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Thursday, March 19, 2026
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जेठ बइसखवा के पुरइन लहर-लहर करे

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जेठ बइसखवा के पुरइन लहर-लहर करे

 

जेठ बइसखवा के पुरइन लहर-लहर करे,
ताहि कोखी धिअवा जनमली त पुरुख बेपछ परले ए। (बेपछ=विपक्ष)

मइले ओढ़न, मइले डासन, कोदो चउरा पंथ भइले,
रेंडवा के जरेला पसंगिया, निनरियो नाहि आवेले ए।

लाले ओढ़न, लाल डासन, बसमती चउरा पंथ भइले,
चनन के जरेला पसंगिया, निनरिया बलु आवेले ए।

सासु के देबऽ रेडिय तेल, ननद के तिसिए तेल,
गोतिन के देबऽ फुलेल तेल, हम गोतिन पाइंच ए।

सासु जे आवेली गावत, ननद बजावत हे,
गोतिन आवेली बिसमाधम मुदइया मोरे जनमऽलन,

सासु के डासबऽ खटिअवा, ननद के मचिअवा नू ए।
गोतिन के लाली पलंगिया हम गोतिन पाइंचए

सोने के खरउआ राजा रामचन्द्र खुटुर-खुटुर चले नु ए

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सोने के खरउआ राजा रामचन्द्र खुटुर-खुटुर चले नु ए

 

सोने के खरउआ राजा रामचन्द्र खुटुर-खुटुर चले नु ए।
चली गइले आमा के बोलावे-

चलहु ए आमा चलहु मोरा अंगना चलहु ए,
मोर धनि बेदने-बेआकुल झँझिरिया धइले लोटेली हे।

नाहीं जाइब ए बबुआ नाहीं जाइब, तहरा अँगनवाँ नाहीं जाइब हे,
तहरा धनि बोलेली बिरहिया, सहल नाहीं जाला नु ए।

चलहु ए मामी चलहु, मोरे अंगना चलहु हे
मोर धनि बेदने-बेआकुल झंझरिया धरी लोटेली हे।

नाहीं जाइब ए बबुआ नाहीं जाइब, तोर धनि बोलेली
बिरही कड़कवा, मोरे हिया लागेला हे।

महतारी, भाभी के बाद बहिन के पास गए और फिर अन्त में –

लोटहु ए धनि लोटहु झंझरिया धरी लोटहु ए।
आमा के बोलेलू बिरहिया सहल नाहीं जाला नु ए।
बहिन , भाभी… के बोलेलू बिरहिया सहल नाहीं जाला नु ए।

नउजी अइहें सासु, नउजी अइहें ननदो, नउजी अइहें गोतिन, नउजी अइहें हो   (नउजी=चाहे न)प्रभुजी ओढ़ि लेब ललका रजइया सउरिया हमी लिपबऽ नु ए। (ललका रजइया=कफन)

घरी रात बितले पहर रात, अउरी छने रात हे
ललना अधेराती होरिला जनमले, महलिया उठे सोहर ए
मोरा पिछुअरवा बजनिया भैया, भैया धीरे-धीरे बजवा बजइह,
ननदवा जनि जानस हे।

ललना सुनि लहली लउरी ननदिया, बेसरिया हम बधइया लेब हे, (लउरी=छोटी)
सभवा बइठल बाबा बानी, सरब गुन आगर बानी हे, (बेसरिया=नकबेसर, नाक का एक आभूषण)
भउजो के भइले नन्दलाल, बेसरिया हम बधइया लेब हे।

उहवाँ से बाबा उठि आवे ले, अंगना में ठारा भइले हे
बबुआ देइ घालऽ नाक के बेसरिया दुलारी धिअवा पाहुन हे। (फुफुतिया=फांड)
नाक में से कढ़ली बेसरिया फुफुतिया में चोरावेली हे
इहे बेसरिया हमके बाबा दहले, बधइया तोहके नाहीं देब हे।

बबुआ बइठले नहाए त सासु निरेखेली ए

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बबुआ बइठले नहाए त सासु निरेखेली ए

 

बबुआ बइठले नहाए त सासु निरेखेली ए,
ललना कवना चेली के लोभवलु त,
गरभ रहि जाले नू ए।

पुत मोरे बसेले अयोध्या, पतोहिया गजओबर ए,
ए सासु भंवरा सरीखे प्रभु अइले,
गरभ रहि जाले नू ए।

मोरे पिछुअरवा पटेहरवा भइया, तूहू मोरे हितवा नू ए,
बिनी द ना रेशमऽ के जलिया त,
छैला के भोराइवि हे।

बिनि देहले रेशमऽ के जलिया, रेशम-डोरिया लगाई देहले ए
लेहि जाहु रेशम के जलिया, छैला के भोरावऽहु ए ।

