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Thursday, March 19, 2026
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छह बार विश्व चैंपियनशिप जितने वाली पहली महिला – मैरीकॉम

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marykom biography hindi

आज हम जिस शख्सियत से आपका परिचय कराने जा रहे हैं वह किसी परिचय की मोहताज नहीं है। कोमल और लचीला शरीर लेकिन उनकी पंच में ऐसी जान है कि सामने वाला देखते ही देखते रिंग में चित हो जाता है। वे दुनिया की पहली ऐसी महिला बॉक्सर है जिन्होंने विश्व महिला बॉक्सिंग प्रतियोगिता 6 बार जीत चुकी हैं। जी हां हम बात कर रहे है मणिपुर की मैरी कॉम की , जो अकेली ऐसी महिला मुक्केबाज हैं जिन्होंने अपने सभी 6 विश्व प्रतियोगिताओ में पदक जीता है।

मैरीकॉम का जीवन परिचय – Marykom Biography in Hindi

मैंगते चंगनेइजैंग मैरीकॉम जिन्हें मैरीकॉम के नाम से भी जाना जाता है का जन्म 1 मार्च 1983 को मणिपुर के चूड़ा चांदपुर जिले में हुआ था । उनके पिता एक गरीब किसान थे । यह चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी । अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए अपने माता-पिता के साथ वे खेतों में भी काम करती थी। बचपन से ही उनकी रुचि खेलों में थी।

प्रारंभिक शिक्षा 

उनकी प्रारंभिक शिक्षा लोकटक क्रिश्चियन मॉडल स्कूल और सेंट जेवियर स्कूल में हुई । इसके बाद उन्होंने कक्षा 9 और 10 की पढ़ाई के लिए इंफाल के आदिमजाति हाई स्कूल में दाखिला लिया। लेकिन वह मैट्रिकुलेशन की परीक्षा पास नहीं कर सकी। मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में दोबारा बैठने का उनका कोई विचार नहीं था इसलिए उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और आगे की पढ़ाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग यानी NIOS इंफाल से की। उन्होंने स्नातक की पढ़ाई चुराचांदपुर कॉलेज से पूरा किया।

मैरीकॉम कहती हैं –

यदि वह खिलाड़ी नहीं होती तो गायिका होती क्योंकि संगीत से मुझे बहुत लगाव था ।लेकिन मुक्केबाजी ने मेरे संगीत प्रेम पर ग्रहण लगा दिया।

मैरी कॉम की बॉक्सर बनने को कहानी  

मैरीकॉम कॉम के बॉक्सर बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। बात उन दिनों की है जब बच्ची मैरीकॉम मणिपुर के एक मैदान में बॉयज बॉक्सिंग देख रही थी। तभी किसी ने उससे कहा यह लड़कों का खेल है। एक भी पंच तुम्हारी नाक में पड़ जाएगा तो तुम्हारी नाक टूट जाएगी। फिर टूटी नाक वाली लड़की से कोई शादी नहीं करेगा । मैरी ने अपने शरीर पर कई पंच मारे और अपनी बॉडी को बॉक्सिंग के लिए टेस्ट किया। आर्थिक तंगी के चलते मुक्केबाज बनने का सपना उस समय पूरा नहीं हुआ। लेकिन वह खेल से जुड़ी रही, जैवलिन थ्रो और 400 मीटर दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेती रही। पर वह ज्यादा वहां कुछ नहीं कर सकी। 1998 में जब मणिपुर के बॉक्सर डिंगको सिंह ने एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीता तो उनसे वह काफी प्रभावित हुई और उन्होंने बॉक्सिंग में अपना कैरियर बनाने की सोची।

घरवाले थे बॉक्सिंग के खिलाफ 

लेकिन एक लड़की के लिए बॉक्सिंग में कैरियर बनाना इतना आसान नहीं था। मैरीकॉम के पिता और उनके घरवाले उनके बॉक्सिंग करने के बिलकुल खिलाफ थे। क्योंकि वह लोग बॉक्सिंग को पुरुषों का खेल समझते थे। ऐसे में इस फील्ड में करियर बनाने के लिए मैरीकॉम को बहुत चुनौतियों का सामना करना पड़ा। अपने सपने को सच करने के लिए मैरीकॉम ने मणिपुर राज्य के इंफाल में बॉक्सिंग कोच इंद्रजीत सिंह से ट्रेनिंग लेना शुरू कर दिया।

बॉक्सिंग की शुरुआत 

1998 से 2000 तक वे अपने घर में बिना बताए बॉक्सिंग की ट्रेनिंग लेती रही। 2000 में जब मेरी ने विमेन बॉक्सिंग चैंपियनशिप मणिपुर में जीत हासिल की और इन्हें बॉक्सर का अवार्ड मिला तो वहां के हर एक समाचार पत्र में उनकी जीत की बात छपी। तब उनके परिवार को मेरीकॉम के बॉक्सर होने का पता चला । इस जीत को परिवार वालों ने सेलिब्रेट किया। उसके बाद पश्चिम बंगाल में आयोजित विमेन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर अपने राज्य का नाम ऊंचा किया । यहां से मैरी कॉम बॉक्सिंग की शुरुआत हुई।

18 साल की उम्र में  विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप में सिल्वर मैडल जीता 

