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Thursday, March 19, 2026
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अफ़सोस नहीं इसका हमको – गोपाल सिंह नेपाली

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अफ़सोस नहीं इसका हमको

गोपाल सिंह नेपाली

 

अफ़सोस नहीं इसका हमको,

जीवन में हम कुछ कर न सके,

झोलियाँ किसी की भर न सके,

सन्ताप किसी का हर न सके।

अपने प्रति सच्चा रहने का,

जीवन भर हमने काम किया,

देखा-देखी हम जी न सके,

देखा-देखी हम मर न सके ।

तू किसी रेल-सी गुज़रती है -दुष्यंत कुमार

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Tu kisi rail si gujarati hai

तू किसी रेल-सी गुज़रती है

दुष्यंत कुमार

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ

वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ

एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ

तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ

हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ

एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ

मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ

कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है

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aadam gondawi kavita

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है

अदम गोंडवी

 

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।

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aadam gondawi kavita

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है

अदम गोंडवी

 

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है।।

भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी।
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।।

बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में।
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है।।

सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास वो कैसे।
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।।

तुम कितनी सुन्दर लगती हो

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dharmvir bharati

तुम कितनी सुन्दर लगती हो

धर्मवीर भारती

तुम कितनी सुन्दर लगती हो
जब तुम हो जाती हो उदास!
ज्यों किसी गुलाबी दुनिया में सूने खँडहर के आसपास
मदभरी चांदनी जगती हो!

मुँह पर ढँक लेती हो आँचल
ज्यों डूब रहे रवि पर बादल,
या दिन-भर उड़कर थकी किरन,
सो जाती हो पाँखें समेट, आँचल में अलस उदासी बन!
दो भूले-भटके सान्ध्य-विहग, पुतली में कर लेते निवास!
तुम कितनी सुन्दर लगती हो
जब तुम हो जाती हो उदास!

खारे आँसू से धुले गाल
रूखे हलके अधखुले बाल,
बालों में अजब सुनहरापन,
झरती ज्यों रेशम की किरनें, संझा की बदरी से छन-छन!
मिसरी के होठों पर सूखी किन अरमानों की विकल प्यास!
तुम कितनी सुन्दर लगती हो
जब तुम हो जाती हो उदास!

भँवरों की पाँतें उतर-उतर
कानों में झुककर गुनगुनकर
हैं पूछ रहीं-‘क्या बात सखी?
उन्मन पलकों की कोरों में क्यों दबी ढँकी बरसात सखी?
चम्पई वक्ष को छूकर क्यों उड़ जाती केसर की उसाँस?
तुम कितनी सुन्दर लगती हो
ज्यों किसी गुलाबी दुनिया में सूने खँडहर के आसपास
मदभरी चाँदनी जगती हो!

~ उदास तुम / धर्मवीर भारती

वह कहता था, वह सुनती थी – शरद कोकास

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wah kahata tha sharad kokas

वह कहता था, वह सुनती थी

शरद कोकास

 

वह कहता था,
वह सुनती थी,

जारी था एक खेल
कहने-सुनने का।

खेल में थी दो पर्चियाँ।
एक में लिखा था ‘कहो’,
एक में लिखा था ‘सुनो’

अब यह नियति थी
या महज़ संयोग?

उसके हाथ लगती रही वही पर्ची
जिस पर लिखा था ‘सुनो’

वह सुनती रही।
उसने सुने आदेश।
उसने सुने उपदेश।

बन्दिशें उसके लिए थीं।
उसके लिए थीं वर्जनाएँ।

वह जानती थी,
‘कहना-सुनना’
नहीं हैं केवल क्रियाएं।

राजा ने कहा,
‘ज़हर पियो’
वह मीरा हो गई।

ऋषि ने कहा,
‘पत्थर बनो’
वह अहल्या हो गई।

प्रभु ने कहा,
‘निकल जाओ’
वह सीता हो गई।

चिता से निकली चीख,
किन्हीं कानों ने नहीं सुनी।
वह सती हो गई।

घुटती रही उसकी फरियाद,
अटके रहे शब्द,

सिले रहे होंठ,
रुन्धा रहा गला।

उसके हाथ
कभी नहीं लगी वह पर्ची,
जिस पर लिखा था, ‘कहो’

