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Thursday, March 19, 2026
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नर हो न निराश करो मन को – मैथिलीशरण गुप्त

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nar ho na nirash karo man ko

नर हो, न निराश करो मन को

 मैथिलीशरण गुप्त

(MAITHILI SHARAN GUPT)
 
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को

संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को

प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को

करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो

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EK GUDIYA KI KIMAT

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गुडिया की कीमत ( प्रेरणादायक  कहानी )

 

एक 6 वर्ष का लडका अपनी 4 वर्ष की छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था।
अचानक से उसे लगा कि, उसकी बहन पीछे रह गयी है।

वह रुका, पीछे मुड़कर देखा तो जाना कि, उसकी बहन एक खिलौने के दुकान के सामने खडी कोई चीज निहार रही है।

लडका पीछे आता है और बहन से पूछता है, “कुछ चाहिये तुम्हें?”

 लडकी एक गुड़िया की तरफ उंगली उठाकर दिखाती है।

बच्चा उसका हाथ पकडता है, एक जिम्मेदार बडे भाई की तरह अपनी बहन को वह गुड़िया देता है। बहन बहुत खुश हो गयी ।

दुकानदार यह सब देख रहा था, बच्चे का व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित भी हुआ ….

अब वह बच्चा बहन के साथ काउंटर पर आया और दुकानदार से पूछा, “कितनी कीमत है इस गुड़िया की ?”

दुकानदार एक शांत और गहरा व्यक्ति था, उसने जीवन के कई उतार देखे थे, उन्होने बड़े प्यार और अपनत्व से बच्चे से पूछा,
“बताओ बेटे, आप क्या दे सकते हो ??”

बच्चा अपनी जेब से वो सारी सीपें बाहर निकालकर दुकानदार को देता है जो उसने थोड़ी देर पहले बहन के साथ समुंदर किनारे से चुन चुन कर बीनी थी !!!

दुकानदार वो सब लेकर यूँ गिनता है जैसे कोई पैसे गिन रहा हो।

सीपें गिनकर वो बच्चे की तरफ देखने लगा तो बच्चा बोला,”सर कुछ कम हैं क्या ??”

दुकानदार :-” नहीं – नहीं, ये तो इस गुड़िया की कीमत से भी ज्यादा है, ज्यादा मैं वापस देता हूँ ” यह कहकर उसने 4 सीपें रख ली और बाकी की बच्चे को वापिस दे दी।

बच्चा बड़ी खुशी से वो सीपें जेब मे रखकर बहन को साथ लेकर चला गया।

यह सब उस दुकान का कामगार देख रहा था, उसने आश्चर्य से मालिक से पूछा, ” मालिक ! इतनी महंगी गुड़िया आपने केवल 4 सीपों के बदले मे दे दी ?”

दुकानदार एक स्मित संतुष्टि वाला हास्य करते हुये बोला,

“हमारे लिये ये केवल सीप है पर उस 6 साल के बच्चे के लिये अतिशय मूल्यवान है और अब इस उम्र में वो नहीं जानता, कि पैसे क्या होते हैं ?

पर जब वह बडा होगा ना…

और जब उसे याद आयेगा कि उसने सीपों के बदले बहन को गुड़िया खरीदकर दी थी, तब उसे मेरी याद जरुर आयेगी, और फिर वह सोचेगा कि,,,,,,
“यह विश्व अच्छे मनुष्यों से भी भरा हुआ है।”*

यही बात उसके अंदर सकारात्मक दृष्टिकोण बढानेे में मदद करेगी और वो भी एक अच्छा इंन्सान बनने के लिये प्रेरित होगा

Source- Whatsapp

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तो देखा दोस्तों ये दुनिया अच्छे लोगो से भरी पड़ी है बस जरुरत है की हम अपनी सोच को सकारत्म रखे है और कोई ऐसा काम न करे जिससे लोग दुसरो पर भरोसा करना छोड़ दे | अगर इस दुकानदार की तरह सोचने वाले आधे लोग भी हो जायेंगे न तो या धरती सवर्ग बन जाएगी
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GOPAL SINGH NEPALI BIOGRAPHY IN HINDI

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‪गोपाल सिंह नेपाली(GOPAL SINGH NEPALI)‬

कलम की स्वाधीनता के लिए आजीवन संघर्षरत रहे ‘गीतों के राजकुमार’ गोपाल सिंह नेपाली लहरों की धारा के विपरीत चलकर हिन्दी साहित्य, पत्रकारिता और फिल्म उद्योग में ऊंचा स्थान हासिल करने वाले छायावादोत्तर काल के विशिष्ट कवि और गीतकार थे।साहित्यिक कविताओं, जन कविताओं के साथ-साथ हिन्दी फिल्मों के लिए भी इन्होने 400 से अधिक गीत लिखे।

गोपाल सिंह नेपाली का जन्म 11 अगस्त 1911 को बेतिया, पश्चिमी चम्पारन (बिहार) में हुआ था। उनका मूल नाम गोपाल बहादुर सिंह है। नेपाली प्रवेशिका तक शिक्षित थे।

 बचपन से ही थे  कवी

गोपाल सिंह नेपाली की काव्य प्रतिभा बचपन में ही दिखाई देने लगी थी। एक बार एक दुकानदार ने बच्चा समझकर उन्हें पुराना कार्बन दे दिया जिस पर उन्होंने वह कार्बन लौटाते हुए दुकानदार से कहा- ‘इसके लिए माफ कीजिएगा गोपाल पर, सड़ियल दिया है आपने कार्बन निकालकर’। उनकी इस कविता को सुनकर दुकानदार काफी शर्मिंदा हुआ और उसने उन्हें नया कार्बन निकालकर दे दिया।

4 हिंदी  पत्रिकाओ का किया संपादन 

साहित्य की लगभग सभी विधाओं में पारंगत नेपाली की पहली कविता ‘भारत गगन के जगमग सितारे’ 1930 में रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा संपादित बाल पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। पत्रकार के रूप में उन्होंने कम से कम 4 हिन्दी पत्रिकाओं- रतलाम टाइम्स, चित्रपट, सुधा और योगी का संपादन किया।

रामधारी सिंह ‘दिनकर भी उनके  मुरीद हुए 

युवावस्था में नेपालीजी के गीतों की लोकप्रियता से प्रभावित होकर उन्हें आदर के साथ कवि सम्मेलनों में बुलाया जाने लगा। उस दौरान एक कवि सम्मेलन में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ उनके एक गीत को सुनकर गद्गनद् हो गए। वह गीत था-


सुनहरी सुबह नेपाल की, ढलती शाम बंगाल की

कर दे फीका रंग चुनरी का, दोपहरी नैनीताल की

क्या दरस-परस की बात यहां, जहां पत्थर में भगवान है

यह मेरा हिन्दुस्तान है, यह मेरा हिन्दुस्तान है…

पत्नी थी नेपाल के राजपुरोहित के परिवार से

नेपालीजी के गीतों की उस दौर में धूम मची हुई थी लेकिन उनकी माली हालत खराब थी। वे चाहते तो नेपाल में उनके लिए सम्मानजनक व्यवस्था हो सकती थी, क्योंकि उनकी पत्नी नेपाल के राजपुरोहित के परिवार से ताल्लुक रखती थीं लेकिन उन्होंने बेतिया में ही रहने का निश्चय किया।


