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Saturday, October 3, 2026
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गुनाहों  का  देवता (उपन्यास) – भाग 3

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गुनाहों  का  देवता – धर्मवीर भारती

  भाग 3

”वह घर आयी और बहुत बिगड़ी, बोली, ‘आप नाच रहे थे या टेनिस का मैच खेल रहे थे, मेरा हाथ था या टेनिस का रैकट?’ इस बात पर बर्टी भी बिगड़ गया, और उस दिन से जो इन लोगों में खटकी तो फिर कभी न बनी। धीरे-धीरे वह लड़की एक सार्जेंट को प्यार करने लगी। बर्टी को इतना सदमा हुआ कि वह बीमार पड़ गया। लेकिन बर्टी ने तलाक नहीं दिया, उस लड़की से कुछ कहा भी नहीं, और उस लड़की ने सार्जेंट से प्यार जारी रखा लेकिन बीमारी में बर्टी की बहुत सेवा की। बर्टी अच्छा हो गया। उसके बाद उसको एक बच्ची हुई और उसी में वह मर गयी। हालाँकि हम लोग सब जानते हैं कि वह बच्ची उस सार्जेंट की थी लेकिन बर्टी को यकीन नहीं होता कि वह सार्जेंट को प्यार करती थी। वह कहता है, ‘यह दूसरे को प्यार करती होती तो मेरी इतनी सेवा कैसे कर सकती थी भला!’ उस बच्ची का नाम बर्टी ने रोज रखा। और उसे लेकर दिनभर उन्हीं गुलाब के पेड़ों के बीच में बैठा करता था जैसे अपनी पत्नी को लेकर बैठता था। दो साल बाद बच्ची को साँप ने काट लिया, वह मर गयी और तब से बर्टी का दिमाग ठीक नहीं रहता। खैर, जाने दीजिए। आइए, अपना काम शुरू करें। चलिए, अन्दर के स्टडी-रूम में चलें!”

”चलिए!” चन्दर बोला। और पम्मी के पीछे-पीछे चल दिया। मकान बहुत बड़ा था और पुराने अँग्रेजों के ढंग पर सजा हुआ था। बाहर से जितना पुराना और गन्दा नजर आता था, अन्दर से उतना ही आलीशान और सुथरा। ईस्ट इंडिया कम्पनी के जमाने की छाप थी अन्दर। यहाँ तक कि बिजली लगने के बावजूद अन्दर पुराने बड़े-बड़े हाथ से खींचे जाने वाले पंखे लगे थे। दो कमरों को पार कर वे लोग स्टडी-रूम में पहुँचे। बड़ा-सा कमरा जिसमें चारों तरफ आलमारियों में किताबें सजी हुई थीं। चार कोने में चार मेजें लगी हुई थीं जिनमें कुछ बस्ट और कुछ तस्वीरें स्टैंड के सहारे रखी हुई थीं। एक आलमारी में नीचे खाने में टाइपराइटर रखा था। पम्मी ने बिजली जला दी और टाइपराइटर खोलकर साफ करने लगी। चन्दर घूमकर किताबें देखने लगा। एक कोने में कुछ मराठी की किताबें रखी थीं। उसे बड़ा ताज्जुब हुआ-”अच्छा पम्मी, ओह, माफ कीजिएगा, मिस डिक्रूज…”

”नहीं, आप मुझे पम्मी पुकार सकते हैं। मुझे यही नाम अच्छा लगता है-हाँ, क्या पूछ रहे थे आप?”

”क्या आप मराठी भी जानती हैं?”

”नहीं, मैं तो नहीं, मेरी नानीजी जानती थीं। क्या आपको डॉक्टर शुक्ला ने हमलोगों के बारे में कुछ नहीं बताया?”

”नहीं!” कपूर ने कहा।

”अच्छा! ताज्जुब है!” पम्मी बोली, ”आपने ट्रेनाली डिक्रूज का नाम सुना है न?”

”हाँ हाँ, डिक्रूज जिन्होंने कौशाम्बी की खुदाई करवायी थी। वह तो बहुत बड़े पुरातत्ववेत्ता थे?” कपूर ने कहा।

”हाँ, वही। वह मेरे सगे नाना थे। और वह अँग्रेज नहीं थे, मराठा थे और उन्होंने मेरी नानी से शादी की थी जो एक कश्मीरी ईसाई महिला थीं। उनके कारण भारत में उन्हें ईसाइयत अपनानी पड़ी। यह मेरे नाना का ही मकान है और अब हम लोगों को मिल गया है। डॉ. शुक्ला के दोस्त मिस्टर श्रीवास्तव बैरिस्टर हैं न, वे हमारे खानदान के ऐटर्नी थे। उन्होंने और डॉ. शुक्ला ने ही यह जायदाद हमें दिलवायी। लीजिए, मशीन तो ठीक हो गयी।” उसने टाइपराइटर में कार्बन और कागज लगाकर कहा, ”लाइए निबन्ध!”

इसके बाद घंटे-भर तक टाइपराइटर रुका नहीं। कपूर ने देखा कि यह लड़की जो व्यवहार में इतनी सरल और स्पष्ट है, फैशन में इतनी नाजुक और शौकीन है, काम करने में उतनी ही मेहनती और तेज भी है। उसकी अँगुलियाँ मशीन की तरह चल रही थीं। और तेज इतनी कि एक घंटे में उसने लगभग आधी पांडुलिपि टाइप कर डाली थी। ठीक एक घण्टे के बाद उसने टाइपराइटर बन्द कर दिया, बगल में बैठे हुए कपूर की ओर झुककर कहा, ”अब थोड़ी देर आराम।” और अपनी अँगुलियाँ चटखाने के बाद वह कुरसी खिसकाकर उठी और एक भरपूर अँगड़ाई ली। उसका अंग-अंग धनुष की तरह झुक गया। उसके बाद कपूर के कन्धे पर बेतकल्लुफी से हाथ रखकर बोली, ”क्यों, एक प्याला चाय मँगवायी जाय?”

”मैं तो पी चुका हूँ।”

”लेकिन मुझसे तो काम होने से रहा अब बिना चाय के।” पम्मी एक अल्हड़ बच्ची की तरह बोली, और अन्दर चली गयी। कपूर ने टाइप किये हुए कागज उठाये और कलम निकालकर उनकी गलतियाँ सुधारने लगा। चाय पीकर थोड़ी देर में पम्मी वापस आयी और बैठ गयी। उसने एक सिगरेट केस कपूर के सामने किया।

”धन्यवाद, मैं सिगरेट नहीं पीता।”

”अच्छा, ताज्जुब है, आपकी इजाजत हो तो मैं सिगरेट पी लूँ!”

”क्या आप सिगरेट पीती हैं? छिह, पता नहीं क्यों औरतों का सिगरेट पीना मुझे बहुत ही नासपन्द है।”

”मेरी तो मजबूरी है मिस्टर कपूर, मैं यहाँ के समाज में मिलती-जुलती नहीं, अपने विवाह और अपने तलाक के बाद मुझे ऐंग्लो-इंडियन समाज से नफरत हो गयी है। मैं अपने दिल से हिन्दुस्तानी हूँ। लेकिन हिन्दुस्तानियों से घुलना-मिलना हमारे लिए सम्भव नहीं। घर में अकेले रहती हूँ। सिगरेट और चाय से तबीयत बदल जाती है। किताबों का मुझे शौक नहीं।”

”तलाक के बाद आपने पढ़ाई जारी क्यों नहीं रखी?” कपूर ने पूछा।

”मैंने कहा न, कि किताबों का मुझे शौक नहीं बिल्कुल!” पम्मी बोली। ”और मैं अपने को आदमियों में घुलने-मिलने के लायक नहीं पाती। तलाक के बाद साल-भर तक मैं अपने घर में बन्द रही। मैं और बर्टी। सिर्फ बर्टी से बात करने का मौका मिला। बर्टी मेरा भाई, वह भी बीमार और बूढ़ा। कहीं कोई तकल्लुफ की गुंजाइश नहीं। अब मैं हरेक से बेतकल्लुफी से बात करती हूँ तो कुछ लोग मुझ पर हँसते हैं, कुछ लोग मुझे सभ्य समाज के लायक नहीं समझते, कुछ लोग उसका गलत मतलब निकालते हैं। इसलिए मैंने अपने को अपने बँगले में ही कैद कर लिया है। अब आप ही हैं, आज पहली बार मैंने देखा आपको। मैं समझी ही नहीं कि आपसे कितना दुराव रखना चाहिए। अगर आप भलेमानस न हों तो आप इसका गलत मतलब निकाल सकते हैं।”

”अगर यही बात हो तो…” कपूर हँसकर बोला, ”सम्भव है कि मैं भलेमानस बनने के बजाय गलत मतलब निकालना ज्यादा पसन्द करूँ।”

”तो सम्भव है मैं मजबूर होकर आपसे भी न मिलूँ!” पम्मी गम्भीरता से बोली।

”नहीं, मिस डिक्रूज…”

”नहीं, आप पम्मी कहिए, डिक्रूज नहीं!”

”पम्मी सही, आप गलत न समझें, मैं मजाक कर रहा था।” कपूर बोला। उसने इतनी देर में समझ लिया था कि यह साधारण ईसाई छोकरी नहीं है।

इतने में बर्टी लडख़ड़ाता हुआ, हाथ में धूल सना खुरपा लिये आया और चुपचाप खड़ा हो गया और अपनी धुँधली पीली आँखों से एकटक कपूर को देखने लगा। कपूर ने एक कुरसी खिसका दी और कहा, ”आइए!” पम्मी उठी और बर्टी के कन्धे पर एक हाथ रखकर उसे सहारा देकर कुरसी पर बिठा दिया। बर्टी बैठ गया और आँखें बन्द कर लीं। उसका बीमार कमजोर व्यक्तित्व जाने कैसा लगता था कि पम्मी और कपूर दोनों चुप हो गये। थोड़ी देर बाद बर्टी ने आँखें खोलीं और बहुत करुण स्वर में बोला, ”पम्मी, तुम नाराज हो, मैंने जान-बूझकर तुम्हारे मित्र का अपमान नहीं किया था?”

”अरे नहीं!” पम्मी ने उठकर बर्टी का माथा सहलाते हुए कहा, ”मैं तो भूल गयी और कपूर भी भूल गये?”

”अच्छा, धन्यवाद! पम्मी, अपना हाथ इधर लाओ!” और वह पम्मी के हाथ पर सिर रखकर पड़ रहा और बोला, ”मैं कितना अभागा हूँ! कितना अभागा! अच्छा पम्मी, कल रात को तुमने सुना था, वह आयी थी और पूछ रही थी, बर्टी तुम्हारी तबीयत अब ठीक है, मैंने झट अपनी आँखें ढँक लीं कि कहीं आँखों का पीलापन देख न ले। मैंने कहा, तबीयत अब ठीक है, मैं अच्छा हूँ तो उठी और जाने लगी। मैंने पूछा, कहाँ चली, तो बोली सार्जेंट के साथ ज़रा क्लब जा रही हूँ। तुमने सुना था पम्मी?”

कपूर स्तब्ध-सा उन दोनों की ओर देख रहा था। पम्मी ने कपूर को आँख का इशारा करते हुए कहा, ”हाँ, हमसे मिली थी वह, लेकिन बर्टी, वह सार्जेंट के साथ नहीं गयी थी!”

”हाँ, तब?” बर्टी की आँखें चमक उठीं और उसने उल्लास-भरे स्वर में पूछा।

”वह बोली, बर्टी के ये गुलाब सार्जेंट से ज्यादा प्यारे हैं।” पम्मी बोली।

”अच्छा!” मुसकराहट से बर्टी का चेहरा खिल उठा, उसकी पीली-पीली आँखें और धँस गयीं और दाँत बाहर झलकने लगे, ”हूँ! क्या कहा उसने, फिर तो कहो!”

उसने कहा, ”ये गुलाब सार्जेंट से ज्यादा प्यारे हैं, फिर इन्हीं गुलाबों पर नाचती रही और सुबह होते ही इन्हीं फूलों में छिप गयी! तुम्हें सुबह किसी फूल में तो नहीं मिली?”

”उहूँ, तुम्हें तो किसी फूल में नहीं मिली?” बर्टी ने बच्चों के-से भोले विश्वास के स्वरों में कपूर से पूछा।

चन्दर चौंक उठा। पम्मी और बर्टी की इन बातों पर उसका मन बेहद भर आया था। बर्टी की मुसकराहट पर उसकी नसें थरथरा उठी थीं।

”नहीं; मैंने तो नहीं देखा था।” चन्दर ने कहा।

बर्टी ने फिर मायूसी से सिर झुका लिया और आँखें बन्द कर लीं और कराहती हुई आवाज में बोला, ”जिस फूल में वह छिप गयी थी, उसी को किसी ने चुरा लिया होगा!” फिर सहसा वह तनकर खड़ा हो गया और पुचकारते हुए बोला, ”जाने कौन ये फूल चुराता है! अगर मुझे एक बार मिल जाए तो मैं उसका खून ऐसे पी लूँ!” उसने हाथ की अँगुली काटते हुए कहा और उठकर लडख़ड़ाता हुआ चला गया।

वातावरण इतना भारी हो गया था कि फिर पम्मी और कपूर ने कोई बातें नहीं कीं। पम्मी ने चुपचाप टाइप करना शुरू किया और कपूर चुपचाप बर्टी की बातें सोचता रहा। घंटा-भर बाद टाइपराइटर खामोश हुआ तो कपूर ने कहा-

”पम्मी, मैंने जितने लोग देखे हैं उनमें शायद बर्टी सबसे विचित्र है और शायद सबसे दयनीय!”

पम्मी खामोश रही। फिर उसी लापरवाही से अँगड़ाई लेते हुए बोली, ”मुझे बर्टी की बातों पर ज़रा भी दया नहीं आती। मैं उसको दिलासा देती हूँ क्योंकि वह मेरा भाई है और बच्चे की तरह नासमझ और लाचार है।”

कपूर चौंक गया। वह पम्मी की ओर आश्चर्य से चुपचाप देखता रहा; कुछ बोला नहीं।

”क्यों, तुम्हें ताज्जुब क्यों होता है?” पम्मी ने कुछ मुसकराकर कहा, ”लेकिन मैं सच कहती हूँ”-वह बहुत गम्भीर हो गयी, ”मुझे जरा तरस नहीं आता इस पागलपन पर।” क्षण-भर चुप रही, फिर जैसे बहुत ही तेजी से बोली, ”तुम जानते हो उसके फूल कौन चुराता है? मैं, मैं उसके फूल तोडक़र फेंक देती हूँ। मुझे शादी से नफरत है, शादी के बाद होने वाली आपसी धोखेबाजी से नफरत है, और उस धोखेबाजी के बाद इस झूठमूठ की यादगार और बेईमानी के पागलपन से नफरत है। और ये गुलाब के फूल, ये क्यों मूल्यवान हैं, इसलिए न कि इसके साथ बर्टी की जिंदगी की इतनी बड़ी ट्रेजेडी गुँथी हुई है। अगर एक फूल के खूबसूरत होने के लिए आदमी की जिंदगी में इतनी बड़ी ट्रेजेडी आना जरूरी है तो लानत है उस फूल की खूबसूरती पर! मैं उससे नफरत करती हूँ। इसीलिए मैं किताबों से नफरत करती हूँ। एक कहानी लिखने के लिए कितनी कहानियों की ट्रेजेडी बर्दाश्त करनी होती है।”

पम्मी चुप हो गयी। उसका चेहरा सुर्ख हो गया था। थोड़ी देर बाद उसका तैश उतर गया और वह अपने आवेश पर खुद शरमा गयी। उठकर वह कपूर के पास गयी और उसके कन्धों पर हाथ रखकर बोली, ”बर्टी से मत कहना, अच्छा?”

कपूर ने सिर हिलाकर स्वीकृति दी और कागज समेटकर खड़ा हुआ। पम्मी ने उसके कन्धों पर हाथ रखकर उसे अपनी ओर घुमाकर कहा, ”देखो, पिछले चार साल से मैं अकेली थी, और किसी दोस्त का इन्तजार कर रही थी, तुम आये और दोस्त बन गये। तो अब अक्सर आना, ऐं?”