2001 मेरी कॉम ने 18 साल की उम्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने कैरियर की शुरुआत की उन्होंने अमेरिका में आयोजित AIBA विश्व विमेन बॉक्सिंग चैंपियनशिप के 48 किलोग्राम वेट केटेगरी में सिल्वर मेडल जीतकर अपने देश का नाम रोशन किया । उसके बाद से मैरीकॉम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा उनके जीत का सिलसिला चलता रहा ।

वैवाहिक जीवन 

2001 में मैरी कॉम पंजाब में नेशनल गेम्स खेलने के लिए जा रही थी। तभी उनकी मुलाकात ओनलर से हुई उस समय ओनलर दिल्ली यूनिवर्सिटी में लॉ की पढ़ाई कर रहे थे । मैरी कॉम और ओनलर पहले बहुत अच्छे दोस्त बने ।उसके करीब 4 सालों बाद 2005 में उन्होंने शादी कर ली। 2007 में मैरीकॉम ने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। इसके बाद 2013 में उन्हें एक और बेटा पैदा हुआ।

2 साल रिंग से दूर रहने के बावजूद बनी विश्व चैम्पियन 

मैरी कॉम जब चौथी बार विश्व चैंपियन बनी सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए। क्योंकि प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले वे 2 साल तक रिंग से दूर थी। इस दौरान उन्होंने जुड़वा बच्चों को भी जन्म दिया था। वे अपने पति और बच्चों के साथ परिवारिक जीवन जी रही थी । लेकिन जब उन्होंने रिंग में वापसी की तो चौथी बार वह करिश्मा कर दिखाया जो आज तक किसी ने नहीं किया है

ओलंपिक में भारत को गोल्ड दिलाना है सपना 

मैरीकॉम ने एशियन महिला मुक्केबाजी प्रतियोगिता में पांच स्वर्ण और एक रजत पदक जीत चुकी हैं। महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में भी उन्होंने 6 स्वर्ण और एक रजत पदक जीता है। एशियाई खेलों में मैरीकॉम ने दो रजत और एक स्वर्ण पदक जीता है। 2012 के लंदन ओलंपिक में मैरीकॉम ने कांस्य पदक जीतकर देश का नाम ऊंचा किया। मैरी कॉम का सपना है ओलंपिक में भारत को स्वर्ण पदक दिलाना

पद्मभूषण से भी सम्मानित

मैरीकॉम को अब तक 10 राष्ट्रीय खिताब मिल चुके हैं। बॉक्सिंग में देश का नाम रोशन करने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2003 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया था एवं वर्ष 2006 में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। जुलाई 2009 को उन्हें भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार भी प्रदान किया गया। वर्ष 2013 को मैरी कॉम को देश के तीसरे सबसे बड़े सम्मान पद्मभूषण से भी सम्मानित किया गया।

शहीदों की चौखट चूमने का जुनून -विकास मन्हास

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vikas manhas

आज हम एक ऐसे शख्स की कहानी बताने जा रहे हैं जिसे शहीदों की चौखट चूमने का जुनून है । वह कारगिल जंग के बाद से ही शहीद के परिवारों की पावन यात्रा करते आ रहे हैं । अब तक वह 200 से भी अधिक दिवंगत वीरों के घर की माटी को चूम चुके हैं। हम बात कर रहे हैं विकास मन्हास कि जिन्होंने जम्मू यूनिवर्सिटी से बीएससी करने के बाद मुंबई विश्वविद्यालय से मैनेजमेंट स्टडीज में मास्टर की डिग्री हासिल की है।

vikas manhas

फौजियों और शहीदों के प्रति सम्मान का किस्सा

फौजियों और शहीदों के प्रति उनके गहरे सम्मान का किस्सा कारगिल से पहले का है । बात 1994 की एक रात की है गर्मी की छुट्टी में मन्हास अपने परिवार के शादी में शिरकत करने के लिए शहर आए थे। एक रात खाने के बाद उन्होंने घूमने की सोची। लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि सूरज ढलते ही वहां कर्फ्यू हो जाता है । मन्हास अभी कुछ ही कदम चले होंगे कि एक तेज रोशनी उनकी आंखों में पड़ी और कड़क की आवाज में पूछा – रुको। कुछ समय के लिए वह ठिठक गए। चंद सेकंड बाद उनकी चेतना लौटी और दौड़ते हुए अपने घर की तरफ भागे । घर में घुसते ही उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया और परिवार वाले लोगों के बीच आकर बैठ गए। कुछ समय बाद दरवाजा खटखटाया गया। फौजियों की एक टुकड़ी सामने थी। उन्होंने कहा हमने एक आतंकी को इस घर में घुसते देखा है। मन्हास के चाचा ने इनकार किया और बोला कि हमारे यहां कोई आतंकी नहीं है। मगर मन्हास ने और हिम्मत बटोर के कहा कि आप लोगों ने जिसे देखा है मैं वह मैं ही हूं और मैं दहशतगर्द नहीं हूं।

