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Saturday, October 3, 2026
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अखबार में सबसे नीचे बने चार रंगीन बिंदुओं का मतलब जानिये

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हम रोजाना अपनी जिंदगी में कई ऐसी छोटी छोटी चीजो को बार बार देखते है जिसे हम नजरंदाज कर देते है . अख़बार तो रोज सभी अपने घरो में पढ़ते ही होंगे लेकिन शायद ही किसी ने अख़बार पढ़ते समय अख़बार पर बने चार रंगीन बिन्दुओ पर ध्यान दिया होगा | किसी ने ध्यान दिया भी होगा तो सोचा भी नहीं होगा की इसका भी कुछ मतलब होता होगा | तो दोस्तों आज हम इस पोस्ट में आपको बताएँगे की अख़बार पर बने इन बिन्दुओ का मतलब क्या होता है

रंगीन बिंदुओँ की लाइन का मतलब

हर अखबार में सबसे नीचे चार रंगों की बिंदुएं एक लाइन में बनी होती हैं. चार रंगों की बिंदुओं की ये लाइन किसी रोड ट्रैफिक की बिंदुओं की तरह नहीं होती हैं जिन्हें खबरों के बारे में कुछ बताना हो लेकिन आखिर इसका क्या मतलब होता है.

इंद्रधनुष में भी होता है रंगों का एक निश्चित क्रम

आपने इंद्रधनुष भी देखा ही होगा जिसमें सात रंग होते हैं और उनका एक निश्चित क्रम भी होता है . लेकिन अखबार के नीचे बने इन चार रंगों की लाइन का कुछ मतलब जरूर होता ही होगा.

मुख्य रंगों का होता है एक क्रम

आपने कहीं ना कहीं सुना या पढ़ा ही होगा कि रंग मुख्यत: तीन ही होते हैं जो लाल, पीला, नीला होते हैं. मुख्य रंगों का यही क्रम प्रिंटर में भी काम करता है और इसके साथ ही एक और रंग काला जुड़ जाता है.

प्रिंटर में भी रंगीन बिंदुओं का होता है एक क्रम

लाल, पीला, नीला और काला रंग अखबार में CMYK के क्रम में होते हैं. सबसे पहले C से Cyan जो कि नीला, M से Magenta जो कि गुलाबी रंग होता है और फिर इसके बाद पीला और गुलाबी रंग आता है. कोई भी इमेज प्रिंटर द्वारा प्रिंट किया जाता है तो वो इन्ही चारो रनों के निश्चित अनुपात में मिलाने से बनता है . अगर आप अख़बार में कोई इमेज देखते है और वह धुंधला या सही से नहीं दीखता है तो इसका कारण है की प्रिंटर के मुख्य रंग CMYK एक लाइन में प्रिंट नहीं हुए है .

प्रिंटिंग की क्वालिटी चेक करने के लिए होता है उपयोग 

रोज इतनी मात्रा में अख़बार छापते है की हर अख़बार की इमेज चेक करना आसान नहीं है इसलिए अख़बार छपने वाले अख़बार के निचे में इन चार रंगों के डॉट या रजिस्ट्रेशन मार्क छोड़ देते है जिससे उन्हें आसानी होती है की ये चारो रंग अख़बार में सही से एकदूसरे के ऊपर प्रिंट हुए है की नहीं .

बुक प्रिंटिंग में भी इसी तरह होती है 

यह विधि किताब छापते समय भी अपनाई जाती है लेकिन ये डॉट किताब की BINDING करते समय हटा दी जाती है . तो अगर अगली बार अख़बार पढ़ते समय आपको उस पर छपी फोटो साफ नहीं दिखे तो अख़बार के निचे छपे इन चार बिन्दुओ को जरुर देखे की वे एक लाइन में प्रिंट हुए है या नहीं .

अश्वेत होने से कुछ फर्क नहीं पड़ता – नाओमी ओसाका

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दोस्तों आज हम एक ऐसे अश्वेत लड़की की प्रेरणादायक कहानी सुनाने जा रहे है जिसने ये साबित करके दिखाया की अगर आपमें इच्छाशक्ति है तो अश्वेत होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है . अश्वेत पिता की संतान होने के कारण कई बार इन्हे नस्लभेदी टिप्पणी भी झेलनी पड़ी . हम बात कर रहे है जापान की नाओमी ओसका के बारे में जिसने युएस ओपन में अपनी आदर्श सेरेना विलियम्स को हराकर  ग्रैंडस्लैम  जितने वाली जापान की पहली महिला खिलाडी बन गयी .

