22.8 C
New York
Thursday, March 19, 2026
Home Blog Page 21

विराट कोहली की जीवनी | Virat Kohli biography Hindi

0

Birthday Special- आत्मविश्वास से बना विराट 

हर बच्चे का सपना होता है की वो बड़ा आदमी बने | हर बच्चे को पढने और आगे बढ़ने का अधिकार है | लेकिन जिन लोगो के पास पैसा होता है वे इस बात को गंभीरता से नहीं लेते और अपने बच्चो पर ध्यान नहीं देते | वे नहीं जानते की इस देश में लाखो लोग पैसे और संसाधनों की कमी की वजह से अपने बच्चो को उस तरह की शिक्षा नहीं दिला पते जिसके वो हक़दार है | मै इस तरह के लोगो को मदद करना चाहता हु ताकि संसाधनों की कमी की वजह से किसी बच्चे की प्रतिभा बेकार न हो |

विराट कोहली की जीवनी | Virat Kohli biography in Hindi
दिल्ली के पश्चिम बिहार इलाके के  रहने वाले एक  नौ साल के लड़के को उसके पिता का फरमान मिला की उसे क्रिकेटर बनना है  |लेकिन पिता के इस फरमान में प्यार छुपा हुआ था क्योकि वे जानते है की उसके बेटे  को क्रिकेट में दिलचस्पी है |बेटे ने पिता के इस आग्रह को अपना सपना बना लिया और वो भारत का सबसे चहेता क्रिक्केटर के साथ साथ भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान भी बन गया | जी हा हम बात कर रहे है लगातार सात सिरीज जितने वाले कप्तान विराट कोहली की | एक नजर डालते है विराट कोहली के बारे में
पूरा नाम    – विराट प्रेम कोहली
जन्म        – 5 नवम्बर 1988
जन्मस्थान – दिल्ली
पिता        – प्रेम कोहली
माता        – सरोज कोहली
कोच  -राजकुमार शर्मा (वेस्ट डेल्ही क्रिकेट अकादमी )
आदर्श -सचिन तेंदुलकर
पसंदीदा अभिनेता -आमिर खान
पसंदीदा फुटबॉलर -Cristiano Ronaldo

 पापा खुद ले गए क्रिकेट अकादमी 

विराट रोजाना की तरह मोहल्ले के पार्क में बच्चो के साथ क्रिकेट खेल रहे थे | शाम होने पर घर आये तो पिता ने कहा की कल तुम्हे ट्रेनिंग दिलाने के लिया क्रिकेट अकादमी ले चलूँगा | उस समय विराट सिर्फ नौ साल के थे। यह जानकर विराट कोहली को थोडा अजीब लगा पर वे मन ही मन खुश थे | रात को उनके मन में तरह तरह के ख्याल आये | सुबह विराट अपने पापा के साथ पश्चिम दिल्ली क्रिकेट क्लब के दफ्तर में गए | उस समय वहां के कोच राजकुमार शर्मा थे |

 विराट पर था पूरा भरोसा 

विराट के पिता पुरे आत्मविश्वास के साथ कोच से बोले – मैं अपने बेटे को क्रिकेटर बनाना चाहता हूं। यह जानकर  कोच को आश्चर्य हुआ क्युकी उनके पास आने वाले ज्यादातर  माता पिता केवल छुट्टियों में ही बच्चो को ट्रेनिंग दिलाने की बात करते थे | पर पेशे से वकील प्रेम कोहली का नजरिया बिलकुल अलग था | वे चाहते थे की मेरा बेटा क्रिकेट में अपना  बनाये

 कोच के टेस्ट में हुए पास 

राजकुमार शर्मा ने विराट कोहली का टेस्ट लिया | देखते ही वह समझ गए की इस लड़के में दम है |उन्होंने कहा की कल से तुम्हारी ट्रेनिंग शुरू | यह सुनकर विराट के ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | अगले दिन से सारा टाइम टेबल तय हो गया। कितने बजे सुबह उठना है, कितने बजे स्कूल जाना है और कितने बजे एकेडमी पहुंचना है। विराट कोहली के लिए पहला दिन काफी शानदार रहा । प्रोफेशनल खिलाड़ियों के संग खेलना और ट्रेनर से खेल की बारीकियों को समझना विराट को अच्छा लगा।

 साथी खिलाडियों ने उडाया मजाक 

ट्रेनिग के दौरान विराट का प्रदर्शन काफी शानदार रहा |  कोच उनकी मेहनत, समय की पाबंदी और झटपट सीखने की क्षमता के मुरीद हो गए। पर कुछ ही महीनों के बाद  बैट पर पड़तीं दरारें, जूतों के घिसते तलवे और फटते दस्ताने के कारण असहज रहने लगे। साथी खिलाडी  इस बात को लेकर उनका मजाक उड़ाते थे |  विराट जानते थे कि पापा के लिए अपनी सीमित आय से इन खर्चों को वहन करना मुश्किल है।

