भौतिक शास्त्र विभाग के प्रमुख थे। सर सी. वी. रामन ने डॉ. भाभा को शुरू से ही पसंद किया और डॉ. भाभा को ‘फैलो ऑफ़ रायल सोसायटी’ (FRS) में चयन हेतु मदद की।
बैंगलोर में डॉ. भाभा कॉस्मिक किरणों के हार्ड कम्पोनेंट पर अनुसंधान का कार्य कर रहे थे, किंतु वे देश में विज्ञान की उन्नति के बारे में बहुत चिंतित थे। उन्हें चिंता थी कि क्या भारत उस गति से उन्नति कर रहा है जिसकी उसे ज़रूरत है? देश में वैज्ञानिक क्रांति के लिए बैंगलोर का संस्थान पर्याप्त नहीं था। डॉ. भाभा ने नाभिकीय विज्ञान के क्षेत्र में विशिष्ट अनुसंधान के लिए एक अलग संस्थान बनाने का विचार बनाया और सर दोराब जी टाटा ट्रस्ट से मदद माँगी। यह सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए वैज्ञानिक चेतना एवं विकास का निर्णायक मोड़ था।
भाभा ने ही भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की कल्पना की थी। उन्होने मुट्ठी भर वैज्ञानिकों की सहायता से मार्च 1944 में न्यूक्लियर एनर्जी पर रिसर्च प्रोग्राम शुरू किया था। उन्होंने न्यूक्लियर साइंस पर तब काम करना शुरू किया था दुनिया को इसकी चैन रिएक्शन के बारे में काफी कम जानकारी थी। इतना ही नहीं उस वक्त नाभिकीय उर्जा से विद्युत उत्पादन की कल्पना को कोई मानने को तैयार नहीं था। उन्हें ‘आर्किटेक्ट ऑफ इंडियन एटॉमिक एनर्जी प्रोग्राम’ भी कहा जाता है।
उन्होंने जेआरडी टाटा की मदद से मुंबई में ‘टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च’ की स्थापना की और वर्ष 1945 में इसके निदेशक बन गए।वर्ष 1948 में डॉ भाभा ने भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की और अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा वह कई और महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रमुख भी रहे।
भाभा के बारे में एक बड़ी मजेदार बात ये है कि विज्ञान के साथ-साथ शास्त्रिय संगीत, मूर्तीकला, चित्रकला तथा नृत्य आदि क्षेत्रों में उनकी गहन रूचि और अच्छी पकङ थी। वे चित्रकारों और मूर्तिकारों को प्रोत्साहित करने के लिए उनके चित्रों और मूर्तियों को खरीद कर टॉम्ब्रे स्थित संस्थान में सजाते थे और संगीत कार्यक्रमों में भी हिस्सा लिया करते थे। मशहूर चित्रकार एम एफ हुसैन की पहली प्रदर्शनी का मुम्बई में उद्घाटन डॉ भाभा ने ही किया था।
डॉ. भाभा ने पेडर रोड में ‘केनिलवर्थ’ की एक इमारत का आधा हिस्सा किराये पर लिया। यह इमारत उनकी चाची श्रीमती कुंवर पांड्या की थी। संयोगवश डॉ. भाभा का जन्म भी इसी इमारत में हुआ था। TIFR ने उस समय इस इमारत के किराए के रूप में हर महीने 200 रुपये देना तय किया था। उन दिनों यह संस्थान काफ़ी छोटा था। कर्मचारियों के लिए चाय की दुकान संस्थान से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर थी। श्रीमती पांड्या ने कर्मचारियों की चाय अपनी रसोई में ही बनाने की इजाजत दे दी। वह अपने प्रिय भतीजे डॉ. भाभा को अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाया करतीं थीं। आज उस दो मंजिली पुरानी इमारत की जगह एक बहुमंजिली इमारत ने ले ली है, जो अब मुख्यतः ‘भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र’ के अधिकारियों का निवास स्थान है।
