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Thursday, March 19, 2026
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CHEIF KI DAWAT BHISHM SAHANI

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चीफ की दावत – भीष्म साहनी

(हिंदी कहानी )

आज मिस्टर शामनाथ के घर चीफ की दावत थी।

शामनाथ और उनकी धर्मपत्नी को पसीना पोंछने की फुर्सत न थी। पत्नी ड्रेसिंग गाउन पहने, उलझे हुए बालों का जूड़ा बनाए मुँह पर फैली हुई सुर्खी और पाउड़र को मले और मिस्टर शामनाथ सिगरेट पर सिगरेट फूँकते हुए चीजों की फेहरिस्त हाथ में थामे, एक कमरे से दूसरे कमरे में आ-जा रहे थे।

आखिर पाँच बजते-बजते तैयारी मुकम्मल होने लगी। कुर्सियाँ, मेज, तिपाइयाँ, नैपकिन, फूल, सब बरामदे में पहुँच गए। ड्रिंक का इंतजाम बैठक में कर दिया गया। अब घर का फालतू सामान अलमारियों के पीछे और पलंगों के नीचे छिपाया जाने लगा। तभी शामनाथ के सामने सहसा एक अड़चन खड़ी हो गई, माँ का क्या होगा?

इस बात की ओर न उनका और न उनकी कुशल गृहिणी का ध्यान गया था। मिस्टर शामनाथ, श्रीमती की ओर घूम कर अंग्रेजी में बोले – ‘माँ का क्या होगा?’

श्रीमती काम करते-करते ठहर गईं, और थोडी देर तक सोचने के बाद बोलीं – ‘इन्हें पिछवाड़े इनकी सहेली के घर भेज दो, रात-भर बेशक वहीं रहें। कल आ जाएँ।’

शामनाथ सिगरेट मुँह में रखे, सिकुडी आँखों से श्रीमती के चेहरे की ओर देखते हुए पल-भर सोचते रहे, फिर सिर हिला कर बोले – ‘नहीं, मैं नहीं चाहता कि उस बुढ़िया का आना-जाना यहाँ फिर से शुरू हो। पहले ही बड़ी मुश्किल से बंद किया था। माँ से कहें कि जल्दी ही खाना खा के शाम को ही अपनी कोठरी में चली जाएँ। मेहमान कहीं आठ बजे आएँगे इससे पहले ही अपने काम से निबट लें।’

सुझाव ठीक था। दोनों को पसंद आया। मगर फिर सहसा श्रीमती बोल उठीं – ‘जो वह सो गईं और नींद में खर्राटे लेने लगीं, तो? साथ ही तो बरामदा है, जहाँ लोग खाना खाएँगे।’

‘तो इन्हें कह देंगे कि अंदर से दरवाजा बंद कर लें। मैं बाहर से ताला लगा दूँगा। या माँ को कह देता हूँ कि अंदर जा कर सोएँ नहीं, बैठी रहें, और क्या?’

‘और जो सो गई, तो? डिनर का क्या मालूम कब तक चले। ग्यारह-ग्यारह बजे तक तो तुम ड्रिंक ही करते रहते हो।’

शामनाथ कुछ खीज उठे, हाथ झटकते हुए बोले – ‘अच्छी-भली यह भाई के पास जा रही थीं। तुमने यूँ ही खुद अच्छा बनने के लिए बीच में टाँग अड़ा दी!’

‘वाह! तुम माँ और बेटे की बातों में मैं क्यों बुरी बनूँ? तुम जानो और वह जानें।’

मिस्टर शामनाथ चुप रहे। यह मौका बहस का न था, समस्या का हल ढूँढ़ने का था। उन्होंने घूम कर माँ की कोठरी की ओर देखा। कोठरी का दरवाजा बरामदे में खुलता था। बरामदे की ओर देखते हुए झट से बोले – मैंने सोच लिया है, – और उन्हीं कदमों माँ की कोठरी के बाहर जा खड़े हुए। माँ दीवार के साथ एक चौकी पर बैठी, दुपट्टे में मुँह-सिर लपेटे, माला जप रही थीं। सुबह से तैयारी होती देखते हुए माँ का भी दिल धड़क रहा था। बेटे के दफ्तर का बड़ा साहब घर पर आ रहा है, सारा काम सुभीते से चल जाय।

माँ, आज तुम खाना जल्दी खा लेना। मेहमान लोग साढ़े सात बजे आ जाएँगे।

माँ ने धीरे से मुँह पर से दुपट्टा हटाया और बेटे को देखते हुए कहा, आज मुझे खाना नहीं खाना है, बेटा, तुम जो जानते हो, मांस-मछली बने, तो मैं कुछ नहीं खाती।

जैसे भी हो, अपने काम से जल्दी निबट लेना।

अच्छा, बेटा।

और माँ, हम लोग पहले बैठक में बैठेंगे। उतनी देर तुम यहाँ बरामदे में बैठना। फिर जब हम यहाँ आ जाएँ, तो तुम गुसलखाने के रास्ते बैठक में चली जाना।

माँ अवाक बेटे का चेहरा देखने लगीं। फिर धीरे से बोलीं – अच्छा बेटा।

और माँ आज जल्दी सो नहीं जाना। तुम्हारे खर्राटों की आवाज दूर तक जाती है।

माँ लज्जित-सी आवाज में बोली – क्या करूँ, बेटा, मेरे बस की बात नहीं है। जब से बीमारी से उठी हूँ, नाक से साँस नहीं ले सकती।

मिस्टर शामनाथ ने इंतजाम तो कर दिया, फिर भी उनकी उधेड़-बुन खत्म नहीं हुई। जो चीफ अचानक उधर आ निकला, तो? आठ-दस मेहमान होंगे, देसी अफसर, उनकी स्त्रियाँ होंगी, कोई भी गुसलखाने की तरफ जा सकता है। क्षोभ और क्रोध में वह झुँझलाने लगे। एक कुर्सी को उठा कर बरामदे में कोठरी के बाहर रखते हुए बोले – आओ माँ, इस पर जरा बैठो तो।

माँ माला सँभालतीं, पल्ला ठीक करती उठीं, और धीरे से कुर्सी पर आ कर बैठ गई।

यूँ नहीं, माँ, टाँगें ऊपर चढ़ा कर नहीं बैठते। यह खाट नहीं हैं।

माँ ने टाँगें नीचे उतार लीं।

और खुदा के वास्ते नंगे पाँव नहीं घूमना। न ही वह खड़ाऊँ पहन कर सामने आना। किसी दिन तुम्हारी यह खड़ाऊँ उठा कर मैं बाहर फेंक दूँगा।

माँ चुप रहीं।

कपड़े कौन से पहनोगी, माँ?

जो है, वही पहनूँगी, बेटा! जो कहो, पहन लूँ।

मिस्टर शामनाथ सिगरेट मुँह में रखे, फिर अधखुली आँखों से माँ की ओर देखने लगे, और माँ के कपड़ों की सोचने लगे। शामनाथ हर बात में तरतीब चाहते थे। घर का सब संचालन उनके अपने हाथ में था। खूँटियाँ कमरों में कहाँ लगाई जाएँ, बिस्तर कहाँ पर बिछे, किस रंग के पर्दे लगाएँ जाएँ, श्रीमती कौन-सी साड़ी पहनें, मेज किस साइज की हो… शामनाथ को चिंता थी कि अगर चीफ का साक्षात माँ से हो गया, तो कहीं लज्जित नहीं होना पडे। माँ को सिर से पाँव तक देखते हुए बोले – तुम सफेद कमीज और सफेद सलवार पहन लो, माँ। पहन के आओ तो, जरा देखूँ।

माँ धीरे से उठीं और अपनी कोठरी में कपड़े पहनने चली गईं।

यह माँ का झमेला ही रहेगा, उन्होंने फिर अंग्रेजी में अपनी स्त्री से कहा – कोई ढंग की बात हो, तो भी कोई कहे। अगर कहीं कोई उल्टी-सीधी बात हो गई, चीफ को बुरा लगा, तो सारा मजा जाता रहेगा।

माँ सफेद कमीज और सफेद सलवार पहन कर बाहर निकलीं। छोटा-सा कद, सफेद कपड़ों में लिपटा, छोटा-सा सूखा हुआ शरीर, धुँधली आँखें, केवल सिर के आधे झड़े हुए बाल पल्ले की ओट में छिप पाए थे। पहले से कुछ ही कम कुरूप नजर आ रही थीं।

चलो, ठीक है। कोई चूड़ियाँ-वूड़ियाँ हों, तो वह भी पहन लो। कोई हर्ज नहीं।

चूड़ियाँ कहाँ से लाऊँ, बेटा? तुम तो जानते हो, सब जेवर तुम्हारी पढ़ाई में बिक गए।

यह वाक्य शामनाथ को तीर की तरह लगा। तिनक कर बोले – यह कौन-सा राग छेड़ दिया, माँ! सीधा कह दो, नहीं हैं जेवर, बस! इससे पढ़ाई-वढ़ाई का क्या तअल्लुक है! जो जेवर बिका, तो कुछ बन कर ही आया हूँ, निरा लँडूरा तो नहीं लौट आया। जितना दिया था, उससे दुगना ले लेना।

मेरी जीभ जल जाय, बेटा, तुमसे जेवर लूँगी? मेरे मुँह से यूँ ही निकल गया। जो होते, तो लाख बार पहनती!