अकेले सैनिक ने बचायी चौकी 

वह खुशकिस्मत थे कि भागते हुए जवानों ने उन पर गोलियां नहीं दागी थी । फौजी लौट गए लेकिन इसके कुछ देर बाद अचानक ही गोलियों की आवाज से पूरा इलाका थर्रा उठा। बहुत देर तक गोलियों की आवाजें गूंजती रही। सुबह खबर आई कि चौकी पर आतंकियों ने घात लगाकर हमला बोला जिसमें 8 में से 7 सैनिक शहीद हो गए। अकेला बचा सैनिक रात भर आतंकियों से लोहा लेते रहा मगर उसने चौकी को लूटते और लूटने नहीं दिया।

vikas manhas

शहीदों के परिवार का दर्द सोचकर किया फैसला 

उन दिनों फौजियों का शव उनके घर पर नहीं भेजा जाता था । बल्कि अंतिम संस्कार के बाद उनके अवशेष को अपनों तक पहुंचाया जाता था । विकास मन्हास यह सोचकर व्यथित हो गए की शहीद के परिजन अपने लाडलो का आखिरी दर्शन भी नहीं कर पाते हैं। वह उन 7 जवानों की अर्थियां जलते देख कर रो पड़े। तभी उनके मन में यह विचार आया कि क्यों न शाहिद के घर वालों का दर्द साझा करने के लिए उनके घर पर जाया जाए

शहीद परिवार से पहली मुलाकात 

कारगिल के जंग के समय सरकार ने यह फैसला किया था कि शहीदों के शव उनके अपनों तक ससम्मान पहुंचाए जाएंगे। तब मीडिया में वीर जवानों की कहानियां भी आने लगी थी जिससे विकास मन्हास को शहीदों के घर पर पहुंचने में आसानी हो गई । पहली बार वे ग्रेनेडियर उदयमान सिंह के घर के तरफ बढ़े थे । जब वह कमरे में दाखिल हुए तो उनकी मां नीचे बिछी कालीन पर सर झुकाए हुए बैठी थी । कारगिल की जंग में 19 साल का उनका जांबाज टाइगर हिल पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर गया था। मन्हास को कुछ समझ नही आ रहा था कि वह उनकी मां को क्या कहें। 1 घंटे तक दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई । उसके बाद उदय भान सिंह की मां ने ही पूछ लिया क्या आप चाय पिएंगे। फिर शब्दों का सिलसिला चल पड़ा । हजार बातें हुई और फिर कमरे की एक तस्वीर पर जाकर दोनों की आंखें नम हो गई क्योंकि वह उदयभान से की आखिरी तस्वीर थी। ग्रेनेडियर उदय मानसिंह की गमजदा मां से हुई मुलाकात के लंबे मौन ने विकास मन्हास को जैसे हिला दिया था।

कंपनी ने भी दिया साथ 

उसके बाद से विकास मन्हास शहीदों के परिवारों की पावन यात्रा करते आ रहे हैं। किसी किसी साल तो वह 11 महीने तक सफर में ही रहते हैं । अब तक वह 200 से भी अधिक दिवंगत वीरों के घर की माटी घूम चुके हैं। मन्हास जम्मू कश्मीर के भदेरवाह के हैं । साल 2007 से 2011 तक मन्हास बौद्धिक संस्थान से जुड़ी बेंगलुरु की एक कंपनी क्रॉसटीम कंसलटिंग प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े थे। कंपनी के काम से उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों में जाना पड़ता था। लेकिन उनके जज्बे को देखते हुए कंपनी ने मन्हास को इजाजत दी थी की वह बिजनेस दौरे के दौरान भी शहीदों के घर घूम सकते है

पिछले बीस सैलून में 200 से भी ज्यादा परिवार से मिले 

मन्हास 2011 में जब जम्मू लौटे उन्होंने अपनी एक ट्रेवल कंपनी शुरू कर दी । जिससे उन्हें काफी वक्त मिल जाता था कि वह अपनी इच्छा को आसानी से पूरी कर सके। उनके पास शहीदों के परिजनों की ऐसी ऐसी कहानियां है कठोर से कठोर इंसान का भी आंसू थामना मुश्किल हो जाए । मन्हास न सिर्फ उनकी कहानी एक दूसरे से साझा करते हैं बल्कि पिछले 20 वर्षों में अनेक शहीद परिवारों से उन्हें अपनापन सा हो चुका है।

क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए -निर्मला पुतुल

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kya hu mai tumhare liye nirmala putul

क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए – हिंदी कविता 

निर्मला पुतुल 

क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए…?
एक तकिया
कि कहीं से थका-मांदा आया और सिर टिका दिया

कोई खूँटी
कि ऊब, उदासी थकान से भरी कमीज़ उतारकर टाँग दी

या आँगन में तनी अरगनी
कि कपड़े लाद दिए

घर
कि सुबह निकला और शाम लौट आया

कोई डायरी
कि जब चाहा कुछ न कुछ लिख दिया

या ख़ामोशी-भरी दीवार
कि जब चाहा वहाँ कील ठोक दी
कोई गेंद
कि जब तब जैसे चाहा उछाल दी
या कोई चादर
कि जब जहाँ जैसे तैसे ओढ-बिछा ली
क्यूँ ? कहो, क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए ?

हम सब सुमन एक उपवन के – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

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हम सब सुमन एक उपवन के – हिंदी कविता 

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

 

हम सब सुमन एक उपवन के
एक हमारी धरती सबकी
जिसकी मिट्टी में जन्मे हम
मिली एक ही धूप हमें है
सींचे गए एक जल से हम।
पले हुए हैं झूल-झूल कर
पलनों में हम एक पवन के
हम सब सुमन एक उपवन के।।

रंग रंग के रूप हमारे
अलग-अलग है क्यारी-क्यारी
लेकिन हम सबसे मिलकर ही
इस उपवन की शोभा सारी
एक हमारा माली हम सब
रहते नीचे एक गगन के
हम सब सुमन एक उपवन के।।

