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DEMI LEIGH MISS UNIVERSE 2017 BIOGRAPHY IN HINDI || डेमी लेई मिस यूनिवर्स 2017 का जीवन परिचय

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दोस्तों आज हम बताने जा रहे है ब्रम्हांड सुंदरी यानि मिस यूनिवर्स 2017 के बारे में जिसके माता पिता दोनों ने दूसरी शादी की | सुन्दर होने की वजह से एक बार उनके अपहरण की भी कोशिश हुयी | लेकिन उन्होंने हर नहीं माना और उनका मानना हैं की प्रत्येक लड़की को सेल्फ डिफेन्स आना चाहिए | चलिए जानते है की बिजनेस मैनेजमेंट की ये लड़की कैसे बनी मिस यूनिवर्स |

DEMI LEIGH MISS UNIVERSE 2017 BIOGRAPHY IN HINDI

डेमी लेई नेल (Demi-Leigh Nel-Peters) का जन्म दक्षिण अफ्रीका के वेस्टर्न केप प्रांत में  28 June 1995 को हुआ था ।डेमी के  जन्म के बाद से ही मम्मी-पापा में अनबन रहने लगी थी। जब वह दो साल की थी तब तनाव इतना बढ़ गया था की उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली ।  वे अपने नए घर में रहने लगे, पर डेमी को कभी अपने से अलग नहीं कर पाए। पापा अक्सर उनसे मिलने आया करते थे।

सगी माँ ने भी की दूसरी शादी 

डेमी की सगी मां एनी इंटीरियर फैशन डिजाइनर थीं। कुछ समय बाद उन्होंने भी दूसरी शादी कर ली। एनी ने अपने  होने वाले पति जोहान को  पहले ही बता दिया था कि उनकी बेटी उनके साथ रहेगी।

डेमी बताती हैं- जोहान मेरे सौतेले पिता हैं, पर मेरे लिए दुनिया के सबसे प्यारे इंसान हैं। उन्होंने कभी एहसास  नहीं होने दिया कि वह मेरे दूसरे पिता हैं।

डेमी की नई मां इलेज पीटर मनोचिकित्सक थीं। इलेज कहती हैं- जब मैंने पहली बार उसे देखा, तब वह दो साल की थी। उसकी मासूमियत दिल को छू गई। उसे गोद में उठाया, तो मां होने का एहसास हुआ।

इस तरह डेमी का बचपन दो घरों में बीतने लगा। कभी सगी और सौतेली मां का फर्क महसूस ही नहीं हुआ। दोनों माएं उन पर खूब प्यार लुटातीं। धीरे-धीरे दोनों मां अच्छी दोस्त बन गईं। दोनों परिवारों का तनाव भी खत्म होने लगा।

 

विकलांग बहन बनी प्रेरणा

डेमी को हमेशा यह शिकायत रहती कि उनका कोई भाई-बहन नहीं है। नई मां इलेज ने उनकी तमन्ना पूरी कर दी। डेमी जब  दस साल की थीं, तो उनकी नयी माँ ने  एक बेटी को जन्म दिया। पर वह जन्म से ही विकलांग थी। बहन के साथ खेलने और मजे करने का सपना अधूरा रह गया।

डेमी कहती हैं- काश, वह मेरे संग खेल पाती। मुझसे बातें कर पाती। उसे देखकर एहसास हुआ कि ईश्वर ने मुझे कितनी खूबियों से नवाजा है। तब मैंने तय किया कि मैं अपनी जिंदगी के हर पल को पूरी संजीदगी से जिऊंगी। कुछ ऐसा करूंगी कि घरवालों को मुझ पर गर्व हो। बहन मेरी प्रेरणा है। 

डेमी को किताबें पढ़ना और पार्क में दौड़ना खूब पसंद था। स्कूल में उनकी छवि एक पढ़ाकू और अनुशासित लड़की की रही। 10वीं कक्षा में उन्हें स्कूल की हेड गर्ल बनाया गया। जब वह कक्षा 11 में थीं, उन्हें जॉर्ज सिटी काउंसिल का डिप्टी मेयर नियुक्त किया गया। जब वह घर से बाहर होतीं, मां को उनकी फिक्र सताती। इसलिए उन्हें सेल्फ डिफेंस की ट्र्रेंनग दिलवाई गई।

खुबसूरत दिखने में लगने लगा मन 

डेमी अब  18 साल की हो चुकी थीं। बाकी लड़कियों की तरह उन्हें भी सजना-संवरना अच्छा लगने लगा। खाली वक्त में वह तरह-तरह की हेयर स्टाइल बनातीं। मां के संग फैशनेबल कपड़े खरीदने जातीं।

डेमी कहती हैं- मैं सबसे खूबसूरत दिखना चाहती थी। मैं फैशन मैगजीन पढ़ने लगी। फैशन शो देखने लगी। पर कभी नहीं सोचा था कि ब्यूटी क्वीन बनूंगी। मम्मी-पापा ने कभी ऐतराज नहीं किया, पर वे इस बात को लेकर हमेशा संजीदा रहे कि बेटी एक सम्मानजनक करियर चुने।

फैशन पत्रिकाओं में दिलचस्पी बढ़ी 

12वीं पास करने के बाद उन्होंने नॉर्थ वेस्ट यूनिवर्सिटी से बिजनेस मैनेजमेंट में डिग्री हासिल की। पढ़ाई के दौरान ही फैशन पत्रिकाओं में दिलचस्पी बढ़ने लगी। नई मां ने उनके मन की बात भांप ली। छोटी मां उन्हें कई फैशन शो में लेकर गईं। पिछले साल वह मिस साउथ अफ्रीका का फाइनल शो देखने पहुंचीं।

डेमी बताती हैं- सुंदरियां जिस नजाकत से स्टेज पर आईं, उसे देखकर मैं अभिभूत हो गई। इसी ने मुझे विश्व सुंदरी बनने के लिए प्रेरित किया। 

रातो रात बनी सेलेब्रेटी 

अब डेमी  तय कर चुकी थीं कि उन्हें  ब्यूटी क्वीन बनना है। हमेशा की तरह मां ने हौसला दिया। फिटनेस ट्र्रेंनग और काउंर्संलग सेशन शुरू हुए। इस साल मिस साउथ अफ्रीका के चयन में जज पैनल के अलावा जनता से भी र्वोंटग कराई गई। मार्च में वह मिस साउथ अफ्रीका चुनी गईं। रातोंरात डेमी सेलिब्रिटी बन गईं। जिधर जातीं, कैमरामैन पीछा करते। लोग उन्हें देखने को उमड़ पड़ते। पर वह बिंदास  जीना चाहती थीं। सुरक्षा घेरे में रहना पसंद न था।