‘मजदूर’ के लिए नेपाली ने   लिखे गीत

वर्ष 1944 में मुंबई में उनकी मुलाकात फिल्मीस्तान के मालिक सेठ तुलाराम जालान से हुई जिन्होंने नेपाली को 200 रुपए प्रतिमाह पर गीतकार के रूप में 4 साल के लिए अनुबंधित कर लिया। फिल्मीस्तान के बैनर तले बनी ऐतिहासिक फिल्म ‘मजदूर’ के लिए नेपाली ने सर्वप्रथम गीत लिखे।

60 से अधिक फिल्मों के लिए लिखे  गीत 

फिल्मों में बतौर गीतकार नेपालीजी 1944 से 1962 तक गीत लेखन करते रहे। इस दौरान उन्होंने 60 से अधिक फिल्मों के लिए लगभग 400 से अधिक गीत लिखे। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकतर गीतों की धुनें भी खुद उन्होंने बनाईं। नेपालीजी ने हिमालय फिल्म्स और नेपाली पिक्चर्स फिल्म कंपनी की स्थापना कर नजराना (1949), सनसनी (1951) और खुशबू (1955) जैसी कुछ फिल्मों का निर्माण भी किया।

नेपालीजी को जीते-जी वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे। अपनी इस भावना को उन्होंने कविता में इस तरह उतारा था-

 

अफसोस नहीं हमको जीवन में कुछ कर न सके

झोलियां किसी की भर न सके, संताप किसी का हर न सके

अपने प्रति सच्चा रहने का जीवनभर हमने यत्न किया

देखा-देखी हम जी न सके, देखा-देखी हम मर न सके।



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 अप्रैल 1963 को अपने जीवन के अंतिम कवि सम्मेलन से कविता पाठ करके लौटते समय बिहार के भागलपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर गोपालसिंह नेपाली का अचानक निधन हो गया।

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DEVENDRA JHAJHARIA BIOGRAPHY IN HINDI

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devendra jhajhariya
Devendra Jhajharia Biography In Hindi
देवेंद्र झाझरिया(रियो पैरा-ओलंपिक विजेता)
 
राजस्थान के चुरू जिले में आठ वर्ष की उम्र में पेड़ पर चढ़ते वक्त उन्हें करीब 11 हजार वोल्ट का करंट लगा था और उस वक्त वे इतने जल चुके थे कि एक रात भी जिंदा रह पाएंगे या नहीं यह तय नहीं था। इस एक्सीडेंट में उनका बाया हाथ खराब हो गया था जिसे काटना पड़ा लेकिन जुझारू देवेंद्र और उनके परिजनों ने हार नहीं मानी और फिर शुरू हुई उनकी सफलता की तरफ बढ़ने की कहानी।
देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) का परिवार काफी निर्धन था। माता-पिता की सारी उम्मीदें बेटे पर टिकी थीं। वे बस एक ही सपने के साथ जी रहे थे कि बेटा पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करे, ताकि घर के हालात सुधर सकें। देवेंद्र का परिवार राजस्थान के चूरू जिले के एक छोटे से गांव में रहता था। देवेंद्र जब पांच साल के हुए, तो पिताजी ने गांव के सरकारी स्कूल में दाखिला करा दिया। मां को बेटे की मासूम शरारतों पर खूब प्यार उमड़ता, मगर यह फिक्र भी लगी रहती कि कहीं इसे चोट न लग जाए। स्कूल से लौटते समय अक्सर देवेंद्र पेड़ पर चढ़ जाते थे। तब वह आठ साल के थे।

पेड़ पर चढ़ते वक्त लगा बिजली का करंट 

देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) एक दिन शाम को स्कूल से लौटते वक्त सड़क किनारे पेड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे कि अचानक बाएं हाथ में तेज झनझनाहट महसूस हुई। पेड़ के आस-पास मौजूद बच्चों को उनकी तेज चीख सुनाई दी। लोगों ने उन्हें पेड़ से नीचे गिरते देखा। गांव वाले भागकर देवेंद्र के घर पहुंचे और उनकी मां को बताया। यह सुनकर मां दौड़कर वहां पहुंचीं। बेहोशी की हालत में उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। डॉक्टर ने बताया कि इसे बिजली का करंट लगा है। होश आया, तो सामने मां खड़ी थीं। उन्होंने आंसू पोंछते हुए कहा, तुम्हें बिजली का करंट लगा है। पर चिंता मत करो, अब तुम ठीक हो।

काटना पड़ा हाथ 

दरअसल देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) जिस पेड़ पर चढ़े थे, उसकी टहनियों के बीच से 11,000 वोल्ट का बिजली का तार गुजर रहा था। धोखे से बायां हाथ तार पर पड़ा और पूरा हाथ झुलस गया। देवेंद्र ने देखा कि उनके पूरे हाथ पर पट्टी बंधी है। हाथ उठाने की कोशिश की, तो उसमें कोई हलचल नहीं हुई। लगा, जैसे हाथ में जान ही न हो। वह बार-बार मां से पूछते रहे- मेरा हाथ कब ठीक होगा?
सब चुप थे। किसी के पास उनके सवाल का जवाब नहीं था। घरवाले डॉक्टर से मिन्नतें कर रहे थे। मां घर बेचकर भी बेटे का इलाज कराने को तैयार थीं। कई दिनों की कोशिश के बाद डॉक्टर ने कह दिया कि इसका हाथ अब काटना पड़ेगा, नहीं तो जहर पूरे शरीर में फैल जाएगा। यह सुनते ही मां के होश उड़ गए। बेटे की जिंदगी का सवाल था, इसलिए डॉक्टर को ऑपरेशन की इजाजत दे दी। पिता परेशान थे। तमाम सवाल थे उनके सामने। क्या अब बेटा अपाहिज बनकर जिएगा? क्या होगा इसका? पढ़ाई कैसे करेगा?
Devendra_Jhajharia
देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia)

घर से निकलना किया बंद 

देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर पहुंचे। अब उनका एक हाथ कट चुका था।वह बताते हैं- ऑपरेशन के बाद पहली बार घर से निकला, तो बड़ा अजीब लगा। सब मेरी ही तरफ देख रहे थे। मुङो लगा, जैसे वे मेरा कटा हुआ हाथ देखकर हंस रहे हैं। मैंने घर से निकलना बंद कर दिया। मां बेटे की मनोदशा समझ रही थीं। बड़ा बुरा लगता था, जब लोग देवेंद्र पर दया दिखाते या कोई तंज कसते।

पिता ने  पढ़ाई के साथ-साथ खेल के लिए  किया प्रेरित 

 मां हर पल उनके संग रहती थीं। उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखतीं। कुछ हफ्ते बाद उन्हें दोबारा स्कूल भेजने की तैयारी शुरू हो गई। मां ने स्कूल बैग तैयार कर दिया। लेकिन देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) को यकीन ही नहीं हो पा रहा था कि वह पहले की तरह दोबारा स्कूल जा पाएंगे।पिता ने बेटे को पढ़ाई के साथ-साथ खेल के लिए प्रेरित किया। वह दोबारा स्कूल जाने लगे।

Devendra Jhajharia के प्रेरणा स्रोत बने मिल्खा सिंह

देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) बताते हैं- उन दिनों मैंने धावक मिल्खा सिंह के किस्से सुने। किसी ने बताया कि मिल्खा के पास दौड़ने के लिए जूते तक नहीं थे, फिर भी उन्होंने कई मेडल जीते। वह मेरे रोल मॉडल बन गए। मैंने खुद से कहा कि मिल्खा जीत सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं?