”अच्छा!” कपूर ने गम्भीरता से कहा।

”डॉ. शुक्ला से मेरा अभिवादन कहना, कभी यहाँ जरूर आएँ।”

”आप कभी चलिए, वहाँ उनकी लड़की है। आप उससे मिलकर खुश होंगी।”

पम्मी उसके साथ फाटक तक पहुँचाने चली तो देखा बर्टी एक चमेली के झाड़ में टहनियाँ हटा-हटाकर कुछ ढूँढ़ रहा था। पम्मी को देखकर पूछा उसने-”तुम्हें याद है; वह चमेली के झाड़ में तो नहीं छिपी थी?” कपूर ने पता नहीं क्यों जल्दी पम्मी को अभिवादन किया और चल दिया। उसे बर्टी को देखकर डर लगता था।

सुधा का कॉलेज बड़ा एकान्त और खूबसूरत जगह बना हुआ था। दोनों ओर ऊँची-सी मेड़ और बीच में से कंकड़ की एक खूबसूरत घुमावदार सड़क। दायीं ओर चने और गेहूँ के खेत, बेर और शहतूत के झाड़ और बायीं ओर ऊँचे-ऊँचे टीले और ताड़ के लम्बे-लम्बे पेड़। शहर से काफी बाहर देहात का-सा नजारा और इतना शान्त वातावरण लगता था कि यहाँ कोई उथल-पुथल, कोई शोरगुल है ही नहीं। जगह इतनी हरी-भरी कि दर्जों के कमरों के पीछे ही महुआ चूता था और लम्बी-लम्बी घास की दुपहरिया के नीले फूलों की जंगली लतरें उलझी रहती थीं।

और इस वातावरण ने अगर किसी पर सबसे ज्यादा प्रभाव डाला था तो वह थी गेसू। उसे अच्छी तरह मालूम था कि बाँस के झाड़ के पीछे किस चीज के फूल हैं। पुराने पीपल पर गिलोय की लतर चढ़ी है और करौंदे के झाड़ के पीछे एक साही की माँद है। नागफनी की झाड़ी के पास एक बार उसने एक लोमड़ी भी देखी थी। शहर के एक मशहूर रईस साबिर हुसैन काजमी की वह सबसे बड़ी लड़की थी। उसकी माँ, जिन्हें उसके पिता अदन से ब्याह कर लाये थे, शहर की मशहूर शायरा थीं। हालाँकि उनका दीवान छपकर मशहूर हो चुका था, मगर वह किसी भी बाहरी आदमी से कभी नहीं मिलती-जुलती थीं, उनकी सारी दुनिया अपने पति और अपने बच्चों तक सीमित थी। उन्हें शायराना नाम रखने का बहुत शौक था। अपनी दोनों लड़कियों का नाम उन्होंने गेसू और फूल रखा था और अपने छोटे बच्चे का नाम हसरत। हाँ, अपने पतिदेव साबिर साहब के हुक्के से बेहद चिढ़ती थीं और उनका नाम उन्होंने रखा था, ‘आतिश-फिजाँ।’

घास, फूल, लतर और शायरी का शौक गेसू ने अपनी माँ से विरासत में पाया था। किस्मत से उसका कॉलेज भी ऐसा मिला जिसमें दर्जों की खिड़कियों से आम की शाखें झाँका करती थीं इसलिए हमेशा जब कभी मौका मिलता था, क्लास से भाग कर गेसू घास पर लेटकर सपने देखने की आदी हो गयी थी। क्लास के इस महाभिनिष्क्रमण और उसके बाद लतरों की छाँह में जाकर ध्यान-योग की साधना में उसकी एकमात्र साथिन थी सुधा। आम की घनी छाँह में हरी-हरी दूब में दोनों सिर के नीचे हाथ रखकर लेट रहतीं और दुनिया-भर की बातें करतीं। बातों में छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी किस तरह की बातें करती थीं, यह वही समझ सकता है जिसने कभी दो अभिन्न सहेलियों की एकान्त वार्ता सुनी हो। गालिब की शायरी से लेकर, उनके छोटे भाई हसरत ने एक कुत्ते का पिल्ला पाला है, यह गेसू सुनाया करती थी और शरत के उपन्यासों से लेकर यह कि उसकी मालिन ने गिलट का कड़ा बनवाया है, यह सुधा बताया करती थी। दोनों अपने-अपने मन की बातें एक-दूसरे को बता डालती थीं और जितना भावुक, प्यारा, अनजान और सुकुमार दोनों का मन था, उतनी ही भावुक और सुकुमार दोनों की बातें। हाँ भावुक, सुकुमार दोनों ही थीं, लेकिन दोनों में एक अन्तर था। गेसू शायर होते हुए भी इस दुनिया की थी और सुधा शायर न होते हुए भी कल्पनालोक की थी। गेसू अगर झाड़ियों में से कुछ फूल चुनती तो उन्हें सूँघती, उन्हें अपनी चोटी में सजाती और उन पर चन्द शे’र कहने के बाद भी उन्हें माला में पिरोकर अपनी कलाई में लपेट लेती। सुधा लतरों के बीच में सिर रखकर लेट जाती और निर्निमेष पलकों से फूलों को देखती रहती और आँखों से न जाने क्या पीकर उन्हें उन्हीं की डालों पर फूलता हुआ छोड़ देती। गेसू हर चीज का उचित इस्तेमाल जानती थी, किसी भी चीज को पसन्द करने या प्यार करने के बाद अब उसका क्या उपयोग है, क्रियात्मक यथार्थ जीवन में उसका क्या स्थान है, यह गेसू खूब समझती थी। लेकिन सुधा किसी भी फूल के जादू में बँध जाना चाहती थी, उसी की कल्पना में डूब जाना जानती थी, लेकिन उसके बाद सुधा को कुछ नहीं मालूम था। गेसू की कल्पना और भावुक सूक्ष्मता शायरी में व्यक्त हो जाती थी, अत: उसकी जिंदगी में काफी व्यावहारिकता और यथार्थ था, लेकिन सुधा, जो शायरी लिख नहीं सकती थी, अपने स्वभाव और गठन में खुद ही एक मासूम शायरी बन गयी थी। वह भी पिछले दो सालों में तो सचमुच ही इतनी गम्भीर, सुकुमार और भावनामयी बन गयी थी कि लगता था कि सूर के गीतों से उसके व्यक्तित्व के रेशे बुन गये हैं।

लड़कियाँ, गेसू और सुधा के इस स्वभाव और उनकी अभिन्नता से वाकिफ थीं। और इसलिए जब आज सुधा की मोटर आकर सायबान में रुकी और उसमें से सुधा और गेसू हाथ में फाइल लिये उतरीं तो कामिनी ने हँसकर प्रभा से कहा, ”लो, चन्दा-सूरज की जोड़ी आ गयी!” सुधा ने सुन लिया। मुसकराकर गेसू की ओर फिर कामिनी और प्रभा की ओर देखकर हँस दी। सुधा बहुत कम बोलती थी, लेकिन उसकी हँसी ने उसे खुशमिजाज साबित कर रखा था और वह सभी की प्यारी थी। प्रभा ने आकर सुधा के गले में बाँह डालकर कहा, ”गेसू बानो, थोड़ी देर के लिए सुधारानी को हमें दे दो। जरा कल के नोट्स उतारने हैं इनसे पूछकर।”

गेसू हँसकर बोली, ”उसके पापा से तय कर ले, फिर तू जिंदगी भर सुधा को पाल-पोस, मुझे क्या करना है।”

जब सुधा प्रभा के साथ चली गयी तो गेसू ने कामिनी के कन्धे पर हाथ रखा और कहा, ”कम्मो रानी, अब तो तुम्हीं हमारे हिस्से में पड़ी, आओ। चलो, देखें लतर में कुन्दरू हैं?”

”कुन्दरू तो नहीं, अब चने का खेत हरिया आया है।” कम्मो बोली।

गृह-विज्ञान का पीरियड था और मिस उमालकर पढ़ा रही थीं। बीच की कतार की एक बेंच पर कामिनी, प्रभा, गेसू और सुधा बैठी थीं। हिस्सा बाँट अभी तक कायम था, अत: कामिनी के बगल में गेसू, गेसू के बगल में प्रभा और प्रभा के बाद बेंच के कोने पर सुधा बैठी थी। मिस उमालकर रोगियों के खान-पान के बारे में समझा रही थीं। मेज के बगल में खड़ी हुई, हाथ में एक किताब लिये हुए, उसी पर निगाह लगाये वह बोलती जा रही थीं। शायद अँगरेजी की किताब में जो कुछ लिखा हुआ था, उसी का हिन्दी में उल्था करते हुए बोलती जा रही थीं, ”आलू एक नुकसानदेह तरकारी है, रोग की हालत में। वह खुश्क होता है, गरम होता है और हजम मुश्किल से होता है…।”

सहसा गेसू ने एकदम बीच से पूछा, ”गुरुजी, गाँधी जी आलू खाते हैं या नहीं?” सभी हँस पड़े।

मिस उमालकर ने बहुत गुस्से से गेसू की ओर देखा और डाँटकर कहा, ”व्हाइ टॉक ऑव गाँधी? आई वाण्ट नो पोलिटिकल डिस्क्शन इन क्लास। (गाँधी से क्या मतलब? मैं दर्जे में राजनीतिक बहस नहीं चाहती।)” इस पर तो सभी लड़कियों की दबी हुई हँसी फूट पड़ी। मिस उमालकर झल्ला गयीं और मेज पर किताब पटकते हुए बोलीं, ”साइलेन्स (खामोश)!” सभी चुप हो गये। उन्होंने फिर पढ़ाना शुरू किया।

”जिगर के रोगियों के लिए हरी तरकारियाँ बहुत फायदेमन्द होती हैं। लौकी, पालक और हर किस्म के हरे साग तन्दुरुस्ती के लिए बहुत फायदेमन्द होते हैं।”

सहसा प्रभा ने कुहनी मारकर गेसू से कहा, ”ले, फिर क्या है, निकाल चने का हरा साग, खा-खाकर मोटे हों मिस उमालकर के घंटे में!”

गेसू ने अपने कुरते की जेब से बहुत-सा साग निकालकर कामिनी और प्रभा को दिया।

मिस उमालकर अब शक्कर के हानि-लाभ बता रही थीं, ”लम्बे रोग के बाद रोगी को शक्कर कम देनी चाहिए। दूध या साबूदाने में ताड़ की मिश्री मिला सकते हैं। दूध तो ग्लूकोज के साथ बहुत स्वादिष्ट लगता है।”

इतने में जब तक सुधा के पास साग पहुँचा कि फौरन मिस उमालकर ने देख लिया। वह समझ गयीं, यह शरारत गेसू की होगी, ”मिस गेसू, बीमारी की हालत में दूध काहे के साथ स्वादिष्ट लगता है?”

इतने में सुधा के मुँह से निकला, ”साग काहे के साथ खाएँ?” और गेसू ने कहा, ”नमक के साथ!”

”हूँ? नमक के साथ?” मिस उमालकर ने कहा, ”बीमारी में दूध नमक के साथ अच्छा लगता है। खड़ी हो! कहाँ था ध्यान तुम्हारा?”

गेसू सन्न। मिस उमालकर का चेहरा मारे गुस्से के लाल हो रहा था।

”क्या बात कर रही थीं तुम और सुधा?”

गेसू सन्न!

”अच्छा, तुम लोग क्लास के बाहर जाओ, और आज हम तुम्हारे गार्जियन को खत भेजेंगे। चलो, जाओ बाहर।”

सुधा ने कुछ मुसकराते हुए प्रभा की ओर देखा और प्रभा हँस दी। गेसू ने देखा कि मिस उमालकर का पारा और भी चढऩे वाला है तो वह चुपचाप किताब उठाकर चल दी। सुधा भी पीछे-पीछे चल दी। कामिनी ने कहा, ”खत-वत भेजती रहना, सुधा!” और क्लास ठठाकर हँस पड़ी। मिस उमालकर गुस्से से नीली पड़ गयीं, ”क्लास अब खत्म होगी।” और रजिस्टर उठाकर चल दीं। गेसू अभी अन्दर ही थी कि वह बाहर चली गयीं और उनके जरा दूर पहुँचते ही गेसू ने बड़ी अदा से कहा, ”बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले!” और सारी क्लास फिर हँसी से गूँज उठी। लड़कियाँ चिड़ियों की तरह फुर्र हो गयीं और थोड़ी ही देर में सुधा और गेसू बैडमिंटन फील्ड के पास वाले छतनार पाकड़ के नीचे लेटी हुई थीं।

बड़ी खुशनुमा दोपहरी थी। खुशबू से लदे हल्के-हल्के झोंके गेसू की ओढ़नी और गरारे की सिलवटों से आँखमिचौली खेल रहे थे। आसमान में कुछ हल्के रुपहले बादल उड़ रहे थे और जमीन पर बादलों की साँवली छायाएँ दौड़ रही थीं। घास के लम्बे-चौड़े मैदान पर बादलों की छायाओं का खेल बड़ा मासूम लग रहा था। जितनी दूर तक छाँह रहती थी, उतनी दूर तक घास का रंग गहरा काही हो जाता था, और जहाँ-जहाँ बादलों से छनकर धूप बरसने लगती थी वहाँ-वहाँ घास सुनहरे धानी रंग की हो जाती थी। दूर कहीं पर पानी बरसा था और बादल हल्के होकर खरगोश के मासूम स्वच्छन्द बच्चों की तरह दौड़ रहे थे। सुधा आँखों पर फाइल की छाँह किये हुए बादलों की ओर एकटक देख रही थी। गेसू ने उसकी ओर करवट बदली और उसकी वेणी में लगे हुए रेशमी फीते को उँगली में उमेठते हुए एक लम्बी-सी साँस भरकर कहा-

बादशाहों की मुअत्तर ख्वाबगाहों में कहाँ

वह मजा जो भीगी-भीगी घास पर सोने में है,

मुतमइन बेफिक्र लोगों की हँसी में भी कहाँ

लुत्फ जो एक-दूसरे को देखकर रोने में है।

सुधा ने बादलों से अपनी निगाह नहीं हटायी, बस एक करुण सपनीली मुसकराहट बिखेरकर रह गयी।

क्या देख रही है, सुधा?” गेसू ने पूछा।

”बादलों को देख रही हूँ।” सुधा ने बेहोश आवाज में जवाब दिया। गेसू उठी और सुधा की छाती पर सिर रखकर बोली-

कैफ बरदोश, बादलों को न देख,

बेखबर, तू न कुचल जाय कहीं!

और सुधा के गाल में जोर की चुटकी काट ली। ”हाय रे!” सुधा ने चीखकर कहा और उठ बैठी, ”वाह वाह! कितना अच्छा शेर है! किसका है?”

”पता नहीं किसका है।” गेसू बोली, ”लेकिन बहुत सच है सुधी, आस्माँ के बादलों के दामन में अपने ख्वाब टाँक लेना और उनके सहारे जिंदगी बसर करने का खयाल है तो बड़ा नाजुक, मगर रानी बड़ा खतरनाक भी है। आदमी बड़ी ठोकरें खाता है। इससे तो अच्छा है कि आदमी को नाजुकखयाली से साबिका ही न पड़े। खाते-पीते, हँसते-बोलते आदमी की जिंदगी कट जाए।”

सुधा ने अपना आँचल ठीक किया, और लटों में से घास के तिनके निकालते हुए कहा, ”गेसू, अगर हम लोगों को भी शादी-ब्याह के झंझट में न फँसना पड़े और इसी तरह दिन कटते जाएँ तो कितना मजा आए। हँसते-बोलते, पढ़ते-लिखते, घास में लेटकर बादलों से प्यार करते हुए कितना अच्छा लगता है, लेकिन हम लड़कियों की जिंदगी भी क्या! मैं तो सोचती हूँ गेसू; कभी ब्याह ही न करूँ। हमारे पापा का ध्यान कौन रखेगा?”

गेसू थोड़ी देर तक सुधा की आँखों में आँखें डालकर शरारत-भरी निगाहों से देखती रही और मुसकराकर बोली, ”अरे, अब ऐसी भोली नहीं हो रानी तुम! ये शबाब, ये उठान और ब्याह नहीं करेंगी, जोगन बनेंगी।”

”अच्छा, चल हट बेशरम कहीं की, खुद ब्याह करने की ठान चुकी है तो दुनिया-भर को क्यों तोहमत लगाती है!”

”मैं तो ठान ही चुकी हूँ, मेरा क्या! फ्रिक तो तुम लोगों की है कि ब्याह नहीं होता तो लेटकर बादल देखती हैं।” गेसू ने मचलते हुए कहा।

”अच्छा अच्छा,” गेसू की ओढ़नी खींचकर सिर के नीचे रखकर सुधा ने कहा, ”क्या हाल है तेरे अख्तर मियाँ का? मँगनी कब होगी तेरी?”

”मँगनी क्या, किसी भी दिन हो जाय, बस फूफीजान के यहाँ आने-भर की कसर है। वैसे अम्मी तो फूल की बात उनसे चला रही थीं, पर उन्होंने मेरे लिए इरादा जाहिर किया। बड़े अच्छे हैं, आते हैं तो घर-भर में रोशनी छा जाती है।” गेसू ने बहुत भोलेपन से गोद में सुधा का हाथ रखकर उसकी उँगलियाँ चिटकाते हुए कहा।

”वे तो तेरे चचाजाद भाई हैं न? तुझसे तो पहले उनसे बोल-चाल रही होगी।” सुधा ने पूछा।

”हाँ-हाँ, खूब अच्छी तरह से। मौलवी साहब हम लोगों को साथ-साथ पढ़ाते थे और जब हम दोनों सबक भूल जाते थे तो एक-दूसरे का कान पकडक़र साथ-साथ उठते-बैठते थे।” गेसू कुछ झेंपते हुए बोली।

सुधा हँस पड़ी, ”वाह रे! प्रेम की इतनी विचित्र शुरुआत मैंने कहीं नहीं सुनी थी। तब तो तुम लोग एक-दूसरे का कान पकडऩे के लिए अपने-आप सबक भूल जाते होंगे?”

”नहीं जी, एक बार फिर पढक़र कौन सबक भूलता है और एक बार सबक याद होने के बाद जानती हो इश्क में क्या होता है-

मकतबे इश्क में इक ढंग निराला देखा,

उसको छुट्टी न मिली जिसको सबक याद हुआ”

”खैर, यह सब बात जाने दे सुधा, अब तू कब ब्याह करेगी?”

”जल्दी ही करूँगी।” सुधा बोली।

”किससे?”

”तुझसे।” और दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ीं।

बादल हट गये थे और पाकड़ की छाँह को चीरते हुए एक सुनहली रोशनी का तार झिलमिला उठा। हँसते वक्त गेसू के कान के टॉप चमक उठे और सुधा का ध्यान उधर खिंच गया। ”ये कब बनवाया तूने?”

”बनवाया नहीं।”

”तो उन्होंने दिये होंगे, क्यों?”

गेसू ने शरमाकर सिर हिला दिया।

सुधा ने उठकर हाथ से छूते हुए कहा, ”कितने सुन्दर कमल हैं! वाह! क्यों, गेसू! तूने सचमुच के कमल देखे हैं?”

”न।”

”मैंने देखे हैं।”

”कहाँ?”

”असल में पाँच-छह साल पहले तक तो मैं गाँव में रहती थी न! ऊँचाहार के पास एक गाँव में मेरी बुआ रहती हैं न, बचपन से मैं उन्हीं के पास रहती थी। पढ़ाई की शुरुआत मैंने वहीं की और सातवीं तक वहीं पढ़ी। तो वहाँ मेरे स्कूल के पीछे के पोखरे में बहुत-से कमल थे। रोज शाम को मैं भाग जाती थी और तालाब में घुसकर कमल तोड़ती और घर से बुआ एक लम्बा-सा सोंटा लेकर गालियाँ देती हुई आती थीं मुझे पकड़ने के लिए। जहाँ वह किनारे पर पहुँचतीं तो मैं कहती, अभी डूब जाएँगे बुआ, अभी डूबे, तो बहुत रबड़ी-मलाई की लालच देकर वह मिन्नत करतीं-निकल आओ, तो मैं निकलती थी। तुमने तो कभी देखा नहीं होगा हमारी बुआ को?”

”न, तूने कभी दिखाया ही नहीं।”

”इधर बहुत दिनों से आयीं ही नहीं वे। आएँगी तो दिखाऊँगी तुझे। और उनकी एक लड़की है। बड़ी प्यारी, बहुत मजे की है। उसे देखकर तो तुम उसे बहुत प्यार करोगी। वो तो अब यहीं आने वाली है। अब यहीं पढ़ेगी।”

”किस दर्जे में पढ़ती है?”

”प्राइवेट विदुषी में बैठेगी इस साल। खूब गोल-मटोल और हँसमुख है।” सुधा बोली।

इतने में घंटा बोला और गेसू ने सुधा के पैर के नीचे दबी हुई अपनी ओढ़नी खींची।

”अरे, अब आखिरी घंटे में जाकर क्या पढ़ोगी! हाजिरी कट ही गयी। अब बैठो यहीं बातचीत करें, आराम करें।” सुधा ने अलसाये स्वर में कहा और खड़ी होकर एक मदमाती हुई अँगड़ाई ली-गेसू ने हाथ पकडक़र उसे बिठा लिया और बड़ी गम्भीरता से कहा, ”देखो, ऐसी अरसौहीं अँगड़ाई न लिया करो, इससे लोग समझ जाते हैं कि अब बचपन करवट बदल रहा है।”

”धत्!” बेहद झेंपकर और फाइल में मुँह छिपाकर सुधा बोली।

”लो, तुम मजाक समझती हो, एक शायर ने तुम्हारी अँगड़ाई के लिए कहा है-

कौन ये ले रहा है अँगड़ाई

आसमानों को नींद आती है”

”वाह!” सुधा बोली, ”अच्छा गेसू, आज बहुत-से शेर सुनाओ।”

”सुनो-

इक रिदायेतीरगी है और खाबेकायनात

डूबते जाते हैं तारे, भीगती जाती है रात!”