डेमी का अपहरण करने की हुयी कोशिश 

खिताब जीते कुछ दिन हुए थे। शर्ॉंपग के लिए वह जोहानिसबर्ग में थीं। दिन का वक्त था। आसपास काफी भीड़ थी। वह कार से बाहर निकल रही थीं कि अचानक सामने से तीन बंदूकधारी आए। उन्होंने धमकी देते हुए कहा- कार में बैठो चुपचाप। उनमें से एक ने उनका फोन छीना और दूसरे ने पर्स। डेमी फुर्ती के साथ पलटीं और उन्हें धकेलते हुए सड़क पर तेजी से भागने लगीं। वह मदद के लिए चिल्ला रही थीं और लोग तमाशा देख रहे थे।

डेमी बताती हैं- उस दिन सेल्फ डिफेंस ट्र्रेंनग बहुत काम आई। वे मेरा अपहरण करना चाहते थे, पर मेरा हौसला देखकर भाग गए। इसीलिए मैं कहती हूं कि हर लड़की को आत्मरक्षा ट्र्रेंनग लेनी चाहिए। 

इस हादसे के बाद घरवाले डर गए, पर डेमी ने कहा कि यह वक्त डरकर घर में बैठने का नहीं है। उन्होंने लड़कियों को आत्मरक्षा की ट्र्रेंनग देने के लिए अनब्रेकेबल नाम का कार्यक्रम शुरू किया। वह वर्कशॉप के जरिये लड़कियों को आत्मरक्षा के लिए जागरूक करने लगीं। डेमी कहती हैं- लड़कियों को हमेशा से शारीरिक रूप से कमजोर समझा गया।

90 सुन्दरियों को देकर मात पहना ताज  

अब बारी थी अंतरराष्ट्रीय मंच पर जलवा बिखेरने की, जहां मुकाबला 90 सुंदरियों से था। तैयारी का समय कम  था, पर हौसले बुलंद थे। डेमी-ले नेल-पीटर्स साउथ अफ्रीका की तरफ से मिस वर्ल्ड 2017 और मिस यूनिवर्स 2017 में अपने देश साउथ अफ्रीका को प्रतिनिधित्व करने वाली थीं, लेकिन दोनों प्रतियोगिताओं की डेट क्लैश होने की वजह से डेमी-ले नेल को मिस यूनिवर्स 2017 के लिए भेजा गया।उन्होंने अपने देशवासियों को मायूस नहीं होने दिया और लास वेगास में उन्होंने मिस यूनीवर्स का ताज अपने नाम कर लिया।

39 सालो का सुखा किया ख़त्म

डेमी-ले नेल-पीटर्स साउथ अफ्रीका की दूसरी मिस यूनिवर्स हैं। इससे पहले मार्गरेट गार्डिनर ( Margaret Gardiner) 1978 में मिस यूनिवर्स साउथ अफ्रीका बनीं थीं। इस हिसाब से देखा जाए तो साउथ अफ्रीका को करीब 39 साल बाद मिस यूनिवर्स का ताज मिला है।

आज है सशस्त्र सेना झंडा दिवस -जानिए क्यों मनाया जाता है

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7 दिसंबर 1949 से भारतीय सेना द्वारा हर वर्ष भारत में सशस्त्र सेना झंडा दिवस मनाया जाता है | इस दिवस को मानाने का मुख्य उद्देश्य देशवासियों द्वारा सेना के प्रति सम्मान प्रकट करना है |

उद्देश्य 

भारत सरकार ने 1949 से भारत में सशस्त्र सेना झंडा दिवस मानाने का निर्णय लिया था | इस दिन झंडे की खरीद से इकट्ठा हुए धन को भारत के शहीद सैनिको के आश्रितों के कल्याण में खर्च किया जाता है | इस दिन   सशस्त्र सेना झंडा दिवस द्वारा इकट्ठा की गयी | देश के हर नागरिक को चाहिए कि वह झंडा दिवस कोश में अपना योगदान दें, ताकि हमारे देश का झंडा आसमान की ऊंचाइयों को छूता रहे | इस अभियान का उद्देश्य ‘सशस्त्र बल झंडा दिवस कोष’ के बारे में जागरुकता पैदा करने और लोगों को उदारतापूर्वक योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करना है।

इतिहास 

7 दिसंबर, 1949 से शुरू हुआ यह सफ़र आज तक जारी है। आज़ादी के तुरंत बाद सरकार को लगने लगा कि सैनिकों के परिवार वालों की भी जरूरतों का ख्याल रखने की आवश्यकता है और इसलिए उसने 7 दिसंबर को झंडा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। इसके पीछे सोच थी कि जनता में छोटे-छोटे झंडे बांट कर दान अर्जित किया जाएगा जिसका फ़ायदा शहीद सैनिकों के आश्रितों को होगा। शुरूआत में इसे झंडा दिवस के रूप में मनाया जाता था लेकिन 1993 से इसे सशस्त्र सेना झंडा दिवस का रूप दे दिया गया।

हर देशवासियों को करना चाहिए सहयोग 

झंडा दिवस उन जाबांज सैनिको के प्रति एकजुटता दिखने का दिन है जो हमारे देश की रक्षा करते करते शहीद हो गए | आतंकवादियों और उग्रवादियों से लोहा तेते हुए अपने प्राणों की बलि दे दी |  साल में एक बार आने वाले इस दिवस में भारत के हर देशवासी को अपना सहयोग देना चाहिए ताकि भारत का तिरंगा हमेशा अपनी ऊँचाईया  छूता रहे | और शहीद सैनिको के परिवार को किसी प्रकार की तकलीफ न हो |

कैसे दे सहयोग 

देश का कोई भी आदमी इसमे योगदान दे सकता है | इसके लिए आपको इसके ओफिसियल वेबसाइट http://ksb.gov.in/  पर जाना है | इस वेबसाइट पर आप फ्री में भारत का झंडा डाउनलोड कर सकते है | और इसमे अपना आर्थिक योगदान देने के लिए CONTRIBUTE NOW पर क्लिक करे | इसमे पेमेंट करने के बहुत सारे आप्शन भी उपलब्ध है | आप पेटीएम के द्वारा भी पैसे भेज सकते है |इस साल रक्षा मंत्रालय 1 से 7 दिसंबर 2017 तक डिजिटल सप्ताह अभियान का आयोजन कर रहा है जिसे सशस्त्र बल सप्ताह के रूप में मनाया जाएगा। यह अभियान पूरे देश की सशस्त्र बल कार्मिकों के साथ एकजुटता व्यक्त करने रूप में मनाया जाएगा। इसके लिए कई कैशलेस भुगतान विधियां उपलब्ध कराई गई हैं। आप अपना योगदान Paytm नंबर ‘8800462175’ और यूपीआई कोड armedforcesflagdayfund@sbi के माध्यम से भेज सकते हैं। इसके अलावा क्रेडिट / डेबिट कार्ड या नेट बैंकिंग द्वारा योगदान करने हेतु ksb.gov.in/armed-forces-flag-day-fund.htm  पर लॉग इन करें।

 

