GULABI CHUDIYA-NAGARJUN
TANUSHREE PARIKH-FIRST WOMAN BSF OFFICER
तनुश्री पारीक
(TANUSHREE PARIKH )
राजस्थान में भारत-पाक सीमा पर देश की रखवाली करने वाली बीएसएफ की पहली महिला असिस्टैंट कमांडेंट तनुश्री पारीक उन्हीं महिलाओं में से एक हैं। तनुश्री ने 40 साल के बीएसएफ के इतिहास में पहली महिला असिस्टेंट कमांडेंट बनने का गौरव हासिल किया। वह इस वक्त पाकिस्तान की सीमा से सटे इलाके बाड़मेर में ड्यूटी पर तैनात हैं।
देश में महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुष को न सिर्फ चुनौती दे रही है बल्कि उनसे आगे भी बढ़ रही हैं। राजस्थान में भारत-पाक सीमा पर देश की रखवाली करने वाली बीएसएफ की पहली महिला असिस्टैंट कमांडेंट तनुश्री पारीक उन्हीं महिलाओं में से एक हैं। तनुश्री ने 40 साल के बीएसएफ के इतिहास में पहली महिला असिस्टेंट कमांडेंट बनने का गौरव हासिल किया। वह इस वक्त पाकिस्तान की सीमा से सटे इलाके बाड़मेर में ड्यूटी पर तैनात हैं। अपनी ड्यूटी के साथ ही वह कैमल सफारी के जरिए बीएसएफ एवं वायुसेना के महिला जवानों के साथ नारी सशक्तिकरण एवं बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का संदेश दे रही हैं।
देश की पहली महिला असिस्टेंट कमांडेंट
तनुश्री 2014 बैच की बीएसएफ अधिकारी हैं। 2014 की यूपीएससी की असिस्टैंट कमांडेंट की परीक्षा पास की थी। इसके बाद उन्होंने टेकनपुर स्थित सीमा सुरक्षा बल अकादमी में आयोजित पासिंग आउट परेड में देश की पहली महिला अधिकारी (असिस्टेंट कमांडेंट) के रूप में हिस्सा लिया और 67 अधिकारियों के दीक्षांत समारोह में परेड का नेतृत्व भी किया। इसके लिए उन्हें सम्मानित किया गया। टेकनपुर के बाद तनुश्री ने बीएसएफ अकैडमी के 40वें बैच में 52 हफ्तों की ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद तनुश्री को पंजाब में भारत-पाकिस्तान सीमा पर तैनाती मिली।

दीक्षांत समारोह के दौरान बैच लगाते राजनाथ सिंह
बॉर्डर फिल्म की शूटिंग से मिली प्रेरणा
अभी तनुश्री पंजाब फ्रंटियर में तैनात हैं। उनका कहना है कि उन्होंने नौकरी के लिए नहीं पैशन के लिए बीएसएफ को चुना क्योंकि उन्हें बचपन से ही सेना में जाने की लगन थी। जिस बाड़मेर में आज तनुश्री ड्यूटी कर रही हैं कभी उनके पिता वहां नौकरी करते थे। जब बीकानेर में बॉर्डर फिल्म की शूटिंग हो रही थी तो वह स्कूल जाया करती थीं। उसी फिल्म से तनुश्री को सेना में जाने की प्रेरणा मिली। वह स्कूल और कॉलेज में एनसीसी कैडेट भी रहीं हैं।
लड़कियां सूरज से बचने के लिए सनस्क्रीन लगाना छोड़ें
तनुश्री कहती हैं, ‘मेरा फोर्स में जाना तभी मायने रखेगा, जब दूसरी लड़कियां भी फोर्स ज्वाइन करना शुरू करेंगी।’ उन्होंने कहा कि लड़कियां सूरज से बचने के लिए सनस्क्रीन लगाना छोड़ें, धूप में तपकर खुद को साबित करें।’उन्हें इस बात का बेहद गर्व है कि वे देश की पहली महिला कॉम्बैट ऑफिसर हैं ।
बचाओ-बेटी पढ़ाओ दे रही है संदेश