 भाला फेंकने का किया  अभ्यास 

 धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर लौटने लगी। अब वह अपने भविष्य को लेकर काफी गंभीर हो चुके थे। देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) का पूरा ध्यान पढ़ाई पर था। एक हाथ खोने का गम गहरा तो था, पर इरादे पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत थे। बचपन से उनके अंदर एक हाथ से चीजों को दूर तक फेंकने का हुनर था। पर कभी नहीं सोचा था कि यही हुनर उनकी नई पहचान बनाएगा। उन दिनों कुछ खिलाड़ी गांव में भाला फेंकने का अभ्यास कर रहे थे। देवेंद्र को यह खेल रोमांचकारी लगा। वह लकड़ी का भाला बनाकर अभ्यास करने लगे।

पहले ही टूर्नामेंट में जीता गोल्ड मेडल 

यह बात 1997 की है। तब वह 17 साल के थे। कोच आर डी सिंह की उन पर नजर पड़ी। उन्होंने देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) को ट्रेनिंग देने का फैसला किया। जिले के पहले भाला फेंक टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि हौसले बुलंद हों, तो इंसान कुछ भी हासिल कर सकता है। जीत के बाद तमाम गांव वाले मुबारकबाद देने घर पहुंचे। उम्मीदों को पंख लग चुके थे। कोच ने कहा, खूब मेहनत करो। अब तुम्हें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।

रियो पैरा-ओलंपिक में जीता गोल्ड 

राज्य व राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में जीत दर्ज कराने के बाद 2002 में देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) ने दक्षिण कोरिया में हुए पैसेफिक खेल में गोल्ड मेडल जीता। साल 2004 में उन्होंने एथेंस पैरा-ओलंपिक में गोल्ड मेडल अपने नाम किया और बाद में अपना ही रिकॉर्ड तोड़ते हुए 63़.97 मीटर भाला फेंककर नया वल्र्ड रिकॉर्ड बनाया। इसी साल उन्हें अजरुन पुरस्कार मिला। 2012 में देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) पद्मश्री से सम्मानित हुए। पिछले साल रियो पैरा-ओलंपिक में गोल्ड जीतकर देश का नाम रोशन किया। इसी हफ्ते उन्हें खेल रत्न देने की सिफारिश की गई है।

सेना का करें सहयोग, न खरीदें चीन के उत्पाद

रियो पैरा ओलंपिक में स्वर्ण पदक विजेता देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) ने कहा कि जनता पाकिस्तान का सहयोग करने वाले चाइना के उत्पाद नहीं खरीदें। झाझरिया रविवार को टाउन हाल में अभिनन्दन समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा पाक ने हमारे 18 जवान मारे लेकिन भारत के जवानों ने 38 पाक आतंकियों को उनकी ही जमीन पर मारकर दिखा दिया कि वे दुनिया में किसी से कम नहीं है। झाझड़िया ने कहा कि वे 14 साल से भारत का ध्वज लिए देश और विदेश में घूम रहे हैं। इसकी आन बान और शान को आज तक बरकरार रखा है। उन्होंने संघर्ष की कहानी सुनाते हुए कहा कि चूरू से एक नहीं बल्कि सौ देवेंद्र झाझरिया (Devendra Jhajharia) निकलने चाहिए।

साभार -हिंदुस्तान अख़बार

KABHI YU BHI AA-BASHIR BADRA

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Mh_Bashir_Badr

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न हो

बशीर बद्र (BASHIR BADR)

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे मगर उसके बाद सहर न हो

वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है मुझे ये सिफ़तभी अताकरे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो

मेरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महव-ए-ख़्वाब है चांदनी
न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो

ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चांदनी
न बुझे ख़राबे की रोशनी, कभी बेचिराग़ ये घर न हो

वो फ़िराक़ हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन
वो गुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो

कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिल-ओ-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं
मगर उस नगर में न क़ैद कर जहाँ ज़िन्दगी की हवा न हो

कभी दिन की धूप में झूम के कभी शब के फूल को चूम के
यूँ ही साथ साथ चलें सदा कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो

मेरे पास मेरे हबीब आ ज़रा और दिल के क़रीब आ
तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं के बिछड़ने का कोई डर न हो

जानिए एक चाय बेचने वाली का बेटा कैसे बना अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉलर

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JAICKICHAND SINGH-FOOTBALLER

जानिए एक चाय बेचने वाली का बेटा कैसे बना अंतर्राष्ट्रीय  फुटबॉलर 

जैकीचंद सिंह – फुटबॉल खिलाड़ी (JAICKICHAND SINGH-FOOTBALLER )

मेरी मां सड़क किनारे चाय बेचा करती थीं। उनका एक ही सपना था कि अपनी खुद की दुकान हो। हालात सुधरते ही मैंने बाजार में उनके लिए एक स्टॉल खरीदा। हम गरीब थे, मगर मां ने मेरे लिए हमेशा बड़ा सपना देखा। खुशी है कि मैं उनका सपना पूरा कर पाया।

मणिपुर की राजधानी इंफाल से करीब दस किलोमीटर दूर छोटा सा गांव है कीकोल। जैकीचंद तब पांच साल के थे, गांव से लगी कच्ची सड़क से सेना की बख्तरबंद गाड़ियों का आना-जाना आम बात थी। गाड़ियों में सवार सैनिकों को बंदूक थामे देख जैकी के मन में अक्सर यह ख्याल आता कि एक दिन मैं भी सैनिक बनकर ऐसी गाड़ियों में चलूंगा।

नहीं थे हालात  अच्छे

 परिवार के हालात अच्छे नहीं थे। पिता किसान थे। दूसरों के खेत में काम कर किसी तरह गुजारा चलाते थे। उनकी कमाई काफी नहीं थी। साल में कई महीने उनके पास काम नहीं होता था। लिहाजा मां गांव में खेल-मैदान के पास चाय बेचने लगीं।

चाय की दुकान चलाकर बेटे को स्कूल भेजा 

मां खुद कभी स्कूल नहीं गईं, लेकिन बेटे को लेकर उन्होंने बड़े सपने देख रखे थे। वह जानती थीं कि उनके सपनों की मंजिल का दरवाजा स्कूल से होकर गुजरता था। इसलिए तमाम मुश्किलों की परवाह किए बिना बेटे को स्कूल में भर्ती करा दिया।

जैकी भी करते थे माँ की मदद 

जैकीचंद बताते हैं, मां सुबह चार बजे घर से निकल जाती थीं और रात आठ बजे लौटती थीं। वह बहुत मेहनत करती थीं। स्कूल से छूटते ही मैं उनकी दुकान पर पहुंच जाता था, उनकी मदद करने के लिए। मां की दुकान में तमाम युवा खिलाड़ी चाय पीने आया करते थे। उन्हें देखते ही नन्हे जैकी लपककर उन्हें चाय पहुंचाते और खुशी-खुशी उनके जूठे कप धोते।