जानिए रामलला की भूमि अयोध्या में अब तक क्या क्या हुआ

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ayodhya ram mandir

अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचा के ध्वस्त हुए  आज 25 साल पुरे हो गए है 

 

आज ही के दिन यानि 6 दिसम्बर 1992  को अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को ध्वस्त किया गया था | आजादी के बाद यह सबसे बड़ी घटना थी जिसने देश की राजनीती के साथ साथ सामाजिक गलियारों में भी हलचल मचा दी थी | इस घटना ने न सिर्फ भारत को बल्कि पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओ को भी प्रभावित किया था | आज इस घटना के 25 साल पुरे हो गए है ,लेकिन आज भी इस मुद्दे की गूंज भारत की राजनीती में सुनाई देती है | यह महज एक इतेफाक ही है की विवादित ढांचा ढहाने के 25 साल पुरे होने के एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवाई शुरू हुयी है | चलिए एक दृष्टि डालते है की अयोध्या में अब तक क्या क्या हुआ है |

 

 

  • 1527 में बाबर ने यहां बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया। हिंदू मान्यता के अनुसार इसी जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था।
  • 1853 में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पहली हिंसा हुई। हिंदुओं का आरोप है कि भगवान राम के मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया हुआ।
  • 1859 में ब्रिटिश सरकार ने विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिदुओं को अलग-अलग प्रार्थनाओं की इजाजत दी।
  • 1885 में मामला पहली बार अदालत पहुंचा। महंत रघुबर दास ने फैजाबाद अदालत में मंदिर के निर्माण के लिए अपील दायर की।
  • 5 दिसंबर, 1950 को महंत परमहंस रामचंद्र दास ने बाबरी मस्जिद में राममूर्ति रखने के लिए मुकदमा दायर किया। मस्जिद को ‘ढांचा’ नाम दिया गया
  • 1 फरवरी, 1976 को फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिदुओं को पूजा की इजाजत दी और ताले दोबारा खोले गए
  • 1 जुलाई, 1989 को इस मामले में भगवान रामलला विराजमान नाम से एक और मुकदमा किया गया। यह पांचवा मुकदमा था।
  • 25 दिसंबर, 1990 बीजेपी अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली।
  • 6 दिसंबर, 1992 को हजारों की संख्या में कार सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर ढांचा गिरा दिया। इसके बाद देश के तमाम हिस्सों में तनाव फैल गया।
  • 16 दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा गिराने की जिम्मेदार स्थितियों की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया गया।
  • जनवरी, 2002 तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने वार्ता से विवाद सुलझाने के लिए अपने कार्यालय में एक अयोध्या प्रकोष्ठ शुरू किया।
  • अप्रैल, 2002 अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर उच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की।
  • सितंबर, 2003 अदालत ने फैसला दिया कि मस्जिद के विध्वंस को उकसाने वाले सात हिंदू नेताओं को सुनवाई के लिए बुलाया जाए।
  • जुलाई, 2009 लिब्रहान आयोग ने अपने गठन के करीब 17 साल बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
  • 28 सितंबर, 2010 सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहबाद उच्च न्यायालय को विवादित मामले में फैसला देने से रोकने वाली याचिका खारिज की।
  • 30 सितंबर, 2010 इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा। एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े को मिला।
  • 9 मई, 2011 को इस मामले में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक के आदेश दिए।
  • जुलाई, 2016 बाबरी मामले के सबसे उम्रदराज वादी हाशिम अंसारी का 95 साल की उम्र में निधन हो गया। वह 1949 से इस मामले से जुड़े थे।
  • 21 मार्च 2017 सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की बात कही। इसके बाद दोनों तरफ से कोशिशें शुरू हुईं।
  • 19 अप्रैल, 2017 सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में कई नेताओं के खिलाफ आपराधिक केस चलाने का आदेश दिया।
  • 11 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे से जुड़े सभी कागजातों को अंग्रेजी में अनुवाद करने के आदेश दिए।
  • 5 दिसंबर 2017 सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की विशेष अदालत में विवादित मामले की फिर से सुनवाई शुरू की गई है।

सरकारी नौकरी छोड़कर बनी मायानगरी की सफल अभिनेत्री -छवि पाण्डेय

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Chhavi pandey facebook, viraf patel, age wiki, biography

छवि पाण्डेय (अभिनेत्री ) जीवन परिचय || CHHAVI PANDEY ACTRESS HINDI BIOGRAPHY

लालू यादव ने दिया था सरकारी नौकरी 
छवि पाण्डेय की  प्रारंभिक शिक्षा पटना के सेंट जोसेफ कान्वेंट से हुई। छवि ने मगध महिला कॉलेज से ग्रेजुएशन की। छवि जब पटना में थी तो अपने गायन को लेकर हमेशा सुर्खियों में रही। छवि के  गायन से एक बार राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने छवि को  सरकारी नौकरी दिला दी।
किस्मत ने बनाया सिंगर से अभिनेत्री 
छवि के  पिताजी छवि को  सिंगर के तौर पर स्थापित करना चाहते थे पर किस्मत ने छवि को  अभिनेत्री बना दिया। इसके लिए उन्होंने  सरकारी नौकरी भी छोड़ दी। छवि  मुंबई में एक सिंगिंग  शो में ऑडिशन के लिए गयी थी पर अभिनय के लिए मौका मिला तो उन्होंने  इसे तुरंत स्वीकार कर लिया।
परिवार ने किया मुझे हमेशा सपोर्ट 
छवि बताती है -आज मैं जिस मुकाम पर हूं उसमें मेरे पिता उमेश कुमार पांडेय, मां गीता पांडेय और चाचा जयंत कुमार पांडेय का बहुत बड़ा योगदान है। मुझे लगता है कि अगर परिवार पूरी तरह सपोर्ट नहीं करे तो बिहार से मुंबई जैसे शहर में आकर संघर्ष करना बहुत मुश्किल है। शुरू में जब भी मुङो ऑडिशन के लिए मुंबई, कोलकाता और दिल्ली समेत किसी भी शहर में जाना हुआ चाचाजी हमेशा मेरे साथ रहे। इसलिए मैं बिहार के अभिभावकों से कहना चाहती हूं कि अगर आपकी बेटियां किसी भी क्षेत्र में कॅरियर बनाना चाहती हैं तो उनका खुले दिल से सहयोग करें। इससे बेटियों का उत्साह दोगुना हो जाता है।
छवि बताती  है –मैं जब छोटी थी तो किसी भी प्रतियोगिता में भाग लेने से डरती थी। जल्द ही एक कार्यक्रम में जज की भूमिका में भी नजर आऊंगी। जब जब वरुण धवन और दीपिका पादुकोण के साथ किसी मंच पर परफार्म करती हूं तो बहुत गर्व महसूस होता है।