सुतल बाड़ू कि जागलऽ सासु,
चिन्ही लऽ आपनऽ पुतवा अछरंगवा मत लगावऽहु ए।

(अछरंग=दोष)

अंगना में कुइयाँ खोनाइले, पीयर माटी नू ए

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अंगना में कुइयाँ खोनाइले, पीयर माटी नू ए,
ए ललना जाहिरे जगवहु कवन देवा, नाती जनम लिहले हो।
नाती जनमले त भल भइले, अब वंस बाढ़हू ए।
ए ललना देह घालऽ सोने के हँसुअवा,
बाबू के नार काटहु ए।
ए ललना देइ घालऽ सोने के खपड़वा,
बाबू के नहवाईवि ए।
ए ललना जाहि रे जगवहु कवन देवा,
नाती जनम लिहले ए ।
नाती जनमले त भल भइले, अब वंस बाढ़हु ए ।
ए ललना देई घालऽ रेशमऽ के कपड़वा,
जे बाबू के पेनहाइवि ए ।

मिली जुली गावे के बधैया, बधैया गाव सोहर हो

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मिली जुली गावे के बधैया, बधैया गाव सोहर हो

 

मिली जुली गावे के बधइया, बधइया गाव सोहर हो
आज क्रिशन के होइहे जनमवा, जगत गाई सोहर हो॥
नन्द बाबा देवे धेनू गैया लुटावे धन यशोदा मैया हो
यहवा घर घर बाजता बधैया, महलिया उठे सोहर हो॥

जुग जुग जियसु ललनवा

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जुग जुग जियसु ललनवा

 

जुग जुग जियसु ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो
ललना लाल होइहे, कुलवा के दीपक मनवा में आस लागल हो॥

आज के दिनवा सुहावन, रतिया लुभावन हो,
ललना दिदिया के होरिला जनमले, होरिलवा बडा सुन्दर हो॥

नकिया त हवे जैसे बाबुजी के,अंखिया ह माई के हो
ललन मुहवा ह चनवा सुरुजवा त सगरो अन्जोर भइले हो॥

सासु सुहागिन बड भागिन, अन धन लुटावेली हो
ललना दुअरा पे बाजेला बधइया, अन्गनवा उठे सोहर हो॥

नाची नाची गावेली बहिनिया, ललन के खेलावेली हो
ललना हंसी हंसी टिहुकी चलावेली, रस बरसावेली हो॥

जुग जुग जियसु ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो
ललना लाल होइहे, कुलवा के दीपक मनवा में आस लागल हो॥

अर्जुन अवॉर्ड मिलने की खुशी, पर सरकारी नौकरी का आज भी इंतजार – सविता पूनिया

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savita punia biography hindi

कुछ ही दिनों पहले राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित भारतीय हॉकी की गोलकीपर सविता पुनिया के गोलकीपर बनने  की कहानी बड़ी दिलचस्प है . सविता पुनिया ने दादाजी की जिद पर परिवार से दूर रहकर हॉकी खेलना शुरू किया . सविता पुनिया के परिवार की आर्थिक हालत इतनी ख़राब थी की  गोलकीपिंग के लिए सेफ्टी किट खरीदने के लिए उनके पिता को अपने एक रिश्तेदार से पैसे उधार लेने पड़े . सविता ने अपने परिवार को कभी गलत साबित नहीं होने दिया और उसने न सिर्फ अपने राज्य का बल्कि अपने देश का भी नाम रोशन किया . लेकिन दुःख की बात है की 10 साल तक भारतीय हॉकी टीम के साथ खेलने के बाद भी अभी तक उन्हें  नौकरी का आश्वाशन ही मिल रहा है .

SAVITA PUNIA BIOGRAPHY IN HINDI

 सविता पुनिया का जीवन परिचय 

सविता पुनिया का जन्म 11 जून 1990 को हरियाणा के एक छोटे से गाँव में हुआ था . बात 2004 की है जब उनके दादाजी रंजित पुनिया पहली बार दिल्ली गए . वहां उन्हें एक रिश्तेदार के साथ हॉकी मैच देखने का अवसर मिला . हॉकी मैच देखकर उन्हें इतना मजा आया की उन्होंने सोचा की काश ! मेरा भी कोई बच्चा हॉकी का खिलाडी होता . कुछ दिन बाद दादाजी दिल्ली से वापस गांव आए। लेकिन उनके मन में हॉकी मैच के रोमांचकारी पल अब भी ताजा थे। कुछ लोगों से इस बारे में चर्चा की, तो पता चला कि लड़के ही नहीं, लड़कियां भी हॉकी खेलती हैं। उस समय सविता छह साल की थीं। दादाजी ने तय किया कि उनकी पोती हॉकी खेलेगी। पापा ने भी दादाजी की बात मान ली।