अंडर 19 टीम में हुए शामिल  

कोच अपने शिष्य की इस परेशानी को भांप गए | उन्होंने एक स्पोर्ट्स कंपनी से विराट की मदद करने को कहा। उन्होंने कंपनी के अधिकारियों के सामने विराट को पेश किया, तो वे चौंक गए। उन्होंने कहा, यह तो बच्चा है। खैर बात बन गई। जल्द ही विराट दिल्ली लीग की अंडर-14 टीम में शामिल हो गए। उनकी पहचान तेज तेवर वाले खिलाड़ी के तौर पर होने लगी। इसके बाद वह अंडर-19 टीम में शामिल हो गए।

 पापा की मौत पर भी फील्ड नहीं छोड़ा 

वर्ष 2006 में विराट को रणजी मैच खेलने का मौका मिला। मैच के दौरान ही पापा को ब्रेन स्ट्रोक हुआ और उनकी मौत हो गई। यह कठिन समय था विराट के लिए। उस दिन वह मैदान में वार्म-अप के लिए नहीं जा सके। सबको लगा कि आज वह नहीं खेल पाएंगे। पर कुछ देर बाद विराट मैदान में थे और पूरे फार्म में खेले।
कोच राजकुमार बताते हैं, उस दिन मैं सिडनी में था, विराट का फोन आया। उसने पापा की मौत के बारे में बताया और पूछा, मुझे क्या करना चाहिए? मैंने कहा, तुम्हें मैच बीच में नहीं छोड़ना चाहिए। इस पर विराट का जवाब था, सर मैं भी यही सोचा रहा था। पापा भी यही चाहेंगे कि मैं खेलूं।

 अपनी कप्तानी में अंडर-19 वर्ल्ड कप जीताया 

बात वर्ष 2008 की है। कोहली की कप्तानी में अंडर-19 इंडियन टीम ने वर्ल्ड कप जीता। विराट के क्रिकेट करियर की यह पहली और सबसे बड़ी जीत थी। पर अब उनके पापा इस खुशी का जश्न मनाने के लिए मौजूद नहीं थे। विराट की मां सरोज कहती हैं, विराट आज बहुत मशहूर खिलाड़ी बन गया है। काश, उसके पापा इस कामयाबी को देख पाते।
विराट पिछले दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि मैंने कम उम्र में ही बहुत कुछ हासिल किया, कुछ गलतियां भी कीं। अच्छी बात यह रही है कि इन गलतियों से काफी कुछ सीखा और अपने में सुधार लाने की कोशिश की।

 हर बच्चे को पढ़ने और आगे बढ़ने का अधिकार है

अंडर-19 वर्ल्ड कप जीतने के बाद विराट  ने पीछे मुड़कर नहीं देखा । विराट एक के बाद एक कीर्तिमान स्थापित करते गए । पर शोहरत और कामयाबी के बीच वह बचपन के कठिन दिन को कभी नहीं भूले। वर्ष 2013 में उन्होंने विराट कोहली फाउंडेशन की शुरुआत की। विराट कहते हैं, हर बच्चे को पढ़ने और आगे बढ़ने का अधिकार है। जिन लोगों के पास पैसा है, वे इस बात को गंभीरता से नहीं लेते, वे नहीं जानते देश में लाखों लोग पैसे व साधनों की कमी के कारण बच्चों को शिक्षा नहीं दिला पाते। मैं इन बच्चों की मदद करना चाहता हूं।

बने भारतीय टीम के कप्तान

जब धोनी ने संन्यास लिया तब वे भारतीय टीम के कप्तान बनाये गए। 2015 में विराट ने अपने करियर का दूसरा वर्ल्ड कप भी खेला। किसी भारतीय द्वारा सबसे तेज़ शतक और दुनिया में वन-डे क्रिकेट में सबसे तेज़ 5000 रन और सबसे तेज़ 10 वन-डे शतक मारने वाले कोहली ने कई रिकॉर्ड स्थापित किये हैं। कोहली ऐसे पहले खिलाड़ी हैं जिन्होंने लगातार 4 साल 1000 वन-डे रन बनाये और ऐसा करने वाले वह दुनिया के दूसरे खिलाड़ी बने। वे 20-20 में 1000 रन बनाने का रेकॉर्ड भी उन्ही के नाम हैं।

सचिन जैसी है बैटिंग स्टाइल

विराट बहुत आक्रमक किस्म के बैट्समैन है। जिनमें बहुत सी टेक्निकल स्किल भी है। विराट शॉट मरने के लिए फेमस है, अंडर प्रेशर में इन्हें खेलना बहुत अच्छा लगता है। विराट की बैटिंग स्टाइल बिल्कुल सचिन जैसी है, इसलिए उन्हें भविष्य का सचिन कहा जा रहा है। कुछ लोगों को मानना है कि विराट सचिन तेंदुलकर के रनों का स्कोर तोड़ देंगें।