एक बूंद इश्क सीरियल से मिली पहचान 

छवि को टीवी की दुनिया में  एक बूंद इश्क सीरियल से पहचान मिली। इसके बाद छवि ये है आशिकी, बंधन, सिलसिला प्यार का और और अब काल भैरव रहस्य में बतौर लीड अभिनेत्री के रूप में  काम कर रही है । ’सिलसिला प्यार का’ में छवि को अभिनेत्री शिल्पा शिरोडकर के साथ काम करने का मौका मिला। उन्होंने  भोजपुरी फिल्म बिदेसिया में बतौर लीड अभिनेत्री काम किया था पर अब वह  भोजपुरी फिल्मों में काम नहीं करना चाहती हूं। काल भैरव में काम करके वह बहुत ही रोमांचित हैं । इसमें वह  लंदन में पढ़ी-लिखी नम्रता का किरदार निभा रही हूं।

मुंबई में बहुत याद आता है बिहार का लिट्टी-चोखा

छवि बताती है -मैं बिहार के लिट्टी-चोखा को बहुत मिस करती हूं। अभी मैं सालभर से पटना नहीं आ पाई हूं।मैं पटना को बहुत मिस करती हूं।वहां के मौर्योलोक का लिट्टी-चोखा भी बहुत याद आता है। काल भैरव में मेरे साथ काम करने वाले सभी साथी मुझसे पूछते हैं कि लिट्टी-चोखा के बारे में पूछते हैं।मैंने उनसे वादा किया है कि शूटिंग खत्म होने के बाद मैं उन्हें पटना लेकर चलूंगी और बिहार की प्रसिद्ध चीजें खिलाऊंगी और दिखाऊंगी।

मन और शरीर को मजबूत करके ही माया नगरी में आइये

छवि कहती है -जो अभिनय के क्षेत्र में आना चाहते हैं उन्हें मैं मुंबई की हकीकत से रूबरू कराना चाहती हूं।यहां कॅरियर के किसी भी अन्य क्षेत्र से ज्यादा संघर्ष है। यहां कई बार युवा अपना धैर्य खो देते हैं। महीनों काम नहीं मिलता है और आर्थिक परेशानियां भी बढ़ जाती हैं तो कदम डगमगाने लगते हैं। लेकिन यही परीक्षा की घड़ी होती है। यहीं पर धैर्य के साथ सही निर्णय लेने की जरूरत पड़ती है। इसमें आपका अपना परिवार बहुत काम आता है।एकमात्र परिवार के लोग ही होते हैं जो आपका सहारा बनते हैं। इसलिए कभी भी अपने परिवार को मत भूलिए। उनसे अपनी हर बात शेयर करिए। यह बात गांठ बांध लीजिए कि यहां कुछ भी आसानी से नहीं मिलता। कुछ ही लोग भाग्यशाली होते हैं, जिन्हें जल्दी सफलता मिल जाती है।इसलिए मैं अपने फैंस और बिहार के युवाओं से कहना चाहती हूं कि मन और शरीर को मजबूत करके ही माया नगरी में आइये।

बच्चो से मजदूरी नहीं करवाईये – सीता चौधरी

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सीता चौधरी जब 10 साल की थी ,एक दिन उनके घर पर एक ठेकेदार आया और उनको अपने साथ चलने के लिए कहा । उन्होंने उसका विरोध किया रोई और मिन्नतें भी की । मगर ठेकेदार ने उन्हें डांटते हुए बताया कि तुम्हारे माता पिता तुम्हें बेच  चुके हैं और मैंने उसके लिए पैसा भी दिया है । अब रोना धोना छोड़ो और मेरे साथ चलो । वैसे नेपाल के जिस गांव में सीता का जन्म हुआ था वहां पर बच्चियों को बेचना और उनसे बंधुआ मजदूरी करवाना एक आम बात थी।  क्योंकि वहां के परिवार बहुत ही गरीब थे और वह अपने बच्चों से काम करने के लिए मजबूर थे ।ठेकेदार ऐसे बच्चों को घरेलू नौकर बना कर एक निश्चित समय के लिए शहर में भेज देते थे ।

 

सीता बताती है –मुझे अपने माता-पिता से कोई शिकायत नहीं है । लेकिन गांव में रोजगार नहीं  थे खेत के लिए जमीन नहीं थी । गरीबी और भूख के कारण लोगो को  अपने बच्चों से काम कराना पड़ता 

जिंदगी बन गयी नरक 

शहर में आकर सीता की जिंदगी नरक बन गई । ठेकेदार उन्हें एक घर में ले गया ।  घर के झाड़ू पोछा बर्तन और बच्चों की देखरेख  का जिम्मा सीता के ऊपर था। सीता को सुबह 4:00 बजे से लेकर रात के 12:00 बजे तक काम करना पड़ता था । कुछ भी गलती  होती थी तो घर की मालकिन उन पर भड़क जाती थी । 10 साल की सीता पर मालकिन को जरा सी भी दया नहीं आती थी ।छोटी सी गलती होने पर उन्हें पूरा दिन भूखा रखा जाता था । मजदूरी का ठेका 1 साल के लिए होता था और फिर ठेकेदार फिर उन्हें किसी नए परिवार में भेज देता था ।

बाहर पड़ता था सोना

सीता बताती है- हमारे देश में बहुत ही आसानी से सस्ते मजदूर मिल जाते हैं। अमीर परिवारों को सस्ते नौकर मिल जाते हैं और ठेकेदार को मोटा कमीशन । नौकरों  की जिंदगी कभी भी बदलती नहीं है । काम करते समय हर पल खतरा रहता कि कहीं नाराज ना हो जाए । घरवालों की याद तो आती थी लेकिन उनसे संपर्क करने का कोई जरिया नहीं था । तबीयत खराब होने पर यह कहने  की हिम्मत नहीं होती थी कि मैं आज काम नहीं कर पाऊंगी । घर में  चाहे जितना स्वादिष्ट खाना बने  उनके हिस्से में बासी खाना ही आता था । सर्दी हो या गर्मी उन्हें बाहर ही सोना पड़ता था ।

सरकार ने उठाया कदम 

लोक घरेलू नौकरों को हिकारत की नजर से देखते थे । उन्हें लगता था कि हम गरीब बच्चों को दुखी आसमान का एहसास नहीं होता । साल 2000 में पहली बार नेपाल में घरेलू नौकरों के उत्पीडन का मुद्दा उठा  और मामला कोर्ट तक पहुंचा ।देश में बाल मजदूरी पर कानूनी तौर से रोक लगाई गई ।मगर जमीन पर ऐसा कोई खास असर नहीं दिखा  । साल 2013 में एक 12 साल की घरेलू नौकरानी की मौत के बाद  यह मुद्दा दोबारा उठा।

सीता को मिली आजादी 

सीता को पता चला की कई गरीब बच्चों को प्रताड़ना की वजह से अपनी जान गवानी पड़ती है।  उन्हें डर लगा यदि वह जल्दी बंधुआ मजदूरी से आजाद नहीं हुई तो उनका भी यही हश्र हो सकता है । कई बार कोशिश की ठेकेदार के चुंगल से निकलने की पर वह  कामयाब नहीं हो पाई । पिछले साल सरकारी अभियान के तहत  तमाम बंधुआ मजदूरों को रिहा कराया गया। सीता को भी आजादी मिली ।