”पहली लाइन के क्या मतलब हैं?” सुधा ने पूछा।

”रिदायेतीरगी के माने हैं अँधेरे की चादर और खाबेकायनात के माने हैं जिंदगी का सपना-अब फिर सुनो शेर-

इक रिदायेतीरगी है और खाबेकायनात

डूबते जाते हैं तारे, भीगती जाती है रात!”

”वाह! कितना अच्छा है-अन्धकार की चादर है, जीवन का स्वप्न है, तारे डूबते जाते हैं, रात भीगती जाती है…गेसू, उर्दू की शायरी बहुत अच्छी है।”

”तो तू खुद उर्दू क्यों नहीं पढ़ लेती?” गेसू ने कहा।

”चाहती तो बहुत हूँ, पर निभ नहीं पाता!”

”किसी दिन शाम को आओ सुधा तो अम्मीजान से तुझे शेर सुनवाएँ। यह ले तेरी मोटर तो आ गयी।”

सुधा उठी, अपनी फाइल उठायी। गेसू ने अपनी ओढऩी झाड़ी और आगे चली। पास आकर उचककर उसने प्रिंसिपल का रूम देखा। वह खाली था। उसने दाई को खबर दी और मोटर पर बैठ गयी।

गेसू बाहर खड़ी थी। ”चल तू भी न!”

”नहीं, मैं गाड़ी पर चली जाऊँगी।”

”अरे चलो, गाड़ी साढ़े चार बजे जाएगी। अभी घंटा-भर है। घर पर चाय पिएँगे, फिर मोटर पहुँचा देगी। जब तक पापा नहीं हैं, तब तक जितना चाहो कार घिसो!”

गेसू भी आ बैठी और कार चल दी।

दूसरे दिन जब चन्दर डॉ. शुक्ला के यहाँ निबन्ध की प्रतिलिपि लेकर पहुँचा तो आठ बज चुके थे। सात बजे तो चन्दर की नींद ही खुली थी और जल्दी से वह नहा-धोकर साइकिल दौड़ाता हुआ भागा था कि कहीं भाषण की प्रतिलिपि पहुँचने में देर न हो जाए।

जब वह बँगले पर पहुँचा तो धूप फैल चुकी थी। अब धूप भली नहीं मालूम देती थी, धूप की तेजी बर्दाश्त के बाहर होने लगी थी, लेकिन सुधा नीलकाँटे के ऊँचे-ऊँचे झाड़ों की छाँह में एक छोटी-सी कुरसी डाले बैठी थी। बगल में एक छोटी-सी मेज थी जिस पर कोई किताब खुली हुई रखी थी, हाथ में क्रोशिया थी और उँगलियाँ एक नाजुक तेजी से डोरे से उलझ-सुलझ रही थीं। हल्के बादामी रंग की इकलाई की लहराती हुई धोती, नारंगी और काली तिरछी धारियों का कलफ किया चुस्त ब्लाउज और एक कन्धे पर उभरा एक उसका पफ ऐसा लग रहा था जैसे कि बाँह पर कोई रंगीन तितली आकर बैठी हुई हो और उसका सिर्फ एक पंख उठा हो! अभी-अभी शायद नहाकर उठी थी क्योंकि शरद की खुशनुमा धूप की तरह हलके सुनहले बाल पीठ पर लहरा रहे थे। नीलकाँटे की टहनियाँ उनको सुनहली लहरें समझकर अठखेलियाँ कर रही थीं।

चन्दर की साइकिल जब अन्दर दिख पड़ी तो सुधा ने उधर देखा लेकिन कुछ भी न कहकर फिर अपनी क्रोशिया बुनने में लग गयी। चन्दर सीधा पोर्टिको में गया और अपनी साइकिल रखकर भीतर चला गया डॉ. शुक्ला के पास। स्टडी-रूम में, बैठक में, सोने के कमरे में कहीं भी डॉ. शुक्ला नजर नहीं आये। हारकर वह बाहर आया तो देखा मोटर अभी गैरज में है। तो वे जा कहाँ सकते? और सुधा को तो देखिए! क्या अकड़़ी हुई है आज, जैसे चन्दर को जानती ही नहीं। चन्दर सुधा के पास गया। सुधा का मुँह और भी लटक गया।

”डॉक्टर साहब कहाँ हैं?” चन्दर ने पूछा।

”हमें क्या मालूम?” सुधा ने क्रोशिया पर से बिना निगाह उठाये जवाब दिया।

”तो किसे मालूम होगा?” चन्दर ने डाँटते हुए कहा, ”हर वक्त का मजाक हमें अच्छा नहीं लगता। काम की बात का उसी तरह जवाब देना चाहिए। उनके निबन्ध की लिपि देनी है या नहीं!”

”हाँ-हाँ, देनी है तो मैं क्या करूँ? नहा रहे होंगे। अभी कोई ये तो है नहीं कि तुम निबन्ध की लिपि लाये हो तो कोई नहाये-धोये न, बस सुबह से बैठा रहे कि अब निबन्ध आ रहा है, अब आ रहा है!” सुधा ने मुँह बनाकर आँखें नचाते हुए कहा।

”तो सीधे क्यों नहीं कहती कि नहा रहे हैं।” चन्दर ने सुधा के गुस्से पर हँसकर कहा। चन्दर की हँसी पर तो सुधा का मिजाज और भी बिगड़ गया और अपनी क्रोशिया उठाकर और किताब बगल में दबाकर, वह उठकर अन्दर चल दी। उसके उठते ही चन्दर आराम से उस कुरसी पर बैठ गया और मेज पर टाँग फैलाकर बोला-”आज मुझे बहुत गुस्सा चढ़ा है, खबरदार कोई बोलना मत!”

सुधा जाते-जाते मुडक़र खड़ी हो गयी।

”हमने कह दिया चन्दर एक बार कि हमें ये सब बातें अच्छी नहीं लगतीं। जब देखो तुम चिढ़ाते रहते हो!” सुधा ने गुस्से से कहा।

”नहीं! चिढ़ाएँगे नहीं तो पूजा करेंगे! तुम अपने मौके पर छोड़ देती हो!” चन्दर ने उसी लापरवाही से कहा।

सुधा गयी नहीं। वहीं घास पर बैठ गयी और किताब खोलकर पढऩे लगी। जब पाँच मिनट तक वह कुछ नहीं बोली तो चन्दर ने सोचा आज बात कुछ गम्भीर है।

”सुधा!” उसने बड़े दुलार से पुकारा। ”सुधा!”

सुधा ने कुछ नहीं कहा मगर दो बड़े-बड़े आँसू टप से नीचे किताब पर गिर गये।

”अरे क्या बात है सुधा, नहीं बताओगी?”

”कुछ नहीं।”

”बता दो, तुम्हें हमारी कसम है।”

”कल शाम को तुम आये नहीं…” सुधा रोनी आवाज में बोली।

”बस इस बात पर इतनी नाराज हो, पागल!”

”हाँ, इस बात पर इतनी नाराज हूँ! तुम आओ चाहे हजार बार न आओ; इस पर हम क्यों नाराज होंगे! बड़े कहीं के आये, नहीं आएँगे तो जैसे हमारा घर-बार नहीं है। अपने को जाने क्या समझ लिया है!” सुधा ने चिढक़र जवाब दिया।

”अरे तो तुम्हीं तो कह रही थी, भाई।” चन्दर ने हँसकर कहा।

”तो बात पूरी भी सुनो। शाम को गेसू का नौकर आया था। उसके छोटे भाई हसरत की सालगिरह थी। सुबह ‘कुरानखानी’ होने वाली थी और उसकी माँ ने बुलाया था।”

”तो गयी क्यों नहीं?”

”गयी क्यों नहीं! किससे पूछकर जाती? आप तो इस वक्त आ रहे हैं जब सब खत्म हो गया!” सुधा बोली।

”तो पापा से पूछ के चली जाती!” चन्दर ने समझाकर कहा, ”और फिर गेसू के यहाँ तो यों अकसर जाती हो तुम!”

”तो? आज तो डान्स भी करने के लिए कहा था उसने। फिर बाद में तुम कहते, ‘सुधा, तुम्हें ये नहीं करना चाहिए, वो नहीं करना चाहिए। लड़कियों को ऐसे रहना चाहिए, वैसे रहना चाहिए।’ और बैठ के उपदेश पिलाते और नाराज होते। बिना तुमसे पूछे हम कहीं सिनेमा, पिकनिक, जलसों में गये हैं कभी?” और फिर आँसू टपक पड़े।

”पगली कहीं की! इतनी-सी बात पर रोना क्या? किसी के हाथ कुछ उपहार भेज दो और फिर किसी मौके पर चली जाना।”

”हाँ, चली जाना! तुम्हें कहते क्या लगता है! गेसू ने कितना बुरा माना होगा!” सुधा ने बिगड़ते हुए ही कहा। ”इम्तहान आ रहा है, फिर कब जाएँगे?”

”कब है इम्तहान तुम्हारा?”

”चाहे जब हो! मुझे पढ़ाने के लिए कहा किसी से?”

”अरे भूल गये! अच्छा, आज देखो कहेंगे!”

”कहेंगे-कहेंगे नहीं, आज दोपहर को आप बुला लाइए, वरना हम सब किताबों में लगाये देते हैं आग। समझे कि नहीं!”

”अच्छा-अच्छा, आज दोपहर को बुला लाएँगे। ठीक, अच्छा याद आया बिसरिया से कहूँगा तुम्हें पढ़ाने के लिए। उसे रुपये की जरूरत भी है।” चन्दर ने छुटकारे का कोई रास्ता न पाकर कहा।

”आज दोपहर को जरूर से।” सुधा ने फिर आँखें नचाकर कहा। ”लो, पापा आ गये नहाकर, जाओ!”

चन्दर उठा और चल दिया। सुधा उठी और अन्दर चली गयी।

डॉ. शुक्ला हल्के-साँवले रंग के जरा स्थूलकाय-से थे। बहुत गम्भीर अध्ययन और अध्यापन और उम्र के साथ-साथ ही उनकी नम्रता और भी बढ़ती जा रही थी।

लेकिन वे लोगों से मिलते-जुलते कम थे। व्यक्तिगत दोस्ती उनकी किसी से नहीं थी। लेकिन उत्तर भारत के प्रमुख विद्वान् होने के नाते कान्फ्रेन्सों में, मौखिक परीक्षाओं में, सरकारी कमेटियों में वे बराबर बुलाये जाते थे और इसमें प्रमुख दिलचस्पी से हिस्सा लेते थे। ऐसी जगहों में चन्दर अक्सर उनका प्रमुख सहायक रहता था और इसी नाते चन्दर भी प्रान्त के बड़े-बड़े लोगों से परिचित हो गया था। जब वह एम. ए. पास हुआ था तब से फाइनेन्स विभाग में उसे कई बार ऊँचे-ऊँचे पदों का ‘ऑफर’ आ चुका था लेकिन डॉ. शुक्ला इसके खिलाफ थे। वे चाहते थे कि पहले वह रिसर्च पूरी कर ले। सम्भव हो तो विदेश हो आये, तब चाहे कुछ काम करे। अपने व्यक्तिगत जीवन में डॉ. शुक्ला अन्तर्विरोधों के व्यक्ति थे। पार्टियों में मुसलमानों और ईसाइयों के साथ खाने में उन्हें कोई एतराज नहीं था लेकिन कच्चा खाना वे चौके में आसन पर बैठकर, रेशमी धोती पहनकर खाते थे। सरकार को उन्होंने सलाह दी कि साधुओं और संन्यासियों को जबरदस्ती काम में लगाया जाए और मन्दिरों की जायदादें जब्त कर ली जाएँ, लेकिन सुबह घंटे-भर तक पूजा जरूर करते थे। पूजा-पाठ, खान-पान, जात-पाँत के पक्के हामी, लेकिन व्यक्तिगत जीवन में कभी यह नहीं जाना कि उनका कौन शिष्य ब्राह्मण है, कौन बनिया, कौन खत्री, कौन कायस्थ!

नहाकर वे आ रहे थे और दुर्गासप्तशती का कोई श्लोक गुनगुना रहे थे। कपूर को देखा तो रुक गये और बोले, ”हैलो, हो गया वह टाइप!”

”जी हाँ।”

”कहाँ कराया टाइप?”

”मिस डिक्रूज के यहाँ।”

”अच्छा! वह लड़की अच्छी है। अब तो बहुत बड़ी हुई होगी? अभी शादी नहीं हुई? मैंने तो सोचा वह मिले या न मिले!”

”नहीं, वह यहीं है। शादी हुई। फिर तलाक हो गया।”

”अरे! तो अकेले रहती है?”

”नहीं, अपने भाई के साथ है, बर्टी के साथ!”

”अच्छा! और बर्टी की पत्नी अच्छी तरह है?”

”वह मर गयी।”

”राम-राम, तब तो घर ही बदल गया होगा।”

”पापा, पूजा के लिए सब बिछा दिया है।” सहसा सुधा बोली।

”अच्छा बेटी, अच्छा चन्दर, मैं पूजा कर आऊँ जल्दी से। तुम चाय पी चुके?”

”जी हाँ।”

”अच्छा तो मेरी मेज पर एक चार्ट है, जरा इसको ठीक तो कर दो तब तक। मैं अभी आया।”

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गुनाहों  के  देवता – उपन्यास – भाग 2

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गुनाहों  के  देवता – धर्मवीर भारती

  भाग 2

सिविल लाइन्स के एक उजाड़ हिस्से में एक पुराने-से बँगले के सामने आकर मोटर रुकी। बँगले का नाम था ‘रोजलान’ लेकिन सामने के कम्पाउंड में जंगली घास उग रही थी और गुलाब के फूलों के बजाय अहाते में मुरगी के पंख बिखरे पड़े थे। रास्ते पर भी घास उग आयी थी और और फाटक पर, जिसके एक खम्भे की कॉर्निस टूट चुकी थी, बजाय लोहे के दरवाजे के दो आड़े बाँस लगे हुए थे। फाटक के एक ओर एक छोटा-सा लकड़ी का नामपटल लगा था, जो कभी काला रहा होगा, लेकिन जिसे धूल, बरसात और हवा ने चितकबरा बना दिया था। चन्दर मोटर से उतरकर उस बोर्ड पर लिखे हुए अधमिटे सफेद अक्षरों को पढऩे की कोशिश करने लगा, और जाने किसका मुँह देखकर सुबह उठा था कि उसे सफलता भी मिल गयी। उस पर लिखा था, ‘ए. एफ. डिक्रूज’। उसने जेब से लिफाफा निकाला और पता मिलाया। लिफाफे पर लिखा था, ‘मिस पी. डिक्रूज’। यही बँगला है, उसे सन्तोष हुआ।

”हॉर्न दो!” उसने ड्राइवर से कहा। ड्राइवर ने हॉर्न दिया। लेकिन किसी का बाहर आना तो दूर, एक मुरगा, जो अहाते में कुडक़ुड़ा रहा था, उसने मुडक़र बड़े सन्देह और त्रास से चन्दर की ओर देखा और उसके बाद पंख फडफ़ड़ाते हुए, चीखते हुए जान छोडक़र भागा। ”बड़ा मनहूस बँगला है, यहाँ आदमी रहते हैं या प्रेत?” कपूर ने ऊबकर कहा और ड्राइवर से बोला, ”जाओ तुम, हम अन्दर जाकर देखते हैं!”

”अच्छा हुजूर, सुधा बीबी से क्या कह देंगे?”

”कह देना, पहुँचा दिया।”

कार मुड़ी और कपूर बाँस फाँदकर अन्दर घुसा। आगे का पोर्टिको खाली पड़ा था और नीचे की जमीन ऐसी थी जैसे कई साल से उस बँगले में कोई सवारी गाड़ी न आयी हो। वह बरामदे में गया। दरवाजे बन्द थे और उन पर धूल जमी थी। एक जगह चौखट और दरवाजे के बीच में मकड़ी ने जाला बुन रखा था। ‘यह बँगला खाली है क्या?’ कपूर ने सोचा। सुबह साढ़े आठ बजे ही वहाँ ऐसा सन्नाटा छाया था कि दिल घबरा जाय। आस-पास चारों ओर आधी फर्लांग तक कोई बँगला नहीं था। उसने सोचा बँगले के पीछे की ओर शायद नौकरों की झोंपडिय़ाँ हों। वह दायें बाजू से मुड़ा और खुशबू का एक तेज झोंका उसे चूमता हुआ निकल गया। ‘ताज्जुब है, यह सन्नाटा, यह मनहूसी और इतनी खुशबू!’ कपूर ने कहा और आगे बढ़ा तो देखा कि बँगले के पिछवाड़े गुलाब का एक बहुत खूबसूरत बाग है। कच्ची रविशें और बड़े-बड़े गुलाब, हर रंग के। वह सचमुच ‘रोजलान’ था।

वह बाग में पहुँचा। उधर से भी बँगले के दरवाजे बन्द थे। उसने खटखटाया लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। वह बाग में घुसा कि शायद कोई माली काम कर रहा हो। बीच-बीच में ऊँचे-ऊँचे जंगली चमेली के झाड़ थे और कहीं-कहीं लोहे की छड़ों के कटघरे। बेगमबेलिया भी फूल रही थी लेकिन चारों ओर एक अजब-सा सन्नाटा था और हर फूल पर किसी खामोशी के फरिश्ते की छाँह थी। फूलों में रंग था, हवा में ताजगी थी, पेड़ों में हरियाली थी, झोंकों में खुशबू थी, लेकिन फिर भी सारा बाग एक ऐसे सितारों का गुलदस्ता लग रहा था जिनकी चमक, जिनकी रोशनी और जिनकी ऊँचाई लुट चुकी हो। लगता था जैसे बाग का मालिक मौसमी रंगीनी भूल चुका हो, क्योंकि नैस्टर्शियम या स्वीटपी या फ्लाक्स, कोई भी मौसमी फूल न था, सिर्फ गुलाब थे और जंगली चमेली थी और बेगमबेलिया थी जो सालों पहले बोये गये थे। उसके बाद उन्हीं की काट-छाँट पर बाग चल रहा था। बागबानी में कोई नवीनता और मौसम का उल्लास न था।

