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Thursday, March 19, 2026
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सरकारी नौकरी छोड़कर बनी मायानगरी की सफल अभिनेत्री -छवि पाण्डेय

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छवि पाण्डेय (अभिनेत्री ) जीवन परिचय || CHHAVI PANDEY ACTRESS HINDI BIOGRAPHY

लालू यादव ने दिया था सरकारी नौकरी 
छवि पाण्डेय की  प्रारंभिक शिक्षा पटना के सेंट जोसेफ कान्वेंट से हुई। छवि ने मगध महिला कॉलेज से ग्रेजुएशन की। छवि जब पटना में थी तो अपने गायन को लेकर हमेशा सुर्खियों में रही। छवि के  गायन से एक बार राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने छवि को  सरकारी नौकरी दिला दी।
किस्मत ने बनाया सिंगर से अभिनेत्री 
छवि के  पिताजी छवि को  सिंगर के तौर पर स्थापित करना चाहते थे पर किस्मत ने छवि को  अभिनेत्री बना दिया। इसके लिए उन्होंने  सरकारी नौकरी भी छोड़ दी। छवि  मुंबई में एक सिंगिंग  शो में ऑडिशन के लिए गयी थी पर अभिनय के लिए मौका मिला तो उन्होंने  इसे तुरंत स्वीकार कर लिया।
परिवार ने किया मुझे हमेशा सपोर्ट 
छवि बताती है -आज मैं जिस मुकाम पर हूं उसमें मेरे पिता उमेश कुमार पांडेय, मां गीता पांडेय और चाचा जयंत कुमार पांडेय का बहुत बड़ा योगदान है। मुझे लगता है कि अगर परिवार पूरी तरह सपोर्ट नहीं करे तो बिहार से मुंबई जैसे शहर में आकर संघर्ष करना बहुत मुश्किल है। शुरू में जब भी मुङो ऑडिशन के लिए मुंबई, कोलकाता और दिल्ली समेत किसी भी शहर में जाना हुआ चाचाजी हमेशा मेरे साथ रहे। इसलिए मैं बिहार के अभिभावकों से कहना चाहती हूं कि अगर आपकी बेटियां किसी भी क्षेत्र में कॅरियर बनाना चाहती हैं तो उनका खुले दिल से सहयोग करें। इससे बेटियों का उत्साह दोगुना हो जाता है।
छवि बताती  है –मैं जब छोटी थी तो किसी भी प्रतियोगिता में भाग लेने से डरती थी। जल्द ही एक कार्यक्रम में जज की भूमिका में भी नजर आऊंगी। जब जब वरुण धवन और दीपिका पादुकोण के साथ किसी मंच पर परफार्म करती हूं तो बहुत गर्व महसूस होता है।

एक बूंद इश्क सीरियल से मिली पहचान 

छवि को टीवी की दुनिया में  एक बूंद इश्क सीरियल से पहचान मिली। इसके बाद छवि ये है आशिकी, बंधन, सिलसिला प्यार का और और अब काल भैरव रहस्य में बतौर लीड अभिनेत्री के रूप में  काम कर रही है । ’सिलसिला प्यार का’ में छवि को अभिनेत्री शिल्पा शिरोडकर के साथ काम करने का मौका मिला। उन्होंने  भोजपुरी फिल्म बिदेसिया में बतौर लीड अभिनेत्री काम किया था पर अब वह  भोजपुरी फिल्मों में काम नहीं करना चाहती हूं। काल भैरव में काम करके वह बहुत ही रोमांचित हैं । इसमें वह  लंदन में पढ़ी-लिखी नम्रता का किरदार निभा रही हूं।

मुंबई में बहुत याद आता है बिहार का लिट्टी-चोखा

छवि बताती है -मैं बिहार के लिट्टी-चोखा को बहुत मिस करती हूं। अभी मैं सालभर से पटना नहीं आ पाई हूं।मैं पटना को बहुत मिस करती हूं।वहां के मौर्योलोक का लिट्टी-चोखा भी बहुत याद आता है। काल भैरव में मेरे साथ काम करने वाले सभी साथी मुझसे पूछते हैं कि लिट्टी-चोखा के बारे में पूछते हैं।मैंने उनसे वादा किया है कि शूटिंग खत्म होने के बाद मैं उन्हें पटना लेकर चलूंगी और बिहार की प्रसिद्ध चीजें खिलाऊंगी और दिखाऊंगी।

मन और शरीर को मजबूत करके ही माया नगरी में आइये

छवि कहती है -जो अभिनय के क्षेत्र में आना चाहते हैं उन्हें मैं मुंबई की हकीकत से रूबरू कराना चाहती हूं।यहां कॅरियर के किसी भी अन्य क्षेत्र से ज्यादा संघर्ष है। यहां कई बार युवा अपना धैर्य खो देते हैं। महीनों काम नहीं मिलता है और आर्थिक परेशानियां भी बढ़ जाती हैं तो कदम डगमगाने लगते हैं। लेकिन यही परीक्षा की घड़ी होती है। यहीं पर धैर्य के साथ सही निर्णय लेने की जरूरत पड़ती है। इसमें आपका अपना परिवार बहुत काम आता है।एकमात्र परिवार के लोग ही होते हैं जो आपका सहारा बनते हैं। इसलिए कभी भी अपने परिवार को मत भूलिए। उनसे अपनी हर बात शेयर करिए। यह बात गांठ बांध लीजिए कि यहां कुछ भी आसानी से नहीं मिलता। कुछ ही लोग भाग्यशाली होते हैं, जिन्हें जल्दी सफलता मिल जाती है।इसलिए मैं अपने फैंस और बिहार के युवाओं से कहना चाहती हूं कि मन और शरीर को मजबूत करके ही माया नगरी में आइये।

बच्चो से मजदूरी नहीं करवाईये – सीता चौधरी

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सीता चौधरी जब 10 साल की थी ,एक दिन उनके घर पर एक ठेकेदार आया और उनको अपने साथ चलने के लिए कहा उन्होंने उसका विरोध किया रोई और मिन्नतें भी की मगर ठेकेदार ने उन्हें डांटते हुए बताया कि तुम्हारे माता पिता तुम्हें बेच  चुके हैं और मैंने उसके लिए पैसा भी दिया है अब रोना धोना छोड़ो और मेरे साथ चलो वैसे नेपाल के जिस गांव में सीता का जन्म हुआ था वहां पर बच्चियों को बेचना और उनसे बंधुआ मजदूरी करवाना एक आम बात थी क्योंकि वहां के परिवार बहुत ही गरीब थे और वह अपने बच्चों से काम करने के लिए मजबूर थे ठेकेदार ऐसे बच्चों को घरेलू नौकर बना कर एक निश्चित समय के लिए शहर में भेज देते थे

 

सीता बताती है –मुझे अपने माता-पिता से कोई शिकायत नहीं है । लेकिन गांव में रोजगार नहीं  थे खेत के लिए जमीन नहीं थी । गरीबी और भूख के कारण लोगो को  अपने बच्चों से काम कराना पड़ता 

जिंदगी बन गयी नरक 

शहर में आकर सीता की जिंदगी नरक बन गई । ठेकेदार उन्हें एक घर में ले गया ।  घर के झाड़ू पोछा बर्तन और बच्चों की देखरेख  का जिम्मा सीता के ऊपर था। सीता को सुबह 4:00 बजे से लेकर रात के 12:00 बजे तक काम करना पड़ता था । कुछ भी गलती  होती थी तो घर की मालकिन उन पर भड़क जाती थी । 10 साल की सीता पर मालकिन को जरा सी भी दया नहीं आती थी ।छोटी सी गलती होने पर उन्हें पूरा दिन भूखा रखा जाता था । मजदूरी का ठेका 1 साल के लिए होता था और फिर ठेकेदार फिर उन्हें किसी नए परिवार में भेज देता था ।

