22.8 C
New York
Saturday, October 3, 2026
Home Blog Page 19

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है-द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

0

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

 

देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की 
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥

नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नये राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥

लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
तोड़ो बन्धन, रुके न चिन्तन
गति, जीवन का सत्य चिरन्तन
धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।

चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना
सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे
सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥

 

22 साल बाद भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाली वर्ल्ड चैम्पियन के मेहनत और लगन की प्रेरक कहानी

0

 

मणिपुर में जन्मीं सैखोम मिराबाई चानू ने अमेरिका के आनाहिम में हुई चैम्पियनशिप में  नया विश्व कीर्तिमान स्थापित करते हुए स्नैच में कुल 194 किलोग्राम- 85 किग्रा और क्लिन एण्ड जर्क में 109 किग्रा वजन उठा कर वर्ल्ड चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल किया। उन्होंने देश को इस स्पर्धा में दूसरी बार गोल्ड दिलवाया है।  पोडियम पर खड़े होकर तिरंगा देख कर चानू के आँखों में खुशी के आँसू आ गए थे। परंतु यह सब इतना आसान नहीं था। रियो अोलंपिक के अवसाद से उबरने और तीन प्रयासों में विफल होने के बाद उनके नाम के आगे DNF (Did Not Finish) लिखा जाना उनके सपनों का चकनाचूर हो जाने जैसा था।

बचपन आभाव में बिता 

मणिपुर के छोटे से गांव की चानू का बचपन अभाव में बीता। परिवार के लिए भरपेट खाना मिलना बड़ी बात थी। मेहनत-मजूदरी करके किसी तरह गुजारा चल रहा था। उन दिनों गांव में भारोत्तोलन चैंपियन कुंजरानी देवी की बड़ी चर्चा थी। दरअसल, कुंजरानी भी मणिपुर की ही हैं। साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली इस खिलाड़ी ने कई रिकॉर्ड बनाए। चानू उनके किस्से सुनते हुए बड़ी हुईं।

कुंजरानी के किस्से सुन सुनकर बड़ी हुयी 

एक बार पिता किसी काम से इंफाल गए। चानू उनके साथ थीं। वहां भारोत्तोलन प्रतियोगिता चल रही थी। मैदान में भार उठाती महिलाएं और चारों तरफ शोर मचाती भीड़। नजारा अद्भुत था। तभी एक महिला की ओर इशारा करते हुए पापा ने बताया, ये कुंजरानी हैं। चानू को खेल दिलचस्प लगा। बड़ी मासूमियत से पूछा, क्या मैं भी उनकी तरह वजन उठा सकती हूं? पापा हंस पड़े। नन्ही चानू के मन में लगातार यह सवाल उठता रहा कि एक औरत इतना वजन कैसे उठा सकती है? तब वह मात्र 13 साल की थीं। कक्षा पांच पास कर चुकी थीं। एक दिन पापा से बोलीं, मैं भी वजन उठाने वाले खेल में हिस्सा लेना चाहती हूं। पापा ने यह कहकर बात टाल दी कि इसके लिए काफी ट्र्रेंनग लेनी पड़ती है। चानू के मन में भारोत्तोलक बनने का सपना बस चुका था।

घर की आर्थिक स्थिति थी ख़राब 

पिता पढ़े-लिखे तो नहीं थे, पर खेल की अहमियत समझते थे। मणिपुर की तमाम लड़कियां खेल में नाम कमा चुकी थीं। इसलिए जब बेटी ने जिद पकड़ी, तो उन्होंने सोचा, चलो उसे मौका दिया जाए। गांव से 60 किमी दूरी पर एक ट्रेनिंग सेंटर था। वहीं 2007 में ट्र्रेंनग शुरू हुई। शुरुआत से ही प्रदर्शन अच्छा रहा। ट्र्रेंनग के पहले ही दिन उन्हें समझाया गया कि वजन उठाने के लिए व्यायाम और खान-पान पर ध्यान देना होगा। कोच ने उन्हें डाइट चार्ट दिया। फल-सब्जी के अलावा रोज दूध और चिकन खाना जरूरी था। डाइट चार्ट देखते ही होश उड़ गए। घर में चिकन पूरे साल में कभी-कभार ही बनने की नौबत आती थी। घर के हालात ऐसे नहीं थे कि यह सब खाने-पीने का खर्च उठाया जा सके। घर में बिना किसी से कुछ कहे चानू ट्र्रेंनग करती रहीं। रोजाना 60 किमी का सफर तय करके सेंटर पहुंचतीं। दो घंटे व्यायाम के बाद वजन उठाने का अभ्यास करतीं। शाम को लौटतीं, तो तेज भूख लगती। जो सबके लिए बनता, वही खाकर सो जातीं। पर्याप्त डाइट नहीं मिलने के कारण सेहत बिगड़ने लगी। चानू बताती हैं, हमारे पास इतने पैसे भी नहीं थे कि रोज एक गिलास दूध मिल सके। मैंने तय कर लिया था कि चाहे जो हो, खेल तो नहीं छोड़ूंगी।

घरवालो ने कहा खेल छोड़ दो 

एक दौर ऐसा भी आया, जब घरवालों ने कहा कि खेल छोड़ दो। पर चानू नहीं मानीं। डटी रहीं। ट्र्रेंनग के पहले ही वर्ष में स्थानीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का मौका मिल गया। तब तक सब मान चुके थे कि यह लड़की अच्छा खेलेगी। खेल के कारण पढ़ाई के लिए बहुत कम समय मिलता था। किसी तरह 10वीं पास किया। बड़ी कामयाबी मिली साल 2011 में, जब चानू ने दक्षिण एशियाई जूनियर खेल में गोल्ड मेडल जीता। अब पूरा देश उन्हें पहचानने लगा था। कुंजरानी देवी बनने का सपना हकीकत बन चुका था। खेल कोटे से रेलवे में नौकरी भी मिल गई। हालात बदलने लगे। 2013 में जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में सर्वश्रेष्ठ भारोत्तोलक का खिताब अपने नाम किया। मेडल जीतकर लौटीं, तो गांव में बड़ा जश्न हुआ।  जूनियर र्चैंपयनशिप के बाद बारी राष्ट्रमंडल खेलों की थी। नए कोच ने कहा कि मुकाबला कड़ा होगा, और मेहनत करो। 2014 में ब्रिटेन के ग्लासगो शहर में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में चानू ने सिल्वर मेडल जीता। इसके बाद तो हौसले और बुलंद हो गए।

चानू कहती हैं,

‘खिलाड़ी का जीवन अलग होता है। हमारे लिए हर खेल के बाद एक नई चुनौती आती है। हमारे काम के घंटे तय नहीं होते। हर मैच के बाद और ज्यादा मेहनत करनी होती है।’

 

साल 2016 करियर का सबसे बड़ा लक्ष्य लेकर आया। बारी थी रियो ओलंपिक की। वह मौका गंवाना नहीं चाहती थीं। कई महीने घर से दूर रहीं। पूरी शिद्दत से तैयारी की। परंतु उतने बड़े मंच पर वे अवाक रह गई और दो प्रतिभागीयों, जिन्होंने बारबेल से तीन क्लिन एण्ड जर्क प्रयास को भी पूरा न कर पायी उनमें से एक मिराबाई चानू थी। चानू बताती हैं, ओलंपिक में जाना मेरा सपना था। मैंने क्वालिफाई भी कर लिया, पर मेडल नहीं जीत पाई। इससे बड़ी मायूसी हुई।

“वह इतनी अवसादग्रस्त हो गई थी कि हमलोंगो के लिए उसे नियंत्रित कर पाना कठिन था। हमलोग लगभग 2 सालों से तैयारी कर रहे थे और मेडल की आशा कर रहे थे। रियो से लौटकर वह पाँच दिनों के लिए घर गई फिर पटियाला (नेशनल ट्रेनिंग सेंटर) आ गई और फिर 14 महिनों तक वह घर वापस नहीं गई” ,शर्मा ने बताया।

निराशाजनक प्रदर्शन पर उठे सवाल 

रियो में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद सवाल भी उठे। कुछ लोगों ने कहा कि तैयारी ठीक से नहीं की थी। चानू ने लोगों को जवाब देने की बजाय चूक तलाशने पर ध्यान केंद्रित किया, ताकि अगले लक्ष्य के लिए बेहतर तैयारी की जा सके।

“ओलंपिक एक दुर्भाग्य था, उसके बाद मैं कई हफ्तों तक न ठीक से खाना खा पाती या फिर सो पाती। यहाँ तक की आज भी उन दिनों को सोचकर मैं अवसादित हो जाती हूँ।” आनाहिम से एक साक्षात्कार में बात करते हुए उन्होंने कहा, “सौभाग्यवश, मेरे उस बुरे पल के वक्त देशवासी सो रहे थे।” और बुधवार की रात उनके बेहतरीन प्रदर्शन के वक्त भी जनता नींद में थी।

 

वो मेरे ख़ुशी के आंसू थे 

ओलंपिक के बाद एक साल तक कोच विजय शर्मा के नेतृत्व में ट्रेनिंग ली। पिछले सप्ताह ही विश्व चैंपियनशिप में 194 किलोग्राम वजन उठाकर चानू ने गोल्ड मेडल अपने नाम किया है। गर्व से भरे उस क्षण का नजारा पूरे देश ने देखा। वह नजारा, जब चानू अमेरिका के ऐनाहिम शहर में तिरंगा ओढ़कर पोडियम पर खड़ी थीं और उनकी आंखों से अनवरत आंसू बह रहे थे। चानू बड़ी विनम्रता से कहती हैं- देश के लिए  मेडल जीतना गर्व की बात होती है। वे तो मेरी खुशी के आंसू थे।

जानिए अपने SBI Account CIF Number कैसे Check करें?

0

क्या आपको अपने SBI Account का  CIF Number पता है |

बहुत बार हमको अपने बैंक के CIF नंबर की जरुरत होती है लेकिन बहुत सारे  लोगो को अपने बैंक के CIF नंबर के बारे में जानकारी ही नहीं होती है तो चलिए आज हम इस पोस्ट में आपको  State Bank of India बैंक अकाउंट का CIF ढूँढने के 4 आसान तरीके बताएँगे।

बैंक सीआईएफ संख्या क्या है? What is Bank CIF Number in hindi?

