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Thursday, March 19, 2026
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जानिए LADY KHALI के नाम से मशहूर भारत की पहली WWE रेसलर कविता देवी के बारे में

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KAVITA DEVI BIOGRAPHY IN HINDI 

आज हम बात कर रहे है लेडी खली के नाम से मशहूर और डब्ल्यूडब्ल्यूई तक पहुंचने वाली देश की पहली महिला पहलवान कविता देवी के बारे में | कविता रिंग में इतनी फुर्तीली हैं कि एक शेरनी की तरह विपक्षी खिलाड़ी पर टूटती हैं। वह मिनटों में ही फाइट जीतकर बाहर आ जाती हैं।लेकिन यहाँ तक का उनका सफ़र आसन नहीं था | जानिए की एक गाँव की लड़की से WWE का सफ़र ……
KAVITA DEVI BIOGRAPHY IN HINDI 
कविता हरियाणा के एक ऐसे गांव में पली-बढ़ीं, जहां बेटियों को बेटों से कमतर आंका जाता था। यह कहानी है जींद जिले के माल्वी गांव की। एक ऐसा इलाका, जहां लड़कियों की दुनिया मायके के आंगन से ससुराल की दहलीज तक सीमित थी। जो माता-पिता अपनी बेटी को स्कूल भेजते भी थे, उनका एक ही मकसद होता था कि लड़की मात्र इतना पढ़-लिख जाए कि जरूरत पड़ने पर घरवालों को खत लिख सके।

परिवार ने किया सपोर्ट 

गांव के स्कूल में लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या बहुत कम थी। मगर कविता के परिवार ने हमेशा उन्हें पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित किया। खासकर बड़े भाई संदीप ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया। जहां 10वीं पास करने के बाद उनकी ज्यादातर सहेलियों ने पढ़ाई छोड़ दी, कविता ने गांव के स्कूल से 12वीं पास की और फिर बीए।

वेटलिफ्टिंग में अजमाया हाथ 

 इस दौरान उनकी खेल में रुचि बढ़ने लगी। उन्हें वेटलिफ्टिंग पसंद था। पापा और भाई को तो उनके खेल से दिक्कत नहीं थी, मगर गांव वालों को यह पसंद नहीं था। उन्हें लगता था कि कविता की वजह से गांव की बाकी लड़कियां भी बिगड़ जाएंगी। वे लगातार उनके पापा पर दबाव बनाते कि कविता को खेल से रोको। याद दिलाते कि अब उनकी बेटी बड़ी हो गई है और उसकी शादी कर देनी चाहिए।
KAVITA DEVI (FIRST WWE INDIAN WOMAN WRESTLER
 
 कविता बताती हैं-
 गांव वालों ने कई बार मेरे पापा से कहा कि छोरी का ब्याह कर दो, नहीं तो बिगड़ जाएगी। लेकिन पापा ने ध्यान नहीं दिया। जब भी मैं गांव से बाहर जाती, तो भाई मेरे साथ होता, ताकि किसी गांव वाले की हिम्मत न पड़े मुझ पर कमेंट करने की।परिवार ने तय किया कि बेटी को वेटलिफ्टिंग की ट्रेनिंग दिलाई जाए, ताकि वह एक प्रोफेशनल खिलाड़ी बन सके।

2007 में वह नेशनल चैंपियन बनीं

 साल 2002 में कविता ने फरीदाबाद स्थित एकेडमी में वेटलिफ्टिंग की ट्रेनिंग शुरू की। बाद में एडवांस ट्रेनिंग के लिए लखनऊ गईं। उन्होंने खेल करियर की शुरुआत पावरलिफ्टिंग से की। कड़ी मेहनत व अनुशासित जीवन-शैली का नतीजा सामने था। साल 2007 में वह नेशनल चैंपियन बनीं।

एशियन गेम्स में  जीता गोल्ड मेडल

2016 में तो उन्हें साउथ एशियन गेम्स में गोल्ड मिला। खेल कोटे से सीमा सुरक्षा बल में कांस्टेबल की नौकरी मिली और फिर प्रमोशन के बाद सब इंस्पेक्टर बन गईं। खेल की वजह से अक्सर बाहर जाना पड़ता था, जिस कारण ड्यूटी पर जाना मुश्किल हो रहा था, इसलिए 2010 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

द ग्रेट खली के प्रदर्शन से डब्ल्यूडब्ल्यूई के प्रति उनकी दिलचस्पी बढ़ी 

उन दिनों पूरे देश में दिलीप सिंह राणा उर्फ द ग्रेट खली के वर्ल्ड चैंपियन बनने की खूब चर्चा हो रही थी। कविता टीवी पर उनके शो देखने लगीं। डब्ल्यूडब्ल्यूई के प्रति उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी।
KAVITA DEVI BIOGRAPHY IN HINDI
कविता बताती हैं-
 मैं द ग्रेट खली की बड़ी फैन हूं। पहली बार उन्हें रिंग में देखा, तो लगा कि काश मुङो उनकी तरह भारी भीड़ के बीच वर्ल्ड चैंपियन का खिताब मिलता। लेकिन वह तो बस सपना था। कभी नहीं सोचा था कि एक दिन मैं भी डब्ल्यूडब्ल्यूई में भाग लूंगी।

खली  की  एकेडमी में ली ट्रेनिंग

 उन्होंने खली से संपर्क किया और उनकी एकेडमी में ट्रेनिंग लेने लगीं। वहां उन्हें कई विदेशी ट्रेनर की देखरेख में सीखने का मौका मिला। एकेडमी द्वारा आयोजित तमाम मुकाबलों में उनका प्रदर्शन शानदार रहा।
कविता कहती हैं-
 जब मैंने डब्ल्यूडब्ल्यूई में जाने का फैसला किया, तो कई लोगों ने कहा कि यह लड़की बेवकूफी कर रही है, लेकिन परिवार ने सही फैसला लेने में मेरी मदद की। कविता डब्ल्यूडब्ल्यूई में हिस्सा लेने वाली भारत की पहली महिला पहलवान हैं। 

 सलवार-कमीज पहन रिंग में उतरी 

हाल ही में डब्ल्यूडब्ल्यूई की ओर से सिर्फ महिला पहलवानों के लिए टूर्नामेंट आयोजित किया गया। कविता जब इस मुकाबले में न्यूजीलैंड की महिला पहलवान के खिलाफ रिंग में उतरीं, तो सब उन्हें देखते रह गए। लोगों ने पहली बार किसी महिला पहलवान को सलवार-कमीज में देखा था। दरअसल, डब्ल्यूडब्ल्यूई के मैच अपने बोल्ड पश्चिमी पहनावे के लिए भी लोकप्रिय रहे हैं। लेकिन कविता ने पश्चिमी पहनावे की जगह अपने देश की परंपरागत पोशाक सलवार-कमीज पहनने का फैसला किया।

खेलने के अंदाज से  खेलप्रेमियों के दिल में बनायीं जगह 

रोमांचक मुकाबले में उन्होंने बड़े शानदार ढंग से अपनी प्रतिद्वंद्वी को कई बार पटखनी दी। हालांकि वह फाइनल मुकाबला हार गईं, लेकिन उनका अंदाज खेलप्रेमियों के दिल को छू गया। सब तरफ उनके शालीन पहनावे और दमदार प्रदर्शन की चर्चा होने लगी।
कविता कहती हैं-
डब्ल्यूडब्ल्यूई को शो-मैनशिप कहते हैं लोग। मैं इस खेल की तकनीकी बारीकियों को जानती हूं। मैं बाकी महिला रेसलर की तरह ग्लैमरस नहीं हूं, लेकिन मैं मानती हूं कि सलवार-कमीज मेरी अपनी स्टाइल है। इसमें शरमाने जैसी कोई बात नहीं। इसे लेकर मैं बहुत खुश हूं।

वल्र्ड चैंपियन बनना है अगला लक्ष्य 

 कविता का अगला लक्ष्य डब्ल्यूडब्ल्यूई महिला मुकाबले में वल्र्ड चैंपियन बनना है और इसकी तैयारी में वह शिद्दत से जुटी हुई हैं। कविता ने वॉलीबॉल खिलाड़ी गौरव तोमर से शादी की है और अब वह पांच साल के बेटे की मां भी हैं। लेकिन शादी के बाद भी उनकी दिनचर्या में फर्क नहीं आया है। आज भी वह सुबह दौड़ लगाती हैं, व्यायाम करती हैं और घंटों अभ्यास करती हैं।
 कविता कहती हैं- शादी के बाद पति ने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया। हर लड़की को शादी के बाद अपना करियर बनाने व तरक्की पाने की आजादी मिलनी चाहिए

 द ग्रेट खली की चेली बुलबुल को रिंग में बुरी तरह धोया था

पंजाब के जालंधर में यह फाइट हुई थी। कविता दलाल अपने बेटे के साथ मुकाबला देखने गई थी। रिंग में पहलवान बुलबुल थी और उन्होंने दर्शकों को मुकाबला करने के ​लिए खुला चैलेंज दिया। उनके इस चैलेंज को कविता दलाल ने स्वीकार किया और वे सलवार सूट पहने ही रिंग में आ गई।रिंग में आकर कविता ने भी बुलबुल को चैलेंज कर दिया। चुनौती मिलते ही बुलबुल को गुस्सा आ गया और वे कविता पर टूट पड़ी। उसके बाद कविता दलाल ने बुलबुल की वो पिटाई की कि बीच बचाव करके मुकाबला खत्म कराना पड़ा।

वहीं बुलबुल ने बदला लेने की ठान ली और उन्हें यह मौका भी मिला। मुकाबला, जालंधर में स्थित खली की अकादमी कॉन्टिनेंटल रेसलिंग एंटरटेनमेंट में हुआ। यहां उनकी शिष्या बीबी बुलबुल ने सलवार सूट पहन कर लड़ने वाली पहलवान को पूरी तरह से चित्त कर दिया।लेडी रेसलर बीबी बुलबुल ने सूट सलवार वाली हरियाणवी खिलाड़ी कविता को रिंग में ओपन चैलेंज दिया था, जिसे कविता ने कबूल कर लिया था। बीबी बुलबुल को अपने साथी द ग्रेट खालसा के साथ टैग टीम मैच में हरियाणा की पहलवान कविता और साहिल से मुकाबला करना था।मैच शुरू न होने के बाद बुलबुल को किसी और के साथ मुकाबला करना पड़ा। वे अभी लड़ ही रहीं थी कि अचानक कविता वहां हा गईं।

