HINDU YA MUSLIM KE AHSAS KO MAT CHHEDIYE ADAM GONDVI
JASVINDER SANGHERA BIOGRAPHY IN HINDI
जसविंदर संघेरा
(ब्रिटेन में सामजिक कार्यकर्ता )

वह 1950 का दौर था। जसविंदर के पिता काम की तलाश में ब्रिटेन आए और यहीं बस गए। परिवार ब्रिटेन के डर्बी इलाके में रहने लगा। यहीं जसविंदर का जन्म हुआ। मम्मी-पापा को हमेशा अपनी पांच बेटियों की चिंता रहती थी। वे जल्द से जल्द उनकी शादी करके जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थी। बड़ी तीन बेटियों की शादी 14 या 15 साल की उम्र में करा दी गई थी। अब जसविंदर की बारी थी।
HIMMAT AUR JINDAGI-RAMDHARI SINGH DINKAR
रामधारी सिंह दिनकर
जो लोग पाँव भीगने के खौफ से पानी से बचते रहते हैं, समुन्द्र में डूब जाने का ख़तरा उन्ही के लिए है. लहरों में तैरने का जिन्हे अभ्यास है वो मोती ले कर बाहर आयेँगे.
महाभारत में देश के प्रायः अधिकाँश वीर कौरवों के पक्ष में थे. मगर फिर भी जीत पांडवों की हुई; क्योंकि उन्होंने लाक्षागृह की मुसीबत झेली थी, क्योंकि उन्होंने वनवास के जोखिम को पार किया था.
अगर रास्ता आगे ही आगे निकल रहा है तो फिर असली मज़ा तो पाँव बढ़ाते जाने में ही है.
साहसी मनुष्य सपने उधार नहीँ लेता, वह अपने विचारोँ में रमा हुआ अपनी ही किताब पढ़ता है.
झुण्ड मेँ चलना और झुण्ड मेँ चरना, यह भैंस और भेड़ का काम है. सिंह तो बिल्कुल अकेला होने पर भी मगन रहता है.
अर्नाल्ड बेनेट ने एक जगह लिखा है की जो आदमी यह महसूस करता है कि किसी महान निश्चय के समय वह साहस से काम नहीं ले सका, ज़िन्दगी की चुनौती को कबूल नहीं कर सका, वह सुखी नही हो सकता। बड़े मौके पर साहस नहीं दिखाने वाला आदमी बराबर अपनी आत्मा के भीतर एक आवाज़ सुनता रहता है, एक ऐसी आवाज़ जिसे वही सुन सकता है और जिसे वह रोक भी नही सकता। यह आवाज़ उसे बराबर कचोटती रहती है, “तुम साहस नही दिखा सके, तुम कायर की तरह भाग खड़े हुए.”
ज़िन्दगी का भेद कुछ उसे ही मालुम है जो यह जानकार चलता है कि ज़िन्दगी कभी भी ख़त्म न होने वाली चीज़ है.
कामना का आँचल छोटा मत करो, ज़िन्दगी के फल को दोनों हाथों से दबाकर निचोड़ो, रस की निर्झरी तुम्हारे बहाये भी बह सकती है.
ASHA KHEMKA BIOGRAPHY IN HINDI
बिहार से ब्रिटेन तक का सफ़र
(नॉटिंघमशायर कॉलेज की सीईओ और प्रिंसिपल)
पंद्रह साल की उम्र में मेरी शादी हो गई। हमारे मायके में बेटियों को पढ़ाने का रिवाज नहीं था। पति डॉक्टर थे। पच्चीस साल की उम्र में उनके संग ब्रिटेन पहुंची, तो दोबारा पढ़ने का मौका मिला। टीवी देखकर अंग्रेजी सीखी और फिर कॉलेज में पढ़ाने लगी।

उन दिनों आशा 13 साल की थीं। पढ़ाई में खूब मन लगता था उनका। लेकिन एक दिन अचानक उनका स्कूल जाना बंद करवा दिया गया। कहा गया, पढ़कर क्या करोगी?