मौका मिलते ही फुटबॉल खेलने चले जाते थे  

 इस दौरान उनकी निगाहें खिलाड़ियों की फुटबॉल पर टिकी रहतीं। बच्चे की उत्सुकता देखकर कई बार खिलाड़ी उन्हें कुछ देर के लिए अपनी गेंद दे देते खेलने के लिए। जैकी को बड़ा मजा आता। जब भी मौका मिलता, वह मैदान में पहुंच जाते। खिलाड़ियों को फुटबॉल पर किक मारते हुए देखना बड़ा सुखद था। सभी खिलाड़ी और कोच जानते थे कि वह चाय बेचने वाली के बेटे हैं, इसलिए किसी ने कभी उन्हें मैदान के अंदर आने से नहीं रोका। लंच के दौरान या शाम को खेल खत्म होने के बाद मौका मिलते ही जैकी फुटबॉल खेलने लगते। अब वह आठवीं कक्षा पास कर चुके थे।

फूटबाल खेलने की ललक जगी 

 यह बात 2004 की है। मन में आया कि क्यों न मैं भी फुटबॉल की ट्रेनिंग लूं? फिर किसी ने बताया कि कोच फ्री में नहीं सिखाते। फीस देनी पड़ती है। मन छोटा हो गया। कहां से लाऊंगा फीस? एक दिन फुटबॉल कोच उनकी दुकान पर चाय पी रहे थे। जैकी ने हिचकते हुए कहा, मैं फुटबॉल खेलना चाहता हूं। कोच महोदय ने शिलांग स्थित आर्मी ब्यॉज एकेडमी जाने की सलाह दी। उन्होंने तुरंत तय कर लिया कि शिलांग जाऊंगा।

पांच साल तक एकेडमी में रहे

जैकी बताते हैं, मुझे  शिलांग जाना था। जब पिताजी ने मुझे बस में बिठाया, तो मैं बहुत रोया। समझ में नहीं आ रहा था कि मां से दूर कैसे रह पाऊंगा? पर मां खुश थीं, क्योंकि उन्हें यकीन था कि उनका सपना सच होगा।जैकी पांच साल तक एकेडमी में रहे। साल 2009 में रॉयल वा¨हगदोह एफसी के लिए उनका चयन हुआ। इसके बाद हालात सुधरने लगे। वह कई साल तक इस टीम का हिस्सा रहे और क्लब ने उनकी बदौलत कई यादगार जीत हासिल कीं। इसके बाद उन्हें पीछे मुड़कर देखने की नौबत नहीं आई।

हालत सुधरने पर चाय की दुकान बंद करवाई 

जैकीचंद बताते हैं, तब मुझे खेल के लिए 20 हजार रुपये महीना मिलते थे। इससे परिवार की काफी मदद हो जाती थी। हालांकि इस पैसे का काफी हिस्सा मेरे खान-पान व आने-जाने पर खर्च होता था। साल 2014 में वह देश की पेशेवर फुटबॉल स्पर्धा आई-लीग का हिस्सा बने। इसके बाद तो उन्होंने चाय की दुकान बंद करवा दी और मां को घर में आराम करने को कहा। अब उनकी कमाई परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए काफी थी।

सीनियर नेशनल फुटबॉल टीम के लिए खेलने का मिला मौका 

 अगले साल यानी 2015 में उन्हें आई-लीग के पहले टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन के लिए ‘प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट’ घोषित किया गया। इनाम में दो लाख रुपये मिले। इसके बाद सीनियर नेशनल फुटबॉल टीम के लिए खेलने का मौका मिला। यह उनके जीवन का अहम पड़ाव था।

ऋतिक ने  कहा जैकी  रॉकेट की तरह उड़ता है 

 जैकीचंद बताते हैं, यह बात 2015 की है। अगले दिन आईएसएल के खिलाड़ियों की नीलामी होनी थी। उस रात मैं सो नहीं पाया। समझ में नहीं आ रहा था कि कोई क्लब मुझे  अपनी टीम में शामिल करेगा या नहीं? अगले दिन बॉलीवुड अभिनेता ऋतिक रोशन के सह स्वामित्व वाली पुणो सिटी एफसी ने उन्हें 45 लाख रुपये में साइन किया। नीलामी के बाद ऋतिक ने उनकी तारीफ करते हुए कहा था, जैकी बेहतरीन खिलाड़ी है। उसके अंदर बड़ी ऊर्जा है। वह रॉकेट की तरह उड़ता है।

आईएसएल ने 55 लाख रुपये में किया  साइन

जल्द ही जैकीचंद फुटबॉल की दुनिया में बड़ा नाम बन गए। इस साल वह केरल ब्लास्र्ट्स की तरफ से खेलेंगे। इसी सप्ताह आईएसएल ने 55 लाख रुपये में साइन किया। अब उनका एक ही सपना है, माता-पिता को अच्छी जिंदगी देना, ताकि वह सम्मान से जी सकें।

 मां को खुश देख दिल को बड़ा सुकून मिलता है

उन्होंने पिता को हमेशा दूसरों के खेत में काम करते देखा। कई बार उन्हें काम की तलाश में भटकते हुए देख उन्हें बुरा लगता था। लिहाजा हालात सुधरते ही उन्होंने गांव के पास जमीन खरीदी, ताकि पिताजी अपने खेत में फसल उगा सकें। जैकी कहते हैं, मां सड़क किनारे चाय बेचा करती थीं। मैं चाहता था कि उनकी अपनी दुकान हो। इसलिए इंफाल के ख्वारामबादा बाजार में उनके लिए स्टॉल खरीदा। मां को खुश देख दिल को बड़ा सुकून मिलता है।

साभार -हिंदुस्तान अख़बार

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जानें टूरिस्टों को गाइड करने वाले शख्स ने कैसे खड़ा किया अलीबाबा जैसी कंपनी

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jack ma -alibaba

हार्वर्ड ने 10 बार किया था इन्हें रिजेक्ट, पर हार नहीं मानी, आज दुनिया करती है सलाम

दुनिया में रोज बहुत सारे लोग नौकरी से निकाले जाते हैं या नौकरी पाने के लिए कंपनियों के दरवाजे खटखटाते हैं, उनमें से कुछ लोगों को नौकरी मिलती है और कुछ को नहीं लेकिन दुनिया में कुछ लोग ही ऐसे होते हैं जो नौकरी न मिलने पर खुद की कंपनी खोलने के बारे में सोचते हैं इन्हीं लोगों में से एक जुनूनी, मेहनती, काम करने के लिए एक हद तक पागल व्यक्ति का नाम जैक मा है जो चीन के सबसे अमीर लोगों में से एक हैं

jack ma -alibaba
 
यह कहानी चीन के एक ऐसे उद्योगपति की है जिसने जीवन में मिली असफलताओं को सीढ़ी बनाकर कामयाबी की बुलंदी हासिल की। हम बात कर रहे हैं अलीबाबा ग्रुप के संस्थापक जैक मा की। कभी एक मामूली-सी नौकरी की तलाश में जुटे जैक मा की गिनती आज चीन के ही नहीं बल्कि दुनिया के अमीरों में होती है। जानिए उनके जीवन से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें।