 कविता ने उन्हें कुछ कहा और इस पर बुलबुल को गुस्सा आ गया। उन्होंने आव देखा न ताव वो सीधा रिंग से उतरकर ऑडियंस के बीच में पहुंच गईं।बीबी बुलबुल ने ऑडियंस के बीच में पहुंचकर कविता पर तेज हमले किए जिस कारण वो संभल नहीं सकी। बुलबुल को इतना गुस्सा था कि वो रुक ही नहीं रहीं थी। बुलबुल ने जब कविता पर हमला किया वो तालियां बजाने में मग्न थीं उन्हें पता ही नहीं चला कब बुलबुल वहां आ गईं।बुलबुल को चैलेंज का इतना गुस्सा था कि वो रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं। ऑडियंस के बीच पहुंचने के बाद बुलबुल के मुक्के और लातें रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। इसी बीच बुलबुल ने कविता का सिर कई बार वहां पर लगी ग्रिल पर दे मारा।बीबी बुलबुल ने कविता को दीवार पर मारा और रिंग में ले गईं। रिंग में ले जाते समय जो भी उनके बीच में आया उन्होंने उसे भी नहीं छोड़ा। लग रहा था कि वो कविता को नहीं छोड़ेंगी। रिंग के बाहर दो और बार ग्रिल पर पटकने के बाद बुलबुल ने कविता को रिंग के अंदर धकेल दिया।रिंग में आने के बाद भी कविता पर बुलबुल पूरी तरह से हावी थीं और रुकने का नाम नहीं ले रहीं थी।
 कविता को एक मौके की तलाश थी जो बुलबुल ने उन्हें दे दिया। बुलबुल की नजर हटी और कविता ने उन पर हमला कर दिया।रेसलर कविता भी लगातार बुलबुल पर हमले करने लगीं और तभी बुलबुल के टैग टीम पार्टनर द ग्रेट खालसा अपने साथियों के साथ पहुंच गए और दोनों को अलग कर दिया। खालसा अपनी साथ बुलबुल को लेकर चलते बने जबकि अन्य खिलाड़ियों ने कविता को रिंग में ही रोके रखा।इस मुकाबले के बाद कविता दलाल छा गईं और खली ने उन्हें अपना स्टूडेंट बना लिया। खली ने उन्हें wwe के लिए तैयार किया और कविता इसमें सिलेक्ट भी हो चुकी हैं। कविता देश में हार्ड केडी और लेडी खली नाम से मशहूर हैं।

 
Dakota और  Kavita Devi के बिच पहले मैच का विडियो जो आजकल बहुत वायरल हो रहा है इस मैच में कविता ने बुरी तरह अपने प्रतिद्वंदी को धोया है  
 
 
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बिहार का एक नेत्रहीन शिक्षक फैला रहा है शिक्षा की रोशनी

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बिहार के पूर्णिया जिले के रहने वाले दृष्टिहीन शिक्षक निरंजन झा खुद दृष्टिहीन होने के बावजूद भी बच्चों के बीच शिक्षा का दीप जला कर समाज के लिए एक मिसाल पेश कर रहे हैं। पूर्णिया शहर के गुलाबबाग शानिमंदिर मोहल्ले में टीन के शेड में गरीबी की दंश झेल रहे 37 वर्षीय दिव्यांग निरंजन झा आज के दिनों में किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं।
फोटो साभार: हिंदुस्तान टाइम्स
बिहार के पूर्णिया जिले के रहने वाले दृष्टिहीन शिक्षक निरंजन झा खुद दृष्टिहीन होने के बावजूद भी बच्चों के बीच शिक्षा का दीप जला कर समाज के लिए एक मिसाल पेश कर रहे हैं। पूर्णिया शहर के गुलाबबाग शानिमंदिर मोहल्ले में टीन के शेड में गरीबी की दंश झेल रहे 37 वर्षीय दिव्यांग निरंजन झा आज के दिनों में किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। बच्चे उन्हें मास्टर साहब कह कर बड़े प्रेमपूर्वक और आदर-सहित बुलाते हैं।

बचपन में चली गयी थी  दोनों आंखों की रोशनी 

 निरंजन झा की दोनों आंखों की रोशनी बचपन में किसी बीमारी के कारण चली गई थी। उस वक्त वे तीसरी कक्षा में थे। बाद में एक शिक्षक जितेन्द्र सिंह ने उन्हें गणित और भौतिक विज्ञान की शिक्षा मौखिक रूप से दी। निरंजन बताते हैं-
 ‘जितेन्द्र सिंह ने मुझे बहुत प्रेरित किया, भौतिक विज्ञान और गणित विषय में एक अच्छी पकड़ बनाने में भरपूर सहयोग दिया। ब्रेल लिपि की सुविधा न मिलने के कारण मैंने मौखिक शिक्षा ग्रहण की।’

लुई ब्रेल की कहानी से ली  प्रेरणा 

निरंजन ने लुई ब्रेल की कहानी से प्रेरणा ली और ब्रेल लिपि से पढ़ना सीखा। कुछ दिनों तक तो उन्होंने एक स्कूल चलाया लेकिन बाद में घर पर ही ट्यूशन पढ़ाने लगे। निरंजन झा जितने धैर्यवान हैं उतने ही साहसी। दोनों आंखों की रोशनी चली जाने के बावजूद भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी, बल्कि अपने हौसलों को और बुलंद कर उन्होंने समाज के लिए कुछ कर गुजरने की मन बना लिया। अपनी निष्ठा और एकाग्रता के बदौलत उन्होंने इस दो विषयों में अधित से अधिक ज्ञान अर्जित कर बारहवीं कक्षा तक के छात्रों को भौतिक विज्ञान और गणित की टयूशन देना शुरू कर दिया।

बिना ब्लैक-बोर्ड के ही सब कुछ समझा देते है 

निरंजन की कक्षा काफी चटख और जीवंत रंगों से रंगी हुई है। झा भले हीं उसे देख नहीं सकते हैं मगर यहां का रंगीन माहौल और विद्यार्थियों के मनोदशा उन्हें हमेशा उत्साहित करती रहती है। निरंजन जब अपने छात्रों को ‘प्रकाश के गुण’ विषय के बारे में पढ़ाते हैं तब वे शब्दों को पिरो कर विद्यार्थियों के सामने ऐसी तस्वीर बना देते हैं जिसे समझाने के लिए बाकी शिक्षकों को ब्लैक-बोर्ड का सहारा लेना पड़ता है।

 मुफ्त में पढ़ाते हैं अनाथ और गरीब बच्चों 

हालांकि निरंजन को बहुत ज्यादा सैलरी नहीं मिलती है। करीब 50 विद्यार्थियों को पढ़ा कर 1500 से 2000 रूपये तक महीना कमाने वाले निरंजन झा खुद को गौरवान्वित महसूस करते हुए कहते हैं की मेरे विद्यार्थी प्रेम और स्नेह के कारण और भी बेहतर कर रहे हैं। खुद गरीबी में जीवन यापन करने के कारण उन्हें मालूम है की गरीब परिवार के लोग अपने बच्चों को सही शिक्षा देने में समर्थ नहीं होते हैं इसीलिए वे अनाथ और गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाते हैं।

दृष्टिहीनता रुकावट नहीं, ताकत है

निरंजन बच्चों को सुबह 6 बजे से 9 बजे तक पढ़ते हैं। निरंजन झा से पढ़ने वाली छात्रा अलीशा कुमारी का भी कहना है, ‘सर दिव्यांग और दृष्टिहीन होने के बावजूद भी काफी अच्छा पढ़ाते हैं। वे गणित और विज्ञान के कठिन सवाल को भी आसानी से हल कर लेते हैं।‘ सरकार के तरफ से निरंजन जैसे लोगों के लिए कुछ करने की बजाये उन्हें मात्र 400 रुपये की मासिक दिव्यांगता पेंशन दी जाती है। निरंजन के बड़े भाई को 10 साल पूर्व गुजरने के बाद वे अपने विधवा भाभी एवं परिवार के देख-रेख में अपनी जिन्दगी गुजार रहे हैं। झा अपनी भाभी को अपनी मां मानते हैं। उन्होंने खुद शादी नहीं की है।

खुद करते है सारा काम

निरंजन की भाभी शिवानी झा का कहना है कि निरंजन झा बचपन से दिव्यांग होने के बावजूद अपना सारा काम खुद कर लेते हैं। पढ़ाने के अलावा वे रेडियो भी खुद ठीक करते हैं। और बाकी के दिनों में टीवी या रेडियो सुना करते हैं। अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने कहा कि रेडियो शिक्षा को बढ़ावा देने का बहुत ही कारगर माध्यम है, लोकल रेडियो स्टेशन को अपने चैनलों पर शिक्षात्मक एवं ज्ञान-वर्धक प्रोग्रामों को शुरू करना चाहिए। जिससे अधिक से अधिक छात्र लाभान्वित हो सकें।

विधायक ने भी की उनके प्रयास की सराहना 

निरंजन ने अपने इस दृष्टिहीन दिव्यांगता को खुद पर कभी हावी नहीं होने दिया और आज तक न हीं कभी अपने परिवार तथा समाज पर बोझ बने। इन्होंने अपने सामने आने वाली हर-एक बाधा को बखूबी अपने अंदाज़ में हल किया। ये अपने अदम्य हौसले की बदौलत समाज में सम्मान के साथ जी रहे हैं। सदर विधायक विजय खेमका ने दिव्यांग निरंजन की संघर्ष भरी कहानी सुनकर काफी प्रेरित हुये और उन्होंने भी अपने स्तर से निरंजन झा की हर संभव मदद करने का भरोसा दिलाया है। विधायक ने कहा कि दिव्यांगता के बावजूद जिस तरह निरंजन झा बच्चों में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं ये काफी सराहनीय है। बचपन से दृष्टिहीन होने के बावजूद निरंजन झा ने अपने अदम्य हौसले के बदौलत समाज में सम्मान के साथ जीना सीखा है।

सपने देखने और उन्हें पूरा करने की कोई उम्र नहीं होती: बिसलेरी के फाउंडर खुशरू संतूक

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खुशरू संतूक (Khushroo Suntook-Founder Of Bisleri )


मिनरल वॉटर कंपनी बिसलेरी की  शुरुआत करने का ऑफर   खुशरू संतूक को उनके एक इटालियन दोस्त ने दी थी | पर जब इनका व्यपार रफ़्तार पकड़ा तभी दोस्त के परिवार में दुर्घटना हो गयी जिसके वजह से इन्हे मजबूरी में कंपनी के शेयर्स पार्ले को बेचने पड़े। खुशरू संतूक  की उम्र अब 81 हो चली है, लेकिन वह अभी भी पूरी तल्लीनता से अपने काम में लगे हुए हैं। आईये जानें खुशरू के बारे में और भी कुछ दिलचस्प बातें…