 

सीता बताती है – रिहाई के बाद सरकार ने जो वादा किया वह हमें बेहतर जिंदगी जीने का मौका देगा । लेकिन वह पूरा नहीं किया गया । मुआवजे में हमें ऐसी जमीन दी गई जो अक्सर में डूब जाती है   । बाढ़ में हमारा घर और खेत सब डूब गए और एक बार फिर हम बर्बाद हो गए ।

शादी और बच्चे 

इसी बिच सीता की शादी हुई और उनकी दो बच्चियां भी हुई । सीता ने तय किया कि वह अपनी बेटियों को जरूर पढ़ाएंगी । मगर इसके लिए उन्हें अपने पांव पर खड़ा होना जरूरी था । अनपढ़ होने की वजह से सीता को नौकरी मिलना मुश्किल था और वह घरेलू कामगार नहीं बनना चाहती थी ।

 

सीता बताती है –मैं अकेली महिला नहीं थी जिसे नौकरी की तलाश थी  जो बंधुआ  मजदूरी से आज़ाद होने के लिए भटक रही थी । हम काम करना चाहते थे पर बंधुआ मजदूर बनकर नहीं इसलिए हमने सोचा कि हम व्यवस्था के खिलाफ लड़ेंगे ।

प्रशासन के खिलाफ खोला मोर्चा 

सीता ने अपने इलाके के महिलाओं को एकजुट किया और उन्हें बताया कि सरकारी योजना के नाम पर उनके साथ किस तरह का मजाक किया गया है । प्रशासन पर दबाव बनाया गया कि सभी बंधुआ मजदूरों को सही इलाके में जमीन दे ताकि  वे  खेती कर सकें ।प्रशासन से जीतना इतना आसान नहीं था । लेकिन सीता अपने इलाके के महिलाओं में उम्मीद जगाने में कामयाब रही और इस साल जब निकाय चुनाव की घोषणा हुई तो उन्होंने तय किया कि वह चुनाव लड़ेंगी । 

चुनाव में जीत हासिल की 

 सीता बताती हैं -मैं कभी स्कूल नहीं गई और मुझे पढ़ना लिखना भी नहीं आता।  लेकिन जिंदगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया।  करीब 20 साल तक मैं शहर के तमाम छोटे बड़े घरों में काम किया । घर का माहौल देखा मैं लोगों के दर्द को समझती हूं । मैं जानती हूं लोगो के लिए क्या करना है । सीता को चुनाव में भरपूर समर्थन मिला और उन्होंने शानदार जीत हासिल की ।

दिलवाउंगी उनका हक़ 

सीता बताती है कि अब मैं जनप्रतिनिधि हु ।  प्रशासन को मेरी बात सुननी पड़ेगी । सबसे पहले मैं महिलाओं को  जमीन दिलवाउंगी । गांव में स्कूल खुलवाउंगी  । ताकि हमारे बच्चे अनपढ़ ना रह  सके और उन्हें किसी भी तरह की मजदूरी नहीं करनी पड़े। 

भारत की मानुषी छिल्लर ने जीता मिस वर्ल्ड 2017 का खिताब

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 मानुषी छिल्लर मिस वर्ल्ड खिताब जीतने वाली बनी छठी भारतीय महिला 

भारत की सुंदरियों ने एक बार फिर अपनी सुन्दरता का परचम पुरे विश्व मव लहरा दिया है । चीन के सनाया में आयोजित मिस वर्ल्डप्रतियोगिता में भारत की मिस इंडिया मानुषी छिल्लर ने  मिस वर्ल्ड 2017 का ख़िताब अपने नाम किया है | दुनियाभर की 118 सुंदरियों को हराकर हरियाणा के सोनीपत के शहर की रहने वाली मानुषी ने यह खिताब अपने नाम किया है । इस प्रतियोगिता में दूसरे नंबर पर मिस मेक्सिको रहीं जबकि तीसरे नंबर पर मिस इंग्लैंड रहीं है।
जूरी का दिल जीता 
मिस इंडिया मानुषी छिल्लर से फाइनल राउंड में जूरी ने सवाल पूछा था कि किस प्रफेशन में सबसे ज्यादा सैलरी मिलनी चाहिए और क्यों?
इसके जवाब में मानुषी ने कहा, ‘मां को सबसे ज्यादा सम्मान मिलना चाहिए। इसके लिए उन्हें कैश में सैलरी नहीं बल्कि सम्मान और प्यार मिलना चाहिए।’
स्केचिंग और पेंटिंग का भी शौख
20 साल की मानुषी छिल्लर 67वीं मिस वर्ल्ड हैं। मानुषी ने दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल से पढ़ाई की है और वह फिलहाल सोनीपत के भगत फूल सिंह गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज फॉर विमिन से मेडिकल की पढ़ाई कर रही हैं। उन्होंने नेशनल स्कूल अॉफ ड्रामा में भी भाग लिया है।  मानुषी को पैराग्लाइडिंग, बंजी जंपिंग और स्कूबा डाइविंग जैसे स्पोर्ट्स पसंद हैं। इसके अलावा मानुषी एक प्रशिक्षित कुचिपुड़ी डांसर भी हैं और स्केचिंग और पेंटिंग भी बनाती हैं।
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मिस वर्ल्ड बनना बचपन का था सपना
मानुषी ने  एक इंटरव्यू में बताया –
‘बचपन में, मैं हमेशा से इस कॉम्पिटिशन में हिस्सा लेना चाहती थी और मुझे यह कभी नहीं पता था कि मैं यहां तक पहुंच जाऊंगी। अब मिस वर्ल्ड का खिताब जीतना केवल मेरा ही नहीं बल्कि मेरी फैमिली और दोस्तों का भी सपना बन गया था।‘
मिस वर्ल्ड में जाने से पहले मानुषी समाजसेवा के कार्यों से भी जुड़ी रही हैं। उन्होंने महिलाओं की माहवारी के दौरान हाइजीन से संबंधित एक कैंपेन में करीब 5000 महिलाओं को जागरूक किया है।
मिस वर्ल्ड का ख़िताब जितने वाली छठी भारतीय 
 1966 तक कोई भी एशियन महिला ने मिस वर्ल्ड का खिताब नहीं जीता था। 1966 मेडिकल फाइनल इयर की स्टूडेंट रीता फारिया भारत से पहली मिस वर्ल्ड बनीं थीं। उसके बाद ऐश्वर्या राय ने 1994, डायना हेडन ने 1997 में, युक्ता मुखी ने 1999 में और प्रियंका चोपड़ा ने साल 2000 में मिस वर्ल्ड का खिताब जीता था।

गूगल ने अपने प्ले-स्टोर से हटाया यूसी ब्राउजर,जानिए वजह

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 यूसी ब्राउज़र पर यूजर्स को भ्रमित करने का आरोप