वर्ष 1955 में जिनेवा में संयुक राज्य संघ द्वारा आयोजित ‘शांतिपूर्ण कार्यों के लिए परमाणु ऊर्जा का उपयोग’ के पहले सम्मलेन में डॉ. होमी भाभा को सभापति बनाया गया। जहाँ पश्चिमी देशों के वैज्ञानिक इस बात का प्रचार कर रहे थे कि अल्पविकसित देशों को पहले औद्योगिक विकास करना चाहिए तब परमाणु शक्ति के बारे में सोचना चाहिए वहीँ डॉ भाभा ने इसका जोरदार खण्डन किया और कहा कि अल्प विकसित राष्ट्र इसका प्रयोग शान्ति पूर्वक तथा औद्योगिक विकास के लिए कर सकते हैं।
अक्टूबर 1965 में भाभा ने ऑल इंडिया रेडियो से घोषणा की थी कि अगर उन्हें छूट मिले तो भारत 18 महीनों में परमाणु बम बनाकर दिखा सकता है। वह मानते थे और काफी आश्वस्त भी थे कि अगर भारत को ताकतवर बनना है तो ऊर्जा, कृषि और मेडिसिन जैसे क्षेत्रों के लिए शांतिपूर्ण नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम शुरू करना होगा। इसके अलावा भाभा यह भी चाहते थे कि देश की सुरक्षा के लिए परमाणु बम भी बने। हालांकि यह उनका छिपा हुआ अजेंडा था।
भारत के इस महान वैज्ञानिक और स्वप्नदृष्टा का निधन 24 जनवरी 1966 में स्विट्जरलैंड में एक विमान दुर्घटना में हो गया।वह इस विमान में वियना एक कांफ्रेंस में हिस्सा लेने जा रहे थे। इस विमान में उस वक्त 117 यात्री सवार थे। भारत को इस विमान दुर्घटना से गहरा धक्का लगा था।एक थ्योरी के मुताबिक विमान का पायलट उस वक्त जिनेवा एयरपोर्ट को अपनी सही पॉजीशन बताने में नाकाम रहा था और विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। लेकिन दूसरी थ्योरी के मुताबिक यह विमान एक हादसे का नहीं बल्कि एक षड़यंत्र के तहत बम से उड़ाया गया था। इस विमान को दुर्घटनाग्रस्त करने के पीछे अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए का हाथ था। एक न्यूज वेबसाइट ने अपनी रिपोर्ट में कथित तौर पर इस बात का संकेत दिया है कि प्लेन क्रैश में अमेरिकी खुफिया एजेंसी का हाथ था। इसकी वजह भारत के परमाणु कार्यक्रम को पटरी से उतारना था।
दरअसल इस वेबसाइट ने 11 जुलाई 2008 को एक पत्रकार ग्रेगरी डगलस और सीआईए के अधिकारी रॉबर्ट टी क्राओली के बीच हुई कथित बातचीत को फिर से पेश किया है। इस बातचीत में सीआईए अधिकारी रॉबर्ट के हवाले से कहा गया है, ‘हमारे सामने समस्या थी। भारत ने 60 के दशक में आगे बढ़ते हुए परमाणु बम पर काम शुरू कर दिया था। उन्होंने इस बातचीत में रूस का भी जिक्र किया है जो भारत की मदद कर रहा था। भाभा का उल्लेख करते हुए सीआईए अधिकारी ने कहा, ‘मुझपर भरोसा करो, वह खतरनाक थे। उनके साथ एक दुर्भाग्यपूर्ण ऐक्सिडेंट हुआ। वह परेशानी को और अधिक बढ़ाने के लिए वियना की उड़ान में थे, तभी उनके बोइंग 707 के कार्गो में रखे बम में विस्फोट हो गया।