सूरज एक हमारा, जिसकी
किरणें उसकी कली खिलातीं,
एक हमारा चांद चांदनी
जिसकी हम सबको नहलाती।
मिले एकसे स्वर हमको हैं,
भ्रमरों के मीठे गुंजन के
हम सब सुमन एक उपवन के।।

काँटों में मिलकर हम सबने
हँस हँस कर है जीना सीखा,
एक सूत्र में बंधकर हमने
हार गले का बनना सीखा।
सबके लिए सुगन्ध हमारी
हम श्रंगार धनी निर्धन के
हम सब सुमन एक उपवन के।।

पुनः नया निर्माण करो- द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

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पुनः नया निर्माण करो – हिंदी कविता

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

 

उठो धरा के अमर सपूतो
पुनः नया निर्माण करो।
जन-जन के जीवन में फिर से
नई स्फूर्ति, नव प्राण भरो।

नया प्रात है, नई बात है,
नई किरण है, ज्योति नई।
नई उमंगें, नई तरंगे,
नई आस है, साँस नई।
युग-युग के मुरझे सुमनों में,
नई-नई मुसकान भरो।

डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ
नए स्वरों में गाते हैं।
गुन-गुन-गुन-गुन करते भौंरे
मस्त हुए मँडराते हैं।
नवयुग की नूतन वीणा में
नया राग, नवगान भरो।

कली-कली खिल रही इधर
वह फूल-फूल मुस्काया है।
धरती माँ की आज हो रही
नई सुनहरी काया है।
नूतन मंगलमय ध्वनियों से
गुंजित जग-उद्यान करो।

सरस्वती का पावन मंदिर
यह संपत्ति तुम्हारी है।
तुम में से हर बालक इसका
रक्षक और पुजारी है।
शत-शत दीपक जला ज्ञान के
नवयुग का आह्वान करो।

उठो धरा के अमर सपूतो,
पुनः नया निर्माण करो।

मूलमंत्र कविता – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

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मूलमंत्र – कविता  

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

केवल मन के चाहे से ही
मनचाही होती नहीं किसी की।
बिना चले कब कहाँ हुई है
मंज़िल पूरी यहाँ किसी की।।
पर्वत की चोटी छूने को
पर्वत पर चढ़ना पड़ता है।
सागर से मोती लाने को
गोता खाना ही पड़ता है।।
उद्यम किए बिना तो चींटी
भी अपना घर बना न पाती।
उद्यम किए बिना न सिंह को
भी अपना शिकार मिल पाता।।
इच्‍छा पूरी होती तब, जब
उसके साथ जुड़ा हो उद्यम।
प्राप्‍त सफलता करने का है,
‘मूल मंत्र’ उद्योग परिश्रम।।

जानिए- कौन हैं IBM के नये CEO अरविंद कृष्णा

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ये भारत के लिए गौरव की बात है की IBM जैसी नामी कंपनी में भारतीय मूल के अरविंद कृष्णा को CEO बनाया गया है . यह पहली बार नहीं है जब किसी भारतीय को इतनी बड़ी कम्पनी का सीईओ बनाया गया है . अरविंद कृष्णा  प्रमुख अमेरिकी टेक समूह के चौथे भारतीय मूल के CEO होंगे. इस सूची में माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला, गूगल के सुंदर पिचाई और एडोब के शांतनु नारायण का नाम शामिल है. तो चलिए जानते है की कौन हैं अरविंद कृष्णा, कहां से की है पढ़ाई, क्यों दिया गया उन्हें इतना महत्वपूर्ण पद.

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ARVIND KRISHNA BIOGRAPHY HINDI

जानिए कौन है अरविंद कृष्णा

अरविन्द कृष्णा का जन्म 1962 को वेस्ट गोदावरी आँध्र प्रदेश में हुआ था . उनके पिता का नाम मेजर जनरल विजय कृष्णा था जो इंडियन आर्मी में काम करते थे . उनकी माता का नाम आरती कृष्णा था जो इंडियन आर्मी की विधवाओ के कल्याण का काम कराती थी .

शुरूआती जीवन और शिक्षा 

अरविन्द कृष्णा ने स्कूल की पढाई  St Joseph’s Academy, Dehradun से की और इंटर की पढाई Stanes SchoolCoonoorTamil Nadu से की . इसके बाद उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर (IIT KANPUR) उत्तर प्रदेश , भारत (1980 से 1985 तक) से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बैचलर इन इंजीनियरिंग की पढ़ाई की . इसके बाद वे आगे की पढाई के लिए अमेरिका चले गए . अरविंद कृष्ण ने 1990 में  यूनिवर्सिटी ऑफ इलनॉइज, अर्बाना शैंपेन से इलेक्ट्रिकल और कंप्यूटर इंजीनियरिंग में पीएच.डी. की पढ़ाई की.

1990 में ज्वाइन की IBM

पीएचडी की पढाई के बाद अरविन्द कृष्णा ने 1990 में आईबीएम कंपनी ज्वाइन कर ली . वो आईबीएम के क्लाउड और कॉग्न‍िटिव सॉफ्टवेयर (IBM’s cloud and cognitive software) में सीनियर वाइस प्रेसीडेंट के पद पर थे जहां वे आईबीएम बिजनेस यूनिट का नेतृत्व करते थे .अरविंद कृष्णा की जिम्मेदारियों में आईबीएम क्लाउड, आईबीएम सिक्योरिटी और कॉग्निटिव एप्लिकेशन बिजनेस और आईबीएम रिसर्च भी शामिल था . 2018 में 34 बिलियन अमेरिकी डॉलर में रेड हैट के आईबीएम के अधिग्रहण का श्रेय अरविन्द कृष्णा को दिया जाता है.