यूसी ब्राउज़र मोबाइल की दुनिया का सबसे पॉपुलर ब्राउज़र है | यूसी ब्राउज़र को 50 करोंड़ से भी ज्यादा यूजर इस्तेमाल करते है | अकेले भारत में ही इस ब्राउज़र के 10 करोंड़ यूजर है | यह चीन की कंपनी अलीबाबा ग्रुप का सबसे पॉपुलर प्रोडक्ट है |

गूगल ने अपने प्ले-स्टोर से  यूसी ब्राउजर को हमेशा के लिए नहीं बल्कि 7  दिनों के लिए हटाया है| जिसकी शुरुआत 13 नवंबर से हो चुकी है। दरअसल, गूगल के पॉलिसी के हिसाब से इस ब्राउजर की सेटिंग्स फिट नहीं हैं जिसकी वजह से इसे हटाया गया है। यूसी पर गूगल ने यूजर्स को भ्रमित करने का आरोप लगाया है |

रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है की यूसी ब्रोसेर  दुसरे  ऐप के  यूजर्स को रिडायरेक्ट करके उन्हें भ्रमित कर रहा था. रिडायरेक्शन के कारण कई बार यूजर्स के फोन में थर्ड पार्टी ऐप भी इंस्टॉल हो जाते हैं व ऐसे में यूजर्स के फोन में मैलवेयर के आने का खतरा रहता था.

इससे पहले यह भी रिपोर्ट सामने आई थी कि यूसी ब्राउजर इंडिया के यूजर्स की जानकारियों को चाइना की गवर्नमेंट के साथ शेयर करता है | वहीं आईटी मंत्रालय के एक वरिष्ठ ऑफिसर ने बताया था कि इस मामले में दोषी पाए जाने पर यूसी ब्राउजर को प्रतिबंधित किया जा सकता है |

फिलहाल प्ले स्टोर पर इस ब्रोसेर का   मिनी वर्जन उपलब्ध है। जब तक यूसी ब्राउजर गूगल प्ले स्टोर पर वापस नहीं आ जाता, तब तक यूजर्स चाहे तो यूसी ब्राउजर मिनी ब्राउज़र यूज कर सकते हैं, जो यूसी का ही एक दूसरा विकल्प है।

फिलहाल यूसी ब्राउजर के नए वर्जन को गूगल प्ले स्टोर के डिवेलपर कंसोल पर अपलोड कर दिया गया है और इसका मूल्यांकन किया जा रहा है।

वैसे गूगल ब्राउज़र के बहुत सारे विकल्प मौजूद है जिसमे अभी सबसे popular भारत का mcent Browser है क्युकी यह न सिर्फ ब्राउज़िंग करता है बल्कि आपको पैसे भी देता है | आप ब्राउज़िंग के दौरान इसके जितने भी विज्ञापन देखते है उसका 20 % इनकम यूजर को देता है | इस एप्प को Download करने के लिए निचे क्लिक करे

Mcent Browser Download

 

जीतू राय का जीवन परिचय | Jitu Rai Shooter Biography In Hindi

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जीतू राय का जीवन परिचय | Jitu Rai Shooter Biography In Hindi

एक चरवाहे से भारत के सफलतम निशानेबाज तक का सफ़र 

दोस्तों आज हम बता रहे है  एक ऐसे शख्स के बारे में जिसका जन्म तो नेपाल में हुआ था लेकिन वो खुद को भारतीय मानता है | जो नेपाल के एक गाँव में बकरी चराने और अपनी माँ के साथ खेती का काम करते थे | लेकिन आज भारत के सफलतम निशानेबाज है | जी हम बात कर रहे है विश्वकप निशानेबाजी में स्वर्ण पदक दिलाने वाले खेल रत्न जीतू राय के बारे में | पढ़िए जीतू राय की बायोग्राफी ……………

जन्म 

जीतू राय का जन्म 26 अगस्त सन 1987 को नेपाल के संखुवासभा जिले  के एक छोटे से गांव  में हुआ था | जीतू का बचपन जंगलों और खेतों में बकरी चराते हुए बीता। परिवार का गुजर बसर खेती  से होता था | कुछ समय बाद जीतू के पिताजी को भारतीय सेना के गोरखा राइफल्स रेजिमेंट में नौकरी मिल गई और वह भारत आ गए | पर परिवार नेपाल में ही रहा।  5 भाई बहनों में जीतू चौथे नंबर पर आते थे  | इन पांच बच्चो की परवरिश की जिम्मेदारी अब की माँ पर थी |

खेतो में करते थे माँ की मदद 

उनकी माँ पढ़ी लिखी नहीं थी पर उनमे गजब का हौसला था | सुबह जल्दी उठती और खाना पकाकर बच्चो को स्कूल भेज देती | फिर खेतो में बुआई ,सिंचाई ,कटाई के कामो में लग जाती | हालाँकि स्कूल गाँव से बहुत दूर थे और पैदल आने जाने में गाँव के बच्चो को थकान हो जाती थी | फिर भी जीतू स्कूल से लौटने के बाद खेतो में माँ की मदद करते थे |

जीतू बताते है –

हम आलू और धान उगाते थे। वहां की जमीन इस फसल के लिए अच्छी थी। खेती में कड़ी मेहनत थी। बारिश हो या कड़ी धूप, मां खेतों में जुटी रहतीं। वह कभी नहीं थकतीं, क्योंकि वह जानती थीं कि उसी फसल से उनके बच्चों का पेट भरेगा। उन्होंने हम भाई-बहनों को हमेशा अनुशासन में जीना सिखाया।  

पढने का नहीं मिल पता था समय 

गाँव और स्कूल के बिच लम्बी दुरी और जंगली रास्ता होने के कारण जीतू को पढने के लिए बहुत कम समय मिला पता था |जीतू बताते है – मुझे बचपन में पढ़ने का समय नहीं मिलता था। किसी तरह दौड़ते-भागते स्कूल पहुंचता, वापस आता, तो मां कहतीं कि बकरी चराने जाओ। हम बासी भात खाकर गुजारा करते थे। वैसे यह कोई अजीब बात नहीं थी, बाकी गांव वाले भी ऐसी ही जिंदगी जीने को मजबूर थे।

पिता की मौत से परेशां हो गया परिवार 

पापा को देखकर जीतू के मन में भी सेना में भारती होने की लालसा जगी | लेकिन उसने यह बात घरवालो  को नहीं बतायी  | तभी अचानक 2016 में दुखद खबर आई की जीतू के पापा नहीं रहे | परिवार में कोहराम मच गया | तब जीतू  की उम्र 19 साल  की थी | जीतू ने तय किया की वो भी भारत जायेंगे और अपने पापा की तरह फ़ौज में भारती होंगे |यह बात सुनकर उनकी माँ परेशान हो उठी | वह अपने पति को गँवा चुकी थी और अब वो अपना बेटा  नहीं खोना चाहती थी | लेकिन जीतू माँ को समझाने में सफल रहे क्युकी परिवार की बेहतरी के लिए जीतू को सेना में जाना जरुरी था |