साढ़े पाँच बज चुके थे। अभी मिस्टर शामनाथ को खुद भी नहा-धो कर तैयार होना था। श्रीमती कब की अपने कमरे में जा चुकी थीं। शामनाथ जाते हुए एक बार फिर माँ को हिदायत करते गए – माँ, रोज की तरह गुमसुम बन के नहीं बैठी रहना। अगर साहब इधर आ निकलें और कोई बात पूछें, तो ठीक तरह से बात का जवाब देना।

मैं न पढ़ी, न लिखी, बेटा, मैं क्या बात करूँगी। तुम कह देना, माँ अनपढ़ है, कुछ जानती-समझती नहीं। वह नहीं पूछेगा।

सात बजते-बजते माँ का दिल धक-धक करने लगा। अगर चीफ सामने आ गया और उसने कुछ पूछा, तो वह क्या जवाब देंगी। अंग्रेज को तो दूर से ही देख कर घबरा उठती थीं, यह तो अमरीकी है। न मालूम क्या पूछे। मैं क्या कहूँगी। माँ का जी चाहा कि चुपचाप पिछवाड़े विधवा सहेली के घर चली जाएँ। मगर बेटे के हुक्म को कैसे टाल सकती थीं। चुपचाप कुर्सी पर से टाँगें लटकाए वहीं बैठी रही।

एक कामयाब पार्टी वह है, जिसमें ड्रिंक कामयाबी से चल जाएँ। शामनाथ की पार्टी सफलता के शिखर चूमने लगी। वार्तालाप उसी रौ में बह रहा था, जिस रौ में गिलास भरे जा रहे थे। कहीं कोई रूकावट न थी, कोई अड़चन न थी। साहब को व्हिस्की पसंद आई थी। मेमसाहब को पर्दे पसंद आए थे, सोफा-कवर का डिजाइन पसंद आया था, कमरे की सजावट पसंद आई थी। इससे बढ़ कर क्या चाहिए। साहब तो ड्रिंक के दूसरे दौर में ही चुटकुले और कहानियाँ कहने लग गए थे। दफ्तर में जितना रोब रखते थे, यहाँ पर उतने ही दोस्त-परवर हो रहे थे और उनकी स्त्री, काला गाउन पहने, गले में सफेद मोतियों का हार, सेंट और पाउड़र की महक से ओत-प्रोत, कमरे में बैठी सभी देसी स्त्रियों की आराधना का केंद्र बनी हुई थीं। बात-बात पर हँसतीं, बात-बात पर सिर हिलातीं और शामनाथ की स्त्री से तो ऐसे बातें कर रही थीं, जैसे उनकी पुरानी सहेली हों।

और इसी रो में पीते-पिलाते साढ़े दस बज गए। वक्त गुजरते पता ही न चला।

आखिर सब लोग अपने-अपने गिलासों में से आखिरी घूँट पी कर खाना खाने के लिए उठे और बैठक से बाहर निकले। आगे-आगे शामनाथ रास्ता दिखाते हुए, पीछे चीफ और दूसरे मेहमान।

बरामदे में पहुँचते ही शामनाथ सहसा ठिठक गए। जो दृश्य उन्होंने देखा, उससे उनकी टाँगें लड़खड़ा गई, और क्षण-भर में सारा नशा हिरन होने लगा। बरामदे में ऐन कोठरी के बाहर माँ अपनी कुर्सी पर ज्यों-की-त्यों बैठी थीं। मगर दोनों पाँव कुर्सी की सीट पर रखे हुए, और सिर दाएँ से बाएँ और बाएँ से दाएँ झूल रहा था और मुँह में से लगातार गहरे खर्राटों की आवाजें आ रही थीं। जब सिर कुछ देर के लिए टेढ़ा हो कर एक तरफ को थम जाता, तो खर्राटें और भी गहरे हो उठते। और फिर जब झटके-से नींद टूटती, तो सिर फिर दाएँ से बाएँ झूलने लगता। पल्ला सिर पर से खिसक आया था, और माँ के झरे हुए बाल, आधे गंजे सिर पर अस्त-व्यस्त बिखर रहे थे।

देखते ही शामनाथ क्रुद्ध हो उठे। जी चाहा कि माँ को धक्का दे कर उठा दें, और उन्हें कोठरी में धकेल दें, मगर ऐसा करना संभव न था, चीफ और बाकी मेहमान पास खड़े थे।

माँ को देखते ही देसी अफसरों की कुछ स्त्रियाँ हँस दीं कि इतने में चीफ ने धीरे से कहा – पुअर डियर!

माँ हड़बड़ा के उठ बैठीं। सामने खड़े इतने लोगों को देख कर ऐसी घबराई कि कुछ कहते न बना। झट से पल्ला सिर पर रखती हुई खड़ी हो गईं और जमीन को देखने लगीं। उनके पाँव लड़खड़ाने लगे और हाथों की उँगलियाँ थर-थर काँपने लगीं।

माँ, तुम जाके सो जाओ, तुम क्यों इतनी देर तक जाग रही थीं? – और खिसियाई हुई नजरों से शामनाथ चीफ के मुँह की ओर देखने लगे।

चीफ के चेहरे पर मुस्कराहट थी। वह वहीं खड़े-खड़े बोले, नमस्ते!

माँ ने झिझकते हुए, अपने में सिमटते हुए दोनों हाथ जोड़े, मगर एक हाथ दुपट्टे के अंदर माला को पकड़े हुए था, दूसरा बाहर, ठीक तरह से नमस्ते भी न कर पाई। शामनाथ इस पर भी खिन्न हो उठे।

इतने में चीफ ने अपना दायाँ हाथ, हाथ मिलाने के लिए माँ के आगे किया। माँ और भी घबरा उठीं।

माँ, हाथ मिलाओ।

पर हाथ कैसे मिलातीं? दाएँ हाथ में तो माला थी। घबराहट में माँ ने बायाँ हाथ ही साहब के दाएँ हाथ में रख दिया। शामनाथ दिल ही दिल में जल उठे। देसी अफसरों की स्त्रियाँ खिलखिला कर हँस पडीं।

यूँ नहीं, माँ! तुम तो जानती हो, दायाँ हाथ मिलाया जाता है। दायाँ हाथ मिलाओ।

मगर तब तक चीफ माँ का बायाँ हाथ ही बार-बार हिला कर कह रहे थे – हाउ डू यू डू?

कहो माँ, मैं ठीक हूँ, खैरियत से हूँ।

माँ कुछ बडबड़ाई।

माँ कहती हैं, मैं ठीक हूँ। कहो माँ, हाउ डू यू डू।

माँ धीरे से सकुचाते हुए बोलीं – हौ डू डू ..

एक बार फिर कहकहा उठा।

वातावरण हल्का होने लगा। साहब ने स्थिति सँभाल ली थी। लोग हँसने-चहकने लगे थे। शामनाथ के मन का क्षोभ भी कुछ-कुछ कम होने लगा था।

साहब अपने हाथ में माँ का हाथ अब भी पकड़े हुए थे, और माँ सिकुड़ी जा रही थीं। साहब के मुँह से शराब की बू आ रही थी।

शामनाथ अंग्रेजी में बोले – मेरी माँ गाँव की रहने वाली हैं। उमर भर गाँव में रही हैं। इसलिए आपसे लजाती है।

साहब इस पर खुश नजर आए। बोले – सच? मुझे गाँव के लोग बहुत पसंद हैं, तब तो तुम्हारी माँ गाँव के गीत और नाच भी जानती होंगी? चीफ खुशी से सिर हिलाते हुए माँ को टकटकी बाँधे देखने लगे।

माँ, साहब कहते हैं, कोई गाना सुनाओ। कोई पुराना गीत तुम्हें तो कितने ही याद होंगे।

माँ धीरे से बोली – मैं क्या गाऊँगी बेटा। मैंने कब गाया है?

वाह, माँ! मेहमान का कहा भी कोई टालता है?

साहब ने इतना रीझ से कहा है, नहीं गाओगी, तो साहब बुरा मानेंगे।

मैं क्या गाऊँ, बेटा। मुझे क्या आता है?

वाह! कोई बढ़िया टप्पे सुना दो। दो पत्तर अनाराँ दे …

देसी अफसर और उनकी स्त्रियों ने इस सुझाव पर तालियाँ पीटी। माँ कभी दीन दृष्टि से बेटे के चेहरे को देखतीं, कभी पास खड़ी बहू के चेहरे को।

इतने में बेटे ने गंभीर आदेश-भरे लिहाज में कहा – माँ!

इसके बाद हाँ या ना सवाल ही न उठता था। माँ बैठ गईं और क्षीण, दुर्बल, लरजती आवाज में एक पुराना विवाह का गीत गाने लगीं –

हरिया नी माए, हरिया नी भैणे

हरिया ते भागी भरिया है!

