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Saturday, October 3, 2026
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GULABI CHUDIYA-NAGARJUN

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गुलाबी चूड़ियाँ

नागार्जुन


जब भी कभी नागार्जुन जी का नाम दिमाग में आया सबसे पहले गुलाबी चूड़ियाँ ही याद आई ……
कभी कभी पुरानी यादें लौट आती है आज भी याद है स्कूल में हिंदी की क्लास में एक ट्रक ड्राईवर के बारें में ऐसे पिता का वात्सल्य जो परदेस में रह रहा है घर से दूर सड़कों पर महीनों चलते हुए भी उसके दिल से ममत्व खत्म नहीं हुआ जो अपनी बच्ची से बहुत प्यार करता है ………….
यह कविता है नागार्जुन की “गुलाबी चूड़ियाँ” जिसे उसने अपने ट्रक में टांग रखा है ! ये चूडियाँ उसे अपनी गुड़िया की याद दिलाती और वो खो जाता है हिलते डुलते गुलाबी चूड़ियाँ की खनक में ………!!
कविता की पंक्तियाँ ……….
प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…
झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा –
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वरना किसे नहीं भाँएगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ !

TANUSHREE PARIKH-FIRST WOMAN BSF OFFICER

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 तनुश्री पारीक

(TANUSHREE PARIKH )

राजस्थान में भारत-पाक सीमा पर देश की रखवाली करने वाली बीएसएफ की पहली महिला असिस्टैंट कमांडेंट तनुश्री पारीक उन्हीं महिलाओं में से एक हैं। तनुश्री ने 40 साल के बीएसएफ के इतिहास में पहली महिला असिस्टेंट कमांडेंट बनने का गौरव हासिल किया। वह इस वक्त पाकिस्तान की सीमा से सटे इलाके बाड़मेर में ड्यूटी पर तैनात हैं।

देश में महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुष  को न सिर्फ चुनौती दे रही है बल्कि उनसे आगे भी बढ़ रही हैं। राजस्थान में भारत-पाक सीमा पर देश की रखवाली करने वाली बीएसएफ की पहली महिला असिस्टैंट कमांडेंट तनुश्री पारीक उन्हीं महिलाओं में से एक हैं। तनुश्री ने 40 साल के बीएसएफ के इतिहास में पहली महिला असिस्टेंट कमांडेंट बनने का गौरव हासिल किया। वह इस वक्त पाकिस्तान की सीमा से सटे इलाके बाड़मेर में ड्यूटी पर तैनात हैं। अपनी ड्यूटी के साथ ही वह कैमल सफारी के जरिए बीएसएफ एवं वायुसेना के महिला जवानों के साथ नारी सशक्तिकरण एवं बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का संदेश दे रही हैं।

देश की पहली महिला असिस्टेंट कमांडेंट

तनुश्री 2014 बैच की बीएसएफ अधिकारी हैं। 2014 की यूपीएससी की असिस्टैंट कमांडेंट की परीक्षा पास की थी। इसके बाद उन्होंने टेकनपुर स्थित सीमा सुरक्षा बल अकादमी में आयोजित पासिंग आउट परेड में देश की पहली महिला अधिकारी (असिस्टेंट कमांडेंट) के रूप में हिस्सा लिया और 67 अधिकारियों के दीक्षांत समारोह में परेड का नेतृत्व भी किया। इसके लिए उन्हें सम्मानित किया गया। टेकनपुर के बाद तनुश्री ने बीएसएफ अकैडमी के 40वें बैच में 52 हफ्तों की ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद तनुश्री को पंजाब में भारत-पाकिस्तान सीमा पर तैनाती मिली।

दीक्षांत समारोह के दौरान बैच लगाते राजनाथ सिंह


बॉर्डर फिल्म की शूटिंग से मिली प्रेरणा 

अभी तनुश्री पंजाब फ्रंटियर में तैनात हैं। उनका कहना है कि उन्होंने नौकरी के लिए नहीं पैशन के लिए बीएसएफ को चुना क्योंकि उन्हें बचपन से ही सेना में जाने की लगन थी। जिस बाड़मेर में आज तनुश्री ड्यूटी कर रही हैं कभी उनके पिता वहां नौकरी करते थे। जब बीकानेर में बॉर्डर फिल्म की शूटिंग हो रही थी तो वह स्कूल जाया करती थीं। उसी फिल्म से तनुश्री को सेना में जाने की प्रेरणा मिली। वह स्कूल और कॉलेज में एनसीसी कैडेट भी रहीं हैं।

लड़कियां सूरज से बचने के लिए सनस्क्रीन लगाना छोड़ें

तनुश्री कहती हैं, ‘मेरा फोर्स में जाना तभी मायने रखेगा, जब दूसरी लड़कियां भी फोर्स ज्वाइन करना शुरू करेंगी।’ उन्होंने कहा कि लड़कियां सूरज से बचने के लिए सनस्क्रीन लगाना छोड़ें, धूप में तपकर खुद को साबित करें।’उन्हें इस बात का बेहद गर्व है कि वे देश की पहली महिला कॉम्बैट ऑफिसर हैं ।

बचाओ-बेटी पढ़ाओ दे रही है संदेश 

तनुश्री इस वक्त एक कैमल सफारी का नेतृत्व कर रही हैं जो सीमा से सटे इलाकों में आमजन से रूबरू होने के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और महिला सशक्तिकरण का संदेश दे रही है। यह कैमल सफारी 1368 किमी का सफर तय कर 49 दिन बाद यानी 2 अक्टूबर को वाघा बॉर्डर पहुंचेगी। कैमल सफारी में तनुश्री के साथ एयरफोर्स की लेडी ऑफिसर अयुष्का तोमसभी हैं। वह कहती हैं कि अगर माता-पिता बेटियों को पढ़ाई के साथ काबिल बना देंगे तो फ्यूचर में वे अपने पैरों पर खड़े होने के साथ किसी पर निर्भर नहीं रहेंगी।

SONAL MAN SINGH BIOGRAPHY IN HINDI

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सोनल मानसिंह प्रसिद्ध नृत्यांगना


(SONAL MAN SINGH)

यह कहानी एक ऐसे साहसिक लड़की की है जिसने परिस्थितियों आगे अपने घुटने नहीं टेके | जिस लड़की के लिए नृत्य ही जिंदगी थी  उसे एक बार लगा की वह कभी नृत्य ही नहीं कर पायेगी | एक दुर्घटना में उसे अपनी रीढ़ की हड्डी गवानी पड़ी और उसके शारीर पर पैरालीसिस का भी खतरा मंडरा रहा  था | फिर भी उसने हौसला नहीं हारा और इन सबसे उबर कर कैसे उसने फिर से स्टेज की और रुख किया ,जानिए सोनल मानसिंह की कहानी 

 


घरवाले चाहते थे मै वकील बनू 

मुंबई के एल्फीन्स्टन कॉलेज की मेरी पढ़ाई 1963 में खत्म होने के बाद घर पर सभी लोग चाहते थे कि मैं मास्टर्स करने के लिए जर्मनी चली जाऊं। पिताजी, मां, दादा, हर कोई यही कहता था कि जर्मनी जाकर पढ़ाई पूरी करो। दादाजी काफी प्रतिष्ठित वकील थे, इसलिए इस बात पर जोर था कि वकालत कर लो। मैं किसी सूरत में वकालत नहीं करना चाहती थी। आखिरकार एक रोज मैंने कह ही दिया- ‘मैं वकालत नहीं करूंगी। मेरे वश का नहीं है कि अदालत में खड़ी होकर मैं मी लॉर्ड करती रहूं’। वकालत से पीछा छूटा, तो दूसरी परेशानी आ गई। परिवार मेरी शादी के लिए पीछे पड़ गया। बड़ी बहन की शादी हो चुकी थी। मेरे लिए भी ढेरो रिश्ते आ रहे थे। एक रोज मैंने खुलकर कहा कि मुझे शादी नहीं करनी है। घरवाले चौंक गए। उन्होंने पूछा कि वकालत नहीं करनी है, शादी नहीं करनी है, तो फिर क्या करना है? मैंने पूरी हिम्मत से जवाब दिया-मुझे डांस करना है। घरवालों का जवाब मिला- शादी कर लो, डांस भी करती रहना। मैंने कहा, ‘मुझे डांस भी नहीं करना, मुझे डांस ही करना है’।