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जीतू बताते है –

पापा के निधन के बाद मैंने तय किया कि उनकी तरह मैं भी गोरखा रेजिमेंट में सेवा करूंगा। पर मन में आशंका भी थी कि पता नहीं, चयन होगा या नहीं। पहली ही कोशिश में चयन हो गया। मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात थी।

पढाई दोबारा की शुरू 

सेना में आने के बाद जीतू ने अपने फिटनेस पर ध्यान देना शुरू किया | जीतू ने दोबारा पढाई शुरू की और देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAVV) इंदौर मध्यप्रदेश से स्नातक की  परीक्षा पास की |  गोरखा रेजिमेंट में बतौर सिपाही भर्ती हुए और अपनी योग्यता के बूते जीतू नायब सूबेदार बन गए।

एशियाई गेम्स में जीता सवर्ण पदक 

जीतू ने वर्ष 2010 में पहली बार सेना की निशानेबाजी टीम में जगह बनायीं पर प्रदर्शन अच्छा नहीं होने के चलते उन्हें वापस यूनिट भेज दिया गया | लेकिन जीतू कहा हिम्मत हरने वाले थे ? उन्होंने जबरदस्त तैयारी की और उन्हें दोबारा 2011 में टीम की तरफ से खेलने का मौका मिला। हालाँकि   2011 के राष्ट्रीय खेलों में जीतू को उत्तर प्रदेश की तरफ से खेलने का भी मौका मिला  पर उन्हें असली सफलता  2014 के एशियाई खेलों में मिली | जीतू ने 50 मीटर मेंस पिस्टल  में देश को गोल्ड मेडल दिलाया। दक्षिण कोरिया के इन्चेओन (Incheon) में हुए “एशियाई गेम्स” में जीतू ने 50m पिस्टल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता | उन्होंने आदमियों की 10m एयर पिस्टल टीम स्पर्धा में कांस्य पदक भी जीता |

वर्ल्ड कप में 2 पदक जितने वाले पहले भारतीय बने 

2014 में म्युनिक (Munich) में हुए “ISSF वर्ल्ड कप” में इन्होंने 10m एयर पिस्टल स्पर्धा में रजत पदक जीता. इसके बाद मनिबोर में जीतू ने 50m पिस्टल स्पर्धा में रजत और 10m पिस्टल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीते |  इस तरह वर्ल्ड कप के 9 दिनों में इन्होंने 3 पदक जीते और भारत के लिए एक वर्ल्ड कप में 2 पदक जीतने वाले ये पहले खिलाड़ी बने |

माँ को नहीं था पता 

अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट के दौरान लंबा समय विदेश में गुजरने लगा और जीतू के जीत का सिलसिला चल पड़ा | इधर बेटा निशानेबाजी में व्यस्त था, उधर मां गांव में खेती-किसानी में।   गांव में रह रही मां को पता ही नहीं चला कि बेटा इतना मशहूर निशानेबाज बन गया है।  2015 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड देने की घोषणा हुई। जीतू मां को लेकर दिल्ली आए। मां ने पहली बार ऐसा भव्य समारोह देखा। जब बेटा राष्ट्रपति के हाथों अवॉर्ड लेने मंच पर पहुंचा, तो पूरा हॉल तालियों से गूंज गया। यह नजारा देखकर मां को बिश्वास ही नहीं हो रहा था की उनका बेटा  इतना तरक्की कर गया है |

जीतू कहते हैं-

मां आज भी गांव में रहती हैं। उन्हें बस इतना पता था कि मैं सेना में हूं। यह नहीं मालूम था कि मैं निशानेबाज हूं। गांव में टीवी न था। अखबार वह पढ़ नहीं सकतीं। मैंने सोचा था कि खूब नाम कमा लूंगा, तब मां को बताऊंगा। 

खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित 

सन 2016 के रियो ओलंपिक में जीतू राय ने 10m एयर पिस्तौल स्पर्धा में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया | वे फाइनल तक भी पहुंचे, किन्तु फाइनल में उनका प्रदर्शन ज्यादा अच्छा नही रहा और वे 8वें स्थान में पहुंच कर, बिना किसी पदक के वापस लौट गए | हाल में जीतू ने साथी निशानेबाज हिना सिन्धु  के साथ खेलते हुए आईएसएसएफ विश्व कप की दस मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में रूस को हराकर गोल्ड मेडल जीता।

जीतू कहते हैं-

मैं नेपाल में पैदा हुआ, पर अब भारत मेरा असली घर है। यहां मुझे निशानेबाजी सीखने का मौका मिला। यहां मैंने भरपूर प्यार और सम्मान कमाया। उन सभी लोगों का शुक्रिया, जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया, मेरी मदद की।

 

उसे मेरे तेज़ाब से झुलसे चेहरे से प्यार हो गया-Saroj Kumar Sahoo and Pramodini Roul Love Story

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दोस्तों आज हम बताने जा रहे है एक ऐसी लड़की के बारे में जिसे अनजान  शख्स के प्यार का इनकार के बदले तेजाब जैसी असहनीय दर्द को झेलना पड़ा | इस एसिड अटैक ने उसकी आँखों की रोशनी छीन ली ,नौ महीने आई सी यू ,और चार सालो तक बीएड पर रही | फिर भी इस बदसूरत चहरे पर एक शख्स को प्यार आया और उसने न सिर्फ उसकी सेवा की बल्कि उसे चलना फिरना सिखाया और उसकी आँखों की रौशनी भी वापस लायी | तो पढ़िए रानी और सरोज की यह सच्ची और प्रेरणादायक कहानी ……………

Saroj Kumar Sahoo and Pramodini Roul Love Story

रानी की शोख़ी और खिलखिलाहट से आस-पास का माहौल गूंज उठता था 

ये कहानी है ओडिशा के जगतसिंहपुर की रानी का जिसका असली नाम प्रमोदिनी राउल है | उसे डांस करने का बेहद शौक था | 14-15 साल की रानी किसी आम किशोरी की तरह अपने सपनों की दुनिया में जी रही थी की अचानक एक घटना ने उनके जीवन को बर्बाद करके रख दिया | उनको एक अनजान शख्स ने प्यार का इजहार किया जिसे रनि९ ने इंकार कर दिया | उसके बाद उस शख्स ने रानी को परेशान करना शुरू किया | वो रानी के घर भी फोन करके परेशान करने लगा | रानी ने उस पर उतना ध्यान नहीं दिया उन्हें लगा की वो हारकर तंग करना बंद कर देगा |लेकिन ऐसा नहीं हुआ |

जिसे कभी भी सोचा नहीं था 

और एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसे याद  करके रानी आज भी सिहर उठती है | एक दिन रानी और उसका कजन भाई सायकिल पर बैठकर स्कूल से वापस आ रहे थे तभी पीछे से आकर उनपर तेजाब फेंक दिया गया |