आमदनी का नहीं था कोई जरिया 

जैक मा का जन्म 10 सितम्बर 1964 को चीन के हांगजोऊ में हुआ था। उनके माता-पिता के पास आमदनी का कोई ठोस जरिया नहीं था। वे पारंपरिक नाटक और कहानियां सुनाने का काम करते थे। चीन में मंदारिन भाषा बोली जाती है और जैक की युवावस्था के दौर में अंग्रेजी को ज्यादा अहमियत नहीं दी जाती थी। तभी उनमें अंग्रेजी को लेकर लगाव पैदा हुआ। अंग्रेजी सीखने के लिए वे अपने घर से काफी दूर उन होटलों की ओर चले जाते थे, जहां विदेशी पर्यटक ठहरते थे। वे वहा उनसे टूटी-फूटी अंग्रेजी में बातचीत की कोशिश करते।

 हाॅर्वर्ड यूनिवर्सिटी ने  उन्हें दस बार किया रिजेक्ट

अंग्रेजी पर पकड़ होने के बाद वे गाइड का काम करने लगे। इससे उन्हें विदेशी संस्कृति, तौर-तरीकों, पसंद-नापसंद और अन्य बातों की जानकारी हुई। उन्होंने करीब 9 साल तक गाइड का ही काम किया। जैक मानते हैं कि इस काम से उन्हें भविष्य में बड़ी मदद मिली। उन्होंने पश्चिमी तकनीक और तरीकों को करीब से जाना।
अब बात करते हैं जैक के विद्यार्थी जीवन की। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि स्कूली दिनों में जैक पढ़ाई में ज्यादा अच्छे नहीं थे। वे पांचवीं कक्षा में दो बार फेल हो गए थे। यही नहीं वे आठवीं कक्षा में तीन बार फेल हुए। यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा में भी तीन बार फेल हुए। हाॅर्वर्ड यूनिवर्सिटी ने तो उन्हें दस बार रिजेक्ट किया लेकिन जैक ने हार नहीं मानी। हर असफलता से सीखते गए और निराश नहीं हुए।

ढीला-ढाला देखकर किया रिजेक्ट 

जैक मा ने करियर की शुरुवात काफी कठिन और चुनौतीपूर्ण रहा। जैक मा ने 30 अलग अलग जगहों पर नौकरी के लिए आवेदन किये लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी। जैक मा सबसे पहले एक पुलिस की नौकरी के लिए आवेदन किया था लेकिन ढीला-ढाला देखकर उन्हें साफ मना कर दिया।

24 लोगो में केवल उनका नहीं हुआ चयन 

एक बार केएफसी ने उनके शहर में नौकरी के लिए वैकेंसी निकाली। इसके लिए कुल 24 लोगों ने आवेदन किया। जैक भी उनमें से एक थे। बाद में पता चला कि कंपनी ने उनमें से 23 लोगों का चयन कर लिया। सिर्फ जैक को रिजेक्ट कर दिया गया। सोचिए, उस वक्त उन्हें कैसा लगा होगा!

इन्टरनेट की तरफ बढ़ा खिचाव 

जैक इंटरनेट की दुनिया में बिजनेस करने से पहले एक ट्रांसलेशन कंपनी चलाते थे। 1994 में जैक मा ने पहली बार इन्टरनेट का नाम सूना। जिसके बाद वे अमेरिका गए और वहां उन्होंने इंटरनेट देखा और उन्होंने सबसे पहला शब्द इंटरनेट पर Beer (भालू) टाइप किया। उनके सामने कई देशों के बीयर ऑप्शन दिखे लेकिन चाइनीज बीयर नहीं दिखा।

अगले बार उन्होंने चीन के बारे में सामान्य जानकारी ढूंढने की कोशिश की लेकिन फिर वो चौंक गये कि चीन को कोई जानकारी इन्टनेट पर उपलब्ध नही थी। अपने देश की जानकारी इंटरनेट पर ना होने से जैक को काफी दुखी हुई। क्योंकि इससे उन्हें लग गया था कि चीन तकनीकी क्षेत्र में अन्य देशो से काफी पीछे है।

चीन की जानकारी देने वाली  वेबसाइट “अग्ली” बनाई

इसी वजह से उन्होंने अपने दोस्तो के साथ मिलकर चीन की जानकारी देने वाली पहली वेबसाइट “अग्ली” (Ugly) बनाई। इस वेबसाइट के बनाने के महज पांच घंटो के अंदर उन्हें कुछ चीनी लोगो के ईमेल आये जो जैक के बारे में जानना चाहते थे। तब जैक मा को एहसास हुआ कि इन्टरनेट से बहुत कुछ किया जा सकता।

अपनी बहन से भी  पैसे उधार लेना पड़ा 

1995 में जैक मा ,उनकी पत्नी और दोस्तों ने मिलकर 20,000 डॉलर इखट्टे किये और एक कम्पनी की शुरुवात की। इस कम्पनी का मुख्य काम था दुसरी कंपनियों के लिए वेबसाइट बनाना। उन्होंने अपनी कम्पनी का नाम “चयना येल्लो पेजस” (China Yellow Pages) रखा था। इस कंपनी को शुरू करने के लिए जैक ने अपनी बहन से पैसे उधार लिए थे। लेकिन यह कंपनी फेल हो गई। इसके बाद उन्होंने चीन की कॉमर्स मिनिस्ट्री में काम किया जिसमे वे अध्यक्ष पद मे थे। कुछ दिनों के बाद नौकरी छोड़ दी, जिसके बाद वे अपने घर हैंग्जू चले गए और जहा उन्होंने अपने 17 दोस्तों के साथ मिलकर अलीबाबा (Alibaba) की शुरुआत की।

अमेरिका का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ

अलीबाबा कंपनी की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगया जा सकता है कि इस कंपनी ने अपना आईपीओ 4080 रुपए (68 डॉलर) पर पेश किया था और मार्केट खत्म होने पर इसकी कीमत 5711 रुपए (93.89 डॉलर) हो गई थी. इसे अमेरिका का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ बताया जा रहा है। उनकी निजी संपत्ति की कीमत करीब 130800 करोड़ रुपए है।

 eBay के  प्रस्ताव ठुकराया 

ग्लोबल इ कॉमर्स सिस्टम  को सुधारन के लिए 2003 में जैक मा ने Taobao Marketplace की स्थापना की। जिसके बढ़ते प्रभाव को देखते हुए eBay ने इसे खरीदने का ऑफर दिया। लेकिन जैक मा ने eBay का प्रस्ताव ठुकरा दिया और इसकी बजाय उसने याहू (Yahoo) के को-फाउंडर जेरी से 1 बिलियन डॉलर की सहायता ली।
 अलीबाबा कंपनी के शुरुआती दिनों में सिर्फ 18 लोग काम करते थे और अभी करीब 22 हजार लोग काम करते हैं।अलीबाबा.कॉम (Alibaba.com) के नाम से मशहूर यह कंपनी दुनिया भर के 190 कंपनियों से जुड़ी हुई है। अलीबाबा.कॉम वेबसाइट के अलावा तओबाओ.कॉम (Taobao.com) चलाती है जो चीन की सबसे बड़ी शॉपिंग वेबसाइट है। इसके अलावे चीन की बड़ी जनसंख्या को इनकी वेबसाइट तमल्ल.कॉम (Tmall.com) ब्रांडेड चीजें मुहैया कराती हैं।यही नहीं, चीन में ट्विटर जैसी सोशल मीडिया सिना वाइबो (Sina Weibo) में भी इस कंपनी की बड़ी हिस्सेदारी है। इसके साथ ही यूट्यूब जैसी वीडियो शेयरिंग वेबसाइट यौकू टुद्ौऊ (Youku Tudou) में भी इसकी अहम हिस्सेदारी है। ये कंपनियां मार्केटिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग और लोजिस्ट सेवाएं देती हैं।