 टेनिस खेलना था पसंद 

भारत में ड्रिंकिंग वॉटर मार्केट का कारोबार 7,000 करोड़ के आस-पास है। इसमें सबसे बड़ा कारोबार करने वाली कंपनी बिसलेरी है। इस कंपनी की स्थापना मुंबई की एक पारसी फैमिली से आने वाले खुशरू संतूक ने की थी। मुंबई के प्लश मालाबार हिल्स में कई पीढ़ियों से रहने वाला यह परिवार कई बड़े नामी वकीलों से भरा हुआ है। खुशरू के पिता भी अंतरराष्ट्रीय ख्याति के वकील थे। खुशरू को टेनिस खेलना पसंद था और उन्होंने स्टेट से लेकर नेशनल लेवल तक टेनिस खेला। लेकिन पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने वकालत की पढ़ाई की।

उनके एक मित्र ने दिया बिजनेस शुरू करने का प्रस्ताव 

गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से लॉ की पढ़ाई खत्म करने के बाद वे भी अपने पिता की तरह वकालत के पेशे में जाने वाले थे, लेकिन उनके एक पारिवारिक मित्र ने उनके सामने बिजनेस शुरू करने का प्रस्ताव रख दिया। उस मित्र का नाम रोसिस था। रोसिस का परिवार भारत में मलेरिया की दवाओं का व्यापार करता था और उनकी कंपनी का नाम बिस्लेरी था। खुशरू के पिता चूंकि एक कस्टोडियन संपत्ति के मालिक थे इसलिए रोसिस ने उन्हें बिजनेस में हिस्सेदारी का ऑफर दे दिया। उस वक्त बिस्लेरी कंपनी का एक छोटा सा ऑफिस मुंबई के डीएन रोड पर हुआ करता था।

 बॉम्बे में पानी की गुणवत्ता  थी खराब 

डॉ. रोसी के संबंध वेंकटस्वामी नायडू और देवराजुलू जैसे भारत के कई बड़े उद्यमियों से थे इसलिए उन्हें एक हद तक इन लोगों पर विश्वास भी था। उन्होंने खुशरू को भरोसे में लेकर बॉटलबंद पानी का बिजनेस शुरू किया। यह 1965 का वक्त था। खुशरू उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि वह काफी शक्तिशाली इटैलियन थे। इसके साथ ही उस वक्त बॉम्बे में पानी की गुणवत्ता काफी खराब थी और इसलिए लोगों को बीमारियां हो जाया करती थीं। और उस वक्त बॉटल में पेयजल के बारे में सोचना भी गुनाह समझा जाता था क्योंकि एक तो यह प्रतिबंधित था और दूसरा इसे पीना भी लग्जरी समझा जाता था। खुशरू ने रोसी के साथ मिलकर इस भ्रम को तोड़ा।

लोगो ने की आलोचना 

रोसी की इटली में भी एक कंपनी थी जो ‘फेरो चाइना’ नाम से वाइन बनाती थी। इसके साथ ही वे थोड़ा सा पानी की बोतलों का भी उत्पादन करते थे। उन्होंने मुंबई के ठाणे में वागले स्टेट में अपनी फैक्ट्री स्थापित की। जहां पहले केवल पानी को डीमिनरलाइज्ड किया जाता था ताकि वो एकदम डिसिल्ड हो जाए। लेकिन बाद में देखा गया कि यह पानी पाचन के लिए उपयुक्त नहीं है इसलिए उसमें सोडियमऔर पोटैशियम जैसे मिनरल मिलाया जाने लगा। लेकिन इससे उनकी आलोचना भी हुई। लोगों ने इसे बेवजह का काम बताया, लेकिन खुशरू अपने इस प्रयोग पर डटे रहे।

होटल में खुद पानी भी  पहुंचाया

उस वक्त पानी की एक बोतल का दाम सिर्फ एक रुपये रखा गया। लेकिन उस जमाने में एक रुपये की भी अपनी कीमत थी। इससे कोई भी एक रुपया खर्च करके पानी नहीं खरीदना चाहता था। लेकिन धीरे-धीरे कुछ बड़े होटलों ने ऐसे पानी के बारे में सोचना शुरू कर दिया। खुशरू बताते हैं कि उन्होंने खुद से ईरानी होटल में पानी पहुंचाया था। उनकी कोशिश थी कि इस लग्जरी समझे जाने वाले पानी को लोगों की आम जिंदगी का हिस्सा बनाना है। सब कुछ अच्छे से चलने लगा था लेकिन इसी बीच मिलान में रोसी के परिवार में कुछ दुर्घटना घटित हो गई। इसके बाद उन्हें मजबूरी में कंपनी के शेयर्स पार्ले को बेचने पड़े।

खुशरू संतूक (Khushroo Suntook-Founder Of Bisleri )

 टाटा की  वेंचर कंपनियों के साथ मिलकर कम शुरू किया 

लेकिन खुशरू भला कहां हार मानने वाले थे। उनके पिता टाटा की कंपनियों में डायरेक्टर थे। उनके पास टाटा के यहां से कॉल आई और उन्होंने वहां काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने पहले 1968 में टाटा के एक वेंचर लक्मे को जॉइन किया और उसके बाद कई सारी छोटी कंपनियों के लिए भी काम करना शुरू किया। उन्होंने लगभग 30 सालों तक टाटा की कई कंपनियों के लिए काम किया। इनमें टाटा ऑयल मिल्स कंपनी, फाइनैंस कंपनी से लेकर टाटा मैक्ग्रॉ हिल, टाटा इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन, टाटा बिल्डिंग जैसी कंपनी शामिल थीं।

कारोबार इटली तक फैलाया कारोबार

उस वक्त टाटा का काफी कारोबार रूस के साथ होता था। लेकिन जो सामान रूस को बेचा जाता था उसके बदले में उन्हें पैसे के बदले सामान मिलते थे। क्योंकि रूस के पास टाटा को देने के लिए डॉलर नहीं होते थे। यहां से जितना भी सामान भेजा जाता था उसके बदले में उन्हें दवाईयां और कई अन्य सामान मिलता था। इसके बाद खुशरू की देखरेख में कई सारे उत्पाद बनाए गए और टाटा का कारोबार इटली तक फैल गया। उनके अंडर में कफ सिरप से लेकर स्किन क्रीम तक बनने लगीं जो इटली को एक्सपोर्ट की जाती थीं।

कई प्रसिद्द ऑरकेस्ट्रा में किया  शिरकत 

खुशरू को तो पहले से ही म्यूजिक का शौक था। उन्होंने इस दौरान दुनियाभर के संगीतज्ञों के साथ कई रिकॉर्ड रिलीज किए। उन्होंने जर्मनी, इटली, जपान, रूस औ इंग्लैंड जैसे देशों में भी म्यूजिक रिकॉर्ड एक्सपोर्ट किए। सन 2000 में 65 साल की उम्र में खुशरू ने एक्सटेंशन की डिमांड न करते हुए रिटायरमेंट ले लिया। लेकिन हमेशा काम में लगे रहने वाले खुशरू बताते हैं कि वह अपनी पूरी जिंदगी में सिर्फ 2 महीने के लिए फ्री हुए थे। टाटा की कंपनी का पदभार छोड़ने के बाद खुशरू ने नेशनल सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट के डायरेक्टर पद की जिम्मेदारी संभाल ली। उन्होंने दुनियाभर के कई प्रसिद्द ऑरकेस्ट्रा में शिरकत की है और महाराष्ट्र में भी ऐसे कई ऑर्केस्ट्रा ऑर्गनाइज किए।

इंग्लैंड औऱ जर्मनी में भी इनवाइट किया गया इनकी ऑर्केस्ट्राग्रुप को

खुशरू ने अपने एक कजाख मित्र की सलाह पर भारत में भी ऑर्केस्ट्रा की स्थापना की जिसमें सिर्फ भारतीय संगीतकार और म्यूजिशन परफॉर्म करते हैं। इस ग्रुप में 16 से 18 सदस्य हैं। वह बताते हैं कि बिसलेरी की कंपनी की स्थापना करने से ज्यादा मुश्किल काम ये है। खुशरू की उम्र अब 81 हो चली है, लेकिन वह अभी भी पूरी तल्लीनता से अपने काम में लगे हुए हैं। जनवरी 2019 में उनके इस ऑर्केस्ट्राग्रुप को इंग्लैंड औऱ जर्मनी में इनवाइट किया गया है।

 इस उम्र में भी आशावान 

अफसोस कि खुशरू का पहला स्टार्टअप ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका था, लेकिन इस बार वे काफी आशावान हैं। इस उम्र में भी उनके पास एक उम्मीद है। वह कहते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप जिंदगी के किस पड़ाव पर हैं, आपके सपने हमेशा बड़े होने चाहिए और वह कोई भी रूटीन वाला काम करने की सलाह कभी नहीं देते हैं। उनका कहना है कि अगर आप अपने काम के प्रति ईमानदार हैं और समर्पित होकर उस काम को करते हैं तो आपको सफलता जरूर हासिल होगी।

साभार -Yourstory.com

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18 की उम्र में इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ शुरू किया स्टार्टअप, आज दे रहे हैं इंजीनियर्स को नौकरी

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ANAND NAIK-FOUNDER OF BOREDBEES

आज हम बात कर रहे हैं कर्नाटक के हुबली में रहने वाले आनंद नाइक  की जिन्होंने  साबित कर दिया है कि यदि खुद पर यकीन हो तो सफलता का मार्ग अपने आप प्रशस्त होने लगता है ।इंजीनियरिंग की पढाई बिच में छोड़कर इन्होने खुद की कम्पनी ‘बर्डबीज़’ की शुरुआत की जो  अभी तक 150 से भी अधिक मोबाइल ऍप्लिकेशन्स का निर्माण कर चुकी है | तो चलिए जानते है इनकी सफलता की कहानी ……

घरवाले चाहते थे इंजीनियर बनाना

 अपनी 10वीं तक की शिक्षा पूरी करने के बाद सभी सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थियों के परिवार की तरह आनंद का परिवार भी उनके उज्जवल भविष्य के लिए उन्हें कोटा के एक विख्यात कोचिंग में आई.आई.टी की प्रवेश परीक्षा की तैयारी हेतु प्रवेश दिलवा दिया। क्योंकि वे चाहते थे की उनका बेटा एक अच्छा इंजीनियर बने और उसका भविष्य सुरक्षित रहे।

 कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ी 

पूरी तैयारी के बाद भी जब मात्र कुछ अंकों से अपनी पसंद के इंजीनियरिंग कॉलेज में आंनद को दाखिला नहीं मिला और जो कॉलेज मिला उस कॉलेज की सीमाएं उन्हें ज्यादा दिन बाँध कर नहीं रख पाई। आंनद की किस्मत में कुछ और ही लिखा था। 18 वर्षीय आनंद ने कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर अपने मन की सुनी और वापस अपने गृहनगर हुबली का रुख किया। इस छोटी सी उम्र में उन्होंने बोर्डबीज़ सोलूशन्स नाम से एक स्टार्टअप की नींव रखी।
आनंद अपने स्टार्टअप के शुरूआती दौर का जिक्र करते हुए कहते हैं कि “जब मैंने पहले–पहले काम प्रारंभ किया उस समय लोगों को मेरे व्यवसाय पर यकीन दिलाना सबसे बड़ी चुनौती थी। इसके अलावा सच कहूँ तो तकनीकी पृष्ठभूमि से भी मेरा कोई वास्ता नहीं था।”
 ANAND NAIK

गृहनगर हुबली से किया व्यवसाय का शुभारम्भ 

आनंद के पास कोई दूसरा अनुभव भी नहीं था क्योंकि उस समय बोर्डबीज़ समूचे क्षेत्र का पहला टेक स्टार्टअप था। और अपने गृहनगर हुबली का चयन व्यवसाय के लिए करने के पीछे आनंद का कारण था कि उत्तरी कर्नाटक में हुबली एक जाना माना वाणिज्यिक और व्यावसायिक केंद्र है जिसे ‘छोटा बंबई’ भी कहा जाता है। लेकिन वहाँ ज्यादातर लोग अपना परंपरागत व्यवसाय जमा कर बैठे हैं। इस तरह परंपरागत व्यवसाय के बीच में तकनीकी व्यवसाय की शुरुआत करना अपने आप में एक चुनौती था ऐसे में एक नया व्यवसाय आई.टी समाधान कंपनी प्रारंभ करना आनंद के लिए एक खट्टा–मीठा लेकिन नए अनुभव प्रदान करने वाला रहा।

आई.टी क्षेत्र का पहला स्टार्टअप का मिला लाभ 

आंनद अपने शुरूआती दौर की याद साझा करते हुए कहते हैं “दुकानदार परीक्षण करने और फिर मोलभाव करने के लिये अक्सर ऊँचे रसूख का  इस्तेमाल करते। और कई बार तो हमें महीनों तक भुगतान ही प्राप्त नहीं हो पाता था। लेकिन कहते है समय परिवर्तनशील है एक न एक दिन बदलता जरूर है आनंद के व्यवसाय ने भी करवट बदली समय की मांग को देखते हुए अन्य तकनीकी व्यवसाय भी आनंद के साथ प्रतिस्पर्धा के मैदान में उतरे लेकिन आई.टी क्षेत्र का पहला स्टार्टअप होने का लाभ आनंद को मिला। आनंद को अब अपनी मंज़िल का रास्ता दिखने लगा था

अनुभवी इंजीनियरों को अपनी टीम में जोड़ा 

 कुछ समय बाद आनंद ने अपने स्कूल में पढ़ने वाले सीनियर जो की सॉफ्टवेयर कंपनियों के साथ काम कर रहे थे उन्हें अपनी टीम में शामिल करने की कोशिश की और वे सफल भी रहे। अनुभवी इंजीनियरों को अपनी टीम में जोड़ना आसान रहा पर अपनी टीम को बनाये रखना किसी चुनौती से कम नहीं था। अपनी टीम को जोड़े रखने, उनके उचित वेतन की व्यवस्था हेतु आनंद ने अन्य संस्थानों में अध्यापन का कार्य शुरू किया। साथ ही शैक्षिक संस्थानों में आई.टी का प्रशिक्षण देने का अनुबंध भी हासिल लिया। आंनद का जुनून मेहनत और काबिलियत का परिणाम है कि आज उनकी 60 लोगो की एक जिम्मेदार और अनुभवी टीम है।
दिलचस्प बात यह है कि उनकी टीम के ज्यादातर कर्मचारी उनसे उम्र में काफी बड़े हैं।

टीम के साथ तालमेल में सफल 

आनंद खुद कहते हैं कि मेरी टीम के सबसे उम्रदराज सदस्य 62 वर्ष के हैं और अपने टीम के सदस्यों के साथ आनंद का तालमेल बहुत ही व्यवहारिक और संवेदनशील है। आनद कहते हैं कि “मैं किसी को अपनी टीम का हिस्सा बनाने से पहले उससे एक मुलाकात जरूर करता हूँ। जिससे हमारी वैचारिक समझ बढ़ सके और हम सभी का सम्मान करते हुए कार्य करे।

कर्नाटक के सबसे लोकप्रिय उद्यमियों में से एक

आने वाले समय में उन्हें काफी प्रसिद्धी और पुरस्कार मिले और आज वे उत्तरी कर्नाटक के सबसे लोकप्रिय उद्यमियों में से एक हैं। आनंद के स्टार्टअप बोर्डबीज़ ने विनिर्माण की समस्या से निजात पाने के लिए आउटसोर्सिंग के रास्ते को चुना जिसका परिणाम यह निकला कि बर्डबीज़ विनिर्माण के क्षेत्र में ई.आर.पी समाधान कंपनी बनने में शीर्ष पर रही। एक 18 साल के किशोर की सोच ‘बर्डबीज़’ अभी तक 150 से भी अधिक मोबाइल ऍप्लिकेशन्स का निर्माण कर चुकी है और प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

एक कॉल ने बदल दी जिन्दगी 

आंनद की बोर्डबीज़ को 2 साल ही हुए थे कि साल 2013 के एक सोमवार की दोपहर को अचानक उनके पास एक फोन आया। आनंद को लगा किसी उपभोक्ता का कॉल होगा क्योंकि फ़ोन के दूसरी तरफ से उनसे कम्पनी की कार्य प्रणाली के बारे में पूछा जा रहा था। आनंद ने भी उन्हें उपभोक्ता समझ कर बड़े ही सहज तरीके से बोर्डबीज़ कंपनी द्वारा किये जा रहे कार्यो से अवगत करवाया और कॉल समाप्ति पर आनंद को लगा की वे उपभोक्ता को संतुष्ट करने में सफल रहे। आनंद को इस बात का इल्म तक नहीं था कि ये एक फ़ोन कॉल उनकी किस्मत का रुख बदल देगा। वे कुछ कह सकते उससे पहले ही उन्हें पुनः एक कॉल आया और आनंद को बताया गया की वे इस वर्ष के “सर्वश्रेष्ठ युवा उद्यमी पुरस्कार” के विजेता हैं और भारत के मशहूर उद्योगपति रतन टाटा के द्वारा उन्हें सम्मानित किया जाएगा।
आनंद कहते है “उस कॉल ने मानो मेरी जिंदगी बदल दी हो। प्रारंभिक दौर में ही पुरस्कार और सराहना का अपना अलग ही महत्व होता है क्योंकि इसके बाद आपको मान्यता तो मिलती ही है साथ ही बाजार में स्वीकार्यता भी मिलती है।

18 बट नॉट टीन

वर्तमान में बोर्डबीज़ एक सफल और प्रतिष्ठित कम्पनी है। लेकिन आनंद आज भी हर दिन एक नयी शुरुआत करते हैं वे अपने अनुभवों को छात्रों और विशेषकर किशोरों के साथ साझा करते हैं और उन्हें प्रोत्साहित करते हैं। उन्होंने एक अभियान चलाया है जिसका नाम है “18 बट नॉट टीन“, जिसके माध्यम से कई कॉलेजों के युवाओं से अपने अनुभव साझा करते है। आनंद कहते हैं कि “मैंने प्रारंभिक दौर में बहुत अधिक आलोचना का सामना किया। मुझे याद है कि कैसे मेरे इस कदम को खतरनाक करार दे दिया गया था। मैं यह सुनिश्चित करना चाहता हूँ कि युवा कम उम्र में ही बड़े सपने देखने और विफलता को अपनाने में मेरे अनुभवों से कुछ सीख लेने में सफल रहें।

एक बड़ी सोच  आपकी जिंदगी बदल सकती है 

अपनी इस नयी पहल के साथ ही आनंद ने एक नई यात्रा प्रारंभ की जिसमें 25 शहर शामिल थे और सफर था 30 हजार कि.मी. से भी अधिक और मकसद यह था, छात्रों को कम उम्र में उद्यमिता के साथ प्रयोग करने के लिये प्रेरित करना।
आज आनंद ने दुनिया को बता दिया कि किसी भी व्यवसाय की शुरुआत के लिए बड़ी उम्र, ज्यादा पैसा, बड़ी जगह या फिर ज्यादा तज़ुर्बे की जरूरत नहीं होती, आवश्यकता होती है तो केवल एक बड़ी सोच की और उस सोच को हक़ीक़त में बदलने के जज़्बे की।

मुस्लिम लड़की को हुआ हिंदू से प्यार तो सियासत में आया भूचाल-सचिन पायलट और सारा की लव स्टोरी

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कश्मीर में इस शादी का हुआ था  काफी विरोध 

कहते हैं कि प्यार किसी की जात और मजहब नहीं देखता। पवित्र प्यार वह अनुभूति है जो हर किसी को ​अपने साथी के प्रति वफादार बना देता है। इतिहास गवाह है कि जमाना प्यार का दुश्मन रहा है लेकिन जब प्यार सच्चा हो तो वह इन सबकी परवाह नहीं करता और लोग इसे सलाम करते हैं।

फारूक अब्दुल्लाह की बेटी से हुआ इश्क
प्यार के नाम लिखी गई यह इबारत सचिन पायलट और सारा अब्दुल्लाह की लव स्टोरी पर हूबहू लागू होती है। 7 सितंबर 1977 को कांग्रेस के दिग्गज नेता राजेश पायलट के घर जन्मे सचिन पढ़ाई में बहुत अच्छे स्टूडेंट रहे हैं। आज सचिन भी कांग्रेस में बड़ा मुकाम हासिल कर चुके हैं। वहीं सारा अब्दुल्लाह कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्लाह की बेटी हैं। अब सारा अब्दुल्लाह सारा पायलट बन चुकी हैं क्योंकि उन्होंने सचिन को जीवनसाथी चुना।

कई लोगो ने किया था विरोध

सचिन और सारा की यह लव स्टोरी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगती, क्योंकि इस शादी का काफी लोगों ने विरोध भी किया था। कई कट्टरपंथियोंं ने इस पर ऐतराज जताया था लेकिन इन दोनों ने साबित कर दिया कि सच्चा प्यार हर इम्तिहान के बाद और निखरकर सामने आता है।