बाहर पड़ता था सोना

सीता बताती है- हमारे देश में बहुत ही आसानी से सस्ते मजदूर मिल जाते हैं। अमीर परिवारों को सस्ते नौकर मिल जाते हैं और ठेकेदार को मोटा कमीशन । नौकरों  की जिंदगी कभी भी बदलती नहीं है । काम करते समय हर पल खतरा रहता कि कहीं नाराज ना हो जाए । घरवालों की याद तो आती थी लेकिन उनसे संपर्क करने का कोई जरिया नहीं था । तबीयत खराब होने पर यह कहने  की हिम्मत नहीं होती थी कि मैं आज काम नहीं कर पाऊंगी । घर में  चाहे जितना स्वादिष्ट खाना बने  उनके हिस्से में बासी खाना ही आता था । सर्दी हो या गर्मी उन्हें बाहर ही सोना पड़ता था ।

सरकार ने उठाया कदम 

लोक घरेलू नौकरों को हिकारत की नजर से देखते थे । उन्हें लगता था कि हम गरीब बच्चों को दुखी आसमान का एहसास नहीं होता । साल 2000 में पहली बार नेपाल में घरेलू नौकरों के उत्पीडन का मुद्दा उठा  और मामला कोर्ट तक पहुंचा ।देश में बाल मजदूरी पर कानूनी तौर से रोक लगाई गई ।मगर जमीन पर ऐसा कोई खास असर नहीं दिखा  । साल 2013 में एक 12 साल की घरेलू नौकरानी की मौत के बाद  यह मुद्दा दोबारा उठा।

सीता को मिली आजादी 

सीता को पता चला की कई गरीब बच्चों को प्रताड़ना की वजह से अपनी जान गवानी पड़ती है।  उन्हें डर लगा यदि वह जल्दी बंधुआ मजदूरी से आजाद नहीं हुई तो उनका भी यही हश्र हो सकता है । कई बार कोशिश की ठेकेदार के चुंगल से निकलने की पर वह  कामयाब नहीं हो पाई । पिछले साल सरकारी अभियान के तहत  तमाम बंधुआ मजदूरों को रिहा कराया गया। सीता को भी आजादी मिली ।

 

सीता बताती है – रिहाई के बाद सरकार ने जो वादा किया वह हमें बेहतर जिंदगी जीने का मौका देगा । लेकिन वह पूरा नहीं किया गया । मुआवजे में हमें ऐसी जमीन दी गई जो अक्सर में डूब जाती है   । बाढ़ में हमारा घर और खेत सब डूब गए और एक बार फिर हम बर्बाद हो गए ।

शादी और बच्चे 

इसी बिच सीता की शादी हुई और उनकी दो बच्चियां भी हुई । सीता ने तय किया कि वह अपनी बेटियों को जरूर पढ़ाएंगी । मगर इसके लिए उन्हें अपने पांव पर खड़ा होना जरूरी था । अनपढ़ होने की वजह से सीता को नौकरी मिलना मुश्किल था और वह घरेलू कामगार नहीं बनना चाहती थी ।

 

सीता बताती है –मैं अकेली महिला नहीं थी जिसे नौकरी की तलाश थी  जो बंधुआ  मजदूरी से आज़ाद होने के लिए भटक रही थी । हम काम करना चाहते थे पर बंधुआ मजदूर बनकर नहीं इसलिए हमने सोचा कि हम व्यवस्था के खिलाफ लड़ेंगे ।

प्रशासन के खिलाफ खोला मोर्चा 

सीता ने अपने इलाके के महिलाओं को एकजुट किया और उन्हें बताया कि सरकारी योजना के नाम पर उनके साथ किस तरह का मजाक किया गया है । प्रशासन पर दबाव बनाया गया कि सभी बंधुआ मजदूरों को सही इलाके में जमीन दे ताकि  वे  खेती कर सकें ।प्रशासन से जीतना इतना आसान नहीं था । लेकिन सीता अपने इलाके के महिलाओं में उम्मीद जगाने में कामयाब रही और इस साल जब निकाय चुनाव की घोषणा हुई तो उन्होंने तय किया कि वह चुनाव लड़ेंगी । 

चुनाव में जीत हासिल की 

 सीता बताती हैं -मैं कभी स्कूल नहीं गई और मुझे पढ़ना लिखना भी नहीं आता।  लेकिन जिंदगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया।  करीब 20 साल तक मैं शहर के तमाम छोटे बड़े घरों में काम किया । घर का माहौल देखा मैं लोगों के दर्द को समझती हूं । मैं जानती हूं लोगो के लिए क्या करना है । सीता को चुनाव में भरपूर समर्थन मिला और उन्होंने शानदार जीत हासिल की ।

दिलवाउंगी उनका हक़ 

सीता बताती है कि अब मैं जनप्रतिनिधि हु ।  प्रशासन को मेरी बात सुननी पड़ेगी । सबसे पहले मैं महिलाओं को  जमीन दिलवाउंगी । गांव में स्कूल खुलवाउंगी  । ताकि हमारे बच्चे अनपढ़ ना रह  सके और उन्हें किसी भी तरह की मजदूरी नहीं करनी पड़े। 

भारत की मानुषी छिल्लर ने जीता मिस वर्ल्ड 2017 का खिताब

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 मानुषी छिल्लर मिस वर्ल्ड खिताब जीतने वाली बनी छठी भारतीय महिला 

भारत की सुंदरियों ने एक बार फिर अपनी सुन्दरता का परचम पुरे विश्व मव लहरा दिया है । चीन के सनाया में आयोजित मिस वर्ल्डप्रतियोगिता में भारत की मिस इंडिया मानुषी छिल्लर ने  मिस वर्ल्ड 2017 का ख़िताब अपने नाम किया है | दुनियाभर की 118 सुंदरियों को हराकर हरियाणा के सोनीपत के शहर की रहने वाली मानुषी ने यह खिताब अपने नाम किया है । इस प्रतियोगिता में दूसरे नंबर पर मिस मेक्सिको रहीं जबकि तीसरे नंबर पर मिस इंग्लैंड रहीं है।
जूरी का दिल जीता 
मिस इंडिया मानुषी छिल्लर से फाइनल राउंड में जूरी ने सवाल पूछा था कि किस प्रफेशन में सबसे ज्यादा सैलरी मिलनी चाहिए और क्यों?
इसके जवाब में मानुषी ने कहा, ‘मां को सबसे ज्यादा सम्मान मिलना चाहिए। इसके लिए उन्हें कैश में सैलरी नहीं बल्कि सम्मान और प्यार मिलना चाहिए।’
स्केचिंग और पेंटिंग का भी शौख
20 साल की मानुषी छिल्लर 67वीं मिस वर्ल्ड हैं। मानुषी ने दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल से पढ़ाई की है और वह फिलहाल सोनीपत के भगत फूल सिंह गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज फॉर विमिन से मेडिकल की पढ़ाई कर रही हैं। उन्होंने नेशनल स्कूल अॉफ ड्रामा में भी भाग लिया है।  मानुषी को पैराग्लाइडिंग, बंजी जंपिंग और स्कूबा डाइविंग जैसे स्पोर्ट्स पसंद हैं। इसके अलावा मानुषी एक प्रशिक्षित कुचिपुड़ी डांसर भी हैं और स्केचिंग और पेंटिंग भी बनाती हैं।
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मिस वर्ल्ड बनना बचपन का था सपना
मानुषी ने  एक इंटरव्यू में बताया –
‘बचपन में, मैं हमेशा से इस कॉम्पिटिशन में हिस्सा लेना चाहती थी और मुझे यह कभी नहीं पता था कि मैं यहां तक पहुंच जाऊंगी। अब मिस वर्ल्ड का खिताब जीतना केवल मेरा ही नहीं बल्कि मेरी फैमिली और दोस्तों का भी सपना बन गया था।
मिस वर्ल्ड में जाने से पहले मानुषी समाजसेवा के कार्यों से भी जुड़ी रही हैं। उन्होंने महिलाओं की माहवारी के दौरान हाइजीन से संबंधित एक कैंपेन में करीब 5000 महिलाओं को जागरूक किया है।
मिस वर्ल्ड का ख़िताब जितने वाली छठी भारतीय 
 1966 तक कोई भी एशियन महिला ने मिस वर्ल्ड का खिताब नहीं जीता था। 1966 मेडिकल फाइनल इयर की स्टूडेंट रीता फारिया भारत से पहली मिस वर्ल्ड बनीं थीं। उसके बाद ऐश्वर्या राय ने 1994, डायना हेडन ने 1997 में, युक्ता मुखी ने 1999 में और प्रियंका चोपड़ा ने साल 2000 में मिस वर्ल्ड का खिताब जीता था।