तनुश्री इस वक्त एक कैमल सफारी का नेतृत्व कर रही हैं जो सीमा से सटे इलाकों में आमजन से रूबरू होने के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और महिला सशक्तिकरण का संदेश दे रही है। यह कैमल सफारी 1368 किमी का सफर तय कर 49 दिन बाद यानी 2 अक्टूबर को वाघा बॉर्डर पहुंचेगी। कैमल सफारी में तनुश्री के साथ एयरफोर्स की लेडी ऑफिसर अयुष्का तोमसभी हैं। वह कहती हैं कि अगर माता-पिता बेटियों को पढ़ाई के साथ काबिल बना देंगे तो फ्यूचर में वे अपने पैरों पर खड़े होने के साथ किसी पर निर्भर नहीं रहेंगी।
SONAL MAN SINGH BIOGRAPHY IN HINDI
सोनल मानसिंह प्रसिद्ध नृत्यांगना
(SONAL MAN SINGH)
यह कहानी एक ऐसे साहसिक लड़की की है जिसने परिस्थितियों आगे अपने घुटने नहीं टेके | जिस लड़की के लिए नृत्य ही जिंदगी थी उसे एक बार लगा की वह कभी नृत्य ही नहीं कर पायेगी | एक दुर्घटना में उसे अपनी रीढ़ की हड्डी गवानी पड़ी और उसके शारीर पर पैरालीसिस का भी खतरा मंडरा रहा था | फिर भी उसने हौसला नहीं हारा और इन सबसे उबर कर कैसे उसने फिर से स्टेज की और रुख किया ,जानिए सोनल मानसिंह की कहानी

घरवाले चाहते थे मै वकील बनू
डांस का बचपन से था शौक
घर से भी भागी
उस दिन को मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकती
मेरी रीढ़ की हड्डी और चार पसलियां टूटी
टॉर्च की रोशनी से मुझे ढूंढा गया
तीन दिनों तक मुझे ‘फोम रबर’ पर रखा
चार किलो प्लास्टर कास्ट में मेरे आधे शरीर को बांध गया
जिंदगी रुक-सी गई
नृत्य न करने के ख्याल से आंखों से नींद गायब हो गई
आशा की एक किरण
फिर से पहुची स्टेज पर
एक बार फिर से मेरी जिंदगी की शुरुआत हुयी
नर हो न निराश करो मन को – मैथिलीशरण गुप्त
नर हो, न निराश करो मन को
मैथिलीशरण गुप्त
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को
संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को
जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को
निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को
प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को
किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को
करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
EK GUDIYA KI KIMAT
गुडिया की कीमत ( प्रेरणादायक कहानी )
एक 6 वर्ष का लडका अपनी 4 वर्ष की छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था।
अचानक से उसे लगा कि, उसकी बहन पीछे रह गयी है।
वह रुका, पीछे मुड़कर देखा तो जाना कि, उसकी बहन एक खिलौने के दुकान के सामने खडी कोई चीज निहार रही है।
लडका पीछे आता है और बहन से पूछता है, “कुछ चाहिये तुम्हें?”
बच्चा उसका हाथ पकडता है, एक जिम्मेदार बडे भाई की तरह अपनी बहन को वह गुड़िया देता है। बहन बहुत खुश हो गयी ।
दुकानदार यह सब देख रहा था, बच्चे का व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित भी हुआ ….
अब वह बच्चा बहन के साथ काउंटर पर आया और दुकानदार से पूछा, “कितनी कीमत है इस गुड़िया की ?”
दुकानदार एक शांत और गहरा व्यक्ति था, उसने जीवन के कई उतार देखे थे, उन्होने बड़े प्यार और अपनत्व से बच्चे से पूछा,
“बताओ बेटे, आप क्या दे सकते हो ??”
बच्चा अपनी जेब से वो सारी सीपें बाहर निकालकर दुकानदार को देता है जो उसने थोड़ी देर पहले बहन के साथ समुंदर किनारे से चुन चुन कर बीनी थी !!!
दुकानदार वो सब लेकर यूँ गिनता है जैसे कोई पैसे गिन रहा हो।
सीपें गिनकर वो बच्चे की तरफ देखने लगा तो बच्चा बोला,”सर कुछ कम हैं क्या ??”