विदेश में पढ़ाई के दौरान हुई थी मुलाकात

विदेश में पढ़ाई के दौरान सचिन और सारा मुलाकात हुई थी। बाद में दोनों ने शादी का फैसला किया। चूंकि वे दोनों ही चर्चित राजनीतिक परिवारों से हैं, इसलिए कई लोगों ने आशंका जाहिर की थी कि इस शादी का असर उनके राजनीतिक भविष्य पर पड़ सकता है।

कश्मीर में हुआ था शादी का विरोध

मगर सचिन और सारा की शादी ने परंपरागत समाज के कई मिथकों को तोड़ दिया। दोनों ने मजहब, राजनीति व रूढ़ियों को दरकिनार कर जनवरी 2004 में एक सादे समारोह में शादी कर ली। दूसरी ओर कश्मीर में इस शादी का काफी विरोध हुआ।

26 साल में बने सांसद

उसी साल लोकसभा चुनाव होने थे। उस समय सचिन की उम्र मात्र 26 साल थी। वे चुनावों में उतरे और जीत दर्ज की। इसके बाद सचिन राजनीति में तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते गए। अब तक इस शादी को लेकर जो विरोध था, वह भी काफी कम हो गया। अब दोनों ही परिवार इस शादी को स्वीकार कर चुके हैं और सचिन व सारा अपनी जिंदगी में काफी खुश हैं।

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आठ साल तक एक रोटी खाकर गुजारी जिंदगी ,आज है बॉलीवुड के फेमस ACTOR

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सर्कस वाला खरीदने आया था के के गोस्वामी को 

अगर सपने सच्चे हो और आपमें उन्हें पूरा करना का जज़्बा हो तो फिर उन्हें पूरा होने से कुछ भी रोक नहीं सकता। यह बात को साबित कर दिखाया है बॉलीवुड एक्टर केके गोस्वामी ने। केके महज का कद महज 3 फीट है, लेकिन अपने जीवन में संघर्ष करने के बाद उन्होंने बॉलीवुड में जिन ऊंचाईयों को छुआ है, वह बेहद ही हैरान कर देना वाला और तारीफ करना वाला है। केके का अपने बॉलीवुड तक के सफर के दौरान किए गए संघर्षों के बारे में कहना है कि जब वह मुंबई एक एक्टर बनने का सपना लेकर पहुंचे तभी से उनका स्ट्रगल शुरू हो गया। 7-8 साल तो उन्होंने सिर्फ एक वक्त रोटी खाकर ही निकाले।
भोजपुरी एक्टर केके गोस्वामी का आज जन्मदिन है। गोस्वामी को इंडस्ट्री के कई एक्टर और एक्ट्रेस समेत कई लोगों ने बधाई दी। रात को मुंबई में एक पार्टी का भी आयोजन किया गया है। जिसमें कई लोग पहुंचेंगे। गोस्वामी के लिए बिहार के एक छोटे से गांव से लेकर मुंबई तक का सफर आसान नहीं था। इस दौरान कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। गोस्वामी की हाइट तीन फीट के करीब है और उनकी वाइफ उनसे दो फीट लंबी हैं। शादी के पहले वो अपने कम कद के कारण डर गए थे।

सर्कस वाला खरीदने आया था घर…

 गोस्वामी ने बताया कि मेरा और मेरे छोटे भाई का कद छोटा है। जब इस बात का पता एक सर्कस वाले को चला तो वह मेरे पिता से मिला।
– उसने पिता से कहा कि बड़े बेटे को मुझे दे दिजिए। आपको 50 हजार रुपए देंगे। इसको सर्कस का काम सिखाएंगे। आप इससे मिल भी सकते हैं।
– सर्कस वाले की बात सुनकर मैं डर गया था। पिता जी ने मुझे बेचने से इनकार कर दिया तब राहत मिली। मैं उस समय 10-12 साल का था।

ससुर नहीं चाहते थे कि छोटे कद के लड़के से हो बेटी की शादी

– गोस्वामी जब जवान हुए तो शादी तय हुआ, लेकिन ऐन वक्त पर ससुराल वाले बेटी देने से इनकार करने लगे।
– लड़की ने जब सिर्फ और सिर्फ इनसे ही शादी करने की जिद की तब वे दूल्हा बनकर ससुराल गए, लेकिन दिल में डर था।
– छोटा कद की जानकारी के बाद भी होने वाली पत्नी उनसे शादी करने को तैयार थी। घरवाले उसे समझा रहे थे कि अभी भी मौका है। शादी से इनकार कर दो और अपने लिए कोई अच्छा लड़का चुनो। इस पर लड़की का कहना था कि शादी तय होने के दिन से ही मैं उन्हें अपना पति मानने लगी हूं। वे नाटे हुए तो क्या हुआ मैं उन्हीं से शादी करूंगी।
– लड़की के इस जवाब के बाद भी गोस्वामी को बरात ले जाने से डर लग रहा था। उन्हें डर था कि बैंड बाजे के साथ पूरे गांव के लोगों को बरात में ले जाउं और अगर लड़की ने मुझे देख कर शादी से मना कर दिया तो? ऐसा होने पर पूरे समाज में बदनामी होती। इस डर से गोस्वामी ने मंदिर में शादी की।
के. के. गोस्वामी

गांव के लोग मां को मारते थे ताना

– अपनी नटखट अदाओं से लोगों को हंसाने वाले कॉमेडी स्टार केके गोस्वामी का जीवन कई रोचक कहानियों से भरा है।
– गोस्वामी ने कहा कि छोटे कद के चलते उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
– मेरा घर बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के पानापुर में है।
– गांव में जब भी पड़ोसी झगड़ा करते तो मां को मेरा कद को लेकर जरूर ताना मारते थे।

बीयर बार में नौकरी करने गए थे केके पर…

एक बार उन्हें उनके ही कद-काठी का आदमी मिला जिसने बीयर बार में नौकरी करने की सलाह दी। उसने उन्हें बताया कि वहां नौकरी करने पर उन्हें 500-700 रुपए मिलेंगे और साथ ही अच्छा खाना। उस व्यक्ति की बात मान कर बीयर बार पहुंचे। जब वह अंदर जाने लगे तो बार के वॉचमैन ने उन्हें डंडा मारकर बाहर से ही भगा दिया। यह पल केके की जिंदगी का वो पल था जब उन्होंने ठान लिया कि अब वह हर हाल में एक्टर बनकर रहेंगे।

मेरे छोटे कद के कारण बेटे को होना पड़ता था शर्मिंदा

केके का कहना है कि कम कद होना आज भी एक समस्या ही है। क्योंकि आज मैं एक एक्टर हूं इसलिए लोग मुझे स्वीकारते हैं। जब मैं एक परिचित चेहरा नहीं था तब तक मैं कभी अपने बेटे के साथ उसके स्कूल नहीं जा सका क्योंकि जब भी मैं उनके स्कूल जाता था तो बच्चे मेरा मज़ाक उड़ाते थे जिसके कारण मेरे बेटे को शर्मिंदा होना पड़ता था। मेरे बेटे को शर्मिंदा ना होना पड़े इसलिए मैं अकसर अपने बेटे के किसी भी स्कूल फंक्शन में अपनी पत्नी को भेजा करता था। लेकिन इन सब चीजों ने मेरे ऊपर बहुत असर डाला और मैनें यह ठान लिया कि मैं यह साबित करके रहूंगा कि आदमी कद से नहीं, हुनर से बड़ा होता है।
के. के. गोस्वामी

एक दिन खाना और 6 दिन पानी पीकर बिताते थे हफ्ते

केके की संघर्ष की कहानी सुनकर तो हर कोई हैरान रह जाए। मुंबई में अपने संघर्ष के दिनों में केके हफ्ते में सिर्फ एक दिन पूरा खाना खाते थे और बाकी दिन 6 दिन वह पानी पीकर बिताया करते थे। उनकी हालत इतनी खराब हो गई थी कि उन्हें पानी देखकर भी उल्टी आती थी। वह खाने को इतना तरस गए थे कि सिर्फ एक वक्त अच्छे खाने के लिए बिना पैसों के भी काम करने को तैयार रहते थे। कई बार हौसला टूटा भी, कई बार मन में आया कि वापस बिहार लौट जाएं लेकिन बीयर बार वाली घटना ने उनके दिल और दिमाग पर इतना गहरा असर डाल दिया था कि अब एक्टर बनना ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन गया था।

शो की टीआरपी बढ़ाने के लिए करते थे शामिल

टीवी शो में अपने किरदार के बारे में बताते हुए केके ने बताया कि पहले ज्यादातर स्क्रिप्ट राइटर उनके जैसे कम कद वालों को सिर्फ शो की टीआरपी बढ़ाने के लिए शामिल किया जाता है। लेकिन अब ऐसा नहीं है, अब हालात बदल चुके हैं। हालांकि अभी हालात शायद इतने नहीं बदले हैं कि हमें लीड रोल के रूप में जगह दी जाए।

कैसे बना एक पत्थर तोड़ने वाला The Great Khali

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The Great Khali Hindi Biography

कभी मेहनत-मजदूरी करके जीवन यापन करने वाले खली , आज इतने धनवान हो गए है कि अपने गाँव की विकास के लिए पैसे खर्च करते है। जी हाँ टीनेज के दिनों में उन्हें अपने भाई और पिता के साथ मेहनत-मजदूरी करने जाना पड़ता था। ताकि वे अपना पेट पाल सके। पर एक दिन उनकी किस्मत ने यू टर्न लिया की, उनकी दुनियाँ ही बदल गई। खली की सफलता  किसी हिंदी फिल्म  के हीरो की कहानी से कम नहीं है। तो आइये जानते है ग्रेट खली की का सफ़र  जिनका वास्तविक नाम दिलीप सिंह राणा   है

Childhood  

The Great Khali का जन्म हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के सिराइना गाँव में, गरीब पंजाबी राजपूत फ़ैमिली में हुआ था। उनके पिता ज्वाला राम एक किसान थे और माँ तंदी देवी एक हाउस वाइफ़ थी, जो खेती में पति की सहायता करती थी।
बचपन में Gigantism नामक बीमारी से पीड़ित होने के कारण उनका माथा, नाक, ठुड़ी और कान असामान्य रूप से बड़े हो गए थे, जिसके कारण वह अपने सातों भाई-बहनों और परिवार में सबसे अलग थे। केवल उनके Grandfather की लंबाई(6फुट 6इंच) ही उनके लंबाई की करीब थी।
परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक ना होने के कारण उनकी पढ़ाई-लिखाई ना हो सकी। आगे जिंदगी काटने के लिए उन्हें अपने भाइयों के साथ दूसरे गाँव में जाकर मजदूरी करनी पड़ती थी। ऊंची कद-काठी और Heavy Body वाला होने के कारण उनके लिए वजन उठाना बाए हाथ का खेल था।
जैसे-जैसे वे बड़े होते गए, वैसे वैसे बाजार में उनके पैर की नाप(Shoe Size) के जूते-चप्पले मिलना मुश्किल होने लगा। इसलिए उन्हें शिमला में एक मोची से जूते और चपप्ले बनवाने पड़ते थे।
उनके गाँव के लोगों का कहना है-जब वे कहीं भी जाते थे, तो उनको देखने के लिए लोगो की भीड़ लग जाता था। पर खली को भीड़ पसंद नहीं था
लोग उनसे मरे हुए जानवरों को एक जगह से दूसरे जगह ले जाना, पत्थर तोड़ना जैसे हैवी-काम ज्यादा करवाते थे।