चन्दर फूलों का बेहद शौकीन था। सुबह घूमने के लिए उसने दरिया किनारे के बजाय अल्फ्रेड पार्क चुना था क्योंकि पानी की लहरों के बजाय उसे फूलों के बाग के रंग और सौरभ की लहरों से बेहद प्यार था। और उसे दूसरा शौक था कि फूलों के पौधों के पास से गुजरते हुए हर फूल को समझने की कोशिश करना। अपनी नाजुक टहनियों पर हँसते-मुसकराते हुए ये फूल जैसे अपने रंगों की बोली में आदमी से जिंदगी का जाने कौन-सा राज कहना चाहते हैं। और ऐसा लगता है कि जैसे हर फूल के पास अपना व्यक्तिगत सन्देश है जिसे वह अपने दिल की पाँखुरियों में आहिस्ते से सहेज कर रखे हुए हैं कि कोई सुनने वाला मिले और वह अपनी दास्ताँ कह जाए। पौधे की ऊपरी फुनगी पर मुसकराता हुआ आसमान की तरफ मुँह किये हुए यह गुलाब जो रात-भर सितारों की मुसकराहट चुपचाप पीता रहा है, यह अपने मोतियों-पाँखुरियों के होठों से जाने क्यों खिलखिलाता ही जा रहा है। जाने इसे कौन-सा रहस्य मिल गया है। और वह एक नीचे वाली टहनी में आधा झुका हुआ गुलाब, झुकी हुई पलकों-सी पाँखुरियाँ और दोहरे मखमली तार-सी उसकी डंडी, यह गुलाब जाने क्यों उदास है? और यह दुबली-पतली लम्बी-सी नाजुक कली जो बहुत सावधानी से हरा आँचल लपेटे है और प्रथम ज्ञात-यौवना की तरह लाज में जो सिमटी तो सिमटी ही चली जा रही है, लेकिन जिसके यौवन की गुलाबी लपटें सात हरे परदों में से झलकी ही पड़ती हैं, झलकी ही पड़ती हैं। और फारस के शाहजादे जैसा शान से खिला हुआ पीला गुलाब! उस पीले गुलाब के पास आकर चन्दर रुक गया और झुककर देखने लगा। कातिक पूनो के चाँद से झरने वाले अमृत को पीने के लिए व्याकुल किसी सुकुमार, भावुक परी की फैली हुई अंजलि के बराबर बड़ा-सा वह फूल जैसे रोशनी बिखेर रहा था। बेगमबेलिया के कुंज से छनकर आनेवाली तोतापंखी धूप ने जैसे उस पर धान-पान की तरह खुशनुमा हरियाली बिखेर दी थी। चन्दर ने सोचा, उसे तोड़ लें लेकिन हिम्मत न पड़ी। वह झुका कि उसे सूँघ ही लें। सूँघने के इरादे से उसने हाथ बढ़ाया ही था कि किसी ने पीछे से गरजकर कहा, ”हीयर यू आर, आई हैव काट रेड-हैण्डेड टुडे!” (यह तुम हो; आज तुम्हें मौके पर पकड़ पाया हूँ)

और उसके बाद किसी ने अपने दोनों हाथों में जकड़ लिया और उसकी गरदन पर सवार हो गया। वह उछल पड़ा और अपने को छुड़ाने की कोशिश करने लगा। पहले तो वह कुछ समझ नहीं पाया। अजब रहस्यमय है यह बँगला। एक अव्यक्त भय और एक सिहरन में उसके हाथ-पाँव ढीले हो गये। लेकिन उसने हिम्मत करके अपना एक हाथ छुड़ा लिया और मुडक़र देखा तो एक बहुत कमजोर, बीमार-सा, पीली आँखों वाला गोरा उसे पकड़े हुए था। चन्दर के दूसरे हाथ को फिर पकडऩे की कोशिश करता हुआ वह हाँफता हुआ बोला (अँग्रेजी में), ”रोज-रोज यहाँ से फूल गायब होते थे। मैं कहता था, कहता था, कौन ले जाता है। हो…हो…,” वह हाँफता जा रहा था, ”आज मैंने पकड़ा तुम्हें। रोज चुपके से चले जाते थे…” वह चन्दर को कसकर पकड़े था लेकिन उस बीमार गोरे की साँस जैसे छूटी जा रही थी। चन्दर ने उसे झटका देकर धकेल दिया और डाँटकर बोला, ”क्या मतलब है तुम्हारा! पागल है क्या! खबरदार जो हाथ बढ़ाया, अभी ढेर कर दूँगा तुझे! गोरा सुअर!” और उसने अपनी आस्तीनें चढ़ायीं।

वह धक्के से गिर गया था, धूल झाड़ते उठ बैठा और बड़ी ही रोनी आवाज में बोला, ”कितना जुल्म है, कितना जुल्म है! मेरे फूल भी तुम चुरा ले गये और मुझे इतना हक भी नहीं कि तुम्हें धमकाऊँ! अब तुम मुझसे लड़ोगे! तुम जवान हो, मैं बूढ़ा हूँ। हाय रे मैं!” और सचमुच वह जैसे रोने लगा हो।

चन्दर ने उसका रोना देखा और उसका सारा गुस्सा हवा हो गया और हँसी रोककर बोला, ”गलतफहमी है, जनाब! मैं बहुत दूर रहता हूँ। मैं चिठ्ठी लेकर मिस डिक्रूज से मिलने आया था।”

उसका रोना नहीं रुका, ”तुम बहाना बनाते हो, बहाना बनाते हो और अगर मैं विश्वास नहीं करता तो तुम मारने की धमकी देते हो? अगर मैं कमजोर न होता…तो तुम्हें पीसकर खा जाता और तुम्हारी खोपड़ी कुचलकर फेंक देता जैसे तुमने मेरे फूल फेंके होंगे?”

”फिर तुमने गाली दी! मैं उठाकर तुम्हें अभी नाले में फेंक दूँगा!”

”अरे बाप रे! दौड़ो, दौड़ो, मुझे मार डाला…पॉपी…टॉमी…अरे दोनों कुत्ते मर गये…।” उसने डर के मारे चीखना शुरू किया।

”क्या है, बर्टी? क्यों चिल्ला रहे हो?” बाथरूम के अन्दर से किसी ने चिल्लाकर कहा।

”अरे मार डाला इसने…दौड़ो-दौड़ो!”

झटके से बाथरूम का दरवाजा खुला बेदिङ्-गाउन पहने हुए एक लड़की दौड़ती हुई आयी और चन्दर को देखकर रुक गयी।

”क्या है?” उसने डाँटकर पूछा।

”कुछ नहीं, शायद पागल मालूम देता है!”

”जबान सँभालकर बोलो, वह मेरा भाई है!”

”ओह! कोई भी हो। मैं मिस डिक्रूज से मिलने आया था। मैंने आवाज दी तो कोई नहीं बोला। मैं बाग में घूमने लगा। इतने में इसने मेरी गरदन पकड़ ली। यह बीमार और कमजोर है वरना अभी गरदन दबा देता।”

गोरा उस लड़की के आते ही फिर तनकर खड़ा हो गया और दाँत पीसकर बोला, ”अरे मैं तुम्हारे दाँत तोड़ दूँगा। बदमाश कहीं का, चुपके-चुपके आया और गुलाब तोडऩे लगा। मैं चमेली के झाड़ के पीछे छिपा देख रहा था।”

”अभी मैं पुलिस बुलाती हूँ, तुम देखते रहो बर्टी इसे। मैं फोन करती हूँ।”

लड़की ने डाँटते हुए कहा।

”अरे भाई, मैं मिस डिक्रूज से मिलने आया हूँ।”

”मैं तुम्हें नहीं जानती, झूठा कहीं का। मैं मिस डिक्रूज हूँ।”

”देखिए तो यह खत!”

लड़की ने खत खोला और पढ़ा और एकदम उसने आवाज बदल दी।

”छिह बर्टी, तुम किसी दिन पागलखाने जाओगे। आपको डॉ. शुक्ला ने भेजा है। तुम तो मुझे बदनाम करा डालोगे!”

उसकी शक्ल और भी रोनी हो गयी , ”मैं नहीं जानता था, मैं जानता नहीं था।” उसने और भी घबराकर कहा।

”माफ कीजिएगा!” लड़की ने बड़े मीठे स्वर में साफ हिन्दुस्तानी में कहा, ”मेरे भाई का दिमाग ज़रा ठीक नहीं रहता, जब से इनकी पत्नी की मौत हो गयी।”

”इसका मतलब ये नहीं कि ये किसी भले आदमी की इज्जत उतार लें।” चन्दर ने बिगडक़र कहा।

”देखिए, बुरा मत मानिए। मैं इनकी ओर से माफी माँगती हूँ। आइए, अन्दर चलिए।” उसने चन्दर का हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ बेहद ठण्डा था। वह नहाकर आ रही थी। उसके हाथ के उस तुषार स्पर्श से चन्दर सिहर उठा और उसने हाथ झटककर कहा, ”अफसोस, आपका हाथ तो बर्फ है?”

लड़की चौंक गयी। वह सद्य:स्नाता सहसा सचेत हो गयी और बोली, ”अरे शैतान तुम्हें ले जाए, बर्टी! तुम्हारे पीछे मैं बेदिङ् गाउन में भाग आयी।” और बेदिङ् गाउन के दोनों कालर पकडक़र उसने अपनी खुली गरदन ढँकने का प्रयास किया और फिर अपनी पोशाक पर लज्जित होकर भागी।

अभी तक गुस्से के मारे चन्दर ने उस पर ध्यान ही नहीं दिया था। लेकिन उसने देखा कि वह तेईस बरस की दुबली-पतली तरुणी है। लहराता हुआ बदन, गले तक कटे हुए बाल। एंग्लो-इंडियन होने के बावजूद गोरी नहीं है। चाय की तरह वह हल्की, पतली, भूरी और तुर्श थी। भागते वक्त ऐसी लग रही थी जैसे छलकती हुई चाय।

इतने में वह गोरा उठा और चन्दर का कन्धा छूकर बोला, ”माफ करना, भाई! उससे मेरी शिकायत मत करना। असल में ये गुलाब मेरी मृत पत्नी की यादगार हैं। जब इनका पहला पेड़ आया था तब मैं इतना ही जवान था जितने तुम, और मेरी पत्नी उतनी ही अच्छी थी जितनी पम्मी।”

”कौन पम्मी?”

”यह मेरी बहन प्रमिला डिक्रूज!”

”ओह! कब मरी आपकी पत्नी?ï माफ कीजिएगा मुझे भी मालूम नहीं था!”

”हाँ, मैं बड़ा अभागा हूँ। मेरा दिमाग कुछ खराब है; देखिए!” कहकर उसने झुककर अपनी खोपड़ी चन्दर के सामने कर दी और बहुत गिड़गिड़ाकर बोला, ”पता नहीं कौन मेरे फूल चुरा ले जाता है! अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद पाँच साल से मैं इन फूलों को सँभाल रहा हूँ। हाय रे मैं! जाइए, पम्मी बुला रही है।”

पिछवाड़े के सहन का बीच का दरवाजा खुल गया था और पम्मी कपड़े पहनकर बाहर झाँक रही थी। चन्दर आगे बढ़ा और गोरा मुडक़र अपने गुलाब और चमेली की झाड़ी में खो गया। चन्दर गया और कमरे में पड़े हुए एक सोफा पर बैठ गया। पम्मी ट्वायलेट कर चुकी थी और एक हल्की फ्रान्सीसी खुशबू से महक रही थी। शैम्पू से धुले हुए रूखे बाल जो मचले पड़ रहे थे, खुशनुमा आसमानी रंग का एक पतला चिपका हुआ झीना ब्लाउज और ब्लाउज पर एक फ्लैनेल का फुलपैंट जिसके दो गेलिस कमर, छाती और कन्धे पर चिपके हुए थे। होठों पर एक हल्की लिपस्टिक की झलक मात्र थी, और गले तक बहुत हल्का पाउडर, जो बहुत नजदीक से ही मालूम होता था। लम्बे नाखूनों पर हल्की गुलाबी पैंट। वह आयी, निस्संकोच भाव से उसी सोफे पर कपूर के बगल में बैठ गयी और बड़ी मुलायम आवाज में बोली, ”मुझे बड़ा दु:ख है, मिस्टर कपूर! आपको बहुत तवालत उठानी पड़ी। चोट तो नहीं आयी?”

”नहीं, नहीं, कोई बात नहीं!” कपूर का सारा गुस्सा हवा हो गया। कोई भी लड़की नि:संकोच भाव से, इतनी अपनायत से सहानुभूति दिखाये और माफी माँगे, तो उसके सामने कौन पानी-पानी नहीं हो जाएगा, और फिर वह भी तब जबकि उसके होठों पर न केवल बोली अच्छी लगती हो, वरन लिपस्टिक भी इतनी प्यारी हो। लेकिन चन्दर की एक आदत थी। और चाहे कुछ न हो, कम-से-कम वह यह अच्छी तरह जानता था कि नारी जाति से व्यवहार करते समय कहाँ पर कितनी ढील देनी चाहिए, कितना कसना चाहिए, कब सहानुभूति से उन्हें झुकाया जा सकता है, कब अकड़कर। इस वक्त जानता था कि इस लड़की से वह जितनी सहानुभूति चाहे, ले सकता है, अपने अपमान के हर्जाने के तौर पर। इसलिए कपूर साहब बोले, ”लेकिन मिस डिक्रूज, आपके भाई बीमार होने के बावजूद बहुत मजबूत हैं। उफ! गरदन पर जैसे अभी तक जलन हो रही है।”

”ओहो! सचमुच मैं बहुत शर्मिन्दा हूँ। देखूँ!” और कालर हटाकर उसने गरदन पर अपनी बर्फीली अँगुलियाँ रख दीं, ”लाइए, लोशन मल दूँ मैं!”

”धन्यवाद, धन्यवाद, इतना कष्ट न कीजिए। आपकी अँगुलियाँ गन्दी हो जाएँगी!” कपूर ने बड़ी शालीनता से कहा।

पम्मी के होठों पर एक हल्की-सी मुस्कराहट, आँखों में हल्की-सी लाज और वक्ष में एक हल्का-सा कम्पन दौड़ गया। यह वाक्य कपूर ने चाहे शरारत में ही कहा हो, लेकिन कहा इतने शान्त और संयत स्वरों में कि पम्मी कुछ प्रतिवाद भी न कर सकी और फिर छह बरस से साठ बरस तक की कौन ऐसी स्त्री है जो अपने रूप की प्रशंसा पर बेहोश न हो जाए।

”अच्छा लाइए, वह स्पीच कहाँ है जो मुझे टाइप करनी है।” उसने विषय बदलते हुए कहा।

”यह लीजिए।” कपूर ने दे दी।

”यह तो मुश्किल से तीन-चार घण्टे का काम है?” और पम्मी स्पीच को उलट-पुलटकर देखने लगी।

”माफ कीजिएगा, अगर मैं कुछ व्यक्तिगत सवाल पूछूँ; क्या आप टाइपिस्ट हैं?” कपूर ने बहुत शिष्टता से पूछा।

”जी नहीं!” पम्मी ने उन्हीं कागजों पर नजर गड़ाते हुए कहा, ”मैंने कभी टाइपिंग और शार्टहैंड सीखी थी, और तब मैं सीनियर केम्ब्रिज पास करके यूनिवर्सिटी गयी थी। यूनिवर्सिटी मुझे छोडऩी पड़ी क्योंकि मैंने अपनी शादी कर ली।”

”अच्छा, आपके पति कहाँ हैं?”

”रावलपिंडी में, आर्मी में।”

”लेकिन फिर आप डिक्रूज क्यों लिखती हैं, और फिर मिस?”

”क्योंकि हमलोग अलग हो गये हैं।” और स्पीच के कागज को फिर तह करती हुई बोली-

”मिस्टर कपूर, आप अविवाहित हैं?”

”जी हाँ?”

”और विवाह करने का इरादा तो नहीं रखते?”

”नहीं।”

”बहुत अच्छे। तब तो हम लोगों में निभ जाएगी। मैं शादी से बहुत नफरत करती हूँ। शादी अपने को दिया जानेवाला सबसे बड़ा धोखा है। देखिए, ये मेरे भाई हैं न, कैसे पीले और बीमार-से हैं। ये पहले बड़े तन्दुरुस्त और टेनिस में प्रान्त के अच्छे खिलाडिय़ों में से थे। एक बिशप की दुबली-पतली भावुक लड़की से इन्होंने शादी कर ली, और उसे बेहद प्यार करते थे। सुबह-शाम, दोपहर, रात कभी उसे अलग नहीं होने देते थे। हनीमून के लिए उसे लेकर सीलोन गये थे। वह लड़की बहुत कलाप्रिय थी। बहुत अच्छा नाचती थी, बहुत अच्छा गाती थी और खुद गीत लिखती थी। यह गुलाब का बाग उसी ने बनवाया था और इन्हीं के बीच में दोनों बैठकर घंटों गुजार देते थे।

”कुछ दिनों बाद दोनों में झगड़ा हुआ। क्लब में बॉल डान्स था और उस दिन वह लड़की बहुत अच्छी लग रही थी। बहुत अच्छी। डान्स के वक्त इनका ध्यान डान्स की तरफ कम था, अपनी पत्नी की तरफ ज्यादा। इन्होंने आवेश में उसकी अँगुलियाँ जोर से दबा दीं। वह चीख पड़ी और सभी इन लोगों की ओर देखकर हँस पड़े।

एक ऐसा बिहारी नेता जिसने भारतीय राजनीती और दलित समाज को नयी दिशा प्रदान की

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तुल न सके धरती धन धाम,
धन्य तुम्हारा पावन नाम,
लेकर तुम सा लक्ष्य ललाम,
सफल काम जगजीवन राम।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की देश के विख्यात राजनेता जगजीवन राम के बारे में कही गयी ये पंक्तियां उनके व्यक्तित्व का प्रतिबिंब हैं। आजादी के बाद भारतीय राजनीति में ऐसे कम ही नेता रहे हैं जिन्होंने न केवल मंत्री के रूप में अकेले कई मंत्रालयों की चुनौतियों को स्वीकारा बल्कि उन चुनौतियों को अंतिम अंजाम तक पहुंचाया. आधुनिक भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष रहे जगजीवन राम को मंत्री के रूप में जो भी विभाग मिला उन्होंने अपनी प्रशासनिक दक्षता से उसका सफल संचालन किया.

जगजीवन राम का एक ऐसा व्यक्तित्व था कि जो वह एक बार ठान लेते थे उसे पूरा करके ही छोड़ते थे. उनमें संघर्ष का जबरदस्त माद्दा था. चुनौतियों का सामना करना उन्हें भाता था. उनके व्यक्तित्व ने अन्याय से कभी समझौता नहीं किया. वह हमेशा दलितों के सम्मान के लिए संघर्षरत रहे.