गूगल ने अपने प्ले-स्टोर से हटाया यूसी ब्राउजर,जानिए वजह

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 यूसी ब्राउज़र पर यूजर्स को भ्रमित करने का आरोप

यूसी ब्राउज़र मोबाइल की दुनिया का सबसे पॉपुलर ब्राउज़र है | यूसी ब्राउज़र को 50 करोंड़ से भी ज्यादा यूजर इस्तेमाल करते है | अकेले भारत में ही इस ब्राउज़र के 10 करोंड़ यूजर है | यह चीन की कंपनी अलीबाबा ग्रुप का सबसे पॉपुलर प्रोडक्ट है |

गूगल ने अपने प्ले-स्टोर से  यूसी ब्राउजर को हमेशा के लिए नहीं बल्कि 7  दिनों के लिए हटाया है| जिसकी शुरुआत 13 नवंबर से हो चुकी है। दरअसल, गूगल के पॉलिसी के हिसाब से इस ब्राउजर की सेटिंग्स फिट नहीं हैं जिसकी वजह से इसे हटाया गया है। यूसी पर गूगल ने यूजर्स को भ्रमित करने का आरोप लगाया है |

रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है की यूसी ब्रोसेर  दुसरे  ऐप के  यूजर्स को रिडायरेक्ट करके उन्हें भ्रमित कर रहा था. रिडायरेक्शन के कारण कई बार यूजर्स के फोन में थर्ड पार्टी ऐप भी इंस्टॉल हो जाते हैं व ऐसे में यूजर्स के फोन में मैलवेयर के आने का खतरा रहता था.

इससे पहले यह भी रिपोर्ट सामने आई थी कि यूसी ब्राउजर इंडिया के यूजर्स की जानकारियों को चाइना की गवर्नमेंट के साथ शेयर करता है | वहीं आईटी मंत्रालय के एक वरिष्ठ ऑफिसर ने बताया था कि इस मामले में दोषी पाए जाने पर यूसी ब्राउजर को प्रतिबंधित किया जा सकता है |

फिलहाल प्ले स्टोर पर इस ब्रोसेर का   मिनी वर्जन उपलब्ध है। जब तक यूसी ब्राउजर गूगल प्ले स्टोर पर वापस नहीं आ जाता, तब तक यूजर्स चाहे तो यूसी ब्राउजर मिनी ब्राउज़र यूज कर सकते हैं, जो यूसी का ही एक दूसरा विकल्प है।

फिलहाल यूसी ब्राउजर के नए वर्जन को गूगल प्ले स्टोर के डिवेलपर कंसोल पर अपलोड कर दिया गया है और इसका मूल्यांकन किया जा रहा है।

वैसे गूगल ब्राउज़र के बहुत सारे विकल्प मौजूद है जिसमे अभी सबसे popular भारत का mcent Browser है क्युकी यह न सिर्फ ब्राउज़िंग करता है बल्कि आपको पैसे भी देता है | आप ब्राउज़िंग के दौरान इसके जितने भी विज्ञापन देखते है उसका 20 % इनकम यूजर को देता है | इस एप्प को Download करने के लिए निचे क्लिक करे

Mcent Browser Download

 

जीतू राय का जीवन परिचय | Jitu Rai Shooter Biography In Hindi

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जीतू राय का जीवन परिचय | Jitu Rai Shooter Biography In Hindi

एक चरवाहे से भारत के सफलतम निशानेबाज तक का सफ़र 

दोस्तों आज हम बता रहे है  एक ऐसे शख्स के बारे में जिसका जन्म तो नेपाल में हुआ था लेकिन वो खुद को भारतीय मानता है | जो नेपाल के एक गाँव में बकरी चराने और अपनी माँ के साथ खेती का काम करते थे | लेकिन आज भारत के सफलतम निशानेबाज है | जी हम बात कर रहे है विश्वकप निशानेबाजी में स्वर्ण पदक दिलाने वाले खेल रत्न जीतू राय के बारे में | पढ़िए जीतू राय की बायोग्राफी ……………

जन्म 

जीतू राय का जन्म 26 अगस्त सन 1987 को नेपाल के संखुवासभा जिले  के एक छोटे से गांव  में हुआ था | जीतू का बचपन जंगलों और खेतों में बकरी चराते हुए बीता। परिवार का गुजर बसर खेती  से होता था | कुछ समय बाद जीतू के पिताजी को भारतीय सेना के गोरखा राइफल्स रेजिमेंट में नौकरी मिल गई और वह भारत आ गए | पर परिवार नेपाल में ही रहा।  5 भाई बहनों में जीतू चौथे नंबर पर आते थे  | इन पांच बच्चो की परवरिश की जिम्मेदारी अब की माँ पर थी |

खेतो में करते थे माँ की मदद 

उनकी माँ पढ़ी लिखी नहीं थी पर उनमे गजब का हौसला था | सुबह जल्दी उठती और खाना पकाकर बच्चो को स्कूल भेज देती | फिर खेतो में बुआई ,सिंचाई ,कटाई के कामो में लग जाती | हालाँकि स्कूल गाँव से बहुत दूर थे और पैदल आने जाने में गाँव के बच्चो को थकान हो जाती थी | फिर भी जीतू स्कूल से लौटने के बाद खेतो में माँ की मदद करते थे |

जीतू बताते है –

हम आलू और धान उगाते थे। वहां की जमीन इस फसल के लिए अच्छी थी। खेती में कड़ी मेहनत थी। बारिश हो या कड़ी धूप, मां खेतों में जुटी रहतीं। वह कभी नहीं थकतीं, क्योंकि वह जानती थीं कि उसी फसल से उनके बच्चों का पेट भरेगा। उन्होंने हम भाई-बहनों को हमेशा अनुशासन में जीना सिखाया।  

पढने का नहीं मिल पता था समय 

गाँव और स्कूल के बिच लम्बी दुरी और जंगली रास्ता होने के कारण जीतू को पढने के लिए बहुत कम समय मिला पता था |जीतू बताते है – मुझे बचपन में पढ़ने का समय नहीं मिलता था। किसी तरह दौड़ते-भागते स्कूल पहुंचता, वापस आता, तो मां कहतीं कि बकरी चराने जाओ। हम बासी भात खाकर गुजारा करते थे। वैसे यह कोई अजीब बात नहीं थी, बाकी गांव वाले भी ऐसी ही जिंदगी जीने को मजबूर थे।