हॉकी की ट्रेनिंग के लिए स्कूल में हुआ दाखिला 

हॉकी की ट्रेनिंग गांव में रहकर संभव नहीं थी,इसलिए सविता का दाखिला  सिरसा के महाराजा अग्रसेन बालिका स्कूल में  कराया गया। दरअसल इस स्कूल में खेल की बेहतरीन सुविधाएं थीं, इसलिए दादाजी को लगा कि यहां पढ़ने से पोती को खेल में जाने का मौका मिलेगा। तब वह कक्षा छह की छात्रा थीं। स्कूल गांव से करीब दो घंटे की दूरी पर था। स्कूल में हॉस्टल की सुविधा थी। इसलिए सविता को हॉस्टल में डाल दिया गया .पापा ने सविता से वादा किया कि वह अक्सर उनसे मिलने आया करेंगे।

माँ की बहुत याद आती थी 

शुरुआत में सविता का  स्कूल में बिल्कुल मन नहीं लगता था। मां की बड़ी याद आती थी। वह कोई न कोई बहाना बनाकर घर आ जाती थीं। जब वापस जाने का वक्त आता, तो आंखों में आंसू भरकर मां से कहतीं, मैं नहीं जाऊंगी तुम्हें छोड़कर। मां लीलावती भी भावुक होकर पति और ससुर को समझाने की कोशिश करतीं कि बेटी को हॉस्टल न भेजा जाए। पर पापा मोहिंदर बेटी को समझा-बुझाकर वापस भेज देते। शुरुआत के एक साल यूं ही बीत गए। ज्यादातर समय फिटनेस दुरुस्त करने में बीता।

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उधार लेकर दिया सेफ्टी किट 

सविता  की उस समय लम्बाई  तीन फीट आठ इंच थी और वो क्लास में सबसे लम्बी भी थी । साथ ही उनके अंदर गजब की एकाग्रता भी थी, जो विपक्षी टीम के मूवमेंट को समझने के लिए बहुत जरूरी है। कोच सुंदर सिंह को लगा कि इस लड़की को गोलकीपर बनाया जा सकता है। गोलकीपिंग की ट्रेनिंग शुरू हुई। सविता का प्रदर्शन वाकई बढ़िया रहा। कोच के कहने पर पापा उनके लिए रक्षक किट लेकर आए। इसकी कीमत थी करीब 20,000 रुपये। इसके लिए पापा को एक रिश्तेदार से उधार लेना पड़ा। पर वह बहुत खुश थे। उनका एक ही सपना था कि बेटी बेहतरीन गोलकीपर बने।

सविता कहती हैं-

पापा ने किट के लिए रुपये उधार लिए, तो मुझे लगा कि मैं कितनी भाग्यशाली हूं, मेरे घरवाले मुझे खिलाड़ी बनाना चाहते हैं, जबकि गांव की लड़कियों को घर से बाहर निकलने की भी इजाजत नहीं थी।

लक्ष्य को लेकर बेहद गंभीर 

अब सविता अपने लक्ष्य को लेकर बेहद गंभीर  थी । उसका एक ही लक्ष्य था, बेहतरीन गोलकीपर बनना। स्कूल टीम में उनका प्रदर्शन शानदार  रहा। उसने  बहुत मेहनत किये और घर जाना बंद कर दिया । 18 साल की उम्र में उन्हें नेशनल टीम में जगह मिली। 2009 में जूनियर एशिया कप में कांस्य पदक मिला। दादाजी की खुशी का ठिकाना नहीं था।

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सविता कहती हैं-

दादाजी पढ़े-लिखे नहीं थे, पर मेरे बारे में खबरें पढ़ने के लिए उन्होंने पढ़ना सीखा। एक बार जब मैं टूर्नामेंट से घर लौटी, तो दादाजी ने अखबार दिखाते हुए कहा, देखो इसमें तुम्हारी तारीफ छपी है। उनका उत्साह देखकर मैं रो पड़ी।

आर्थिक हालत अभी भी नहीं सुधरे 

अब सविता मशहूर हो चुकी थीं और  गांव में उनके परिवार का सम्मान बढ़ गया। लेकिन  घर के आर्थिक हालात अभी भी पहले जैसे ही थे । पापा दवा की दुकान में काम करते थे। मुश्किल से घर के खर्चे पूरे हो पाते थे। सविता के पास आय का कोई जरिया नहीं था।

बीमार माँ ने कभी भी सविता को नहीं रोका

मां बीमार हो तो अमूमन लड़कियों को घर का काम संभालने की नसीहत दी जाती है। लेकिन  जब सविता ने खेलना शुरू किया तो उनकी  मां को लीलावती देवी को गठिया हो गया था। घर में  दिक्कत थी कि काम कौन करे?  सविता  हॉकी खेलती थी और उनकी  मां कतई नहीं चाहती थी की वह घर के काम में उलझ कर रह जाये । उन्होंने सविता को  हॉकी खेलने के लिए बाहर भेज दिया।