बच्चा बड़ी खुशी से वो सीपें जेब मे रखकर बहन को साथ लेकर चला गया।
यह सब उस दुकान का कामगार देख रहा था, उसने आश्चर्य से मालिक से पूछा, ” मालिक ! इतनी महंगी गुड़िया आपने केवल 4 सीपों के बदले मे दे दी ?”
दुकानदार एक स्मित संतुष्टि वाला हास्य करते हुये बोला,
“हमारे लिये ये केवल सीप है पर उस 6 साल के बच्चे के लिये अतिशय मूल्यवान है और अब इस उम्र में वो नहीं जानता, कि पैसे क्या होते हैं ?
पर जब वह बडा होगा ना…
और जब उसे याद आयेगा कि उसने सीपों के बदले बहन को गुड़िया खरीदकर दी थी, तब उसे मेरी याद जरुर आयेगी, और फिर वह सोचेगा कि,,,,,,
“यह विश्व अच्छे मनुष्यों से भी भरा हुआ है।”*
यही बात उसके अंदर सकारात्मक दृष्टिकोण बढानेे में मदद करेगी और वो भी एक अच्छा इंन्सान बनने के लिये प्रेरित होगा
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GOPAL SINGH NEPALI BIOGRAPHY IN HINDI
कलम की स्वाधीनता के लिए आजीवन संघर्षरत रहे ‘गीतों के राजकुमार’ गोपाल सिंह नेपाली लहरों की धारा के विपरीत चलकर हिन्दी साहित्य, पत्रकारिता और फिल्म उद्योग में ऊंचा स्थान हासिल करने वाले छायावादोत्तर काल के विशिष्ट कवि और गीतकार थे।साहित्यिक कविताओं, जन कविताओं के साथ-साथ हिन्दी फिल्मों के लिए भी इन्होने 400 से अधिक गीत लिखे।
गोपाल सिंह नेपाली का जन्म 11 अगस्त 1911 को बेतिया, पश्चिमी चम्पारन (बिहार) में हुआ था। उनका मूल नाम गोपाल बहादुर सिंह है। नेपाली प्रवेशिका तक शिक्षित थे।
बचपन से ही थे कवी
गोपाल सिंह नेपाली की काव्य प्रतिभा बचपन में ही दिखाई देने लगी थी। एक बार एक दुकानदार ने बच्चा समझकर उन्हें पुराना कार्बन दे दिया जिस पर उन्होंने वह कार्बन लौटाते हुए दुकानदार से कहा- ‘इसके लिए माफ कीजिएगा गोपाल पर, सड़ियल दिया है आपने कार्बन निकालकर’। उनकी इस कविता को सुनकर दुकानदार काफी शर्मिंदा हुआ और उसने उन्हें नया कार्बन निकालकर दे दिया।
4 हिंदी पत्रिकाओ का किया संपादन
रामधारी सिंह ‘दिनकर भी उनके मुरीद हुए
युवावस्था में नेपालीजी के गीतों की लोकप्रियता से प्रभावित होकर उन्हें आदर के साथ कवि सम्मेलनों में बुलाया जाने लगा। उस दौरान एक कवि सम्मेलन में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ उनके एक गीत को सुनकर गद्गनद् हो गए। वह गीत था-
सुनहरी सुबह नेपाल की, ढलती शाम बंगाल की
कर दे फीका रंग चुनरी का, दोपहरी नैनीताल की
क्या दरस-परस की बात यहां, जहां पत्थर में भगवान है
यह मेरा हिन्दुस्तान है, यह मेरा हिन्दुस्तान है…
पत्नी थी नेपाल के राजपुरोहित के परिवार से
नेपालीजी के गीतों की उस दौर में धूम मची हुई थी लेकिन उनकी माली हालत खराब थी। वे चाहते तो नेपाल में उनके लिए सम्मानजनक व्यवस्था हो सकती थी, क्योंकि उनकी पत्नी नेपाल के राजपुरोहित के परिवार से ताल्लुक रखती थीं लेकिन उन्होंने बेतिया में ही रहने का निश्चय किया।
‘मजदूर’ के लिए नेपाली ने लिखे गीत
वर्ष 1944 में मुंबई में उनकी मुलाकात फिल्मीस्तान के मालिक सेठ तुलाराम जालान से हुई जिन्होंने नेपाली को 200 रुपए प्रतिमाह पर गीतकार के रूप में 4 साल के लिए अनुबंधित कर लिया। फिल्मीस्तान के बैनर तले बनी ऐतिहासिक फिल्म ‘मजदूर’ के लिए नेपाली ने सर्वप्रथम गीत लिखे।
60 से अधिक फिल्मों के लिए लिखे गीत