इस विमान हादसे के बाद इस इलाके में पत्रकारों का समूह भी गया था जिसको वहां पर विमान के कुछ हिस्से भी मिले थे। इसके अलावा वर्ष 2012 में वहां पर एक डिप्लोमेटिक बैग भी मिला जिसमें कलेंडर, कुछ पत्र और कुछ न्यूज पेपर्स थे। रॉबर्ट का कहना है कि सीआईए का हाथ सिर्फ भाभा के विमान को हादसाग्रस्त करने में ही नहीं था बल्कि लाल बहादुर शास्त्री की मौत में भी था। 1947 में भारत सरकार द्वारा गठित परमाणु ऊर्जा आयोग के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। 1953 में जेनेवा में अनुष्ठित विश्व परमाणुविक वैज्ञानिकों के महासम्मेलन में उन्होंने सभापतित्व किया। भाभा 1950 से 1966 तक परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष थे, तब वो भारत सरकार के सचिव भी हुआ करते थे। वो कभी भी अपने चपरासी को अपना ब्रीफ़केस उठाने नहीं देते थे।
रेल लम्बी दुरी तय करने के लिए सबसे सस्ता और आरामदायक साधन माना जाता है । भारत में सबसे अधिक रोजगार का भी सृजन भारतीय रेल के द्वारा ही होता है । रोजाना लाखो लोग ट्रेन से यात्रा करते है वैसे तो बहुत सारे रेल इंजन इलेक्ट्रिक से चलने लगे है । लेकिन क्या कभी आपने सोचा है की रेल का इंजन कितना माईलेज देता है यानि ट्रेन का इंजन को एक किलोमीटर की दुरी तय करने में कितना डीजल खर्च होता है । आज हम इस पोस्ट में बताएँगे की ट्रेन के इंजन का माईलेज कितना होता है ।
भारतीय रेल अपने सभी ट्रेन के इंजन को इलेक्ट्रिक करने जा रहा है जिससे बड़ी मात्र में डीजल की बचत होगी । लेकिन भारत में अभी भी बहुत सारे ऐसे रस्ते है जहा इलेक्ट्रिक की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारन अभी भी डीजल इंजन चल रहे है ।

रेलवे के डीजल इंजन के टैंक तिन हिस्सों में बंटा रहता है । जहाँ पहले भाग को 5000 लीटर, दूसरे टैंक को 5500 लीटर और तीसरे टैंक को 6000 लीटर डीजल से भरा जा सकता है । ऐसा नहीं है की सभी ट्रेन के इंजन का माईलेज सामान होता है । चूँकि सभी इंजन पर लोड एकसमान नहीं होता है इसलिए सबका माईलेज भी अलग अलग होता है । यदि गाड़ी में कुल 24 डिब्बे हों तो 6 लीटर डीजल में करीब एक किलोमीटर का एवरेज आता है। वहीं यदि ये कोई एक्सप्रेस गाड़ी हो तो 24 डिब्बों के साथ गाड़ी करीब 4.5 लीटर में एक किलोमीटर का सफर तय करती है। इंजन को बंद करना तो आसान है लेकिन इसे फिर से शुरू करने में कम से कम 25 लीटर डीजल खर्च होता है।
इसके अलावा अगर 12 डिब्बों की पैसेंजर गाड़ी है तो तो उसमें भी 1 किलोमीटर का एवरेज 6 लीटर डीजल में ही आयेगा । क्योंकि पैसेंजर गाड़ी हर स्टेशन पर रूकती जाती है इस बजह से इसके ब्रेक लगने और स्पीड बढ़ाने में ज्यादा डीजल खर्च होता हैं. वहीं एक्सप्रेस गाड़ियों की बात करे तो उनमें भी लगभग 4.50 लीटर में 1 किलोमीटर का एवरेज आयेगा क्योंकि एक्सप्रेस ट्रेन, पैसेंजर ट्रेन की तुलना में बहुत कम जगह रुकती है.