पिता की मौत से परेशां हो गया परिवार 

पापा को देखकर जीतू के मन में भी सेना में भारती होने की लालसा जगी | लेकिन उसने यह बात घरवालो  को नहीं बतायी  | तभी अचानक 2016 में दुखद खबर आई की जीतू के पापा नहीं रहे | परिवार में कोहराम मच गया | तब जीतू  की उम्र 19 साल  की थी | जीतू ने तय किया की वो भी भारत जायेंगे और अपने पापा की तरह फ़ौज में भारती होंगे |यह बात सुनकर उनकी माँ परेशान हो उठी | वह अपने पति को गँवा चुकी थी और अब वो अपना बेटा  नहीं खोना चाहती थी | लेकिन जीतू माँ को समझाने में सफल रहे क्युकी परिवार की बेहतरी के लिए जीतू को सेना में जाना जरुरी था |

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जीतू बताते है –

पापा के निधन के बाद मैंने तय किया कि उनकी तरह मैं भी गोरखा रेजिमेंट में सेवा करूंगा। पर मन में आशंका भी थी कि पता नहीं, चयन होगा या नहीं। पहली ही कोशिश में चयन हो गया। मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात थी।

पढाई दोबारा की शुरू 

सेना में आने के बाद जीतू ने अपने फिटनेस पर ध्यान देना शुरू किया | जीतू ने दोबारा पढाई शुरू की और देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAVV) इंदौर मध्यप्रदेश से स्नातक की  परीक्षा पास की |  गोरखा रेजिमेंट में बतौर सिपाही भर्ती हुए और अपनी योग्यता के बूते जीतू नायब सूबेदार बन गए।

एशियाई गेम्स में जीता सवर्ण पदक 

जीतू ने वर्ष 2010 में पहली बार सेना की निशानेबाजी टीम में जगह बनायीं पर प्रदर्शन अच्छा नहीं होने के चलते उन्हें वापस यूनिट भेज दिया गया | लेकिन जीतू कहा हिम्मत हरने वाले थे ? उन्होंने जबरदस्त तैयारी की और उन्हें दोबारा 2011 में टीम की तरफ से खेलने का मौका मिला। हालाँकि   2011 के राष्ट्रीय खेलों में जीतू को उत्तर प्रदेश की तरफ से खेलने का भी मौका मिला  पर उन्हें असली सफलता  2014 के एशियाई खेलों में मिली | जीतू ने 50 मीटर मेंस पिस्टल  में देश को गोल्ड मेडल दिलाया। दक्षिण कोरिया के इन्चेओन (Incheon) में हुए “एशियाई गेम्स” में जीतू ने 50m पिस्टल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता | उन्होंने आदमियों की 10m एयर पिस्टल टीम स्पर्धा में कांस्य पदक भी जीता |

वर्ल्ड कप में 2 पदक जितने वाले पहले भारतीय बने 

2014 में म्युनिक (Munich) में हुए “ISSF वर्ल्ड कप” में इन्होंने 10m एयर पिस्टल स्पर्धा में रजत पदक जीता. इसके बाद मनिबोर में जीतू ने 50m पिस्टल स्पर्धा में रजत और 10m पिस्टल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीते |  इस तरह वर्ल्ड कप के 9 दिनों में इन्होंने 3 पदक जीते और भारत के लिए एक वर्ल्ड कप में 2 पदक जीतने वाले ये पहले खिलाड़ी बने |

माँ को नहीं था पता 

अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट के दौरान लंबा समय विदेश में गुजरने लगा और जीतू के जीत का सिलसिला चल पड़ा | इधर बेटा निशानेबाजी में व्यस्त था, उधर मां गांव में खेती-किसानी में।   गांव में रह रही मां को पता ही नहीं चला कि बेटा इतना मशहूर निशानेबाज बन गया है।  2015 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड देने की घोषणा हुई। जीतू मां को लेकर दिल्ली आए। मां ने पहली बार ऐसा भव्य समारोह देखा। जब बेटा राष्ट्रपति के हाथों अवॉर्ड लेने मंच पर पहुंचा, तो पूरा हॉल तालियों से गूंज गया। यह नजारा देखकर मां को बिश्वास ही नहीं हो रहा था की उनका बेटा  इतना तरक्की कर गया है |

जीतू कहते हैं-

मां आज भी गांव में रहती हैं। उन्हें बस इतना पता था कि मैं सेना में हूं। यह नहीं मालूम था कि मैं निशानेबाज हूं। गांव में टीवी न था। अखबार वह पढ़ नहीं सकतीं। मैंने सोचा था कि खूब नाम कमा लूंगा, तब मां को बताऊंगा। 

खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित 

सन 2016 के रियो ओलंपिक में जीतू राय ने 10m एयर पिस्तौल स्पर्धा में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया | वे फाइनल तक भी पहुंचे, किन्तु फाइनल में उनका प्रदर्शन ज्यादा अच्छा नही रहा और वे 8वें स्थान में पहुंच कर, बिना किसी पदक के वापस लौट गए | हाल में जीतू ने साथी निशानेबाज हिना सिन्धु  के साथ खेलते हुए आईएसएसएफ विश्व कप की दस मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में रूस को हराकर गोल्ड मेडल जीता।

जीतू कहते हैं-

मैं नेपाल में पैदा हुआ, पर अब भारत मेरा असली घर है। यहां मुझे निशानेबाजी सीखने का मौका मिला। यहां मैंने भरपूर प्यार और सम्मान कमाया। उन सभी लोगों का शुक्रिया, जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया, मेरी मदद की।

 

उसे मेरे तेज़ाब से झुलसे चेहरे से प्यार हो गया-Saroj Kumar Sahoo and Pramodini Roul Love Story

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दोस्तों आज हम बताने जा रहे है एक ऐसी लड़की के बारे में जिसे अनजान  शख्स के प्यार का इनकार के बदले तेजाब जैसी असहनीय दर्द को झेलना पड़ा | इस एसिड अटैक ने उसकी आँखों की रोशनी छीन ली ,नौ महीने आई सी यू ,और चार सालो तक बीएड पर रही | फिर भी इस बदसूरत चहरे पर एक शख्स को प्यार आया और उसने न सिर्फ उसकी सेवा की बल्कि उसे चलना फिरना सिखाया और उसकी आँखों की रौशनी भी वापस लायी | तो पढ़िए रानी और सरोज की यह सच्ची और प्रेरणादायक कहानी ……………

Saroj Kumar Sahoo and Pramodini Roul Love Story

रानी की शोख़ी और खिलखिलाहट से आस-पास का माहौल गूंज उठता था 

ये कहानी है ओडिशा के जगतसिंहपुर की रानी का जिसका असली नाम प्रमोदिनी राउल है | उसे डांस करने का बेहद शौक था | 14-15 साल की रानी किसी आम किशोरी की तरह अपने सपनों की दुनिया में जी रही थी की अचानक एक घटना ने उनके जीवन को बर्बाद करके रख दिया | उनको एक अनजान शख्स ने प्यार का इजहार किया जिसे रनि९ ने इंकार कर दिया | उसके बाद उस शख्स ने रानी को परेशान करना शुरू किया | वो रानी के घर भी फोन करके परेशान करने लगा | रानी ने उस पर उतना ध्यान नहीं दिया उन्हें लगा की वो हारकर तंग करना बंद कर देगा |लेकिन ऐसा नहीं हुआ |

जिसे कभी भी सोचा नहीं था 

और एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसे याद  करके रानी आज भी सिहर उठती है | एक दिन रानी और उसका कजन भाई सायकिल पर बैठकर स्कूल से वापस आ रहे थे तभी पीछे से आकर उनपर तेजाब फेंक दिया गया |

रानी बताती है –

पहले तो मुझे लगा की मुझ पर उबलता पानी फेंका गया है | मै जमीन पर गिर गयी ,तेजाब टपककर घास पर गिर रहा था और मैंने देखा की घास भी झुलसती जा रही है | मुझे भयंकर जलन हो रही थी और मेरे बालो से धुआं भी निकल रहा था |