निजी जीवन (विवाह)

जैक मा ने जेंगयिंग (Zhang Ying) से शादी की थी और उनके एक पुत्र एवं एक पुत्री है। जैक अपनी पत्नी से पहली बार तब मिले जब वो Hangzhou Normal University में पढ़ रहे थे। स्नातक होने के बाद तुरंत 1980 के दशक में दोनों ने शादी कर ली और दोनों ने ही अध्यापक का काम शूरू कर दिया था जैक के बारे में उनकी पत्नी जैंग यिंग का मानना है ‘जैक हैंडसम नहीं है, लेकिन मुझे उनसे इसलिए प्यार हो गया, क्योंकि वे ऐसे कई काम कर सकते हैं जो हैंडसम पुरुष भी नहीं कर सकते’।

जैक मा के अनमोल विचार

आपको अपने प्रतिद्वंद्वी से सीखना चाहिए, लेकिन कभी उसकी नकल न करें। अगर नकल की तो समझें कि आप खत्म हो गए।

सरकार के साथ कभी भी कारोबार मत करो। उसके साथ प्यार करो लेकिन शादी कभी मत करो।

कभी हार न मानो। आज का दिन कठिन है, कल और भी बदतर होगा, लेकिन परसों सुनहरी धूप खिलेगी।

युवा लोगों की मदद करो। छोटे लोगों की मदद करो। क्योंकि छोटे लोग बड़े होंगे। युवाओं के दिमाग में वो बीज होगा जो आप उनमे बोयेंगे, और जब वे बड़े होंगे, वे दुनिया बदल देंगे।

आपको आपके साथ सही लोग चाहिए होते हैं, सबसे अच्छे लोग नहीं

इससे फर्क नहीं पड़ता कि पीछा कितना कठिन है, आपके पास हमेशा वो सपना होना चाहिए जो आपने पहले दिन देखा था। वो आपको प्रेरित रखेगा और (किसी कमजोर विचार से ) आपको बचाएगा

हमारे पास कभी भी पैसों की कमी नहीं होती। हमारे पास कमी होती है सपने देखने वाले लोगों की, जो अपने सपनो के लिए मर सकें

 
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देश के पहले राष्ट्रपति की परपोती है ‘रॉकस्टार और तनु वेड्स मनु’ की ये एक्ट्रेस

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श्रेया नारायण (SHREYA NARAYAN)

BOLLYWOOD ACTRESS

फिल्म एक्ट्रेस के साथ साथ एक लेखिका एवं समाज सेविका भी

जैसा कि हम सभी जानते है की भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र थे. डॉ राजेंद्र प्रसाद बिहार के रहने वाले थे.कई सारी बातें लोगों को उनके बारे में पता है. लेकिन ये बातें शायद ही लोगों को मालूम होगा कि उनके परिवार की एक बेटी बॉलीवुड एक्ट्रेस हैं. जी हाँ, हम बात कर रहे है बॉलीवुड एक्ट्रेस श्रेया की. जिन्होंने ‘साहेब बीवी और गैंगस्टर’ जैसी फिल्मों में किरदार निभाया है. श्रेया का जन्म मुजफ्फरपुर में हुआ. श्रेया को तिग्मांशु धुलिया की फिल्म ‘साहेब बीवी और गैंगस्टर’ में महुआ के रोल से पहचान मिली थी. श्रेया फिल्म एक्ट्रेस के साथ साथ एक लेखिका एवं समाज सेविका भी हैं.

कई फिल्मो में किया है काम

श्रेया ने अपना करियर सोनी टीवी पर आने वाले शो ‘पावडर’ से शुरूआत की. इसके साथ साथ श्रेया ने कई बॉलीवुड फिल्मों में भी काम किया है हैसे एक दस्तक, नॉक आउट, रॉकस्टार, राजनीति सुपर नानी, तनु वेड्स मनु.


साहेब बीवी और गैंगस्टर से मिली पहचान

लेकिन उन्हें फिल्मी जगत में सफलता 2011 में आयी तिगमांशु धूलिया की फिल्म साहेब बीवी और गैंगस्टर फिल्मों से मिली. हाल ही में आयी फिल्म ‘सुपर नानी’ में उन्होंने दिमागी तौर पर बीमार लड़की का किरदार निभाया था. इसी के साथ श्रेया ने कोसी नदी बाढ़ के समय प्रकाश झा के साथ बिहार बाढ़ राहत मिशन में भी काम किया था. श्रेया की मां कैंसर से पीड़ित थीं, जिसकी वजह से उनकी मौत हो गई थी. एसे में श्रेया ने थिएटर के सहारे ही अपने जीवन को एक नई दिशा दी और फिल्मी जगत में उन्होंने अपना करियर शुरू किया. श्रेया का कहती है कि जब तक आप फिल्म इंडस्‍ट्री में कुछ बन नहीं जाते, तब तक आपका शोषण होता रहता है.

बॉलीबुड की है बोल्ड एक्ट्रेस

श्रेया नारायण बॉलीबुड की एक बोल्ड एक्ट्रेस मानी जाती हैं. श्रेया का कहना है कि कलाकार अलग-अलग तरह के किरदार निभाते हैं तो आपको ऐसा तरीका मिल जाता है, जिससे आप अपनी शख़्सियत को किसी फ़िल्मी किरदार में ढालकर उसे फ़िल्म ख़त्म होने के बाद छोड़ सकते हैं.

थियेटर करने से मिलती है ख़ुशी

बचपन को याद करते हुए वे आगे कहती हैं कि जब मैं अपनी मां से मिलने अस्पताल जाती थी तो मैं एक ज़िम्मेदार बेटी होती थी और जब मैं उन्हें छोड़कर शूटिंग पर जाती थी तो मैं बस वह किरदार बन जाती थी, जिसे मैं निभा रही होती थी। ऐसा करने से आप अपनी भावनाओं पर पूरी तरह नियंत्रण रख पाते हैं.

श्रेया ने एक इंटरव्यू में कहा था कि थिएटर ने उन्हें उनकी पहचान और खुशी दिलाई, क्योंकि वह बचपन में एक नाखुश बच्चे की जिंदगी जी रही थीं.