फोबेर्स की सूचि में पॉपुलर सेलेब्रिटीस

विराट कोहली एक प्रसिद्ध क्रिकेटर के साथ एक फेमोस सेलिब्रिटीज भी हैं। फोबेर्स की सूचि में (2016) वे भारत 3 सबसे पॉपुलर सेलेब्रिटीस हैं। यही कारण है की वे कई कंपनियों के ब्रांड एम्बेसडर है|कोहली को क्रिकेट मे अपने बेहतरीन योगदान के लिए, कई पुरूस्कारो से नवाज़ा गया है जिनमे शामिल है आईसीसी वन-डे ‘प्लेयर ऑफ़ द ईयर’ 2012 और 2011 से 2012 तक ब्साइ इंटरनेशनल क्रिकेटर ऑफ़ द ईयर। 2013 में इन्हे अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में अपने अद्वितीय योगदान के लिए ‘अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। ब्रिटेन में प्रकाशित एक पत्रिका स्पोर्ट्स-प्रो ने विराट को 2014 में दुनिया का दूसरा सबसे अच्छा एथलीट बताया।

MILSTONE

  • First indian test captain to score a double century overseas
  • First ever batsman to score double centuries in four consecutive test series
  • Quickest batsman to bring up to 30 odi centuries ,getting in his 186 th innings
  • First cricketer to score three centuries in his first three inings as test captain

क्या आप रेलवे ट्रैक के किनारे लिखे W/L,W,T/P,T/G चिन्हों का अर्थ जानते है ?

0

हम अक्सर ही सफ़र के दौरान रेलवे ट्रैक के किनारे जगह जगह पर विभिन्न प्रकार के सिग्नल बोर्ड पर लिखे चिन्हों को देखते है । और मन में सोचते रहते है की इसका क्या मतलब होगा । ये यहाँ किसलिए लगाया गया है । लेकिन हम नहीं जान पते है की इन सब शब्दों का क्या अर्थ है तो चलिए आज हम बताते है की रेलवे ट्रैक के किनारे लिखे कुछ चुनिदा सिगनल के मतलब जिनसे हमारा पला हर रोज पड़ता रहता है ।

‘W’ या ‘W/L’ का अर्थ 

W या W/L एक सिटी संकेतक शब्द है । आपने रेलवे ट्रैक के किनारे लगे पीले बोर्ड पर लिखे ‘W’ या ‘W/L’ शब्द को जरुर देखा होगा ।  W का मतलब होता है – Whistle यानि सिटी जबकि ‘W/L’ का मतलब होता है Whistle for level crossing यानि ‘W/L’ लेवल क्रॉसिंग के लिए सीटी सूचक शब्द  है। सामान्यतः इस तरह का बोर्ड मानवरहित  क्रॉसिंग से लगभग 250 मीटर की दूरी पर लगा हुआ देखा जा सकता  है।

सी /फा का अर्थ

सी /फा भी एक सिटी संकेतक शब्द ही है यह ‘W/L’ का हिंदी रूपांतरण है सी /फा का मतलब है सिटी बजाओ आगे फाटक है ।

W/B का अर्थ

W/B का मतलब whistle for bridge यानि आगे पूल है सिटी बजाओ ।

‘T/P या ‘T/G’ का अर्थ

 T’ एक सामान्य समाप्ति सूचक शब्द  है। T/P का अर्थ-Termination of speeds restriction for passanger होता है । जबकि T/G’ का अर्थ-Termination of speeds restriction for passanger होता है ये शब्द ट्रेन की Speed Limitation के लिए दिया जाता है ।

 

भारत के इस वैज्ञानिक से इतना डर गया था अमेरिका, करवा दी थी हत्या

0
भारत के इस वैज्ञानिक से इतना डर गया था अमेरिका, करवा दी थी हत्या

आज यानि ३० अक्टूबर को भारत के मशहूर परमाणु वज्ञानिक डॉक्टर होमी जहाँगीर भाभा जी का जन्मदिन है |उन्हे भारत के परमाणु उर्जा कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। उन्होंने    भारत में परमाणु   कार्यक्रम की ऐसी नीव राखी जिसकी   बदौलत भारत आज  विश्व के प्रमुख परमाणु संपन्न देशों की कतार में खड़ा है | डॉक्टर होमी जहाँगीर भाभा उन वैज्ञानिकों में शामिल थे  जिनके नाम से अमेरिका भी कांपता था। अमेरिका को दरअसल इस बात का खौफ पैदा हो गया था कि कहीं भारत उससे आगे न निकल जाए। यही कारण थी की भाभा को ख़त्म करने का प्लान अमेरिका ने बनाया और उसे पूरा भी किया | 24 नवंबर 1966 को फ्रांस के माउंट ब्‍लैंक के आसमान में एक विमान क्रैश हुआ और इसमें मौजूद सभी यात्री मारे गए। जिनमे डॉक्‍टर होमी जहांगीर भाभा भी शामिल थे |