देसी स्त्रियाँ खिलखिला के हँस उठीं। तीन पंक्तियाँ गा के माँ चुप हो गईं।

बरामदा तालियों से गूँज उठा। साहब तालियाँ पीटना बंद ही न करते थे। शामनाथ की खीज प्रसन्नता और गर्व में बदल उठी थी। माँ ने पार्टी में नया रंग भर दिया था।

तालियाँ थमने पर साहब बोले – पंजाब के गाँवों की दस्तकारी क्या है?

शामनाथ खुशी में झूम रहे थे। बोले – ओ, बहुत कुछ – साहब! मैं आपको एक सेट उन चीजों का भेंट करूँगा। आप उन्हें देख कर खुश होंगे।

मगर साहब ने सिर हिला कर अंग्रेजी में फिर पूछा – नहीं, मैं दुकानों की चीज नहीं माँगता। पंजाबियों के घरों में क्या बनता है, औरतें खुद क्या बनाती हैं?

शामनाथ कुछ सोचते हुए बोले – लड़कियाँ गुड़ियाँ बनाती हैं, और फुलकारियाँ बनाती हैं।

फुलकारी क्या?

शामनाथ फुलकारी का मतलब समझाने की असफल चेष्टा करने के बाद माँ को बोले – क्यों, माँ, कोई पुरानी फुलकारी घर में हैं?

माँ चुपचाप अंदर गईं और अपनी पुरानी फुलकारी उठा लाईं।

साहब बड़ी रुचि से फुलकारी देखने लगे। पुरानी फुलकारी थी, जगह-जगह से उसके तागे टूट रहे थे और कपड़ा फटने लगा था। साहब की रुचि को देख कर शामनाथ बोले – यह फटी हुई है, साहब, मैं आपको नई बनवा दूँगा। माँ बना देंगी। क्यों, माँ साहब को फुलकारी बहुत पसंद हैं, इन्हें ऐसी ही एक फुलकारी बना दोगी न?

माँ चुप रहीं। फिर डरते-डरते धीरे से बोलीं – अब मेरी नजर कहाँ है, बेटा! बूढ़ी आँखें क्या देखेंगी?

मगर माँ का वाक्य बीच में ही तोड़ते हुए शामनाथ साहब को बोले – वह जरूर बना देंगी। आप उसे देख कर खुश होंगे।

साहब ने सिर हिलाया, धन्यवाद किया और हल्के-हल्के झूमते हुए खाने की मेज की ओर बढ़ गए। बाकी मेहमान भी उनके पीछे-पीछे हो लिए।

जब मेहमान बैठ गए और माँ पर से सबकी आँखें हट गईं, तो माँ धीरे से कुर्सी पर से उठीं, और सबसे नजरें बचाती हुई अपनी कोठरी में चली गईं।

मगर कोठरी में बैठने की देर थी कि आँखों में छल-छल आँसू बहने लगे। वह दुपट्टे से बार-बार उन्हें पोंछतीं, पर वह बार-बार उमड़ आते, जैसे बरसों का बाँध तोड़ कर उमड़ आए हों। माँ ने बहुतेरा दिल को समझाया, हाथ जोड़े, भगवान का नाम लिया, बेटे के चिरायु होने की प्रार्थना की, बार-बार आँखें बंद कीं, मगर आँसू बरसात के पानी की तरह जैसे थमने में ही न आते थे।

आधी रात का वक्त होगा। मेहमान खाना खा कर एक-एक करके जा चुके थे। माँ दीवार से सट कर बैठी आँखें फाड़े दीवार को देखे जा रही थीं। घर के वातावरण में तनाव ढीला पड़ चुका था। मुहल्ले की निस्तब्धता शामनाथ के घर भी छा चुकी थी, केवल रसोई में प्लेटों के खनकने की आवाज आ रही थी। तभी सहसा माँ की कोठरी का दरवाजा जोर से खटकने लगा।

माँ, दरवाजा खोलो।

माँ का दिल बैठ गया। हड़बड़ा कर उठ बैठीं। क्या मुझसे फिर कोई भूल हो गई? माँ कितनी देर से अपने आपको कोस रही थीं कि क्यों उन्हें नींद आ गई, क्यों वह ऊँघने लगीं। क्या बेटे ने अभी तक क्षमा नहीं किया? माँ उठीं और काँपते हाथों से दरवाजा खोल दिया।

दरवाजे खुलते ही शामनाथ झूमते हुए आगे बढ़ आए और माँ को आलिंगन में भर लिया।

ओ अम्मी! तुमने तो आज रंग ला दिया! …साहब तुमसे इतना खुश हुआ कि क्या कहूँ। ओ अम्मी! अम्मी!

माँ की छोटी-सी काया सिमट कर बेटे के आलिंगन में छिप गई। माँ की आँखों में फिर आँसू आ गए। उन्हें पोंछती हुई धीरे से बोली – बेटा, तुम मुझे हरिद्वार भेज दो। मैं कब से कह रही हूँ।

शामनाथ का झूमना सहसा बंद हो गया और उनकी पेशानी पर फिर तनाव के बल पड़ने लगे। उनकी बाँहें माँ के शरीर पर से हट आईं।

क्या कहा, माँ? यह कौन-सा राग तुमने फिर छेड़ दिया?

शामनाथ का क्रोध बढ़ने लगा था, बोलते गए – तुम मुझे बदनाम करना चाहती हो, ताकि दुनिया कहे कि बेटा माँ को अपने पास नहीं रख सकता।

नहीं बेटा, अब तुम अपनी बहू के साथ जैसा मन चाहे रहो। मैंने अपना खा-पहन लिया। अब यहाँ क्या करूँगी। जो थोड़े दिन जिंदगानी के बाकी हैं, भगवान का नाम लूँगी। तुम मुझे हरिद्वार भेज दो!

तुम चली जाओगी, तो फुलकारी कौन बनाएगा? साहब से तुम्हारे सामने ही फुलकारी देने का इकरार किया है।

मेरी आँखें अब नहीं हैं, बेटा, जो फुलकारी बना सकूँ। तुम कहीं और से बनवा लो। बनी-बनाई ले लो।

माँ, तुम मुझे धोखा देके यूँ चली जाओगी? मेरा बनता काम बिगाड़ोगी? जानती नही, साहब खुश होगा, तो मुझे तरक्की मिलेगी!

माँ चुप हो गईं। फिर बेटे के मुँह की ओर देखती हुई बोली – क्या तेरी तरक्की होगी? क्या साहब तेरी तरक्की कर देगा? क्या उसने कुछ कहा है?

कहा नहीं, मगर देखती नहीं, कितना खुश गया है। कहता था, जब तेरी माँ फुलकारी बनाना शुरू करेंगी, तो मैं देखने आऊँगा कि कैसे बनाती हैं। जो साहब खुश हो गया, तो मुझे इससे बड़ी नौकरी भी मिल सकती है, मैं बड़ा अफसर बन सकता हूँ।

माँ के चेहरे का रंग बदलने लगा, धीरे-धीरे उनका झुर्रियों-भरा मुँह खिलने लगा, आँखों में हल्की-हल्की चमक आने लगी।

तो तेरी तरक्की होगी बेटा?

तरक्की यूँ ही हो जाएगी? साहब को खुश रखूँगा, तो कुछ करेगा, वरना उसकी खिदमत करनेवाले और थोड़े हैं?

तो मैं बना दूँगी, बेटा, जैसे बन पड़ेगा, बना दूँगी।

और माँ दिल ही दिल में फिर बेटे के उज्ज्वल भविष्य की कामनाएँ करने लगीं और मिस्टर शामनाथ, अब सो जाओ, माँ, कहते हुए, तनिक लड़खड़ाते हुए अपने कमरे की ओर घूम गए।

BHOJPURI QUOTES-नीमन विचार

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BHOJPURI QUOTES-नीमन विचार

इंसान के बोले के सीखे में तीन साल लाग जला 

लेकिन का बोले के बा इ सीखे में पूरा जिंदगी लाग जाला

 

MOTHERS DAY FUNNY IMAGE HINDI

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MOTHERS DAY FUNNY IMAGE HINDI

DEAR GIRLS

AGAR TUM APNE PAPA KI PARI HO 

TO HAM BHI APNI MA KE

NASPITE HAI

हम बिहारी हैं 

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बिहारी टैग लाइन

 

हम बिहारी हैं 

हमलोग किसी से उलझते नहीं हैअझूरा जाते हैं 

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PALAM KALYANSUNDARAM BIOGRAPHY IN HINDI

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पालम कल्याणसुंदरम

(सामाजिक कार्यकर्ता)