रानी को हॉस्पिटल ले जाया गया जहाँ वो नौ महीने तक आई सी यू में रही | उस दौरान रानी ने जो तकलीफे सही उसे याद कर  रानी आज भी कांप उठती है |

Saroj Kumar Sahoo and Pramodini Roul Love Story

 

रानी बताती है –

”मुझे एक बड़े से बाथटब में बैठाया जाता था जो डेटॉल जैसी तीख़ी महक वाली तरल दवाइयों से भरा होता था. उसमें मेरी ड्रेसिंग होती थी यानी मेरी स्किन उधेड़ी जाती थी. मैं दर्द से बदहवास सी हो जाती थी|चार-पांच नर्सें मुझे पकड़कर रखती थीं और डॉक्टर मुझसे माफ़ी मांगते हुए ड्रेसिंग करते थे. वे कहते थे अगर अभी मैंने ये दर्द न झेला तो जी नहीं पाऊंगी ”

आँखों की रौशनी भी चली गयी 

रानी का वजन 60 किलो से घटकर 28 किलो हो गया | उनकी आँखों की रौशनी भी चली गयी और वो सही से चल भी नहीं पा रही थी | नौ महीने बाद पैसे की कमी और दूसरी परेशानियों की वजह से रानी को घर वापस आना पड़ा | चार साल तक बिस्टर पर पड़े रहने के कारन रानी के घाव सड गए और उससे पास आने लगा | जब घर में रहना मुश्किल हो गया तो फिर वापस रानी को अस्पताल में भर्ती कराया गया | यहाँ उनकी दोस्ती कुछ नर्सो से हो गयी |

रानी के लिए छोड़ी नौकरी 

लेकिन कहते है न की गम के बादल कभी न कभी छंटते जरुर है | रानी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ |एक दिन हॉस्पिटल की  नर्स रानी से मिलवाने एक शख्स को ले आई जिसका नाम था -सरोज साहू | सरोज को रानी से कुछ ऐसी हमदर्दी हुई कि उन्होंने दो महीने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी और रात-दिन उनकी देखभाल करने लगे |

रानी बताती हैं

”सरोज ने डॉक्टर से पूछा था कि मैं चलना कब शुरू करूंगी. डॉक्टरों का कहना था कि मैं एक साल से पहले संभव नहीं है | लेकिन सरोज ने खुद को चुनौती दी और कहा कि वो रानी को चार महीने में चलाकर दिखाएंगे. उनकी मेहनत रंग ला रही थी और दोस्ती भी |

सरोज ने कर दिखाया 

चार महीने के अन्दर रानी बिना किसी सहारा के चलने फिरने लगी | सरोज ने रानी से अपने दिल की बात बताई नहीं थी पर अपने परिवार में बता दिया था जिसकी वजह से सरोज के परिवार में तनाव का माहौल था | रानी यह सब जानकर दुखी हुयी और फैसला किया की ठीक हिने के बाद ओडिशा छोड़ दूंगी |

रानी बताती है –

”जब मैं ओडिशा छोड़कर आ रही थी तब सरोज खूब रोए थे और मैं भी. हालांकि तब भी इन्होंने नहीं कहा कि ये मुझसे प्यार करते हैं.”

‘स्टॉप एसिड अटैक’  संस्था ने किया  रानी से संपर्क

खुस्किस्मती से इस बीच ‘स्टॉप एसिड अटैक’ नाम की संस्था ने रानी से संपर्क किया | 2016 के अंत तक रानी आगरा आ चुकी थीं और शीरोज़ कैफ़े में काम कर रही थीं | आखिर 14 जनवरी को सरोज ने रानी को फ़ोन किया और अपने दिल की सारी  बात बता दी |

रानी बताती हैं-

”उनकी बात सुनकर मैं रो पड़ी. मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था कि कोई मुझसे प्यार कैसे कर सकता है. उन्हें मेरे तेज़ाब से झुलसे चेहरे से प्यार हो गया था | मैंने कहा था कि अगर मैं दोबारा देखने लगी तभी उनसे शादी करूंगी वरना नहीं. मैं नहीं जानती थी कि आगे क्या होगा लेकिन सरोज को भरोसा था कि मैं फिर देख सकूंगी”

आंख का हुआ सफल ऑपरेशन

जुलाई 2017 में रानी के आँखों का ऑपरेशन चेन्नई के एक अस्पताल में हुआ | ऑपरेशन सफल रहा और जहां रानी को कुछ धुंधली आकृतियां दिखाई देने लगी |उन्होंने बताया,”ऑपरेशन के बाद मैं पूरी तरह ख़ुश नहीं थी. मैंने सोचा था कि सबकुछ साफ दिखने लगेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. डॉक्टरों ने धीरे-धीरे सुधार होने का भरोसा दिलाया था लेकिन मुझे ज़्यादा उम्मीद नहीं थी.”

सब दिखने लगा साफ साफ 

ऑपरेशन के बाद वापस आगरा जाने के लिए रानी और सरोज प्लेन में बैठे | फ़्लाइट ने अभी टेकऑफ़ नहीं किया था की  अचानक रानी को रंग  दिखाई देने लगे और नज़र भी धीरे-धीरे साफ होने लगी |

Saroj Kumar Sahoo and Pramodini Roul Love Story

रानी  चहकते हुए बताती हैं-

”मैं उत्साह में भरकर सरोज की तरफ़ घूमी, जो मेरे बगल में ही बैठे थे. मैंने देखा कि वो पहले ही मुझे देख रहे थे. मैं ख़ुशी से चिल्लाई और उनके गले लग गई | एकदम फ़िल्मों जैसा सीन था. लोग आकर हमसे गले मिल रहे थे और बधाई दे रहे थे…”

नए साल में करेंगे सगाई 

फ़िलहाल रानी नोएडा में शीरोज़ के पुनर्वास केंद्र का काम संभाल रही हैं और सरोज ओडिशा में काम रहे हैं |अब उनके माता-पिता रानी को बहू बनाने के लिए तैयार हैं क्यूंकि अब उन्हें पता चल गया है की सरोज रानी के अलावा किसी और से शादी नहीं करेगा | सरोज और रानी दोनों नए साल में सगाई करने की सोच रहे हैं.

सरोज कहते हैं-

”मुझे रानी की आवाज़ बहुत पसंद है. वो किसी बच्ची जैसी मासूम है. मैं नहीं जानता कि मैं उससे इतना प्यार क्यों करता हूं.”

 

Note- Source & Image-BbcHindi

गूगल डूडल में आज जाने कौन थीं? अनसूया साराभाई

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 Google celebrates women’s labour movement leader Anasuya Sarabhai’s 132nd birthday with a doodle

दोस्तों आज हम बताने जा रहे है एक ऐसी प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता के बारे में जिसने मजदूरो की हक़ की लड़ाई के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया । उधोगपति परिवार से होते हुए भी जिसने  मजदूरो का संगठन बनाया । जिसकी यद् में आज यानि 11 नवम्बर को गूगल ने भी उनका डूडल बनाकर श्रद्धांजलि दी । जी हम बात कर रहे है अहमदाबाद की सामाजिक कार्यकर्ता अनसूया साराभाई के बारे में जिन्हें लोग प्यार से मोटाबेन कहकर बुलाते थे जिसका गुजराती में मतलब ‘बड़ी बहन’ होता है।

शुरुआती जीवन और शिक्षा 

अनसूया साराभाई का जन्म 11 नवंबर, 1885 को अहमदाबाद में साराभाई परिवार में हुआ। उनकी माता का नाम गोदावरीबा और उनके पिता का नाम  साराभाई  था जो उद्योगपति थे । नौ साल की उम्र में ही उनके माता पिता का निधन हो गया जिसके फलस्वरूप उनको अपने भाई अम्बालाल साराभाई के पास जाना पड़ा और छोटी बहन को एक चाचा के पास भेजना पड़ा । 13 साल की उम्र में ही उनका बाल  विवाह कर दिया गया जो असफल रहा । अपने भाई की मदद से 1912 इस्वी में अनुसूया  मेडिकल की डिग्री लेने के लिए इंग्लैंड चली गईं लेकिन बाद में लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में चली गईं।