Khali के जीवन का यू टर्न

अब वो टाइम आया गया था, जब काली माता की इस भक्त की किस्मत का सूरज उगने वाला था।
एक दिन पंजाब पुलिस का ऑफिसर शिमला घूमने के लिए आया। जब उसने The Great Khali को देखा तो दंग रह गया। उस ऑफिसर ने उन्हें पंजाब पुलिस में शामिल होने के लिए इंवाईट किया और पंजाब आने के लिए भी पैसा दिया।
इस तरह उन्होंने अपने छोटे भाई के साथ पंजाब पुलिस को ज्वाईन कर लिया।
उन दिनों Wrestling का बड़ा ही बोल-बाला था।उनका शरीर पहलवानी के लिए एकदम फिट था । तब पंजाब पुलिस ने उन्हें पहलवानी की ट्रेनिंग दिलाई।

WWE Career & First Fight

इसके बाद The Great Khali सन 2000 में America चले गए, जहां उन्होंने WWE के एक मैच में मात्र 10 मिनट के अंदर Undertaker को हराकर पूरी दुनिया में खलबली मचा दी।
इसके बाद बिग शो, मार्क हेनरी और बतिस्ता जैसे पहलवानों को हराकर डब्‍ल्यूडब्ल्यूई का खिताब जीत लिया। इस तरह उनका 14 सालों तक WWE में दबदबा रहा।

WWE से सन्यास

The Great Khali ने  नंबर 2014 में रेस्लिंग की दुनिया से सन्यास ले लिया और आगे के लिए प्लान बनाया कि इंडिया में ही WWE के लिए Star Fighters की फौज तैयार करेंगे। इसके लिए उन्होंने इंडिया में कई ब्रांच भी खोले हैं।

The Great Khali Hindi Biography

Broody Steel का Challenge

अभी हाल के दिनों में ही कनाडाई रेसलर ब्रूड़ी स्टील और मैक नॉक्स ने खली को चेलेंज किया कि वो उनको उनके देशवाशियों के सामने हरा देंगे।
उन्होंने भी इस चेलेंज को असेप्ट कर लिया और 25 फरवरी 2016 को उतराखंड के हल्द्वानी में हुए मैच में विदेशी रेस्लेर्स ने धोखे से खली को घायल कर दिया। जिसके कारण उन्हें हॉस्पिटल ले जाना पड़ा। उनके सिर पर चौदह टांके आये।
पर उन्होंने अगले ही दिन स्टील और नॉक्स से बदला लेने की घोषणा कर दी और उन्होंने 28 फरवरी को उसी जगह हुए बाऊट में तीनों विदेशी रेस्लेर्स को हराकर अपना चेलेंज पूरा किया।

कैसे पड़ा नाम खली ?

शुरुआत में जब वे रेस्लिंग की दुनियाँ में गए तो उन्हें कई लोगों ने Giant Singh कहा तो कईयों ने Dalip Singh। वे हिन्दू देवी माँ काली के परामभक्त हैं। इसलिए लोगों ने उन्हें भगवान शिव का नाम सुझाया। पर यह हिन्दू धर्म की आस्था से जुड़ी बात थी। इसलिए उन्होंने अपना नाम काली रख लिया पर अंग्रेजों ने उन्हें खली बुलाने लगे। ठीक वैसे ही जैसे मोदी को अमेरिका में मोड़ी पुकारा गया।

Movies और T V Shows में Debut

रेस्लिंग करते हुए कई बार उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए Hollywood और Bollywood से भी ऑफर मिला। जिनमें फिल्मों की कहानी पसंद आने पर ऑफर भी असेप्ट करते थे।
उनकी हॉलीवुड की Movies The Longest Yard, Get Smart, MacGruber, Rama:The Saviour, HOUBA! On the Trail of the Marsupilami और बॉलीवुड की फिल्म कुश्ती हैं।
इसके अलावा 2010 में वे T V Shows की सबसे बड़े सीरियल “बिग बॉस” में भी काम कर चुके है, जिनमें फ़र्स्ट रनर अप रहे थे। आउटसौर्सड और पेयर ऑफ किंग्स जैसे टीवी सीरियल में भी नजर आ चुके है।

Personal Life

स्वभाव से कोमल The Great Khali का विवाह 2005 में हर्मिन्दर कौर(Harminder Kaur) से हुआ। अब वे जालंधर, पंजाब में अपनी पत्नी के साथ खुशी-खुशी रहते हैं।

Diet

खली के Diet के बारें में किसी के पास पुख्ता खबर नहीं है। उन्होंने एक Interview में कुबुला है कि वे वेजिटेरियन है। पर एक दूसरे इंटरव्यू में कहां कि वे मांस भी खाते है।

GULABI CHUDIYA-NAGARJUN

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गुलाबी चूड़ियाँ

नागार्जुन


जब भी कभी नागार्जुन जी का नाम दिमाग में आया सबसे पहले गुलाबी चूड़ियाँ ही याद आई ……
कभी कभी पुरानी यादें लौट आती है आज भी याद है स्कूल में हिंदी की क्लास में एक ट्रक ड्राईवर के बारें में ऐसे पिता का वात्सल्य जो परदेस में रह रहा है घर से दूर सड़कों पर महीनों चलते हुए भी उसके दिल से ममत्व खत्म नहीं हुआ जो अपनी बच्ची से बहुत प्यार करता है ………….
यह कविता है नागार्जुन की “गुलाबी चूड़ियाँ” जिसे उसने अपने ट्रक में टांग रखा है ! ये चूडियाँ उसे अपनी गुड़िया की याद दिलाती और वो खो जाता है हिलते डुलते गुलाबी चूड़ियाँ की खनक में ………!!
कविता की पंक्तियाँ ……….
प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…
झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा –
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वरना किसे नहीं भाँएगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ !

TANUSHREE PARIKH-FIRST WOMAN BSF OFFICER

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 तनुश्री पारीक

(TANUSHREE PARIKH )

राजस्थान में भारत-पाक सीमा पर देश की रखवाली करने वाली बीएसएफ की पहली महिला असिस्टैंट कमांडेंट तनुश्री पारीक उन्हीं महिलाओं में से एक हैं। तनुश्री ने 40 साल के बीएसएफ के इतिहास में पहली महिला असिस्टेंट कमांडेंट बनने का गौरव हासिल किया। वह इस वक्त पाकिस्तान की सीमा से सटे इलाके बाड़मेर में ड्यूटी पर तैनात हैं।

देश में महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुष  को न सिर्फ चुनौती दे रही है बल्कि उनसे आगे भी बढ़ रही हैं। राजस्थान में भारत-पाक सीमा पर देश की रखवाली करने वाली बीएसएफ की पहली महिला असिस्टैंट कमांडेंट तनुश्री पारीक उन्हीं महिलाओं में से एक हैं। तनुश्री ने 40 साल के बीएसएफ के इतिहास में पहली महिला असिस्टेंट कमांडेंट बनने का गौरव हासिल किया। वह इस वक्त पाकिस्तान की सीमा से सटे इलाके बाड़मेर में ड्यूटी पर तैनात हैं। अपनी ड्यूटी के साथ ही वह कैमल सफारी के जरिए बीएसएफ एवं वायुसेना के महिला जवानों के साथ नारी सशक्तिकरण एवं बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का संदेश दे रही हैं।

देश की पहली महिला असिस्टेंट कमांडेंट

तनुश्री 2014 बैच की बीएसएफ अधिकारी हैं। 2014 की यूपीएससी की असिस्टैंट कमांडेंट की परीक्षा पास की थी। इसके बाद उन्होंने टेकनपुर स्थित सीमा सुरक्षा बल अकादमी में आयोजित पासिंग आउट परेड में देश की पहली महिला अधिकारी (असिस्टेंट कमांडेंट) के रूप में हिस्सा लिया और 67 अधिकारियों के दीक्षांत समारोह में परेड का नेतृत्व भी किया। इसके लिए उन्हें सम्मानित किया गया। टेकनपुर के बाद तनुश्री ने बीएसएफ अकैडमी के 40वें बैच में 52 हफ्तों की ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद तनुश्री को पंजाब में भारत-पाकिस्तान सीमा पर तैनाती मिली।

दीक्षांत समारोह के दौरान बैच लगाते राजनाथ सिंह


बॉर्डर फिल्म की शूटिंग से मिली प्रेरणा 

अभी तनुश्री पंजाब फ्रंटियर में तैनात हैं। उनका कहना है कि उन्होंने नौकरी के लिए नहीं पैशन के लिए बीएसएफ को चुना क्योंकि उन्हें बचपन से ही सेना में जाने की लगन थी। जिस बाड़मेर में आज तनुश्री ड्यूटी कर रही हैं कभी उनके पिता वहां नौकरी करते थे। जब बीकानेर में बॉर्डर फिल्म की शूटिंग हो रही थी तो वह स्कूल जाया करती थीं। उसी फिल्म से तनुश्री को सेना में जाने की प्रेरणा मिली। वह स्कूल और कॉलेज में एनसीसी कैडेट भी रहीं हैं।

लड़कियां सूरज से बचने के लिए सनस्क्रीन लगाना छोड़ें

तनुश्री कहती हैं, ‘मेरा फोर्स में जाना तभी मायने रखेगा, जब दूसरी लड़कियां भी फोर्स ज्वाइन करना शुरू करेंगी।’ उन्होंने कहा कि लड़कियां सूरज से बचने के लिए सनस्क्रीन लगाना छोड़ें, धूप में तपकर खुद को साबित करें।’उन्हें इस बात का बेहद गर्व है कि वे देश की पहली महिला कॉम्बैट ऑफिसर हैं ।