मैंने शादी नहीं की।
 मेरी जरूरतें बहुत कम रही हैं।
 इसलिए मैं अपना वेतन और पेंशन दान कर देता था।
 यह समाज ही मेरा परिवार है।
 मैं समाज के लिए जीता हूं। 
हर इंसान मौत के बाद इस दुनिया से खाली हाथ जाता है, 
फिर संपत्ति जोड़ने से भला क्या फायदा?
स्कूल उनके गांव से करीब दस किलोमीटर दूर था। गांव में न सड़क थी, न बिजली। दूर-दूर तक कोई दुकान नहीं थी। गांव में सिर्फ 30 घर थे। कल्याणसुंदरम गांव के अकेले बच्चे थे, जिन्हें स्कूल जाने का मौका मिला। इसके लिए रोज दस किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।
यह कहानी तमिलनाडु के एक छोटे से गांव मेलाकारुवेलनगुलम की है। यह तिरुनेलवेली जिले में है। कल्याणसुंदरम इसी गांव में पले-बढ़े। एक साल थे जब उनके पिता की मौत हो गई। मां ने उन्हे पाला। पति के निधन के बाद बेटे को पढ़ा-लिखाकर नेक इंसान उनके जीवन का एकमात्र मकसद बन गया।
कल्याणसुंदरम बताते हैं, मुङो अकेले स्कूल जाना अच्छा नहीं लगता था। मैंने साथी बच्चों से पूछा, वे स्कूल क्यों नहीं जाते, तो जवाब मिला कि उनके परिवार के पास स्कूल की फीस देने के पैसे नहीं हैं। मैं इस बात से बहुत दुखी था। मैं उनकी मदद करना चाहता था, पर तब मैं बहुत छोटा था। गांव में बिजली नहीं थी, लिहाजा मां दीये की रोशनी में काम करती थीं। जब बेटा स्कूल जाने लगा, तो वह घर में लैंप ले आईं, ताकि बेटे को पढ़ाई में दिक्कत न हो।
कल्याणसुंदरम बताते हैं, मां ने तीन बातें सिखाई। कभी लालच मत करो, अपनी कमाई का कुछ हिस्सा दान करो और हर दिन एक नेक काम करो। मां की बात मन में घर कर गई।तब वह 16 साल के थे। उनकी आवाज लड़कियों जैसी पतली थी। दोस्त चिढ़ाने लगे। धीरे-धीरे वह हीन भावना के शिकार हो गए। आत्महत्या का ख्याल आने लगा। एक सुबह एक पत्रिका में उन्होंने प्रेरक लेख पढ़ा और लेखक से मिलने पहुंच गए। लेखक से उन्होंने कहा, मेरी आवाज लड़कियों जैसी है। सब चिढ़ाते हैं। मन करता है कि जान दे दूं। यह सुनकर लेखक महोदय मुस्कराए और कहा, इस बात की फिक्र मत करो कि तुम कैसा बोलते हो? कुछ ऐसा करो कि लोग तुम्हारे बारे में अच्छा बोलने लगे। यह सुनकर उनके मन की उदासी खत्म हो गई।
स्कूली पढ़ाई के बाद बाद वह शहर आ गए। स्नातक में तमिल भाषा को मुख्य विषय चुना, फिर इतिहास में एमए किया। शहर में भी मां की सीख याद रही। कॉलेज के दिनों से ही वह आस-पास के बच्चों की पढ़ाई में मदद करने लगे।बात 1962 की है। उन दिनों वह मद्रास यूनिवर्सिटी से लाइब्रेरी साइंस की पढ़ाई कर रहे थे। भारत-चीन के बीच युद्ध चल रहा था। कल्याणसुंदरम बताते हैं, मैंने रेडियो पर नेहरू जी का संदेश सुना। वह देशवासियों से रक्षाकोष में दान देने की अपील कर रहे थे। मैं तुरंत मुख्यमंत्री कामराज के पास गया और अपने गले से सोने की जंजीर उतारते हुए कहा- आप इसे कोष में जमा कर लीजिए। शायद यह सैनिकों के काम आ जाए। मख्यमंत्री इतना प्रभावित हुए कि मई दिवस पर कल्याणसुंदरम को सम्मानित किया।
पढ़ाई के बाद यूनिवर्सिटी में लाइब्रेरियन की नौकरी मिल गई। उनका जीवन सादा था। साधारण से घर में रहना, दो जोड़ी कपड़े में गुजारा, पैदल चलना और खुद पकाकर खाना। जरूरतें बहुत कम थीं, लिहाजा वेतन का कुछ ही हिस्सा खर्च कर पाते थे। बाकी पैसे बच्चों के लिए दान करने लगे। बाद में मदद करने का जुनून इस कदर चढ़ा कि वह पूरा वेतन दान करने लगे। नौकरी के पूरे 35 साल यह सिलसिला चला। कल्याणसुंदरम कहते हैं, वेतन के पैसे से गरीब बच्चों को स्कूल जाता देखकर मन को बड़ा सुकून मिलता था।
यह वाकया 1990 का है। उन्हें यूजीसी से एक लाख रुपया एरियर मिला। उन्होंने सोचा, इस पैसे का मैं क्या करूंगा? वह डीएम कार्यालय पहुंचे और जिलाधिकारी को पूरी राशि देते हुए कहा कि आप इसे अनाथ बच्चों के कल्याण पर खर्च कीजिए। डीएम के जरिये यह बात मीडिया तक पहुंची। पहली बार पूरे शहर को इस दानवीर के बारे में पता चला।
यह खबर सुपरस्टार रजनीकांत तक भी पहुंची। वह उनसे मिलने पहुंचे। अभिनेता ने उन्हें बतौर पिता गोद लेने का एलान किया। वह कल्याणसुंदरम को अपने साथ घर ले जाना चाहते थे, पर वह राजी नहीं हुए।
साल 1998 में रिटायरमेंट के बाद उन्होंने पालम नाम की संस्था बनाई। पीएफ के दस लाख रुपये संस्था को दान कर दिए। हर महीने की पेंशन भी दान में जाने लगी। खुद के गुजारे के लिए वह होटल में वेटर का काम करने लगे।
कल्याणसुंदरम कहते हैं, मैंने शादी नहीं की। मेरी जरूरतें बहुत कम हैं। अपने गुजारे के लिए मैं होटल में काम करता हूं। मेरा खर्च निकल जाता है। मुङो पेंशन की जरूरत नहीं है।वह अपनी सारी पैतृक संपत्ति सामाजिक संस्था को दान कर चुके हैं। उन्होंने मरने के बाद अपनी आंखें और शरीर दान देने का एलान भी किया है। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें 20वीं सदी के बेमिसाल लोगों में शुमार किया। एक अमेरिकी संस्था ने उन्हें ‘मैन ऑफ द मिलेनियम’ अवॉर्ड से सम्मानित किया। इस मौके पर उन्हें बतौर इनाम 30 करोड़ रुपये मिले। यह पैसा भी उन्होंने दान कर दिया।
कल्याणसुंदरम कहते हैं, इस दुनिया में हर इंसान मृत्यु के बाद खाली हाथ जाता है। फिर संपत्ति जोड़ने की होड़ कैसी? दूसरों के लिए जियो, बड़ा सुकून मिलेगा।

साभार – हिंदुस्तान अख़बार

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MARIYAPPAN THANGAVELU BIOGRAPHY IN HINDI

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मरियप्पन थंगावेलु

(पैरालंपिक गोल्ड मेडलिस्ट)