सुहाग के भोजपुरी लोकगीत

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1 – कहवाँ से डाल रे आवे कहवाँ से बाजन आवे

 

कहवाँ से डाल रे आवे कहवाँ से बाजन आवे,

कहवाँ से धीया के सोहाग आवे, धीया मोरी सोहागिन रही हे।

 

पुरब से डाल रे आवे, पछीम से बाजन आवे,

अरे वरधी लदाईल धीया के सोहाग आवे धीया मोरी सोहागिन रही हे।

 

कहाँ धरबो डाला रे दउरा, कहाँ धरबो अच्छत चंदन ,

अरे कहवाँ से धीया के सोहाग धरबो, धीया मोरी सोहागिन रही हे।

 

माड़ो धरबो डाल रे दउरा, माड़ो धरबो अच्छत चंदन,

अरे कोहवर में धीया के सोहाग धरबो , धीया मोरी सोहागिन रही हे

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2 – कवन लाल के धीअवा सोहाग मांगन आए

 

कथी केरा डलवा कथी केरा कालिया,

अरे अब कहाँ चलेलु अरे अब कहाँ चलेलु,

कवन लाल के धीअवा सोहाग मांगन आए।

 

सोने केरा डलवा रुपे केरा कालिया,

अरे अब कहाँ चलेलु अरे अब कहाँ चलेलु,

कवन लाल के धीअवा सोहाग मांगन आए।

 

हम तजे चलीला महादेव के टोलवा,

अरे अपनी सोहाग गऊरा अपनी सोहाग गऊरा,

हमरा के दिही सोहाग मांगन आए।

 

सब के देबो मैं पात पुरिये सोहगवा,

अरे अपना कवन बेटी अरे अपना कवन बेटी के,

अंचरा भराई सोहाग मांगन आए।

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3 – सोहाग मांगन चली बेटी दादा दरबार

 

मोती झालर मोती झालर मोती झालर,

सोहाग मांगन चली बेटी दादा दरबार,

दादी देहु ना सोहाग, वारी भोरी के सोहाग , नैहरवाली के सोहाग।

 

देबो बेटी देबो बेटी बाजन बजाए ,

सजन हंकारी लेहुना कवन बेटी अंचरा पसार,

बारी भोरी के सोहाग, नैहरवाली के सोहाग।

 

झील मोरा अंचरा झारिये झूरी जाए ,

लेहुना कवन दुलहा पटुका पसार,

बारी भोरी के सोहाग, नैहरवाली के सोहाग।

 

झील मोरा पटुका झारिये झूरी जाए

लेहुना कवन समधी वरधी लदाए,

मोरी धिया के सोहाग , बारी भोरी के सोहाग।

हरदी के भोजपुरी लोकगीत

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1 – सोने के कटोरवा में कांच हरदिया