तो दोस्तों कैसी लगी ये जानकारी कमेन्ट में जरुर बताये
बिहार में छठ के पारंपरिक गीत हों या विवाह का मौका इन अवसरों पर बजने वाले गानों का दूसरा नाम ही पद्मश्री शारदा सिन्हा है। पर्व त्योहारों से लेकर दूसरे शुभ अवसरों पर इनके गाए गीत जहां एक ओर बिहार की लोक संस्कृति की सोंधी महक बिखेरते हैं वहीं यह गीत कानों में मिश्री घोलने का भी काम करते हैं। इनके गाये लोकगीत को सिर्फ बिहार में ही नहीं बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश,झारखंड समेत मॉरीशस तक में खासा पसंद किया जाता है।
2016 में इनका एक गाना “पाहिले पाहिले हम कईली छठी मईया व्रत तोहार ” आया था जो लोगो के जुबान पर चढ़ गया था | खासकर यह गीत नयी पीढ़ी के लिए गया गया था | इसमे दिखाया गया था की कैसे वर्षो से चली आ रही छठ की परंपरा को आगे बढाने का काम नयी पीढ़ी भी कर रही है | इस गाने को अभी तक youtube पर 25 लाख लोग देख चुके है | जितना मधुर आवाज में शारदा सिन्हा ने गाया है उतना ही बढ़िया इस विडियो का निर्माण भी किया गया है |
इस विडियो में दिखाया गया है की बेटे के पास माँ का फ़ोन आता है जिसमे वह बताती है की तबियत ख़राब होने की वजह से वो इस बार छठ नहीं कर रही है | वर्षो से चली आ रही छठी मईया को पूजने की परंपरा इस बार टूट जाएगी क्युकी रिश्तेदारी में भी कोई इस बार छठ नहीं कर रहा है |वह ये भी कहती है की नयी पीढ़ी की होने के कारण तुम्हारी पत्नी को भी छठ करना अच्छा नहीं लगेगा | ये बात बहु सुन लेती है और वो छठ करने का निश्चय लेती है | वो इंटरनेट के माध्यम से ही पूजा करने की विधि देखती है और छठ पूजा करती है | इस गाने के माध्यम से वो छठी मईया से कहती है की ये मेरा पहला छठ पर्व है अगर कोई मुझसे गलती हो जाये तो छठी मईया माफ़ कीजियेगा |
वह छठी मईया से गोदी में बलकवा देने अर्थात माँ बनने की प्रार्थना करती है | वह छठी मईया से विनती करती है की पति का स्नेह ऐसे ही बना रहे तथा हमारा कुल परिवार ऐसे ही बढ़ता रहे |
पाहिले पाहिले हम कईली
छठी मईया व्रत तोहार -2
कारिहा क्षमा छठी मईया
भूल चूक गलती हमार-2
गोदी के बलकवा के दिहा
छठी मईया ममता दुलार-2
पिया के सनेहिया बनईह
मईया दिहा सुख सार-2
नरियर केरवा घउदवा
सजल नादिया किनार-2
सुनिहा अर्ज छठी मईया
बढे कुल परिवार-2
घाट सजवनी मनोहर
मईया तोहर भक्ति अपार-2
लिही न अर्घिया ए मईया
दिही आशीष हज़ार-2
पाहिले पाहिले हम कईली
छठी मईया व्रत तोहार-2
कारिहा क्षमा छठी मईया
भूल चूक गलती हमार-2
मंटू ने बताया की उनके पिताजी रामभूषण मंडल को ज्योतिष और तंत्र-मंत्र में गहरा विश्वास था। एक बार रामभूषण मंडल को सपना आया की लॉटरी का टिकट खरीदने पर वे धनवान बनने वाले हैं। फिर क्या था लॉटरी खेलना शुरू कर दिया । उन्हें लॉटरी खेलने की इतनी बुरी लत लगी कि गांव की जमीन तक बिक गई। इस घटना ने मंटू पर ऐसा असर डाला कि उसने अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई लडऩे की ठान ली।