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

डॉक्टर होमी जहाँगीर भाभा का जन्म मुंबई के एक आमिर पारसी परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम जहाँगीर भाभा था और उन्होंने कैम्ब्रिज से शिक्षा प्राप्त की थी । वे वकील होने के साथ साथ टाटा इंटरप्राइजेज में भी कम कर चुके थे।भाभा बचपन से ही असाधारण प्रतिभा के धनि थे । शुरुआत से ही उनकी रूचि भौतिक विज्ञानं और गणितमें थी | उनकी प्रारंभिक शिक्षा कैथरैडल स्कूल में हुई और फिर आगे की शिक्षा के लिए जॉन केनन में पढने गये।  इसके बाद होमी ने एल्फिस्टन कॉलेज मुंबई और रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से बीएससी की परीक्षा पास की। वर्ष 1927 में वो इंग्लैंड चले गए जहाँ उन्होंने कैंब्रिज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। सन् 1930 में स्नातक की उपाधि अर्जित की ।सन् 1934 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से ही उन्होंने डाक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की। अध्ययन के दौरान कुशाग्र बुद्धी के कारण होमी को लगातार छात्रवृत्ती मिलती रही। पीएचडी के दौरान उनको आइजेक न्यूटन फेलोशिप भी मिली। उन्हें प्रसिद्ध वैज्ञानिक रुदरफोर्ड, डेराक, तथा नील्सबेग के साथ काम करने का अवसर भी मिला।

द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत 

डॉ. भाभा जब कैम्ब्रिज में अध्ययन और अनुसंधान कार्य कर रहे थे और छुट्टियों में भारत आए हुए थे तभी सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया। इस समय हिटलर यूरोप पर कब्ज़ा किये जा रहा था । इंग्लैंड के अधिकांश वैज्ञानिक युद्ध के लिये सक्रिय हो गए और पूर्वी यूरोप में मौलिक अनुसंधान लगभग ठप्प हो गया। ऐसी परिस्थिति में डॉ. भाभा के लिए इंग्लैंड जाकर अनुसंधान जारी रखना के लिए संभव नहीं था। डॉ. भाभा को समझ में नहीं आ रहा था  कि वे भारत में क्या करें?

भारतीय विज्ञान संस्थान में किया अध्यापन का कार्य 

उनकी बहुमुखी प्रतिभा से परिचित कुछ विश्वविद्यालयों ने उन्हें अध्यापन कार्य के लिये आमंत्रित किया। अंततः डॉ. भाभा ने ‘भारतीय विज्ञान संस्थान’ (IISc) बैंगलोर को चुना जहाँ वे भौतिक शास्त्र विभाग के प्राध्यापक के पद पर रहे। यह उनके जीवन का महत्त्वपूर्ण परिवर्तन था।  डॉ. भाभा के लिए कैम्ब्रिज की तुलना में बैंगलोर में काम करना मुश्किल था। कैम्ब्रिज में वे आसानी  से अपने वरिष्ठ लोगो से सम्बन्ध बना लेते थे लेकीन बंगलौर में  उनके लिए चुनौतीपूर्ण था। उन्होंने अपना अनुसंधान कार्य जारी रखा और धीरे-धीरे भारतीय सहयोगियों से संपर्क भी बनाना शुरू किया। उन दिनों ‘भारतीय विज्ञान संस्थान’, बैंगलोर में ‘सर सी. वी. रामन’ भौतिक शास्त्र विभाग के प्रमुख थे। सर सी. वी. रामन ने डॉ. भाभा को शुरू से ही पसंद किया और डॉ. भाभा को ‘फैलो ऑफ़ रायल सोसायटी’ (FRS) में चयन हेतु मदद की।

देश में विज्ञान की उन्नति चाहते थे भाभा 

बैंगलोर में डॉ. भाभा कॉस्मिक किरणों के हार्ड कम्पोनेंट पर अनुसंधान का कार्य कर रहे थे, किंतु वे देश में विज्ञान की उन्नति के बारे में बहुत चिंतित थे। उन्हें चिंता थी कि क्या भारत उस गति से उन्नति कर रहा है जिसकी उसे ज़रूरत है? देश में वैज्ञानिक क्रांति के लिए बैंगलोर का संस्थान पर्याप्त नहीं था। डॉ. भाभा ने नाभिकीय विज्ञान के क्षेत्र में विशिष्ट अनुसंधान के लिए एक अलग संस्थान बनाने का विचार बनाया और सर दोराब जी टाटा ट्रस्ट से मदद माँगी। यह सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए वैज्ञानिक चेतना एवं विकास का निर्णायक मोड़ था।

भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की कल्पना

भाभा ने ही भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की कल्पना की थी। उन्होने मुट्ठी भर वैज्ञानिकों की सहायता से मार्च 1944 में न्‍यूक्लियर एनर्जी पर रिसर्च प्रोग्राम शुरू किया था। उन्होंने न्‍यूक्लियर साइंस पर तब काम करना शुरू किया था दुनिया को इसकी चैन रिएक्‍शन के बारे में काफी कम जानकारी थी। इतना ही नहीं उस वक्‍त नाभिकीय उर्जा से विद्युत उत्पादन की कल्पना को कोई मानने को तैयार नहीं था। उन्हें ‘आर्किटेक्ट ऑफ इंडियन एटॉमिक एनर्जी प्रोग्राम’ भी कहा जाता है।

टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च की स्थापना की

उन्होंने जेआरडी टाटा की मदद से मुंबई में ‘टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च’ की स्थापना की और वर्ष 1945 में इसके निदेशक बन गए।वर्ष 1948 में डॉ भाभा ने भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की और अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा वह कई और महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रमुख भी रहे।

विज्ञान के साथ-साथ कला के क्षेत्र में भी थी रूचि 

भाभा के बारे में एक बड़ी मजेदार बात ये है कि विज्ञान के साथ-साथ शास्त्रिय संगीत, मूर्तीकला, चित्रकला तथा नृत्य आदि क्षेत्रों में उनकी गहन रूचि और अच्छी पकङ थी। वे चित्रकारों और मूर्तिकारों को प्रोत्साहित करने के लिए उनके चित्रों और मूर्तियों को खरीद कर टॉम्ब्रे स्थित संस्थान में सजाते थे और संगीत कार्यक्रमों में भी हिस्सा लिया करते थे। मशहूर चित्रकार एम एफ हुसैन की पहली प्रदर्शनी का मुम्बई में उद्घाटन डॉ भाभा ने ही किया था।

भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र

डॉ. भाभा ने पेडर रोड में ‘केनिलवर्थ’ की एक इमारत का आधा हिस्सा किराये पर लिया। यह इमारत उनकी चाची श्रीमती कुंवर पांड्या की थी। संयोगवश डॉ. भाभा का जन्म भी इसी इमारत में हुआ था। TIFR ने उस समय इस इमारत के किराए के रूप में हर महीने 200 रुपये देना तय किया था। उन दिनों यह संस्थान काफ़ी छोटा था। कर्मचारियों के लिए चाय की दुकान संस्थान से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर थी। श्रीमती पांड्या ने कर्मचारियों की चाय अपनी रसोई में ही बनाने की इजाजत दे दी। वह अपने प्रिय भतीजे डॉ. भाभा को अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाया करतीं थीं। आज उस दो मंजिली पुरानी इमारत की जगह एक बहुमंजिली इमारत ने ले ली है, जो अब मुख्यतः ‘भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र’ के अधिकारियों का निवास स्थान है।

संयुक राज्य संघ द्वारा आयोजित सम्मलेन के सभापति

वर्ष 1955 में जिनेवा में संयुक राज्य संघ द्वारा आयोजित ‘शांतिपूर्ण कार्यों के लिए परमाणु ऊर्जा का उपयोग’ के पहले सम्मलेन में डॉ. होमी भाभा को सभापति बनाया गया। जहाँ पश्चिमी देशों के वैज्ञानिक इस बात का प्रचार कर रहे थे कि अल्पविकसित देशों को पहले औद्योगिक विकास करना चाहिए तब परमाणु शक्ति के बारे में सोचना चाहिए वहीँ डॉ भाभा ने इसका जोरदार खण्डन किया और कहा कि अल्प विकसित राष्ट्र इसका प्रयोग शान्ति पूर्वक तथा औद्योगिक विकास के लिए कर सकते हैं।

18 महीनों में परमाणु बम बना सकता है भारत 

अक्टूबर 1965 में भाभा ने ऑल इंडिया रेडियो से घोषणा की थी कि अगर उन्हें छूट मिले तो भारत 18 महीनों में परमाणु बम बनाकर दिखा सकता है। वह मानते थे और काफी आश्‍वस्‍त भी थे कि अगर भारत को ताकतवर बनना है तो ऊर्जा, कृषि और मेडिसिन जैसे क्षेत्रों के लिए शांतिपूर्ण नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम शुरू करना होगा। इसके अलावा भाभा यह भी चाहते थे कि देश की सुरक्षा के लिए परमाणु बम भी बने। हालांकि यह उनका छिपा हुआ अजेंडा था।

अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए ने करायी विमान हादसे में  उनकी हत्या 

भारत के इस महान वैज्ञानिक और स्वप्नदृष्टा का निधन 24 जनवरी 1966 में स्विट्जरलैंड में एक विमान दुर्घटना में हो गया।वह इस विमान में वियना एक कांफ्रेंस में हिस्‍सा लेने जा रहे थे। इस विमान में उस वक्‍त 117 यात्री सवार थे। भारत को इस विमान दुर्घटना से गहरा धक्‍का लगा था।एक थ्‍योरी के मुताबिक विमान का पायलट उस वक्‍त जिनेवा एयरपोर्ट को अपनी सही पॉजीशन बताने में नाकाम रहा था और विमान दुर्घटनाग्रस्‍त हो गया था। लेकिन दूसरी थ्‍योरी के मुताबिक यह विमान एक हादसे का नहीं बल्कि एक षड़यंत्र के तहत बम से उड़ाया गया था। इस विमान को दुर्घटनाग्रस्‍त करने के पीछे अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए का हाथ था। एक न्‍यूज वेबसाइट ने अपनी रिपोर्ट में कथित तौर पर इस बात का संकेत दिया है कि प्‍लेन क्रैश में अमेरिकी खुफिया एजेंसी का हाथ था। इसकी वजह भारत के परमाणु कार्यक्रम को पटरी से उतारना था।