बचाओ-बेटी पढ़ाओ दे रही है संदेश 

तनुश्री इस वक्त एक कैमल सफारी का नेतृत्व कर रही हैं जो सीमा से सटे इलाकों में आमजन से रूबरू होने के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और महिला सशक्तिकरण का संदेश दे रही है। यह कैमल सफारी 1368 किमी का सफर तय कर 49 दिन बाद यानी 2 अक्टूबर को वाघा बॉर्डर पहुंचेगी। कैमल सफारी में तनुश्री के साथ एयरफोर्स की लेडी ऑफिसर अयुष्का तोमसभी हैं। वह कहती हैं कि अगर माता-पिता बेटियों को पढ़ाई के साथ काबिल बना देंगे तो फ्यूचर में वे अपने पैरों पर खड़े होने के साथ किसी पर निर्भर नहीं रहेंगी।

SONAL MAN SINGH BIOGRAPHY IN HINDI

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सोनल मानसिंह प्रसिद्ध नृत्यांगना


(SONAL MAN SINGH)

यह कहानी एक ऐसे साहसिक लड़की की है जिसने परिस्थितियों आगे अपने घुटने नहीं टेके | जिस लड़की के लिए नृत्य ही जिंदगी थी  उसे एक बार लगा की वह कभी नृत्य ही नहीं कर पायेगी | एक दुर्घटना में उसे अपनी रीढ़ की हड्डी गवानी पड़ी और उसके शारीर पर पैरालीसिस का भी खतरा मंडरा रहा  था | फिर भी उसने हौसला नहीं हारा और इन सबसे उबर कर कैसे उसने फिर से स्टेज की और रुख किया ,जानिए सोनल मानसिंह की कहानी 

 


घरवाले चाहते थे मै वकील बनू 

मुंबई के एल्फीन्स्टन कॉलेज की मेरी पढ़ाई 1963 में खत्म होने के बाद घर पर सभी लोग चाहते थे कि मैं मास्टर्स करने के लिए जर्मनी चली जाऊं। पिताजी, मां, दादा, हर कोई यही कहता था कि जर्मनी जाकर पढ़ाई पूरी करो। दादाजी काफी प्रतिष्ठित वकील थे, इसलिए इस बात पर जोर था कि वकालत कर लो। मैं किसी सूरत में वकालत नहीं करना चाहती थी। आखिरकार एक रोज मैंने कह ही दिया- ‘मैं वकालत नहीं करूंगी। मेरे वश का नहीं है कि अदालत में खड़ी होकर मैं मी लॉर्ड करती रहूं’। वकालत से पीछा छूटा, तो दूसरी परेशानी आ गई। परिवार मेरी शादी के लिए पीछे पड़ गया। बड़ी बहन की शादी हो चुकी थी। मेरे लिए भी ढेरो रिश्ते आ रहे थे। एक रोज मैंने खुलकर कहा कि मुझे शादी नहीं करनी है। घरवाले चौंक गए। उन्होंने पूछा कि वकालत नहीं करनी है, शादी नहीं करनी है, तो फिर क्या करना है? मैंने पूरी हिम्मत से जवाब दिया-मुझे डांस करना है। घरवालों का जवाब मिला- शादी कर लो, डांस भी करती रहना। मैंने कहा, ‘मुझे डांस भी नहीं करना, मुझे डांस ही करना है’।

डांस का बचपन से था शौक 

 

डांस का शौक मुझे बचपन से था। कुछ बड़ी होने पर मैंने बेंगलुरु में प्रोफेसर यूएस कृष्णराव और उनकी पत्नी चंद्रभागा देवी से नृत्य सीखना शुरू किया। वे दोनों भारतीय नृत्य की बहुत बड़ी शख्सियत थे। गुरुजी को मेरे डांस में हर चीज खूब भाती थी, लेकिन वह चाहते थे कि मैं भाव पक्ष को लेकर और मेहनत करूं। उस वक्त मैं 1961 में ‘अरंगेत्रम’ की आखिरी तैयारियों में लगी हुई थी। जून का महीना था। बहुत गरमी भी थी। इसकी वजह से मेरे चेहरे पर शायद वैसे भाव नहीं आ रहे थे, जैसा गुरुजी चाहते थे। एक रोज उनके घर के बाहर एक मदारी आया। गुरुजी ने मुझे बुलाया। उन्होंने बंदरों की तरफ दिखाते हुए पूछा कि ‘ये क्या है’? मैंने जवाब दिया- ‘बंदर-बंदरिया डांस कर रहे हैं गुरुजी। गुरुजी ने तत्तकली दिखाते हुए कहा- ‘शो मी द डिफरेंस बिटवीन मंकी ऐंड यू’। उनकी बात समझ में आ गई। यही वाकया मेरी जिंदगी को परिभाषित करने वाला रहा। दक्षिण भारत की नृत्य विधाओं में गुरु छोटी मजबूत लकड़ी को बजाकर लय विन्यास सिखाते हैं। उसे तत्तकली कहा जाता है। शिष्य की अंगशुद्धि के लिए इससे पिटाई भी की जाती है।

घर से भी भागी 

 

इसके बाद साल 1961 में उन दोनों के निर्देशन में राजभवन में मेरा ‘अरंग्रेत्रम’ हुआ। मेरे दादाजी मंगलदास पक्कासा उन दिनों मैसूर के राज्यपाल थे। देविका रानी, उनके पति चित्रकार रोरिक, मैसूर के महाराजा, दक्षिण के जाने-माने कला आलोचक और तमाम गुरुगणों ने एक आवाज में मेरी प्रशंसा की, जिससे मेरे भीतर इस मार्ग पर आगे बढ़ने का साहस बढ़ा, और उत्कंठा बढ़ी। अगले दो साल में मैंने जर्मन साहित्य में मुंबई से स्नातक ऑनर्स पूरा किया। लेकिन नृत्य को लेकर मेरी जिद की वजह से घर पर लगभग सभी लोग मुझसे नाराज थे, खासकर मेरी मां। साल 1963 में मैंने एक दिन स्कॉलरशिप के पैसे लिए और बगैर किसी से कुछ बोले घर छोड़ दिया। कहीं से बस पकड़ी, कहीं से ट्रेन ली और सीधे बेंगलुरु पहुंच गई। जब गुरुजी के घर पहुंची, तो वह फिल्म देखने गए थे। मैं बाहर ही बैठकर उनका इंतजार करती रही। वह वापस लौटे, तो उनकी गाड़ी की रोशनी मेरे ऊपर पड़ी। उन्होंने पूछा- वहां कौन है? मैंने कहा- सोनल। फिर मैंने उन्हें पूरा किस्सा बताया। उन्होंने ही सबसे पहले मेरे घर पर जानकारी दी कि मैं सुरक्षित हूं। इसके बाद तो मैंने अपना जीवन ही डांस के नाम कर दिया।

उस दिन को मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकती

 

उस दिन को मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकती। तारीख थी 24 अगस्त, 1974। जर्मनी के बैरुथ में मैं अंतरराष्ट्रीय युवा महोत्सव के विद्यार्थियों को भरतनाट्यम का प्रशिक्षण दे रही थी। मैं अपने मंगेतर जॉर्ज लैश्नर के साथ कार से जा रही थी। रात का वक्त था। सड़क बारिश से भीगी हुई थी। हम जिस ‘बीटल फॉक्सवैगन’ में थे, उसमें डिक्की आगे होती थी और इंजन पीछे, यानी कार आगे से हल्की थी। उन दिनों सीट बेल्ट नहीं होती थी। रास्ता बिल्कुल सुनसान था। कार की रफ्तार सौ किलोमीटर प्रति घंटे के करीब रही होगी। अचानक लैश्नर को कार के सामने एक हिरन दिखाई दिया। उन्होंने उसे बचाने के लिए पूरी ताकत से ब्रेक लगाई। हमारी कार ने तीन बार गुलाटियां खाई और पलट गई। मैं कार से बाहर करीब 12-15 फीट दूर जाकर गिरी। उस वक्त मैं हिलने-डुलने या चिल्लाने तक के लायक नहीं थी।

मेरी रीढ़ की हड्डी और चार पसलियां टूटी 

 

कुछ देर बाद लोगों ने मेरे मुंह पर पानी छिड़का। मुझे बहुत ठंड लग रही थी।  मैंने बुदबुदाते हुए कहा कि मुझे कुछ ओढ़ने के लिए चाहिए। इतनी देर में पुलिस आ गई। थोड़ी देर बाद एंबुलेंस आई। मेल नर्सेस ने उठाया। मुझे अस्पताल पहुंचाया गया। वह म्यूनिसिपल अस्पताल था। सबसे पहले मुझे दर्द कम करने के लिए कुछ इंजेक्शन दिए गए और इसके बाद तुरंत एक्स-रे के लिए भेज दिया गया। मेरे एक्स-रे से पता चला कि चोट कितनी गंभीर थी। मेरी रीढ़ की हड्डी, गले के पास की हड्िडयां और चार पसलियां टूट चुकी थीं। इनके अलावा और भी कई चोटें थीं। रीढ़ की हड्डी की बारहवीं कड़ी टूटकर चकनाचूर हो गई थी। उस बुरे वक्त में राहत की खबर बस इतनी थी कि रीढ़ की हड्िडयों को आपस में जोड़ने वाला सूत्र बच गया था। चोट की गंभीरता को देखते हुए उस अस्पताल के डॉक्टरों ने कहा कि मुझे यूनिवर्सिटी सर्जिकल क्लीनिक ले जाया जाए, क्योंकि वहां इलाज का इंतजाम बेहतर था। मेरा एक्सीडेंट पेग्नीत्स शहर में हुआ था, जबकि यूनिवर्सिटी सर्जिकल क्लीनिक दूसरे शहर एरलांगन में थी।

टॉर्च की रोशनी से  मुझे ढूंढा गया 

 

लैश्नर मुझे वहां से लेकर यूनिवर्सिटी सर्जिकल क्लीनिक गए। मैं होश में तो थी, मगर बेतहाशा दर्द में थी। रास्ते में उन्होंने बताया कि एक्सीडेंट के बाद वह सीट और स्टीयरिंग के बीच फंस गए थे। उन्होंने पहले मुझे कार के भीतर ढूंढ़ा, लेकिन वहां मैं नहीं दिखाई दी, तो वह बहुत घबरा गए थे। तभी एक कार वहां आकर रुकी और फिर सबने मिलकर मुझे ढूंढ़ा। मुझे ढूंढ़ने के लिए टॉर्च की रोशनी का सहारा लिया गया।

तीन दिनों तक मुझे ‘फोम रबर’ पर रखा

 