NAOMI OSAKA BIOGRAPHY IN HINDI (नाओमी ओसका जीवन परिचय )

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नाओमी ओसका को  बचपन से ही अपनी पहचान को लेकर भेदभाव का सामना करना पड़ा . नाओमी ओसका  के पिता कैरेबियाई देश हैती के थे और मां जापान की। अश्वेत पिता की संतान होने के कारण उन्हें बचपन से ही कष्ट उठाने पड़े और अपनी पहचान छुपाकर रखनी पड़ी । नाना-नानी उनके पिता को पसंद नहीं करते थे। जिसके कारण  परिवारिक रिश्तों में तनाव का असर उन पर भी पड़ा।

माता पिता की दिलचस्प प्रेम कहानी 

नाओमी के माता-पिता की प्रेम कहानी काफी दिलचस्प है। उनके पिताका नाम लियोनार्ड सान है जिसका जन्म करेबियाई देश हैती में हुआ। उच्च शिक्षा के लिए वह अमेरिका गए। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से उन्होंने मास्टर्स की डिग्री हासिल की। इसके बाद वह पढ़ाई के सिलसिले में ही कुछ समय के लिए जापान में रहे। वहीं पर उनकी मुलाकात तमाकी ओसाका नाम की जापानी लड़की से हुई। पहली ही मुलाकात में उनमें अच्छी दोस्ती हो गई।

अश्वेत लड़के से शादी मंजूर नहीं  

जल्द ही उनकी दोस्ती प्यार में बदल गई। वे एक-दूसरे से बेइंतिहा प्यार करने लगे। वे एक-दूजे से शादी कर  जिंदगी गुजारना चाहते थे। हालांकि तमाकी जानती थीं कि उनके घरवालों इस रिश्ते को कभी मंजूर नहीं करेंगे। जब उनके पिता को पता चला कि बेटी एक अश्वेत लड़के से प्यार करती है, तो वह भड़क गए। उनके समाज में ऐसे रिश्ते के लिए कोई जगह नहीं थी। तमाकी की मां भी परेशान हो गईं। उन्हें लगा कि अगर लोगों को पता चला कि इनकी बेटी ने अश्वेत लड़के से शादी की है, तो बहुत बदनामी होगी। उनलोगों की शादी के बाद वह इतनी नाराज हुईं कि बेटी से रिश्ता ही तोड़ लिया। दस साल तक उन्होंने बेटी-दामाद से बात नहीं की।

छुपानी पड़ी अपनी पहचान

तमाकी ओसाका को अश्वेत पति के साथ जापान में रहना आसान नहीं था । एक तरफ माता-पिता नाराज थे तो दूसरी तरफ समाज में नस्ली भेदभाव का दंश। इसलिए उन्होंने अपनी पहली बेटी का नाम मारी ओसाका रखा। दरअसल, वह जानती थीं कि जापान में हैती का उपनाम स्वीकार नहीं होगा। मारी के बाद नाओमी का जन्म हुआ। मां ने अपनी दोनों बेटियों को अपना ओसाका उपनाम दिया, ताकि आगे उन्हें अपनी पहचान को लेकर कोई संकट न झेलना पड़े।

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नाओमी के पिता को था टेनिस से लगाव 

मारी और नाओमी के जन्म के बाद उनके पिता को अमेरिका में नौकरी मिल गई। तब नाओमी तीन साल की थीं। यह साल 2000 की बात है। उन दिनों टेनिस की दुनिया में विलियम सिस्टर्स (सेरेना विलियम और उनकी बहन वीनस विलियम) का जादू छाया हुआ था। नाओमी के पापा को टेनिस बहुत पसंद था। वह अक्सर अपनी बेटियों के साथ टेनिस मैच देखने जाया करते। विलियम सिस्टर्स से तो वह इतने प्रभावित थे कि उन्होंने तय किया कि अपनी बेटियों को टेनिस खिलाड़ी बनाएंगे। बेटियों को टेनिस सिखाने के लिए वह न्यूयॉर्क छोड़ फलोरिडा आकर रहने लगे।

दोनों लडकियों ने शुरू किया टेनिस खेलना  

पहले बड़ी बहन मारी की ट्र्रेंनग शुरू हुई, फिर नाओमी ने खेलना शुरू किया। दोनों ने फ्लोरिडा टेनिस एसबीटी एकेडमी से ट्र्रेंनग ली। जल्द ही वे लोकल मैचों में हिस्सा लेने लगीं। बेटियों को डबल्स खेलते देख पापा बहुत खुश होते थे।

Naomi Osaka v Julia Glushko - Day 4
August 30, 2018 – Naomi Osaka and Julia Glushko shake hands after Osaka won the match at the 2018 US Open.