रानी बताती है –

पहले तो मुझे लगा की मुझ पर उबलता पानी फेंका गया है | मै जमीन पर गिर गयी ,तेजाब टपककर घास पर गिर रहा था और मैंने देखा की घास भी झुलसती जा रही है | मुझे भयंकर जलन हो रही थी और मेरे बालो से धुआं भी निकल रहा था |

रानी को हॉस्पिटल ले जाया गया जहाँ वो नौ महीने तक आई सी यू में रही | उस दौरान रानी ने जो तकलीफे सही उसे याद कर  रानी आज भी कांप उठती है |

Saroj Kumar Sahoo and Pramodini Roul Love Story

 

रानी बताती है –

”मुझे एक बड़े से बाथटब में बैठाया जाता था जो डेटॉल जैसी तीख़ी महक वाली तरल दवाइयों से भरा होता था. उसमें मेरी ड्रेसिंग होती थी यानी मेरी स्किन उधेड़ी जाती थी. मैं दर्द से बदहवास सी हो जाती थी|चार-पांच नर्सें मुझे पकड़कर रखती थीं और डॉक्टर मुझसे माफ़ी मांगते हुए ड्रेसिंग करते थे. वे कहते थे अगर अभी मैंने ये दर्द न झेला तो जी नहीं पाऊंगी ”

आँखों की रौशनी भी चली गयी 

रानी का वजन 60 किलो से घटकर 28 किलो हो गया | उनकी आँखों की रौशनी भी चली गयी और वो सही से चल भी नहीं पा रही थी | नौ महीने बाद पैसे की कमी और दूसरी परेशानियों की वजह से रानी को घर वापस आना पड़ा | चार साल तक बिस्टर पर पड़े रहने के कारन रानी के घाव सड गए और उससे पास आने लगा | जब घर में रहना मुश्किल हो गया तो फिर वापस रानी को अस्पताल में भर्ती कराया गया | यहाँ उनकी दोस्ती कुछ नर्सो से हो गयी |

रानी के लिए छोड़ी नौकरी 

लेकिन कहते है न की गम के बादल कभी न कभी छंटते जरुर है | रानी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ |एक दिन हॉस्पिटल की  नर्स रानी से मिलवाने एक शख्स को ले आई जिसका नाम था -सरोज साहू | सरोज को रानी से कुछ ऐसी हमदर्दी हुई कि उन्होंने दो महीने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी और रात-दिन उनकी देखभाल करने लगे |

रानी बताती हैं

”सरोज ने डॉक्टर से पूछा था कि मैं चलना कब शुरू करूंगी. डॉक्टरों का कहना था कि मैं एक साल से पहले संभव नहीं है | लेकिन सरोज ने खुद को चुनौती दी और कहा कि वो रानी को चार महीने में चलाकर दिखाएंगे. उनकी मेहनत रंग ला रही थी और दोस्ती भी |

सरोज ने कर दिखाया 

चार महीने के अन्दर रानी बिना किसी सहारा के चलने फिरने लगी | सरोज ने रानी से अपने दिल की बात बताई नहीं थी पर अपने परिवार में बता दिया था जिसकी वजह से सरोज के परिवार में तनाव का माहौल था | रानी यह सब जानकर दुखी हुयी और फैसला किया की ठीक हिने के बाद ओडिशा छोड़ दूंगी |

रानी बताती है –

”जब मैं ओडिशा छोड़कर आ रही थी तब सरोज खूब रोए थे और मैं भी. हालांकि तब भी इन्होंने नहीं कहा कि ये मुझसे प्यार करते हैं.”

‘स्टॉप एसिड अटैक’  संस्था ने किया  रानी से संपर्क

खुस्किस्मती से इस बीच ‘स्टॉप एसिड अटैक’ नाम की संस्था ने रानी से संपर्क किया | 2016 के अंत तक रानी आगरा आ चुकी थीं और शीरोज़ कैफ़े में काम कर रही थीं | आखिर 14 जनवरी को सरोज ने रानी को फ़ोन किया और अपने दिल की सारी  बात बता दी |

रानी बताती हैं-

”उनकी बात सुनकर मैं रो पड़ी. मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था कि कोई मुझसे प्यार कैसे कर सकता है. उन्हें मेरे तेज़ाब से झुलसे चेहरे से प्यार हो गया था | मैंने कहा था कि अगर मैं दोबारा देखने लगी तभी उनसे शादी करूंगी वरना नहीं. मैं नहीं जानती थी कि आगे क्या होगा लेकिन सरोज को भरोसा था कि मैं फिर देख सकूंगी”

आंख का हुआ सफल ऑपरेशन

जुलाई 2017 में रानी के आँखों का ऑपरेशन चेन्नई के एक अस्पताल में हुआ | ऑपरेशन सफल रहा और जहां रानी को कुछ धुंधली आकृतियां दिखाई देने लगी |उन्होंने बताया,”ऑपरेशन के बाद मैं पूरी तरह ख़ुश नहीं थी. मैंने सोचा था कि सबकुछ साफ दिखने लगेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. डॉक्टरों ने धीरे-धीरे सुधार होने का भरोसा दिलाया था लेकिन मुझे ज़्यादा उम्मीद नहीं थी.”

सब दिखने लगा साफ साफ 

ऑपरेशन के बाद वापस आगरा जाने के लिए रानी और सरोज प्लेन में बैठे | फ़्लाइट ने अभी टेकऑफ़ नहीं किया था की  अचानक रानी को रंग  दिखाई देने लगे और नज़र भी धीरे-धीरे साफ होने लगी |

Saroj Kumar Sahoo and Pramodini Roul Love Story

रानी  चहकते हुए बताती हैं-

”मैं उत्साह में भरकर सरोज की तरफ़ घूमी, जो मेरे बगल में ही बैठे थे. मैंने देखा कि वो पहले ही मुझे देख रहे थे. मैं ख़ुशी से चिल्लाई और उनके गले लग गई | एकदम फ़िल्मों जैसा सीन था. लोग आकर हमसे गले मिल रहे थे और बधाई दे रहे थे…”

नए साल में करेंगे सगाई 

फ़िलहाल रानी नोएडा में शीरोज़ के पुनर्वास केंद्र का काम संभाल रही हैं और सरोज ओडिशा में काम रहे हैं |अब उनके माता-पिता रानी को बहू बनाने के लिए तैयार हैं क्यूंकि अब उन्हें पता चल गया है की सरोज रानी के अलावा किसी और से शादी नहीं करेगा | सरोज और रानी दोनों नए साल में सगाई करने की सोच रहे हैं.

सरोज कहते हैं-

”मुझे रानी की आवाज़ बहुत पसंद है. वो किसी बच्ची जैसी मासूम है. मैं नहीं जानता कि मैं उससे इतना प्यार क्यों करता हूं.”

 

Note- Source & Image-BbcHindi