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आईबीएम का स्थापना

आईबीएम (इंटरनेशनल बिजनेस मशीन्स कॉर्प) का स्थापना 16 जून 1911 को की गई थी। कम्प्यूटर कंपनियों में आईबीएम एकमात्र ऐसी कंपनी है जिसने अब तक तीन नोबेल पुरस्कार, चार टूरिंग पुरस्कार, पांच राष्ट्रीय प्रोद्योगिकी पदक तथा पांच राष्ट्रीय विज्ञान पदक जीते हैं। 1981 में आईबीएम ने पर्सनल कम्प्यूटर्स की बिक्री शुरू की जिसने आईबीएम को जल्द ही दुनिया की श्रेष्ठतम कंपनियों में एक बना दिया।

उनके प्रतिभा से खुश होकर निदेशक मंडल ने बनाया सीईओ 

31 जनवरी 2020 कंपनी के निदेशक मंडल ने गिन्नी रोमेटी  के स्थान पर अरविन्द कृष्णा  को कंपनी के नए सीईओ के रूप में चुना है। अरविंद कंपनी के निदेशक मंडल के सदस्य भी होंगे। आईबीएम की मौजूदा सीईओ गिन्नी रोमेटी करीब 40 साल से कंपनी से जुड़ी हैं। वे इस साल के आखिर में सेवानिवृत्त होंगी। आईबीएम के सीईओ पद पर अरविंद की नियुक्ति छह अप्रैल को होगी।

सीईओ चुने जाने पर कंपनी की एक प्रेस रिलीज में अरविंद ने कहा,

“मैं IBM का नया कार्यकारी अधिकारी चुने जाने को लेकर रोमांचित हूं। गिन्नी और निदेशक मंडल ने मुझ पर जो भरोसा जताया है, मैं उसके लिए आभारी हूं।”

वह एक प्रमुख अमेरिकी टेक समूह के चौथे भारतीय मूल केCEO होंगे. इस सूची में माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला, गूगल के सुंदर पिचाई और एडोब के शांतनु नारायण का नाम शामिल है.

2020 बिहार की छुट्टियों का कैलेंडर- Bihar State Calender 2020

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Bihar Rajya Calender 2020
Bihar Rajya Calender 2020

Bihar State Calender 2020 Free Download 

बिहार राज्यपाल द्वारा जारी 2020 का कैलेंडर

2020 में घट गई सरकारी छुट्टियां, जानिए किन 35 दिनों को सरकार ने घोषित किया अवकाश

साल 2020 में सरकारी छुट्टियों की संख्या कम हो गई है.पिछले साल में कुल 37 दिन सरकारी अवकाश थे जबकि 2020 में छुट्टियों की संख्या 35 है.

Bihar Rajya Calender 2020
Bihar Rajya Calender 2020

 

 

तारीख- दिन त्योहारों के नाम
2 जनवरी गुरुवार गुरु गोविन्द सिंह जयंती
26 जनवरी रविवार गणतंत्र दिवस
 30जनवरी गुरुवार वसंत पंचमी
9 फरवरी रविवार संत रविदास जयंती
21 फरवरी शुक्रवार महाशिवरात्रि
 10 मार्च मंगलवार होली
11 मार्च बुधवार होली
22 मार्च रविवार बिहार दिवस
01 अप्रैल बुधवार सम्राट अशोक अष्टमी
02 अप्रैल गुरुवार राम नवमी
06 अप्रैल सोमवार महावीर जयंती
09 अप्रैल गुरुवार शब ए बारात
10 अप्रैल शुक्रवार गुड फ्राइडे
14 अप्रैल मंगलवार डॉ भीमराव अंबेडकर का जन्म दिवस
23 अप्रैल गुरुवार वीर कुंवर सिंह जयंती
01 मई शुक्रवार मजदूर दिवस
07 मई गुरुवार बुद्ध पूर्णिमा
25 मई सोमवार ईद उल फितर
05 जून शुक्रवार कवीर जयंती
01 अगस्त शनिवार बकरीद
11  अगस्त मंगलवार जन्माष्टमी
15 अगस्त शनिवार स्वतंत्रता दिवस
30 अगस्त रविवार मोहर्रम
02 अक्टूबर शुक्रवार गांधी जयंती
08 अक्टूबर शुक्रवार चेहल्लुम
23 अक्टूबर शुक्रवार दशहरा / सप्तमी
24 अक्टूबर शनिवार दशहरा / महाअष्टमी
25 अक्टूबर रविवार दशहरा / महानवमी
26  अक्टूबर सोमवार दशहरा / विजयादशमी
14 नवंबर शनिवार दीपावली
16 नवंबर सोमवार भैया दूज / चित्रगुप्त जयंती
20 नवंबर शुक्रवार छठ पूजा
21 नवंबर शनिवार छठ पूजा
30 नवंबर सोमवार गुरु नानक जयंती / हजरत मोहम्मद साहब जयंती
25 दिसंबर शुक्रवार क्रिसमस डे

 

BIRBAL JHA BIOGRAPHY IN HINDI – बीरबल झा जीवन परिचय

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BIRBAL JHA BIOGRAPHY IN HINDI