डांस का बचपन से था शौक 

 

डांस का शौक मुझे बचपन से था। कुछ बड़ी होने पर मैंने बेंगलुरु में प्रोफेसर यूएस कृष्णराव और उनकी पत्नी चंद्रभागा देवी से नृत्य सीखना शुरू किया। वे दोनों भारतीय नृत्य की बहुत बड़ी शख्सियत थे। गुरुजी को मेरे डांस में हर चीज खूब भाती थी, लेकिन वह चाहते थे कि मैं भाव पक्ष को लेकर और मेहनत करूं। उस वक्त मैं 1961 में ‘अरंगेत्रम’ की आखिरी तैयारियों में लगी हुई थी। जून का महीना था। बहुत गरमी भी थी। इसकी वजह से मेरे चेहरे पर शायद वैसे भाव नहीं आ रहे थे, जैसा गुरुजी चाहते थे। एक रोज उनके घर के बाहर एक मदारी आया। गुरुजी ने मुझे बुलाया। उन्होंने बंदरों की तरफ दिखाते हुए पूछा कि ‘ये क्या है’? मैंने जवाब दिया- ‘बंदर-बंदरिया डांस कर रहे हैं गुरुजी। गुरुजी ने तत्तकली दिखाते हुए कहा- ‘शो मी द डिफरेंस बिटवीन मंकी ऐंड यू’। उनकी बात समझ में आ गई। यही वाकया मेरी जिंदगी को परिभाषित करने वाला रहा। दक्षिण भारत की नृत्य विधाओं में गुरु छोटी मजबूत लकड़ी को बजाकर लय विन्यास सिखाते हैं। उसे तत्तकली कहा जाता है। शिष्य की अंगशुद्धि के लिए इससे पिटाई भी की जाती है।

घर से भी भागी 

 

इसके बाद साल 1961 में उन दोनों के निर्देशन में राजभवन में मेरा ‘अरंग्रेत्रम’ हुआ। मेरे दादाजी मंगलदास पक्कासा उन दिनों मैसूर के राज्यपाल थे। देविका रानी, उनके पति चित्रकार रोरिक, मैसूर के महाराजा, दक्षिण के जाने-माने कला आलोचक और तमाम गुरुगणों ने एक आवाज में मेरी प्रशंसा की, जिससे मेरे भीतर इस मार्ग पर आगे बढ़ने का साहस बढ़ा, और उत्कंठा बढ़ी। अगले दो साल में मैंने जर्मन साहित्य में मुंबई से स्नातक ऑनर्स पूरा किया। लेकिन नृत्य को लेकर मेरी जिद की वजह से घर पर लगभग सभी लोग मुझसे नाराज थे, खासकर मेरी मां। साल 1963 में मैंने एक दिन स्कॉलरशिप के पैसे लिए और बगैर किसी से कुछ बोले घर छोड़ दिया। कहीं से बस पकड़ी, कहीं से ट्रेन ली और सीधे बेंगलुरु पहुंच गई। जब गुरुजी के घर पहुंची, तो वह फिल्म देखने गए थे। मैं बाहर ही बैठकर उनका इंतजार करती रही। वह वापस लौटे, तो उनकी गाड़ी की रोशनी मेरे ऊपर पड़ी। उन्होंने पूछा- वहां कौन है? मैंने कहा- सोनल। फिर मैंने उन्हें पूरा किस्सा बताया। उन्होंने ही सबसे पहले मेरे घर पर जानकारी दी कि मैं सुरक्षित हूं। इसके बाद तो मैंने अपना जीवन ही डांस के नाम कर दिया।

उस दिन को मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकती

 

उस दिन को मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकती। तारीख थी 24 अगस्त, 1974। जर्मनी के बैरुथ में मैं अंतरराष्ट्रीय युवा महोत्सव के विद्यार्थियों को भरतनाट्यम का प्रशिक्षण दे रही थी। मैं अपने मंगेतर जॉर्ज लैश्नर के साथ कार से जा रही थी। रात का वक्त था। सड़क बारिश से भीगी हुई थी। हम जिस ‘बीटल फॉक्सवैगन’ में थे, उसमें डिक्की आगे होती थी और इंजन पीछे, यानी कार आगे से हल्की थी। उन दिनों सीट बेल्ट नहीं होती थी। रास्ता बिल्कुल सुनसान था। कार की रफ्तार सौ किलोमीटर प्रति घंटे के करीब रही होगी। अचानक लैश्नर को कार के सामने एक हिरन दिखाई दिया। उन्होंने उसे बचाने के लिए पूरी ताकत से ब्रेक लगाई। हमारी कार ने तीन बार गुलाटियां खाई और पलट गई। मैं कार से बाहर करीब 12-15 फीट दूर जाकर गिरी। उस वक्त मैं हिलने-डुलने या चिल्लाने तक के लायक नहीं थी।

मेरी रीढ़ की हड्डी और चार पसलियां टूटी 

 

कुछ देर बाद लोगों ने मेरे मुंह पर पानी छिड़का। मुझे बहुत ठंड लग रही थी।  मैंने बुदबुदाते हुए कहा कि मुझे कुछ ओढ़ने के लिए चाहिए। इतनी देर में पुलिस आ गई। थोड़ी देर बाद एंबुलेंस आई। मेल नर्सेस ने उठाया। मुझे अस्पताल पहुंचाया गया। वह म्यूनिसिपल अस्पताल था। सबसे पहले मुझे दर्द कम करने के लिए कुछ इंजेक्शन दिए गए और इसके बाद तुरंत एक्स-रे के लिए भेज दिया गया। मेरे एक्स-रे से पता चला कि चोट कितनी गंभीर थी। मेरी रीढ़ की हड्डी, गले के पास की हड्िडयां और चार पसलियां टूट चुकी थीं। इनके अलावा और भी कई चोटें थीं। रीढ़ की हड्डी की बारहवीं कड़ी टूटकर चकनाचूर हो गई थी। उस बुरे वक्त में राहत की खबर बस इतनी थी कि रीढ़ की हड्िडयों को आपस में जोड़ने वाला सूत्र बच गया था। चोट की गंभीरता को देखते हुए उस अस्पताल के डॉक्टरों ने कहा कि मुझे यूनिवर्सिटी सर्जिकल क्लीनिक ले जाया जाए, क्योंकि वहां इलाज का इंतजाम बेहतर था। मेरा एक्सीडेंट पेग्नीत्स शहर में हुआ था, जबकि यूनिवर्सिटी सर्जिकल क्लीनिक दूसरे शहर एरलांगन में थी।

टॉर्च की रोशनी से  मुझे ढूंढा गया 

 

लैश्नर मुझे वहां से लेकर यूनिवर्सिटी सर्जिकल क्लीनिक गए। मैं होश में तो थी, मगर बेतहाशा दर्द में थी। रास्ते में उन्होंने बताया कि एक्सीडेंट के बाद वह सीट और स्टीयरिंग के बीच फंस गए थे। उन्होंने पहले मुझे कार के भीतर ढूंढ़ा, लेकिन वहां मैं नहीं दिखाई दी, तो वह बहुत घबरा गए थे। तभी एक कार वहां आकर रुकी और फिर सबने मिलकर मुझे ढूंढ़ा। मुझे ढूंढ़ने के लिए टॉर्च की रोशनी का सहारा लिया गया।

तीन दिनों तक मुझे ‘फोम रबर’ पर रखा

 