हादसे ने मेरे पैर छीन लिए
मां ने इलाज के लिए लोन लिया।
मगर कोई फायदा नहीं हुआ।
मैं हमेशा के लिए विकलांग हो गया,
लेकिन मां ने हिम्मत नहीं हारी।
मुङो पढ़ाया-लिखाया और खेलने की आजादी भी दी।
इसीलिए आज मैं इस मुकाम पर हूं।
मरियप्पन का जन्म तमिलनाडु के सेलम जिले से 50 किलोमीटर दूर पेरियावादागामपट्टी गांव में हुआ। बचपन में ही पिता परिवार छोड़कर चले गए। परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। चार बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी अकेले मां पर आ गई। गुजर-बसर करने के लिए कुछ दिनों तक उन्होंने ईंट भट्टे पर मजदूरी की। बाद में सब्जी बेचने लगीं। दुश्वारियों भरे दिन थे वे। सब्जी बेचकर इतनी कमाई नहीं हो पाती थी कि चारों बच्चों को भरपेट खाना खिलाया जा सके। इसके बावजूद मां चाहती थीं कि किसी तरह बच्चों की पढ़ाई जारी रहे, ताकि आगे चलकर उन्हें अच्छी जिंदगी नसीब हो। खुद अनपढ़ होने के बावजूद उन्होंने चारों बच्चों को स्कूल भेजा।पर नई मुसीबतें उनका इंतजार कर रही थीं।
 मरियप्पन तब पांच साल के थे। एक दिन पैदल स्कूल जा रहे थे। तभी रास्ते में सामने से आती तेज रफ्तार बस ने उन्हें टक्कर मार दी। बस का पहिया उनके नन्हे पैरों को कुचलता हुआ आगे बढ़ गया। वह बेहोश हो गए। राहगीरों ने खून से लथपथ बच्चे को पास के सरकारी अस्पताल तक पहुंचाया। इलाज शुरू हुआ, पर उनकी हालत बिगड़ती गई। फिर किसी ने प्राइवेट अस्पताल ले जाने का सुझाव दिया। वहां डॉक्टर ने मां से कहा कि इलाज में बहुत खर्च आएगा। मां गिड़गिड़ाने लगीं- कुछ भी कीजिए डॉक्टर साहब। मेरे बेटे के पांव ठीक कर दीजिए। आनन-फानन में किसी तरह तीन लाख रुपये का लोन लिया। कुछ लोगों ने उन्हें टोका- इतनी बड़ी रकम है, कहां से चुकाओगी? मां का जवाब था- बेटा अपने पांव पर खड़ा हो जाए, इसके लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं।
 कुछ महीने इलाज चला। समय के साथ उम्मीदें धूमिल होती गईं। आखिरकार एक दिन डॉक्टर ने साफ कह दिया कि अब आपका बेटा कभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाएगा।मरियप्पन के घुटने के नीचे का हिस्सा पूरी तरह खराब हो गया था।
 मरियप्पन कहते हैं, लोगों ने कहा कि ड्राइवर ने शराब पी रखी थी, इसलिए यह हादसा हुआ। मगर मेरे लिए यह सब मायने नहीं रखता। किसी को कोसने से कुछ हासिल नहीं होता है। मैंने हकीकत को स्वीकार किया और आगे बढ़ने की कोशिश की। हादसे ने उन्हें हमेशा के लिए अपाहिज बना दिया। मगर मां ने हिम्मत नहीं हारी। सब्जी बेचने के साथ ही वह दूसरों के घरों में चौका-बर्तन करने लगीं, ताकि बेटे की पढ़ाई का खर्च निकल सके। वह जानती थीं कि शिक्षा ही वह ताकत है, जो उनके बेटे को बेहतर जिंदगी दे सकती है। इसलिए तमाम अड़चनों के बावजूद मरियप्पन का स्कूल जाना बंद नहीं हुआ।
पढ़ाई के साथ खेल में भी उनका खूब मन लगता था। उन्हें वॉलीबॉल बहुत पंसद था। मगर खेल टीचर को लगा कि उनका शिष्य ऊंची कूद में कहीं ज्यादा अच्छा प्रदर्शन कर पाएगा। लिहाजा उन्होंने मरियप्पन को हाई जंप के लिए प्रेरित किया। इस प्रेरणा ने मरियप्पन के अंदर कुछ कर गुजरने का जज्बा पैदा किया। अब उनके लिए हर अड़चन, हर चुनौती बेमानी थी। ट्रेनर ने उन्हें एहसास दिलाया कि वह सामान्य बच्चों से कहीं बेहतर खिलाड़ी और छात्र हैं। इसी एहसास से वह आगे बढ़ते रहे। 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद बीबीए की डिग्री हासिल की।विकलांग होने के बावजूद वह सामान्य खिलाड़ियों के संग खेले। 14 साल की उम्र में सामान्य खिलाड़ियों के साथ मुकाबला करते हुए वह हाई जंप में दूसरे स्थान पर पहुंचे।
 मरियप्पन कहते हैं, मैंने कभी खुद को दूसरे से कम नहीं समझा। शारीरिक रूप से जरूर मैं दिव्यांग बन गया था, पर मन से मैं एक सामान्य बच्च था। मन की ताकत ने मुङो यहां तक पहुंचाया। कोच सत्यनारायण ने उन्हें 18 साल की उम्र में नेशनल पैरा एथलीट चैंपियनशिप में देखा। उन्हें यकीन हो गया कि लड़के में दम है और अगर इसे बेहतर ट्रेनिंग दी जाए, तो यह बहुत आगे जा सकता है। प्रोफेशनल ट्रेनिंग के लिए वह मरियप्पन को अपने साथ बेंगलुरु ले गए। वहां कड़े अभ्यास के बाद मरियप्पन 2015 में अव्वल खिलाड़ी बन गए। ट्रेनिंग के लिए घर से एकेडमी तक जाना और टूर्नामेंट के दौरान शहर से बाहर जाना आसान नहीं था। एक तरफ संसाधनों की कमी थी, तो दूसरी तरफ शारीरिक चुनौतियां। मगर बुलंद हौसले वाले मरियप्पन ने मुश्किलों को कभी अपनी राह की अड़चन नहीं बनने दिया।
 उनके कोच ई इलामपार्थी कहते हैं, मरियप्पन बहुत मेहनती और अनुशासित खिलाड़ी है। उसका जज्बा व लगन हम सबके लिए प्रेरक है।मरियप्पन ने पिछले साल रियो पैरालंपिक्स में पुरुषों की टी-42 हाई जंप में गोल्ड मेडल जीता। 21 साल के मरियप्पन 1.89 मीटर की जंप लगाने वाले पहले भारतीय बन गए। उनकी शानदार कामयाबी ने देश का नाम रोशन किया है। जल्द ही उनके संघर्ष और कामयाबी की कहानी फिल्मी परदे पर दिखने वाली है। तमिलनाडु की मशहूर डायरेक्टर ऐश्वर्या धनुष उनके जीवन पर फिल्म बना रही हैं। हाल में मरियप्पन को पद्मश्री अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है।
 उनकी मां सरोज कहती हैं, मरियप्पन को लेकर हमेशा फिक्र रहती थी। मगर उसने अपनी मेहनत और लगन से सारी चिंताएं दूर कर दी। मुङो खुशी है कि पूरा देश उसे प्यार करता है।
साभार हिंदुस्तान अख़बार

WARIS AHLUWALIA BIOGRAPHY IN HINDI

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waris ahluwalia hindi-biography

 वारिस अहलूवालिया

(अमेरिकी डिजाइनर, अभिनेता)

अमेरिका में 9/11 के हमले के बाद सिख होने की वजह से अपमान सहना पड़ा।
 लेकिन मैं डरा नहीं।
 हर किसी को अपने धर्म के हिसाब से जीने की आजादी होनी चाहिए।
 इसके लिए लोगों को जागरूक करना होगा।
 सभ्य समाज में नस्ली भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं होती।

 

वारिश का जन पंजाब के  अमृतसर में हुआ था लेकिन उनका पालन पोषण अमेरिका में हुआ  । पिता पंजाब की गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे और मां एक निजी स्कूल चलाती थीं। वारिस पांच साल के थे, जब मम्मी-पापा उन्हें लेकर अमेरिका घूमने निकले। 1979 में वे अमेरिका के ब्रुकलिन शहर पहुंचे। दिलचस्प बात यह थी कि उनकी मां ने मास्टर्स की पढ़ाई अमेरिका में ही की थी, इसलिए उन्हें वहां का माहौल बहुत अच्छा लगा। दोनों ने वहीं बसने का इरादा कर लिया।