नाओमी बताती हैं-

मैं अक्सर अपनी बड़ी बहन से हार जाती थी। 15 साल की उम्र तक मैं मारी से हारती रही। इसके बाद मैं जीतने लगी।

होने लगी इस अश्वेत जापानी लड़की की चर्चा 

साल 2014 में 16 साल की उम्र में नाओमी ने यूएस चैंपियन समांथा स्टोसुर को हराया। वह उनकी पहली बड़ी जीत थी। फिर तो वह सुर्खियों में छा गईं। हर तरफ इस अश्वेत जापानी लड़की की चर्चा होने लगी। एक बार फिर वह अपनी पहचान को लेकर असहज महसूस करने लगीं। कोई उन्हें जापानी-अमेरिकी कहता, तो कोई हैतियन-जापानी। नाओमी जानती थीं कि उनके नाना-नानी जापान में हैं, और वे उनसे कोई रिश्ता नहीं रखना चाहते। वह उनकी नाराजगी की वजह समझती थीं।

नाओमी बताती हैं-

अश्वेत होने की वजह से लोग मेरे बारे में भ्रमित हो जाते हैं। उन्हें लगता कि अगर यह लड़की जापानी है, तो अश्वेत क्यों है?

पहला  ग्रैंड स्लेम खिताब जीत पुरे जापान में खलबली मचा दी 

अपनी पहचान के संकट को नजरअंदाज कर वह आगे बढ़ती रहीं। 2016 में नाओमी ‘टोरे पैन पैसिफिक ओपन’ के फाइनल में पहुंचीं। इसके बाद तो उनका नाम वर्ल्ड- 50 रैंकिंग में शामिल हो गया। मार्च 2018 में उन्होंने इंडियन वेल्स टूर्नामेंट में शानदार जीत हासिल की। इस टूर्नामेंट में उन्होंने विश्व की पूर्व नंबर वन खिलाड़ी मारिया शारापोवा को हराया। अब उनका एक ही सपना था, एक बार सेरेना के साथ खेलना। इस सप्ताह यह सपना भी पूरा हुआ। इस बार यूएस ओपन में सेरेना उनके सामने थीं। यह बहुत रोमांचक मैच था। सबको उम्मीद थी कि सेरेना ही ग्रैंड स्लेम जीतेंगी, पर बेहद कड़े मुकाबले में नाओमी ने उन्हें हराकर नया रिकॉर्ड बनाया। वह ग्रैंड स्लेम खिताब जीतने वाली पहली जापानी महिला खिलाड़ी बन गईं।

जापानी प्रधानमंत्री ने भी दी बधाई 

इस जीत पर पूरा जापान झूम उठा। जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने ट्वीट किया, जापान को यह जीत दिलाने के लिए शुक्रिया। आपकी जीत से पूरे जापान को एक नई उर्जा और प्रेरणा मिली है। इस जीत ने नाना-नानी की नाराजगी भी दूर कर दी।

इस मौके पर नाओमी के भावुक नाना टेसुओ ओसाका ने कहा,

मैंने और मेरी पत्नी ने टीवी पर अपनी नातिन का पूरा मैच देखा। उसकी जीत देखकर हम बहुत रोए। अब एक ही ख्वाहिश है, मेरी बच्ची 2020 में टोक्यो में होने वाले ओलंपिक में जीत हासिल करे।

जानिए पद्म विभूषण , पद्म भूषण , पद्म श्री के बिच का अंतर

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जानिए पद्म विभूषण , पद्म भूषण , पद्म श्री के बिच का अंतर