एरलांगन में यूनिवर्सिटी सर्जिकल क्लीनिक में तीन दिनों तक डॉक्टरों ने मुझे ‘फोम रबर’ पर रखा और इलाज की प्रक्रिया के बारे में वे सलाह-मशविरा करते रहे। उनके लिए ‘स्पाइनल कॉर्ड’ से ज्यादा बड़ी मुसीबत थी खून का जमना। मेरी रीढ़ की हड्डी के पास बहुत सा खून जम गया था, जो रीढ़ पर दबाव बना रहा था। डॉक्टरों का मानना था कि अगर इसका तुरंत हल नहीं निकाला गया, तो मुझे ‘पैरालिसिस’ हो जाएगा। मेरे शरीर की तमाम मांसपेशियों में हरकत खत्म हो जाएगी। फिर उन्होंने तय किया कि वे मेरा ऑपरेशन करेंगे। ऑपरेशन के बाद मेरी रीढ़ की हड्डी को स्टील के रॉड से टिका दिया जाएगा, ताकि रीढ़ की हड्डी को सहारा मिल सके। ऐसा करके वे मुझे ‘पैरालिसिस’ से बचा सकते थे। मैं दवाई की वजह से हल्की बेहोशी में थी, पर ऑपरेशन की बात सुनते ही मैंने इशारे से मना किया। लैश्नर ने मेरे इशारे को समझ लिया। उसने डॉक्टरों से गुजारिश की कि ऑपरेशन को आखिरी विकल्प की तरह देखा जाए। डॉक्टरों ने भी लैश्नर की बात मान ली। बगैर ऑपरेशन मेरा इलाज शुरू किया गया। ऊपर वाले की दया से मेरे शरीर की सूजन अगले दो दिनों में कम हो गई।

चार किलो प्लास्टर कास्ट में मेरे आधे शरीर को बांध गया 

 

उसके बाद का इलाज आज भी याद करूं, तो सिहरन सी होती है। शरीर की सूजन कम होने के बाद मुझे प्लास्टर वाले कमरे में ले जाया गया। मुझे पट्टों की मदद से उलटा लटकाया गया। मेरी ठुड्डी के नीचे एक टेबल थी और दूसरी टेबल घुटनों के नीचे। शरीर के बीच का पूरा हिस्सा हवा में लटका हुआ था। इसके बाद डॉक्टर हवा में लटके उस हिस्से को दबा-दबाकर इस बात की जांच करते थे कि दर्द कहां-कहां हो रहा है। फिर मेरे पूरे शरीर को प्लास्टर के घोल में डूबी रूई की कई परतों में लपेट दिया गया। बेतहाशा दर्द हो रहा था। डॉक्टरों ने इस प्लास्टर को बांधने के दौरान अगल-बगल रूई की मोटी परतें लगा दी थीं। ऐसा इसलिए कि दर्द की हालत में अगर मैं हिलूं, तो नुकसान न हो। पूरी प्रक्रिया में कोई एक घंटे का वक्त लगा होगा। मैं दर्द में छटपटाती हुई डॉक्टरों को यह सब करते सिर्फ देख रही थी। जिस प्लास्टर कास्ट में मेरे आधे शरीर को बांध दिया गया था, वह कम से कम चार किलो का था। एक घंटे के बाद मुझे उस कमरे से बाहर निकाला गया। वहां से बाहर आने के बाद डॉक्टरों ने लैश्नर से सिर्फ इतना कहा कि सोनल दो वर्ष के बाद ही ठीक से चल-फिर सकेंगी, लेकिन नृत्य का ख्याल छोड़ना पड़ेगा।

 जिंदगी रुक-सी गई

 

बगैर ऑपरेशन मेरा इलाज तो कर दिया गया, लेकिन डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि फिलहाल मेरे घुटने, एड़ी, कोहनी और पांव के पंजे में मुड़ने की ताकत या लचक खत्म हो गई है। उन्होंने सांत्वना देते हुए कहा कि लचक धीरे-धीरे लौटेगी, लेकिन इसमें अच्छा-खासा वक्त लगेगा। मुझे भी बहुत मेहनत करनी होगी। 12 दिनों तक मैं अस्पताल में वैसे ही पड़ी रही। ऐसा लग रहा था कि जैसे जिंदगी रुक-सी गई है। फिर डॉक्टरों ने लैश्नर से कहा कि वह मुझे मॉ्ट्रिरयल ले जा सकते हैं। लेकिन पूरे रास्ते पीठ के बल ही लेटकर जाना होगा। लैश्नर वहां गॉथे जर्मन इंस्टीट्यूट के निदेशक थे। फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट पर उस रोज हम एंबुलेंस से पहुंचे। लेकिन फ्लाइट के कैप्टन ने मुझे विमान में ले जाने से मना कर दिया। उसने कहा कि मरीज की हालत ऐसी नहीं है कि उसे हवाई सफर कराया जाए। लैश्नर ने बहुत ‘रिक्वेस्ट’ की, लेकिन कैप्टन नहीं माना। आखिर कैप्टन को राजी करने के लिए लैश्नर ने मुझसे कहा कि मैं फ्लाइट की सीढि़यों पर चढ़कर उसे दिखा दूं। मैंने लैश्नर के कंधे का सहारा लेते हुए फ्लाइट की लगभग 30 सीढ़ियां चढ़कर दिखा भी दी, लेकिन कैप्टन पर कोई असर नहीं पड़ा। आखिर में उसने कहा कि अगर मुझे फ्लाइट में जाना है, तो किसी डॉक्टर का सर्टिफिकेट चाहिए होगा। लैश्नर ने एक कागज पर सर्टिफिकेट बनाया और अपने ही साइन करके लिखा- डॉक्टर जॉर्ज लैश्नर। इसके बाद फ्लाइट कैप्टन ने मुझे यात्रा करने की मंजूरी दी। मजे की बात यह है कि लैश्नर के पास मेडिकल सांइस में नहीं, फिलॉसफी में डॉक्टरेट की उपाधि थी।

नृत्य न करने के ख्याल से आंखों से नींद गायब हो गई

 

जब मैं मॉ्ट्रिरयल पहुंची, तो मित्र मंडल में खबर फैल गई। तमाम लोग मुझसे मिलने आए। आने-जाने वालों में से किसी ने लैश्नर को बताया कि वह मुझे डॉक्टर पियेर ग्रावेल को दिखाएं। पियेर ग्रावेल ने मेरी शुरुआती जांच के बाद कहा कि वह मेरे बारे में कोई भी बात तभी कह सकते हैं, जब वह मेरे इलाज की सारी रिपोर्ट्स की ‘स्टडी’ कर लेंगे। पूरी प्रक्रिया के दौरान मुझे यह तो भरोसा था कि मैं ठीक हो जाऊंगी, लेकिन मेरा डर इस बात को लेकर था कि मैं दोबारा नृत्य कर पाऊंगी या नहीं? मैं अपने पैरों में घुंघरू बांध पाऊंगी या नहीं? यह नृत्य ही था, जिसके लिए मैंने अपना घर छोड़ दिया था। यह नृत्य ही था, जिसके लिए मैं अपने पहले पति से अलग हुई थी। मैं लेटे-लेटे सिर्फ छत की ओर देखा करती थी। मेरी आंखों से नींद गायब हो गई थी। भूख खत्म हो चुकी थी।

आशा की एक किरण 

 

फिर एक दिन पियेर ग्रावेल ने मेरी सारी मांसपेशियों को जांचने के बाद बड़ी ही गंभीरता के साथ कहा- सोनल, मुझे डर है कि… इतना कहने के बाद ग्रावेल चुप हो गए। उनकी चुप्पी भर से मैं निराशा के सागर में डूब गई। मैं रो पड़ी। फिर कुछ देर बाद लगा कि कहीं दूर से आवाज आ रही है कि तुम दोबारा नृत्य करोगी। उनके इतना कहने के बाद तो कमरे में सभी के हाव-भाव ही बदल गए। लैश्नर और उसके इंस्टीट्यूट के साथियों ने ताली बजाते-बजाते जैसे छत को उड़ा दिया। मैं रो रही थी, पर मेरा मन थिरक रहा था। मैंने डॉक्टर ग्रावेल को फिर से इसी वाक्य को दोहराने के लिए कहा। उन्होंने जैसे ही दोबारा यह बात कही, मुझे लगा कि जैसे कमरे में इंद्रधनुष के तमाम रंग बिखर गए हों।

फिर से पहुची स्टेज पर 

 

इसके बाद अगले छह महीने तक जबर्दस्त मेहनत का दौर चला। फिर वह दिन भी आया, जब मैंने अपनी पहली क्लास को याद करके डर-डरकर पैर उठाना शुरू किया। 11 महीने के बाद भारत लौटी। बंबई (अब मुंबई) में माता-पिता के साथ 15 दिन रही। उस दौरान स्वामी हरिदास सम्मेलन में 20 अप्रैल, 1975 के दिन भरतनाट्यम करने का निमंत्रण मिला। बंबई का रंगभवन पूरी तरह भरा हुआ था। मैं ग्रीन रूम में थी। अचानक मेरी नजर शीशे पर गई। मुझे पसीने छूटने लगे। बहुत कुछ याद आने लगा। ऐसा लगा कि जैसे हाथ-पांव सुन्न हो गए हों। मुझे याद है कि ऐसा कई साल पहले भी हुआ था, जब मैं पहली बार स्टेज पर नृत्य करने वाली थी। मुझे याद है कि एक अंग्रेज पत्रकार ने तो मेरे नृत्य को देखने के बाद लिखा था- सोनल मानसिंह का नृत्य देखकर ही समझ आता है कि शास्त्रीय नृत्य को देवताओं की विरासत क्यों मानते हैं?