 सीआईए अधिकारी के हवाले से सामने आई जानकारी 

दरअसल इस वेबसाइट ने 11 जुलाई 2008 को एक पत्रकार ग्रेगरी डगलस और सीआईए के अधिकारी रॉबर्ट टी क्राओली के बीच हुई कथित बातचीत को फिर से पेश किया है। इस बातचीत में सीआईए अधिकारी रॉबर्ट के हवाले से कहा गया है, ‘हमारे सामने समस्या थी। भारत ने 60 के दशक में आगे बढ़ते हुए परमाणु बम पर काम शुरू कर दिया था। उन्‍होंने इस बातचीत में रूस का भी जिक्र किया है जो भारत की मदद कर रहा था। भाभा का उल्लेख करते हुए सीआईए अधिकारी ने कहा, ‘मुझपर भरोसा करो, वह खतरनाक थे। उनके साथ एक दुर्भाग्यपूर्ण ऐक्सिडेंट हुआ। वह परेशानी को और अधिक बढ़ाने के लिए वियना की उड़ान में थे, तभी उनके बोइंग 707 के कार्गो में रखे बम में विस्फोट हो गया।

शास्‍त्री की मौत में भी सीआईए का हाथ

इस विमान हादसे के बाद इस इलाके में पत्रकारों का समूह भी गया था जिसको वहां पर विमान के कुछ हिस्‍से भी मिले थे। इसके अलावा वर्ष 2012 में वहां पर एक डिप्‍लो‍मे‍टिक बैग भी मिला जिसमें कलेंडर, कुछ पत्र और कुछ न्‍यूज पेपर्स थे। रॉबर्ट का कहना है कि सीआईए का हाथ सिर्फ भाभा के विमान को हादसाग्रस्‍त करने में ही नहीं था बल्कि लाल बहादुर शास्‍त्री की मौत में भी था। 1947 में भारत सरकार द्वारा गठित परमाणु ऊर्जा आयोग के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। 1953 में जेनेवा में अनुष्ठित विश्व परमाणुविक वैज्ञानिकों के महासम्मेलन में उन्होंने सभापतित्व किया। भाभा 1950 से 1966 तक परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष थे, तब वो भारत सरकार के सचिव भी हुआ करते थे। वो कभी भी अपने चपरासी को अपना ब्रीफ़केस उठाने नहीं देते थे।

 

क्या आप जानते है ट्रेन का इंजन कितना माईलेज देता है

0

भारतीय रेल के डीजल इंजन कितना एवरेज देते हैं जानकर हैरान रह जायेंगे आप 

रेल लम्बी दुरी तय करने के लिए सबसे सस्ता और आरामदायक साधन माना जाता है । भारत में सबसे अधिक रोजगार का भी सृजन भारतीय रेल के द्वारा ही होता है । रोजाना लाखो लोग ट्रेन से यात्रा करते है वैसे तो बहुत सारे रेल इंजन  इलेक्ट्रिक से चलने लगे है । लेकिन क्या कभी आपने सोचा है की  रेल का इंजन कितना माईलेज देता है यानि ट्रेन का इंजन को एक किलोमीटर की दुरी तय करने में कितना डीजल खर्च होता है । आज हम इस पोस्ट में बताएँगे की ट्रेन के इंजन का माईलेज कितना होता है ।

भारतीय रेल अपने सभी ट्रेन के इंजन को इलेक्ट्रिक करने जा रहा है जिससे बड़ी मात्र में डीजल की बचत होगी । लेकिन भारत में अभी भी बहुत सारे ऐसे रस्ते है जहा इलेक्ट्रिक की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारन अभी भी डीजल इंजन चल रहे है ।

 

रेलवे के डीजल इंजन के टैंक तिन हिस्सों में बंटा रहता है । जहाँ पहले भाग को 5000 लीटर, दूसरे टैंक को 5500 लीटर और तीसरे टैंक को 6000 लीटर डीजल से भरा जा सकता है । ऐसा नहीं है की सभी ट्रेन के इंजन का माईलेज सामान होता है । चूँकि सभी इंजन पर लोड एकसमान नहीं होता है इसलिए सबका माईलेज भी अलग अलग होता है । यदि गाड़ी में कुल 24 डिब्बे हों तो 6 लीटर डीजल में करीब एक किलोमीटर का एवरेज आता है। वहीं यदि ये कोई एक्सप्रेस गाड़ी हो तो 24 डिब्बों के साथ गाड़ी करीब 4.5 लीटर में एक किलोमीटर का सफर तय करती है।  इंजन को बंद करना तो आसान है लेकिन इसे फिर से शुरू करने में कम से कम 25 लीटर डीजल खर्च होता है।

इसके अलावा अगर 12 डिब्बों की पैसेंजर गाड़ी है तो तो उसमें भी 1 किलोमीटर का एवरेज 6 लीटर डीजल में ही आयेगा । क्योंकि पैसेंजर गाड़ी हर स्टेशन पर रूकती जाती है इस बजह से इसके ब्रेक लगने और स्पीड बढ़ाने में ज्यादा डीजल खर्च होता हैं. वहीं एक्सप्रेस गाड़ियों की बात करे तो उनमें भी लगभग 4.50 लीटर में 1 किलोमीटर का एवरेज आयेगा क्योंकि एक्सप्रेस ट्रेन, पैसेंजर ट्रेन की तुलना में बहुत कम जगह रुकती है.