CIF (Customer Information File) एक बहुत महत्वपूर्ण संख्या होता है जिसकी मदद से किसी बैंक खाते को Track किया जाता है या ढूँढा जाता है। अगर हम साधारण भाषा में समझे तो Bank CIF Number में ही किसी भी Customer की पूरी जानकारी को Save करके रखा जाता है। इन सभी जानकारी की मदद से बैंक के कर्मचारी किसी व्यक्ति के अकाउंट के सभी Transaction और काम को पूरा करते हैं। कभी-कभी एक Branch से दुसरे Branch में अपने बैंक अकाउंट को Transfer करते समय भी CIF नंबर की आवश्यकता पड़ती है।

अपने बैंक अकाउंट का SBI Account CIF Number ढूँढने के 4 आसान तरीके

1  बैंक पासबुक Bank passbook

पहला और सबसे आसान तरिका है आपके भारतीय स्टेट बैंक का पासबुक । उसके पहले पेज पर आपको Bank A/C नंबर के ऊपर आपको CIF Number लिखा हुआ मिल जायेगा।

 

2. SBI Anywhere App की मदद से

  • सबसे पहले अपने SBI Anywhere Android या iOS के App पर Login करें। आप अपने SBI Internet banking के Username और Password की मदद से इस App में Login कर सकते हैं।
  • Login करने के बाद आपको Services लिखा हुआ Tab मिलेगा उस पर Click करें।
  • उसके बाद आपको एक नया Page दिखेगा वहां Online Nomination पर Click करें।
  • अगले Page पर अपना Bank Account नंबर चुने जिसका आप CIF नंबरजानना चाहते हैं उसके बाद नीचे आपको उसका CIF Number दिख जायेगा।

3. भारतीय स्टेट बैंक इन्टरनेट बैंकिंग SBI Internet Banking

अगर आपके पास एक Active SBI Internet Banking अकाउंट है तो आप इस तरीके की मदद से अपने SBI बैंक अकाउंट का CIF नंबर ढूंढ सकते हैं।

  • सबसे पहले SBI के Online banking के Website पर जाकर Login करें : https://retail.onlinesbi.com/retail/login.htm
  • Login करने के बाद अपने Bank Account नंबर के नीचे लिखे हुए View Nomination and PAN Details पर Click करें। अगले Page पर आपको SBI Account Number के साथ CIF नंबर लिखा हुआ मिल जायेगा।

 

4. इ-स्टेटमेंट E-Statement

आप चाहें तो अपने Internet Banking के माध्यम से अपने बैंक खाते का इ-स्टेटमेंट डाउनलोड कर सकते हैं उसमें भी आपको आपके बैंक अकाउंट का CIF नंबर लिखा हुआ मिल जायेगा।

  • सबसे पहले अपने SBI Netbanking Account में Login करें। Login होने के बाद बाई तरफ के Menu पर Account statement पर Click करें।
  • उसके बाद अगले Page पर अपने उस Bank account को चुनें जिसका आप CIF Number देखना चाहते हैं। फिर आप जितने भी महीने का Statement चाहते हैं चुन लें। उसके बाद साल और महिना Select करें और View पर Tick करके Go पर क्लिक करें।
  • अगले Page पर आपको उस अकाउंट के उस निर्धारित किये हुए समय का Statement और Account से जुडी जानकारी प्राप्त होगी जहाँ पर CIF Number भी लिखा हुआ आपको दिख जायेगा।

जानिये मंदिर की परिक्रमा करने के पीछे का वैज्ञानिक कारण

1

दुनिया में रोज लाखो करोड़ो लोग मंदिर जाते है और पूजा अर्चना करते है |  मंदिर के अन्दर लोग नंगे पैर ही जाते है और पूजा करते समय देवी देवताओ की परिक्रमा करते है | मंदिर में लगे घंटे को बजाते है और कपूर अगरबती जलाकर फुल पत्ती देवताओ को अर्पण करते है | लेकिन हम ऐसा क्यों करते है क्या आपको पता है | बहुत सारे लोग प्राचीन समय से चली आ रही  परंपरा को बस निभाते जाते है | उसके पीछे का कारण बहुत सारे लोगो को नहीं पता है | प्राचीन समय में हर एक चीज के पीछे कुछ न कुछ वैज्ञानिक कारण जरुर रहता था | तो चलिए हम आपको बताते है ये कारण —–

 

मंदिर का निर्माण

प्राचीन समय में मंदिर से जुड़ी प्रत्येक चीजो के पीछे कुछ न कुछ  कारण होता था. मंदिर की स्थापना से लेकर उसकी संचरना तक, सारी चीज़ों के पीछे वैज्ञानिकों का दिमाग़ होता था | मंदिर के निर्माण के लिए हमेशा ऐसा जगह चुना जाता था जहाँ से अधिक से अधिक सकारात्मक उर्जा मिल सके | एक ऐसा स्थान जहाँ उत्तरी ओर से सकारात्मक रूप से चुम्बकीय और विद्युत् तरंगो का प्रवाह हो | अक्सर ऐसे ही स्थानों पर मंदिर का निर्माण करवाया जाता था , ताकि लोगो के शरीर में अधिकतम सकारात्मक उर्जा मिल सके | पर आजकल के मंदिरों के निर्माण में ये सारी बाते बहुत कम ध्यान में राखी जाती है |

 

मंदिर के शिखर पर कलश का वैज्ञानिक कारण 

मंदिर का कलश पिरामिड की आकृति का होता है, जो ब्रम्हांडीय ऊर्जा तरंगों को अवशोषित करके नीचे बैठने वालों को लाभ पहुंचाता है | .और मंदिर में भगवान की मूर्ति को उसके निचे यानि गर्भ गृह के बिलकुल बिच में रखा जाता है ताकि कोई भी भगवान का दर्शन करे तो उसके शरीर को अधिक से अधिक उर्जा प्राप्त हो सके | बहुत सारे  संत लोग अपने शारीर पर बहुत कम वस्त्र धारण किये हुए रहते थे ताकि उनको अधिक से अधिक सकारात्मक उर्जा मिल सके | मंदिर को तीन तरफ़ से बंद रखने का सबसे बड़ा कारण है कि इससे ऊर्जा का असर ज़्यादा बढ़ता है.

मंदिर के अन्दर नंगे पैर प्रवेश करने का वैज्ञानिक कारण

क्या आपने कभी सोचा है की हम मंदिर में नंगे पैर ही क्यों प्रवेश करते है | बहुत सरे लोग तर्क देते है की मंदिर पवित्र जगह है गन्दा नहीं हो इसलिए | लेकिन इसके पीछे भी वैज्ञानिक कारण है | दरअसल प्राचीन समय में मंदिर के फर्शो का निर्माण इस प्रकार कराया जाता था की इससे इलेक्ट्रिक और मैग्नेटिक तरंगे उत्पन्न हो सके | जिससे जब भी कोई नंगे पैर फर्श पर चले तो उसके पैरो के माध्यम से अधिकतम उर्जा उसके शारीर में प्रवेश कर सके | मंदिरों में साफ़-सफ़ाई का ध्यान भी इसलिए रखा जाता है कि गंदगी के माध्यम से नकारात्मक उर्जा मंदिर के अंदर प्रवेश न हो सके|

मंदिर के प्रवेश द्वार पर घंटा टांगने का  वैज्ञानिक कारण

जब भी हम मंदिर में प्रवेश करते है मंदिर के प्रवेश द्वार पर घंटा  टंगा रहता है जिसे हर कोई बजाकर ही अन्दर जाता है | बहुत सारे लोगो को इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण नहीं मालूम है | दरअसल घंटा को बजाने से इससे निकलने वाली आवाज और तरंगे हमारी सतो इन्द्रियों को जागृत कर देता है | जिससे व्यक्ति की सारी समस्याए ख़त्म हो जाती है |

मंदिर में धुप अगरबत्ती जलाने का वैज्ञानिक कारण

मंदिर में लोग पूजा करते समय धुप अगरबत्ती और कपूर जलाते है | इससे वातावरण हमेशा सुगन्धित रहता है और वातावरण में उपस्थित बक्टेरिया और वायरस मर जाते है | आपने देखा होगा की मंदिर में मिलने वाले चरणामृत  में तुलसी के पत्ते मिले रहते है और मंदिर का चैम्बर हमेशा कपूर की सुगंध से महकता रहता है | ऐसा माना जाता है की ये दोनों चीजे सर्दी खांसी जैसी बिमारियों से लड़ने में सहायक होती है |

दीपक के ऊपर हाथ घुमाने का वैज्ञानिक कारण 

आरती के बाद सभी लोग दिए पर या कपूर के ऊपर हाथ रखते हैं और उसके बाद सिर से लगाते हैं और आंखों पर स्पर्श करते हैं। ऐसा करने से हल्के गर्म हाथों से दृष्टि इंद्री सक्रिय हो जाती है और बेहतर महसूस होता है।मंदिर में माथे पर लगने वाला कुमकुम का टिका मानव शारीर में उर्जा और एकाग्रता के स्तर को बनाये रखता है |

मंदिर का परिक्रमा करने  के पीछे धार्मिक कारण 

लगभग हर मंदिर में भगवान की पूजा और दर्शन करने के बाद परिक्रमा करने का नियम होता है | शास्त्र में बताया गया है भगवान की परिक्रमा से अक्षय पुण्य मिलता है और पाप नष्ट होते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार जब गणेश और कार्तिक के बीच संसार का चक्कर लगाने की प्रतिस्पर्धा चल रही थी तब गणेश जी ने अपनी चतुराई से पिता शिव और माता पार्वती के तीन चक्कर लगाए थे। इसी वजह से लोग भी पूजा के बाद संसार के निर्माता के चक्कर लगाते हैं। उनके अनुसार ऐसा करने से धन-समृद्धि होती हैं और जीवन में खुशियां बनी रहती हैं।

मंदिर का परिक्रमा करने का वैज्ञानिक कारण 

इस परंपरा के पीछे धार्मिक महत्व के साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी है। जिन मंदिरों में पूरे विधि-विधान के साथ देवी-देवताओं की मूर्ति स्थापित की जाती है, वहां मूर्ति के आसपास दिव्य शक्ति हमेशा सक्रिय रहती है। वैज्ञानिक भी मानते है की एक धार्मिक स्थल अपने भीतर कुछ ऊर्जा से लैस रहती है  है, यह ऊर्जा मंत्रों एवं धार्मिक उपदेशों के उच्चारण से उत्पन्न होती है। मूर्ति की परिक्रमा करने से वो उर्जा हमें मिलती है । इस ऊर्जा से मन शांत होता है। जिस दिशा में घड़ी की सुई घुमती है, उसी दिशा में परिक्रमा करनी चाहिए।

परिक्रमा करते समय ध्यान रखनी चाहिए ये बातें 

जिस देवी-देवता की परिक्रमा की जा रही है, उनके मंत्रों का जप करना चाहिए। भगवान की परिक्रमा करते समय मन में बुराई, क्रोध, तनाव जैसे भाव नहीं होना चाहिए। परिक्रमा नंगे पैर ही करना चाहिए। परिक्रमा करते समय बातें नहीं करना चाहिए। शांत मन से परिक्रमा करें। परिक्रमा करते समय तुलसी, रुद्राक्ष आदि की माला पहनेंगे तो बहुत शुभ रहता है।

जानिए हिंदी नहीं है भारत की राष्ट्रभाषा फिर भी अधिकतर सरकारी काम हिंदी में क्यों होते है