एक बार फिर से मेरी जिंदगी की शुरुआत हुयी 

 

मैं घबराए मन से स्टेज पर गई। हाथ जोड़कर दर्शकों का अभिवादन किया। इसके बाद मैंने लगभग डेढ़ घंटे तक भरतनाट्यम किया। सौभाग्यवश कथक क्वीन के विशेषण से प्रख्यात सितारा देवी, जो वहां दर्शक थीं, मंच पर चढ़ीं, अपनी बांहों में जकड़कर मेरे माथे पर हाथ रखा, गले से काला धागा उतारकर मेरे गले में यह कहते हुए पहनाया कि ईश्वर तुम्हें बुरी नजर से बचाए। इसके बाद मैं दिल्ली आई। जहां चार-छह घंटों तक भरतनाट्यम संगीत मंडली के साथ अभ्यास शुरू हुआ। चार मई, 1975 को होटल अशोक के विशाल कन्वेंशन सेंटर में मेरा ढाई घंटे का कार्यक्रम हुआ। डॉ. कर्ण सिंह, डॉ. कपिला वात्सायन आदि ने खुलकर प्रशंसा की। आज भी उस कार्यक्रम की चर्चा होती है।

नर हो न निराश करो मन को – मैथिलीशरण गुप्त

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nar ho na nirash karo man ko

नर हो, न निराश करो मन को

 मैथिलीशरण गुप्त

(MAITHILI SHARAN GUPT)
 
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को

संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को

प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को

करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो

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EK GUDIYA KI KIMAT

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गुडिया की कीमत ( प्रेरणादायक  कहानी )

 

एक 6 वर्ष का लडका अपनी 4 वर्ष की छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था।
अचानक से उसे लगा कि, उसकी बहन पीछे रह गयी है।

वह रुका, पीछे मुड़कर देखा तो जाना कि, उसकी बहन एक खिलौने के दुकान के सामने खडी कोई चीज निहार रही है।

लडका पीछे आता है और बहन से पूछता है, “कुछ चाहिये तुम्हें?”

 लडकी एक गुड़िया की तरफ उंगली उठाकर दिखाती है।

बच्चा उसका हाथ पकडता है, एक जिम्मेदार बडे भाई की तरह अपनी बहन को वह गुड़िया देता है। बहन बहुत खुश हो गयी ।

दुकानदार यह सब देख रहा था, बच्चे का व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित भी हुआ ….

अब वह बच्चा बहन के साथ काउंटर पर आया और दुकानदार से पूछा, “कितनी कीमत है इस गुड़िया की ?”

दुकानदार एक शांत और गहरा व्यक्ति था, उसने जीवन के कई उतार देखे थे, उन्होने बड़े प्यार और अपनत्व से बच्चे से पूछा,
“बताओ बेटे, आप क्या दे सकते हो ??”

बच्चा अपनी जेब से वो सारी सीपें बाहर निकालकर दुकानदार को देता है जो उसने थोड़ी देर पहले बहन के साथ समुंदर किनारे से चुन चुन कर बीनी थी !!!

दुकानदार वो सब लेकर यूँ गिनता है जैसे कोई पैसे गिन रहा हो।

सीपें गिनकर वो बच्चे की तरफ देखने लगा तो बच्चा बोला,”सर कुछ कम हैं क्या ??”

दुकानदार :-” नहीं – नहीं, ये तो इस गुड़िया की कीमत से भी ज्यादा है, ज्यादा मैं वापस देता हूँ ” यह कहकर उसने 4 सीपें रख ली और बाकी की बच्चे को वापिस दे दी।

बच्चा बड़ी खुशी से वो सीपें जेब मे रखकर बहन को साथ लेकर चला गया।

यह सब उस दुकान का कामगार देख रहा था, उसने आश्चर्य से मालिक से पूछा, ” मालिक ! इतनी महंगी गुड़िया आपने केवल 4 सीपों के बदले मे दे दी ?”

दुकानदार एक स्मित संतुष्टि वाला हास्य करते हुये बोला,

“हमारे लिये ये केवल सीप है पर उस 6 साल के बच्चे के लिये अतिशय मूल्यवान है और अब इस उम्र में वो नहीं जानता, कि पैसे क्या होते हैं ?

पर जब वह बडा होगा ना…

और जब उसे याद आयेगा कि उसने सीपों के बदले बहन को गुड़िया खरीदकर दी थी, तब उसे मेरी याद जरुर आयेगी, और फिर वह सोचेगा कि,,,,,,
“यह विश्व अच्छे मनुष्यों से भी भरा हुआ है।”*

यही बात उसके अंदर सकारात्मक दृष्टिकोण बढानेे में मदद करेगी और वो भी एक अच्छा इंन्सान बनने के लिये प्रेरित होगा

Source- Whatsapp

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तो देखा दोस्तों ये दुनिया अच्छे लोगो से भरी पड़ी है बस जरुरत है की हम अपनी सोच को सकारत्म रखे है और कोई ऐसा काम न करे जिससे लोग दुसरो पर भरोसा करना छोड़ दे | अगर इस दुकानदार की तरह सोचने वाले आधे लोग भी हो जायेंगे न तो या धरती सवर्ग बन जाएगी
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GOPAL SINGH NEPALI BIOGRAPHY IN HINDI

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‪गोपाल सिंह नेपाली(GOPAL SINGH NEPALI)‬

कलम की स्वाधीनता के लिए आजीवन संघर्षरत रहे ‘गीतों के राजकुमार’ गोपाल सिंह नेपाली लहरों की धारा के विपरीत चलकर हिन्दी साहित्य, पत्रकारिता और फिल्म उद्योग में ऊंचा स्थान हासिल करने वाले छायावादोत्तर काल के विशिष्ट कवि और गीतकार थे।साहित्यिक कविताओं, जन कविताओं के साथ-साथ हिन्दी फिल्मों के लिए भी इन्होने 400 से अधिक गीत लिखे।

गोपाल सिंह नेपाली का जन्म 11 अगस्त 1911 को बेतिया, पश्चिमी चम्पारन (बिहार) में हुआ था। उनका मूल नाम गोपाल बहादुर सिंह है। नेपाली प्रवेशिका तक शिक्षित थे।

 बचपन से ही थे  कवी

गोपाल सिंह नेपाली की काव्य प्रतिभा बचपन में ही दिखाई देने लगी थी। एक बार एक दुकानदार ने बच्चा समझकर उन्हें पुराना कार्बन दे दिया जिस पर उन्होंने वह कार्बन लौटाते हुए दुकानदार से कहा- ‘इसके लिए माफ कीजिएगा गोपाल पर, सड़ियल दिया है आपने कार्बन निकालकर’। उनकी इस कविता को सुनकर दुकानदार काफी शर्मिंदा हुआ और उसने उन्हें नया कार्बन निकालकर दे दिया।

4 हिंदी  पत्रिकाओ का किया संपादन 

साहित्य की लगभग सभी विधाओं में पारंगत नेपाली की पहली कविता ‘भारत गगन के जगमग सितारे’ 1930 में रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा संपादित बाल पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। पत्रकार के रूप में उन्होंने कम से कम 4 हिन्दी पत्रिकाओं- रतलाम टाइम्स, चित्रपट, सुधा और योगी का संपादन किया।