2006 में मंटू ने 21 युवाओं के साथ मिलकर ‘सक्सेस साइंस फॉर सोसाइटी’ का गठन किया। इसका सोसाइटी का लक्ष्य विज्ञान के माध्यम से लोगो के अन्दर मौजूद अन्धविश्वास को दूर करना था । इसके लिए मंटू ने कथित चमत्कारों की असलियत उजागर करने के लिए जगह जगह विज्ञानं मेला व नुक्कड़ नाटक का आयोजन करना शुरू किया। इतना ही नहीं वे अपनी सोसाइटी के माध्यम से स्वच्छता अभियान, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ व नारी स्वावलंबन का भी काम करते हैं।
मंटू ने अपने साथियों के साथ मिलकर न सिर्फ बिहार में बल्कि झारखंड, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, ओडिशा, दिल्ली, हरियाणा और मिजोरम में भी विज्ञान जागरूकता मेला लगा चुके हैं। जीविका सलाहकार पद पर कार्यरत मंटू इस अभियान में लगने वाला सारा खर्च अपनी साथियों के साथ मिलकर खुद उठाते हैं।
एमकॉम तक की शिक्षा पाए मंटू ने बताया की उनकी यह राह दिखाने में उनके गुरूजी का महत्वपूर्ण हाथ है | वे वर्ष 2006 में मंगलौर के इंडियन रैशनलिस्ट एसोसिएशन के प्रेसिडेंट और मेडिकल कॉलेज के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर डॉ. नारेंद्र नायक के संपर्क में आए। उन्होंने विज्ञान के प्रति अभिरुचि बढाने के साथ साथ हुए वैज्ञानिक चमत्कारों का भी प्रशिक्षण दिया। अब मंटू लोगों को बताते हैं कि कील को जीभ के आर-पार कर लेने वाले बाबा दरअसल अपनी जीभ में यू आकार की कील फंसाए रखते हैं।
मंटू ये भी लोगो को जरुर बताते है की सड़क किनारे ग्रह-नक्षत्रों को वश में करने वाली अंगूठी बेचने वाले लोग दरअसल चूने के पानी में उस पत्थर को डुबोए रहते हैं। लोगों को चकित करने के लिए अंगुली में चालाकी से फिनोथिलीन नामक केमिकल लगाए रहते हैं। इसके संपर्क में जैसे ही पत्थर आता है, खून जैसा लाल रंग निकलता है। इससे लोगों को लगता है कि वह पत्थर चमत्कारी है। इसी तरह अन्य चमत्कारों की कलई भी मंटू विज्ञान के जरिए खोलते हैं।
मधुबनी के चकदह निवासी अमित कुमार चौधरी बताते हैं कि एक बार इन्हें वाहन खरीदना था। वे चाहते थे की गाड़ी शुभ मुहूर्त में ही ख़रीदे ताकि उन्हें ज्यादा लाभ हो । उसी बीच वे मंटू के संपर्क में आये तो उनका अन्धविश्वास कुछ कम हुआ और उनका भ्रमजाल टूटा। बगैर मुहूर्त उन्होंने वाहन खरीदा जो काफी फलदायी रहा।
इसी तरह महाराजगंज मोहल्ले के बेचन साह के बेटे को एक बार सांप ने काट लिया। लोग झााड़-फूंक के चक्कर में पड़े थे। मंटू ने परिजनों को समझाया और उन्हें नजदीक के अस्पताल में जाने की सलाह दी |परिजन बच्चे को को लेकर सदर अस्पताल गए । जब डॉक्टर ने बताया कि समय रहते बच्चे को अस्पताल लाने के कारण जान बची तो परिजन को अपनी भूल का एहसास हुआ।
मंटू को इन सामाजिक कार्यो के लिए कई पुरस्कार भी मिल चुके है
वर्ष 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों भारत स्काउट गाइड का राष्ट्रपति पुरस्कार
नेहरू युवा केंद्र मधुबनी का जिला युवा क्लब पुरस्कार
वर्ष 2012 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में राष्ट्रीय विज्ञान प्रदर्शनी के मौके पर प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. यशपाल के हाथों पुरस्कार
2015 में राष्ट्रीय एकता शिविर मिजोरम में नेहरू युवा केंद्र मिजोरम के जोनल डायरेक्टर एसआर विष्णोई के हाथों पुरस्कार