बीरबल झा जीवन परिचय

आपके जीवन का लक्ष्य क्या है? आप अपने जीवन में क्या बनना चाहते हैं? ये जीवन के कुछ ऐसे बुनियादी सवाल हैं जिससे हम सब कभी-न-कभी जरूर गुजरते हैं। अपने जीवन को ऊंचाई देने के लिए हम बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाते हैं, बड़े-बड़े सपने देखते हैं। लेकिन सच तो यह है कि कई बार हमारी ज़िंदगी किसी छोटी-सी बात से भी अपनी मंज़िल तय कर लेती है। यह कहानी उसी की मिशाल है।

अंग्रेजी शेरनी के दूध की तरह है

कहानी की शुरुआत बिहार के मधुबनी ज़िले के एक छोटे-से गांव से होती है। गांव के निर्धन परिवार का एक बच्चा दूसरे बच्चों की तरह ही रोज़ स्कूल जाता है और स्कूल से लौटकर खेती-बाड़ी के कामों में वह अपने परिवार का हाथ बंटाता है। लेकिन स्वाभाव से यह बच्चा कहीं-न-कहीं जिज्ञासु जरूर है और शायद तभी एक दिन स्कूल में गुरूजी की कही बात को वह अपने दिल से लगा लेता है। गुरूजी बच्चों को अंग्रेजी भाषा पढ़ाते हुए भारत के संविधान-निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के कथन का ज़िक्र करते हैं कि “अंग्रेजी शेरनी के दूध की तरह है और जो इसे पीता है, वह शेर बन जाता है।” बस, यही वह घटना है जहाँ से उस छोटे से बालक के जीवन में एक नए सपने का जन्म होता है। अंग्रेजी पढ़ने और उसमें महारत हासिल करने की ज़िद्द ही अब उस बच्चे की ज़िंदगी का आखिरी मकसद बन जाता है।

BIRBAL JHA BIOGRAPHY IN HINDI - बीरबल झा जीवन परिचय

BIRBAL JHA BIOGRAPHY IN HINDI

ढाबे पर किया वेटर का काम

कहते हैं कि जीवन के सपने को साकार करने के लिए सोना नहीं बल्कि जागना पड़ता है। इस कहानी के बच्चे के साथ भी यही हुआ। जिस तरह कुंदन को अपनी सुंदरता पाने के लिए पहले आग में तपना पड़ता है ठीक उसी तरह छोटी-सी उम्र में ही गांव से निकलकर पटना आना और फिर अपने सपने को आगे बढ़ाने के लिए ज़द्दोज़हद करने की कहानी कुछ ऐसी ही है। केवल 27 रूपये लेकर घर से निकले इस बच्चे को पटना के मुसल्लहपुर मोहल्ले में एक ढाबे पर वेटर का काम मिल गया। ज़िंदगी को सहारा मिला तो धीरे-धीरे सहयोगी भी मिलने लगे। प्रदीप झा ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी जान-पहचान से एक प्रिंटिंग प्रेस जिसका नाम ‘मुरलीधर प्रेस’ था, में चपरासी की नौकरी दिला दी। बेशक, ज़िंदगी कुछ आसान हुई मगर रास्ते उतने ही मुश्किलों से भरे थे। पढ़ना, आजीविका के लिए काम करना और अपने सपने को लेकर आगे बढ़ते जाना यही दिनचर्या बन गया। इस राह में न जाने कितनी ठोकरें मिलीं, भटकाव आया, भूखा सोया, सड़क किनारे सोया, कितने रास्ते बदले बगैरह-बगैरह के पाई-पाई का हिसाब अब भी उसके पास है। मगर खास बात यह कि वह कभी थका नहीं, हारा नहीं। इस बच्चे ने अपने सपने को अपनी आँखों से कभी ओझल न होने दिया। फिर सवाल तो यह भी है कि अगर ऐसा हो जाता तो यह कहानी भला मुकम्मल कैसी होती?

BIRBAL JHA BIOGRAPHY IN HINDI

‘ब्रिटिश लिंगुआ की स्थापना 

संघर्षों के साथ पढ़ाई करते हुए डबल मास्टर्स की डिग्री और फिर बिहार के प्रतिष्ठित पटना विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल करके अंग्रेजी भाषा के माध्यम से देश-दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाला वह बच्चा आगे चलकर डॉ. बीरबल झा के नाम से जाना गया। आज डॉ. बीरबल झा को बिहार ही नहीं बल्कि समूचे देश में अंग्रेजी भाषा में काम करने और उनके नवीन प्रयोगों के लिए बखूबी जाना जाता है। उन्होंने 1993 में सोशल एंटरप्राइज ‘ब्रिटिश लिंगुआ’ की स्थापना की और तब से ‘इंग्लिश फॉर ऑल’ के नाम समाज के कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को अंग्रेजी सिखाने की जो मुहिम शुरू की उसका लाभ लाखों बच्चों तक पहुंचा। आज वो बच्चे देश के विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हुए न केवल अपनी ज़िंदगी को बल्कि अपने समाज की ज़िंदगी को भी बदलने में कामयाब -हुए हैं।