फिल्मों में बतौर गीतकार नेपालीजी 1944 से 1962 तक गीत लेखन करते रहे। इस दौरान उन्होंने 60 से अधिक फिल्मों के लिए लगभग 400 से अधिक गीत लिखे। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकतर गीतों की धुनें भी खुद उन्होंने बनाईं। नेपालीजी ने हिमालय फिल्म्स और नेपाली पिक्चर्स फिल्म कंपनी की स्थापना कर नजराना (1949), सनसनी (1951) और खुशबू (1955) जैसी कुछ फिल्मों का निर्माण भी किया।
नेपालीजी को जीते-जी वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे। अपनी इस भावना को उन्होंने कविता में इस तरह उतारा था-
झोलियां किसी की भर न सके, संताप किसी का हर न सके
अपने प्रति सच्चा रहने का जीवनभर हमने यत्न किया
देखा-देखी हम जी न सके, देखा-देखी हम मर न सके।
17 अप्रैल 1963 को अपने जीवन के अंतिम कवि सम्मेलन से कविता पाठ करके लौटते समय बिहार के भागलपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर गोपालसिंह नेपाली का अचानक निधन हो गया।
DEVENDRA JHAJHARIA BIOGRAPHY IN HINDI
राजस्थान के चुरू जिले में आठ वर्ष की उम्र में पेड़ पर चढ़ते वक्त उन्हें करीब 11 हजार वोल्ट का करंट लगा था और उस वक्त वे इतने जल चुके थे कि एक रात भी जिंदा रह पाएंगे या नहीं यह तय नहीं था। इस एक्सीडेंट में उनका बाया हाथ खराब हो गया था जिसे काटना पड़ा लेकिन जुझारू देवेंद्र और उनके परिजनों ने हार नहीं मानी और फिर शुरू हुई उनकी सफलता की तरफ बढ़ने की कहानी।
पेड़ पर चढ़ते वक्त लगा बिजली का करंट
काटना पड़ा हाथ

देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia)
घर से निकलना किया बंद
पिता ने पढ़ाई के साथ-साथ खेल के लिए किया प्रेरित
Devendra Jhajharia के प्रेरणा स्रोत बने मिल्खा सिंह
भाला फेंकने का किया अभ्यास
पहले ही टूर्नामेंट में जीता गोल्ड मेडल
रियो पैरा-ओलंपिक में जीता गोल्ड
सेना का करें सहयोग, न खरीदें चीन के उत्पाद
रियो पैरा ओलंपिक में स्वर्ण पदक विजेता देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) ने कहा कि जनता पाकिस्तान का सहयोग करने वाले चाइना के उत्पाद नहीं खरीदें। झाझरिया रविवार को टाउन हाल में अभिनन्दन समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा पाक ने हमारे 18 जवान मारे लेकिन भारत के जवानों ने 38 पाक आतंकियों को उनकी ही जमीन पर मारकर दिखा दिया कि वे दुनिया में किसी से कम नहीं है। झाझड़िया ने कहा कि वे 14 साल से भारत का ध्वज लिए देश और विदेश में घूम रहे हैं। इसकी आन बान और शान को आज तक बरकरार रखा है। उन्होंने संघर्ष की कहानी सुनाते हुए कहा कि चूरू से एक नहीं बल्कि सौ देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) निकलने चाहिए।
KABHI YU BHI AA-BASHIR BADRA
कभी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न हो
बशीर बद्र (BASHIR BADR)
कभी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे मगर उसके बाद सहर न हो
वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है मुझे ये सिफ़तभी अताकरे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो
मेरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महव-ए-ख़्वाब है चांदनी
न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो
ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चांदनी
न बुझे ख़राबे की रोशनी, कभी बेचिराग़ ये घर न हो
वो फ़िराक़ हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन
वो गुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो
कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिल-ओ-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं
मगर उस नगर में न क़ैद कर जहाँ ज़िन्दगी की हवा न हो
कभी दिन की धूप में झूम के कभी शब के फूल को चूम के
यूँ ही साथ साथ चलें सदा कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो
मेरे पास मेरे हबीब आ ज़रा और दिल के क़रीब आ
तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं के बिछड़ने का कोई डर न हो
जानिए एक चाय बेचने वाली का बेटा कैसे बना अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉलर
जानिए एक चाय बेचने वाली का बेटा कैसे बना अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉलर
मेरी मां सड़क किनारे चाय बेचा करती थीं। उनका एक ही सपना था कि अपनी खुद की दुकान हो। हालात सुधरते ही मैंने बाजार में उनके लिए एक स्टॉल खरीदा। हम गरीब थे, मगर मां ने मेरे लिए हमेशा बड़ा सपना देखा। खुशी है कि मैं उनका सपना पूरा कर पाया।
मणिपुर की राजधानी इंफाल से करीब दस किलोमीटर दूर छोटा सा गांव है कीकोल। जैकीचंद तब पांच साल के थे, गांव से लगी कच्ची सड़क से सेना की बख्तरबंद गाड़ियों का आना-जाना आम बात थी। गाड़ियों में सवार सैनिकों को बंदूक थामे देख जैकी के मन में अक्सर यह ख्याल आता कि एक दिन मैं भी सैनिक बनकर ऐसी गाड़ियों में चलूंगा।
नहीं थे हालात अच्छे
चाय की दुकान चलाकर बेटे को स्कूल भेजा

जैकी भी करते थे माँ की मदद
मौका मिलते ही फुटबॉल खेलने चले जाते थे
फूटबाल खेलने की ललक जगी
पांच साल तक एकेडमी में रहे
हालत सुधरने पर चाय की दुकान बंद करवाई
सीनियर नेशनल फुटबॉल टीम के लिए खेलने का मिला मौका
ऋतिक ने कहा जैकी रॉकेट की तरह उड़ता है
आईएसएल ने 55 लाख रुपये में किया साइन
मां को खुश देख दिल को बड़ा सुकून मिलता है
उन्होंने पिता को हमेशा दूसरों के खेत में काम करते देखा। कई बार उन्हें काम की तलाश में भटकते हुए देख उन्हें बुरा लगता था। लिहाजा हालात सुधरते ही उन्होंने गांव के पास जमीन खरीदी, ताकि पिताजी अपने खेत में फसल उगा सकें। जैकी कहते हैं, मां सड़क किनारे चाय बेचा करती थीं। मैं चाहता था कि उनकी अपनी दुकान हो। इसलिए इंफाल के ख्वारामबादा बाजार में उनके लिए स्टॉल खरीदा। मां को खुश देख दिल को बड़ा सुकून मिलता है।
साभार -हिंदुस्तान अख़बार
जानें टूरिस्टों को गाइड करने वाले शख्स ने कैसे खड़ा किया अलीबाबा जैसी कंपनी
हार्वर्ड ने 10 बार किया था इन्हें रिजेक्ट, पर हार नहीं मानी, आज दुनिया करती है सलाम
दुनिया में रोज बहुत सारे लोग नौकरी से निकाले जाते हैं या नौकरी पाने के लिए कंपनियों के दरवाजे खटखटाते हैं, उनमें से कुछ लोगों को नौकरी मिलती है और कुछ को नहीं । लेकिन दुनिया में कुछ लोग ही ऐसे होते हैं जो नौकरी न मिलने पर खुद की कंपनी खोलने के बारे में सोचते हैं । इन्हीं लोगों में से एक जुनूनी, मेहनती, काम करने के लिए एक हद तक पागल व्यक्ति का नाम जैक मा है जो चीन के सबसे अमीर लोगों में से एक हैं।

आमदनी का नहीं था कोई जरिया
हाॅर्वर्ड यूनिवर्सिटी ने उन्हें दस बार किया रिजेक्ट
ढीला-ढाला देखकर किया रिजेक्ट
24 लोगो में केवल उनका नहीं हुआ चयन
एक बार केएफसी ने उनके शहर में नौकरी के लिए वैकेंसी निकाली। इसके लिए कुल 24 लोगों ने आवेदन किया। जैक भी उनमें से एक थे। बाद में पता चला कि कंपनी ने उनमें से 23 लोगों का चयन कर लिया। सिर्फ जैक को रिजेक्ट कर दिया गया। सोचिए, उस वक्त उन्हें कैसा लगा होगा!