सविता कहती हैं-

मुझे अपनी जरूरतों के लिए पापा से पैसे मांगने पड़ते थे। मैं जब भी मेडल जीतकर आती थी, मां एक ही सवाल करतीं- अब तो तुझे नौकरी मिल जाएगी न? यह सुनकर दुख होता था।

दादाजी हरपल मेरे साथ है 

2013 में उन्हें बड़ी कामयाबी मिली, जब भारतीय टीम को वुमेन एशिया कप में कांस्य पदक मिला। उस दौरान गोलकीपर सविता सुर्खियों में छाई रहीं। जापान में हॉकी वल्र्ड लीग में भी उनका प्रदर्शन शानदार रहा। 2015 में उन्हें बलजीत सिंह गोलकीपर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इस मौके पर दादा नहीं थे। सविता बताती हैं- 2013 में दादाजी हमें छोड़कर चले गए। पर मुझे लगता है कि वह हर पल मेरे साथ हैं और मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं।

 

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2017 महिला एशिया कप के फाइनल यादगार 

सविता कहती हैं, ‘मेरे लिए मेरे अतर्राष्ट्रीय करियर में भारत को 2017 में जापान में महिला एशिया कप के फाइनल में चीन के खिलाफ शूटआउट में शानदार बचाव कर खिताब जिताना हमेशा याद रहेगा। साथ ही भारत को 2016 के रियो ओलंपिक के लिए क्वॉलिफाई कराने में योगदान करना भी याद रहेगा। हम भले ही जापान से जकार्ता में एशियाई खेलों के फाइनल में महज एक गोल से हार कर स्वर्ण पदक जीतने से चूक गए लेकिन हमारी टीम ने पिछले करीब एक डेढ़ बरस से लगातार बेहतरीन प्रदर्शन किया।

अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित 

एक तरफ सविता मेडल पर मेडल जीत रही थी तो दुसरे तरफ गाँव के कुछ लोग सविता के पापा को सलाह दे रहे थे की बहुत हो गया खेल कूद अब इसकी शादी करा दो कयोंकि मेडल जितने से पेट नहीं भरता . पर पापा ने बेटी का मनोबल नहीं गिरने दिया। एशियाड खेलों में  भारतीय महिला हॉकी टीम ने रजत पदक जीता। इसके बाद  अर्जुन पुरस्कार के लिए सविता के नाम की  सिफारिश की गई। भारत की 28 बरस की बेहतरीन और मुस्तैद ओलंपिक हॉकी गोलरक्षक सविता पूनिया कहती हैं वह खुशकिस्मत हैं कि उन्होंने पहले ही बार अर्जुन अवॉर्ड के लिए आवेदन किया और यह अवॉर्ड मिल गया। अब अर्जुन पुरस्कार के बाद तो मुझे लगता है कि 4-5 साल तक कोई मेरी शादी की बात नहीं करेगा ।’

हरियाणा सरकार से नौ साल से मिल रहा नौकरी का आश्वासन

भारतीय हॉकी टीम की उपकप्तान सविता पूनिया ने अर्जुन अवॉर्ड के लिए नवाजे पर कहा, ‘मुझे अर्जुन अवॉर्ड अपनी पूरी भारतीय टीम की 18 लड़कियों, पूरे स्पोर्ट स्टाफ और परिवार से मिले सहयोग के कारण ही मिल पाया है। हॉकी दरअसल टीम गेम है। हॉकी में बिना पूरी टीम के सहयोग से किसी भी टीम की कामयाबी और जीत मुमकिन नहीं है। मैंने हॉकी में आज अर्जुन अवॉर्ड सहित जो कुछ भी पाया पूरी टीम के सहयोग के कारण ही पाया। मेरी हॉकी में कामयाबी में परिवार के समर्थन का बेहद अहम योगदान है। हरियाणा सरकार से मैं पिछले नौ बरस से नौकरी की गुहार कर रही हूं लेकिन मुझे केवल आश्वासन मिला लेकिन नौकरी नहीं।’

उम्मीद है जल्द ही नौकरी का इंतजार ख़त्म हो जायेगा

बेरोजगारी से परेशान रहीं सविता ने यह भी बताया कि खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने एशियन गेम्स में सिल्वर मेडल जीतकर टीम के लौटने के बाद उन्हें व्यक्तिगत रूप से नौकरी दिलाने का आश्वासन दिया है। पिछले 10 साल से भारतीय सीनियर टीम के साथ खेल रहीं गोलकीपर ने कहा, ‘एशियाड से लौटने के बाद राठौड़ सर ने खुद एक समारोह में मिलने पर मुझे बुलाकर नौकरी का आश्वासन दिया। मुझे उम्मीद है कि 9 साल का मेरा इंतजार अब खत्म हो जाएगा और पूरा ध्यान खेल पर लगा सकूंगी।’