अंग्रेजी भाषा के प्रति जुनून

डॉ. बीरबल झा का यह अंग्रेजी भाषा के प्रति जुनून था है कि उन्होंने इसे समाज बदलने का जरिया बनाया अनेक बच्चों और युवाओं को गरीबी के अंधे कुएं से बाहर निकाला। अंग्रेजी भाषा पर अबतक लगभग 25 किताबें लिख चुके डॉ. बीरबल झा के काम की प्रशंसा देश-विदेश की कई पत्र-पत्रिकाओं में हुई है और उन्हें अनेक पुरस्कारों से भी सम्मानित जा चुका है। हाल ही में उन्होंने एक मौलिक शिक्षण-प्रणाली ‘स्ट्रक्चरल-कम-इंटरेक्टिव मैथड’ (सिम) को भी विकसित किया है जो शिक्षा के क्षेत्र में बेहद लोकप्रिय हो रहा है। अंग्रेजी भाषा को सफलता का पर्याय बनाने वाले और मिशन में सक्रिय 47 वर्षीय डॉ झा वर्तमान में ‘लिंगुआ मल्टीसर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड’ के प्रबंध निदेशक हैं। आज उनकी पहचान वर्ल्ड सेलिब्रिटी के रूप में है ।

राष्ट्रिय समाचार पत्रों में स्तंभकार के रूप में भी किया काम 

डॉ झा की लिखी ‘इंग्लिशिया बोली‘ नाटक, जिसमें देश में अंग्रेजी शिक्षा की आवश्यकता को दर्शाया गया है, 2013 प्रकाशित हुआ। वे एक प्रसिद्ध लेखक, सोशल ऑन्टरप्रेनर, सामाजिक उद्यमी, सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता, गीतकार और भाषाविद भी हैं। वे दैनिक जागरण के काॅलम ‘सीखें सही अंग्रेजी‘ और हिन्दुस्तान के ‘जानो इंग्लिश‘ के स्तंभकार रहें हैं। साथ हीं वे विभिन्न दैनिक समाचार पत्रों में स्तंभों के माध्यम से पाठकों और शिक्षार्थियों की मदद भी करते रहे हैं।

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विदेशों में भी लहराया परचम 

कई अन्य हस्तियों के अलावा, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एलिजाबेथ शॉएल ने डॉ झा की किताब ‘सेलिब्रेट योर लाइफ‘ की भूरी-भूरी प्रशंशा की। उनकी विशेषज्ञता, दक्षता और मेधा को मानते हुए, बिहार सरकार ने डॉ झा के संगठन को 2009 में पहली बार बिहार के सरकारी उच्च विद्यालयों के शिक्षकों के लिए ‘स्पोकेन इंग्लिश एंड कैपेसिटी बिल्डिंग‘ प्रशिक्षण का काम भी सौंपा, जो काफ़ी सफल रहा । हजारों दलित युवक- युवती को अंग्रेजी का सफल प्रशिक्षण देकर जीवन शैली बदली।

2010 में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में ब्रिटिश लिंगुआ ने प्रशिक्षण दल का सफल नेतृत्व किया। इस अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम में दिल्ली के प्रथम संपर्क सूत्र के रूप में काम करने बाले लोगों को अंग्रेजी और व्यवहार कौशल का प्रशिक्षण देने का काम उनकी संस्था ने किया था।

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पाग बचाओ अभियान 

2016 में मिथिलालोक फाउंडेशन द्वारा शुरू किए गए ‘पाग बचाओ अभियान‘ एक आंदोलन के रूप में प्रसिद्ध रहा जिसकी अगुवाई डॉ झा ने अध्यक्ष के रूप में की। जिसके परिणामस्वरूप 2017 में केंद्र सरकार ने ‘पाग‘ जो मिथिलांचल की सांस्कृतिक प्रतीक चिन्ह है पर डाक टिकट जारी किया। उन्होंने बाल सुरक्षा को लेकर अभियान चलाया और ‘चाइल्ड सेफ्टी‘ शीर्षक से एक पुस्तक भी लिखी। सांस्कृतिक मूल्यों, देश प्रेम एवं बालहित में दर्जनों गानों के बोल भी लिखे। उनमें से एक गाने के बोल ‘क्या गुनाह था मेरे बच्चे का’ जिसे यूट्यूब पर पोस्ट किया गया। उसे अब तक 80 लाख से अधिक लोगो ने देखा व सुना है।

सक्रीय सामाजिक कार्यकर्त्ता 

2017 में जाने माने लेखक विवेकानंद झा की पुस्तक ‘द लिविंग लीजेंड्स ऑफ मिथिला‘ प्रकाशित हुई, जिसमें सामाजिक क्षेत्र में योगदान देने वाले 25 प्रमुख हस्तियों के नाम एवं उनकी कृति को भी अंकित किया गया। इस किताब में डॉ बीरबल झा को ‘यंगेस्ट लिविंग लीजेंड ऑफ मिथिला‘ का दर्जा दिया गया। डॉ झा ने एक सामजिक कार्यकर्त्ता होने के नाते ‘आदर्श विवाह अभियान‘ चलाया जिसके तहत उन्होंने 365 जोड़ियों की शादियां बिना दहेज़ के हीं करबाये।

संचार कौशल के विकास और अन्य सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र में उनके योगदान से प्रभावित होकर उन्हें ‘स्टार ऑफ एशिया’ के खिताब से नवाज़ा गया इसके अलावा भी कई पुरस्कार और प्रशंसा पत्र से उन्हें सम्मानित किया गया। उनकी विद्वता एवं वैचारिक प्रतिबद्धता ने न्यूयॉर्क टाइम्स का ध्यान इस ओर आकर्षित किया और 2003 में उन पर एक कहानी भी चलाई।