जगजीवन राम का जन्म

एक दलित परिवार में जन्म लेकर राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर छा जाने वाले बाबू जगजीवन राम का जन्म बिहार की उस धरती पर हुआ था जिसकी भारतीय इतिहास और राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है. जगजीवन राम का जन्म 5 अप्रैल, 1908  को बिहार के शाहाबाद जिले (वर्तमान भोजपुर जिला ) के एक छोटे से गांव चंदवा में शोभी राम और वसंती देवी के यहां हुआ था। जगजीवन राम को आदर्श मानवीय मूल्य और सूझबूझ  अपने पिता से विरासत में मिली जो धार्मिक प्रविृति के थे । जब वे विद्यालय में ही थे तब उनके पिता का स्वर्गवास हो गया और उनका पालन-पोषण उनकी माता जी को करना पड़ा।

जगजीवन राम की शिक्षा 

जगजीवन राम को उस समय अस्पृश्यता की दर्दनाक वेदना झेलनी पड़ी, जब उस स्कूल में अछूत जातियों के लिए उन्होंने अलग घड़े से पानी पीने की व्यवस्था देखी। आक्रोशित होकर उन्होंने एक बार नहीं बल्कि तीन बार वह घड़ा फोड़ा। अंततः स्कूल के प्रधानाचार्य ने यह व्यवस्था दी कि जगजीवन भी उसी घड़े से पानी पिएंगे और जिसे एतराज हो, वह अपनी पृथक व्यवस्था स्वयं करे। एक मेधावी छात्र के रूप में जगजीवन प्रत्येक कक्षा में छात्रवृत्ति लेकर पढ़े और वैज्ञानिक बनने का सपना संजोये रहे, परंतु तत्कालीन परिस्थितियों में उन्हें देश की आजादी ज्यादा जरूरी लगी और वे भी स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।

बाबूजी ने वर्ष 1920 में आरा स्थित अग्रवाल विद्यालय में उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु प्रवेश लिया | आयु वृद्धि के साथ ही उनमें परिपक्वता का भी समावेश हो रहा था | उनकी विदेशी भाषाओं को समझने व सीखने की जिज्ञासा के बल पर उन्होंने अंग्रेज़ी में निपुणता हासिल की, साथ ही माननीय श्री बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा रचित ‘आनंद मठ’ की मूल पुस्तक (जो बांगाली में लिखित है) को पढ़ने के लिए बांगाली तक सीख गए | वे अंग्रेज़ी व बांगाली के साथ-साथ हिंदी व संस्कृत में भी माहिर थे | 1925 में पंडित मदन मोहन मालवीय जब आरा पधारे तो वे युवा जगजीवन के व्यापक ज्ञान व सभी क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन को देखकर अचंभित रह गए तथा उन्हें तभी आभास हो गया कि ये किशोर भविष्य में देश की आज़ादी व राष्ट्र निर्माण में अहम भूमिका निभा सकता है | उन्होंने युवा जगजीवन से स्वयं मुलाकात की व बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय आने का निमंत्रण दिया | परन्तु जगजीवन राम को वहाँ जाति के आधार पर भेद भाव झेलना पड़ा | क्रांतिकारी स्वाभाव के जगजीवन ने इसका खुल कर विरोध किया और वे सफल भी हुए | आतंरिक विज्ञान परीक्षा में वे उत्तम अंकों से उत्तीर्ण हुए व वर्ष 1931 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से विज्ञान स्नातक में उच्चतम अंकों से उत्तीर्ण हुए |

दलित वर्ग के लिए उठाई आवाज 

जगजीवन राम ने अनेक रविदास सम्मेलन आयोजित किए थे और कलकत्ता (कोलकाता) के विभिन्न भागों में गुरू रविदास जयंती मनाई थी। वर्ष 1934 में, आपने कलकत्ता में अखिल भारतीय रविदास महासभा और अखिल भारतीय दलित वर्ग लीग की स्थापना की। इन संगठनों के माध्यम से आपने दलित वर्गों को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल किया। आपका विचार था कि दलित नेताओं को न केवल समाज सुधार के लिए संघर्ष करना चाहिए बल्कि राजनीतिक, प्रतिनिधित्व की मांग भी करनी चाहिए। अगले वर्ष अर्थात 19 अक्तूबर, 1935 में बाबूजी रांची में हेमंड आयोग के समक्ष उपस्थित हुए और आपने पहली बार दलितों के लिए मतदान के अधिकार की मांग की।

अंग्रजो से मिलने से किया साफ इंकार 

28 साल की उम्र में ही 1936 में उन्हें बिहार विधान परिषद् का सदस्य नामांकित कर दिया गया था। जब गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के तहत 1937 में चुनाव हुए तो बाबूजी डिप्रेस्ड क्लास लीग के उम्मीदवार के रूप में निर्विरोध एमएलए चुने गए। अंग्रेज बिहार में अपनी पिट्ठू सरकार बनाने के प्रयास में थे। उनकी कोशिश थी कि जगजीवन राम को लालच देकर अपने साथ मिला लिया जाए। उन्हे मत्री पद और पैसे का लालच दिया गया, लेकिन जगजीवन राम ने अंग्रेजों का साथ देने से साफ इनकार कर दिया। उसके बाद ही बिहार में काग्रेस की सरकार बनी, जिसमें वह मत्री बने। साल भर के अंदर ही अंग्रेजों के गैरजिम्मेदार रुख के कारण महात्मा गांधी की सलाह पर काग्रेस सरकारों ने इस्तीफा दे दिया। बाबूजी इस काम में सबसे आगे थे। पद का लालच उन्हें छू तक नहीं गया था।

आजादी की लड़ाई में सक्रियता

 

बाबू जगजीवन राम ने स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत सक्रिय और महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। गांधीजी से प्रेरणा पाकर बाबूजी ने 10 दिसम्बर, 1940 को अपनी गिरफ्तारी दी। रिहा होने के बाद, आपने सविनय अवज्ञा आंदोलन और सत्याग्रह में सक्रिय रूप से भाग लिया। बाबूजी को इंडियन नेशनल कांग्रेस द्वारा आरंम्भ किए गए भारत छोड़ो आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए 19 अगस्त, 1942 को पुनः गिरफ्तार कर लिया गया और बाबूजी का पांच दशक से भी अधिक का लंबा और उत्कृष्ट राजनीतिक जीवन था।

मंत्री के रूप में लंबा कार्यकाल

बाबू जगजीवन 1952 से 1984 तक लगातार सांसद चुने गए. वह सबसे लंबे समय तक (लगभग 30 साल) देश के केंद्रीय मंत्री रहे. पहले नेहरू के मंत्रिमंडल में, फिर इंदिरा गांधी के कार्यकाल में और अंत में जनता सरकार में उप प्रधानमंत्री के रूप में. केंद्र सरकार में अपने लंबे कॅरियर के दौरान उन्होंने श्रम, कृषि संचार रेलवे और रक्षा जैसे अनेक चुनौतीपूर्ण मंत्रालयों का जिम्मा संभाला. उन्होंने श्रम के रूप में मजदूरों की स्थिति में आवश्यक सुधार लाने और उनकी सामाजिक आर्थिक सुरक्षा के लिए विशिष्ट कानून के प्रावधान किए जो आज भी हमारे देश की श्रम नीति का मूलाधार है.

दलित समाज के मसीहा

जगजीवन राम को भारतीय समाज और राजनीति में दलित वर्ग के मसीहा के रूप में याद किया जाता है. वह स्वतंत्र भारत के उन गिने चुने नेताओं में से एक थे जिन्होंने राजनीति के साथ ही दलित समाज के लिए नई दिशा प्रदान की. उन्होंने उन लाखों-करोड़ो दमितों की आवाज उठाई जिन्हें सवर्ण जातियों के साथ चलने की मनाही थी, जिनके खाने के बर्तन अलग थे, जिन्हें छूना पाप समझा जाता था और जो हमेशा दूसरों की दया के सहारे रहते थे. पांच दशक तक सक्रिय राजनीति का हिस्सा रहे जगजीवन राम ने अपना सारा जीवन देश की सेवा और दलितों के उत्थान के लिए अर्पित कर दिया.

 

जगजीवन बाबु की शादी 

जून, 1935 में बाबूजी का विवाह इंद्राणी देवी से हुआ था। इंद्राणी देवी स्वयं एक स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षाविद थीं। उनके पिता डा. बीरबल एक प्रतिष्ठित चिकित्सक थे और उन्होंने ब्रिटिश सेना में कार्य किया था तथा 1889-90 में चीन-लुशई युद्ध में उनकी सेवाओं के लिए तत्कालीन वायसराय लार्ड लैंसडाउन द्वारा उन्हें विक्टोरिया मैडल से सम्मानित किया गया था। 17 जुलाई, 1938 को उनके पुत्र सुरेश कुमार और 31 मार्च, 1945 को पुत्री मीरा कुमार का जन्म हुआ। 21 मई, 1985 को सुरेश कुमार का निधन हो गया जिससे आपके माता-पिता को अत्यंत आघात पहुंचा। मीरा कुमार भारत की  पहली महिला लोकसभाध्यक्ष है |

आपातकाल व नयी शुरुआत

25 जून 1975 को श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा देश भर में आपातकाल की घोषणा कर दी गयी | इस आपातकाल ने संविधान के मौलिक अधिकारों को सवालों के घेरे में ला दिया | श्रीमती इंदिरा गाँधी ने 18 जनवरी 1977 को आम चुनाव की घोषणा तो कर दी थी किन्तु देश को आपातकाल का डर था | इस परिस्थिति से निपटने के लिए बाबूजी ने अपने पद का त्याग कर दिया व कांग्रेस पार्टी से भी इस्तीफ़ा दे दिया | उन्होंने उसी दिवस ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ (सी.एफ़.डी.) नामक एक नयी पार्टी की रचना की | वर्ष 1977 के आम चुनावों में बाबूजी की विजय हुई व उन्हें रक्षा मंत्रालय का दायित्व दिया गया | 25 मार्च 1977 को कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी, जनता पार्टी में सम्मिलित कर ली गयी | जनवरी 1979 में बाबूजी भारत वर्ष के उपप्रधानमंत्री के रूप में घोषित किये गए | वर्ष 1980 में जनता पार्टी का आपसी मनमुटावों के कारण बंटवारा हो गया एवं बाबूजी ने मार्च 1980 में अंततः कांग्रेस (जे) का निर्माण किया | वर्ष 1984 के आम चुनावों में सासाराम की जनता ने अपने विश्वनीय प्रतिनिधि बाबू जगजीवन राम के लिए एक बार पुनः लोकसभा के द्वार खोल दिए |

जगजीवन बाबु के बारे में लोगो की राय

डॉ अंबेडकर ने जगजीवन राम के बारे में कहा था-‘बाबू जगजीवन राम भारत के चोटी के विचारक, भविष्यदृष्टा और ऋषि राजनेता हैं जो सबके कल्याण की सोचते हैं।’ जगजीवन राम ने आरंभ से ही समाज के पद्दलित लोगों के अधिकार और सम्मान के लिए अथक संघर्ष किया। सुभाष चंद्र बोस ने उस समय कहा था-‘जगजीवन राम ने जिस ढंग से श्रमिक व हरिजन सुधार आंदोलन का संगठन किया है, वह सभी के लिए अनुकरणीय है।

निधन

6 जुलाई, 1986 को 78 साल की उम्र में इस महान् राजनीतिज्ञ का निधन हो गया। बाबू जगजीवन राम को भारतीय समाज और राजनीति में दलित वर्ग के मसीहा के रूप में याद किया जाता है। वह स्वतंत्र भारत के उन गिने चुने नेताओं में थे जिन्होंने देश की राजनीति के साथ ही दलित समाज को भी नयी दिशा प्रदान की।

 

जानिए एक ब्राम्हण परिवार के लड़के ने कैसे शौचालय को बनाया इंटरनेशनल ब्रांड

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Bindeshwar Pathak

दोस्तों किसी की जीवन में कुछ ऐसी घटनाये घटती है जिसके कारण उनके जीवन का मकसद बिलकुल स्पष्ट हो जाता है की हमें क्या करना है . आज मै एक ऐसे ही सामाजिक कार्यकर्ता एवं उद्यमी के बारे में बताने जा रहा हु जिनके बचपन में कुछ ऐसी घटना घटी जिसने उनके जीवन में नया मोड़ ला दिया . उन्होंने खुले में शौचालय जाते महिलाओ और पुरुषो की झुकी नजरो को उठाने के लिए  सुलभ इन्टरनेशनल की स्थापना कर डाली . जी हाँ मै बात कर रहा हूँ बिहार के महान उद्यमी बिन्देश्वर पाठक के बारे में . उनकी कंपनी न सिर्फ  स्वच्छता अभियान का हिस्सा बन रही है बल्कि मानव अधिकार, पर्यावरणीय स्वच्छता, ऊर्जा के गैर पारंपरिक स्रोतों और शिक्षा द्वारा सामाजिक परिवर्तन आदि क्षेत्रों में कार्य करने वाली एक अग्रणी संस्था है। पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित बिन्देश्वर पाठक द्वारा किए गए कार्यों की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है और पुरस्कृत किया गया है।

बिन्देश्वर पाठक जीवन परिचय – BINDESHWAR PATHAK HINDI BIOGRAPHY

जीवन परिचय

डॉ बिन्देश्वर पाठक  का जन्म 2 अप्रैल 1943 को बिहार के वैशाली जिले के एक गांव में  रूढि़वादी ब्राह्णण परिवार में हुआ. डॉ बिन्देश्वर पाठक जी कहते है की मै एक ऐसे बड़े घर में पला बढ़ा जिसमें 9 कमरे थे, पर एक भी शौचालय नहीं था.  मैं सोते हुए या अद्र्धनिद्रा में हर सुबह कुछ आवाजें सुनता था. कोई बाल्टी उठा रहा था, कोई पानी भर रहा था और महिलाएं सूर्योदय से पहले शौच के लिए बाहर जा रही होती थीं. कोई महिला बीमार पड़ जाती तो उसे एक मिट्टी के बर्तन में ही शौच करना पड़ता था. कई महिलाओं के सिर में दर्द रहता क्योंकि उन्हें दिनभर अपने शौच को रोककर रखना पड़ता था. मैंने यह सब देखा है. मैंने उन पुरुषों की झुकी हुई नजरें भी देखी हैं, जो दिन के समय खुले में शौच के लिए बैठे होते थे.

बचपन की कुछ घटनाओ से मिली सुलभ इंटरनेशनल शुरू करने की प्रेरणा

डॉ बिन्देश्वर पाठक से जब पूछा जाता है की एक ब्राह्मण परिवार का लड़का शौचालय जैसे समाज सुधार के क्ष्रेत्र में कैसे आया तो वो कहते है –  ये मेरे बचपन की कुछ घटनाओं से जाना जा सकता है. मेरा जन्म 1943 में बिहार के वैशाली जिले के एक गांव में एक रूढि़वादी ब्राह्णण परिवार में हुआ. जब मैं 6 वर्ष का था तो मैंने एक कथित अस्पृश्य महिला को छू दिया और रूढि़वादी अस्पृश्यता को मानने वाली मेरी दादी ने शुद्ध करने की बात कहकर जबरन मुझे गाय का गोबर और गौ मूत्र पिलाया. उसका कड़वा स्वाद आज भी मेरे मुंह में है. मुझे बाद में समझ आया, यही कहानी भारत के 7,00,000 गांवों और सैकड़ों शहरों की है. मेरी शिक्षा चार स्कूलों में हुई. उनमें से किसी में भी शौचालय नहीं था.

पढाई लिखाई

डॉ बिन्देश्वरी पाठक ने  सन 1964 में समाज शास्त्र में स्नातक की उपाधि ली। उन्हें  1968-69 में बिहार गांधी जन्म शताब्दी समारोह समिति के भंगी मुक्ति विभाग में काम करने का मौका मिला. समिति ने उन्हें  सुरक्षित और सस्ती शौचालय तकनीक विकसित करने और दलितों के सम्मान के लिए काम करने को कहा ताकि उन्हें मुख्य धारा में शामिल किया जाए. एक उच्च जाति के एक पढ़े-लिखे युवक के लिए यह एक गलत कदम माना जाता था. लेकिन इसने उनके व्यक्तित्व में बड़ा बदलाव किया और उनके  जीवन का रुख ही मोड़ दिया. सन 1980 में उन्होने स्नातकोत्तर तथा सन 1984 में पटना विश्वविद्यालय से पीएच डी की उपाधि अर्जित की। उनके शोध-प्रबन्ध का विषय था – बिहार में कम लागत की सफाई-प्रणाली के माध्यम से सफाईकर्मियों की मुक्ति (लिबरेशन ऑफ स्कैवेन्जर्स थ्रू लो कास्ट सेनिटेशन इन बिहार)।  उच्चकोटि के लेखक और वक्ता के रूप में श्री पाठक ने कई पुस्तके भी लिखीं। स्वच्छता और स्वास्थ्य पर आधारित विभिन्न कार्यशालाओं और सम्मेलनों में श्री पाठक  ने अभूतपूर्व योगदान दिया।

बेतिया की दलित बस्ती ने उनके  जीवन को एक नया मोड़ दिया

डॉ बिन्देश्वरी पाठक कहते है – मेरे जीवन में नया मोड़ तब आया, जब मैं बेतिया की दलित बस्ती में तीन महीने के लिए उनके बीच रहने गया. उस समय देश में जाति-प्रथा चरम पर थी. उनके साथ रहते हुए मैंने कई चीजें देखीं, जिन्होंने मेरी आंखें खोल दीं. इस वर्ग की पीड़ा दर्दनाक थी. तब मैंने अपना जीवन स्कैवेंजरों के लिए समर्पित करने की ठान ली. मैंने उस अपमान और तानों को नजरअंदाज किया जो मुझ पर आ रहे थे. अब मेरे सामने सवाल था पश्चिमी देशों में इस्तेमाल हो रही महंगी कलश और सीवर व्यवस्था के विकल्प के रूप में प्रभावी और सस्ती शौचालय व्यवस्था का विकास कैसे किया जाए, ताकि स्कैवेंजिंग प्रथा रोकी जा सके और उन्हें किसी अन्य काम में पुनर्वासित किया जा सके.

Bindeshwar Pathak

मैं कोई इंजीनियर या वैज्ञानिक नहीं था

डॉ बिन्देश्वरी पाठक कहते है – मैं कोई इंजीनियर या वैज्ञानिक नहीं था. इस वजह से शौचालय-प्रणाली का आविष्कार करने के लिए उपयुक्त नहीं था. लेकिन मैंने अपने दिमाग का इस्तेमाल किया, गहन शोध किया और इस विषय पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की किताब की मदद से 1968 में एक टू-पिट पोर-कलश, डिस्पोजल कंपोस्ट शौचालय का आविष्कार किया, जो सरलतापूर्वक स्थानीय वस्तुओं से, कम लागत पर बनाया जा सकता. यह आगे चलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव-अपशिष्ट के निपटान के लिए बेहतरीन वैश्विक तकनीकों में से एक माना गया. पहली बार इसकी सार्थकता दिखाने के लिए मुझे लंबा संघर्ष करना पड़ा. 1973 में मुझे यह अवसर मिला.