साभार –Daily bihar News ,shreyanarayan

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पिता की ख्वाहिश वर्ल्ड कप जीतकर लौटे हरमनप्रीत कौर

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मैं खुद को साबित करना चाहती थी: हरमनप्रीत कौर

Harmanpreet kaur womens cricketer

वुमंस वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में भारत ने 6 बार के चैंपियन ऑस्ट्रेलिया को 36 रन से हरा दिया। पंजाब के मोगा की हरमनप्रीत कौर ने 171 रन की पारी खेली। इसमें हरमनप्रीत कौर ने 20 चौके और 7 छक्के लगाए। हरमन अब तक 73 वन-डे और 68 टी -20 मैच खेल चुकी हैं।

चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करने उतरी हरमनप्रीत ने 115 गेंदों में 20 चौके और 7 छक्के लगाकर नाबाद 171 रन की अविश्वसनीय पारी खेलते हुये भारत को 42 ओवर के मैच में 281 के विशाल स्कोर तक पहुंचाया था। इस मैच में गेंदबाजों ने भी जबरदस्त खेल दिखाते हुये आस्ट्रेलिया को 245 पर ढेर कर फाइनल में जगह बना ली जहां वह खिताब के लिये इंग्लैंड से भिड़ेगी।

प्लेयर ऑफ द मैच बनीं 

28 वर्षीय हरमनप्रीत ने मैच के बाद कहा पूरे टूर्नामेंट में मुझे ठीक से बल्लेबाजी करने का मौका नहीं मिला। लेकिन जब इस मैच में मेरे पास मौका आया तो मैं इसका पूरा फायदा उठाना चाहती थी और खुद को साबित करना चाहती थी। बल्लेबाज ने साथी खिलाड़ियों की भी उनकी पारियों और मदद के लिये प्रशंसा की। उन्होंने कहा मैं भगवान का धन्यवाद करना चाहती हूं कि मैंने जैसा सोचा वैसा ही हो पाया। मिताली राज और वेदा कृष्णामूर्ति ने भी बहुत ही अच्छी पारियां खेलीं और दीप्ति ने भी मुझे सहयोग किया।


पहली भारतीय महिला बल्लेबाज

हरमनप्रीत पहली भारतीय महिला बल्लेबाज भी हैं जिन्हें आस्ट्रेलिया की मशहूर बिग बैश लीग और किया सुपर लीग में खेलने का मौका मिला। हालांकि टूर्नामेंट में वह अब तक खुद को साबित नहीं कर सकीं क्योंकि मध्यओवरों में उन्हें पांच पारियों में केवल 91 गेंदे ही खेलने का मौका मिल सका था। लेकिन सेमीफाइनल में उन्होंने अपने करियर के तीसरे शतक से भारत को फाइनल का टिकट दिलाकर सारी कसर पूरी कर ली।

होना  चाहिए लड़कियों का सशक्तिकरण 

हरमनप्रीत की मां ने मैच के बाद कहा, ‘लड़कियों का सशक्तिकरण होना ही चाहिए। कोख में उनकी हत्या नहीं की जानी चाहिए। मेरी बेटी ने पूरे देश का सम्मान बढ़ाया है बाकी लड़कियों को भी इससे बढ़ावा मिलेगा।’ हरमनप्रीत के पिता हरमिंदर सिंह ने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि वो फाइनल में और बेहतर करे और खिताब जीतकर देश का सम्मान बढ़ाए।’

कोहली जैसी काफी आक्रामक हैं हरमनप्रीत कौर, बहन ने खोले राज

भारत मां का सीना गर्व से चौड़ा करने वाली क्रिकेटर हरमनप्रीत कौर टीम इंडिया (मेल) के कैप्टन विराट कोहली की तरह काफी आक्रामक हैं। ये कहना हमारा नहीं बल्कि हरमनप्रीत की बहन हेमजीत कौर का है। जिन्होंने ये भी बताया कि हरमनप्रीत के, भारत के पूर्व विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग, फेवरेट प्लेयर हैं और इसी कारण वो भी सहवाग की तरह विस्फोटक बैटिंग करना पसंद करती हैं।अपनी बहन की कामयाबी पर गौरवान्वित होने वाली हेमजीत की आंखें खुशी से हर बार उस वक्त छलछला उठती हैं, जब वो अपनी जान से प्यारी और देश के गौरव हरमनप्रीत की बातें करती है। प्यार से हरमनप्रीत को हैरी कहने वाली हेमजीत खुद एक स्कूल टीचर है।


परिवार का सीना फक्र से चौड़ा

साधारण परिवार में जन्मी असाधारण प्रतिभा की धनी हरमप्रीत के पिता हरमंदर भुल्लर मोगा में एक वकील के यहां मुंशी हैं और हरमन खुद भी मुंबई रेलवे में चीफ ऑफिस सुपरिटेडेंट की पद पर तैनात हैं। आज हरमन के घर पर लोगों की बधाई देने वालो का तांता लगा हुआ है, जिसे देखकर, बूढ़े दादा अमरसिंह जिनकी उम्र 91 साल है, का सीना फक्र से चौड़ा हो जाता है।

 

भारत की जीत की कामना

अब हरमन की तरह उनके घरवाले भी यही सोच रहे हैं कि भारत अंग्रेजों को फाइनल में बुरी तरह हराये और विश्वकप का खिताब अपने नाम करे। ऊपर वाले से प्रार्थना कर रहे मोगा के हर परिवार का सदस्य अब केवल भारत की जीत की कामना कर रहा है।


ट्वीटर पर  लगा बधाई देने वालों का  तांता

 आइए आपको बताते हैं कि किस किसने कौर को बधाई दी और बधाई में उन्होंने कौर के लिए क्या कहा।
भारत के पूर्व खिलाड़ी बिशन सिंह बेदी ने कौर की तारीफ करते हुए लिखा, ”हरमनप्रीत कौर ने बेहतरीन शॉट खेले, कौर ने कपिल देव की याद दिला दी। शानदार प्रयास।

भारत के पूर्व विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग ने लिखा, ”एक ऐसी पारी जो जिंदगी भर याद रहेगी। आपने भारतीय टीम से के स्कोर में 60 फीसदी से ज्यादा रन आपके। अब सब गेंदबाजों के ऊपर।
वहीं आर श्रीधर ने लिखा, ”किसी भी विश्व कप की सबसे बेहतरीन पारी, फिर चाहे वो पुरुष टीम हो या फिर महिला टीम।
भारतीय टीम के खिलाड़ी मोहम्मद कैफ ने लिखा, ”42 ओवरों में 281 रन का स्कोर शानदार है। हरमनप्रीत कौर ने किसी भी विश्व की अपनी जिंदगी की सबसे यादगाप पारी खेली है। शानदार।”

कौर की शानदार पारी की बदौलत टीम इंडिया ने 42 ओवरों में 4 विकेट खोकर 281 रन बनाए। कौर ने लाजवाब बल्लेबाजी की और 115 गेंदों में नाबाद 171 रनों की पारी खेली। कौर ने अपनी पारी में 20 चौके और 7 छक्के लगाए। कौर के अलावा मिताली राज ने (36), दीप्ति शर्मा ने (25) रनों की पारी खेली। इसके अलावा कौर भारत की तरफ से किसी भी विश्व कप में सर्वोच्च रन बनाने वाली खिलाड़ी बन गईं। कौर अंत तक आउट नहीं हुईं नाबाद पवेलियन लौटीं।. .