जानिए ट्रेन के मिडिल बर्थ से जुडी रेलवे के नियम के बारे में

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रेल यात्रा सबसे सस्ता और आरामदायक यात्रा माना जाता है . बहुत सारे लोग टिकट कटाने के वक्त ही अपना बर्थ सेलेक्ट कर लेते है . क्यूंकि बहुत सारे लोग ट्रेन में सफ़र के दौरान सामान एडजस्ट करने और सोने के दौरान होने वाली बहस से बचना चाहते है. लेकिन कई बार हमें मनचाहा बर्थ नहीं मिल पता है और हमें यात्रा के दौरान कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है . रेलवे ने यात्रियों की सुविधा के लिए कई नियम बनाये है . लेकिन बहुत सारे लोगों को इन नियमों की जानकारी नहीं है . ऊपर के बर्थ वाला यात्रि जब चाहे अपने बर्थ पर जाकर सो सकता है लेकिन सबसे ज्यादा दिक्कत लोअर और मिडिल बर्थ वाले को होती है . लोअर बर्थ वाले मुसाफिर अक्सर देर रात तक बैठे रहते हैं जिसके कारण मिडिल बर्थ वाले को सोने में परेशानी होती है . ऐसे में काम आते हैं रेलवे के नियम, मिडिल बर्थ को लेकर रेलवे के निमय अलग हैं. ये नियम बड़े काम के होते हैं.इन नियमों की जानकारी होना और उन्हें फोलो करना दोनों ही जरूरी है. इनकी जानकारी न होने पर अक्सर यात्री धोखा खाते हैं. 

मिडिल बर्थ के लिए सोने का नियम

रेलवे में मिडिल बर्थ पर सोने के लिए अलग नियम है . बहुत बार हम देखते है की मिडिल बर्थ पर सोने वाले यात्री, ट्रेन शुरू होते ही खोल कर सोने लगता है . इससे लोअर बर्थ वाले यात्री को भी मजबूरी में सोना पड़ता है. लोगो के बिच सोने को लेकर झगडा न हो इसलिए रेलवे ने कुछ नियम बनाये है, जिसकी जानकारी हम सभी को होनी बहुत जरुरी है .रेलवे के नियम के मुताबिक, मिडिल बर्थ पर सोने वाला यात्री अपनी बर्थ पर 10 बजे रात से सुबह 6 बजे तक ही सो सकता है. रात 10 से पहले अगर कोई यात्री मिडिल बर्थ खोलने से रोकना चाहे तो रोका जा सकता है. वहीं, सुबह 6 बजे के बाद बर्थ को नीचे करना होगा, ताकि अन्य यात्री लोअर बर्थ पर बैठ सकें.

दो स्टॉप का नियम

बहुत बार ऐसा होता है की हम जिस स्टेशन से चढने का टिकट लेते है उस स्टेशन पर न चढ़कर उसके अगले स्टेशन पर चढ़ पाते है . लेकिन ऐसा नहीं है की टीटीई आपका टिकट तुरंत ही किसी और को अलॉट कर देगा . रेलवे के नियम के अनुसार अगर आपकी ट्रेन किसी करणवश छुट जाती है तो टीटीई अगले दो स्टॉप या अगले एक घंटे तक (दोनों में जो पहले हो) आपकी सीट किसी और यात्री को अलॉट नहीं कर सकता है. यानि आप अगले  दो स्टॉप(एक घंटे के अन्दर ) में से किसी से आप अपनी  ट्रेन पकड़ सकते हैं . तीन स्टॉप गुजर जाने के बाद टीटीई के पास अधिकार होता है कि वह आरएसी लिस्ट में अगले व्यक्ति को सीट अलॉट कर दे. आप चाहे तो अपना बोर्डिंग स्टेशन IRCTC की वेबसाइट पर लॉग इन करके भी चेंज कर सकते है .

यात्रा को आगे बढ़ाना

अक्सर पर्व या त्यौहार के समय हम जिस स्टेशन तक जाना चाहते है उस स्टेशन तक की टिकट हमें नहीं मिल पाती है . उस स्थिति में हम कुछ स्टेशन पहले तक का टिकट ले लेते है . इस स्थिति में निर्धारित स्टेशन पर पहुंचने से पहले टीटीई को सूचित करके आप अपनी यात्रा को बढ़ा सकते हैं. टीटीई आपसे अतिरिक्त किराया वसूलेगा और आगे की यात्रा के लिए टिकट बना देगा. आपको अलग बर्थ मुहैया कराया जा सकता है. अगर खाली बर्थ नहीं मिला तो आपको बाकी यात्रा चेयर कार में करनी होगी.

रात 10 बजे के बाद TTE नहीं कर सकता टिकट चेक

लम्बी यात्रा के दौरान अक्सर यात्री 10 बजे खाना खाकर सोने लगते है और कई बार ट्रैवल टिकट एग्जामिनर (TTE) आकर उनका टिकट मांगता है जिससे यात्रियों की नींद ख़राब हो जाती है . इससे बहुत सारे यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है . इन परेशानियों से बचने के लिए भी रेलवे द्वारा नियम बनाये गए है . रात 10 बजे के बाद TTE  आपको डिस्टर्ब नहीं कर सकता है. टीटीई को सुबह 6 से रात 10 बजे के बीच ही टिकटों का वेरिफिकेशन करना जरूरी है. रात में सोने के बाद किसी भी पैसेंजर को डिस्टर्ब नहीं किया जा सकता. यह गाइडलाइन रेलवे बोर्ड की है. हालांकि, रात को 10 बजे के बाद यात्रा शुरू करने वाले यात्रियों पर यह नियम लागू नहीं होता है .