परदेस में रहने के बावजूद परिवार ने सिख परंपराओं का पूरी तरह निर्वाह किया। वारिस को स्कूल जाने से पहले रोज घर में अरदास, यानी प्रार्थना करनी होती थी।
 वारिस बताते हैं- स्कूल में मैं अकेला सिख बच्च था। मेरे बाल व पगड़ी देखकर अमेरिकी बच्चों को अजीब लगता था। मगर इसे लेकर कभी कोई दिक्कत नहीं आई। मेरी सबसे बनती थी। एक दिन स्कूल टीचर ने मां से कहा कि आपका बेटा बहुत बढ़िया वक्ता है। इसे तो वकील होना चाहिए। इस खूबी को निखारने के लिए वारिस को लीडरशिप ट्रेनिंग में भेजा गया। उन्होंने सिख यूथ कैंपों में भी हिस्सा लिया। वह सार्वजनिक मंचों से नस्ली भेदभाव व सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय जाहिर करने लगे।स्कूली पढ़ाई के बाद वारिस न्यूयॉर्क के लिबरल आर्ट कॉलेज गए। वहां तमाम अफ्रीकी और एशियाई देशों के छात्र पढ़ते थे।
वारिस बताते हैं- कॉलेज में मैं अकेला छात्र था, जो पटका पहनता था। हम संग घूमते-फिरते थे। मैंने हमेशा अपने धार्मिक संस्कारों का पालन किया, साथ ही दूसरे धर्मो का भी सम्मान किया। दो साल तक न्यूयॉर्क में पढ़ाई के बाद वह इंग्लैंड की मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी चले गए। ब्रिटेन उन्हें काफी अच्छा लगा, पर इसी बीच पिता के निधन की एक बुरी खबर आई। वह न्यूयॉर्क लौट आए। तय किया कि अब मां के पास ही रहूंगा। वारिस ने नौकरी के लिए कई जगह इंटरव्यू दिए। म्यूजिक पत्रिका निकालने की कोशिश की, एक इंटरनेट कंपनी खोली। मगर कहीं कामयाबी नहीं मिली।
 वह न्यूयॉर्क छोड़कर लॉस एंजेलिस आ गए। वहां एक दिलचस्प वाकया हुआ। एक दिन वह वहां के सबसे मशहूर बुटीक पहुंचे थे। वहां हॉलीवुड के बड़े-बड़े सितारे आया करते थे। तभी स्टोर में मौजूद एक अधिकारी ने उनके हाथ में हीरे की खूबसूरत अंगूठी को देख पूछा, यह अंगूठी कहां से खरीदी? क्या आप हमें इसी डिजाइन की कुछ अंगूठियां बनवाकर दे सकते हैं? वारिस ने झट से हां कर दी। वह एक ज्वैलरी डिजाइनर से मिले व उसी डिजाइन की अंगूठियां स्टोर को पहुंचा दीं।कुछ दिनों के बाद वे अंगूठियां कुछ मशहूर हॉलीवुड सितारों की उंगलियों में नजर आईं। फैशन मैग्जीन में उन अंगूठियों की चर्चा होने लगी। जेवरात डिजाइन की बारीकियों को समझने के लिए उन्होंने ट्रेनिंग ली। जल्द ही उन्होंने हाउस ऑफ वारिस स्टोर खोल लिया। प्राचीन व मॉर्डन डिजाइन का संगम उनके जेवरात की खूबी थी। फैशन पत्रिकाओं में उनका ब्रांड छा गया।
 जिंदगी पटरी पर दौड़ रही थी कि अचानक एक बड़ा झटका लगा। सितंबर, 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमलों के बाद नफरत फैलने लगी। उसकी चपेट में सिख समुदाय भी आ गया। वारिस भी गुस्से का शिकार बने। हमलावरों ने उन्हें ओसामा बिन लादेन कहकर अमेरिका छोड़कर जाने को कहा।
 वारिस कहते हैं- जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तो कई बच्चे मेरी पगड़ी को देखकर कहते थे- देखो, वह गांधी जा रहा है। मगर जब लोगों ने मुङो लादेन कहा, तो मेरा दिल रो पड़ा। डरने की बजाय वारिस लोगों को जागरूक करने में जुट गए।एक दिन वह हॉलीवुड डायरेक्टर वेन्स एंडरसन के संग डिनर कर रहे थे। उन्होंने वारिस से पूछा, तुम मेरी फिल्म में काम करोगे? वारिस ने कहा- हां, क्यों नहीं! 2004 में उन्हें द लाइफ एक्वेटिक विद स्टीव जिसौ फिल्म में रोल मिल गया।
 यह नए सफर का आगाज था। एक तरफ उनका ज्वैलरी ब्रांड मशहूर हो रहा था, तो दूसरी तरफ हॉलीवुड में अदाकारी से पहचान मिलने लगी थी। कुछ दिनों के बाद ही उन्हें हॉलीवुड फिल्म निर्देशक स्पाइक ली की फिल्म इनसाइड मैन में एक महत्वपूर्ण रोल मिल गया। कई फैशन कंपनियों के लिए उन्होंने मॉडलिंग भी की।
 वर्ष 2013 में फैशन ब्रांड गैप के पोस्टर पर उनकी तस्वीर छपी, तो हंगामा मच गया। तस्वीर में वह पगड़ी पहने नजर आए। पोस्टर पर नस्ली टिप्पणी हुई। मगर वह डटे रहे। फैशन हो या फिल्म का मंच, वारिस बड़े शान से अपनी दाढ़ी और पगड़ी के संग नजर आए। 2010 में उन्हें वेनिटी फेयर में सर्वश्रेष्ठ पहनावे का अवॉर्ड मिला। वोग ने उन्हें दस प्रभावशाली लोगों में शुमार किया।19 अक्तूबर, 2016 को न्यूयॉर्क के मेयर ने धार्मिक सहिष्णुता के क्षेत्र में योगदान के लिए वारिस अहलूवालिया दिवस मनाने का एलान किया।
 मगर इस साल फरवरी में एक बार फिर उन्हें अपमानित किया गया। मैक्सिको से न्यूयॉर्क आते वक्त उनसे पगड़ी उतारकर तलाशी देने को कहा गया। वारिस कहते हैं- मैं सिख हूं, मैं पगड़ी पहनता हूं। इस बात पर मुङो गर्व है। नस्ली टिप्पणियों के बावजूद मैंने अपने पहनावे में कोई बदलाव नहीं किया और न ही करूंगा।

 

GAURI SAWANT BIOGRAPHY IN HINDI

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गौरी सावंत

(सामाजिक कार्यकर्ता)

 

मेरी सबसे बड़ी पहचान यह है कि मैं गायत्री की मां हूं।
 मुङो मां का प्यार नसीब नहीं हुआ,
 लेकिन मैं अपनी बच्ची को यह कमी कभी महसूस नहीं होने दूंगी।
 वह मेरा गुरूर है। मैं उसे खूब पढ़ाऊंगी।
 मेरा सपना है कि वह एक आत्मनिर्भर इंसान बने।
 
गौरी का जन्म पुणो के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। उनका नाम गणोश सुरेश सावंत रखा गया था। तब वह एक लड़का थीं। गौरी नौ साल की थीं, तभी मां चल बसीं। मां के जाने के बाद दादी ने पाला। वह लड़का थीं, लेकिन उनकी चाल-ढाल लड़कियों जैसी थी।स्कूल के दिनों में ही वह अपने अंदर अजीब-सा बदलाव महसूस करने लगीं। उन्हें एहसास होने लगा कि वह लड़का नहीं, लड़की हैं।

अक्सर घर में चुपके से दादी की साड़ी पहनकर चेहरे पर मेकअप लगा लेतीं। आईने में निहारतीं, तो खुद पर इतराना आता। मगर मन में खौफ रहता कि कहीं कोई देख न ले। पिताजी पुलिस में थे। उन्हें बेटे के तौर-तरीके बिल्कुल पसंद नहीं थे।
 गौरी बताती हैं- घर में मां नहीं थी, स्कूल में दोस्त नहीं थे। ऐसा कोई करीबी न था, जिससे मन की बातें कर पातीं। पिताजी नफरत ही करते थे।जिंदगी बदतर होती जा रही थी। पड़ोस के बच्चे मजाक उड़ाते थे। कुछ तो उनको ‘हिजड़ा’ कहकर चिढ़ाने लगे। समय के साथ यह एहसास मजबूत होता गया कि वह लड़की हैं, लड़का नहीं। मुश्किलों से जूझते हुए स्कूली पढ़ाई पूरी कर वह कॉलेज में दाखिल हुईं। एमएसडब्ल्यू में स्नातक किया। घरवाले चाहते थे कि वह अच्छे बेटे की तरह नौकरी करें और परिवार की जिम्मेदारी संभालें। मगर वह तय कर चुकी थीं कि अब वह लड़के की जिंदगी नहीं जी सकतीं।
एक रात किसी से बिना कुछ कहे वह घर से निकल पड़ीं। वह रात उन्होंने दादर रेलवे स्टेशन पर गुजारी। अगले दिन चंपा नाम की एक किन्नर उन्हें अपने घर ले गई। फिर नौकरी के लिए संघर्ष शुरू हुआ, पर लोग एक किन्नर को नौकरी देने को तैयार नहीं थे। कुछ दिन भीख मांगकर काम चलाना पड़ा।इसी बीच गौरी एक गैर-सरकारी संगठन के संपर्क में आईं। मेडिकल काउंसलिंग के बाद उन्होंने सेक्स बदलने का फैसला किया। वह गणोश सावंत से गौरी सावंत बन गईं। इसके बाद उन्होंने इलाके के एक शेल्टर होम में अनाथ बच्चों की मदद करनी चाही, पर उसके संचालकों ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया।
 गौरी बताती हैं- मैं बच्चों के पास न जाऊं, इसलिए उन्होंने मुङो काफी प्रताड़ित किया। बहुत निराशा हुई। आखिर लोग किन्नरों से इतनी नफरत क्यों करते हैं?
वर्ष 2000 में उन्होंने किन्नरों व ट्रांसजेंडर लोगों को सामाजिक न्याय दिलाने के मकसद से एक संगठन बनाया। जिंदगी पटरी पर आने लगी। बात साल 2001 की है। उनके जीवन में एक अहम पड़ाव आया।
 मुंबई में एक सेक्स वर्कर की मौत हो गई। यह मौत उसकी नन्ही बेटी गायत्री पर कहर बनकर टूटी। बच्ची की दादी ने उसे एक दलाल को बेच दिया, मगर पड़ोसियों ने उसे बचा लिया। कुछ समय के लिए बच्ची को अनाथालय भेज दिया गया। गौरी को यह बात पता चली, तो वह उनसे मिलने पहुंची।
 गौरी बताती हैं- पहली बार गायत्री से मिली, तो लगा कि वह मेरी बेटी है। मेरे अंदर ममता उमड़ पड़ी। मैंने तय किया कि इसे गोद लूंगी।गायत्री अपनी नई मां के संग उनके घराने में रहने लगीं। उस घराने में गौरी के गुरु और चेले रहते हैं। जाहिर है, वे सभी किन्नर व ट्रांसजेंडर हैं। नए घर में गायत्री को खूब प्यार मिला। कोई सिर में तेल की चंपी करता, तो कोई आइसक्रीम ले आता। काफी दिनों बाद उन्हें इतना दुलार मिला। जल्दी वह स्कूल जाने लगीं। गौरी अक्सर बेटी के संग घूमने जातीं। शॉपिंग करतीं और पार्क में सैर भी करतीं। वह आम महिला की तरह जीना चाहती थीं, लेकिन दुनिया वाले ताने मारने से नहीं चूकते।
 गौरी बताती हैं- एक बार मैं और गायत्री कहीं जा रहे थे। रास्ते में ऑटोवाले ने पूछा, क्या यह भी तुम जैसी है? गायत्री ने चिल्लाकर कहा, मैं हिजड़ा नहीं हूं। हम मां-बेटी को अक्सर ऐसे सवालों का सामना करना पड़ता है। बेटी को अच्छे संस्कार मिले, इसलिए गौरी अक्सर शाम को उसे रामायण और महाभारत की कहानियां सुनातीं। गायत्री बड़े ध्यान से पौराणिक कहानियां सुनतीं और तमाम सवाल भी पूछतीं। गौरी बताती हैं- मेरी बेटी के मन में हर बात को लेकर उत्सुकता रहती है। मैं उसके हर सवाल का जवाब देने की कोशिश करती हूं, ताकि वह एक जागरूक नागरिक बने।
 जल्द ही पूरे महाराष्ट्र में इस बात की चर्चा होने लगी कि एक किन्नर ने बच्ची को गोद लिया है। कुछ लोगों ने इसकी तारीफ की, तो कुछ ने सवाल उठाए। आजकल टीवी पर एक विज्ञापन दिखाया जा रहा है। इस विज्ञापन में एक किन्नर अपनी बेटी को बोर्डिग स्कूल में छोड़ने जाती है। बेटी वकील बनकर अपनी मां को उनका हक दिलाने का संकल्प करती है। यह विज्ञापन गौरी के निजी जीवन पर आधारित है। दिलचस्प बात है कि इसमें किन्नर मां का किरदार खुद गौरी ने निभाया है। उन्हें उम्मीद है कि इस तरह के विज्ञापन किन्नरों के प्रति समाज का नजरिया बदलने में कारगर साबित होंगे।
 गौरी बताती हैं- स्कूल में गायत्री की पढ़ाई ठीक नहीं चल रही थी, इसलिए मैंने उसे हॉस्टल में भेजने का फैसला किया। मैं उस पर अपने सपने थोपना नहीं चाहती, लेकिन मेरी तमन्ना है कि मेरी बेटी खूब पढ़े और आत्मनिर्भर बने। उसे बोर्डिग स्कूल भेजते समय मुङो बहुत रोना आया, मगर उसके बेहतर भविष्य के लिए शायद यही सही था।
साभार -हिंदुस्तान अख़बार
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LILLY SINGH BIOGRAPHY IN HINDI