रामधारी सिंह ‘दिनकर भी उनके  मुरीद हुए 

युवावस्था में नेपालीजी के गीतों की लोकप्रियता से प्रभावित होकर उन्हें आदर के साथ कवि सम्मेलनों में बुलाया जाने लगा। उस दौरान एक कवि सम्मेलन में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ उनके एक गीत को सुनकर गद्गनद् हो गए। वह गीत था-


सुनहरी सुबह नेपाल की, ढलती शाम बंगाल की

कर दे फीका रंग चुनरी का, दोपहरी नैनीताल की

क्या दरस-परस की बात यहां, जहां पत्थर में भगवान है

यह मेरा हिन्दुस्तान है, यह मेरा हिन्दुस्तान है…

पत्नी थी नेपाल के राजपुरोहित के परिवार से

नेपालीजी के गीतों की उस दौर में धूम मची हुई थी लेकिन उनकी माली हालत खराब थी। वे चाहते तो नेपाल में उनके लिए सम्मानजनक व्यवस्था हो सकती थी, क्योंकि उनकी पत्नी नेपाल के राजपुरोहित के परिवार से ताल्लुक रखती थीं लेकिन उन्होंने बेतिया में ही रहने का निश्चय किया।


‘मजदूर’ के लिए नेपाली ने   लिखे गीत

वर्ष 1944 में मुंबई में उनकी मुलाकात फिल्मीस्तान के मालिक सेठ तुलाराम जालान से हुई जिन्होंने नेपाली को 200 रुपए प्रतिमाह पर गीतकार के रूप में 4 साल के लिए अनुबंधित कर लिया। फिल्मीस्तान के बैनर तले बनी ऐतिहासिक फिल्म ‘मजदूर’ के लिए नेपाली ने सर्वप्रथम गीत लिखे।

60 से अधिक फिल्मों के लिए लिखे  गीत 

फिल्मों में बतौर गीतकार नेपालीजी 1944 से 1962 तक गीत लेखन करते रहे। इस दौरान उन्होंने 60 से अधिक फिल्मों के लिए लगभग 400 से अधिक गीत लिखे। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकतर गीतों की धुनें भी खुद उन्होंने बनाईं। नेपालीजी ने हिमालय फिल्म्स और नेपाली पिक्चर्स फिल्म कंपनी की स्थापना कर नजराना (1949), सनसनी (1951) और खुशबू (1955) जैसी कुछ फिल्मों का निर्माण भी किया।

नेपालीजी को जीते-जी वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे। अपनी इस भावना को उन्होंने कविता में इस तरह उतारा था-

 

अफसोस नहीं हमको जीवन में कुछ कर न सके

झोलियां किसी की भर न सके, संताप किसी का हर न सके

अपने प्रति सच्चा रहने का जीवनभर हमने यत्न किया

देखा-देखी हम जी न सके, देखा-देखी हम मर न सके।



17
 अप्रैल 1963 को अपने जीवन के अंतिम कवि सम्मेलन से कविता पाठ करके लौटते समय बिहार के भागलपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर गोपालसिंह नेपाली का अचानक निधन हो गया।

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DEVENDRA JHAJHARIA BIOGRAPHY IN HINDI

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devendra jhajhariya
Devendra Jhajharia Biography In Hindi
देवेंद्र झाझरिया(रियो पैरा-ओलंपिक विजेता)
 
राजस्थान के चुरू जिले में आठ वर्ष की उम्र में पेड़ पर चढ़ते वक्त उन्हें करीब 11 हजार वोल्ट का करंट लगा था और उस वक्त वे इतने जल चुके थे कि एक रात भी जिंदा रह पाएंगे या नहीं यह तय नहीं था। इस एक्सीडेंट में उनका बाया हाथ खराब हो गया था जिसे काटना पड़ा लेकिन जुझारू देवेंद्र और उनके परिजनों ने हार नहीं मानी और फिर शुरू हुई उनकी सफलता की तरफ बढ़ने की कहानी।
देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) का परिवार काफी निर्धन था। माता-पिता की सारी उम्मीदें बेटे पर टिकी थीं। वे बस एक ही सपने के साथ जी रहे थे कि बेटा पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करे, ताकि घर के हालात सुधर सकें। देवेंद्र का परिवार राजस्थान के चूरू जिले के एक छोटे से गांव में रहता था। देवेंद्र जब पांच साल के हुए, तो पिताजी ने गांव के सरकारी स्कूल में दाखिला करा दिया। मां को बेटे की मासूम शरारतों पर खूब प्यार उमड़ता, मगर यह फिक्र भी लगी रहती कि कहीं इसे चोट न लग जाए। स्कूल से लौटते समय अक्सर देवेंद्र पेड़ पर चढ़ जाते थे। तब वह आठ साल के थे।

पेड़ पर चढ़ते वक्त लगा बिजली का करंट 

देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) एक दिन शाम को स्कूल से लौटते वक्त सड़क किनारे पेड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे कि अचानक बाएं हाथ में तेज झनझनाहट महसूस हुई। पेड़ के आस-पास मौजूद बच्चों को उनकी तेज चीख सुनाई दी। लोगों ने उन्हें पेड़ से नीचे गिरते देखा। गांव वाले भागकर देवेंद्र के घर पहुंचे और उनकी मां को बताया। यह सुनकर मां दौड़कर वहां पहुंचीं। बेहोशी की हालत में उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। डॉक्टर ने बताया कि इसे बिजली का करंट लगा है। होश आया, तो सामने मां खड़ी थीं। उन्होंने आंसू पोंछते हुए कहा, तुम्हें बिजली का करंट लगा है। पर चिंता मत करो, अब तुम ठीक हो।

काटना पड़ा हाथ 

दरअसल देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) जिस पेड़ पर चढ़े थे, उसकी टहनियों के बीच से 11,000 वोल्ट का बिजली का तार गुजर रहा था। धोखे से बायां हाथ तार पर पड़ा और पूरा हाथ झुलस गया। देवेंद्र ने देखा कि उनके पूरे हाथ पर पट्टी बंधी है। हाथ उठाने की कोशिश की, तो उसमें कोई हलचल नहीं हुई। लगा, जैसे हाथ में जान ही न हो। वह बार-बार मां से पूछते रहे- मेरा हाथ कब ठीक होगा?
सब चुप थे। किसी के पास उनके सवाल का जवाब नहीं था। घरवाले डॉक्टर से मिन्नतें कर रहे थे। मां घर बेचकर भी बेटे का इलाज कराने को तैयार थीं। कई दिनों की कोशिश के बाद डॉक्टर ने कह दिया कि इसका हाथ अब काटना पड़ेगा, नहीं तो जहर पूरे शरीर में फैल जाएगा। यह सुनते ही मां के होश उड़ गए। बेटे की जिंदगी का सवाल था, इसलिए डॉक्टर को ऑपरेशन की इजाजत दे दी। पिता परेशान थे। तमाम सवाल थे उनके सामने। क्या अब बेटा अपाहिज बनकर जिएगा? क्या होगा इसका? पढ़ाई कैसे करेगा?
Devendra_Jhajharia
देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia)

घर से निकलना किया बंद 

देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर पहुंचे। अब उनका एक हाथ कट चुका था।वह बताते हैं- ऑपरेशन के बाद पहली बार घर से निकला, तो बड़ा अजीब लगा। सब मेरी ही तरफ देख रहे थे। मुङो लगा, जैसे वे मेरा कटा हुआ हाथ देखकर हंस रहे हैं। मैंने घर से निकलना बंद कर दिया। मां बेटे की मनोदशा समझ रही थीं। बड़ा बुरा लगता था, जब लोग देवेंद्र पर दया दिखाते या कोई तंज कसते।

पिता ने  पढ़ाई के साथ-साथ खेल के लिए  किया प्रेरित 

 मां हर पल उनके संग रहती थीं। उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखतीं। कुछ हफ्ते बाद उन्हें दोबारा स्कूल भेजने की तैयारी शुरू हो गई। मां ने स्कूल बैग तैयार कर दिया। लेकिन देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) को यकीन ही नहीं हो पा रहा था कि वह पहले की तरह दोबारा स्कूल जा पाएंगे।पिता ने बेटे को पढ़ाई के साथ-साथ खेल के लिए प्रेरित किया। वह दोबारा स्कूल जाने लगे।

Devendra Jhajharia के प्रेरणा स्रोत बने मिल्खा सिंह

देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) बताते हैं- उन दिनों मैंने धावक मिल्खा सिंह के किस्से सुने। किसी ने बताया कि मिल्खा के पास दौड़ने के लिए जूते तक नहीं थे, फिर भी उन्होंने कई मेडल जीते। वह मेरे रोल मॉडल बन गए। मैंने खुद से कहा कि मिल्खा जीत सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं?