शौचालय का प्रयोग  हुआ सफल

शौचालय का प्रयोग सफल हुआ और इसने लोगों का ध्यान आकर्षित किया . श्री पाठक ने 1970 में सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की .  1974 में शहरी क्षेत्रों में ‘भुगतान और उपयोग’ के आधार पर सामुदायिक शौचालयों की अवधारणा विकसित की. इसे सबसे पहले बिहार और फिर पूरे भारत में लोकप्रियता मिली.  स्वच्छता के साथ ही इस संस्था ने दलित बच्चों की शिक्षा के लिए पटना, दिल्ली और अन्य जगहों पर स्कूल खोले जिससे स्कैवेंजिंग और निरक्षरता के उन्मूलन में सहायता मिली. महिलाओं और बच्चों को आर्थिक अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से इस संस्था ने  व्यावसायिक प्रशिक्षण-केंद्रों की स्थापना की. कई सांस्कृतिक भी पहल की: जैसे  जाति-बंधन को तोडऩे के उद्देश्य से स्कैवेंजरों को मंदिरों में ले जाने, उच्च वर्गों और स्कैवेंजरों का एक दूसरे के घर में आने-जाने, अंतरजातीय सम्मेलन और गोष्ठियां आयोजित कीं. इससे जातिवादी मानसिकता में बदलाव आया, सामाजिक बंधन शिथिल हुए और जाति-प्रथा को तोडऩे की प्रक्रिया शुरू हुई.

सुलभ इंटरनेशनल

सुलभ इंटरनेशनल एक सामाजिक सेवा संगठन है जो मुख्यतः मानव अधिकार, पर्यावरणीय स्वच्छता, ऊर्जा के गैर पारंपरिक स्रोतों और शिक्षा द्वारा सामाजिक परिवर्तन आदि क्षेत्रों में कार्य करती है। इस संस्था के 50,000 समर्पित स्वयंसेवक हैं। श्री पाठक ने सुलभ शौचालयों के द्वारा बिना दुर्गंध वाली बायोगैस के प्रयोग की खोज की। इस सुलभ तकनीकि का प्रयोग भारत सहित अनेक विकाशसील राष्ट्रों में बहुतायत से होता है। सुलभ शौचालयों से निकलने वाले अपशिष्ट का खाद के रूप में प्रयोग को भी प्रोत्साहित किया।

Bindeshwar Pathak

सुलभ इण्टरनेशनल सोशल सर्विस आर्गनाइजेशन

1980 आते आते सुलभ भारत ही नहीं विदेशों तक पहुंच गया। सन, 1980 में इस संस्था का नाम सुलभ इण्टरनेशनल सोशल सर्विस आर्गनाइजेशन हो गया। सुलभ को लिए अन्तर्राष्ट्रीय गौरव उस समय प्राप्त हुआ जब संयुक्त राष्ट्र संघ की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद द्वारा सुलभ इण्टरनेशनल को विशेष सलाहकार का दर्जा प्रदान किया गया। श्री पाठकने  राजस्थान के अलवर में भी व्यावसायिक प्रशिक्षण-केंद्र की स्थापना की है. यहां दलित महिलाओं को सिलाई, कढ़ाई और ब्यूटी केयर में प्रशिक्षण दिया जाता है, जो पहले सिर पर मैला ढोने का काम करती थीं.

दिल्ली में की म्युजियम ऑफ ट्वॉयलेट्स नामक संग्रहालय की स्थापना 

2008 में प्रशिक्षण पाने वाली करीब तीन दर्जन महिलाओं को हम न्यूयॉर्क ले गए, ताकि वे संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में फैशन शो में शिरकत कर इंटरनेशनल इयर ऑफ सैनिटेशन में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें. इसके बाद सुलभ ने बायोगैस, जैव-उर्वरक, द्रव और कचरा-प्रबंधन, गरीबी-उन्मूलन के काम में पदार्पण किया.  सुलभ इंटरनेशनल सेंटर फॉर ऐक्शन सोशियोलॉजी, सुलभ इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ एन्वायर्नमेंटल सैनिटेशन और दिल्ली में एक अनोखे संग्रहालय म्युजियम ऑफ ट्वॉयलेट्स की स्थापना की. यह प्राचीनकाल की शौचालयों की विकास की कहानी बताता है. बहरहाल, सुलभ ने देश में जो भी योगदान दिए हैं, वह शौचालयों की संख्या में खो जाते हैं, लेकिन सुलभ का  लक्ष्य सिर्फ शौचालय ही नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव तथा मानवीय विकास है.

पुरस्कार एवं सम्मान

श्री पाठक को भारत सरकार द्वारा 1991 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन् 2003 में श्री पाठक का नाम विश्व के 500 उत्कृष्ट सामाजिक कार्य करने वाले व्यक्तियों की सूची में प्रकाशित किया गया। श्री पाठक को एनर्जी ग्लोब पुरस्कार भी मिला। श्री पाठक को इंदिरा गांधी पुरस्कार, स्टाकहोम वाटर पुरस्कार इत्यादि सहित अनेक पुरस्कारों द्वारा सम्मानित किया गया है। उन्होने पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने के लिये प्रियदर्शिनी पुरस्कार एवं सर्वोत्तम कार्यप्रणाली (बेस्ट प्रक्टिसेस) के लिये दुबई अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त किया है। इसके अलावा सन 2009 में अंतर्राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा संगठन (आईआरईओ) का अक्षय उर्जा पुरस्कार भी प्राप्त किया

चुनौतियाँ 

2019 तक खुले में शौच की परंपरा खत्म करना संभव है, लेकिन चुनौतियां अधिक हैं. सिर्फ राज्य और कॉर्पोरेट घरानों के तालमेल से यह मुमकिन नहीं होगा, जैसा कि प्रधानमंत्री ने संकेत दिया है. इसमें जीवंत लोगों की भागीदारी और सुनियोजित योजनाओं की भी जरूरत है. यदि स्वच्छता को राष्ट्रीय प्रयोजन के तौर पर अपनाने की राजनैतिक इच्छाशक्ति हो और जरूरी पूंजी का इंतजाम हो तथा 50,000 प्रशिक्षित प्रेरकों के साथ मिलकर एक प्रभावी आंदोलन किया जाए तो देश के हर घर में शौचालय उपलब्ध होगा. और तब हम 2019 तक खुले में शौच को अलविदा कह सकेंगे.

BIRTHDAY SPECIAL – जानिए लोकसभा की पहली महिला अध्यक्ष मीरा कुमार के बारे में

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लोकसभा की पहली महिला अध्यक्ष मीरा कुमार

MEIRA KUMAR -मीरा कुमार  

 

अपने पिता स्वर्गीय जगजीवन राम के अधूरे सपने और संकल्प को पूरा करने के लिए भारतीय विदेश सेवा की नौकरी छोड़कर राजनीति में आईं मीरा कुमार स्वभाव से अत्यंत सौम्य, मृदुभाषी और मिलनसार हैं।राजीतिक पृष्ठभूमि वाली  मीरा कुमार को गुस्सा नहीं आता है। गुस्से में भी वह नहीं चीखती हैं। सौम्य हैं। हंसमुख हैं। पढ़ाकू भी हैं। मीरा कुमार अब तक पांच बार सांसद बन चुकी हैं वर्ष 2017 में मीरा कुमार को यूपीए द्वारा अपना राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया गया पर वो रामनाथ कोविंद से हार गयी 

 

प्रारंभिक जीवन 

मीरा कुमार का जन्म 31 मार्च, 1945 को बाबू जगजीवन राम और इन्द्राणी देवी के यहाँ सासाराम बिहार में हुआ था मीरा कुमार की प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के महारानी गायत्री देवी स्कूल में हुई। मीरा कुमार ने दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ और मिरांडा हाउस कॉलेजों से एम ए और एल एल बी तक शिक्षा ग्रहण की। वर्ष 1973 में वह भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के लिए चुनी गईं। कुछ वर्षो तक स्पेन, ब्रिटेन और मॉरीशस में उच्चायुक्त रहीं लेकिन उन्हें अफसरशाही रास नहीं आई और उन्होंने राजनीति में कदम बढ़ाने का फैसला किया। मीरा कुमार अंग्रेजी, स्‍‍पेनिश, हिंदी, संस्कृत, भोजपुरी भाषाओ में निपुण है। मीरा कुमार वर्ष 1968 में बिहार की पहली महिला कैबिनेट मंत्री सुमित्रा देवी के बड़े पुत्र मंजुल कुमार से परिणय सूत्र में बंधी।मीरा कुमार के एक पुत्र (अंशुल) एवं दो पुत्रियाँ (स्‍‍वाति और देवांगना) हैं।

राजनीतिक सफर –

मीरा कुमार ने अपना राजनीतिक सफर की शुरुआत उत्तर प्रदेश से किया। भारतीय राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित करने वाले बाबू जगजीवन राम के घर में पली-बढ़ी मीरा कुमार कांग्रेस के टिकट पर पहली बार 1985 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर लोकसभा क्षेत्र से उप चुनाव लड़ी और तब उन्होंने मायावती और रामविलास पासवान को पराजित कर राजनीति में धमाकेदार शुरुआत की ।हालांकि इसके बाद हुए चुनाव में वह बिजनौर से पराजित हुई। इसके बाद उन्होंने अपना क्षेत्र बदला और 11 वीं तथा 12 वीं लोकसभा के चुनाव में वह दिल्ली के करोलबाग संसदीय क्षेत्र से विजयी होकर फिर संसद पहुंचीं।

कांग्रेस कमेटी का महासचिव पद भी संभाला

मीरा कुमार पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के प्रयास से 1990 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव बनीं। 1996 में वे दूसरी बार सांसद बनीं और तीसरी पारी उन्होंने 1998 में शुरु की। 2004 में बिहार के सासाराम से लोक सभा सीट जीती। उस समय इन्हें पहली बार केन्द्र में मंत्री पद भी प्राप्त हुआ और सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया।

राजग की हवा में भी सासाराम सीट को बरकरार रखा

15 वीं लोकसभा चुनाव में बिहार में जहां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की हवा बह रही थी, उसमें भी मीरा कुमार ने सासाराम सीट को बरकरार रखा तथा अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी मुनिलाल को 45 हजार से ज्यादा मतों से पराजित किया। फलस्वरूप केन्द्र में उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा देते हुए जल संसाधन मंत्रालय सौंपा गया था।

पहली महिला स्पीकर

संसद के स्पीकर पद पर पहुंचने वाली वे पहली महिला हैं। वह भी दलित। इक्कीसवीं सदी में दुनिया के 187 मौजूदा लोकतांत्रिक देशों में से केवल 32 देशों में ही महिलाएं इस पद तक पहुंचने में सफल हो पाई हैं । आस्ट्रिया दुनिया का पहला देश है, जहां किसी महिला को संसद का स्पीकर चुना गया। द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले आस्ट्रियाई संसद बंदुेस्रात में पहली बार महिला स्पीकर पद पर आसीन हुई थी।

MIERA KUMAR BIHAR

प्रिय पुस्तक अभिज्ञान शांकुतलम्

मीरा कुमार कहती है कि मैं हमेशा कुछ न कुछ पढ़ती रहती हूं और मेरी प्रिय पुस्तक महाकवि कालिदास की अभिज्ञान शांकुतलम् है। पहली बार इस सदन की सदस्य बनने पर मैं पीछे की बेंच पर बैठा करती थी। जब मैं स्कूल की छात्रा थी, तब कई बार दर्शक दीर्घा से मैंने लोकसभा की कार्यवाही को देखा । उस समय स्वतंत्रता संग्राम के पुरोधा इस सदन में बैठकर देश के लोगों के हित में फैसले लेते थे। खासकर दलितों, वंचितों और कमजोर तथा हाशिए पर खड़े लोगों के लिए वह बड़ी मशक्कत करते थे।

कला और साहित्य से  विशेष लगाव 

भारतीय इतिहास में विशेष रुचि रखने वाली मीरा कुमार को कला और साहित्य से भी विशेष लगाव है।उन्हें देश-विदेश की ऐतिहासिक इमारतों का भ्रमण करने का भी शौक है। विदेश सेवा में कार्यरत होने के कारण बड़े पैमाने पर उन्होंने विदेश यात्राएं की हैं। हस्तशिल्प प्रेमी होने के अलावा मीरा कुमार एक अच्छी कवियित्री भी हैं. वह अपना खाली समय किताबें पढ़ने और शास्त्रीय संगीत सुनने में व्यतीत करती हैं। उनकी लिखी कई कविताएं प्रकाशित भी हुई हैं।

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जानिए विश्व की सबसे मीठी और अपनेपन वाली बोली भोजपुरी के बारे में

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नमस्कार दोस्तों , रउआ सब लोग के हमार ब्लॉग में स्वागत बा . हम इ ब्लॉग पर लेकर आइला कुछ प्रेरणादायक अउर कुछ रोचक जानकारी से भरल पोस्ट . का भईल रउआ सबके समझ में ना आईल . लेकिन अगर हम गायेंगे – ” कवन दिशा में लेके चला रे बटोहिया ” . तो आप लोग कहेंगे – अरे ये तो भोजपुरी है . जी हां आज हम भोजपुरी भाषा के बारे में बात करेंगे जिसे कई विद्वान  दुनिया की सबसे मीठी बोली मानते है . यह एकमात्र ऐसी बोली है जो दुनिया के कई देशो में बोली जाती है .

भोजपुरी भाषा की सबसे बड़ी खासियत यह है की जो इसे समझते है उनको तो मज़ा आता ही है पर जिसे समझ में नहीं आता है वो भी इसके मिठास से दूर नहीं रह पाते  है

भोजपुरी भाषा का उद्गम और विकास

भोजपुरी भाषा का नामकरण बिहार राज्य के आरा (शाहाबाद ) जिले में स्थित भोजपुर नामक गाँव के आधार पर हुआ है . पहले आरा और बक्सर जिला एक ही में थे जिसे भोजपुर के नाम से जाना जाता था . मध्य काल में मध्य प्रदेश के उज्जैन से भोजवंशी परमार राजा आकर आरा में बस गए. उन्होंने अपनी इस राजधानी को अपने पूर्वज राजा भोज के नाम पर रखा था. इसी वजह से यहां बोले जाने वाली भाषा का नाम “भोजपुरी” पड़ गया.

भोजपुरी भाषा का इतिहास सातवीं सदी से प्रारंभ होता है। भोजपुरी साहित्यकारों की मानें तो सातवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के समय के संस्कृत कवि बाणभट्ट के विवरणों में ईसानचंद्र और बेनीभारत का उल्लेख है जो भोजपुरी कवि थे। नवीं शताब्दी में पूरन भगत ने भोजपुरी साहित्य को आगे बढ़ाने का काम किया। नाथसंप्रदाय के गुरु गोरखनाथ ने सैकड़ों वर्ष पहले गोरख बानी लिखा था। बाबा किनाराम और भीखमराम की रचना में भी भोजपुरी की झलक मिलती है।

भोजपुरी भाषा के शेक्सपियर -भिखारी ठाकुर

भोजपुरी भाषा का जिक्र हो और भिखारी ठाकुर की बात न हो ये भी भला हो सकता है . 18 दिसंबर 1887 को छपरा के कुतुबपुर दियारा गांव में एक निम्नवर्गीय नाई परिवार में जन्म लेने वाले भिखारी ठाकुर ने विमुख होती भोजपुरी संस्कृति को नया जीवन दिया। भिखारी ठाकुर ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे, उसके बावजूद उन्होंने कई कृतियों की रचना की। उनके द्वारा रचित नाटक बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी-बेचवा बेटी-बियोग, बिदेसिया की प्यारी सुंदरी, नशाखोर पति आदि आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितना पहले हुआ करते थे।

हिंदी की एक छोटी बहन है भोजपुरी

भोजपुरी एक आर्य भाषा है जो बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में प्रमुखता से बोली जाती है . आधिकारिक और व्यवहारिक रूप से भोजपुरी हिन्दी की एक उपभाषा या बोली है। भोजपुरी अपने शब्दावली के लिये मुख्यतः संस्कृत एवं हिन्दी पर निर्भर है कुछ शब्द इसने उर्दू से भी ग्रहण किये हैं। भोजपुरी बहुत ही सुंदर, सरस, तथा मधुर भाषा है। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश के सभी हिस्सों में भोजपुरी बोलने वाले मिल जाएंगे. बिहार की तिन बोलिया भोजपुरी ,मगही और मथिली में विस्तार क्षेत्र के हिसाब से भोजपुरी को सबसे उच्च स्थान प्राप्त है .

विश्व के आठ देशो में है इस भाषा का विस्तार

भोजपुरी का विस्तार न सिर्फ भारत में बल्कि विश्व के कई महाद्वीपों तक है . आपको यह जानकर थोडा आश्चर्य जरुर होगा की विश्व में करीब 8 देश ऐसे हैं, जहां भोजपुरी धड़ल्ले से बोली जाती है और सुनी भी जाती है . भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, फिजी, मॉरिशस, अमेरिका, त्रिनिनाद और टोबैगो तथा सुरीनाम आदि देशो में भोजपुरी भाषा बोली जाती है . परिस्थितियों के कारण बिहार के लोगों को अन्य देशों में जाना पड़ा. ऐसे में वे वहीं के हो गए, मगर अपनी बोली को अपने साथ सदैव बनाए रखा. भोजपुरी बोलने वालो की  जनसंख्या 20 करोड़ से भी ज्यादा है । ये लोग भारत ही नहीं बल्कि विश्व के विभिन्न हिस्सों मे अपना विशेष प्रभाव भी रखते हैं । संख्या के हिसाब से भोजपुरी विश्व की 10वीं सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है.

‘एक मारिशस की हिन्दी यात्रा’

मारिशस के हिन्दी विद्वान सोमदत्त बखोरी ने अपनी पुस्तक ‘एक मारिशस की हिन्दी यात्रा’ मे लिखते हैं कि भोजपुरी केवल घर कि भाषा नहीं थी ,ये सारे गाँव कि भाषा थी . भोजपुरी के दम पर लोग हिन्दी समझ लेते थे और हिन्दी सीखना चाहते थे . वह सहायक सिद्ध होती थी . मॉरीशस ने जून, 2011 में ही भोजपुरी भाषा को संवैधानिक मान्यता दे दी थी. भोजपुरी की लोकप्रियता की मिठास का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि संगम नगरी मे मारिशस से आयी एक विदुषी ने कहा था कि भोजपुरी की मिठास की प्रगाढ़ता ही है कि उसने मारिशस जैसे टापू को भी स्वर्ग बना दिया . आज हम निःसंकोच कह सकते हैं कि इस देश मे बहुत जगह हिन्दी फली फुली है तो भोजपुरी के प्रतापों से.