0

हिंदी भाषा, भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है | विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी का चौथा स्थान है | देश के 77% लोग हिन्दी बोलते और समझते हैं. 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में 5 सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी, बंगाली, तेलुगु, मराठी, तमिल भाषाएँ हैं |

हिंदी नहीं है भारत की राष्ट्रभाषा 

हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा (NATIONAL LANGUAGE) नहीं है ,किन्तु फिर भी हम देखते है की भारत के बहुत सारे  कार्यालयों में हिंदी में काम होता है | भारत सरकार द्वारा जारी  किसी भी प्रकार के डॉक्यूमेंट में हिंदी भाषा में अवश्य लिखी रहती है | जैसे पासपोर्ट भी अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी में जरुर लिखा रहता है | दरअसल इसके पीछे कारण यह है की हिंदी भले ही राष्ट्र भाषा नहीं हो पर वह भारत की ऑफिसियल (अधिकारिक )  भाषा है  |भारतीय संविधान (Indian Constitution)  में 14 September, 1949 को हिन्दी की देवनागरी लिपि को अधिकारिक तौर पर मान्यता प्रदान की गई है। इसलिए 14 सितम्बर को हर साल “हिन्दी दिवस” भी मनाया जाता है। इसलिए भारत सरकारमें ही होते है | अंग्रेजी भारत की दूसरी ऑफिसियल भाषा है |

बिहार ने सबको पीछे छोड़ा

भले ही हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा नहीं हो पर भारत के प्रत्येक राज्य को अपनी अधिकारिक भाषा चुनने का अधिकार है | इस तरह प्रत्येक राज्य की अधिकारिक भाषा अलग अलग अलग है जिसके कारण राज्य द्वारा निर्गत डॉक्यूमेंट की भी भाषा अलग अलग होती है | जैसे तमिलनाडु का राशनकार्ड हिंदी में नहीं बल्कि  तमिल और इंग्लिश में लिखा होता है |  हिन्दी अपनाने के मामले में बिहार ने पूरे भारत को पीछे छोड़ दिया था जब वर्ष 1881 में बिहार ने उर्दू को छोड़ हिन्दी को अपनी एकमात्र राज भाषा बना लिया था। और ऐसा करने वाला भारत का पहला राज्य था।

OFFICIAL LANGAUGE और NATIONAL LANGUAGE में अंतर

इस तरह राष्ट्रभाषा (NATIONAL LANGUAGE) वो भाषा होती है जिसका उपयोग राष्ट्र में हर जगह होता है जबकि  अधिकारिक भाषा (OFFICIAL LANGAUGE) वो भाषा होती है जिसका उपयोग सरकारी कार्यालयों में होता है | यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही है की इतने बड़े देश की कोई भी राष्ट्रभाषा नहीं है |हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए लम्बे समय से debate चल रही है, लेकिन इस पर अभी तक मुहर नहीं लगी है।

इंटरनेट पर हिंदी कंटेंट की भारी मांग

हिंदी दुनिया में सबसे तेजी से लोकप्रिय हो रही भाषा है और इंटरनेट पर भी इसकी मांग पिछले कुछ सालों में अंग्रेजी की तुलना में 5 गुना तेजी से बढ़ी है. गूगल ने कहा है कि इंटरनेट पर हिंदी कंटेंट की मांग अब बढ़ना शुरू हो गई है. यह साल-दर-साल English कंटेंट के 19 प्रतिशत वृद्धि के मुकाबले 94 प्रतिशत बढ़ती जा रही है . कम्प्यूटर के विकास के आरम्भिक काल में अंग्रेजी को छोड़कर विश्व की अन्य भाषाओं का प्रयोग बहुत कम किया जाता था. जिससे कारण सामान्य लोगों में यह गलत धारणा फैल गयी कि कम्प्यूटर अंग्रेजी के सिवा किसी दूसरी भाषा में काम ही नही कर सकता. किन्तु यूनिकोड के पदार्पण के बाद स्थिति बहुत तेजी से बदल गयी . हिंदी भारत की उन 7 भाषाओं में से एक भाषा है जिसका इस्तेमाल Web addresses (URLs) बनाने के लिए किया जाता है.

176 विश्वविद्यालयों में हिन्दी की पढ़ाई

आज भी संयुक्त राज्य अमेरिका (US) के 45 विश्वविद्यालय सहित पूरी दुनिया के लगभग  176 विश्वविद्यालयों में हिन्दी की पढ़ाई जारी है.भारत के बाहर, हिन्दी बोलने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका में 648,983, मॉरीशस में 685,170, दक्षिण अफ्रीका में 890,292, यमन में 232,760, युगांडा में 147,000, सिंगापुर में 5,000, नेपाल में करीब 8 लाख, न्यूजीलैंड में 20,000, जर्मनी में 30,000 हैं.  20 से ज्यादा देशों में हिंदी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है.

जानिए नदी में सिक्का फेंकने के पीछे का वैज्ञानिक कारण

0

आपने नदियों के ऊपर से गुजरते हुए बस या ट्रैन या अन्य वाहनों में सवार लोगों को नदियों में सिक्के फैंकते हुए कई बार देखा होगा। लेकिन सिक्के फैकने वाले इन लोगों से कभी पूछा है कि वह ऐसा  क्यों करते हैं ?

बहुत से लोग नदी में सिक्का डालते है ताकि उनकी मनोकामना पूरी हो जाये या जब कभी हम  कहीं मंदिर या पवित्र सरोवर जाते है तो हम देखते है की लोग वहां कोई भी नदी होती है तो उसमे सिक्के डालते है ताकि उनकी जो भी इच्छा है वो पूरी हो जाये। लेकिन आपको पता है इसके पीछे असल लॉजिक क्या है…तो चलिए आज हम आपको बताते है की इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है |

प्राचीनकाल से है चलन में

माना जाता है कि यह परम्परा जब भगवान राम चौदह वर्ष का वनवास काट कर लौटे थे। जब सीता मां ने सरयू नदी में स्वर्ण मुद्राए अर्पित की थी। तभी से प्रथा चली आ रही है। नदियों में सिक्के डालने का प्रचलन मुगलकाल में भी शुरू होने के प्रमाण मिले है। मुगलकाल में एक बार नदियों का पानी इस कदर दूषित हो गया था कि स्नान मात्र से ही तमाम बीमारियाँ घेर लेती थी। जहरीले हो चुके पानी को शुद्ध करने के लिए मुगल शासकों ने जनता से नदियों, तालाब, जलाशयों में तांबे ,चाँदी के सिक्के डालने का हुक्म दिया था। ताकि धातुओ के मिश्रण से नदियों का पानी शुद्ध हो जाए।

जल को शुद्ध करने की अद्भुत क्षमता

दरअसल ये परम्परा बहुत पुरानी  है , उस समय  तांबे के सिक्के हुआ करते थे। तांबा को शुद्घ धातु माना जाता है |  इसलिए इनका इस्तेमाल पूजा-पाठ में किया जाता है। तांबा सूर्य का धातु माना जाता है और यह हमारे शरीर के लिए भी आवश्यक तत्व है। वैज्ञानिक भी यह बात मानते है की ताम्बे में पानी को शुद्ध करने की अद्भुत क्षमता होती है |  प्राचीन समय में लोग तांबे का सिक्का पानी में फेंककर सूर्य देव और अपने पितरों को यह बताते थे  कि हे देव और हे पितर हमने जल के माध्यम से अपने शरीर की रक्षा योग्य तांबा ग्रहण कर लिया है। हमें यह आपके माध्यम से प्राप्त हुआ है इसलिए आभार स्वरुप आप भी जल के माध्यम से तांबा ग्रहण करें। इसलिए तभी से नदी या प्राचीन मंदिरों में बने जलाशय में सिक्का डालने का प्रचालन है |

लाल किताब में भी इसका जिक्र

लाल किताब में भी सूर्य और पितरों को प्रसन्न करने के लिए तांबे को बहते जल में प्रवाहित करने का विधान बताया गया है। हालांकि अब तांबे के सिक्के नहीं होते हैं। स्टेनलेस स्टील के सिक्कों को उसी परंपरा के तौर पर अब लोग में पानी में फेंकते हैं। जबकि वैज्ञानिक दृष्टि यह कहती है कि,जल में तांबे के सिक्के डालने से जल शुद्ध होता है और उस जल को पीने से अनेक बीमारियों का नाश स्वतः ही हो जाता है | स्टील के बने सिक्के में पानी को शुद्ध करने का कोई गुण मौजूद नहीं होता है | पहले के बहुत सारे  लोग इसलिए ताम्बे के बर्तन में पानी पीते थे ताकि जल भी शुद्ध हो जाये और उनके शारीर के लिए आवश्यक तम्बा भी मिल जाये | तांबायुक्त पानी शरीर के विषैले तत्व को बाहर निकलता है।त्वचा चमकीली व स्वस्थ रहती है। इसमें एंटी आक्सीडेटस होते है। जो कि कैंसर से लड़ने मे सहायक होते है।

वर्तमान के सिक्के को डालने पर कैसर का खतरा 

वर्तमान सिक्के में 83 प्रतिशत लोहा और 17 प्रतिशत क्रोमियम होता है। क्रोमियम एक जहरीली धातु है। क्रोमियम दो अवस्था में पाया जाता है, एक सीआर (3) और दूसरा सीआर (4). पहली अवस्था जहरीली नहीं मानी गयी है, बल्कि क्रोमियम (4) की दूसरी अवस्था 0.05% प्रति लीटर से ज्यादा जहरीली है, जो सीधे तौर पर कैंसर जैसी असाध्य बीमारी को जन्म देती है। दरअसल हम आस्था अंध विश्वास के नाम पर  नदियों में आज के आधुनिक सिक्के डालकर न केवल उसे प्रदूषित कर रहे है बल्कि जाने अनजाने में कैंसर को बुलावा दे रहे है।

पीएफ बैलेंस कैसे चेक करें? How to Check PF Balance

0

क्या है PF

PF यानि प्रॉविडेंड फंड एक प्रकार का रिटायरमेंट फंड है। यह रिटायरमेंट के बाद जरूरतों को पूरा करने के लिए होता है। एक तरह से इसे सोशल सिक्‍युरिटी कवर भी कहते हैं। कर्मचारी भविष्‍य निधि संगठन संगठित क्ष्‍ेात्र में काम करने वाले कर्मचारियों को इम्‍पलाइज प्रॉविडेंट फंड एक्‍ट, 1952 के तहत प्रॉविडेंट फंड की सुविधा मुहैया कराता है। अगर किसी कंपनी या संस्‍थान में 20 या इससे अधिक कर्मचारी काम कर रहे हैं तो ईपीएफ एक्‍ट के तहत कंपनी को कर्मचारियों को पीएफ बेनेफिट देना होगा।