पद्म पुरस्कार देश के सर्वोच्च सम्मानों में से एक है जो भारत सरकार  द्वारा भारतीय नागरिको को असाधरण कार्यों के लिए प्रदान किया जाता है । भारत का सबसे बड़ा नागरिक पुरस्कार भारत रत्न है जिसकी शुरुआत  2 जनवरी 1954 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गयी थी . उस समय किवल जीवित व्यक्ति ही इस पुरस्कार को प्राप्त कर सकते थे पर बाद में इसे मरणोपरांत भी दिया जाने लगा . आज हम आपको बताने जा रहे है भारत के तिन प्रमुख नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण , पद्म भूषण और पद्म श्री के बारे में –

शुरुआत 

पद्म श्रेणी के पुरस्कार की शुरुआत 1954 में की गयी थी . प्रत्येक साल के 26 जनवरी को पद्म पुरस्कार पाने वाले नागरिको की घोषणा की जाती है . हालाँकि 1978 ,1979 और 1993-1997 के बीच किन्ही विशेष कारणों से  पद्म पुरस्कारों का वितरण नहीं किया गया था . पद्म पुरस्कार तिन प्रकार के होते है – पद्म पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री  . पद्म पुरस्कार शासकीय सेवको द्वारा प्रदत सेवा के साथ साथ किसी भी क्षेत्र में असाधारण प्रदर्शन करने वाले व्यक्तियों को दिया जाता है .

कौन करता है सिफारिश 

पद्म पुरस्कारों की सिफारिश राज्य सरकार/संघ राज्य प्रशासन, केन्द्रीय मंत्रालय या विभागों के साथ साथ उत्कृष्ट संस्थानों द्वारा किया जाता है ।  इसके बाद एक समिति इन नामों पर विचार करती है। पुरस्कार समिति जब एक बार सिफारिश कर देती है फिर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और राष्ट्रपति इस पर अपना अनुमोदन देते हैं और इसके बाद गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर इन सम्मानों की घोषणा की जाती है।

पद्म विभूषण

पद्म विभूषण पद्म पुरस्कारों में सर्वोच्च होता है और यह भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है . यह पुरस्कार किसी भी क्षेत्र में असाधारण और उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रदान किया जाता है .  इस सम्मान में पुरस्कार के रूप में  1-3/16 इंच का कांसे का एक बिल्ला मिलता है. जिसके केंद्र में एक कमल का फूल होता है. इसमें सफेद रंग में फूल की पत्तियां होती हैं. इस फूल के ऊपर नीचे पद्म विभूषण देवनागरी लिपि में लिखा होता है. वहीं इस बिल्ले के पिछले हिस्से में अशोक चिन्ह बना होता है.

पद्म भूषण

पद्म भूषण पुरस्कार पद्म पुरस्कारों में दुसरे  स्थान पर आता है . यह भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है . इस सम्मान में भी कांसे का बिल्ला दिया जाता है जो 1-3/16 इंच का होता है। इसमें भी बीच में कमल का फूल बना होता है जिसकी तीन पत्तियां इसे घेरे रहती हैं। इस फूल के ऊपर नीचे पद्मभूषण लिखा रहता है।

पद्म श्री 

पद्म श्री पुरस्कार पद्म पुरस्कारों में तीसरे स्थान पर आता है . यह पुरस्कार भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार होता है . इस पुरस्कार में भी कांसे का एक बिल्ला दिया जाता है जिसके बिच में कमल का फुल बना होता है . इस फुल के ऊपर निचे पद्म श्री लिखा रहता है .

बदलाव 

इस तरह के सम्मानों के लिए पारदर्शिता लाने के प्रयास में साल 2017 में सरकार ने सम्मानों के लिए किये जाने वाली नामांकन प्रक्रिया के नियमो में कुछ बदलाव कर दिए | एक अलग से पोर्टल बनाया गया जिस पर न केवल राज्य सरकार या मंत्रालय या विभाग बल्कि एक आम व्यक्ति भी नामांकन कर सकता है | साथ ही सिफारिश करने वाले को अपना आधार नंबर और दूसरी कई जानकारियां साझा करना अनिवार्य किया गया है | इस पोर्टल के अलावा दूसरे किसी तरीके से कोई सिफारिशें स्वीकार नहीं की जाती है |