सोने के कटोरवा में कांच हरदिया,

सोने के कटोरवा में कांच हरदिया।

हजमा मड़उआ धइले ठाढ़ ए।।

हरदी चढावेले बेटी के बाबा,

हरदी चढावेले बेटी के बाबा।

जै जै बोली सभ लोग ए।।

सोने के कटोरवा में कांच हरदिया,

सोने के कटोरवा में कांच हरदिया।

हजमा मड़उआ धइले ठाढ़ ए।।

हरदी चढावेले बेटी के चाचा,

हरदी चढावेले बेटी के चाचा।

जै जै बोली सभ लोग ए।।

सोने के कटोरवा में कांच हरदिया,

सोने के कटोरवा में कांच हरदिया।

हजमा मड़उआ धइले ठाढ़ ए।।

हरदी चढावेले बेटी के भईया,

हरदी चढावेले बेटी के भईया।

जै जै करी सभ लोग

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2 – अम्मा लहे लहे

सोने के कटोरवा में पिसल हरदीया, अम्मा लहे लहे
हरदी चढ़ावे  चटकार अम्मा लहे लहे।
सोने के कटोरवा में पिसल हरदीया, अम्मा लहे लहे
हरदी चढ़ावे  चटकार अम्मा लहे लहे
आज शुभ दिनवा के, सोनवा लुटावे अम्मा लहे लहे।
बचवा के चूमे ली लिलार अम्मा लहे लहे 
हरदी चढ़ावे  चटकार अम्मा लहे लहे।
ह़रदी चढ़ावे  भौजी, मटकी जे मारे भौजी,
आज शुभ दिनवा के, सोनवा लुटावे भौजी,
देवर से लेवे ली लहार भौजी लहे लहे।
हरदी चढ़ावे  चटकार भौजी लहे लहे।
ह़रदी चढ़ावे बहिनी, मुस्की जे मारे बहिनी,
आज शुभ दिनवा के, सोनवा लुटावे बहिनी,
चमकेला सोरहो सिंगार बहिनी लहे लहे।
हरदी चढ़ावे  चटकार बहिनी लहे लहे।
सोने के कटोरवा में पिसल, हरदीया  अम्मा लहे लहे
हरदी चढ़ावे  चटकार अम्मा लहे लहे।
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3 – गाडल रुपया निकाल हो

गाडल रुपया निकाल हो कवन पापा,
निकाल हो कवन पापा,
तब अइह हरदी लगावे सिया राम जी हो। 
आपन चोरिका निकाल हो कवन भैया
निकाल हो कवन भैया,
तब अइह हरदी लगावे सिया राम जी हो। 
गाडल रुपया निकाल हो कवन चाचा
निकाल हो कवन चाचा,
तब अइह हरदी लगावे सिया राम जी हो। 
पुछेलन कवन पापा कवन अम्मा से बात जी,
कइसे कइसे चढी हमरा बाबू के हरदीया जी,
सिरवा रुमाल धरी हथवा में पलो जी
वैसे वैसे चढी हमरा बाबू के हरदीया जी।  
पुछेलन कवन चाचा कवन चाची से बात जी,
कइसे कइसे चढी हमरा बाबू के हरदीया जी,
सिरवा रुमाल धरी हथवा में पलो जी
वैसे वैसे चढी हमरा बाबू के हरदीया जी।

तिलक के भोजपुरी लोकगीत

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1- आजु जनकपुर से तिलक आयो

 

आजु जनकपुर से तिलक आयो

तिलक लेहु ना चढ़ाई ए माई

आजु जनकपुर से तिलक आयो

तिलक लेहु ना चढ़ाई ए माई

तड़पी के बोले ले बाबा हो कवन बाबा,

तिलक है बड़ा थोर ए माई

आजु जनकपुर से तिलक आयो

तिलक लेहु ना चढ़ाई ए माई

तिलक हटाबहु जल्दी उठाबहु

मोरे बाबू रही हे कुआर माई

आजु जनकपुर से तिलक आयो

तिलक लेहु ना चढ़ाई ए माई

आजु जनकपुर से तिलक आयो

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2-ठाडी  कौशल्या माई तिलक निरेखेली

 

ठाडी  कौशल्या माई तिलक निरेखेली तिलक लायो बडा थोर जी,
एजी बरतन लयो बडा थोर जी।
अइसन बस्तर हम पंडितजी के दिहनी बाबू के वेद पढाई जी,
अइसन पिंताबर हम पंडितजी के दिहनी बाबू के वेद पढाई जी।
ठाडी  कौशल्या माई तिलक निरेखेली तिलक लायो बडा थोर जी,
एजी बरतन लयो बडा थोर जी।
अइसन परात हम धोबीया के दिहनी बाबू के बस्त्र धोवाई जी,
अइसन कठवत हम नउवा के दिहनी बाबू के बार कटाई जी।
ठाडी  कौशल्या माई तिलक निरेखेली तिलक लायो बडा थोर जी,
एजी बरतन लयो बडा थोर जी।
अइसन लोटवा हम धोबीया के दिहनी बाबू के नहवाई जी,
अइसन लोटवा हम नउवा के दिहनी बाबू के नहवाई जी।
ठाडी  कौशल्या माई तिलक निरेखेली तिलक लायो बडा थोर जी,
एजी बरतन लयो बडा थोर जी।