मंथली पीएफ कंट्रीब्‍यूशन 

ईपीएफ एक्‍ट के तहत कर्मचारी की बेसिक सैलरी प्‍लस डीए का 12 फीसदी पीएफ अकाउंट में जाता है। वहीं कंपनी भी कर्मचारी की बेसिक सैलरी प्‍लस डीए का 12 फीसदी कंट्रीब्‍यूट करती है। कंपनी के 12 फीसदी कंट्रीब्‍यूशन में से 3.67 फीसदी कर्मचारी के पीएफ अकाउंट में जाता है। बाकी 8.33 फीसदी कर्मचारी इम्‍पलाइज पेंशन स्‍क्‍ीम में जाता है।

पीएफ के फायदे 

पीएफ रिटायरमेंट फंड है। लेकिन आप जरूरत पड़ने पर घर खरीदने, बच्‍चो की शिक्षा, इलाज के लिए और पीएफ का कुछ हिस्‍सा निकाल सकते हैं। इस तरह से आप जरूरत पड़ने पर पीएफ से पैसों का इंतजाम भी कर सकते हैं।

60 दिन से अधिक समय तक बेरोजगार रहने पर निकाल सकते हैं पूरा पीएफ 

अगर किसी कर्मचारी की नौकरी चली जाती है और वह 60 दिन से अधिक समय तक बेरोजगार रहता है तो वह अपने पीएफ का पूरा पैसा निकालने के लिए आवेदन कर सकता है। ऐसे केस में ईपीएफओ उसके पीएफ क्‍लेम का सेटलमेंट कर देगा। नौकरी में रहते हुए कर्मचारी अपने पीएफ का पूरा पैसा नहीं निकाल सकता है।

58 साल की उम्र में मिलेगा पीएफ का पैसा 

कर्मचारी जब 58 साल की उम्र में रिटायर होता है तब उसके पीएफ का पूरा पैसा मिल जाता है।

अब PF के बैलेंस की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध 

अब इम्‍प्‍लॉइज प्रोविडेंट फंड (EPFO) ने मेंबर इम्‍प्‍लॉई के लिए पीएफ डिडक्‍शन और बैलेंस जानने की पेपरलेस सुविधा शुरू कर दी है। अब आपको अपने PF डिडक्‍शन जानने के लिए सैलरी स्लिप का इन्‍तजार करने की जरूरत नहीं है।अब आप ऑनलाइन  मोबाइल या कम्‍प्‍यूटर के जरिए आप तुरंत PF बैलेंस जान सकते हैं। इसके लिए मेंबर इम्‍पलॉई का UAN यानी यूनिवर्सल अकाउंट नंबर इम्‍पलॉयर द्वारा जनरेट होना जरूरी है। साथ ही आपके UAN का बैंक अकाउंट, पैन और आधार से लिंक होना भी जरूरी है। यहां हम आपको बता रहे हैं ऐसे 4 तरीके जिनसे आप मिनटों में अपना पीएफ बैलेंस जान सकते हैं।

EPFO पोर्टल पर जाकर

– अगर आपका अकाउंट UANसे लिंक है तो आप EPFO पोर्टल पर अपनी PF पासबुक देख सकते हैं।

– ऑनलाइन PF बैलेंस जानने के लिए आपको सबसे पहले www.epfindia.gov.in पर जाना होगा।

– उसके बाद ‘Our Services’ कॉलम में ‘For Employees‘ पर क्लिक करना होगा।

– इसके बाद जो पेज खुलेगा उसमें मेंबर पासबुक पर क्लिक करना होगा।

 

– अब नए खुले पेज पर आपको आपको अपना UAN और पासवर्ड डालना होगा।

-इसके बाद आपका पासबुक उम्बेर दिखेगा उस पर क्लिक कीजियेगा तो आपका पासबुक पीडीऍफ़ में डाउनलोड होने लगेगा | इस पीडीऍफ़ में आपके PF से सम्बंधित साडी जानकारी उपलब्ध होगी |

EPFO ऐप

– आप अपने फोन में EPFO का m-epf ऐप डाउनलोड करके भी PF बैलेंस जान सकते हैं।
– ऐप में मेंबर पर और उसके बाद बैलेंस/पासबुक पर क्लिक करें।
– उसके बाद अपना UAN व रजिस्‍टर्ड मोबाइल नंबर डालें।
– इसके बाद आपका पीएफ बैलेंस शो होने लगेगा।

मिस्‍ड कॉल देकर

– आप केवल एक मिस्‍ड कॉल देकर भी PF बैलेंस जान सकते हैं।
– इसके लिए आपको 011-22901406 पर मिस्‍ड कॉल करनी होगी।
– इसके बाद आपको मैसेज के जरिए PF बैलेंस की जानकारी मिल जाएगी।

मैसेज के जरिए

– आप मैसेज भेजकर भी PF बैलेंस जान सकते हैं।
– साथ ही आपको अपने लेटेस्‍ट PF कॉन्‍ट्रीब्‍यूशन की भी जानकारी मिल जाएगी।
– मैसेज के जरिए PF बैलेंस जानने के लिए आपका मोबाइल नंबर EPFO पर रजिस्‍टर्ड होना चाहिए।
– इसके लिए आपको 7738299899 पर मैसेज भेजना होगा।
– मैसेज में आपको EPFOHO UAN ENG लिखना होगा। यहां ENG का मतलब भाषा से है, जिसमें आप बैलेंस जानना चाहते हैं। अगर आपको किसी दूसरी भाषा में पीएफ बैलेंस जानना है तो आपको दूसरी भाषा डालनी होगी।
– मैसेज के जरिए आप यह जानकारी 10 भाषाओं हिन्‍दी, अंग्रेजी, पंजाबी, गुजराती, मराठी, कन्‍नड़, तेलुगु, तमिल, मलयालम और बंगाली में पा सकते हैं।
– इसके अलावा यहां UAN का मतलब अंग्रेजी में UAN लिखने से ही है। आपको UAN नंबर नहीं डालना है।

गुनाहों का देवता 1 (उपन्यास) – धर्मवीर भारती

0

गुनाहों  के  देवता – धर्मवीर भारती

हिंदी साहित्य की लोकप्रिय किताबो की चर्चा की जाये तो धर्मवीर भारती का उपन्यास गुनाहों के देवता शीर्ष दस पुस्तकों मे माना  जाता है | भारत के विभिन्न भाषाओ में इसके करीब सौ संस्करण प्रकाशित हो चुके है | सच बात तो ये है कि इस उपन्यास में एक अजब सा नशा है. आप जितना भी चाहें, एक बार उठाने के बाद इसे रख न सकेंगे. न तो ये कोई थ्रिलर है और ना ही कोई रोमांचक कथा. ये एक साधारण सी पवित्र प्रेम कहानी है – चंदर और सुधा की.. उनके प्यार, उनके बलिदान की… और तो और, यह महज एक काल्पनिक कथा नहीं, बल्कि इलाहबाद युनिवेर्सिटी के एक रिसर्च स्कॉलर की वास्तविक कहानी है!

एक तरफ चंदर, दूसरी ओर सुधा! उन दोनों के अद्वितीय रिश्ते को श्री भारती जी ने इस बखूबी से दर्शाया है, कि आपको मालूम पड़ेगा कि जैसे ये पात्र आपके चारों ओर मंडरा रहे हों! उन के मन कि उलझनें, अपने मन कि उलझनें लगने लगती हैं! उनके सुख, दुःख, उनकी कठिनायों को हम अपना बना बैठते हैं! और इस कहानी के अंत तक हम में एक छोटी सी झीनी सी आस रहती है कि काश! काश! ऐसा न होता!

गुनाहों  के  देवता  भाग 1 

अगर पुराने जमाने की नगर-देवता की और ग्राम-देवता की कल्पनाएँ आज भी मान्य होतीं तो मैं कहता कि इलाहाबाद का नगर-देवता जरूर कोई रोमैण्टिक कलाकार है। ऐसा लगता है कि इस शहर की बनावट, गठन, जिंदगी और रहन-सहन में कोई बँधे-बँधाये नियम नहीं, कहीं कोई कसाव नहीं, हर जगह एक स्वच्छन्द खुलाव, एक बिखरी हुई-सी अनियमितता। बनारस की गलियों से भी पतली गलियाँ और लखनऊ की सडक़ों से चौड़ी सडक़ें। यार्कशायर और ब्राइटन के उपनगरों का मुकाबला करने वाले सिविल लाइन्स और दलदलों की गन्दगी को मात करने वाले मुहल्ले। मौसम में भी कहीं कोई सम नहीं, कोई सन्तुलन नहीं। सुबहें मलयजी, दोपहरें अंगारी, तो शामें रेशमी! धरती ऐसी कि सहारा के रेगिस्तान की तरह बालू भी मिले, मालवा की तरह हरे-भरे खेत भी मिलें और ऊसर और परती की भी कमी नहीं। सचमुच लगता है कि प्रयाग का नगर-देवता स्वर्ग-कुंजों से निर्वासित कोई मनमौजी कलाकार है जिसके सृजन में हर रंग के डोरे हैं।

और चाहे जो हो, मगर इधर क्वार, कार्तिक तथा उधर वसन्त के बाद और होली के बीच के मौसम से इलाहाबाद का वातावरण नैस्टर्शियम और पैंजी के फूलों से भी ज्यादा खूबसूरत और आम के बौरों की खुशबू से भी ज्यादा महकदार होता है। सिविल लाइन्स हो या अल्फ्रेड पार्क, गंगातट हो या खुसरूबाग, लगता है कि हवा एक नटखट दोशीजा की तरह कलियों के आँचल और लहरों के मिजाज से छेडख़ानी करती चलती है। और अगर आप सर्दी से बहुत नहीं डरते तो आप जरा एक ओवरकोट डालकर सुबह-सुबह घूमने निकल जाएँ तो इन खुली हुई जगहों की फिजाँ इठलाकर आपको अपने जादू में बाँध लेगी। खासतौर से पौ फटने के पहले तो आपको एक बिल्कुल नयी अनुभूति होगी। वसन्त के नये-नये मौसमी फूलों के रंग से मुकाबला करने वाली हल्की सुनहली, बाल-सूर्य की अँगुलियाँ सुबह की राजकुमारी के गुलाबी वक्ष पर बिखरे हुए भौंराले गेसुओं को धीरे-धीरे हटाती जाती हैं और क्षितिज पर सुनहली तरुणाई बिखर पड़ती है।

एक ऐसी ही खुशनुमा सुबह थी, और जिसकी कहानी मैं कहने जा रहा हूँ, वह सुबह से भी ज्यादा मासूम युवक, प्रभाती गाकर फूलों को जगाने वाले देवदूत की तरह अल्फ्रेड पार्क के लॉन पर फूलों की सरजमीं के किनारे-किनारे घूम रहा था। कत्थई स्वीटपी के रंग का पश्मीने का लम्बा कोट, जिसका एक कालर उठा हुआ था और दूसरे कालर में सरो की एक पत्ती बटन होल में लगी हुई थी, सफेद मक्खन जीन की पतली पैंट और पैरों में सफेद जरी की पेशावरी सैण्डिलें, भरा हुआ गोरा चेहरा और ऊँचे चमकते हुए माथे पर झूलती हुई एक रूखी भूरी लट। चलते-चलते उसने एक रंग-बिरंगा गुच्छा इकट्ठा कर लिया था और रह-रह कर वह उसे सूँघ लेता था।

पूरब के आसमान की गुलाबी पाँखुरियाँ बिखरने लगी थीं और सुनहले पराग की एक बौछार सुबह के ताजे फूलों पर बिछ रही थी। ”अरे सुबह हो गयी?” उसने चौंककर कहा और पास की एक बेंच पर बैठ गया। सामने से एक माली आ रहा था। ”क्यों जी, लाइब्रेरी खुल गयी?” ”अभी नहीं बाबूजी!” उसने जवाब दिया। वह फिर सन्तोष से बैठ गया और फूलों की पाँखुरियाँ नोचकर नीचे फेंकने लगा। जमीन पर बिछाने वाली सोने की चादर परतों पर परतें बिछाती जा रही थी और पेड़ों की छायाओं का रंग गहराने लगा था। उसकी बेंच के नीचे फूलों की चुनी हुई पत्तियाँ बिखरी थीं और अब उसके पास सिर्फ एक फूल बाकी रह गया था। हलके फालसई रंग के उस फूल पर गहरे बैंजनी डोरे थे।

”हलो कपूर!” सहसा किसी ने पीछे से कन्धे पर हाथ रखकर कहा, ”यहाँ क्या झक मार रहे हो सुबह-सुबह?”