एरलांगन में यूनिवर्सिटी सर्जिकल क्लीनिक में तीन दिनों तक डॉक्टरों ने मुझे ‘फोम रबर’ पर रखा और इलाज की प्रक्रिया के बारे में वे सलाह-मशविरा करते रहे। उनके लिए ‘स्पाइनल कॉर्ड’ से ज्यादा बड़ी मुसीबत थी खून का जमना। मेरी रीढ़ की हड्डी के पास बहुत सा खून जम गया था, जो रीढ़ पर दबाव बना रहा था। डॉक्टरों का मानना था कि अगर इसका तुरंत हल नहीं निकाला गया, तो मुझे ‘पैरालिसिस’ हो जाएगा। मेरे शरीर की तमाम मांसपेशियों में हरकत खत्म हो जाएगी। फिर उन्होंने तय किया कि वे मेरा ऑपरेशन करेंगे। ऑपरेशन के बाद मेरी रीढ़ की हड्डी को स्टील के रॉड से टिका दिया जाएगा, ताकि रीढ़ की हड्डी को सहारा मिल सके। ऐसा करके वे मुझे ‘पैरालिसिस’ से बचा सकते थे। मैं दवाई की वजह से हल्की बेहोशी में थी, पर ऑपरेशन की बात सुनते ही मैंने इशारे से मना किया। लैश्नर ने मेरे इशारे को समझ लिया। उसने डॉक्टरों से गुजारिश की कि ऑपरेशन को आखिरी विकल्प की तरह देखा जाए। डॉक्टरों ने भी लैश्नर की बात मान ली। बगैर ऑपरेशन मेरा इलाज शुरू किया गया। ऊपर वाले की दया से मेरे शरीर की सूजन अगले दो दिनों में कम हो गई।

चार किलो प्लास्टर कास्ट में मेरे आधे शरीर को बांध गया 

 

उसके बाद का इलाज आज भी याद करूं, तो सिहरन सी होती है। शरीर की सूजन कम होने के बाद मुझे प्लास्टर वाले कमरे में ले जाया गया। मुझे पट्टों की मदद से उलटा लटकाया गया। मेरी ठुड्डी के नीचे एक टेबल थी और दूसरी टेबल घुटनों के नीचे। शरीर के बीच का पूरा हिस्सा हवा में लटका हुआ था। इसके बाद डॉक्टर हवा में लटके उस हिस्से को दबा-दबाकर इस बात की जांच करते थे कि दर्द कहां-कहां हो रहा है। फिर मेरे पूरे शरीर को प्लास्टर के घोल में डूबी रूई की कई परतों में लपेट दिया गया। बेतहाशा दर्द हो रहा था। डॉक्टरों ने इस प्लास्टर को बांधने के दौरान अगल-बगल रूई की मोटी परतें लगा दी थीं। ऐसा इसलिए कि दर्द की हालत में अगर मैं हिलूं, तो नुकसान न हो। पूरी प्रक्रिया में कोई एक घंटे का वक्त लगा होगा। मैं दर्द में छटपटाती हुई डॉक्टरों को यह सब करते सिर्फ देख रही थी। जिस प्लास्टर कास्ट में मेरे आधे शरीर को बांध दिया गया था, वह कम से कम चार किलो का था। एक घंटे के बाद मुझे उस कमरे से बाहर निकाला गया। वहां से बाहर आने के बाद डॉक्टरों ने लैश्नर से सिर्फ इतना कहा कि सोनल दो वर्ष के बाद ही ठीक से चल-फिर सकेंगी, लेकिन नृत्य का ख्याल छोड़ना पड़ेगा।

 जिंदगी रुक-सी गई

 

बगैर ऑपरेशन मेरा इलाज तो कर दिया गया, लेकिन डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि फिलहाल मेरे घुटने, एड़ी, कोहनी और पांव के पंजे में मुड़ने की ताकत या लचक खत्म हो गई है। उन्होंने सांत्वना देते हुए कहा कि लचक धीरे-धीरे लौटेगी, लेकिन इसमें अच्छा-खासा वक्त लगेगा। मुझे भी बहुत मेहनत करनी होगी। 12 दिनों तक मैं अस्पताल में वैसे ही पड़ी रही। ऐसा लग रहा था कि जैसे जिंदगी रुक-सी गई है। फिर डॉक्टरों ने लैश्नर से कहा कि वह मुझे मॉ्ट्रिरयल ले जा सकते हैं। लेकिन पूरे रास्ते पीठ के बल ही लेटकर जाना होगा। लैश्नर वहां गॉथे जर्मन इंस्टीट्यूट के निदेशक थे। फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट पर उस रोज हम एंबुलेंस से पहुंचे। लेकिन फ्लाइट के कैप्टन ने मुझे विमान में ले जाने से मना कर दिया। उसने कहा कि मरीज की हालत ऐसी नहीं है कि उसे हवाई सफर कराया जाए। लैश्नर ने बहुत ‘रिक्वेस्ट’ की, लेकिन कैप्टन नहीं माना। आखिर कैप्टन को राजी करने के लिए लैश्नर ने मुझसे कहा कि मैं फ्लाइट की सीढि़यों पर चढ़कर उसे दिखा दूं। मैंने लैश्नर के कंधे का सहारा लेते हुए फ्लाइट की लगभग 30 सीढ़ियां चढ़कर दिखा भी दी, लेकिन कैप्टन पर कोई असर नहीं पड़ा। आखिर में उसने कहा कि अगर मुझे फ्लाइट में जाना है, तो किसी डॉक्टर का सर्टिफिकेट चाहिए होगा। लैश्नर ने एक कागज पर सर्टिफिकेट बनाया और अपने ही साइन करके लिखा- डॉक्टर जॉर्ज लैश्नर। इसके बाद फ्लाइट कैप्टन ने मुझे यात्रा करने की मंजूरी दी। मजे की बात यह है कि लैश्नर के पास मेडिकल सांइस में नहीं, फिलॉसफी में डॉक्टरेट की उपाधि थी।

नृत्य न करने के ख्याल से आंखों से नींद गायब हो गई

 

जब मैं मॉ्ट्रिरयल पहुंची, तो मित्र मंडल में खबर फैल गई। तमाम लोग मुझसे मिलने आए। आने-जाने वालों में से किसी ने लैश्नर को बताया कि वह मुझे डॉक्टर पियेर ग्रावेल को दिखाएं। पियेर ग्रावेल ने मेरी शुरुआती जांच के बाद कहा कि वह मेरे बारे में कोई भी बात तभी कह सकते हैं, जब वह मेरे इलाज की सारी रिपोर्ट्स की ‘स्टडी’ कर लेंगे। पूरी प्रक्रिया के दौरान मुझे यह तो भरोसा था कि मैं ठीक हो जाऊंगी, लेकिन मेरा डर इस बात को लेकर था कि मैं दोबारा नृत्य कर पाऊंगी या नहीं? मैं अपने पैरों में घुंघरू बांध पाऊंगी या नहीं? यह नृत्य ही था, जिसके लिए मैंने अपना घर छोड़ दिया था। यह नृत्य ही था, जिसके लिए मैं अपने पहले पति से अलग हुई थी। मैं लेटे-लेटे सिर्फ छत की ओर देखा करती थी। मेरी आंखों से नींद गायब हो गई थी। भूख खत्म हो चुकी थी।

आशा की एक किरण 

 

फिर एक दिन पियेर ग्रावेल ने मेरी सारी मांसपेशियों को जांचने के बाद बड़ी ही गंभीरता के साथ कहा- सोनल, मुझे डर है कि… इतना कहने के बाद ग्रावेल चुप हो गए। उनकी चुप्पी भर से मैं निराशा के सागर में डूब गई। मैं रो पड़ी। फिर कुछ देर बाद लगा कि कहीं दूर से आवाज आ रही है कि तुम दोबारा नृत्य करोगी। उनके इतना कहने के बाद तो कमरे में सभी के हाव-भाव ही बदल गए। लैश्नर और उसके इंस्टीट्यूट के साथियों ने ताली बजाते-बजाते जैसे छत को उड़ा दिया। मैं रो रही थी, पर मेरा मन थिरक रहा था। मैंने डॉक्टर ग्रावेल को फिर से इसी वाक्य को दोहराने के लिए कहा। उन्होंने जैसे ही दोबारा यह बात कही, मुझे लगा कि जैसे कमरे में इंद्रधनुष के तमाम रंग बिखर गए हों।

फिर से पहुची स्टेज पर 

 

इसके बाद अगले छह महीने तक जबर्दस्त मेहनत का दौर चला। फिर वह दिन भी आया, जब मैंने अपनी पहली क्लास को याद करके डर-डरकर पैर उठाना शुरू किया। 11 महीने के बाद भारत लौटी। बंबई (अब मुंबई) में माता-पिता के साथ 15 दिन रही। उस दौरान स्वामी हरिदास सम्मेलन में 20 अप्रैल, 1975 के दिन भरतनाट्यम करने का निमंत्रण मिला। बंबई का रंगभवन पूरी तरह भरा हुआ था। मैं ग्रीन रूम में थी। अचानक मेरी नजर शीशे पर गई। मुझे पसीने छूटने लगे। बहुत कुछ याद आने लगा। ऐसा लगा कि जैसे हाथ-पांव सुन्न हो गए हों। मुझे याद है कि ऐसा कई साल पहले भी हुआ था, जब मैं पहली बार स्टेज पर नृत्य करने वाली थी। मुझे याद है कि एक अंग्रेज पत्रकार ने तो मेरे नृत्य को देखने के बाद लिखा था- सोनल मानसिंह का नृत्य देखकर ही समझ आता है कि शास्त्रीय नृत्य को देवताओं की विरासत क्यों मानते हैं?

एक बार फिर से मेरी जिंदगी की शुरुआत हुयी 

 

मैं घबराए मन से स्टेज पर गई। हाथ जोड़कर दर्शकों का अभिवादन किया। इसके बाद मैंने लगभग डेढ़ घंटे तक भरतनाट्यम किया। सौभाग्यवश कथक क्वीन के विशेषण से प्रख्यात सितारा देवी, जो वहां दर्शक थीं, मंच पर चढ़ीं, अपनी बांहों में जकड़कर मेरे माथे पर हाथ रखा, गले से काला धागा उतारकर मेरे गले में यह कहते हुए पहनाया कि ईश्वर तुम्हें बुरी नजर से बचाए। इसके बाद मैं दिल्ली आई। जहां चार-छह घंटों तक भरतनाट्यम संगीत मंडली के साथ अभ्यास शुरू हुआ। चार मई, 1975 को होटल अशोक के विशाल कन्वेंशन सेंटर में मेरा ढाई घंटे का कार्यक्रम हुआ। डॉ. कर्ण सिंह, डॉ. कपिला वात्सायन आदि ने खुलकर प्रशंसा की। आज भी उस कार्यक्रम की चर्चा होती है।