 भाला फेंकने का किया  अभ्यास 

 धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर लौटने लगी। अब वह अपने भविष्य को लेकर काफी गंभीर हो चुके थे। देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) का पूरा ध्यान पढ़ाई पर था। एक हाथ खोने का गम गहरा तो था, पर इरादे पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत थे। बचपन से उनके अंदर एक हाथ से चीजों को दूर तक फेंकने का हुनर था। पर कभी नहीं सोचा था कि यही हुनर उनकी नई पहचान बनाएगा। उन दिनों कुछ खिलाड़ी गांव में भाला फेंकने का अभ्यास कर रहे थे। देवेंद्र को यह खेल रोमांचकारी लगा। वह लकड़ी का भाला बनाकर अभ्यास करने लगे।

पहले ही टूर्नामेंट में जीता गोल्ड मेडल 

यह बात 1997 की है। तब वह 17 साल के थे। कोच आर डी सिंह की उन पर नजर पड़ी। उन्होंने देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) को ट्रेनिंग देने का फैसला किया। जिले के पहले भाला फेंक टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि हौसले बुलंद हों, तो इंसान कुछ भी हासिल कर सकता है। जीत के बाद तमाम गांव वाले मुबारकबाद देने घर पहुंचे। उम्मीदों को पंख लग चुके थे। कोच ने कहा, खूब मेहनत करो। अब तुम्हें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।

रियो पैरा-ओलंपिक में जीता गोल्ड 

राज्य व राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में जीत दर्ज कराने के बाद 2002 में देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) ने दक्षिण कोरिया में हुए पैसेफिक खेल में गोल्ड मेडल जीता। साल 2004 में उन्होंने एथेंस पैरा-ओलंपिक में गोल्ड मेडल अपने नाम किया और बाद में अपना ही रिकॉर्ड तोड़ते हुए 63़.97 मीटर भाला फेंककर नया वल्र्ड रिकॉर्ड बनाया। इसी साल उन्हें अजरुन पुरस्कार मिला। 2012 में देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) पद्मश्री से सम्मानित हुए। पिछले साल रियो पैरा-ओलंपिक में गोल्ड जीतकर देश का नाम रोशन किया। इसी हफ्ते उन्हें खेल रत्न देने की सिफारिश की गई है।

सेना का करें सहयोग, न खरीदें चीन के उत्पाद

रियो पैरा ओलंपिक में स्वर्ण पदक विजेता देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) ने कहा कि जनता पाकिस्तान का सहयोग करने वाले चाइना के उत्पाद नहीं खरीदें। झाझरिया रविवार को टाउन हाल में अभिनन्दन समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा पाक ने हमारे 18 जवान मारे लेकिन भारत के जवानों ने 38 पाक आतंकियों को उनकी ही जमीन पर मारकर दिखा दिया कि वे दुनिया में किसी से कम नहीं है। झाझड़िया ने कहा कि वे 14 साल से भारत का ध्वज लिए देश और विदेश में घूम रहे हैं। इसकी आन बान और शान को आज तक बरकरार रखा है। उन्होंने संघर्ष की कहानी सुनाते हुए कहा कि चूरू से एक नहीं बल्कि सौ देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) निकलने चाहिए।

साभार -हिंदुस्तान अख़बार

KABHI YU BHI AA-BASHIR BADRA

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Mh_Bashir_Badr

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न हो

बशीर बद्र (BASHIR BADR)

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे मगर उसके बाद सहर न हो

वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है मुझे ये सिफ़तभी अताकरे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो

मेरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महव-ए-ख़्वाब है चांदनी
न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो

ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चांदनी
न बुझे ख़राबे की रोशनी, कभी बेचिराग़ ये घर न हो

वो फ़िराक़ हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन
वो गुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो

कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिल-ओ-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं
मगर उस नगर में न क़ैद कर जहाँ ज़िन्दगी की हवा न हो

कभी दिन की धूप में झूम के कभी शब के फूल को चूम के
यूँ ही साथ साथ चलें सदा कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो

मेरे पास मेरे हबीब आ ज़रा और दिल के क़रीब आ
तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं के बिछड़ने का कोई डर न हो

जानिए एक चाय बेचने वाली का बेटा कैसे बना अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉलर

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JAICKICHAND SINGH-FOOTBALLER

जानिए एक चाय बेचने वाली का बेटा कैसे बना अंतर्राष्ट्रीय  फुटबॉलर 

जैकीचंद सिंह – फुटबॉल खिलाड़ी (JAICKICHAND SINGH-FOOTBALLER )

मेरी मां सड़क किनारे चाय बेचा करती थीं। उनका एक ही सपना था कि अपनी खुद की दुकान हो। हालात सुधरते ही मैंने बाजार में उनके लिए एक स्टॉल खरीदा। हम गरीब थे, मगर मां ने मेरे लिए हमेशा बड़ा सपना देखा। खुशी है कि मैं उनका सपना पूरा कर पाया।

मणिपुर की राजधानी इंफाल से करीब दस किलोमीटर दूर छोटा सा गांव है कीकोल। जैकीचंद तब पांच साल के थे, गांव से लगी कच्ची सड़क से सेना की बख्तरबंद गाड़ियों का आना-जाना आम बात थी। गाड़ियों में सवार सैनिकों को बंदूक थामे देख जैकी के मन में अक्सर यह ख्याल आता कि एक दिन मैं भी सैनिक बनकर ऐसी गाड़ियों में चलूंगा।

नहीं थे हालात  अच्छे

 परिवार के हालात अच्छे नहीं थे। पिता किसान थे। दूसरों के खेत में काम कर किसी तरह गुजारा चलाते थे। उनकी कमाई काफी नहीं थी। साल में कई महीने उनके पास काम नहीं होता था। लिहाजा मां गांव में खेल-मैदान के पास चाय बेचने लगीं।

चाय की दुकान चलाकर बेटे को स्कूल भेजा 

मां खुद कभी स्कूल नहीं गईं, लेकिन बेटे को लेकर उन्होंने बड़े सपने देख रखे थे। वह जानती थीं कि उनके सपनों की मंजिल का दरवाजा स्कूल से होकर गुजरता था। इसलिए तमाम मुश्किलों की परवाह किए बिना बेटे को स्कूल में भर्ती करा दिया।

जैकी भी करते थे माँ की मदद 

जैकीचंद बताते हैं, मां सुबह चार बजे घर से निकल जाती थीं और रात आठ बजे लौटती थीं। वह बहुत मेहनत करती थीं। स्कूल से छूटते ही मैं उनकी दुकान पर पहुंच जाता था, उनकी मदद करने के लिए। मां की दुकान में तमाम युवा खिलाड़ी चाय पीने आया करते थे। उन्हें देखते ही नन्हे जैकी लपककर उन्हें चाय पहुंचाते और खुशी-खुशी उनके जूठे कप धोते।

मौका मिलते ही फुटबॉल खेलने चले जाते थे  

 इस दौरान उनकी निगाहें खिलाड़ियों की फुटबॉल पर टिकी रहतीं। बच्चे की उत्सुकता देखकर कई बार खिलाड़ी उन्हें कुछ देर के लिए अपनी गेंद दे देते खेलने के लिए। जैकी को बड़ा मजा आता। जब भी मौका मिलता, वह मैदान में पहुंच जाते। खिलाड़ियों को फुटबॉल पर किक मारते हुए देखना बड़ा सुखद था। सभी खिलाड़ी और कोच जानते थे कि वह चाय बेचने वाली के बेटे हैं, इसलिए किसी ने कभी उन्हें मैदान के अंदर आने से नहीं रोका। लंच के दौरान या शाम को खेल खत्म होने के बाद मौका मिलते ही जैकी फुटबॉल खेलने लगते। अब वह आठवीं कक्षा पास कर चुके थे।