उसने मुडक़र पीछे देखा, ”आओ, ठाकुर साहब! आओ बैठो यार, लाइब्रेरी खुलने का इन्तजार कर रहा हूँ।”

”क्यों, यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी चाट डाली, अब इसे तो शरीफ लोगों के लिए छोड़ दो!”

”हाँ, हाँ, शरीफ लोगों ही के लिए छोड़ रहा हूँ; डॉक्टर शुक्ला की लड़की है न, वह इसकी मेम्बर बनना चाहती थी तो मुझे आना पड़ा, उसी का इन्तजार भी कर रहा हूँ।”

”डॉक्टर शुक्ला तो पॉलिटिक्स डिपार्टमेंट में हैं?”

”नहीं, गवर्नमेंट साइकोलॉजिकल ब्यूरो में।”

”और तुम पॉलिटिक्स में रिसर्च कर रहे हो?”

”नहीं, इकनॉमिक्स में!”

”बहुत अच्छे! तो उनकी लड़की को सदस्य बनवाने आये हो?” कुछ अजब स्वर में ठाकुर ने कहा।

”छिह!” कपूर ने हँसते हुए, कुछ अपने को बचाते हुए कहा, ”यार, तुम जानते हो कि मेरा उनसे कितना घरेलू सम्बन्ध है। जब से मैं प्रयाग में हूँ, उन्हीं के सहारे हूँ और आजकल तो उन्हीं के यहाँ पढ़ता-लिखता भी हूँ…।”

ठाकुर साहब हँस पड़े, ”अरे भाई, मैं डॉक्टर शुक्ला को जानता नहीं क्या? उनका-सा भला आदमी मिलना मुश्किल है। तुम सफाई व्यर्थ में दे रहे हो।”

ठाकुर साहब यूनिवर्सिटी के उन विद्यार्थियों में से थे जो बरायनाम विद्यार्थी होते हैं और कब तक वे यूनिवर्सिटी को सुशोभित करते रहेंगे, इसका कोई निश्चय नहीं। एक अच्छे-खासे रुपये वाले व्यक्ति थे और घर के ताल्लुकेदार। हँसमुख, फब्तियाँ कसने में मजा लेने वाले, मगर दिल के साफ, निगाह के सच्चे। बोले-

”एक बात तो मैं स्वीकार करता हूँ कि तुम्हारी पढ़ाई का सारा श्रेय डॉ. शुक्ला को है! तुम्हारे घर वाले तो कुछ खर्चा भेजते नहीं?”

”नहीं, उनसे अलग ही होकर आया था। समझ लो कि इन्होंने किसी-न-किसी बहाने मदद की है।”

”अच्छा, आओ, तब तक लोटस-पोंड (कमल-सरोवर) तक ही घूम लें। फिर लाइब्रेरी भी खुल जाएगी!”

दोनों उठकर एक कृत्रिम कमल-सरोवर की ओर चल दिये जो पास ही में बना हुआ था। सीढिय़ाँ चढक़र ही उन्होंने देखा कि एक सज्जन किनारे बैठे कमलों की ओर एकटक देखते हुए ध्यान में तल्लीन हैं। छिपकली से दुबले-पतले, बालों की एक लट माथे पर झूमती हुई-

”कोई प्रेमी हैं, या कोई फिलासफर हैं, देखा ठाकुर?”

”नहीं यार, दोनों से निकृष्ट कोटि के जीव हैं-ये कवि हैं। मैं इन्हें जानता हूँ। ये रवीन्द्र बिसरिया हैं। एम. ए. में पढ़ता है। आओ, मिलाएँ तुम्हें!”

ठाकुर साहब ने एक बड़ा-सा घास का तिनका तोडक़र पीछे से चुपके-से जाकर उसकी गरदन गुदगुदायी। बिसरिया चौंक उठा-पीछे मुडक़र देखा और बिगड़ गया-”यह क्या बदतमीजी है, ठाकुर साहब! मैं कितने गम्भीर विचारों में डूबा था।” और सहसा बड़े विचित्र स्वर में आँखें बन्द कर बिसरिया बोला, ”आह! कैसा मनोरम प्रभात है! मेरी आत्मा में घोर अनुभूति हो रही थी…।”

कपूर बिसरिया की मुद्रा पर ठाकुर साहब की ओर देखकर मुसकराया और इशारे में बोला, ”है यार शगल की चीज। छेड़ो जरा!”

ठाकुर साहब ने तिनका फेंक दिया और बोले, ”माफ करना, भाई बिसरिया! बात यह है कि हम लोग कवि तो हैं नहीं, इसलिए समझ नहीं पाते। क्या सोच रहे थे तुम?”

बिसरिया ने आँखें खोलीं और एक गहरी साँस लेकर बोला, ”मैं सोच रहा था कि आखिर प्रेम क्या होता है, क्यों होता है? कविता क्यों लिखी जाती है? फिर कविता के संग्रह उतने क्यों नहीं बिकते जितने उपन्यास या कहानी-संग्रह?”

”बात तो गम्भीर है।” कपूर बोला, ”जहाँ तक मैंने समझा और पढ़ा है-प्रेम एक तरह की बीमारी होती है, मानसिक बीमारी, जो मौसम बदलने के दिनों में होती है, मसलन क्वार-कार्तिक या फागुन-चैत। उसका सम्बन्ध रीढ़ की हड्डी से होता है। और कविता एक तरह का सन्निपात होता है। मेरा मतलब आप समझ रहे हैं, मि. सिबरिया?”

”सिबरिया नहीं, बिसरिया?” ठाकुर साहब ने टोका।

बिसरिया ने कुछ उजलत, कुछ परेशानी और कुछ गुस्से से उनकी ओर देखा और बोला, ”क्षमा कीजिएगा, आप या तो फ्रायडवादी हैं या प्रगतिवादी और आपके विचार सर्वदा विदेशी हैं। मैं इस तरह के विचारों से घृणा करता हूँ…।”

कपूर कुछ जवाब देने ही वाला था कि ठाकुर साहब बोले, ”अरे भाई, बेकार उलझ गये तुम लोग, पहले परिचय तो कर लो आपस में। ये हैं श्री चन्द्रकुमार कपूर, विश्वविद्यालय में रिसर्च कर रहे हैं और आप हैं श्री रवीन्द्र बिसरिया, इस वर्ष एम. ए. में बैठ रहे हैं। बहुत अच्छे कवि हैं।”

कपूर ने हाथ मिलाया और फिर गम्भीरता से बोला, ”क्यों साहब, आपको दुनिया में और कोई काम नहीं रहा जो आप कविता करते हैं?”

बिसरिया ने ठाकुर साहब की ओर देखा और बोला, ”ठाकुर साहब, यह मेरा अपमान है, मैं इस तरह के सवालों का आदी नहीं हूँ।” और उठ खड़ा हुआ।

”अरे बैठो-बैठो!” ठाकुर साहब ने हाथ खींचकर बिठा लिया, ”देखो, कपूर का मतलब तुम समझे नहीं। उसका कहना यह है कि तुममें इतनी प्रतिभा है कि लोग तुम्हारी प्रतिभा का आदर करना नहीं जानते। इसलिए उन्होंने सहानुभूति में तुमसे कहा कि तुम और कोई काम क्यों नहीं करते। वरना कपूर साहब तुम्हारी कविता के बहुत शौकीन हैं। मुझसे बराबर तारीफ करते हैं।”

बिसरिया पिघल गया और बोला, ”क्षमा कीजिएगा। मैंने गलत समझा, अब मेरा कविता-संग्रह छप रहा है, मैं आपको अवश्य भेंट करूँगा।” और फिर बिसरिया ठाकुर साहब की ओर मुडक़र बोला, ”अब लोग मेरी कविताओं की इतनी माँग करते हैं कि मैं परेशान हो गया हूँ। अभी कल ‘त्रिवेणी’ के सम्पादक मिले। कहने लगे अपना चित्र दे दो। मैंने कहा कि कोई चित्र नहीं है तो पीछे पड़ गये। आखिरकार मैंने आइडेण्टिटी कार्ड उठाकर दे दिया!”

”वाह!” कपूर बोला, ”मान गये आपको हम! तो आप राष्ट्रीय कविताएँ लिखते हैं या प्रेम की?”

”जब जैसा अवसर हो!” ठाकुर साहब ने जड़ दिया, ”वैसे तो यह वारफ्रण्ट का कवि-सम्मेलन, शराबबन्दी कॉन्फ्रेन्स का कवि-सम्मेलन, शादी-ब्याह का कवि-सम्मेलन, साहित्य-सम्मेलन का कवि-सम्मेलन सभी जगह बुलाये जाते हैं। बड़ा यश है इनका!”

बिसरिया ने प्रशंसा से मुग्ध होकर देखा, मगर फिर एक गर्व का भाव मुँह पर लाकर गम्भीर हो गया।

कपूर थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला, ”तो कुछ हम लोगों को भी सुनाइए न!”

”अभी तो मूड नहीं है।” बिसरिया बोला।

ठाकुर साहब बिसरिया को पिछले पाँच सालों से जानते थे, वे अच्छी तरह जानते थे कि बिसरिया किस समय और कैसे कविता सुनाता है। अत: बोले, ”ऐसे नहीं कपूर, आज शाम को आओ। ज़रा गंगाजी चलें, कुछ बोटिंग रहे, कुछ खाना-पीना रहे तब कविता भी सुनना!”