पद्म पुरस्कार से जुड़े तथ्य 

  1. एक वर्ष में  प्रदान किए जाने वाले कुल पद्म पुरस्कारों की संख्या (मरणोपरान्त तथा विदेशियों को दिए जाने वाले पुरस्कारों को छोड़कर) 120 से अधिक नहीं होनी चाहिए ।
  2. इस अलंकरण में राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुहर से जारी की गई एक सनद (प्रमाण-पत्र) तथा तमगा (मेडल) शामिल होता है। प्रत्येक पुरस्कार विजेता के संबंध में संक्षिप्त परिचय वाली एक स्मारिका भी समारोह वाले दिन जारी की जाती है।
  3. पुरस्कार प्राप्तकतार्ओं को तमगा (मेडल) के साथ एक प्रीतिकृति  भी प्रदान की जाती है, जिसे वे अपनी इच्छानुसार किसी भी समारोह/राजकीय समारोहों आदि में पहन सकते हैं।
  4. यह पुरस्कार कोई पदवी नहीं है और इसे पत्र-शीर्षों, निमंत्रण पत्रों, पोस्टरों, पुस्तकों आदि पर पुरस्कार वजेता के नाम के आगे या पीछे उल्लिखित नहीं किया जा सकता है। इसके दुरुपयोग करने पर चूककर्ता को इस पुरस्कार से वंचित कर दिया जाएगा।
  5. इन पुरस्कारों के साथ कोई नकद भत्ता अथवा रेल/हवाई यात्रा आदि के रूप में कोई रियायत प्रदान नहीं की जाती है।
  6. पुरस्कार समिति का गठन प्रतिवर्ष प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता है|
  7. नामांकन आमंत्रित करने की तिथि तथा नामांकन/सिफ़ारिश प्राप्त करने की अंतिम तिथि क्रमशः 1 मई तथा 15 सितंबर है। इस अविध के दौरान प्राप्त नामांकनों पर ही विचार किया जाता है।

जिन तरह के क्षेत्रों में पद्म पुरस्कार दिए जाते है वो निम्न है –

  • कला के क्षेत्र में जैसे कि संगीत , पेटिंग , फोटोग्राफी आदि |
  • सामाजिक कार्य
  • विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में |
  • व्यापारिक क्षेत्रों में
  • शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र |
  • प्रशासनिक सेवा में |
  • खेल कूद में |
  • और भी बहुत से क्षेत्र |

आज़ादी अभी अधूरी है- अटल बिहारी वाजपेयी

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स्वतंत्रता दिवस की पुकार – अटल बिहारी वाजपेयी

हिंदी कविता 

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का 16 अगस्त 2018 को निधन हो गया .  उन्हें  एक बार नहीं बल्कि तीन बार भारत के प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ. लेकिन वो सिर्फ नेता नहीं थे, उन विरले नेताओं में से थे, जिनका महज साहित्य में झुकाव ही नहीं था बल्कि  वो खुद लिखते भी थे. विविध मंचों से और यहां तक कि संसद में भी उन्होंने  अपनी कविताओं का पाठ कर सबको चकित कर दिया था . उनकी  कविताओं का एक एल्बम भी आ चुका है जिन्हें जगजीत सिंह ने भी अपनी अावाज़ दी है. पढ़िए उनकी कविता -स्वतंत्रता दिवस की पुकार

 

पन्द्रह अगस्त का दिन कहता – आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाक़ी हैं, राखी की शपथ न पूरी है॥ 

जिनकी लाशों पर पग धर कर आजादी भारत में आई। 
वे अब तक हैं खानाबदोश ग़म की काली बदली छाई॥ 

कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आंधी-पानी सहते हैं। 
उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं॥ 

हिन्दू के नाते उनका दुख सुनते यदि तुम्हें लाज आती। 
तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जहाँ कुचली जाती॥ 

इंसान जहाँ बेचा जाता, ईमान ख़रीदा जाता है। 
इस्लाम सिसकियाँ भरता है,डालर मन में मुस्काता है॥ 

भूखों को गोली नंगों को हथियार पिन्हाए जाते हैं। 
सूखे कण्ठों से जेहादी नारे लगवाए जाते हैं॥ 

लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया। 
पख़्तूनों पर, गिलगित पर है ग़मगीन ग़ुलामी का साया॥ 

बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है। 
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥ 

दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएँगे। 
गिलगित से गारो पर्वत तक आजादी पर्व मनाएँगे॥ 

उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें। 
जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें॥

ऊँचाई – अटल बिहारी वाजपेयी

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ऊँचाई – अटल बिहारी वाजपेयी

हिंदी कविता 

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का 16 अगस्त 2018 को निधन हो गया .  उन्हें  एक बार नहीं बल्कि तीन बार भारत के प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ. लेकिन वो सिर्फ नेता नहीं थे, उन विरले नेताओं में से थे, जिनका महज साहित्य में झुकाव ही नहीं था बल्कि  वो खुद लिखते भी थे. विविध मंचों से और यहां तक कि संसद में भी उन्होंने  अपनी कविताओं का पाठ कर सबको चकित कर दिया था . उनकी  कविताओं का एक एल्बम भी आ चुका है जिन्हें जगजीत सिंह ने भी अपनी अावाज़ दी है. पढ़िए उनकी कविता – ऊँचाई

ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।

जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।

ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,

किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

आओ फिर से दिया जलाएँ – अटल बिहारी वाजपेयी

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आओ फिर से दिया जलाएँ – अटल बिहारी वाजपेयी

हिंदी कविता 

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का 16 अगस्त 2018 को निधन हो गया .  उन्हें  एक बार नहीं बल्कि तीन बार भारत के प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ. लेकिन वो सिर्फ नेता नहीं थे, उन विरले नेताओं में से थे, जिनका महज साहित्य में झुकाव ही नहीं था बल्कि  वो खुद लिखते भी थे. विविध मंचों से और यहां तक कि संसद में भी उन्होंने  अपनी कविताओं का पाठ कर सबको चकित कर दिया था . उनकी  कविताओं का एक एल्बम भी आ चुका है जिन्हें जगजीत सिंह ने भी अपनी अावाज़ दी है. पढ़िए उनकी कविता – आओ फिर से दिया जलाएँ .

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

क़दम मिला कर चलना होगा – अटल बिहारी वाजपेयी

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क़दम मिला कर चलना होगा – अटल बिहारी वाजपेयी

हिंदी कविता 

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का 16 अगस्त 2018 को निधन हो गया .  उन्हें  एक बार नहीं बल्कि तीन बार भारत के प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ. लेकिन वो सिर्फ नेता नहीं थे, उन विरले नेताओं में से थे, जिनका महज साहित्य में झुकाव ही नहीं था बल्कि  वो खुद लिखते भी थे. विविध मंचों से और यहां तक कि संसद में भी उन्होंने  अपनी कविताओं का पाठ कर सबको चकित कर दिया था . उनकी  कविताओं का एक एल्बम भी आ चुका है जिन्हें जगजीत सिंह ने भी अपनी अावाज़ दी है. पढ़िए उनकी कविता – कदम मिलकर चलना होगा .

बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,

पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,

निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,

पावस बनकर ढ़लना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,

नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

मौत से ठन गई – अटल बिहारी वाजपेयी 

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मौत से ठन गई – अटल बिहारी वाजपेयी 

हिंदी कविता 

 

ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

 

जानिए जींस में छोटा पॉकेट क्यों दिया जाता है

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वैसे तो आजकल जींस पहनना फैशन का अहम हिस्सा बन चूका है फिर भी अगर आप जींस पहनते होंगे तो जींस के दाये तरफ दी गयी छोटी सी पॉकेट के बारे में जरुर सोचा होगा . आपके मन में भी ये सवाल आया होगा की आखिर जींस में इतनी छोटी पॉकेट क्यों दी जाती है . बहुत सारे लोगो से पूछने पर वे ये बताते है की ये पॉकेट खुदरा सिक्के रखने के लिए बनायीं गयी है लेकिन ये सच नहीं है . तो चलिए हम आपको आज बताते है की ये छोटी सी पॉकेट देने के पीछे की क्या कहानी है ….