फूटबाल खेलने की ललक जगी 

 यह बात 2004 की है। मन में आया कि क्यों न मैं भी फुटबॉल की ट्रेनिंग लूं? फिर किसी ने बताया कि कोच फ्री में नहीं सिखाते। फीस देनी पड़ती है। मन छोटा हो गया। कहां से लाऊंगा फीस? एक दिन फुटबॉल कोच उनकी दुकान पर चाय पी रहे थे। जैकी ने हिचकते हुए कहा, मैं फुटबॉल खेलना चाहता हूं। कोच महोदय ने शिलांग स्थित आर्मी ब्यॉज एकेडमी जाने की सलाह दी। उन्होंने तुरंत तय कर लिया कि शिलांग जाऊंगा।

पांच साल तक एकेडमी में रहे

जैकी बताते हैं, मुझे  शिलांग जाना था। जब पिताजी ने मुझे बस में बिठाया, तो मैं बहुत रोया। समझ में नहीं आ रहा था कि मां से दूर कैसे रह पाऊंगा? पर मां खुश थीं, क्योंकि उन्हें यकीन था कि उनका सपना सच होगा।जैकी पांच साल तक एकेडमी में रहे। साल 2009 में रॉयल वा¨हगदोह एफसी के लिए उनका चयन हुआ। इसके बाद हालात सुधरने लगे। वह कई साल तक इस टीम का हिस्सा रहे और क्लब ने उनकी बदौलत कई यादगार जीत हासिल कीं। इसके बाद उन्हें पीछे मुड़कर देखने की नौबत नहीं आई।

हालत सुधरने पर चाय की दुकान बंद करवाई 

जैकीचंद बताते हैं, तब मुझे खेल के लिए 20 हजार रुपये महीना मिलते थे। इससे परिवार की काफी मदद हो जाती थी। हालांकि इस पैसे का काफी हिस्सा मेरे खान-पान व आने-जाने पर खर्च होता था। साल 2014 में वह देश की पेशेवर फुटबॉल स्पर्धा आई-लीग का हिस्सा बने। इसके बाद तो उन्होंने चाय की दुकान बंद करवा दी और मां को घर में आराम करने को कहा। अब उनकी कमाई परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए काफी थी।

सीनियर नेशनल फुटबॉल टीम के लिए खेलने का मिला मौका 

 अगले साल यानी 2015 में उन्हें आई-लीग के पहले टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन के लिए ‘प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट’ घोषित किया गया। इनाम में दो लाख रुपये मिले। इसके बाद सीनियर नेशनल फुटबॉल टीम के लिए खेलने का मौका मिला। यह उनके जीवन का अहम पड़ाव था।

ऋतिक ने  कहा जैकी  रॉकेट की तरह उड़ता है 

 जैकीचंद बताते हैं, यह बात 2015 की है। अगले दिन आईएसएल के खिलाड़ियों की नीलामी होनी थी। उस रात मैं सो नहीं पाया। समझ में नहीं आ रहा था कि कोई क्लब मुझे  अपनी टीम में शामिल करेगा या नहीं? अगले दिन बॉलीवुड अभिनेता ऋतिक रोशन के सह स्वामित्व वाली पुणो सिटी एफसी ने उन्हें 45 लाख रुपये में साइन किया। नीलामी के बाद ऋतिक ने उनकी तारीफ करते हुए कहा था, जैकी बेहतरीन खिलाड़ी है। उसके अंदर बड़ी ऊर्जा है। वह रॉकेट की तरह उड़ता है।

आईएसएल ने 55 लाख रुपये में किया  साइन

जल्द ही जैकीचंद फुटबॉल की दुनिया में बड़ा नाम बन गए। इस साल वह केरल ब्लास्र्ट्स की तरफ से खेलेंगे। इसी सप्ताह आईएसएल ने 55 लाख रुपये में साइन किया। अब उनका एक ही सपना है, माता-पिता को अच्छी जिंदगी देना, ताकि वह सम्मान से जी सकें।

 मां को खुश देख दिल को बड़ा सुकून मिलता है

उन्होंने पिता को हमेशा दूसरों के खेत में काम करते देखा। कई बार उन्हें काम की तलाश में भटकते हुए देख उन्हें बुरा लगता था। लिहाजा हालात सुधरते ही उन्होंने गांव के पास जमीन खरीदी, ताकि पिताजी अपने खेत में फसल उगा सकें। जैकी कहते हैं, मां सड़क किनारे चाय बेचा करती थीं। मैं चाहता था कि उनकी अपनी दुकान हो। इसलिए इंफाल के ख्वारामबादा बाजार में उनके लिए स्टॉल खरीदा। मां को खुश देख दिल को बड़ा सुकून मिलता है।

साभार -हिंदुस्तान अख़बार

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जानें टूरिस्टों को गाइड करने वाले शख्स ने कैसे खड़ा किया अलीबाबा जैसी कंपनी

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हार्वर्ड ने 10 बार किया था इन्हें रिजेक्ट, पर हार नहीं मानी, आज दुनिया करती है सलाम

दुनिया में रोज बहुत सारे लोग नौकरी से निकाले जाते हैं या नौकरी पाने के लिए कंपनियों के दरवाजे खटखटाते हैं, उनमें से कुछ लोगों को नौकरी मिलती है और कुछ को नहीं । लेकिन दुनिया में कुछ लोग ही ऐसे होते हैं जो नौकरी न मिलने पर खुद की कंपनी खोलने के बारे में सोचते हैं । इन्हीं लोगों में से एक जुनूनी, मेहनती, काम करने के लिए एक हद तक पागल व्यक्ति का नाम जैक मा है जो चीन के सबसे अमीर लोगों में से एक हैं।

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यह कहानी चीन के एक ऐसे उद्योगपति की है जिसने जीवन में मिली असफलताओं को सीढ़ी बनाकर कामयाबी की बुलंदी हासिल की। हम बात कर रहे हैं अलीबाबा ग्रुप के संस्थापक जैक मा की। कभी एक मामूली-सी नौकरी की तलाश में जुटे जैक मा की गिनती आज चीन के ही नहीं बल्कि दुनिया के अमीरों में होती है। जानिए उनके जीवन से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें।

आमदनी का नहीं था कोई जरिया 

जैक मा का जन्म 10 सितम्बर 1964 को चीन के हांगजोऊ में हुआ था। उनके माता-पिता के पास आमदनी का कोई ठोस जरिया नहीं था। वे पारंपरिक नाटक और कहानियां सुनाने का काम करते थे। चीन में मंदारिन भाषा बोली जाती है और जैक की युवावस्था के दौर में अंग्रेजी को ज्यादा अहमियत नहीं दी जाती थी। तभी उनमें अंग्रेजी को लेकर लगाव पैदा हुआ। अंग्रेजी सीखने के लिए वे अपने घर से काफी दूर उन होटलों की ओर चले जाते थे, जहां विदेशी पर्यटक ठहरते थे। वे वहा उनसे टूटी-फूटी अंग्रेजी में बातचीत की कोशिश करते।

 हाॅर्वर्ड यूनिवर्सिटी ने  उन्हें दस बार किया रिजेक्ट

अंग्रेजी पर पकड़ होने के बाद वे गाइड का काम करने लगे। इससे उन्हें विदेशी संस्कृति, तौर-तरीकों, पसंद-नापसंद और अन्य बातों की जानकारी हुई। उन्होंने करीब 9 साल तक गाइड का ही काम किया। जैक मानते हैं कि इस काम से उन्हें भविष्य में बड़ी मदद मिली। उन्होंने पश्चिमी तकनीक और तरीकों को करीब से जाना।
अब बात करते हैं जैक के विद्यार्थी जीवन की। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि स्कूली दिनों में जैक पढ़ाई में ज्यादा अच्छे नहीं थे। वे पांचवीं कक्षा में दो बार फेल हो गए थे। यही नहीं वे आठवीं कक्षा में तीन बार फेल हुए। यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा में भी तीन बार फेल हुए। हाॅर्वर्ड यूनिवर्सिटी ने तो उन्हें दस बार रिजेक्ट किया लेकिन जैक ने हार नहीं मानी। हर असफलता से सीखते गए और निराश नहीं हुए।

ढीला-ढाला देखकर किया रिजेक्ट 

जैक मा ने करियर की शुरुवात काफी कठिन और चुनौतीपूर्ण रहा। जैक मा ने 30 अलग अलग जगहों पर नौकरी के लिए आवेदन किये लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी। जैक मा सबसे पहले एक पुलिस की नौकरी के लिए आवेदन किया था लेकिन ढीला-ढाला देखकर उन्हें साफ मना कर दिया।

24 लोगो में केवल उनका नहीं हुआ चयन 

एक बार केएफसी ने उनके शहर में नौकरी के लिए वैकेंसी निकाली। इसके लिए कुल 24 लोगों ने आवेदन किया। जैक भी उनमें से एक थे। बाद में पता चला कि कंपनी ने उनमें से 23 लोगों का चयन कर लिया। सिर्फ जैक को रिजेक्ट कर दिया गया। सोचिए, उस वक्त उन्हें कैसा लगा होगा!