अखबार में सबसे नीचे बने चार रंगीन बिंदुओं का मतलब जानिये

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हम रोजाना अपनी जिंदगी में कई ऐसी छोटी छोटी चीजो को बार बार देखते है जिसे हम नजरंदाज कर देते है . अख़बार तो रोज सभी अपने घरो में पढ़ते ही होंगे लेकिन शायद ही किसी ने अख़बार पढ़ते समय अख़बार पर बने चार रंगीन बिन्दुओ पर ध्यान दिया होगा | किसी ने ध्यान दिया भी होगा तो सोचा भी नहीं होगा की इसका भी कुछ मतलब होता होगा | तो दोस्तों आज हम इस पोस्ट में आपको बताएँगे की अख़बार पर बने इन बिन्दुओ का मतलब क्या होता है

रंगीन बिंदुओँ की लाइन का मतलब

हर अखबार में सबसे नीचे चार रंगों की बिंदुएं एक लाइन में बनी होती हैं. चार रंगों की बिंदुओं की ये लाइन किसी रोड ट्रैफिक की बिंदुओं की तरह नहीं होती हैं जिन्हें खबरों के बारे में कुछ बताना हो लेकिन आखिर इसका क्या मतलब होता है.

इंद्रधनुष में भी होता है रंगों का एक निश्चित क्रम

आपने इंद्रधनुष भी देखा ही होगा जिसमें सात रंग होते हैं और उनका एक निश्चित क्रम भी होता है . लेकिन अखबार के नीचे बने इन चार रंगों की लाइन का कुछ मतलब जरूर होता ही होगा.

मुख्य रंगों का होता है एक क्रम

आपने कहीं ना कहीं सुना या पढ़ा ही होगा कि रंग मुख्यत: तीन ही होते हैं जो लाल, पीला, नीला होते हैं. मुख्य रंगों का यही क्रम प्रिंटर में भी काम करता है और इसके साथ ही एक और रंग काला जुड़ जाता है.

प्रिंटर में भी रंगीन बिंदुओं का होता है एक क्रम

लाल, पीला, नीला और काला रंग अखबार में CMYK के क्रम में होते हैं. सबसे पहले C से Cyan जो कि नीला, M से Magenta जो कि गुलाबी रंग होता है और फिर इसके बाद पीला और गुलाबी रंग आता है. कोई भी इमेज प्रिंटर द्वारा प्रिंट किया जाता है तो वो इन्ही चारो रनों के निश्चित अनुपात में मिलाने से बनता है . अगर आप अख़बार में कोई इमेज देखते है और वह धुंधला या सही से नहीं दीखता है तो इसका कारण है की प्रिंटर के मुख्य रंग CMYK एक लाइन में प्रिंट नहीं हुए है .

प्रिंटिंग की क्वालिटी चेक करने के लिए होता है उपयोग 

रोज इतनी मात्रा में अख़बार छापते है की हर अख़बार की इमेज चेक करना आसान नहीं है इसलिए अख़बार छपने वाले अख़बार के निचे में इन चार रंगों के डॉट या रजिस्ट्रेशन मार्क छोड़ देते है जिससे उन्हें आसानी होती है की ये चारो रंग अख़बार में सही से एकदूसरे के ऊपर प्रिंट हुए है की नहीं .

बुक प्रिंटिंग में भी इसी तरह होती है 

यह विधि किताब छापते समय भी अपनाई जाती है लेकिन ये डॉट किताब की BINDING करते समय हटा दी जाती है . तो अगर अगली बार अख़बार पढ़ते समय आपको उस पर छपी फोटो साफ नहीं दिखे तो अख़बार के निचे छपे इन चार बिन्दुओ को जरुर देखे की वे एक लाइन में प्रिंट हुए है या नहीं .

अश्वेत होने से कुछ फर्क नहीं पड़ता – नाओमी ओसाका

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दोस्तों आज हम एक ऐसे अश्वेत लड़की की प्रेरणादायक कहानी सुनाने जा रहे है जिसने ये साबित करके दिखाया की अगर आपमें इच्छाशक्ति है तो अश्वेत होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है . अश्वेत पिता की संतान होने के कारण कई बार इन्हे नस्लभेदी टिप्पणी भी झेलनी पड़ी . हम बात कर रहे है जापान की नाओमी ओसका के बारे में जिसने युएस ओपन में अपनी आदर्श सेरेना विलियम्स को हराकर  ग्रैंडस्लैम  जितने वाली जापान की पहली महिला खिलाडी बन गयी .