राजनीतिक सफ़र 

भारत वापस आने के उन्होंने देखा की मजदूरो की हालत बेहद ख़राब है । 36 घंटे की शिफ्ट भी तक उनसे कम लिया जा रहा है जिसके कारन वो थककर कर हो जाते है । इसके बाद उन्होंने  महिलाओ और समाज के गरीब वर्ग की भलाई के लिए आवाज उठाने का फैसला  किया

 मजदूरों  की मांगो का किया समर्थन 

अनसूया ने 1914 में अहमदाबाद में हड़ताल के दौरान टेक्स्टाइल मजदूरों को संगठित करने में मदद की। वह  1918 में महीने भर चले हड़ताल में भी शामिल थीं। बुनकर अपनी मजदूरी में 50 फीसदी की बढ़ोतरी की मांग कर रहे थे जबकि मिल मालिक 20 फीसदी ही बढ़ोतरी के पक्ष में थे । जिससे असंतुष्ट होकर बुनकरों ने हड़ताल करनी शुरू कर दी । इस हड़ताल को गांधीजी और साराभाई का भी समर्थन मिला । अंततः मजदूरो को 35 फीसदी बढ़ोतरी मिली ।

मजदुर महाजन संघ की स्थापना 

इसके बाद अनुसूया साराभाई  ने 1920  में मजदुर महाजन संघ की (Ahmedabad Textile Labour Association) स्थापना की जो भारत के टेक्स्टाइल मजदूरों का सबसे बड़ा पुराना यूनियन है। मिल मालिक की बेटी होते हुए भी अनसूया ने मजदूरो के हक़ की लडाई लड़ी और हमेशा मजदूरो के साथ खडी रही । इन्होने अन्य मिल मालिकों के साथ अपने  भाई तक  का विरोध किया जो  एक  मिल  मालिक थे।

लोग प्यार से कहते थे मोटाबेन

अनसूया को लोग प्यार से मोटाबेन कहकर बुलाते थे जिसका गुजराती में मतलब ‘बड़ी बहन’ होता है। अनसूया का निधन 1972 में हुआ।

45 साल का हुआ रोहतास -जानिए रोहतासगढ़ किले का इतिहास

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 45 साल का रोहतास खुले में शौच से मुक्त बना 

रोहतास बस एक जिले का नाम  नहीं बल्कि खुद अपने आप में एक इतिहास  है, जो बिहार में आर्यो के प्रसार के साथ पड़ा। सूर्यवंशी राजा हरिशचन्द्र के पुत्र रोहिताश्व द्वारा स्थापित ‘रोहतास गढ़’ के नाम पर इस क्षेत्र का नाम रोहतास पड़ा। मुगल बादशाह अकबर के शासन काल 1582 में ‘रोहतास सरकार’ थी, जिसमें सात परगना शामिल थे। 1784 ई. में तीन परगना को मिलाकर रोहतास जिला बना। इसके बाद यह शाहाबाद का अंग बना और 10 नवम्बर 1972 से रोहतास जिला कायम है। आज रोहतास जिला के  45 वर्ष पुरे  हो गये  है और यह  46 वें वर्ष में प्रवेश कर गया है | इस वर्ष  रोहतास एक और नया इतिहास रचने वाला है। क्योंकि बहुत जल्द ही रोहतास पूरे सूबे में खुले में शौच से मुक्त जिला बनने का गौरव हासिल करने वाला है। 10 नवम्बर को इसकी अधिकारिक घोषणा होगी जिसके गवाह मुख्यमंत्री, मंत्री, जन प्रतिनिधि व केंद्र तथा राज्य सरकार के कई आला अधिकारी बनने वाले हैं।
इस अवसर पर हम आपको बताने जा रहे है रोहतासगढ़ के किले का इतिहास जिसे बहुत कम लोग ही जानते है 

रोहतासगढ़ किले के कभी स्वामी थे उराँव 

सोन नदी के तट पर सीधी खडी कैमूर पर्वतमाला के रोहतास पहाड़ के ऊपर निर्मित था उराँव का किला रोहतासगढ़ | दुर्गम ,दुर्जेय और दुसाध्य रोहतास के इस किले के कभी स्वामी थे उरांव | सहसराम (वर्तमान सासाराम) के पठान हसन सुर के बेटे फरीद खान की महत्वकांक्षा थी दिल्ली का ताज हासिल करना | अफगान पिता और कायमखानी राजपूतानी माँ का पुत्र फरीद खान का विजयरथ चल पड़ा और अब उसे शेरखान के नाम से जाना जाने लगा | दिल्ली की और कुच करने से पहले शेरखान अपनी जड़ो को मजबूत करना चाहता था | दूरदर्शी शेरशाह  सूरी अपने घर के आसपास की भूमि पर कब्ज़ा जमाना चाहता था ताकि उसकी अनुपस्थिति में सहसराम से सटा कोई राजा या कबीला उसका लाभ न उठा सके |

रोहतासगढ़ पर गयी शेरशाह की नजर 

शेरशाह का ध्यान उरांवो के किले रोहतासगढ़ पर टिक गयी | जब पठानों ने रोहतासगढ़ पर चढ़ाई की तो उस समय उराँव सरहुल का त्यौहार मानाने में व्यस्त थे | वैसे तो उराँव के लड़ाके युवक पराक्रम या शौर्य में पठानों से कम नहीं ठहरते थे पर पूजा के बाद हँड़िया पिने और नाचने गाने के बाद किले के भीतर इधर उधर लुढके पड़े थे | हठी पठानों ने जब रोहतास दुर्ग को घेर लिया तो  उरांव स्त्रियाँ चौकन्नी हो गयी  | स्त्रियों ने सहस संजोया और तिन महिला दस्ते गठित किये |

उरांव की महिलाओ ने संभाला मोर्चा 

उरांव की स्त्रियों ने माथे पर पगड़ी बंधी और दुधमुहे बच्चे को चादर में लपेटकर शत्रुओ से लोहा लेने लगी |पठान पर्वत की दुर्गम चढ़ाई चढ़कर जब किले के मुख्य फाटक तक पहुंचे तो किले के ऊपर से तिरो की वर्षा होने लगी | अचंभित पठानों के पैर उखाड़ने लगे और उन्हें पीछे हटना पड़ा | उरांव स्त्रियों के प्रबल प्रतिरोध ने पठानों को किले की प्राचीरो के आसपास भी फटकने नहीं दिया | शेरशाह सूरी के पठानी सैनिक लज्जित और निराश हो गए | जिनकी आँखों में दिल्ली सल्तनत के सपने थे वे घर के पिछवाड़े में मुट्ठी भर वनवासी वीरांगनाओ के आगे नतमस्तक थे |अभेद्य रोहतासगढ़ पर पताका फहराने की लालसा सूखने लगी |

घर का भेदी लंका ढाहे

लेकिन कहते है न घर का भेदी लंका ढाहे | पठानों को नित्य दूध दही पहुचने वाली लुन्दारी ग्वालिन पर नजर पड़ी | लुन्दारी के पति को किलेदार बना देने का प्रलोभन देने पर लुन्दारी ने बता दिया की सारा मोर्चा स्त्रियों ने संभाल रखा है | पठान सैनिको ने  अपना खोया आत्मविश्वास पा लिया | दिल्ली विजय का सपना संजोये शेरशाह के लिए चूड़ी बिंदी धारण करने वाली महिलाओ से हार कर लौटना असंभव था |