मजदूरो के लिए बना था जींस 

जींस का इतिहास काफी पुराना है . आपको जानकर यह आश्चर्य होगा की जिस जींस को हमलोग अपने लुक्स को बेहतर बनाने के लिए पहनते है दरअसल उसका अविष्कार मजदूरो के लिए किया गया था . जींस को शुरुआत में नाविक एवं श्रमिक ही पहनते थे . जींस की जेब पर लगने वाले छोटे बटन भी मजदूरो को ध्यान में रखकर ही लगाये जाते थे . क्युकी मजदुर भरी भरकम करते थे . इसलिए इस बटनों को लगा देने से जींस की सिलाई मजबूत हो जाती थी और जींस कई दिनों तक काम में लायी जा सकती थी .लेकिन कालांतर में इन जींस के बटनों को डिजाईन मान लिया गया

चैन वाली घडियो को रखने के लिए बना था पॉकेट 

जींस में सबसे पहले छोटा पॉकेट 1873 में जींस बनाने वाली कम्पनी लेवी स्ट्रास ने दी थी .लेवी स्ट्रॉस की इस कपंनी को अब लिवाइस नाम से जाना जाता है. आपने देखा होगा कि जींस की दाईं ओर एक छोटी से पॉकेट होती है जिसमें एक दो सिक्कों के अलावा शायद ही कुछ रखा जा सकता है. दरअसल ये पॉकेट इसलिए दी गयी थी ताकि  अमेरिकी काऊबॉय इसमे अपनी चेन वाली घड़ियाँ सुरक्षित रख सके . उस समय पॉकेट में चेन वाली घडियो की रखने का फैशन था . इन्ही  घडियो को टूटने से बचने के लिए लिवाइस ने यह छोटी पॉकेट जींस में देना शुरू कर दिया था. जिसके कारण इस पॉकेट को वाच पॉकेट बोला जाता था .

कौन थे काऊबॉयज 

नॉर्थ अमेरिका में जानवरों की देखभाल करने वाले  और उन्हें हांकने वालो को काऊबॉयज बोला जाता था . ये घोड़े पर चढ़कर अपने कम को अंजाम देते थे .सबसे पहले ये स्पेन में शुरू हुआ .फिर धीरे धीरे कई यूरोपीय देश और अमेरिका में पंहुचा .काऊबॉयज  अपने साथ चेन वाली घडिया लेकर चलते थे और इसे वेस्टकोट  पर पहने थे . इन्ही के लिए लिवाइस ने यह छोटी पॉकेट जींस में देना शुरू किया

अब खुले पैसे रखने के लिए होता है इस्तेमाल

चूँकि अब चेन वाली घडियो का चलन बंद हो गया है लेकिन जींस बनाने वाली कम्पनी ने बिना वजह जाने ही आज भी जींस में पॉकेट बना देती है ताकि जींस स्टाइलिश दिखे . अधिकतर जींस में कम से कम पांच पॉकेट जरूर होते हैं। दो पीछे दो आगे और एक सामने वाली छोटी वॉच पॉकेट. आजकल लोग इस छोटे पॉकेट का इस्तेमाल खुले पैसे ,सिम कार्ड , मेमोरी चिप्स ,टिकट ,पर्सनल चीजो को रखने के लिए करते है .लिवाइस ने यह भी बताया  यह पॉकेट पॉपुलर होने के बाद फ्रंटियर पॉकेट ,मैच पॉकेट आदि के नाम से ज्यादा पुकारा जाता है।

जानिए ट्रेन में बजने वाली इन ग्यारह तरह के सीटियों का मतलब

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भारतीय रेलवे से हम कई बार सफ़र करते है और कभी कभी ट्रेन में बजने वाली सीटियाँ हमें बहुत परेशान करती है | चलते समय तो हॉर्न तो बजाये ही जाते है लेकिन ट्रेन जब प्लेटफॉर्म पर कड़ी रहती है तब भी हॉर्न बजाये जाते है | आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ट्रेन से निकलने वाली अलग अलग तरह की सीटियो के भी अलग अलग मायने है | आज हम भारतीय रेलवे के कुछ ऐसे ही रोचक नियम बताने जा रहे हैं जिसे शायद ही आप जानते होंगे |

हम अक्सर ट्रेन के तेज बजने वाले हॉर्न से परेशान रहते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर  हॉर्न की एक अपनी अलग  कहानी होती हैं।

1. एक छोटा हॉर्न (सिटी )

 अगर आप रेलवे स्टेशन पर खड़े हैं और किसी ट्रेन से एक धीमी सीटी की आवाज आती है तो आप समझ जाइये कि  ट्रेन यार्ड में धुलाई और सफाई के लिए जाने वाली है | ट्रेन का केयरटेकर यानि मोटरमैन रेलगाड़ी को वाशिंगलाइन पर ले जाकर साफ सुथरा करके उसे अगली यात्रा के लिए तैयार करने के लिए ले जा रहा है।

2. दो छोटे हॉर्न (सिटी )

अगर ट्रेन से दो बार सीटी बजने की आवाज आती है तो इसका मतलब है कि रेलगाड़ी यात्रा के लिए तैयार है | ट्रेन की सफाई हो चुकी है और मोटरमैन इसके जरिए गार्ड को संकेत देता है कि वह ट्रेन को यात्रा शुरू करने के लिए रेलवे सिग्नल दे.