इन्टरनेट की तरफ बढ़ा खिचाव 

जैक इंटरनेट की दुनिया में बिजनेस करने से पहले एक ट्रांसलेशन कंपनी चलाते थे। 1994 में जैक मा ने पहली बार इन्टरनेट का नाम सूना। जिसके बाद वे अमेरिका गए और वहां उन्होंने इंटरनेट देखा और उन्होंने सबसे पहला शब्द इंटरनेट पर Beer (भालू) टाइप किया। उनके सामने कई देशों के बीयर ऑप्शन दिखे लेकिन चाइनीज बीयर नहीं दिखा।

अगले बार उन्होंने चीन के बारे में सामान्य जानकारी ढूंढने की कोशिश की लेकिन फिर वो चौंक गये कि चीन को कोई जानकारी इन्टनेट पर उपलब्ध नही थी। अपने देश की जानकारी इंटरनेट पर ना होने से जैक को काफी दुखी हुई। क्योंकि इससे उन्हें लग गया था कि चीन तकनीकी क्षेत्र में अन्य देशो से काफी पीछे है।

चीन की जानकारी देने वाली  वेबसाइट “अग्ली” बनाई

इसी वजह से उन्होंने अपने दोस्तो के साथ मिलकर चीन की जानकारी देने वाली पहली वेबसाइट “अग्ली” (Ugly) बनाई। इस वेबसाइट के बनाने के महज पांच घंटो के अंदर उन्हें कुछ चीनी लोगो के ईमेल आये जो जैक के बारे में जानना चाहते थे। तब जैक मा को एहसास हुआ कि इन्टरनेट से बहुत कुछ किया जा सकता।

अपनी बहन से भी  पैसे उधार लेना पड़ा 

1995 में जैक मा ,उनकी पत्नी और दोस्तों ने मिलकर 20,000 डॉलर इखट्टे किये और एक कम्पनी की शुरुवात की। इस कम्पनी का मुख्य काम था दुसरी कंपनियों के लिए वेबसाइट बनाना। उन्होंने अपनी कम्पनी का नाम “चयना येल्लो पेजस” (China Yellow Pages) रखा था। इस कंपनी को शुरू करने के लिए जैक ने अपनी बहन से पैसे उधार लिए थे। लेकिन यह कंपनी फेल हो गई। इसके बाद उन्होंने चीन की कॉमर्स मिनिस्ट्री में काम किया जिसमे वे अध्यक्ष पद मे थे। कुछ दिनों के बाद नौकरी छोड़ दी, जिसके बाद वे अपने घर हैंग्जू चले गए और जहा उन्होंने अपने 17 दोस्तों के साथ मिलकर अलीबाबा (Alibaba) की शुरुआत की।

अमेरिका का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ

अलीबाबा कंपनी की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगया जा सकता है कि इस कंपनी ने अपना आईपीओ 4080 रुपए (68 डॉलर) पर पेश किया था और मार्केट खत्म होने पर इसकी कीमत 5711 रुपए (93.89 डॉलर) हो गई थी. इसे अमेरिका का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ बताया जा रहा है। उनकी निजी संपत्ति की कीमत करीब 130800 करोड़ रुपए है।

 eBay के  प्रस्ताव ठुकराया 

ग्लोबल इ कॉमर्स सिस्टम  को सुधारन के लिए 2003 में जैक मा ने Taobao Marketplace की स्थापना की। जिसके बढ़ते प्रभाव को देखते हुए eBay ने इसे खरीदने का ऑफर दिया। लेकिन जैक मा ने eBay का प्रस्ताव ठुकरा दिया और इसकी बजाय उसने याहू (Yahoo) के को-फाउंडर जेरी से 1 बिलियन डॉलर की सहायता ली।
 अलीबाबा कंपनी के शुरुआती दिनों में सिर्फ 18 लोग काम करते थे और अभी करीब 22 हजार लोग काम करते हैं।अलीबाबा.कॉम (Alibaba.com) के नाम से मशहूर यह कंपनी दुनिया भर के 190 कंपनियों से जुड़ी हुई है। अलीबाबा.कॉम वेबसाइट के अलावा तओबाओ.कॉम (Taobao.com) चलाती है जो चीन की सबसे बड़ी शॉपिंग वेबसाइट है। इसके अलावे चीन की बड़ी जनसंख्या को इनकी वेबसाइट तमल्ल.कॉम (Tmall.com) ब्रांडेड चीजें मुहैया कराती हैं।यही नहीं, चीन में ट्विटर जैसी सोशल मीडिया सिना वाइबो (Sina Weibo) में भी इस कंपनी की बड़ी हिस्सेदारी है। इसके साथ ही यूट्यूब जैसी वीडियो शेयरिंग वेबसाइट यौकू टुद्ौऊ (Youku Tudou) में भी इसकी अहम हिस्सेदारी है। ये कंपनियां मार्केटिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग और लोजिस्ट सेवाएं देती हैं।

निजी जीवन (विवाह)

जैक मा ने जेंगयिंग (Zhang Ying) से शादी की थी और उनके एक पुत्र एवं एक पुत्री है। जैक अपनी पत्नी से पहली बार तब मिले जब वो Hangzhou Normal University में पढ़ रहे थे। स्नातक होने के बाद तुरंत 1980 के दशक में दोनों ने शादी कर ली और दोनों ने ही अध्यापक का काम शूरू कर दिया था जैक के बारे में उनकी पत्नी जैंग यिंग का मानना है ‘जैक हैंडसम नहीं है, लेकिन मुझे उनसे इसलिए प्यार हो गया, क्योंकि वे ऐसे कई काम कर सकते हैं जो हैंडसम पुरुष भी नहीं कर सकते’।

जैक मा के अनमोल विचार

आपको अपने प्रतिद्वंद्वी से सीखना चाहिए, लेकिन कभी उसकी नकल न करें। अगर नकल की तो समझें कि आप खत्म हो गए।

सरकार के साथ कभी भी कारोबार मत करो। उसके साथ प्यार करो लेकिन शादी कभी मत करो।

कभी हार न मानो। आज का दिन कठिन है, कल और भी बदतर होगा, लेकिन परसों सुनहरी धूप खिलेगी।

युवा लोगों की मदद करो। छोटे लोगों की मदद करो। क्योंकि छोटे लोग बड़े होंगे। युवाओं के दिमाग में वो बीज होगा जो आप उनमे बोयेंगे, और जब वे बड़े होंगे, वे दुनिया बदल देंगे।

आपको आपके साथ सही लोग चाहिए होते हैं, सबसे अच्छे लोग नहीं

इससे फर्क नहीं पड़ता कि पीछा कितना कठिन है, आपके पास हमेशा वो सपना होना चाहिए जो आपने पहले दिन देखा था। वो आपको प्रेरित रखेगा और (किसी कमजोर विचार से ) आपको बचाएगा

हमारे पास कभी भी पैसों की कमी नहीं होती। हमारे पास कमी होती है सपने देखने वाले लोगों की, जो अपने सपनो के लिए मर सकें

 
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