भेद पाकर ही अन्दर घुस पाए पठान 

पठानों ने लुन्दारी से प्राप्त सूचनाओ के अनुसार सुरक्षित पगडंडियों का अनुसरण करते हुए रोहतासगढ़ किले पर आक्रमण किया |अचानक किले के पीछे, दाए ,बाये से एकदम निकट प्रकट हुयी पठानों की सशस्त्र टुकडियो को देखकर उरांव की सरदारन हताश हो गयी | अब किले की रक्षा करना उनके वश में नहीं रह गया | निश्चित पराजय उनके सामने मुह बाये खडी  थी | अब उनकी प्राथमिकता  थी उराँव के वंशजो की रक्षा करना | जुझारू स्त्रियों की एक टोली पहले की भांति पठानों पर तीर और पत्थर चला रही थी और शेष स्त्रियाँ अपने बच्चो को गुप्त रस्ते से लेकर किले से बाहर निकल रही थी |

रोहतासगढ़ पर हुआ शेरशाह का कब्ज़ा 

पठानों ने उरांवो का पीछा नहीं किया क्योंकि  उनका लक्ष्य रोहतासगढ़ पर कब्ज़ा करना था जो अब उनके पास था | बिना रक्तपात के मिली विजय के उल्लास में सैनिक किले के फाटक को ध्वस्त कर किले में प्रविष्ट हुए |पहाड़ के पांव तले मौन बह रहा सोन नदी इस जय पराजय का साक्षी था |

अपनी ही तोप  फटने के कारण  मरा शेरशाह 

शेरशाह सूरी दिल्ली के बादशाह हुमायूँ को पराजित कर दिल्ली के सिंहासन पर बैठ तो गया परन्तु कालिंजर के किले पर उसके भाग्य ने दगा दे दिया | अपनी ही तोप  फट पड़ी | शेरशाह सूरी की जीवनयात्रा थम गयी परन्तु उसकी राज्यलिप्सा ने उरांवो को बेघर कर डाला |

जनिशिकार पर्व 

रोहतासगढ़ किले की लड़ाई में सहीद तिन सरदरिन सिनगी देई ,कईली देई ,और चम्पू देई  की स्मृति में उरांव की स्त्रियों ने गोदने की तिन बिंदिया धारण करने की परम्परा डाली | रोहतासगढ़ की पराजय के प्रतिकार का पर्व मनाया जाने लगा | प्रतिक पर्व जनिशिकार | अब आखेट पर्व जनिशिकार |

ओरे छू गंगा ,पारे छू जमुना ,धीरे धीरे तुरका अवै रे

हाथा में तरवारे ,खांदा में बंदुका ,धीरे धीरे तुरका आंवे रे

गाछा केरा मैना लियो झोरा कान्दाय

नदी तीरे तीरे घोड़ा दाडय रे

45 सालो का हुआ रोहतास 


25 फरवरी 1702 को वजीर खां के पुत्र अब्दुल कादिर को रोहतास का किलेदार नियुक्त किया गया। उसी समय रोहतास का किला अवांछित तत्वों के काम आने लगा। 1764 ई. में मीर कासिम को बक्सर युद्ध में अंग्रेजों से पराजय के बाद यह क्षेत्र अंग्रेजों के हाथ आ गया। 1774 ई. में अंग्रेज कप्तान थामस गोडार्ड ने रोहतास गढ़ को अपने कब्जे में लिया और उसे तहस-नहस किया।  अकबर के समय से चली आ रही रोहतास सरकार में औरंगजेब ने कई परिवर्तन कर सातों परगना को पुनगर्ठित किया। शाहाबाद गजेटियर में पुन: 1784 में रोहतास जिला स्थापित होने का उल्लेख है। उसके अनुसार रोहतास, सासाराम व चैनपुर परगनों को मिलाकर जिला बनाया गया। 


वैदिक काल में भी है रोहतास का महत्त्व 

वैदिक काल में भी रोहतास का अपना विशिष्ट स्थान रहने का प्रमाण पुराणों में प्राप्त हुए हैं। ब्रह्मांड पुराण-4/29 में इस क्षेत्र को कारुष प्रदेश कहा गया है।- ‘काशीत: प्राग्दिग्भागे प्रत्यक शोणनदादपि। जाह्वी विन्ध्योर्मध्ये देश: कारुष: स्मृत:।।’ महाभारत काल में कारुष राजा था। महाजनपद युग से लेकर परावर्ती गुप्तकाल तक यह क्षेत्र मगध और काशी के बीच रहा। भगवान बुद्ध उसवेला यानी बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद रोहितवस्तु यानी रोहतास राज्य होते हुए ही ऋषिपत्तन अर्थात सारनाथ गए थे।

कई ऐतिहासिक धरोहर है रोहतास में 

यह क्षेत्र मौर्यकाल में भी प्रसिद्ध रहा है। तभी तो सम्राट अशोक ने सासाराम के निकट चंदतन शहीद पहाड़ी पर अपना लघु शिलालेख लिखवाया। सातवीं सदी में रोहतास गढ़ का राज्य थानेश्वर का राजा और हर्षवर्द्धन को मार डालने वाले गौड़ाधीप शशांक के हाथों में था। जिसके मुहर व सांचा उत्क्रीर्णन में प्राप्त हुए हैं। 12वीं सदी में भी यह राज्य ख्यारवालों यानी खरवालों (खरवारों) के हाथ में गया। इसी सदी के प्रतापी राजा प्रताप धवल देव के तुतला भवानी, ताराचंडी, रोहतास गढ़ की फुलवारी में स्थित शिलालेख इसके आज भी प्राचीनता की गाथा के मिसाल हैं।
Note – रोहतासगढ़ किले का तथ्य राकेश कुमार सिंह की लिखी पुस्तक “जो इतिहास में नहीं है” से ली गयी है

H C Verma Biography Hindi: जिसने इंडिया को समझाया ‘कॉन्सैप्ट्स ऑफ फिजिक्स’

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11 नवम्बर 2017 को  के मौलाना अबुल कलाम आजाद शिक्षा पुरस्कार से नवाजा जाएगा

दोस्तों आज हम एक ऐसे शख्स के बारे में बताने जा रहे है जिनकी वजह से न जाने कितने लोग इंजिनियर बने | बच्चे जब इंटर में पहुचते है तो उनके आँखों में कई सपने होते है और अगर उनका विषय विज्ञान होता है तो उनमे से बहुत सारे लोग इंजिनियर बनना चाहते है | लेकिन विज्ञानं की मोटी मोटी किताबो को देखकर उन्हें डर लगने लगता है | लेकिन इस शख्स के लिखे किताब ने न सिर्फ उनके सपनो को पंख दिए बल्कि इंजिनियर भी बनाया | यह आम आदमी जरुर था  लेकिन इनका हमारे दिलो में खास जगह है | जी हा हम बात कर रहे है  भौतिकी विषय के मशहूर विद्वान व शिक्षक प्रो. हरिश्चन्द्र वर्मा यानि H. C. VERMA की |

भौतिकी विषय के मशहूर विद्वान व शिक्षक प्रो. हरिश्चन्द्र वर्मा को 11 नवम्बर 2017 को  के मौलाना अबुल कलाम आजाद शिक्षा पुरस्कार से नवाजा जाएगा।  11 नवम्बर को शिक्षा दिवस समारोह में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उन्हें यह पुरस्कार देंगे। पुरस्कार के रूप में 2.50 लाख रुपए और प्रशस्ति पत्र दिये जाएंगे। ।

तो आईये जानते है उनके बारे में ………….

