जानिए दुनिया के पहले नक़्शे के बारे में

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आजकल लोग गूगल मैप का प्रयोग करके दुनिया के किसी छोर पर निकल पड़ते है,चाहे वो रास्ता उन्हें मालूम हो या न हो . हम बेफिक्र होते है की हमारे पास गूगल मैप है और ये हमें भटकने नहीं देगा . लेकिन दोस्तों क्या आपने कभी सोचा है की गूगल मैप के आने से पहले लोग अपना सफ़र कैसे तय करते थे . एक जगह से दूसरी जगह जाने के क्रम में क्या वो रास्ता भटकते नहीं थे .

आज से पांच सौ बरस पहले लोगों को ये भी पता  नहीं होता था कि समंदर कितने हैं, महाद्वीप कितने हैं. अमरीका किधर है. भारत कहां है. उस दौर में भी बहुत से साहसी लोग नाव पर सवार होकर या पैदल ही दुनिया की सैर को निकल पड़ते थे.

दुनिया का पहला नक़्शा

यूरोप में दुनिया का पहला नक़्शा 1448 में वेनिस के मानचित्रकार जियोवान्नी लिआर्दो ने चमड़े पर तैयार किया था. इस नक़्शे का  नाम था प्लेनिस्फ़ेरो. प्लेनिस्फ़ेरो, लैटिन भाषा का शब्द है. प्लेनस मतलब चपटा और स्फ़ेरस मतलब गोला. इस नक़्शे की बुनियाद थे यूनानी-रोमन विद्वान टॉलेमी का भूकेंद्रीय मॉडल, बुत परस्तों के निशान, ईसाइयों की श्रद्धा, अरबी भौगोलिक सिद्धांत और वैज्ञानिक फॉर्मूले शामिल थे. इस नक़्शे में तमाम प्रायद्वीपों को उन्हीं नामों से रेखांकित किया गया है, जिस नाम से उस दौर में यूरोप के लोग इन्हें जानते थे.

नक्शे पर आधारित हज़ारों किताबें

इस नक्शे से पहले 1448 में एक और नक़्शा तैयार किया गया था. ये मानचित्र भी इटली के ही एक अन्य शहर वेनिस में बिबलियोटेका सिविका बर्टिलोनिया लाइब्रेरी में सुरक्षित है. बताया जाता है कि बिबलियोटेका सिविका बर्टिलोनिया में नक़्शों पर हज़ारों किताबें और हस्तलिपियां हैं. अगर इन सभी को फैला कर रखा जाए तो क़रीब 19 किलोमीटर में फ़ैल जाएंगी.

15वीं और 16वीं शताब्दी के अंत में  दुनिया के नए-नए इलाक़े खोजे जा रहे थे और साथ  प्रिंटिंग का काम भी शुरू हो गया था . जिसके कारण नक़्शे आसानी से छपने लगे और बहुत लोगो तक पहुचने लगे. नाविकों, व्यापारियों से जितनी भी जानकारियां मिलती थीं उन्हें छापकर ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाया जाता था.

टॉलेमी का किरदार

टॉलेमी ने बताया की दुनिया चपटी और 70 डिग्री चौड़ी है. टॉलेमी को ये भी पता था कि भारत, चीन यूरोप के पूरब में हैं. इसी जानकारी के आधार पर टॉलेमी ने मानचित्र भी बनाया जिसके आधार पर 15वीं शताब्दी में खोजकर्ताओं ने अपना सफ़र शुरू किया.

टॉलेमी के नक़्शे की पहली कॉपी 1475 में लैटिन में छपी थी. टॉलेमी को लोग गणितज्ञ, भूगोल का माहिर, और नजूमी (ज्योतिष) के तौर पर जानते हैं जिसे दूसरी सदी में रोमन साम्राज्य में दुनिया का भूगोल बताने का काम सौंपा गया था. 1475 की टॉलेमी की हस्तलिपियों में नक़्शे शामिल नहीं थी. इनमें सिर्फ़ अनुभव के आधार पर लिखी जानकारियां थी. लेकिन बाद में जो नक़्शे बनाए गए उनमें हाथ से रंग भी भरे गए.जमीन दर्शाने के लिए पीला रंग और समुद्र के लिए नीला रंग इस्तेमाल हुआ.

तब प्रस्तावना, लेखक का नाम नहीं होते थे किताबों में

1500 से पहले की जितनी भी किताबें या हस्तलिपियां नक़्शों पर आधारित हैं. उन सभी में वो पेज नहीं है जिस पर किताब की प्रस्तावना, किताब और लिखने वाले का नाम, तारीख़ आदि लिखी रहती है.इसका चलन 1500 के बाद प्रिंटिंग के ज़माने में अलदुस मनुटियस ने शुरू किया था. वो पहला ऐसा शख़्स था जिसने इटैलिक्स फ़ोन्ट का इस्तेमाल किया और क़रीब 130 किताबों को ग्रीक से लैटिन भाषा में छापा.