आशा एक चैरिटेबल ट्रस्ट ‘द इंस्पायर ऐंड अचीव फाउंडेशन’ भी चलाती हैं। इस फाउंडेशन का मकसद 16 से 24 साल के युवाओं को शिक्षा और रोजगार में मदद करना है। हाल में उन्हें ‘एशियन बिजनेस वूमन ऑफ द ईयर’ के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। आशा कहती हैं- ‘मैं बहुत खुश हूं कि ब्रिटेन में मुङो आगे बढ़ने और कुछ कर दिखाने का मौका मिला। मगर मैं अपनी जड़ों को कभी नहीं भूल सकती। मैं बिहार की रहने वाली हूं और मुङो इस बात पर गर्व है।’
साभार – हिंदुस्तान
GINNI MAHI BIOGRAPHY IN HINDI
गिन्नी माही (GINNI MAHI)
मैंने बचपन में दादी से सुना था कि समाज में दलितों के साथ भेदभाव किया जाता था।
हमारे घर में संत रविदास और डॉ भीमराव अंबेडकर से जुड़ी तमाम किताबें थीं।
मम्मी-पापा से मैंने उनके बारे में सुना था।
इसी से मुङो उनके गीत गाने की प्रेरणा मिली।


JHULAN GOSWAMI BIOGRAPHY IN HINDI
मैं क्रिकेटर बनना चाहती थी,
मगर मम्मी-पापा को समझ में नहीं आ रहा था
कि मुङो क्रिकेट में भेजें या नहीं।
मां को मेरा देर-सबेर घर लौटना पसंद नहीं था।
एक दिन मैं मैच के बाद शाम को देर से घर पहुंची,
तो उन्होंने मुङो घंटों घर के बाहर खड़ा रखा।
वह अपने इलाके की सबसे लंबी लड़की थीं। सड़क पर चलतीं, तो लोग पीछे मुड़कर जरूर देखते। पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के छोटे से कस्बे चकदा में पली-बढ़ीं झूलन को बचपन में क्रिकेट का बुखार कुछ यूं चढ़ा कि बस वह जुनून बन गया। एयर इंडिया में नौकरी करने वाले पिता को क्रिकेट में खास दिलचस्पी नहीं थी। हालांकि उन्होंने बेटी को कभी खेलने से नहीं रोका। मगर मां को उनका गली में लड़कों के संग गेंदबाजी करना बिल्कुल पसंद न था।
साभार – हिंदुस्तान अख़बार
CHHOTA JADOOGAR JAYSHANKAR PRASAD
छोटा जादूगर (कहानी )
जयशंकर प्रसाद
उसके मुँह पर तिरस्कार की हँसी फूट पड़ी। उसने कहा, ”तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्य दूँगा। मुझे शरबत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्नता होती!”
कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूँज रहा था। मैं खड़ा था उस छोटे फुहारे के पास, जहाँ एक लड़का चुपचाप शराब पीनेवालों को देख रहा था। उसके गले में फटे कुरते के ऊपर से एक मोटी-सी सूत की रस्सी पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्ते थे। उसके मुँह पर गंभीर विषाद के साथ धैर्य की रेखा थी। मैं उसकी ओर न जाने क्यों आकर्षित हुआ। उसके अभाव में भी संपन्नता थी।
मैंने पूछा, ”क्यों जी, तुमने इसमें क्या देखा?”
”मैंने सब देखा है। यहाँ चूड़ी फेंकते हैं। खिलौनों पर निशाना लगाते हैं। तीर से नंबर छेदते हैं। मुझे तो खिलौनों पर निशाना लगाना अच्छा मालूम हुआ। जादूगर तो बिलकुल निकम्मा है। उससे अच्छा तो ताश का खेल मैं ही दिखा सकता हूँ।” उसने बड़ी प्रगल्भता से कहा। उसकी वाणी में कहीं रूकावट न थी।
मैंने पूछा, ”और उस परदे में क्या है? वहाँ तुम गए थे?”
”नहीं, वहाँ मैं नहीं जा सका। टिकट लगता है।”
मैंने कहा, ”तो चलो, मैं वहाँ पर तुमको लिवा चलूँ।” मैंने मन-ही-मन कहा, ‘भाई! आज के तुम्हीं मित्र रहे।’
उसने कहा, ”वहाँ जाकर क्या कीजिएगा? चलिए, निशाना लगाया जाए।”
मैंने उससे सहमत होकर कहा, ”तो फिर चलो, पहले शरबत पी लिया जाए।” उसने स्वीकार-सूचक सिर हिला दिया।
मनुष्यों की भीड़ से जाड़े की संध्या भी वहाँ गरम हो रही थी। हम दोनों शरबत पीकर निशाना लगाने चले। राह में ही उससे पूछा, ”तुम्हारे घर में और कौन हैं?”
”माँ और बाबूजी।”
”उन्होंने तुमको यहाँ आने के लिए मना नहीं किया?”
”बाबूजी जेल में हैं।”
”क्यों?”