NAOMI OSAKA BIOGRAPHY IN HINDI (नाओमी ओसका जीवन परिचय )

Naomi-Osaka (1)

नाओमी ओसका को  बचपन से ही अपनी पहचान को लेकर भेदभाव का सामना करना पड़ा . नाओमी ओसका  के पिता कैरेबियाई देश हैती के थे और मां जापान की। अश्वेत पिता की संतान होने के कारण उन्हें बचपन से ही कष्ट उठाने पड़े और अपनी पहचान छुपाकर रखनी पड़ी । नाना-नानी उनके पिता को पसंद नहीं करते थे। जिसके कारण  परिवारिक रिश्तों में तनाव का असर उन पर भी पड़ा।

माता पिता की दिलचस्प प्रेम कहानी 

नाओमी के माता-पिता की प्रेम कहानी काफी दिलचस्प है। उनके पिताका नाम लियोनार्ड सान है जिसका जन्म करेबियाई देश हैती में हुआ। उच्च शिक्षा के लिए वह अमेरिका गए। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से उन्होंने मास्टर्स की डिग्री हासिल की। इसके बाद वह पढ़ाई के सिलसिले में ही कुछ समय के लिए जापान में रहे। वहीं पर उनकी मुलाकात तमाकी ओसाका नाम की जापानी लड़की से हुई। पहली ही मुलाकात में उनमें अच्छी दोस्ती हो गई।

अश्वेत लड़के से शादी मंजूर नहीं  

जल्द ही उनकी दोस्ती प्यार में बदल गई। वे एक-दूसरे से बेइंतिहा प्यार करने लगे। वे एक-दूजे से शादी कर  जिंदगी गुजारना चाहते थे। हालांकि तमाकी जानती थीं कि उनके घरवालों इस रिश्ते को कभी मंजूर नहीं करेंगे। जब उनके पिता को पता चला कि बेटी एक अश्वेत लड़के से प्यार करती है, तो वह भड़क गए। उनके समाज में ऐसे रिश्ते के लिए कोई जगह नहीं थी। तमाकी की मां भी परेशान हो गईं। उन्हें लगा कि अगर लोगों को पता चला कि इनकी बेटी ने अश्वेत लड़के से शादी की है, तो बहुत बदनामी होगी। उनलोगों की शादी के बाद वह इतनी नाराज हुईं कि बेटी से रिश्ता ही तोड़ लिया। दस साल तक उन्होंने बेटी-दामाद से बात नहीं की।

छुपानी पड़ी अपनी पहचान

तमाकी ओसाका को अश्वेत पति के साथ जापान में रहना आसान नहीं था । एक तरफ माता-पिता नाराज थे तो दूसरी तरफ समाज में नस्ली भेदभाव का दंश। इसलिए उन्होंने अपनी पहली बेटी का नाम मारी ओसाका रखा। दरअसल, वह जानती थीं कि जापान में हैती का उपनाम स्वीकार नहीं होगा। मारी के बाद नाओमी का जन्म हुआ। मां ने अपनी दोनों बेटियों को अपना ओसाका उपनाम दिया, ताकि आगे उन्हें अपनी पहचान को लेकर कोई संकट न झेलना पड़े।

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नाओमी के पिता को था टेनिस से लगाव 

मारी और नाओमी के जन्म के बाद उनके पिता को अमेरिका में नौकरी मिल गई। तब नाओमी तीन साल की थीं। यह साल 2000 की बात है। उन दिनों टेनिस की दुनिया में विलियम सिस्टर्स (सेरेना विलियम और उनकी बहन वीनस विलियम) का जादू छाया हुआ था। नाओमी के पापा को टेनिस बहुत पसंद था। वह अक्सर अपनी बेटियों के साथ टेनिस मैच देखने जाया करते। विलियम सिस्टर्स से तो वह इतने प्रभावित थे कि उन्होंने तय किया कि अपनी बेटियों को टेनिस खिलाड़ी बनाएंगे। बेटियों को टेनिस सिखाने के लिए वह न्यूयॉर्क छोड़ फलोरिडा आकर रहने लगे।

दोनों लडकियों ने शुरू किया टेनिस खेलना  

पहले बड़ी बहन मारी की ट्र्रेंनग शुरू हुई, फिर नाओमी ने खेलना शुरू किया। दोनों ने फ्लोरिडा टेनिस एसबीटी एकेडमी से ट्र्रेंनग ली। जल्द ही वे लोकल मैचों में हिस्सा लेने लगीं। बेटियों को डबल्स खेलते देख पापा बहुत खुश होते थे।

Naomi Osaka v Julia Glushko - Day 4
August 30, 2018 – Naomi Osaka and Julia Glushko shake hands after Osaka won the match at the 2018 US Open.