3. तीन छोटे हॉर्न (सिटी )

यह आपातकाल स्थिति में बजाया जाता है . रेलगाड़ी से अगर तीन सीटी की आवाज आये तो समझ लीजिए कि ट्रेन  पर से मोटरमैन का  कंट्रेाल ख़त्म हो गया है । इसके बाद गाड़ी को रोकने के लिए गार्ड किसी भी तरह वैक्‍यूम ब्रेक लगाकर उसे रोकने की कोशिश करता है। वैसे तीन बार सीटी बजाने का वक्त बहुत कम ही आता है।

4. चार छोटे हॉर्न (सिटी )

ट्रेन में कुछ टेक्‍निकल प्रॉब्‍लम आ जाये तो चार बार सीटी बजायी जाती है | इसका मतलब है की ट्रेन आगे नहीं जाएगी |  टेक्‍निकल टीम की देखरेख में ट्रेन को यार्ड या स्‍टॉप पर ही छोड़ दिया जाता है।

5. एक लंबा और एक छोटा हॉर्न (सिटी )

जब एक सीटी देर तक और एक धीमी आवाज में बजाई जाती है तो इसका मतलब ये है कि मोटरमैन इंजन को शुरू करने से पहले गार्ड को ब्रेक पाइप सिस्टम सेट करने के लिए सिग्नल दे रहा है. रेलगाड़ी अभी अगली यात्रा के लिए तैयार नही है और रेल का ‘ब्रेक पाइप सिस्‍टम’ सेट किया जाने के बाद  ही ट्रेन को जर्नी के लिए फिट माना जाएगा।

6. दो लंबे और दो छोटे हॉर्न (सिटी )

इस तरह की सीटी से मोटरमैन गार्ड को संकेत देता है कि रेलगाड़ी पूरी तरह से तैयार है और अब वो आकर इसका कंट्रोल अपने हाथ में ले।

7. लगातार बजने वाला हॉर्न 

अगर आपके सामने ये हॉर्न बजे तो आप समझ जाएं कि अभी यह ट्रेन इस स्टेशन पर नहीं रुकेगी |

8. दो छोटे और एक लंबा हॉर्न 

इस तरह के हॉर्न का इस्तेमाल तब किया जाता है जब कोई पैसेंजर चेन खींचकर रेल रोक दे या फिर किसी खास वजह से ट्रेन का वैक्‍यूम ब्रेक लगाया गया हो |

9. दो बार रुककर हॉर्न 

ये हॉर्न रेलवे क्रॉसिंग के पास बजाया जाता है | जब ट्रेन रेलवे क्रॉसिंग से गुजरती है, तो रेलवे ट्रैक के आसपास खड़े यात्री सावधान करने के लिए इस तरह की सीटी का इस्तेमाल होता है।

10. दो लंबे और एक छोटा हॉर्न

इस तरह की सीटी बजने का मतलब होता है कि गाड़ी ट्रैक यानि पटरी बदलकर दूसरे ट्रैक पर जा रही है।

11. रुक- रुक कर 6 बार छोटे हॉर्न 

अगर आप ट्रेन में हैं और 6 बार रुक-रुककर सीटी बजे तो समझ लीजिए कि कोई खतरे घंटी हैl ऐसी सीटी का मतलब होता है कि एलर्ट रहिए क्‍योंकि ट्रेन खतरनाक कंडीशन में है और उसे तत्‍काल सहायता की जरूरत है।
तो दोस्तों कैसी लगी आपको ये जानकारी कमेंट करके जरुर बताये | अब आगे से आप जब भी कभी ट्रेन में सफर करें तो सीटी की इन आवाजों से आप आसानी से समझ जाएंगे कि किस सीटी का क्या मतलब है।