इन्टरनेट की तरफ बढ़ा खिचाव
जैक इंटरनेट की दुनिया में बिजनेस करने से पहले एक ट्रांसलेशन कंपनी चलाते थे। 1994 में जैक मा ने पहली बार इन्टरनेट का नाम सूना। जिसके बाद वे अमेरिका गए और वहां उन्होंने इंटरनेट देखा और उन्होंने सबसे पहला शब्द इंटरनेट पर Beer (भालू) टाइप किया। उनके सामने कई देशों के बीयर ऑप्शन दिखे लेकिन चाइनीज बीयर नहीं दिखा।
चीन की जानकारी देने वाली वेबसाइट “अग्ली” बनाई
इसी वजह से उन्होंने अपने दोस्तो के साथ मिलकर चीन की जानकारी देने वाली पहली वेबसाइट “अग्ली” (Ugly) बनाई। इस वेबसाइट के बनाने के महज पांच घंटो के अंदर उन्हें कुछ चीनी लोगो के ईमेल आये जो जैक के बारे में जानना चाहते थे। तब जैक मा को एहसास हुआ कि इन्टरनेट से बहुत कुछ किया जा सकता।
अपनी बहन से भी पैसे उधार लेना पड़ा
अमेरिका का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ
eBay के प्रस्ताव ठुकराया
निजी जीवन (विवाह)
जैक मा ने जेंगयिंग (Zhang Ying) से शादी की थी और उनके एक पुत्र एवं एक पुत्री है। जैक अपनी पत्नी से पहली बार तब मिले जब वो Hangzhou Normal University में पढ़ रहे थे। स्नातक होने के बाद तुरंत 1980 के दशक में दोनों ने शादी कर ली और दोनों ने ही अध्यापक का काम शूरू कर दिया था जैक के बारे में उनकी पत्नी जैंग यिंग का मानना है ‘जैक हैंडसम नहीं है, लेकिन मुझे उनसे इसलिए प्यार हो गया, क्योंकि वे ऐसे कई काम कर सकते हैं जो हैंडसम पुरुष भी नहीं कर सकते’।
जैक मा के अनमोल विचार
आपको अपने प्रतिद्वंद्वी से सीखना चाहिए, लेकिन कभी उसकी नकल न करें। अगर नकल की तो समझें कि आप खत्म हो गए।
सरकार के साथ कभी भी कारोबार मत करो। उसके साथ प्यार करो लेकिन शादी कभी मत करो।
कभी हार न मानो। आज का दिन कठिन है, कल और भी बदतर होगा, लेकिन परसों सुनहरी धूप खिलेगी।
युवा लोगों की मदद करो। छोटे लोगों की मदद करो। क्योंकि छोटे लोग बड़े होंगे। युवाओं के दिमाग में वो बीज होगा जो आप उनमे बोयेंगे, और जब वे बड़े होंगे, वे दुनिया बदल देंगे।
आपको आपके साथ सही लोग चाहिए होते हैं, सबसे अच्छे लोग नहीं
इससे फर्क नहीं पड़ता कि पीछा कितना कठिन है, आपके पास हमेशा वो सपना होना चाहिए जो आपने पहले दिन देखा था। वो आपको प्रेरित रखेगा और (किसी कमजोर विचार से ) आपको बचाएगा
हमारे पास कभी भी पैसों की कमी नहीं होती। हमारे पास कमी होती है सपने देखने वाले लोगों की, जो अपने सपनो के लिए मर सकें