H C VERMA BIOGRAPHY HINDI | जीवन परिचय 

H. C. VERMA का जन्म 3 अप्रैल 1952 को बिहार राज्य के दरभंगा जिले में हुआ था |H. C. VERMA  बचपन में वे पढने में तेज नहीं थे | H C VERMA के पिताजी शिक्षक थे | प्रारम्भ में गणित और विज्ञान की शिक्षा उनके पिताजी ने ही दी  | स्कूल ले दिनों में इन्हे विज्ञान और गणित में ज्यादा रूचि नहीं थी |

IIT KANPUR में किया टॉप 

स्नातक करने के लिए H C VERMA का दाखिला पटना पटना साइंस कॉलेज में हुआ | यहाँ के फैकल्टी से प्रभावित होकर H C VERMA के मन में विज्ञान और गणित विषय में रूचि बढ़ी | उनकी रूचि ऐसी बढ़ी की हाई स्कूल की परीक्षा में संघर्ष करने वाले लड़के ने पटना विश्वविद्यालय के Bsc Physics (Hounrs) में तीसरा स्थान ला दिया | स्नातक कम्पलीट करने के बाद H C VERMA ने GATE की परीक्षा निकाली और IIT KANPUR  से  MSC के लिए दाखिला लिया |  IIT KANPUR में H C VERMA ने सभी लडको में टॉप किया और 10.0 में से 9.9 GPA हासिल किया | उसके बाद उन्होंने IIT KANPUR से ही डॉक्टरेट  की पढाई की और तीन वर्षो से भी कम समय में पीएचडी  की उपाधि प्राप्त की |

अमेरिका से आया प्रोफेसर बनने का न्योता

IIT KANPUR में इस असाधारण प्रतिभा प्रदर्शन के कारन इन्हे अमेरिका में प्रोफेसर बनकर पढ़ने का ऑफर भी आया लेकिन इन्होने उसको अस्वीकार कर दिया | इन्होने अपने जड़ को नहीं भुला और 1980 में पटना साइंस कलेज में प्रोफेसर के रूप में ज्वाइन किया |

बच्चों की समस्याओ को समझा 

सायंस कॉलेज में बच्चो को पढ़ते हुए इन्होने देखा की बच्चे भौतिक विज्ञान की पढाई का आनंद नहीं ले रहे है बलि पढ़ पढ़ कर उब रहे है | जितना एक्सपेरिमेंट H C VERMA  ने अपने पढाई के दिनों में फिजिक्स के किताबो (फिक्स्डमेंटल ऑफ़ फिजिक्स रेस्निक और हॉलिडे, जिन्होंने उन्हें एम.एस.सी. के दौरान पढ़ा था) के साथ किया था उतना एक्सपेरिमेंट तेज विद्यार्थी  भी नहीं कर रहे थे | इसका कारण भाषा और सांस्कृतिक अंतर था | ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग पुस्तक की भाषा में उलझ कर रह जाते थे और वे उसकी अवधारणा और निष्कर्ष तक पहुचने से पहले ही अपनी रूचि खो बैठते थे |

8 साल तक कठिन परिश्रम से लिखी पुस्तक

एन सभी समस्याओ को दूर करने के लिए H C VERMA ने एक किताब लिखने की सोची जो भाषा के इस कठिनाई को आसान कर सके | इसके लिए उन्होंने 8 साल तक कठिन परिश्रम किया और फल क्र रूप में लोगो के बिच आया  “Concepts of Physics” | यह पुस्तक भौतिक विज्ञानं की सुन्दरता की उजागर करने में सफल रही | इस पुस्तक की सफलता का कारण  था इसकी सरल भाषा ,दिचास्प संख्यात्मक उदाहरण और भारतीय संस्कृति के साथ सम्बन्ध | यह पुस्तक आईआईटी-जेईई (संयुक्त प्रवेश परीक्षा) की तैयारी के लगभग सभी छात्रों द्वारा उपयोग की जाती है। यह H C VERMA द्वारा  भारतीय छात्रों, विज्ञान और समाज को दिए गए एक महान उपहार था । आईआईटी कानपुर आने से पहले वह लगभग 15 वर्षों तक पटना विज्ञान महाविद्यालय में रहे।

38 सालो तक सिखया लोगो को फिजिक्स 

डॉ एच सी वर्मा 1994 में सहायक प्रोफेसर के रूप में आईआईटी कानपुर में शामिल हुए। यहां, उन्होंने कई पाठ्यक्रमों के छात्रो को पढाया  और  “क्वांटम फिजिक्स” नामक एक पुस्तक भी लिखा | डॉ एच सी वर्मा ने प्रयोगात्मक परमाणु भौतिकी में अनुसंधान भी किया। आईआईटी कानपुर में  नियमित कार्य के अलावा, उन्होंने शिक्षा और समाज के लाभ के लिए कई सामाजिक-शैक्षिक पहल भी  की। इनमें से कुछ पहलुओं में स्कूल फिजिक्स परियोजना, शिक्षा सोपान शामिल हैं। उन्होंने 30 जून 2017 को औपचारिक रिटायरमेंट की घोषणा की | वे 38 सालो से लोगो को फिजिक्स की बारीकियो को समझा रहे थे |

आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर हरीश चंद्र वर्मा का कहना था साइंटिस्ट दुनिया को समझते हैं, इंजीनियर नई दुनिया बनाते हैं | दुनिया जैसी है साइंटिस्ट उसे उसी तरह समझते हैं, लेकिन इंजीनियर्स ऐसी दुनिया बनाते हैं जो पहले कभी नहीं थी.

फिजिक्स की दुनिया के भगवान 

उनके बारे में लोग कहते है की  है प्रोफेसर फिजिक्स में इतना खोए रहते थे कि क्लास में लुंगी ही पहन कर पढ़ाने चले आते थे | उनकी हाथो  में कोई किताब नहीं , साधारण कपडे और चेहरे पर मोटे लेंस का चश्मा होता था |उनके बारे में लोग यहाँ तक कहते है की  2000 के दशक में दो ही भगवान माने जाते थे एक क्रिकेट की दुनिया में  सचिन तेंदुलकर और फिजिक्स की दुनिया में प्रोफेसर एचसी वर्मा |

बनाया 300 क्लास रूम एक्सपेरिमेंट

फिजिक्स की पढ़ाई आसान बनाने के लिए आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिक प्रो. एचसी वर्मा ने घरेलू, दैनिक जीवन में प्रयोग आने वाले 300 क्लास रूम एक्सपेरिमेंट बनाए हैं। इनकी मदद से फिजिक्स पढ़ना-लिखना-समझना आसान हो जाएगा। ये एक्सपेरिमेंट बेलन, चमटा, कल्छुल, गिलास सहित तमाम घरेलू सामान से बनाए गए हैं, जो मेकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, माडर्न साइंस के उदाहरण को सरल बनाने में कारगर साबित हुए हैं।

अबुल कलाम आजाद शिक्षा पुरस्कार से नवाजा जाएगा

भौतिकी विषय के मशहूर विद्वान व शिक्षक प्रो. हरिश्चन्द्र वर्मा को 11 नवम्बर 2017 को  के मौलाना अबुल कलाम आजाद शिक्षा पुरस्कार से नवाजा जाएगा।  11 नवम्बर को शिक्षा दिवस समारोह में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उन्हें यह पुरस्कार देंगे। पुरस्कार के रूप में 2.50 लाख रुपए और प्रशस्ति पत्र दिये जाएंगे। । प्रो. वर्मा दरभंगा जिले के मूल निवासी हैं और वर्तमान में कानपुर में रहते हैं। पटना साइंस कॉलेज में इन्होंने 1980 से 1994 तक विद्यार्थियों को भौतिकी की शिक्षा दी है। उसके बाद आईआईटी कानपुर में अध्यापन किया। प्रो. वर्मा बिहार सहित पूरे देश में भौतिकी के सिद्धांत एवं व्यवहार को सरलता से जानने एवं समझने के लिए शिक्षकों तथा बच्चों के बीच काम कर रहे हैं।