”देश के लिए।” वह गर्व से बोला।
”और तुम्हारी माँ?”
”वह बीमार है।”
”और तुम तमाशा देख रहे हो?”
उसके मुँह पर तिरस्कार की हँसी फूट पड़ी। उसने कहा, ”तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्य दूँगा। मुझे शरबत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्नता होती!”
मैं आश्चर्य से उस तेरह-चौदह वर्ष के लड़के को देखने लगा।
”हाँ, मैं सच कहता हूँ बाबूजी! माँजी बीमार हैं, इसीलिए मैं नहीं गया।”
”कहाँ?”
”जेल में! जब कुछ लोग खेल-तमाशा देखते ही हैं, तो मैं क्यों न दिखाकर माँ की दवा करूँ और अपना पेट भरूँ।”
मैंने दीर्घ नि:श्वास लिया। चारों ओर बिजली के लट्टू नाच रहे थे। मन व्यग्र हो उठा। मैंने उससे कहा, ”अच्छा चलो, निशाना लगाया जाए।”
हम दोनों उस जगह पर पहुँचे जहाँ खिलौने को गेंद से गिराया जाता था। मैंने बारह टिकट खरीदकर उस लड़के को दिए।
वह निकला पक्का निशानेबाज। उसकी कोई गेंद खाली नहीं गई। देखनेवाले दंग रह गए। उसने बारह खिलौनों को बटोर लिया, लेकिन उठाता कैसे? कुछ मेरी रूमाल में बँधे, कुछ जेब में रख लिये गए।
लड़के ने कहा, ”बाबूजी, आपको तमाशा दिखाऊँगा। बाहर आइए, मैं चलता हूँ।” वह नौ-दो ग्यारह हो गया। मैंने मन-ही-मन कहा, ‘इतनी जल्दी आँख बदल गई!”
में घूमकर पान की दुकान पर आ गया। पान खाकर बड़ी देर तक इधर-उधर टहलता-देखता रहा। झूले के पास लोगों का ऊपर-नीचे आना देखने लगा। अकस्मात् किसी ने ऊपर के हिंडोले से पुकारा, ”बाबूजी!”
मैंने पूछा, ”कौन?”
”मैं हूँ छोटा जादूगर।”
कलकत्ते के सुरम्य बोटैनिकल-उद्यान में लाल कमलिनी से भरी हुई एक छोटी-सी झील के किनारे घने वृक्षों की छाया में अपनी मंडली के साथ बैठा हुआ मैं जलपान कर रहा था। बातें हो रही थीं। इतने में वही छोटा जादूगर दिखाई पड़ा। हाथ में चारखाने का खादी का झोला, साफ जाँघिया और आधी बाँहों का कुरता। सिर पर मेरी रूमाल सूत की रस्सी से बँधी हुई थी। मस्तानी चाल में झूमता हुआ आकर वह कहने लगा –
”बाबूजी, नमस्ते! आज कहिए तो खेल दिखाऊँ?”
”नहीं जी, अभी हम लोग जलपान कर रहे हैं।”
”फिर इसके बाद क्या गाना-बजाना होगा, बाबूजी?”
”नहीं जी, तुमको….” क्रोध से मैं कुछ और कहने जा रहा था। श्रीमतीजी ने कहा, ”दिखलाओ जी, तुम तो अच्छे आए। भला, कुछ मन तो बहले।” मैं चुप हो गया, क्योंकि श्रीमतीजी की वाणी में वह माँ की-सी मिठास थी, जिसके सामने किसी भी लड़के को रोका नहीं जा सकता। उसने खेल आरंभ किया।
उस दिन कार्निवल के सब खिलौने उसके खेल में अपना अभिनय करने लगे। भालू मनाने लगा। बिल्ली रूठने लगी। बंदर घुड़कने लगा। गुड़िया का ब्याह हुआ। गुड्डा वर काना निकला। लड़के की वाचालता से ही अभिनय हो रहा था। सब हँसते लोट-पोट हो गए।
मैं सोच रहा था। बालक को आवश्यकता ने कितना शीघ्र चतुर बना दिया। यही तो संसार है।
ताश के सब पत्ते लाल हो गए। फिर सब काले हो गए। गले की सूत की डोरी टुकड़े-टुकड़े होकर जुड़ गई। लट्टू अपने से नाच रहे थे। मैंने कहा, ”अब हो चुका। अपना खेल बटोर लो, हम लोग भी अब जाएँगे।”
श्रीमतीजी ने धीरे से उसे एक रूपया दे दिया। वह उछल उठा।
मैंने कहा, ”लड़के!”