पेटरस की वो किताब

1524 में जर्मनी के पेटरस अप्यानस ने कॉस्मोग्राफ़िया नाम की किताब लिखी जो कि गणित के आधार पर भूज्ञान की बारीकियां बताती है. पेटरस को नक़्शे बनाने, गणित और खगोलशास्त्र में महारात हासिल थी.पेटरस की ये किताब 14 भाषाओं में 30 बार छापी गई. इसका पहला लैटिन संस्करण 1540 में छपा था. कॉस्मोग्रेफ़िया की ख़ास बात थी कि इसमें वॉवेल्स का इस्तेमाल हुआ था और इसमें घूमने वाले व्हील चार्ट थे.

ये चार्ट, पेपर की कई तहों से बनाए गए थे. इसे शुरुआती एनलॉग कंप्यूटर और कैलकुलेटर की मिसाल के तौर पर भी समझा जा सकता है. इसके सहारे राशियों के निशान, चांद-सूरज की चाल को समझा जा सकता था. कॉस्मोग्राफ़िया समुद्री यात्रियों के लिए और भी कई अहम जानकारियां मुहैया कराती थी.इसके अलावा कॉस्मोग्राफ़िया दुनिया के उस शुरुआती नक़्शे के लिए भी जानी जाती है जिसमें पहली बार उत्तरी अमरीका के पश्चिमी किनारे को दर्शाया गया था.

इस दौर में धरती के नए नए हिस्से खोजे जा रहे थे. अन्वेषकों से मिली जानकारी की बुनियाद पर बहुत तरह के नक्शों की किताबें, एबेकस की किताबें, समुद्री रास्तों की किताबें लिखी जा रही थीं. इन किताबों से सेनाओं को भी ज़मीनी और समुद्री रास्ते समझने में काफ़ी मदद मिली.

पहला एटलस- थियेटर ऑफ़ द वर्ल्ड

1570 में पहला एटलस छपा था जिसका नाम था थियेटर ऑफ़ द वर्ल्ड. इसे पहला आधुनिक नक़्शा भी कहा जाता है. इसे फ़्लेमिश स्कॉलर और भू-वैज्ञानिक अब्राहम ऑर्टेलियस ने लिखा था.पहली बार इस एटलस में मानचित्रों के साथ विस्तार से जानकारी थी. नक़्शे, माहिर नक़्शानवीसों ने तैयार किए थे. जिस जगह की जो ख़ासियत थी, उसके निशान भी बनाए गए थे. मिसाल के लिए रेगिस्तान दर्शाने के लिए वहां ऊंट और खजूर के पेड़ बनाए गए थे. नक़्शों की छपाई के लिए पहली बार कॉपर प्लेट का इस्तेमाल किया गया था. इन नक़्शों में इस्तेमाल रंगों में आज भी चमक है.

थियेटर ऑफ़ द वर्ल्ड उस दौर के अमीरों के लिए जानकारी का ज़ख़ीरा थी. ये गाइड बुक 1570 से 1612 तक जर्मन, फ़ैंच, डच, लैटिन और भी बहुत सी ज़बानों में भी छपी. इसकी क़ीमत भी काफ़ी थी.थियेटर ऑफ़ द वर्ल्ड का किसी के पास होना उसके बुद्दिजीवी और अमीर होने की निशानी समझा जाने लगा. इसमें बहुत से मानचित्र ऐसे भी हैं जिनकी जानकारी का स्रोत आज किसी को नहीं पता है.1570 में पहली बार थियेटर ऑफ़ द वर्ल्ड का वो संस्करण छपा, जिसमें 87 ऐसे भू-वैज्ञानिकों और नक़्शानवीसों के नाम थे जिन्हें इन नक़्शों का स्रोत माना गया.बाद में इस फ़ेहरिस्त में और भी कई नाम जुड़े और ये फ़ेहरिस्त 183 नामों की हो गई.

दुनिया गोल है

नक़्शों की बहुत सी किताबें छपीं, मगर दुनिया गोल है, ये बात हमें इटली के अन्वेषक एंतोनियो पिगाफ़ेट्टा ने बताई. पिगाफेट्टा ने समंदर के रास्ते दुनिया के सफ़र की यादें एक डायरी में लिखी थीं.उसने ये डायरी रोमन साम्राज्य के सम्राट चार्ल्स पंचम को तोहफ़े में दे दी थी. 1524 में इस डायरी को एक किताब की शक्ल में छापा गया था. इस डायरी में लिखी जानकारी की बुनियाद पर ही प्रशांत महासागर के बारे में पता चला.नक़्शों का सफ़र जानने के बाद इतना ही कहा जा सकता है कि आज की दुनिया को क़रीब लाने, उसे नए अंदाज़ में समझने और साइंस की तरक़्क़ी में बेशक़ीमती रोल निभाया है.नक़्शा बनाने वाले अगर सफ़र पर ना निकले होते तो दुनिया में तरक़्क़ी मुमकिन नहीं थी.

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