सड़क पर पकौड़े बेचने से लेकर पटना का सबसे बड़ा ज्वैलर्स बनने की कहानी

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सड़क पर पकौड़े बेचने से लेकर पटना का सबसे बड़ा  ज्वैलर्स बनने की कहानी…

(CHAND BIHARI AGRAWAL BIOGRAPHY IN HINDI)

जमीन से फलक की बुलंदियों पर कैसे पहुंचा जा सकता है, ये चांद बिहारी अग्रवाल जैसे लोगों से सीखना चाहिए। किसी जमाने में फुटपाथ पर पकौड़े बेचने वाले चांद बिहारी ने आज पटना में ज्वैलर्स का इतना बड़ा शोरूम खोल दिया है कि उससे उन्हें हर साल 20 करोड़से भी ज्यादा का टर्नओवर हासिल होता है। 

बचपन गरीबी में बिता 

चांद बिहारी अग्रवाल जयपुर में पैदा हुए और वहीं पांच भाई-बहनों के साथ पले बढ़े। उनके पिता जी को सट्टा खेलने की आदत थी। सट्टा खेलना आज भले ही अपराध हो गया हो, लेकिन उस वक्त यह काम लीगल हुआ करता था। चांद के पिता ने शुरू में तो सट्टे से काफी पैसे बना लिए, लेकिन धीरे-धीरे उनकी किस्मत खराब होती गई और वे सारे पैसे लुटाते चले गए। घर की हालत इतनी बुरी हो गई कि चांद बिहारी स्कूल ही नहीं जा पाए। उनकी मां नवल देवी अग्रवाल ने घर का पूरा बोझ अपने कंधों पर ले लिया।

सड़क पर पकौड़े भी बेचने पड़े 

1966 में जब चांद बिहारी महज 10 साल के थे तब वह अपनी मां और भाई रतन के साथ एक ठेले पर पकौड़े बेचा करते थे। उनके दो छोटे भाई स्कूल जाते थे और उनकी बहन घर का काम-धाम देखती थीं। चांद बताते हैं कि वे रोज 12 से 14 घंटे तक काम किया करते थे। वो कहते हैं, ‘स्कूल जाने का सपना, सपना ही लगता था, क्योंकि हमें पेट भरने के लिए भी पैसे चाहिए थे।’ उनके अनुसार यदि उन्हें स्कूली शिक्षा मिली होती तो वह और जल्दी सफल हो जाते लेकिन हालात ऐसे थे कि वह पढ़ ही न हीं सके।

साड़ियो  की दुकान पर भी करना पड़ा काम 

12 साल की उम्र में उन्होंने जयपुर में ही एक साड़ी की दुकान पर सेल्समैन के तौर पर काम करना शुरू कर दिया। इस काम से उन्हें हर महीने 300 रुपये मिलने लगे थे। उस जमाने में 300 रुपये काफी होते थे।
1972 में उनके बड़े भाई रतन की शादी हो गई। शादी के भेंट में मिले 5000 रुपयों से रतन ने जयपुर में 18 पीस चंदौरी साड़ियां खरीदीं और पटना में आकर उन्हें सैंपल के तौर पर दिखाया। यहां उनकी साड़ियां काफी पसंद की गईं। इसके बाद उन्होंने जयपुर से साड़ियां लाकर पटना में बेचने का काम शुरू कर दिया। पटना में ही रतन की ससुराल है।

चांद बिहारी अग्रवाल, फोटो साभार: theweekendleader

 पटना रेलवे स्टेशन के पास फुटपाथ पर भी खोली अपनी दुकान

धीरे-धीरे रतन का काम बढ़ता गया और उन्हें मदद के लिए कुछ लोगों की जरूरत महसूस होने लगी। उन्होंने 1973 में चांद बिहारी को अपने पास पटना बुला लिया। उनके पास पैसे तो ज्यादा नहीं थे, लेकिन उनका सपना बहुत बड़ा था और सपने के साथ ही काम करने की शिद्दत भी थी। पैसे न होने की वजह से वे किराए पर दुकान नहीं ले पाए और उन्होंने पटना रेलवे स्टेशन के पास फुटपाथ पर ही अपनी दुकान शुरू कर दी। चांद बिहारी उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ‘गर्मी की तपती दोपहर में लोगों को बुलाना और उनसे सामान खरीदने के लिए कहना काफी मुश्किल होता था।’

खून पसीने से की कमाई से खड़ी दुकान भी हुई चोरी 

पटना में राजस्थानी साड़ियां बेचने वाले वे अकेले थे। उस वक्त दिन भर की मेहनत से वे 25 प्रतिशत के मार्जिन के हिसाब से 250 से 300 रुपये रोज बना लेते थे। धीरे-धीरे वे हरेक दुकानों पर जा-जाकर लोगों से अपनी साड़ियां खरीदने के लिए कहने लगे। इस प्रोसेस से उन्होंने अपना एक रीटेल नेटवर्क खड़ा कर लिया। ठीक एक साल बाद उन्होंने कुछ पैसे बचाकर पटना के खड़ाकुआ  इलाके में एक दुकान किराए पर ले ली। इसके बाद तो उनकी निकल पड़ी। दुकान लेने के बाद उनकी सेल हर महीने 80,000 से 90,000 रुपये हो गई, लेकिन दुर्भाग्य से 1977 में उनकी दुकान में चोरी हो गई। इसी साल चांद बिहारी की शादी हुई थी और खून-पसीने की कमाई से खड़ा किया हुआ पूरा बिजनेस धाराशाई हो गया। लगभग 4 लाख का नुकसान हुआ। उस जमाने में 4 लाख की रकम मायने रखती थी। इसके एक साल पहले ही रतन ने भी साड़ी का काम छोड़कर रत्न और आभूषण का काम शुरू कर दिया था। चांद बिहारी बताते हैं कि यह उनकी जिंदगी का सबसे बुरा दौर था। उस वक्त वे खुद को असहाय और कमजोर मान बैठे थे।


भाई ने दी ज्वैलरी में हाथ आजमाने की सलाह 

इसके बाद रतन ने चांद बिहारी को संभाला और उनसे ज्वैलरी में हाथ आजमाने को कहा। उन्हें इस बिजनेस के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन रतन ने उन्हें सब समझाया। उन्होंने 5,000 रुपये से रत्न और आभूषण की दुकान शुरू की। उनकी किस्मत अच्छी निकली और उनका यह बिजनेस भी चल पड़ा। इसके बाद चांद बिहारी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।


यूपी और बिहार में अपना नाम जमाया 

1988 में इसी धंधे की बदौलत उन्होंने दस लाख की पूंजी इकट्ठा की और सोने के व्यापार में कदम रख दिया। अपनी क्वॉलिटी और भरोसे के दम पर चांद बिहारी ने यूपी और बिहार में अपना नाम जमा लिया। 2016 में उनका टर्नओवर लगभग 17 करोड़ था। उनकी छोटी सी दुकान आज एक बड़ी कंपनी बन गई है। एक साल पहले ही उन्हें सिंगापुर में ऑल इंडिया बिजनेस ऐंड कम्यूनिटी फाउंडेशन की ओर से सम्मानित भी किया गया।