नाओमी बताती हैं-

मैं अक्सर अपनी बड़ी बहन से हार जाती थी। 15 साल की उम्र तक मैं मारी से हारती रही। इसके बाद मैं जीतने लगी।

होने लगी इस अश्वेत जापानी लड़की की चर्चा 

साल 2014 में 16 साल की उम्र में नाओमी ने यूएस चैंपियन समांथा स्टोसुर को हराया। वह उनकी पहली बड़ी जीत थी। फिर तो वह सुर्खियों में छा गईं। हर तरफ इस अश्वेत जापानी लड़की की चर्चा होने लगी। एक बार फिर वह अपनी पहचान को लेकर असहज महसूस करने लगीं। कोई उन्हें जापानी-अमेरिकी कहता, तो कोई हैतियन-जापानी। नाओमी जानती थीं कि उनके नाना-नानी जापान में हैं, और वे उनसे कोई रिश्ता नहीं रखना चाहते। वह उनकी नाराजगी की वजह समझती थीं।

नाओमी बताती हैं-

अश्वेत होने की वजह से लोग मेरे बारे में भ्रमित हो जाते हैं। उन्हें लगता कि अगर यह लड़की जापानी है, तो अश्वेत क्यों है?

पहला  ग्रैंड स्लेम खिताब जीत पुरे जापान में खलबली मचा दी 

अपनी पहचान के संकट को नजरअंदाज कर वह आगे बढ़ती रहीं। 2016 में नाओमी ‘टोरे पैन पैसिफिक ओपन’ के फाइनल में पहुंचीं। इसके बाद तो उनका नाम वर्ल्ड- 50 रैंकिंग में शामिल हो गया। मार्च 2018 में उन्होंने इंडियन वेल्स टूर्नामेंट में शानदार जीत हासिल की। इस टूर्नामेंट में उन्होंने विश्व की पूर्व नंबर वन खिलाड़ी मारिया शारापोवा को हराया। अब उनका एक ही सपना था, एक बार सेरेना के साथ खेलना। इस सप्ताह यह सपना भी पूरा हुआ। इस बार यूएस ओपन में सेरेना उनके सामने थीं। यह बहुत रोमांचक मैच था। सबको उम्मीद थी कि सेरेना ही ग्रैंड स्लेम जीतेंगी, पर बेहद कड़े मुकाबले में नाओमी ने उन्हें हराकर नया रिकॉर्ड बनाया। वह ग्रैंड स्लेम खिताब जीतने वाली पहली जापानी महिला खिलाड़ी बन गईं।

जापानी प्रधानमंत्री ने भी दी बधाई 

इस जीत पर पूरा जापान झूम उठा। जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने ट्वीट किया, जापान को यह जीत दिलाने के लिए शुक्रिया। आपकी जीत से पूरे जापान को एक नई उर्जा और प्रेरणा मिली है। इस जीत ने नाना-नानी की नाराजगी भी दूर कर दी।

इस मौके पर नाओमी के भावुक नाना टेसुओ ओसाका ने कहा,

मैंने और मेरी पत्नी ने टीवी पर अपनी नातिन का पूरा मैच देखा। उसकी जीत देखकर हम बहुत रोए। अब एक ही ख्वाहिश है, मेरी बच्ची 2020 में टोक्यो में होने वाले ओलंपिक में जीत हासिल करे।

जानिए पद्म विभूषण , पद्म भूषण , पद्म श्री के बिच का अंतर

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जानिए पद्म विभूषण , पद्म भूषण , पद्म श्री के बिच का अंतर

पद्म पुरस्कार देश के सर्वोच्च सम्मानों में से एक है जो भारत सरकार  द्वारा भारतीय नागरिको को असाधरण कार्यों के लिए प्रदान किया जाता है । भारत का सबसे बड़ा नागरिक पुरस्कार भारत रत्न है जिसकी शुरुआत  2 जनवरी 1954 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गयी थी . उस समय किवल जीवित व्यक्ति ही इस पुरस्कार को प्राप्त कर सकते थे पर बाद में इसे मरणोपरांत भी दिया जाने लगा . आज हम आपको बताने जा रहे है भारत के तिन प्रमुख नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण , पद्म भूषण और पद्म श्री के बारे में –

शुरुआत 

पद्म श्रेणी के पुरस्कार की शुरुआत 1954 में की गयी थी . प्रत्येक साल के 26 जनवरी को पद्म पुरस्कार पाने वाले नागरिको की घोषणा की जाती है . हालाँकि 1978 ,1979 और 1993-1997 के बीच किन्ही विशेष कारणों से  पद्म पुरस्कारों का वितरण नहीं किया गया था . पद्म पुरस्कार तिन प्रकार के होते है – पद्म पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री  . पद्म पुरस्कार शासकीय सेवको द्वारा प्रदत सेवा के साथ साथ किसी भी क्षेत्र में असाधारण प्रदर्शन करने वाले व्यक्तियों को दिया जाता है .