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लिली सिंह

( यू-ट्यूबसेलिब्रिटी,कॉमेडियन )

 
उन दिनों मैं डिप्रेशन से लड़ रही थी। 
अपने मन की खुशी के लिए कुछ कॉमेडी वीडियो बनाए।
 नहीं पता था कि यू-ट्यूब में इतनी कामयाबी और शोहरत मिल जाएगी।
 अगर मम्मी-पापा साथ नहीं देते, 
तो मैं यह मुकाम कभी हासिल नहीं कर पाती।
लिली के माता-पिता पंजाब के रहने वाले थे। कनाडा में बस गए। ओनटेरियो सिटी में जन्मी लिली को माता-पिता से भारतीय संस्कार मिले। आम हिन्दुस्तानी परिवार की तरह मां चाहती थीं कि बेटी पढ़ाई के साथ-साथ घर के कामकाज भी सीखे। उन्हें व उनकी बड़ी बहन को हिदायत थी कि वे स्कूल के बाद सीधे घर आएं। देर शाम दोस्तों के संग की इजाजत बिल्कुल नहीं थी। पापा चाहते थे कि स्नातक के बाद वह मनोविज्ञान में मास्टर्स करें और टीचिंग लाइन में जाएं।
बात 2009 की है। उनका मन पढ़ाई से उचटने लगा। वह अनमनी सी रहने लगीं। दोस्तों के संग घूमना बंद हो गया। आए दिन मॉल में शॉपिंग के लिए जिद करने वाली लड़की अचानक अपने कमरे में कैद होकर रह गई। मां परेशान थीं कि यह क्या हो गया लाडली को? जब मम्मी पूछतीं- क्या हुआ बेटा, तो लिली उनके गले से लिपटकर रो पड़तीं। फि र डॉक्टर ने बताया कि बेटी डिप्रेशन में है। इलाज शुरू हुआ।
करीब एक साल लगा डिप्रेशन से बाहर आने में। लिली बताती हैं- मुङो सुबह उठना अच्छा नहीं लगता था। दोस्तों के फोन उठाने बंद कर दिए मैंने। मन में डरावने ख्याल आते थे। लगता था, मैं बेकार में जी रही हूं। मैंने खाना-पीना भी छोड़ दिया था।लिली जानती थीं कि डिप्रेशन से बाहर आने के लिए खुश रहना जरूरी है। जिंदगी उन्हें नीरस लगने लगी थी, पर बचपन की यादें बेहद खुशनुमा थीं। स्कूल के दिन याद आने लगे, जब वह अपनी नादानियों से मम्मी को खूब परेशान करती थीं और मम्मी खीझकर डांट लगाती थीं। पुराने दिनों को याद करके उन्हें खूब हंसी आती। उन यादों ने डिप्रेशन से बाहर आने में काफी मदद की।
तब उन्होंने सोचा कि क्यों न खूबसूरत यादों को सहेजकर वीडियो बनाया जाए। शुरुआत में कुछ बातें यूं ही मोबाइल पर रिकॉर्ड कर ली। अपने वीडियो देखकर खूब हंसी आई। पहली बार एहसास हुआ कि वह तो अच्छी कॉमेडी कर लेती हैं। फिर ख्याल आया कि क्यों न इस तरह के वीडियो बनाकर दूसरों को भी हंसाया जाए।उन्होंने पापा से कहा, मैं यू-ट्यूब के लिए कॉमेडी वीडियो बनाना चाहती हूं। पापा को यह आइडिया कुछ ठीक नहीं लगा। उनका जवाब था, समय बरबाद करने से बेहतर है कि तुम मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करो।
पिता सुखविंदर सिंह बताते हैं- लिली ने मुझसे कहा कि पापा, बस मुङो एक साल की मोहलत दीजिए। अगर मैं यू-ट्यूब पर सफल नहीं हुई, तो वापस यूनिवर्सिटी जाकर पढ़ाई शुरू कर दूंगी। मुङो लगा, बेटी की खुशी के लिए उसे एक मौका देना चाहिए।
 अक्तूबर, 2010 में लिली ने सुपर वुमेन नाम से यू-ट्यूब पर चैनल शुरू किया। उनके कॉमेडी वीडियो हिट हो गए। इस वीडियो में तीन किरदार हैं। एक किशोर लड़की और उसके मम्मी-पापा। तीनों किरदार में लिली अलग-अलग अंदाज में नजर आती हैं। जहां किशोरी की भूमिका में उनका अंदाज बिंदास और अल्लहड़ है, वहीं मम्मी-पापा के किरदार में ठेठ पंजाबीपन झलकता है। तीनों के बीच होने वाली दिलचस्प नोक-झोंक ने दर्शकों को खूब हंसाया।
 लिली कहती हैं- मेरा मकसद किसी के माता-पिता का मजाक उड़ाना नहीं है। मैं तो माता-पिता व किशोर बच्चों के बीच होने वाले प्यार भरे झगड़ों को दिलचस्प अंदाज में पेश करती हूं, ताकि लोगों को हंसी आए। ऐसी नोक-झोंक दुनिया के हर घर में होती है।
उनके वीडियो कनाडा, अमेरिका, जर्मनी, भारत समेत पूरी दुनिया में मशहूर हो गए। चैनल पर दर्शकों की संख्या लाखों-करोड़ों में पहुंच गई। सब्सक्राइबर संख्या भी तेजी से बढ़ने लगी। वह दुनिया के टॉप यू-ट्यूबर में शुमार होने लगीं।
उन्हें दक्षिण एशिया की पहली यू-ट्यूब कॉमेडियन होने का तमगा मिला। आज उनके चैनल पर करीब एक करोड़, दस लाख सब्सक्राइबर हैं। उनकी कमाई भी करोड़ों में है। यू-ट्यूब पर मशहूर होने के बाद उन्होंने सोचा कि क्यों न पूरी दुनिया के सामने यह बात साझा की जाए कि वह डिप्रेशन का शिकार रही हैं। मगर मन में हिचक थी। आज भी हमारे समाज में मानसिक बीमारियों को लेकर बहुत सी गलतफहमियां हैं। लोगों को लगता है कि अगर रिश्तेदार व पड़ोसियों को यह बात पता चली कि कोई लड़का या लड़की डिप्रेशन से पीड़ित है, तो वे उसे पागल समङोंगे।
 मगर लिली ने हिम्मत दिखाई। एक वीडियो जारी करके उन्होंने खुलासा किया कि वह डिप्रेशन की शिकार रही हैं, पर अब पूरी तरह स्वस्थ हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे मानसिक बीमारियों का इलाज कराएं। इस वीडियो को शुरू में ही करीब 50 लाख लोगों ने देखा और उन्हें शुक्रिया कहा।
लिली बताती हैं, सबके सामने डिप्रेशन की बात स्वीकार करना मुश्किल था। पर मुङो लगा कि शायद मेरी कहानी सुनकर समाज में डिप्रेशन जैसी बीमारी को लेकर भ्रम दूर हो सकेगा। साल 2015 में यूनीकॉर्न कार्यक्रम के साथ वह विश्व भ्रमण पर निकलीं। तमाम देशों में स्टेज शो किए। इस विश्व भ्रमण पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनी, जो हिट रही।
2016 में फोर्ब्स ने उन्हें यू-ट्यूब पर सबसे अधिक कमाई वाली सेलिब्रिटी में शामिल किया। हाल में उनकी किताब- हाउ टु बी ए बावसे, ए गाइड टु कॉन्क्वेरिंग लाइफ रिलीज हुई, जो चर्चा में है।
VIA- HINDUSTAN PAPER
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CHETESHWAR PUJARA BIOGRAPHY IN HINDI