भोजपुरी भाषा को राष्ट्रिय दर्जा नहीं पाने का नुकसान

भोजपुरी भाषाभाषियों की संख्या भारत की समृद्ध भाषाओं- बँगला, गुजराती और मराठी आदि बोलनेवालों से कम नहीं है। फिर भी अभी तक इस भाषा को संविधान की आठवी अनुसूची में नहीं शामिल किया जा सका है . अपने देश में संवैधानिक दर्जा नहीं मिल पाने के कारण भोजपुरिया लोगो को बहुत सारी सुख सुविधाओ से वंचित रखा जाता है . भोजपुरी रचनाओ को साहित्य पुरस्कार ,फिल्मों को राष्ट्रीय अवार्ड,भोजपुरी लेखकों को राष्ट्रीय पुरस्कारों की श्रेणी से बाहर रखा जाता है . संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओ में भोजपुरी को परीक्षा का आधार नहीं बनाया जा सकता . इस भाषा और साहित्य के विकास के लिए सर्कार से आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं की जा सकती . भोजपुरी फिल्मे देश के राष्ट्रिय चैनल दूरदर्शन पर नहीं दिखाई जा सकती है . जो की भोजपुरी के 20 करोड़ जनमानस के साथ अन्याय है ।

“ना बोलला के मतलब इनकार ना होखेला,
हर नाकामयाबी के मतलब हार ना होखेला,
का होगइल भोजपुरी के भाषिक दर्जा ना मिलल त,
खाली दर्जा पावल ही भाषा से प्यार ना होखेला”

भोजपुरी और हिन्दुस्तान

भारत में राष्ट्रीय भाषा हिन्दी के बाद सबसे ज्यादा बोले जाने वाली बोलियों मे भोजपुरी है। समय समय पर इसको भाषा बनाने की मांग उठती रही है ।1969 से ही अलग-अलग समय पर सत्ता में आई सरकारों ने भोजपुरी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का आश्वासन दिया था। लेकिन दशकों गुजर जाने के बाद भी भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है। इसके लिए विभिन्न आंदोलन भी हुये लेकिन ये आंदोलन तुच्छ राजनीति का शिकार हो गए। अगर भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाता है तो निसंदेह उसके सुखद परिणाम होंगे। एक तो भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा हासिल हो जाएगा और दूसरे, भोजपुरी भाषा से जुड़ी ढेरों संस्थाएं अस्तित्व में आएंगी जिससे क्षेत्रीय भाषा का विकास होगा और साथ ही कला, साहित्य और विज्ञान को समझने-संवारने में मदद मिलेगी। संवैधानिक दर्जा मिलने से भोजपुरी भाषा की पढ़ाई के लिए बड़े पैमाने पर विश्वविद्यालय, कालेज और स्कूल खुलेंगे जिससे कि रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि होगी।

अंतर्राष्ट्रीय होती भोजपुरी

हिन्दुस्तान में भोजपुरी महज एक बोली नहीं, बल्कि एक इंडस्ट्री है. व्यवसाय, मनोरंजन और साहित्य में भोजपुरी ने पूरे हिन्दुस्तान में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है. ये भोजपुरी बाज़ार का ही आकर्षण है कि अब यहाँ पर चैनल भी आने लगे हैं . महुआ चैनल की सफलता एवं लोकप्रियता के बाद अनेक भोजपुरी चैनल आ गए हैं । जिसमे गंगा,हमार टीवी जैसे चैनल प्रमुख हैं । भोजपुरी को इंटरनेट फ्रेंडली बनाने का भी प्रयास किया जा रहा है । बीएचयू के भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान व भोजपुरी अध्ययन केंद्र मिलकर इंटरनेट फ्रेंडली बनाने मे जुटे हैं। खबरिया पत्रकारों मे भी बड़े नाम हैं रवीश कुमार,पुण्य प्रसून,उर्मिलेश जैसे पत्रकार भी भोजपुरी भाषी हैं जो आज हिन्दी पत्रकारिता की रीढ़ बन चुके हैं ।आज भोजपुरी सिनेमा करीब 20,000 करोड़ रुपये की हो गई है. टीवी के 52 चैनल सिर्फ़ भोजपुरी के ही हैं. इस आधार पर हम कह सकते हैं कि भोजपुरी के बिना हिन्दुस्तानी बोली की कल्पना ही नहीं की जा सकती है.

कुछ अफ़सोस भी है

जितना ज्यादा विकास भोजपुरी भाषा का हुआ है उतना विकास किसी भाषा का नहीं हुआ है . बहुत सारी हिंदी फिल्मो में भोजपुरी भाषा या भोजपुरी भाषा से जुड़े किसी पात्र को जगह दी जा रही है ताकि फिल्म को मजेदार बनाया जा सके . टेलीविजन जगत में भी भोजपुरी का बोलबाला हो गया है . चाहे वो निमकी मुखिया का कैरक्टर हो या भाभीजी घर पर है की अंगूरी भाभी का . सभी जगह इनकी चुलबुली और मीठी  भोजपुरी भाषा को पसंद किया जा रहा है  . लेकिन बहुत सारे लोग फिल्मो में भोजपुरी बोलने वालो को अनपढ़ , गवार या गुंडा दिखाते है . जबकि ऐसा नहीं है . बिहार के बाहर अगर किसी से भोजपुरी में बोल दिया जाए तो वो ऐसे देखने लगता है जैसे हम किसी दुसरे ग्रह से आये है . भोजपुरी भाषा की सबसे बड़ी दुश्मन भोजपुरी इंडस्ट्री बन चुकी है. आज कल भोजपुरी गानों के नाम पर केवल फूहड़ता परोसी जा रही है. और इनकी कमाई भी काफी हो रही है . मै भोजपुरी इंडस्ट्री से जुड़े सभी लोगो से हाथ जोड़कर निवेदन करना चाहता हु की पैसे के कारण भोजपुरी भाषा को अश्लील मत बनाईये . अगर आपको भोजपुरी भाषा और बिहार से प्यार है तो अच्छे गाने बनाये जिसे परिवार के सभी सदस्य सुन सके . जो भी भोजपुरी भाषा के नाम पर अश्लील सामग्री प्रस्तुत कर रहे है हमें उनका विरोध करना होगा तभी हम अपनी भोजपुरी भाषा को वो सम्मान दिला पाएंगे जिसकी वो अधिकारी है

नीतीश ने भरोसा जताया तो इस IAS ने बदल दी पुरे बिहार की तस्वीर

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दोस्तों आज हम बताने जा रहे है बिहार के एक ऐसे लाल की जिन्हें जिस काम की अपेक्षा की जाती है, वे उसे पूरा कर दिखाते हैं.  वे बिना थके अपेक्षाओं से भी आगे बढ़कर अपने काम को अंजाम देते हैं.अपनी लगन, निष्ठा और साहस के साथ वे इस बात की मिसाल हैं कि नौकरशाह को जनसेवा के प्रति कितना समर्पित होना चाहिए. बिहार में सड़कों और बिजली  की सूरत बदलने का श्रेय इन्हे ही जाता है . जी हा हम बात कर रहे है  नागरिक प्रशासन के लिए प्रधानमंत्री का एक्सलेंस अवार्ड से सम्मानित  1991 बैच के आइएएस ऑफिसर अमृत प्रत्यय की 

Meet Pratyaya Amrit, the Inspiring IAS Officer Who Has Placed Bihar Firmly on the Road to Success

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टूटी हुई कुर्सियां ,दिवारों में सीलन,और फटे हुए परदे ; हम  कोई कबाड़ खाने की तस्वीर बयां नहीं कर रहे बल्कि कुछ सालो पहले  बिहार राज्य पुल निर्माण निगम (BRPNN) के दफ्तर का ऐसा ही हाल था. वर्ष 2006 में इसकी हालत बहुत खराब थी। राज्य सरकार तक ने इसे बंद करने का मन बना लिया था .इसी दफ्तर में बैठकर बिहार को रफ्तार देने की जिम्मेदारी थमाते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने IAS अधिकारी प्रत्यय अमृत तो बिहार राज्य पुल निर्माण निगम BRPNN का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया था.

साल 2006 में जब प्रत्यय अमृत ने जिम्मेदारी संभाली थी तब BRPNN के खाते में महज 47 करोड़ रूपय थे.  लेकिन IAS प्रत्यय अमृत ने महज दो साल में वो कारनामा कर दिखाया जिसे देख कर सरकार भी हैरान थी. कल तक आर्थिक तंगी से परेशान BRPNN दो साल के भीतर ही कोसी बाढ़ के दौरान मुख्यमंत्री राहत कोष के लिए 20 करोड़ रुपये दान करने की स्थिति में था. प्रत्यय अमृत ने अपने दम पर ना सिर्फ दिवालिया हो चुके एक उपक्रम को चलाया बल्कि उसे इतना आगे ले गए की  जुलाई 2009 में बिहार राज्य पुल निगम, आइएसओ 9001:2000 और 1410:2004 प्रमाणित कंपनी बन गई . जहां एक ओर बिहार में 30 साल में 300 पुल बने थे वहीं प्रत्यय अमृत के निर्देशन में  महज तीन साल में 314 पुलों का निर्माण हो गया।

प्रत्यय अमृत जीवन परिचय – PRATYAYA AMRIT HINDI BIOGRAPHY

पढाई लिखाई 

प्रत्यय अमृत गोपालगंज जिला के  हथुआ सब डिविजन के भरतपुरा गांव का निवासी है . उनके पिताजी  बीएनमंडल यूनिवर्सिटी के वॉयस चांसलर थे. उनकी मां भी प्रोफेसर थीं. उनकी  पढ़ाई लिखाई  मुजफ्फरपुर से शुरू हुई. 10वीं आसनसोल से हुई. दिल्ली से बारहवीं और हिंदू कॉलेज से बीए व एमए किया. उन्होंने  हिस्ट्री से ऑनर्स किया था. पोस्ट ग्रेजुएशन के अगले ही दिन उन्हें  वैंकटेश्वर कॉलेज में लेक्चररशिप का जॉब मिल गया था. कुछ महीनों तक उन्होंने  वहां भी पढ़ाया है. उसके बाद 1990 में आइपीएस और 1991 में आइएएस बने .

प्रत्यय अमृत की बहन भी आइएएस है

प्रत्यय अमृत कहते है की अन्य घरों की तरह ही उनके घर का भी माहौल था. शुरुआत से ही उनको माता-पिता का गाइडलाइन मिला है. उन दिनों लोग अपने बच्चों को हॉस्टल में रख कर नहीं पढ़ाते थे. हमारी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद हमारे पैरेंट्स ने हम भाई-बहनों को हॉस्टल में रख कर पढ़ाया. हम तीनों भाई-बहन सोचते थे कि जिस कठिनाई में रख कर पैरेंट्स हमें पढ़ा रहे हैं, ऐसे में हमें कुछ कर दिखाना चाहिए. उसके बाद हम लोग परिश्रम करते रहे. माता-पिता का आशीर्वाद रहा. हम आइएएस बने. हम सबने पढ़ाई की एक स्ट्रेटजी तैयार की थी. मैं हमेशा ग्रुप स्टडी को पसंद करता हूं. ध्यान रख कर लाइट माइंड के दोस्तों के साथ ऐसा ग्रुप बनायें. प्रत्यय अमृत की बहन भी आइएएस है.

 

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एक फोन ने बदल दी बिहार की किस्मत

आपने अक्सर सुना होगा की एक फोन ने किसी शख्स की किस्मत बदल दी. लेकिन ऐसा पहली बार हुआ जब एक फोन ने पुरे राज्य की किस्मत बदल दी हो. 1991 बैच के अधिकारी प्रत्यय अमृत उस समय दिल्ली में डेपुटेसन पर थे. तभी बिहार के एक अधिकारी ने उन्हे फोन कर पूछा कि क्या वो बिहार आना चाहते हैं. बिहार में उन्हें एक मृत पड़ी संस्थान बिहार राज्य पुल निर्माण निगम को चलाने की जिम्मेदारी दी जा रही थी, लेकिनबिहारी होने के कारण  बिहार प्रेम उन्हें वापस बिहार खींच लाया. फिर क्या था एक बिहारी ने जो कर के दिखाया वो आज सबके सामने है

मुश्किल था काम को अंजाम देना

ऐसा नहीं है की प्रत्यय अमृत ने ये सब बड़ी आसानी से कर दिखाया बल्कि उन्हें अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा. प्रत्यय अमृत ने जब काम संभाला था तब विभाग के कर्मचारियों का मनोबल टूट चुका था. प्रत्यय अमृत के पास पेंडिंग पड़ी योजनाओं की एक लंबी सूची थी. जिसमें से कुछ तो 17 साल से लंबित पड़े प्रोजेक्ट थे. पिछले एक दशक में जिस विभाग को चूस कर खोखला बना दिया गया था उसी विभाग को चमकाकर प्रत्यय अमृत ने बिहार को रफ्तार देने का काम किया.  बिहार राज्य पुल निर्माण निगम के प्रबंध निदेशक (BRPNN) के रूप में, उन्होंने तीन साल में लगभग 300 प्रमुख पुल परियोजनाओं के पूरा होने का निरीक्षण किया था. ऐसे माहोल में जहां एक ईंट लगाना भी मुश्किल था वहां 300 पुल का काम पूरा करवाना किसी पहाड़ को हिलाने से कम नहीं था.

कर्मचारियों को किया प्रोत्साहित 

प्रत्यय का मानना है कि कर्मचारियों को काम करने के लिए बेहतर सुविधा और माहौल जरुर मुहैया करानी चाहिए, तभी आप अधिक से अधिक परिणाम पा सकते हैं। प्रत्यय ने चुनौती को समझते हुए सबसे पहले अपनी टीम को मजबूत करने की ठानी. उन्होंने अपनी टीम के अधिकारियों और इंजीनियरों को  आउट-ऑफ-द-बॉक्स समाधान निकालने की छूट दी. जब अधिकारियों को काम करने की आजादी मिली तो किसी ने अपने बॉस को निराश नहीं किय़ा. हलांकी तारीफ टीम लीडर की भी करनी होगी क्योंकि जब जब उन्हें लगा की टीम ने कोई बड़ा काम किया है तब-तब उन्होंने अपनी टीम को सम्मानित भी किया. इंजीनियरों और कर्मचारियों में जो विश्वास प्रत्यय अमृत ने दिखाया उसका ही परिणाम था कि BRPNN आज इतनी बहतर स्थिति में है .

बना दिया रिकार्ड

BRPNN ने अपने स्थापना के तीस सालों में जहां सिर्फ 314 पुल बनाए थे वहीं 2006 में प्रत्यय अमृत के आने के बाद सिर्फ तीन साल में ही 336 पुल बनाकर ऐसा रिकार्ड बना दिया जिससे सभी लोग आश्चर्यचकित हो उठे . तीन साल में बने इसी 336 पुल की बदौलत ही  नीतीश कुमार ने पूरे बिहार में सड़कों का जाल बिछाया. जिससे बिहार की पुरानी तस्वीर बदल गई. IAS अधिकारी प्रत्यय अमृत को जब BRPNN का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया था उस वक्त विभाग के खाते में महज 47 करोड़ रूपय थे. लेकिन आज विभाग का कारोबार 768 करोड़ तक पहुंच गया है.जो संस्था बंद होने के कगार पर थी, उसने कोशी बाढ़ पीड़ितों के लिए 20 करोड़ रुपए की मदद दी.ये प्रत्यय अमृत के प्रयासों का ही परिणाम था कि जुलाई 2009 में बिहार राज्य पुल निगम, आइएसओ 9001:2000 और 1410:2004 प्रमाणित कंपनी बन गई। हलांकि इस काम के लिए उन्हें मेहनत भी बहुत करनी पड़ी है. जानकारों की माने तो अमृत ने इस काम को अंजाम तक पहुंचाने के लिए 40 हज़ार किलोमीटर कर का सफर किया.

इनके काम से आम जनता भी रहती है खुश 

प्रत्यय अमृत के काम को जनता ने हमेशा सराहा है। जब ये कटिहार के जिलाधिकारी थे, पहली बार सरकारी और प्राइवेट संस्थाओं को जिला अस्पताल से मिलकर काम करने के लिए कहा। इसी तरह प्रत्यय अमृत जब छपरा के जिलाधिकारी थे तो पहली बार एशिया के सबसे बड़े पशु मेला सोनपुर में सीसीटीवी कैमरा को लगवाया, जो सुरक्षा के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण कदम था। वर्ष 2011 में प्रत्यय अमृत को बिहार स्टेट रोड डेवलपमेंट कारपोरेशन का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया। मैनेजिंग डायेरेक्टर के तौर पर प्रत्यय अमृत ने निर्णय लिया कि संस्था के फंड का कुछ हिस्सा, आर्थिक रुप से पिछड़ी लड़कियों के पढ़ाई और उनको आत्मनिर्भर बनाने पर खर्च किया जाए। प्रत्यय अमृत को 2011 में पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के लिए प्रधानमंत्री एक्सिलेंस अवार्ड भी मिल चुका है।

 

 

हर मुश्किल को आसान बनाने वाले कुशल प्रशासक हैं ऑफिसर अमृत प्रत्यय

यह जुलाई माह का एक दिन था. राजधानी पटना में दीघा-एम्स की सड़क के निर्माण में लगी कंपनी की गड्ढ़ा खोदने वाली भीमकाय मशीन अर्थमूवर ने गलती से बिजली के मोटे-मोटे केबल तारों को क्षतिग्रस्त कर दिया. इन केबलों के जरिए 220/132/33 केवी के खगौल ग्रिड सब-स्टेशन से दीघा ग्रिड को बिजली पहुंचाई जाती है. बिजली की यह लाइन पश्चिमी पटना के 2,00,000 से ज्यादा उपभोक्ताओं को बिजली की आपूर्ति करती है. केबलों के टूटने से पूरा पश्चिमी पटना अंधेरे में डूब गया. 132 केवी का खगौल केबल 2 दिसंबर, 2013 और 30 मार्च, 2014 को दो बार टूट चुका था. दोनों ही बार केबल की मरम्मत करने में हफ्ते भर से ज्यादा समय लगा था.

सात दिन की जगह मात्र 36 घंटे के भीतर बिजली बहाल करवाई 

लेकिन 1991 बैच के आइएएस अधिकारी प्रत्यय अमृत को जिन्होंने एक माह पहले ही ऊर्जा सचिव का कार्यभार संभाला था, को पिछले रिकॉर्डों से कुछ भी लेना-देना नहीं था. उन्होंने विशेषज्ञों और आधुनिक केबलों को जोडऩे वाले उपकरणों का इंतजार करने की जगह कोई नया उपाय आजमाने का फैसला किया. वे इस कोशिश में कामयाब भी रहे और महज 36 घंटे के भीतर बिजली बहाल हो गई. उस वक्त तक मध्य प्रदेश के सतना से केबल विशेषज्ञ पहुंच भी नहीं पाए थे. उन्होंने यह सब कैसे किया. अपने इंजीनियरों के साथ सोच-विचार करने के बाद अमृत ने इंजीनियरों से कहा कि वे दीघा ग्रिड को बिजली की सप्लाई करने के लिए क्षतिग्रस्त केबल से एक अस्थायी लाइन स्थापित करें.