कौन करता है सिफारिश 

पद्म पुरस्कारों की सिफारिश राज्य सरकार/संघ राज्य प्रशासन, केन्द्रीय मंत्रालय या विभागों के साथ साथ उत्कृष्ट संस्थानों द्वारा किया जाता है ।  इसके बाद एक समिति इन नामों पर विचार करती है। पुरस्कार समिति जब एक बार सिफारिश कर देती है फिर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और राष्ट्रपति इस पर अपना अनुमोदन देते हैं और इसके बाद गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर इन सम्मानों की घोषणा की जाती है।

पद्म विभूषण

पद्म विभूषण पद्म पुरस्कारों में सर्वोच्च होता है और यह भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है . यह पुरस्कार किसी भी क्षेत्र में असाधारण और उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रदान किया जाता है .  इस सम्मान में पुरस्कार के रूप में  1-3/16 इंच का कांसे का एक बिल्ला मिलता है. जिसके केंद्र में एक कमल का फूल होता है. इसमें सफेद रंग में फूल की पत्तियां होती हैं. इस फूल के ऊपर नीचे पद्म विभूषण देवनागरी लिपि में लिखा होता है. वहीं इस बिल्ले के पिछले हिस्से में अशोक चिन्ह बना होता है.

पद्म भूषण

पद्म भूषण पुरस्कार पद्म पुरस्कारों में दुसरे  स्थान पर आता है . यह भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है . इस सम्मान में भी कांसे का बिल्ला दिया जाता है जो 1-3/16 इंच का होता है। इसमें भी बीच में कमल का फूल बना होता है जिसकी तीन पत्तियां इसे घेरे रहती हैं। इस फूल के ऊपर नीचे पद्मभूषण लिखा रहता है।

पद्म श्री 

पद्म श्री पुरस्कार पद्म पुरस्कारों में तीसरे स्थान पर आता है . यह पुरस्कार भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार होता है . इस पुरस्कार में भी कांसे का एक बिल्ला दिया जाता है जिसके बिच में कमल का फुल बना होता है . इस फुल के ऊपर निचे पद्म श्री लिखा रहता है .

बदलाव 

इस तरह के सम्मानों के लिए पारदर्शिता लाने के प्रयास में साल 2017 में सरकार ने सम्मानों के लिए किये जाने वाली नामांकन प्रक्रिया के नियमो में कुछ बदलाव कर दिए | एक अलग से पोर्टल बनाया गया जिस पर न केवल राज्य सरकार या मंत्रालय या विभाग बल्कि एक आम व्यक्ति भी नामांकन कर सकता है | साथ ही सिफारिश करने वाले को अपना आधार नंबर और दूसरी कई जानकारियां साझा करना अनिवार्य किया गया है | इस पोर्टल के अलावा दूसरे किसी तरीके से कोई सिफारिशें स्वीकार नहीं की जाती है |

पद्म पुरस्कार से जुड़े तथ्य 

  1. एक वर्ष में  प्रदान किए जाने वाले कुल पद्म पुरस्कारों की संख्या (मरणोपरान्त तथा विदेशियों को दिए जाने वाले पुरस्कारों को छोड़कर) 120 से अधिक नहीं होनी चाहिए ।
  2. इस अलंकरण में राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुहर से जारी की गई एक सनद (प्रमाण-पत्र) तथा तमगा (मेडल) शामिल होता है। प्रत्येक पुरस्कार विजेता के संबंध में संक्षिप्त परिचय वाली एक स्मारिका भी समारोह वाले दिन जारी की जाती है।
  3. पुरस्कार प्राप्तकतार्ओं को तमगा (मेडल) के साथ एक प्रीतिकृति  भी प्रदान की जाती है, जिसे वे अपनी इच्छानुसार किसी भी समारोह/राजकीय समारोहों आदि में पहन सकते हैं।
  4. यह पुरस्कार कोई पदवी नहीं है और इसे पत्र-शीर्षों, निमंत्रण पत्रों, पोस्टरों, पुस्तकों आदि पर पुरस्कार वजेता के नाम के आगे या पीछे उल्लिखित नहीं किया जा सकता है। इसके दुरुपयोग करने पर चूककर्ता को इस पुरस्कार से वंचित कर दिया जाएगा।
  5. इन पुरस्कारों के साथ कोई नकद भत्ता अथवा रेल/हवाई यात्रा आदि के रूप में कोई रियायत प्रदान नहीं की जाती है।
  6. पुरस्कार समिति का गठन प्रतिवर्ष प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता है|
  7. नामांकन आमंत्रित करने की तिथि तथा नामांकन/सिफ़ारिश प्राप्त करने की अंतिम तिथि क्रमशः 1 मई तथा 15 सितंबर है। इस अविध के दौरान प्राप्त नामांकनों पर ही विचार किया जाता है।

जिन तरह के क्षेत्रों में पद्म पुरस्कार दिए जाते है वो निम्न है

  • कला के क्षेत्र में जैसे कि संगीत , पेटिंग , फोटोग्राफी आदि |
  • सामाजिक कार्य
  • विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में |
  • व्यापारिक क्षेत्रों में
  • शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र |
  • प्रशासनिक सेवा में |
  • खेल कूद में |
  • और भी बहुत से क्षेत्र |