कपूर को बोटिंग का बेहद शौक था। फौरन राजी हो गया और शाम का विस्तृत कार्यक्रम बन गया।

इतने में एक कार उधर से लाइब्रेरी की ओर गुजरी। कपूर ने देखा और बोला, ”अच्छा, ठाकुर साहब, मुझे तो इजाजत दीजिए। अब चलूँ लाइब्रेरी में। वो लोग आ गये। आप कहाँ चल रहे हैं?”

”मैं ज़रा जिमखाने की ओर जा रहा हूँ। अच्छा भाई, तो शाम को पक्की रही।”

”बिल्कुल पक्की!” कपूर बोला और चल दिया।

लाइब्रेरी के पोर्टिको में कार रुकी थी और उसके अन्दर ही डॉक्टर साहब की लड़की बैठी थी।

”क्यों सुधा, अन्दर क्यों बैठी हो?”

”तुम्हें ही देख रही थी, चन्दर।” और वह उतर आयी। दुबली-पतली, नाटी-सी, साधारण-सी लड़की, बहुत सुन्दर नहीं, केवल सुन्दर, लेकिन बातचीत में बहुत दुलारी।

”चलो, अन्दर चलो।” चन्दर ने कहा।

वह आगे बढ़ी, फिर ठिठक गयी और बोली, ”चन्दर, एक आदमी को चार किताबें मिलती हैं?”

”हाँ! क्यों?”

”तो…तो…” उसने बड़े भोलेपन से मुसकराते हुए कहा, ”तो तुम अपने नाम से मेम्बर बन जाओ और दो किताबें हमें दे दिया करना बस, ज्यादा का हम क्या करेंगे?”

”नहीं!” चन्दर हँसा, ”तुम्हारा तो दिमाग खराब है। खुद क्यों नहीं बनतीं मेम्बर?”

”नहीं, हमें शरम लगती है, तुम बन जाओ मेम्बर हमारी जगह पर।”

”पगली कहीं की!” चन्दर ने उसका कन्धा पकडक़र आगे ले चलते हुए कहा, ”वाह रे शरम! अभी कल ब्याह होगा तो कहना, हमारी जगह तुम बैठ जाओ चन्दर! कॉलेज में पहुँच गयी लड़की; अभी शरम नहीं छूटी इसकी! चल अन्दर!”

और वह हिचकती, ठिठकती, झेंपती और मुड़-मुडक़र चन्दर की ओर रूठी हुई निगाहों से देखती हुई अन्दर चली गयी।

थोड़ी देर बाद सुधा चार किताबें लादे हुए निकली। कपूर ने कहा, ”लाओ, मैं ले लूँ!” तो बाँस की पतली टहनी की तरह लहराकर बोली, ”सदस्य मैं हूँ। तुम्हें क्यों दूँ किताबें?” और जाकर कार के अन्दर किताबें पटक दीं। फिर बोली, ”आओ, बैठो, चन्दर!”

”मैं अब घर जाऊँगा।”

”ऊँहूँ, यह देखो!” और उसने भीतर से कागजों का एक बंडल निकाला और बोली, ”देखो, यह पापा ने तुम्हारे लिए दिया है। लखनऊ में कॉन्फ्रेन्स है न। वहीं पढऩे के लिए यह निबन्ध लिखा है उन्होंने। शाम तक यह टाइप हो जाना चाहिए। जहाँ संख्याएँ हैं वहाँ खुद आपको बैठकर बोलना होगा। और पापा सुबह से ही कहीं गये हैं। समझे जनाब!” उसने बिल्कुल अल्हड़ बच्चों की तरह गरदन हिलाकर शोख स्वरों में कहा।

कपूर ने बंडल ले लिया और कुछ सोचता हुआ बोला, ”लेकिन डॉक्टर साहब का हस्तलेख, इतने पृष्ठ, शाम तक कौन टाइप कर देगा?”

”इसका भी इन्तजाम है,” और अपने ब्लाउज में से एक पत्र निकालकर चन्दर के हाथ में देती हुई बोली, ”यह कोई पापा की पुरानी ईसाई छात्रा है। टाइपिस्ट। इसके घर मैं तुम्हें पहुँचाये देती हूँ। मुकर्जी रोड पर रहती है यह। उसी के यहाँ टाइप करवा लेना और यह खत उसे दे देना।”

”लेकिन अभी मैंने चाय नहीं पी।”

”समझ गये, अब तुम सोच रहे होगे कि इसी बहाने सुधा तुम्हें चाय भी पिला देगी। सो मेरा काम नहीं है जो मैं चाय पिलाऊँ? पापा का काम है यह! चलो, आओ!”

चन्दर जाकर भीतर बैठ गया और किताबें उठाकर देखने लगा, ”अरे, चारों कविता की किताबें उठा लायी-समझ में आएँगी तुम्हारे? क्यों, सुधा?”

”नहीं!” चिढ़ाते हुए सुधा बोली, ”तुम कहो, तुम्हें समझा दें। इकनॉमिक्स पढऩे वाले क्या जानें साहित्य?”

”अरे, मुकर्जी रोड पर ले चलो, ड्राइवर!” चन्दर बोला, ”इधर कहाँ चल रहे हो?”

”नहीं, पहले घर चलो!” सुधा बोली, ”चाय पी लो, तब जाना!”

”नहीं, मैं चाय नहीं पिऊँगा।” चन्दर बोला।

”चाय नहीं पिऊँगा, वाह! वाह!” सुधा की हँसी में दूधिया बचपन छलक उठा-”मुँह तो सूखकर गोभी हो रहा है, चाय नहीं पिएँगे।”

बँगला आया तो सुधा ने महराजिन से चाय बनाने के लिए कहा और चन्दर को स्टडी रूम में बिठाकर प्याले निकालने के लिए चल दी।

वैसे तो यह घर, यह परिवार चन्द्र कपूर का अपना हो चुका था; जब से वह अपनी माँ से झगडक़र प्रयाग भाग आया था पढऩे के लिए, यहाँ आकर बी. ए. में भरती हुआ था और कम खर्च के खयाल से चौक में एक कमरा लेकर रहता था, तभी डॉक्टर शुक्ला उसके सीनियर टीचर थे और उसकी परिस्थितियों से अवगत थे। चन्दर की अँग्रेजी बहुत ही अच्छी थी और डॉ. शुक्ला उससे अक्सर छोटे-छोटे लेख लिखवाकर पत्रिकाओं में भिजवाते थे। उन्होंने कई पत्रों के आर्थिक स्तम्भ का काम चन्दर को दिलवा दिया था और उसके बाद चन्दर के लिए डॉ. शुक्ला का स्थान अपने संरक्षक और पिता से भी ज्यादा हो गया था। चन्दर शरमीला लड़का था, बेहद शरमीला, कभी उसने यूनिवर्सिटी के वजीफे के लिए भी कोशिश न की थी, लेकिन जब बी. ए. में वह सारी यूनिवर्सिटी में सर्वप्रथम आया तब स्वयं इकनॉमिक्स विभाग ने उसे यूनिवर्सिटी के आर्थिक प्रकाशनों का वैतनिक सम्पादक बना दिया था। एम. ए. में भी वह सर्वप्रथम आया और उसके बाद उसने रिसर्च ले ली। उसके बाद डॉ. शुक्ला यूनिवर्सिटी से हटकर ब्यूरो में चले गये थे। अगर सच पूछा जाय तो उसके सारे कैरियर का श्रेय डॉ. शुक्ला को था जिन्होंने हमेशा उसकी हिम्मत बढ़ायी और उसको अपने लड़के से बढक़र माना। अपनी सारी मदद के बावजूद डॉ. शुक्ला ने उससे इतना अपनापन बनाये रखा कि कैसे धीरे-धीरे चन्दर सारी गैरियत खो बैठा; यह उसे खुद नहीं मालूम। यह बँगला, इसके कमरे, इसके लॉन, इसकी किताबें, इसके निवासी, सभी कुछ जैसे उसके अपने थे और सभी का उससे जाने कितने जन्मों का सम्बन्ध था।

और यह नन्ही दुबली-पतली रंगीन चन्द्रकिरन-सी सुधा। जब आज से वर्षों पहले यह सातवीं पास करके अपनी बुआ के पास से यहाँ आयी थी तब से लेकर आज तक कैसे वह भी चन्दर की अपनी होती गयी थी, इसे चन्दर खुद नहीं जानता था। जब वह आयी थी तब वह बहुत शरमीली थी, बहुत भोली थी, आठवीं में पढऩे के बावजूद वह खाना खाते वक्त रोती थी, मचलती थी तो अपनी कॉपी फाड़ डालती थी और जब तक डॉक्टर साहब उसे गोदी में बिठाकर नहीं मनाते थे, वह स्कूल नहीं जाती थी। तीन बरस की अवस्था में ही उसकी माँ चल बसी थी और दस साल तक वह अपनी बुआ के पास एक गाँव में रही थी। अब तेरह वर्ष की होने पर गाँव वालों ने उसकी शादी पर जोर देना और शादी न होने पर गाँव की औरतों ने हाथ नचाना और मुँह मटकाना शुरू किया तो डॉक्टर साहब ने उसे इलाहाबाद बुलाकर आठवीं में भर्ती करा दिया। जब वह आयी थी तो आधी जंगली थी, तरकारी में घी कम होने पर वह महराजिन का चौका जूठा कर देती थी और रात में फूल तोडक़र न लाने पर अकसर उसने माली को दाँत भी काट खाया था। चन्दर से जरूर वह बेहद डरती थी, पर न जाने क्यों चन्दर भी उससे नहीं बोलता था। लेकिन जब दो साल तक उसके ये उपद्रव जारी रहे और अक्सर डॉक्टर साहब गुस्से के मारे उसे न साथ खिलाते थे और न उससे बोलते थे, तो वह रो-रोकर और सिर पटक-पटककर अपनी जान आधी कर देती थी। तब अक्सर चन्दर ने पिता और पुत्री का समझौता कराया था, अक्सर सुधा को डाँटा था, समझाया था, और सुधा, घर-भर से अल्हड़ पुरवाई और विद्रोही झोंके की तरह तोड़-फोड़ मचाती रहने वाली सुधा, चन्दर की आँख के इशारे पर सुबह की नसीम की तरह शान्त हो जाती थी। कब और क्यों उसने चन्दर के इशारों का यह मौन अनुशासन स्वीकार कर लिया था, यह उसे खुद नहीं मालूम था, और यह सभी कुछ इतने स्वाभाविक ढंग से, इतना अपने-आप होता गया कि दोनों में से कोई भी इस प्रक्रिया से वाकिफ नहीं था, कोई भी इसके प्रति जागरूक न था, दोनों का एक-दूसरे के प्रति अधिकार और आकर्षण इतना स्वाभाविक था जैसे शरद की पवित्रता या सुबह की रोशनी।