2008 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय के गीत एवं नाटक प्रभाग के निदेशक एन नवचंद्र सिंह के हाथों पुरस्कार
2008 में ही धनबाद में आयोजित सातवें राष्ट्रीय बाल अधिकार अधिवेशन में चेयरमैन डॉ. जेवी कुलकर्णी के हाथों पुरस्कार
राज्य शिक्षा शोध द्वारा आयोजित 30वें जवाहर लाल नेहरू बाल विज्ञान प्रदर्शनी में निदेशक रवींद्र राम के हाथों पुरस्कार
अहमदाबाद में अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में पुरस्कार
कन्याकुमारी में सूर्यग्रहण कैंप में वैज्ञानिक बीके त्यागी के हाथों पुरस्कार।
मंटू के गुरु प्रो. नारेंद्र नायक कहते है-
अपनी सांस्कृतिक विरासत अक्षुण्ण रखने में कोई नुकसान नहीं है। नुकसान तब होता है जब लोग चमत्कारी बाबाओं के ढोंग, दकियानूसी परंपराओं के चक्कर में पड़ते हैं। मंटू जैसे युवा समाज को नई राह दिखा रहे हैं।
ऊ जे केरवा जे फरेला खबद से,
ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से,
सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,
आदित होई ना सहाय॥
ऊ जे नारियर जे फरेला खबद से,
ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,
आदित होई ना सहाय॥
अमरुदवा जे फरेला खबद से,
ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥
शरीफवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥
ऊ जे सेववा जे फरेला खबद से,
ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,
आदित होई ना सहाय॥
सभे फलवा जे फरेला खबद से,
ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से,
सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,
आदित होई ना सहाय॥
आदित = आदित्य = सूर्य/सूरज/the sun
मेड़राए = मंडराए=hover
मारबो = मारुंगा/मारुंगी / will beat you
फरेला = फलता है/फला (पेड़ पर फल) =growing of fruits on the trees
सुगवा = तोता = parrot
oo je kerwa je pharela khabad se, ohi par suga madaraye
marbo re sugwa dhanukh se, suga gire murjhaye
oo je sugni je royele viyog se, aadit hoyi na sahay
oo je nariyar je pharela khabad se, ohi par suga med
marbo re sugwa dhanukh se, suga gire murjhaye
oo je sugni je royele viyog se, aadit hoyi na sahay
amarudwa je pharela khabad se, oh par suga medaraye
marbo re sugwa dhanukh se, suga gire murjhaye
oo je sugni je royele viyog se, aadit hoyi na sahay
sharifwa je pharela khabad se, oh par suga medaraye
marbo re sugwa dhanukh se, suga gire murjhaye
oo je sugni je royele viyog se, aadit hoyi na sahay
narangiya je pharela khabad se, oh par suga medaraye
marbo re sugwa dhanukh se, suga gire murjhaye
oo je sugni je royele viyog se, aadit hoyi na sahay
oo je sewua je pharela khabad se, oh par suga medaraye
marbo re sugwa dhanukh se, suga gire murjhaye
oo je sugni je royele viyog se, aadit hoyi na sahay
sabhe phalwa je pharela khabad se, oh par suga medaraye
marbo re sugwa dhanukh se, suga gire murjhaye
oo je sugni je royele viyog se, aadit hoyi na sahay