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Greater Noida, India - Sept. 11, 2016: India Blue batsman Cheteshwar Pujara celebrate Double Century against India Red during the Duleep Trophy Final Match at Shaheed Vijay Singh Pathek Sports Complex at Greater Noida, Uttar Pradesh, India, on Sunday, September 11, 2016. EXPRESS PHOTO 11 09 2016.
 
चेतेश्वर पुजारा (CHETESHWAR PUJARA)
भारतीय  क्रिकेटर
 
मां की मौत के बाद पापा की जिम्मेदारी बढ़ गई।
 घर में सुबह जल्दी उठकर मां की तरह मेरे लिए नाश्ता बनाते।
 मेरी हर जरूरत का ध्यान रखते। 
स्टेडियम में पहुंचते ही कोच बनकर मुङो क्रिकेट की ट्रेनिंग देते। 
मेरी कामयाबी पापा की मेहनत का नतीजा है।

गुजरात के राजकोट शहर में जन्मे चेतेश्वर ने बचपन से परिवार में क्रिकेट का माहौल देखा। पिता अरविंद शिवलाल रणजी खिलाड़ी थे। घर में क्रिकेटरों का आना-जाना लगा रहता था। पापा के संग अक्सर स्टेडियम में मैच देखने का मौका भी मिलता था।

पांच साल की उम्र से उनका स्कूल जाना शुरू हुआ। पढ़ाई में तेज थे, पर मन बैट-बॉल में ज्यादा लगता था। पापा ने भी तय कर लिया कि अगर बेटा क्रिकेटर बनना चाहता है, तो उसे रोकूंगा नहीं। आठ साल की उम्र से उनकी ट्रेनिंग शुरू हो गई। क्लास में पढ़ाई के बाद वह सीधे क्रिकेट एकेडमी चले जाते और फिर शाम को पापा के संग घर लौटते। शुरुआती ट्रेनिंग पापा से मिली। बतौर कोच वह बहुत सख्त थे। घंटों प्रैक्टिस कराते और गलती होने पर सबके सामने खूब डांट लगाते। टाइम को लेकर बहुत पाबंद थे। सोकर देर से उठना या फिर ट्रेनिंग के लिए देरी करना उन्हें कतई पसंद नहीं था।
चेतेश्वर बताते हैं, ट्रेनिंग के दौरान पापा सख्त कोच की तरह व्यवहार करते थे। एकेडमी में उनके लिए सभी बच्चे एकसमान थे। वह सभी खिलाड़ियों के कोच थे, सिर्फ मेरे नहीं।तेरह साल की उम्र में चेतेश्वर को राज्य की टीम में खेलने का मौका मिला। उनका प्रदर्शन उम्दा रहा। इस दौरान मां ने पापा के निर्देश के मुताबिक, बेटे के खान-पान और फिटनेस का पूरा ख्याल रखा। पापा का सपना था कि बेटा देश के लिए खेले, और चेतेश्वर जानते थे कि इस सपने को साकार करने के लिए अनुशासन जरूरी है। उन्होंने पिता के हर निर्देश का पूरी शिद्दत से पालन किया।
चेतेश्वर बताते हैं, आज भी मैं खान-पान को लेकर बहुत अनुशासित हूं। सही समय पर सोना और डाइट के मुताबिक खाना मेरी आदत में शुमार है।समय के साथ उनके खेल में निखार आता गया। दरअसल, 12 साल की उम्र में उन्होंने सौराष्ट्र की टीम से खेलते हुए अंडर 14 मैच में बड़ौदा के खिलाफ 306 रन बनाकर सुर्खियां बटोरी थीं। एक तरफ पिता बेटे को महान क्रिकेटर बनाने का सपना बुन रहे थे, तो दूसरी तरफ मां का इस बात पर जोर था कि बेटा सफल खिलाड़ी बनने के साथ अच्छा इंसान भी बने। वह हमेशा उन्हें सलाह देतीं कि सुबह उठकर ईश्वर की प्रार्थना करने के बाद ही घर से बाहर निकलो।
चेतेश्वर बताते हैं, मां बहुत धार्मिक थीं। उन्होंने मुङो प्रार्थना करना सिखाया। वह चाहती थीं कि मैं एक अच्छा इंसान बनूं। उनके लिए कामयाबी से ज्यादा महत्वपूर्ण यह बात थी। दिलचस्प बात यह रही कि उन्होंने खेल के साथ पढ़ाई पर पूरा ध्यान दिया। स्कूल में वह हर कक्षा में टॉपर रहे। कई साल तक क्लास मॉनीटर भी रहे।बात 2005 की है। उन दिनों वह अंडर 19 टीम में थे। अचानक मां की तबियत खराब हुई। जांच के बाद पता चला कैंसर है। यह सुनकर चेतेश्वर सन्न रह गए। मगर पापा ने यकीन दिलाया कि इलाज के बाद सब ठीक हो जाएगा। मां अस्प्ताल में थीं। इधर, चेतेश्वर को क्रिकेट मैच के लिए अक्सर बाहर जाना पड़ता था। रोजाना मां से बात होती थी फोन पर। वह मां को अपनी सेहत का ख्याल रखने को कहते और मां उन्हें दिल लगाकर खेलने को कहतीं।
 चेतेश्वर बताते हैं, उस दिन मैं भावनगर में खेल रहा था। सुबह मां से फोन पर बात हुई। शाम को खेल के बाद लौट रहा था कि रास्ते में मां के निधन की खबर मिली। उस लम्हे को बयां करना मुश्किल है।मां के गुजर जाने के बाद अचानक उनका जीवन बदल गया। तब वह महज 19 साल के थे। समझ में नहीं आ रहा था कि अब आगे क्या होगा? क्या पहले की तरह पढ़ाई के साथ क्रिकेट खेल पाएंगे? घर के तमाम काम, जो मां बड़ी आसानी से संभाल लेती थीं, उन्हें अब कौन संभालेगा? उनकी छोटी-बड़ी जरूरतों का ध्यान कौन रखेगा? मगर पापा ने उनसे कहा, तुम कुछ मत सोचो। बस क्रिकेट पर ध्यान दो। मां का सपना पूरा करना है, तो बस बैट-बॉल पर ध्यान दो।
पापा ने घर की पूरी जिम्मेदारी संभाल ली। वह मां की तरह बेटे के खान-पान और कपड़ों का ध्यान रखने लगे। चेतेश्वर बताते हैं, मां के जाने के बाद घर में बस मैं और पापा रह गए। पापा जल्दी सुबह उठते, घर के काम निपटाते, मेरे लिए नाश्ता तैयार करते और फिर ऑफिस जाते। मेरे लिए उन्होंने मां और पिता, दोनों की भूमिका निभाई।
समय के साथ चेतेश्वर का क्रिकेट सफर रफ्तार पकड़ता गया। अक्तूबर, 2010 में उनकी इंट्री अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में टेस्ट मैच के साथ हुई। 2012 में न्यूजीलैंड के खिलाफ खेलते हुए शतक जड़ा। उसी साल नवंबर में इंग्लैंड के खिलाफ खेलते हुए दोहरा शतक लगाया। साल 2013 में एक बार फिर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेलते हुए दोहरा शतक बनाया। जल्द ही वह देश के बेहतरीन बल्लेबाजों में शुमार किए जाने लगे। पिछले सप्ताह रांची टेस्ट में वह 500 गेंद खेलने वाले भारत के पहले बल्लेबाज बने। इस मैच में उन्होंने दोहरा शतक जमाया। चेतेश्वर कहते हैं, इस कामयाबी के पीछे मेरे पापा की मेहनत और उनका संघर्ष है। साथ ही, मां का आशीर्वाद भी मेरे साथ है, जो मुङो सफल खिलाड़ी और नेक इंसान बनाना चाहती थीं।।

साभार-हिंदुस्तान
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