और मजा तो यह था कि चन्दर की शक्ल देखकर छिप जाने वाली सुधा इतनी ढीठ हो गयी थी कि उसका सारा विद्रोह, सारी झुँझलाहट, मिजाज की सारी तेजी, सारा तीखापन और सारा लड़ाई-झगड़ा, सभी की तरफ से हटकर चन्दर की ओर केन्द्रित हो गया था। वह विद्रोहिनी अब शान्त हो गयी थी। इतनी शान्त, इतनी सुशील, इतनी विनम्र, इतनी मिष्टभाषिणी कि सभी को देखकर ताज्जुब होता था, लेकिन चन्दर को देखकर जैसे उसका बचपन फिर लौट आता था और जब तक वह चन्दर को खिझाकर, छेडक़र लड़ नहीं लेती थी उसे चैन नहीं पड़ता था। अक्सर दोनों में अनबोला रहता था, लेकिन जब दो दिन तक दोनों मुँह फुलाये रहते थे और डॉक्टर साहब के लौटने पर सुधा उत्साह से उनके ब्यूरो का हाल नहीं पूछती थी और खाते वक्त दुलार नहीं दिखाती थी तो डॉक्टर साहब फौरन पूछते थे, ”क्या… चन्दर से लड़ाई हो गयी क्या?” फिर वह मुँह फुलाकर शिकायत करती थी और शिकायतें भी क्या-क्या होती थीं, चन्दर ने उसकी हेड मिस्ट्रेस का नाम एलीफैंटा (श्रीमती हथिनी) रखा था, या चन्दर ने उसको डिबेट के भाषण के प्वाइंट नहीं बताये, या चन्दर कहता है कि सुधा की सखियाँ कोयला बेचती हैं, और जब डॉक्टर साहब कहते हैं कि वह चन्दर को डाँट देंगे तो वह खुशी से फूल उठती और चन्दर के आने पर आँखें नचाती हुई चिढ़ाती थी, ”कहो, कैसी डाँट पड़ी?”

वैसे सुधा अपने घर की पुरखिन थी। किस मौसम में कौन-सी तरकारी पापा को माफिक पड़ती है, बाजार में चीजों का क्या भाव है, नौकर चोरी तो नहीं करता, पापा कितने सोसायटियों के मेम्बर हैं, चन्दर के इक्नॉमिक्स के कोर्स में क्या है, यह सभी उसे मालूम था। मोटर या बिजली बिगड़ जाने पर वह थोड़ी-बहुत इंजीनियरिंग भी कर लेती थी और मातृत्व का अंश तो उसमें इतना था कि हर नौकर और नौकरानी उससे अपना सुख-दु:ख कह देते थे। पढ़ाई के साथ-साथ घर का सारा काम-काज करते हुए उसका स्वास्थ्य भी कुछ बिगड़ गया था और अपनी उम्र के हिसाब से कुछ अधिक शान्त, संयम, गम्भीर और बुजुर्ग थी, मगर अपने पापा और चन्दर, इन दोनों के सामने हमेशा उसका बचपन इठलाने लगता था। दोनों के सामने उसका हृदय उन्मुक्त था और स्नेह बाधाहीन।

लेकिन हाँ, एक बात थी। उसे जितना स्नेह और स्नेह-भरी फटकारें और स्वास्थ्य के प्रति चिन्ता अपने पापा से मिलती थी, वह सब बड़े नि:स्वार्थ भाव से वह चन्दर को दे डालती थी। खाने-पीने की जितनी परवाह उसके पापा उसकी रखते थे, न खाने पर या कम खाने पर उसे जितने दुलार से फटकारते थे, उतना ही ख्याल वह चन्दर का रखती थी और स्वास्थ्य के लिए जो उपदेश उसे पापा से मिलते थे, उसे और भी स्नेह में पागकर वह चन्दर को दे डालती थी। चन्दर कै बजे खाना खाता है, यहाँ से जाकर घर पर कितनी देर पढ़ता है, रात को सोते वक्त दूध पीता है या नहीं, इन सबका लेखा-जोखा उसे सुधा को देना पड़ता, और जब कभी उसके खाने-पीने में कोई कमी रह जाती तो उसे सुधा की डाँट खानी ही पड़ती थी। पापा के लिए सुधा अभी बच्ची थी; और स्वास्थ्य के मामले में सुधा के लिए चन्दर अभी बच्चा था। और कभी-कभी तो सुधा की स्वास्थ्य-चिन्ता इतनी ज्यादा हो जाती थी कि चन्दर बेचारा जो खुद तन्दुरुस्त था, घबरा उठता था। एक बार सुधा ने कमाल कर दिया। उसकी तबीयत खराब हुई और डॉक्टर ने उसे लड़कियों का एक टॉनिक पीने के लिए बताया। इम्तहान में जब चन्दर कुछ दुबला-सा हो गया तो सुधा अपनी बची हुई दवा ले आयी। और लगी चन्दर से जिद करने कि ”पियो इसे!” जब चन्दर ने किसी अखबार में उसका विज्ञापन दिखाकर बताया कि लड़कियों के लिए है, तब कहीं जाकर उसकी जान बची।

इसीलिए जब आज सुधा ने चाय के लिए कहा तो उसकी रूह काँप गयी क्योंकि जब कभी सुधा चाय बनाती थी तो प्याले के मुँह तक दूध भरकर उसमें दो-तीन चम्मच चाय का पानी डाल देती थी और अगर उसने ज्यादा स्ट्रांग चाय की माँग की तो उसे खालिस दूध पीना पड़ता था। और चाय के साथ फल और मेवा और खुदा जाने क्या-क्या, और उसके बाद सुधा का इसरार, न खाने पर सुधा का गुस्सा और उसके बाद की लम्बी-चौड़ी मनुहार; इस सबसे चन्दर बहुत घबराता था। लेकिन जब सुधा उसे स्टडी रूम में बिठाकर जल्दी से चाय बना लायी तो उसे मजबूर होना पड़ा, और बैठे-बैठे निहायत बेबसी से उसने देखा कि सुधा ने प्याले में दूध डाला और उसके बाद थोड़ी-सी चाय डाल दी। उसके बाद अपने प्याले में चाय डालकर और दो चम्मच दूध डालकर आप ठाठ से पीने लगे, और बेतकल्लुफी से दूधिया चाय का प्याला चन्दर के सामने खिसकाकर बोली, ”पीजिए, नाश्ता आ रहा है।”

चन्दर ने प्याले को अपने सामने रखा और उसे चारों तरफ घुमाकर देखता रहा कि किस तरफ से उसे चाय का अंश मिल सकता है। जब सभी ओर से प्याले में क्षीरसागर नजर आया तो उसने हारकर प्याला रख दिया।

”क्यों, पीते क्यों नहीं?” सुधा ने अपना प्याला रख दिया।

”पीएँ क्या? कहीं चाय भी हो?”

”तो और क्या खालिस चाय पीजिएगा? दिमागी काम करने वालों को ऐसी ही चाय पीनी चाहिए।”

”तो अब मुझे सोचना पड़ेगा कि मैं चाय छोड़ूँ या रिसर्च। न ऐसी चाय मुझे पसन्द, न ऐसा दिमागी काम!”

”लो, आपको विश्वास नहीं होता। मेरी क्लासफेलो है गेसू काजमी; सबसे तेज लड़की है, उसकी अम्मी उसे दूध में चाय उबालकर देती है।”

”क्या नाम है तुम्हारी सखी का?”

”गेसू!”

”बड़ा अच्छा नाम है!”

”और क्या! मेरी सबसे घनिष्ठ मित्र है और उतनी ही अच्छी है जितना अच्छा नाम!”

”जरूर-जरूर,” मुँह बिचकाते हुए चन्दर ने कहा, ”और उतनी ही काली होगी, जितने काले गेसू।”

”धत्, शरम नहीं आती किसी लड़की के लिए ऐसा कहते हुए!”

”और हमारे दोस्तों की बुराई करती हो तब?”

”तब क्या! वे तो सब हैं ही बुरे! अच्छा तो नाश्ता, पहले फल खाओ,” और वह प्लेट में छील-छीलकर सन्तरा रखने लगी। इतने में ज्यों ही वह झुककर एक गिरे हुए सन्तरे को नीचे से उठाने लगी कि चन्दर ने झट से उसका प्याला अपने सामने रख लिया और अपना प्याला उधर रख दिया और शान्त चित्त से पीने लगा। सन्तरे की फाँकें उसकी ओर बढ़ाते हुए ज्यों ही उसने एक घूँट चाय ली तो वह चौंककर बोली, ”अरे, यह क्या हुआ?”

”कुछ नहीं, हमने उसमें दूध डाल दिया। तुम्हें दिमागी काम बहुत रहता है!” चन्दर ने ठाठ से चाय घूँटते हुए कहा। सुधा कुढ़ गयी। कुछ बोली नहीं। चाय खत्म करके चन्दर ने घड़ी देखी।

”अच्छा लाओ, क्या टाइप कराना है? अब बहुत देर हो रही है।”

”बस यहाँ तो एक मिनट बैठना बुरा लगता है आपको! हम कहते हैं कि नाश्ते और खाने के वक्त आदमी को जल्दी नहीं करनी चाहिए। बैठिए न!”

”अरे, तो तुम्हें कॉलेज की तैयारी नहीं करनी है?”

”करनी क्यों नहीं है। आज तो गेसू को मोटर पर लेते हुए तब जाना है!”

”तुम्हारी गेसू और कभी मोटर पर चढ़ी है?”

”जी, वह साबिर हुसैन काजमी की लड़की है, उसके यहाँ दो मोटरें हैं और रोज तो उसके यहाँ दावतें होती रहती हैं।”

”अच्छा, हमारी तो दावत कभी नहीं की?”

”अहा हा, गेसू के यहाँ दावत खाएँगे! इसी मुँह से! जनाब उसकी शादी भी तय हो गयी है, अगले जाड़ों तक शायद हो भी जाय।”

”छिह, बड़ी खराब लड़की हो! कहाँ रहता है ध्यान तुम्हारा?”

सुधा ने मजाक में पराजित कर बहुत विजय-भरी मुसकान से उसकी ओर देखा। चन्दर ने झेंपकर निगाह नीची कर ली तो सुधा पास आकर चन्दर का कन्धा पकडक़र बोली-”अरे उदास हो गये, नहीं भइया, तुम्हारा भी ब्याह तय कराएँगे, घबराते क्यों हो!” और एक मोटी-सी इकनॉमिक्स की किताब उठाकर बोली, ”लो, इस मुटकी से ब्याह करोगे! लो बातचीत कर लो, तब तक मैं वह निबन्ध ले आऊँ, टाइप कराने वाला।”

चन्दर ने खिसियाकर बड़ी जोर से सुधा का हाथ दबा दिया। ”हाय रे!” सुधा ने हाथ छुड़ाकर मुँह बनाते हुए कहा, ”लो बाबा, हम जा रहे हैं, काहे बिगड़ रहे हैं आप?” और वह चली गयी! डॉक्टर साहब का लिखा हुआ निबन्ध उठा लायी और बोली, ”लो, यह निबन्ध की पाण्डुलिपि है।” उसके बाद चन्दर की ओर बड़े दुलार से देखती हुई बोली, ”शाम को आओगे?”