मुश्किल समस्या को बड़ी आसानी से किया हल 

जमीन खोदने वाली मशीन अर्थमूवर ने केबल को क्षतिग्रस्त कर दिया था, लेकिन बारीकी से जांच करने पर पाया गया कि एक सर्किट के दो केबल और दूसरे सर्किट का एक केबल अब भी सही-सलामत था. अमृत ने इंजीनियरों से कहा कि वे इन्हीं तीन केबलों से एक वैकल्पिक सर्किट बनाएं और दीघा ग्रिड को दी जाने वाली बिजली बहाल करें. यह काफी मुश्किल और खतरनाक काम था. यह प्रयोग अगर असफल रहता तो स्थिति और भी बिगड़ सकती थी. लेकिन उनकी कोशिश काम कर गई. वहीं दूसरी ओर केबल मरम्मत के लिए सात दिन का जो अनुमान लगाया गया था, वह सही साबित हुआ. केबल की मरम्मत का काम पूरा होने के लिए आठ केबल-ज्वाइंट किट की जरूरत होती है, जिन्हें स्वीडन से मंगाना पड़ा और वे तीन दिन बाद ही पटना पहुंच पाए. केबल की मरम्मत करने में हफ्ते भर से ज्यादा समय लग गया. पर उपभोक्ताओं को मुसीबत नहीं झेलनी पड़ी, क्योंकि अमृत की कोशिशों से तैयार वैकल्पिक सर्किट से उन्हें बराबर बिजली मिलती रही.

कबाड़’ की चीजों का किया ‘जुगाड़’ तो बन गया पटना का ‘एनर्जी कैफे’

एनर्जी कैफे को बिहार के विद्युत विभाग के मुख्यालय में बनाया गया है। इस कैफे का बनाने के लिए बिजली विभाग के सारे खराब और कबाड़ सामान का दोबारा इस्तेमाल किया गया है यहां तक की यहां  के फर्नीचर  तक  पुराने कबाड़ से बने और एनर्जी कैफे नाम दिया गया है। आपको बता दें कि इस कैफे को बनाने का आइडिया बिहार के आईएएस और बिजली विभाग के सीएमडी  रहें प्रत्यय अमृत का था।  इस कैफे को प्रोफेशनल आर्टिस्ट मंजीत और नेहा सिंह ने डिजाइन किया है ।

दोनो लोगो को प्रत्यय ने टाॅस्क दिया था कि यहां पर जितनी भी  चीजें है कबाड़ की उन्हें फिर से इस्तेमाल करके उन्हें आकर्षक बनाना है। दोनाे ने मिलकर पुराने ड्रम को काटकर कुर्सी का रूप तो क्वायल लपेटने वाले लकड़ी के मोटे गठ्ठर को सेंटर टेबल बना डाला। दोनों ने बताया कि कबाड़ को फिर से आकर्षक बनाना बहुत मुश्किल था लेकिन हमनें चीजो को नया रूप दे ही दिया । इलेकिट्रक पैनल्स को कुर्सी और टेबल बनाया तो इंसुलेटर भी काम आ गया।दोनो ने आॅयल ड्रम को बैठने का टूल तैयार किया और इंसुलेटर से डस्टबिन इसके अलावा बिजली के तारो से मार्डन आर्ट बनाये।  मीनू का बनाने के लिए दीवाल घड़ी के साथ लकड़ी के पुराने टुकड़े का इस्तेमाल किया।

कैफे का एक सोफा लोगों को अपनी तरफ खास आकर्षित करता है। दरअसल एक पुरानी एंबेसेडर कार को आधा काट कर उसे सोफा में बदला गया है और उसमें गद्दे लगाये गये हैं।

फेम इंडिया मैगजीन-एशिया पोस्ट सर्वे में मिला प्रमुख स्थान 

स्वभाव से बहुत सरल प्रत्यय अमृत कभी भी हार न मानने वाले व्यक्ति हैं। उनका मानना है कि किसी भी काम को टालना नहीं चाहिए, उसे तुरंत करना चाहिए। यही जीवन में सफलता की कूंजी है। फेम इंडिया मैगजीन-एशिया पोस्ट सर्वे के ‘असरदार आईएएस 2018’ के सर्वे में विभिन्न पैरामीटर में की गई रेटिंग में प्रत्यय अमृत को प्रमुख स्थान पर पाया है।

बिहार दिवस की शुभकामनाये || Happy Bihar Diwas Quotes , Images

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happy bihar diwas quotes

HAPPY BIHAR DIWAS -QUOTES, IMAGES

आज बिहार को अलग हुए पूरे 106 साल हो गये हैं. लोग उत्साह और जोश में डूबे हैं. ब्रिटिश शासन में बिहार बंगाल प्रांत का हिस्सा था, जिसके शासन की बागडोर कलकत्ता में थी. हालांकि इस दौरान पूरी तरह से बंगाल का दबदबा रहा लेकिन इसके बावजूद बिहार से कुछ ऐसे नाम निकले, जिन्होंने राज्य और देश के गौरव के रूप में अपनी पहचान बनाई.
1912 में बंगाल प्रांत से अलग होने के बाद बिहार और उड़ीसा एक समवेत राज्य बन गए, जिसके बाद भारतीय सरकार के अधिनियम, 1935 के तहत बिहार और उड़ीसा को अलग-अलग राज्य बना दिया गया.

 

हम लेकर आये है बिहार दिवस की शुभकामनाओ के कुछ कोट्स ,लाइन , शायरी और इमेज जिन्हें पढ़ कर आपको जरुर अच्छा लगेगा 

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जहवाँ के लड़कन न माने हार।।
वही तो है अपना बिहार।।।

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ऐ बिहार, तू बेमिसाल
तुझ से हैं हम तुझमें मगन! 
हरियाली तेरे कदम चूमती, बहती पावन पवित्र गंगा, सीमा पर तुझको घेरे है
अवध झारखंड और बंगा, देकर कुर्बानी प्राणों की, 
सचिवालय पर लहरा दिया तिरंगा
आओ संभालें इसका चैन औ’ अमन
शत शत नमन तुझे शत शत नमन| हार्दिक शुभकामनाएं.

 #BiharDiwas

happy bihar diwas quotes

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Being a bihari myself feel proud ,not even single corner of the world has left where bihari toiling hard.
salute to motherland who produced numerous IAS ,IPS , engineer .

#BiharDiwas

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विश्व को लोकतंत्र की राह दिखाने वाले ज्ञान व संस्कृति की भूमी बिहार की समस्त जनता को बिहार दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ!

#BiharDiwas

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Bihar diwas,the day to rememorise the contribution of bihar in country building,the place of budhha,Great Ashoka,Mahavir,Nalanda &Vikramshila unv,Maghadh(the center of politics),Aryabhatta,and so on…worldless.salute to Bihar
#bihardiwas

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Bihari, is not an insult,it’s my identity
Take pride in being a Bihari.
#BiharDiwas

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बुद्ध,सम्राट अशोक,महावीर,गुरु गोविंद सिंह,वीर कुंवर सिंह,रेणु,दिनकर,डॉ राजेंद्र प्रसाद,विद्यापति,भिखारी ठाकुर,नालंदा विश्वविद्यालय जैसे अनगिनत महापुरुषों/स्थलों से जाना जाने वाला बिहार, हां ये है मेरा बिहार।
बिहार दिवस की बधाइयाँ
#BiharDiwas

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Greetings to the people of Bihar on the occasion of . May the State continue to achieve new milestones, on its journey towards development and prosperity. It was on this day when the British carved out the State of Bihar from Bengal Presidency in 1912

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Bihar often considered as a land of labourers. But we should appreciate the fact that they are hardy enough to adapt themselves to any situations. Fact proves that Bihar is the state which is considered as the 2nd most IAS producing factory. Proud to be BIHARI Happy

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विश्व को प्रथम लोकतंत्र, अहिंसा, सदभाव, करूणा व प्रेम का सन्देश देने वाली ज्ञान एवं संघर्ष की भूमि बिहार के स्थापना दिवस पर आप सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

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Everyone started from 1 But we started from zero… Yes we the people of Bihar…. Chankya..aryabhatt all are the superpower of our country belongs to the land of diverse culture means Bihar.

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ज्ञान, स्वाभिमान और परिश्रम की भूमि बिहार प्रदेश के सभी वासियों को की हार्दिक शुभकामनाएं। अपने गौरवशाली इतिहास से बिहार न सिर्फ देश के प्रमुख राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्रों में से एक रहा बल्कि भारतवर्ष के विकास और निर्माण में भी बिहार का अद्वितीय योगदान रहा है।

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Happy Bihar Diwas To The Manufacturer/Producer/Creator Of Most Of The IAS, IPS And The Bank PO’s In The Country. Happy 106th Birthday Bihar.❤

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हम हैं बिहारी सारे जग में हम भारत की शान मेहनत अपना दीन धरम मेहनत है ईमान बिहार दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाए जय बिहार

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वईसे तो हम बिहारी 365 दिन, सब पर भारी फिर भी रस्मी तौर पर हम सब बिहरियन को बिहार दिवस की बधाई ..??

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जोश है, होश है, हौसलों से यारी है। दुःख से, दर्द से, उबरने की बारी है। गर्व से, शौर्य से, बोल तू “बिहारी” है। हां हम “बिहारी” है।।

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बिहार दिवस सिर्फ बिहार के लिए नही अपितु पुरे देश के हर्ष का दिन है ।? उस हर बिहारी को सलाम जो मजदूर हो सकता है पर मजबूर नहीं हो सकता ? देश की हर इमारत को बनाने में किसी बिहारी का खून पसीना जरूर लगता है

#BiharDiwas

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सीधी-सादी बोली अपनी, सीधे-सादे लोग,

लालच, झूठ और मक्कारी के हमको नहीं हैं रोग|

अपने अंदर जिन्दा रक्खा है हमने इंसान,

हम हैं बिहारी, सारे जग में हम भारत की शान,

मेहनत अपना दीन धरम है, मेहनत है ईमान||

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पीछे का इतिहास देख लो, आगे की तैयारी हूँ।

हाँ, मैं बिहारी हूँ।

दिवस की शुभकामनाएँ।

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कल्पना चावला की जीवनी | Kalpana Chawla Biography In Hindi

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दोस्तों मै आज आपको एक ऐसी भारतीय महिला के बारे में बताने जा रहा हूँ  जिसका मानना था की वो अंतरिक्ष के लिए ही बनी है | उसने न सिर्फ इस बात को सच कर दिखाया बल्कि अंतरिक्ष की दुनिया में इतनी उपलब्धिया हासिल की वो आज तमाम छात्र छात्राओं की आदर्श बन गयी है | जी हाँ हम बात कर रहे है अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय महिला  कल्पना चावला के बारे में | भले ही 1 फरवरी 2003 को कोलंबिया स्पेस शटल के दुर्घटनाग्रस्त होने के साथ कल्‍पना की उड़ान रुक गई लेकिन आज भी वह दुनिया के लिए एक मिसाल हैं |

कल्पना चावला जीवन परिचय  – Kalpana Chawla Biography In Hindi

कल्पना चावला का जन्म करनाल पंजाब में 17 मार्च 1962 को हुआ था जो अभी हरियाणा का हिस्सा है | कल्पना चावला अपने परिवार में 4 भाई बहनों में से सबसे छोटी थी | कल्पना चावला के पिता का नाम श्री बनारसी लाल चावला और माता का नाम संजयोती देवी था | उसके पिता उसे एक डॉक्टर या अध्यापक बनाना चाहते थे किंतु कल्पना चावला शुरू से ही अंतरिक्ष में घूमने की कल्पना करती थी | Kalpana Chawla बचपन में ही कल्पना भरी बातें किया करती थी. हमेशा आकाश और उनकी ऊचाइयों ले बारे में सोचती रहती थी और अपने पापा से चाँद-तारों और विमानों के बारे में बात किया करती थी |

प्रारंभिक शिक्षा 

कल्पना चावला ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा टैगोर बाल निकेतन सीनियर सेकेंडरी स्कूल करनाल  से की थी . अपने सपने को साकार करने के लिए कल्पना चावला ने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज चंडीगढ़ में ‘एरोनौटिकल इंजीनियरिंग’ पढने के लिए ‘बी.इ.’ में दाखिला लिया और सन 1982 में ‘एरोनौटिकल इंजीनियरिंग’ की डिग्री भी हासिल कर ली। इसके पश्चात कल्पना अमेरिका चली गयीं और सन 1982 में ‘टेक्सास विश्वविद्यालय’ में ‘एयरोस्पेस इंजीनियरिंग’ में स्नातकोत्तर करने के लिए दाखिला लिया। उन्होंने इस कोर्स को सन 1984 में सफलता पूर्वक पूरा किया। उनके अन्तरिक्ष यात्री बनने की इच्छा इतनी प्रबल थी कि उन्होंने सन 1986 में ‘एयरोस्पेस इंजीनियरिंग’ में दूसरा स्नातकोत्तर भी किया और उसके बाद कोलराडो विश्वविद्यालय से सन 1988 में ‘एयरोस्पेस इंजीनियरिंग’ विषय में पी.एच.डी. भी पूरा किया।

कल्पना चावला करियर

Kalpana Chawla को 1988 में NASA एम्स अनुसंधान केंद्र के लिए ओवेर्सेट मेथड्स इंक के उपाध्यक्ष के रूप में शामिल कर लिया गया, कल्पना ने NASA में रहकर अपने जीवन में बहुत सारे रिसर्च भी किए. कल्पना चावला की लगन और मेहनत को देखते हुए बाद में उन्हें अंतरिक्ष मिशन की Top 15 की टीम में शामिल कर लिया गया और देखते ही देखते उन 6 लोगो की टीम भी Kalpana Chawla का नाम शामिल हो गया, जिनको अंतरिक्ष में भेजा जाना था. इसी तरह कल्पना चावला के सपनों को अब पँख लग चुके थे.

The STS-107 crew includes, from the left, Mission Specialist David Brown, Commander Rick Husband, Mission Specialists Laurel Clark, Kalpana Chawla and Michael Anderson, Pilot William McCool and Payload Specialist Ilan Ramon. (NASA photo)

 

 

Kalpana Chawla का पहला अंतरिक्ष मिशन

अप्रैल 1991 में वे एक देशियकृत संयुक्त राज्य अमेरिका की नागरिक बनी। कल्पना जी मार्च 1995 में नासा के अन्तरिक्ष यात्री कोर में शामिल हुई और उन्हें 1996 में अपनी पहली उडान के लिए चुना गया था। उनका पहला अन्तरिक्ष मिशन 19 नवम्बर 1997 को छह-अन्तरिक्ष यात्री दल के हिस्से के रूप में अन्तरिक्ष शटल कोलंबिया की उडान एसटीएस-87 से शुरू हुआ। कल्पना जी अन्तरिक्ष में उड़ने वाली प्रथम भारत में जन्मी महिला थी और अन्तरिक्ष में उड़ने वाली भारतीय मूल की दूसरी व्यक्ति थी। राकेश शर्मा ने 1984 में सोवियत (Soyuz T-11) अन्तरिक्ष यान में उडान भरी थी। कल्पना जी ने अपने पहले मिशन में अन्तरिक्ष में 360 से अधिक घंटे बिताए। कल्पना जी ने अपने पहले मिशन में 10.67 मिलियन किलोमीटर का सफ़र तय कर के, पृथ्वी की 252 परिक्रमाये की।

अन्तरिक्ष के सफ़ेद आसमान की यात्रा करते समय ये शब्द उन्होंने कहे थे। “आप ये आप ही की बुद्धि का परिणाम हो”। 

Kalpana Chawla का दूसरा अंतरिक्ष मिशन 

सन 2002 में कल्पना को उनके दूसरे अंतरिक्ष उड़ान के लिए चुना गया। उन्हें कोलंबिया अंतरिक्ष यान के एसटीएस-107 उड़ान के दल में शामिल किया गया। कुछ तकनीकी और अन्य कारणों से यह अभियान लगातार पीछे सरकता रहा और अंततः 16 जनवरी 2003 को कल्पना ने कोलंबिया पर चढ़ कर एसटीएस-107 मिशन का आरंभ किया। यह 16 दिन का मिशन था. इस मिशन पर Kalpana Chawla ने अपनी टीम के सभी साथियों के साथ मिलकर 80 परीक्षण प्रयोग किए. लेकिन फिर वह हुआ जिसे सोचकर सबकी आँखे भर आती है.

हाथों में फूल और गुलदस्ते लिए स्वागत के लिए खड़े विज्ञानिक और अंतरिक्ष प्रेमी सहित पूरा विश्व उस दुर्घटना को देखकर शौक में डूब गया. अंतरिक्ष को धरती पर उतरने में महज 16 मिनट रह गए थे, तभी अचानक स्टल ब्लास्ट हो गया और कल्पना चावला के साथ सभी अंतरिक्ष यात्री मारे गए.

 

कल्पना चावला मृत्यु – Kalpana Chawla Death 

1 फ़रवरी  2003 को कोलंबिया अंतरिक्षयान पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते ही टूटकर बिखर गया। देखते ही देखते अन्तरिक्ष यान और उसमे सवार सातो यात्रियों के अवशेष टेक्सास नमक शहर पर बरसने लगे और सफल कहलाया जाने वाला अभियान भीषण सत्य बन गया।

पहले ही तय थी कल्पना चावला की मौत

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कोलंबिया स्पेस शटल के उड़ान भरते ही पता चल गया था कि ये सुरक्षित जमीन पर नहीं उतरेगा, तय हो गया था कि सातों अंतरिक्ष यात्री मौत के मुंह में ही समाएंगे. फिर भी उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी गई. बात हैरान करने वाली है, लेकिन यही सच है.

इसका खुलासा मिशन कोलंबिया के प्रोग्राम मैनेजर ने किया था. यात्रा के हर पल मौते के साये में स्पेस वॉक करती रहीं कल्पना चावला और उनके 6 साथी. उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगने दी गई कि वो सुरक्षित धरती पर नहीं आ सकते. वो जी जान से अपने मिशन में लगे रहे, वो पल-पल की जानकारी नासा को भेजते रहे लेकिन बदले में नासा ने उन्हें पता तक नहीं लगने दिया कि वो धरती को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर जा चुके हैं, उनके शरीर के टुकड़ों को ही लौटना बाकी है.

लडकियों की आदर्श – Kalpana Chawla

कल्पना चावला भले ही हमारे बिच नहीं है पर  आज के भी वो बहुत सारी लडकियों की आदर्श है। आज की लडकियों को ये सोचना चाहिये की जब कल्पना चावला एक माध्यम वर्गीय परिवार से होने के बावजूद अंतरिक्ष में जा सकती है   तो वो क्यू नहीं? जिस समय भारत का तंत्रज्ञान ज्यादा मजबूत नहीं था, जिस समय लोगो को अन्तरिक्ष की समझ भी नहीं थी उस समय कल्पना चावला ने अन्तरिक्ष में जाके पुरे विश्व जगत में भारत का परचम लहराया।

पुरस्कार – Kalpana Chawla Award :

मरणोपरांत
1) कांग्रेशनल अंतरिक्ष पदक के सम्मान।
2) नासा अन्तरिक्ष उडान पदक।
3) नासा विशिष्ट सेवा पदक।