”छोटा जादूगर कहिए। यही मेरा नाम है। इसी से मेरी जीविका है।”
मैं कुछ बोलना ही चाहता था कि श्रीमतीजी ने कहा, ”अच्छा, तुम इस रुपए से क्या करोगे?”
”पहले भरपेट पकौड़ी खाऊँगा। फिर एक सूती कंबल लूँगा।”
मेरा क्रोध अब लौट आया। मैं अपने पर बहुत क्रुद्ध होकर सोचने लगा, ‘ओह! कितना स्वार्थी हूँ मैं। उसके एक रुपया पाने पर मैं ईर्ष्या करने लगा था न!”
वह नमस्कार करके चला गया। हम लोग लता-कुंज देखने के लिए चले।
उस छोटे से बनावटी जंगल में संध्या साँय-साँय करने लगी थी। अस्ताचलगामी सूर्य की अंतिम किरण वृक्षों की पत्तियों से विदाई ले रही थी। एक शांत वातावरण था। हम लोग धीरे-धीरे मोटर से हावड़ा की ओर आ रहे थे।
रह-रहकर छोटा जादूगर स्मरण हो आता था। तभी सचमुच वह एक झोंपड़ी के पास कंबल कंधे पर डाले मिल गया। मैंने मोटर रोककर उससे पूछा, ”तुम यहाँ कहाँ?”
”मेरी माँ यहीं है न! अब उसे अस्पताल वालों ने निकाल दिया है।” मैं उतर गया। उस झोंपड़ी में देखा तो एक स्त्री चिथड़ों से लदी हुई काँप रही थी।
छोटे जादूगर ने कंबल ऊपर से डालकर उसके शरीर से चिमटते हुए कहा, ”माँ!”
मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े।
बड़े दिन की छुट्टी बीत चली थी। मुझे अपने ऑफिस में समय से पहुँचना था। कलकत्ते से मन ऊब गया था। फिर भी चलते-चलते एक बार उस उद्यान को देखने की इच्छा हुई। साथ-ही-साथ जादूगर भी दिखाई पड़ जाता तो और भी…. मैं उस दिन अकेले ही चल पड़ा। जल्द लौट आना था।
दस बज चुके थे। मैंने देखा कि उस निर्मल धूप में सड़क के किनारे एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंगमंच सजा था। मैं मोटर रोककर उतर पड़ा। वहाँ बिल्ली रूठ रही थी। भालू मनाने चला था। ब्याह की तैयारी थी, यह सब होते हुए भी जादूगर की वाणी में वह प्रसन्नता की तरी नहीं थी। जब वह औरों को हँसाने की चेष्टा कर रहा था, तब जैसे स्वयं काँप जाता था। मानो उसके रोएँ रो रहे थे। मैं आश्चर्य से देख रहा था। खेल हो जाने पर पैसा बटोरकर उसने भीड़ में मुझे देखा। वह जैसे क्षण भर के लिए स्फूर्तिमान हो गया। मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए पूछा, ”आज तुम्हारा खेल जमा क्यों नहीं?”
”माँ ने कहा है कि आज तुरंत चले आना। मेरी अंतिम घड़ी समीप है।” अविचल भाव से उसने कहा।
”तब भी तुम खेल दिखलाने चले आए!” मैंने कुछ क्रोध से कहा। मनुष्य के सुख-दु:ख का माप अपना ही साधन तो है। उसके अनुपात से वह तुलना करता है।
उसके मुँह पर वहीं परिचित तिरस्कार की रेखा फूट पड़ी।
उसने कहा, ”क्यों न आता?”
और कुछ अधिक कहने में जैसे वह अपमान का अनुभव कर रहा था।
क्षण भर में मुझे अपनी भूल मालूम हो गई। उसके झोले को गाड़ी में फेंककर उसे भी बैठाते हुए मैंने कहा, ”जल्दी चलो।” मोटरवाला मेरे बताए हुए पथ पर चल पड़ा।
कुछ ही मिनटों में मैं झोंपड़े के पास पहुँचा। जादूगर दौड़कर झोंपड़े में माँ-माँ पुकारते हुए घुसा। मैं भी पीछे था, किंतु स्त्री के मुँह से, ‘बे…’ निकलकर रह गया। उसके दुर्बल हाथ उठकर गिर गए। जादूगर उससे लिपटा रो रहा था। मैं स्तब्ध था। उस उज्ज्वल धूप में समग्र संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नृत्य करने लगा।