”न!”

”अच्छा, हम परेशान नहीं करेंगे। तुम चुपचाप पढऩा। जब रात को पापा आ जाएँ तो उन्हें निबन्ध की प्रतिलिपि देकर चले जाना!”

”नहीं, आज शाम को मेरी दावत है ठाकुर साहब के यहाँ।”

”तो उसके बाद आ जाना। और देखो, अब फरवरी आ गयी है, मास्टर ढूँढ़ दो हमें।”

”नहीं, ये सब झूठी बात है। हम कल सुबह आएँगे।”

”अच्छा, तो सुबह जल्दी आना और देखो, मास्टर लाना मत भूलना। ड्राइवर तुम्हें मुकर्जी रोड पहुँचा देगा।”

वह कार में बैठ गया और कार स्टार्ट हो गयी कि फिर सुधा ने पुकारा। वह फिर उतरा। सुधा बोली, ”लो, यह लिफाफा तो भूल ही गये थे। पापा ने लिख दिया है। उसे दे देना।”

”अच्छा।” कहकर फिर चन्दर चला कि फिर सुधा ने पुकारा, ”सुनो!”

”एक बार में क्यों नहीं कह देती सब!” चन्दर ने झल्लाकर कहा।

”अरे बड़ी गम्भीर बात है। देखो, वहाँ कुछ ऐसी-वैसी बात मत कहना लड़की से, वरना उसके यहाँ दो बड़े-बड़े बुलडॉग हैं।” कहकर उसने गाल फुलाकर, आँख फैलाकर ऐसी बुलडॉग की भंगिमा बनायी कि चन्दर हँस पड़ा। सुधा भी हँस पड़ी।

ऐसी थी सुधा, और ऐसा था चन्दर।

 

 

 

ऐसे ऑनलाइन चेक करें की आपके आधार का इस्तेमाल कहाँ कहाँ हुआ है

0

 

वर्तमान समय में आधार कार्ड हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गया है क्युकी हमें बहुत सरे चीजो के लिए आधार कार्ड की मांग की जाती है | खता खुलवाना हो ,सिम  लेना हो, गैस लेना हो हर चीज में हमें आधार कार्ड की जरुरत पड़ती है | लेकिन आधार कार्ड की इस बढती मांग के कारण इसके दुरूपयोग की भी संभावना बढ़ गयी है | लेकिन अब आपको चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है | क्योंकि अप आप घर बैठे पता कर सकते है की आपके आधार कार्ड का कहा कहा पर इस्तेमाल हुआ है |

घर बैठे पाए जानकारी 

आधार अथॉरिटी यानि  यूआईडीएआई ने एक नई सुविधा शुरू की है, जिसके जरिये आप घर बैठे पता कर सकते हैं कि आपका आधार कार्ड कहां-कहां यूज हुआ है | इस सुविधा का इस्तेमाल कर आप न सिर्फ जान सकेंगे कि आपका आधार कार्ड कहां-कहां यूज हुआ है, बल्क‍ि इसकी बदौलत आपको कुछ गड़बड़ी नजर आती है, तो आप आसानी से इसकी श‍िकायत भी कर सकते हैं |

कैसे पाए जानकारी 

तो चलिए अब हम बताते है की कैसे आप यह सुविधा का लाभ उठा सकते है | इसके लिए आपको UIDAI की ऑफिसियल  वेबसाइट पर जाना होगा. यहां आपको ‘Aadhaar Authentication History’ का विकल्प दिखेगा| आप चाहे तो ऊपर दिए गए लिंक पर सीधे क्लिक कर के भी उस पेज पर पहुच सकते है |

 

STEP – 1

इस पेज पर आपको अपना 12 अंको का आधार नंबर डालना है और साथ ही निचे दिए गए कैप्चा को भी दर्ज करना होगा | इसके बाद आपको GENERATE OTP पर क्लिक करना होगा | क्लिक करते ही आपके verified मोबाइल नंबर पर OTP आ जाएगी | और एक नया पेज खुलेगा |

STEP – 2

इस पेज पर आपको बताना होगा की आपको कब से कब की जानकारी चाहिए | आप केवल 6 महिना पहले की ही जानकारी प्राप्त कर सकते है | आप प्रारंम्भिक तिथि  और अंतिम तिथि का चुनाव कर ले | फिर उसके निचे कितनी सूचनाओ की जानकारी आप चाहते है उसका नंबर भरना है | आप इसमे अधिकतम 50 सूचनाओ की जानकारी प्राप्त कर सकते है | उसके बाद OTP का आप्शन मिलेगा जो आपके मोबाइल में SMS के माध्यम से आ चूका होगा | OTP इंटर करते ही आपको उस समय सीमा अवध‍ि के दौरान की सारी जानकारी मिल जाएगी|

गड़बड़ी नजर आने पर जरुर करे  श‍िकायत

अगर आपको हिस्ट्री देखकर कुछ भी गड़बड़ी नजर आई, तो इसकी श‍िकायत यूआईडीएआई से 1947 पर कॉल कर के कर सकते हैं| दरअसल जब भी आपके आधार को यूज किया जाता है, तो इसे यूज करने के लिए हर संबंध‍ित व्यक्‍त‍ि को यूआईडीएआई को रिक्वेस्ट भेजनी होती है. इसके आधार पर ही यूआईडीएआई आपका डाटा यहां पेश करता है.

 

 

अगर आप का ATM कार्ड खो जाए या चोरी हो जाए तो सबसे पहले ये काम करे

0

एटीएम कार्ड आजकल हर एक छोटे बड़े लोगो के जीवन का अभिन्न अंग बन गया है | खासकर जब से नोटबंदी  हुआ है तब से एटीएम कार्ड की कीमत और बढ़ गयी है | पहले किसी को कुछ हज़ार रूपये देने रहते थे तो मन में यह डर बना रहता था की रस्ते में कुछ अनहोनी न हो जाये | पर अब हर जगह एटीएम उपलब्ध है | जब जरुरत पड़ती है हम निकाल कर पैसे उसे दे देते है |

एटीएम कार्ड जानकारी किसी से शेयर न करे

लेकिन इसके बहुत सारे खतरे भी है | आपके एटीएम कार्ड के जरिये कोई भी ब्यक्ति कुछ सेकंड में आपके खाते के  सारे रुपयों को निकाल सकता है | आजकल जब से अकाउंट नंबर को आधार से लिंक करने की मुहीम चली है तब से बहुत सारे लोगो के पास फेक कॉल आये है की हम इस बैंक के मैनेजर बोल रहे है अपने एटीएम कार्ड की जानकारी दीजिये हम आपका अकाउंट आधार से लिंक कर देंगे | चाहे कोई भी फ़ोन करे अपने एकाउंट्स की जानकारी किसी से शेयर न करे | क्युकी कोई भी बैंक फ़ोन करके किसी से कोई जानकारी नहीं मांगता है |

एटीएम कार्ड खो जाये तो क्या करे 

लेकिन अगर आपका एटीएम कार्ड खो जाए या आप का ATM कार्ड चोरी हो जाए तो आप क्या करेंगे| बहुत सारे लोग इस परिस्थिति में घबरा जाते है | उन्हें समझ में नहीं आता की तुरंत क्या करे | तो हम आपको बताते है की अगर आपका कार्ड खो जाये तो सबसे पहला काम करना है वो है एटीएम कार्ड को ब्लाक करना | उसके लिए बहुत सारे तरीके है लेकिन उसमे सबसे आसन तरीका है नेट बैंकिंग  के द्वारा |

चंद सेकंड में ब्लाक करे एटीएम कार्ड 

अगर आपने अपने अकाउंट में नेट बैंकिंग एक्टिवेट करायी हुयी है तो आपको बिलकुल भी चिंता करने की जरुरत नहीं है | क्युकी ज्यादातर बैंक ऑनलाइन एटीएम कार्ड ब्लाक करने की सुवुधा देते है | इसके लिए अपने बैंक के  नेट बैंकिंग में लॉग इन कीजिये और उसमे कही पर ब्लाक एटीएम कार्ड का आप्शन होगा उस पर क्लिक कीजिये | मिनटों में आपका कार्ड ब्लाक हो जायेगा और कोई चाह कर भी आपके कार्ड का गलत उपयोग नहीं कर पायेगा |

बैंक की हेल्पलाइन नंबर पर कॉल कीजिये

दूसरा कार्ड ब्लाक करने का तरीका है बैंक के एप्लीकेशन के द्वारा | अगर आपके फ़ोन में बैंक का एप्लीकेशन है तो उसमे लोग इन करके भी आप एटीएम कार्ड को ब्लाक करा सकते है | लेकिन चलिए मान लेते है की आपके पास नेट बैंकिंग की सुविधा नहीं है तब क्या करे | फिर भी घबराने की जरुरत नहीं है ,बैंक की हेल्पलाइन नंबर पर कॉल कीजिये | उनसे अपना एटीएम कार्ड को ब्लाक करने के लिए बोलिए | वे कुछ इनफार्मेशन वेरीफाई करवाएंगे और  आपका कार्ड कुछ समय में ब्लाक कर देंगे | इन  तरीको के जरिये  आप कुछ ही देर में अपने कार्ड को ब्लाक कर सकते है |

आप अपने नजदीकी बैंक में जाकर भी अपने एटीएम कार्ड को ब्लाक करा सकते है लेकिन इसमे समय लगेगा और आपके कार्ड के दुरूपयोग की सम्भावना बढ़ जाएगी |

ये उपाय करके अपने कार्ड का दुरूपयोग होने से बचाए 

अगर आप नेट बैंकिंग चलाना जानते है तो हम कुछ उपाय बता रहे है जिनको करने के बाद आपके एटीएम कार्ड के दुरूपयोग की संभावना न्यूनतम हो जाएगी |

OTP  आप्शन हमेशा रखे ओन

आप अपने नेट बैंकिंग में OTP  आप्शन हमेशा ओन कर दे | ताकि अगर आपके अकाउंट से कभी भी 1 रुपया भी कटे तो आपके मोबाइल पर MASSAGE आये ,आप उसको वेरीफाई करो फिर तभी आपका पैसा कटे | अगर आपका कार्ड किसी दुसरे के पास चल भी जाता है तो वो चाह कर भी 1 रुपया भी आपके अकाउंट से ऑनलाइन नहीं निकाल सकता है  |

TRANSACTION लिमिट करे एक्टिवेट

बहुत सारे बैंक में एक TRANSACTION लिमिट होती है | आप उसे एक्टिवेट करे दो और इसकी लिमिट अपनी जरूरत के अनुसार रख दे | मान लिया की आपकी एक दिन की  TRANSACTION लिमिट 10000 है   तो यदि आपका कार्ड किसी और के पास जाता है तो एक दिन में केवल 10000 रूपये ही वह निकाल पायेगा और बाकि आपके पैसे सुरक्षित बाख जायेंगे |