तो दोस्तों कैसी लगी ये जानकारी कमेन्ट में जरुर बताये

पाहिले पाहिले हम कईली छठी मईया व्रत तोहार-शारदा सिन्हा

0

पाहिले पाहिले हम कईली छठी मईया व्रत तोहार-शारदा सिन्हा

 

बिहार में छठ के पारंपरिक गीत हों या विवाह का मौका इन अवसरों पर बजने वाले गानों का दूसरा  नाम ही पद्मश्री शारदा सिन्हा  है। पर्व त्योहारों से लेकर दूसरे शुभ अवसरों पर इनके गाए गीत जहां एक ओर बिहार की लोक संस्कृति की सोंधी महक बिखेरते हैं वहीं यह गीत कानों में मिश्री घोलने का भी काम करते हैं। इनके गाये लोकगीत को सिर्फ बिहार में ही नहीं बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश,झारखंड समेत मॉरीशस तक में खासा पसंद किया जाता है।

2016 में इनका एक गाना  “पाहिले पाहिले हम कईली छठी मईया व्रत तोहार ” आया था जो लोगो के जुबान पर चढ़ गया था | खासकर यह गीत नयी पीढ़ी के लिए गया गया था | इसमे दिखाया गया था की कैसे वर्षो से चली आ रही छठ की परंपरा को आगे बढाने का काम नयी पीढ़ी भी कर रही है | इस गाने को अभी तक  youtube पर 25 लाख लोग देख चुके है | जितना मधुर आवाज में शारदा सिन्हा ने गाया है उतना ही बढ़िया इस विडियो का निर्माण भी किया गया है |

इस विडियो में दिखाया गया है की बेटे के पास माँ का फ़ोन आता है जिसमे वह बताती है की  तबियत ख़राब होने की वजह से वो इस बार छठ नहीं कर रही है | वर्षो से चली आ रही छठी मईया को पूजने की परंपरा इस बार टूट जाएगी क्युकी रिश्तेदारी में भी कोई इस बार छठ नहीं कर रहा है |वह ये भी कहती है की नयी पीढ़ी की होने के कारण तुम्हारी पत्नी को भी छठ करना अच्छा नहीं लगेगा | ये बात बहु सुन लेती है और वो छठ करने का निश्चय लेती है | वो इंटरनेट के माध्यम से ही पूजा करने की विधि देखती  है और छठ पूजा करती है |  इस गाने के माध्यम से वो छठी मईया से कहती है की ये मेरा पहला छठ पर्व है अगर कोई मुझसे गलती हो जाये तो छठी मईया माफ़ कीजियेगा |

वह छठी मईया से गोदी में  बलकवा देने अर्थात माँ बनने की प्रार्थना करती है | वह छठी मईया से विनती करती है की पति का स्नेह ऐसे ही बना रहे तथा हमारा कुल परिवार ऐसे ही बढ़ता रहे |

पाहिले पाहिले हम कईली
छठी मईया व्रत तोहार -2

कारिहा क्षमा छठी मईया
भूल चूक गलती हमार-2

गोदी के बलकवा के दिहा
छठी मईया ममता दुलार-2

पिया के सनेहिया बनईह
मईया दिहा सुख सार-2

नरियर केरवा घउदवा
सजल नादिया किनार-2

सुनिहा अर्ज छठी मईया
बढे कुल परिवार-2

घाट सजवनी मनोहर
मईया तोहर भक्ति अपार-2

लिही न अर्घिया ए मईया
दिही आशीष हज़ार-2

पाहिले पाहिले हम कईली
छठी मईया व्रत तोहार-2

कारिहा क्षमा छठी मईया
भूल चूक गलती हमार-2

अंधविश्वास के खिलाफ अकेले जंग लड़ने वाले इस शख्‍स को मिल चुका है राष्‍ट्रपति पुरस्‍कार

0

विज्ञान का सहारा लेकर करते है लोगो को जागरूक 

 

दोस्तों आज हम बता रहे है बिहार के एक ऐसे शख्स के बारे में जो विज्ञान के माध्यम से लोगो को  अन्धविश्वास के खिलाफ जागरूक करने का कम  करते है | मधुबनी शहर के जेपी कॉलोनी निवासी मंटू ने न सिर्फ बिहार बल्कि कई राज्यों में विज्ञान प्रशिक्षण का कैम्प लगाकर लोगो को जागरूक किया है | उन्हें इस सामाजिक कार्य के लिए राष्ट्रपति सम्मान भी मिल चुका है।

 

कैसे मिली प्रेरणा

मंटू ने बताया की उनके पिताजी  रामभूषण मंडल को  ज्योतिष और तंत्र-मंत्र में गहरा विश्वास था। एक बार रामभूषण मंडल को सपना आया की  लॉटरी का टिकट खरीदने पर वे धनवान बनने वाले हैं। फिर क्या था लॉटरी खेलना शुरू कर दिया  । उन्हें लॉटरी खेलने की इतनी बुरी  लत लगी कि गांव की जमीन तक बिक गई। इस घटना ने मंटू पर  ऐसा असर डाला कि उसने अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई लडऩे की ठान ली।

सक्सेस साइंस फॉर सोसाइटी का गठन किया 

2006 में मंटू ने 21 युवाओं के साथ मिलकर ‘सक्सेस साइंस फॉर सोसाइटी’ का गठन किया। इसका सोसाइटी का  लक्ष्य  विज्ञान के माध्यम से  लोगो के अन्दर मौजूद अन्धविश्वास को दूर करना था । इसके लिए मंटू ने कथित चमत्कारों की असलियत उजागर करने के लिए जगह जगह विज्ञानं मेला व नुक्कड़ नाटक का आयोजन करना शुरू किया। इतना ही नहीं वे अपनी सोसाइटी के माध्यम से  स्वच्छता अभियान, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ व नारी स्वावलंबन का भी काम करते हैं।

मिलकर उठाते हैं खर्च

मंटू ने अपने साथियों के साथ मिलकर न सिर्फ  बिहार में बल्कि  झारखंड, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, ओडिशा, दिल्ली, हरियाणा और मिजोरम में भी   विज्ञान जागरूकता मेला लगा चुके हैं। जीविका सलाहकार पद पर कार्यरत मंटू इस अभियान में लगने वाला सारा खर्च अपनी  साथियों के साथ मिलकर खुद उठाते हैं।

गुरु ने दिखाई राह

एमकॉम तक की शिक्षा पाए मंटू ने बताया की उनकी यह राह दिखाने में उनके गुरूजी का महत्वपूर्ण हाथ है | वे वर्ष 2006 में मंगलौर के इंडियन रैशनलिस्ट एसोसिएशन के प्रेसिडेंट और मेडिकल कॉलेज के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर डॉ. नारेंद्र नायक के संपर्क में आए। उन्होंने विज्ञान के प्रति अभिरुचि बढाने के साथ साथ हुए वैज्ञानिक चमत्कारों का भी प्रशिक्षण दिया। अब मंटू लोगों को बताते हैं कि कील को जीभ के आर-पार कर लेने वाले बाबा दरअसल अपनी जीभ में यू आकार की कील  फंसाए रखते  हैं।

मंटू ये भी लोगो को जरुर बताते है की सड़क किनारे ग्रह-नक्षत्रों को वश में करने वाली अंगूठी बेचने वाले लोग दरअसल चूने के पानी में उस पत्थर को डुबोए रहते हैं। लोगों को चकित करने के लिए अंगुली में चालाकी से फिनोथिलीन नामक केमिकल लगाए रहते हैं। इसके संपर्क में जैसे ही पत्थर आता है, खून जैसा लाल रंग निकलता है। इससे लोगों को लगता है कि वह पत्थर चमत्कारी है। इसी तरह अन्य चमत्कारों की कलई भी मंटू  विज्ञान के जरिए खोलते हैं।

लोगों की सोच बदली

मधुबनी के चकदह निवासी अमित कुमार चौधरी बताते हैं कि एक बार इन्हें वाहन खरीदना था। वे चाहते थे की गाड़ी शुभ मुहूर्त में ही ख़रीदे ताकि उन्हें ज्यादा लाभ हो । उसी बीच वे मंटू के संपर्क में आये तो उनका अन्धविश्वास कुछ कम हुआ और उनका भ्रमजाल टूटा। बगैर मुहूर्त उन्होंने वाहन खरीदा जो  काफी फलदायी रहा।

इसी तरह महाराजगंज मोहल्ले के बेचन साह के बेटे को एक बार सांप ने काट लिया। लोग झााड़-फूंक के चक्कर में पड़े थे। मंटू ने परिजनों  को समझाया और उन्हें नजदीक के अस्पताल में जाने की सलाह दी |परिजन  बच्चे को को लेकर सदर अस्पताल गए । जब डॉक्टर ने बताया कि समय रहते बच्चे को अस्पताल लाने के कारण जान बची तो परिजन को अपनी भूल का एहसास हुआ।

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से मिल चुके है  पुरस्कार

मंटू को इन सामाजिक कार्यो के लिए कई पुरस्कार भी मिल चुके है

वर्ष 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों भारत स्काउट गाइड का राष्ट्रपति पुरस्कार

नेहरू युवा केंद्र मधुबनी का जिला युवा क्लब पुरस्कार

वर्ष 2012 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में राष्ट्रीय विज्ञान प्रदर्शनी के मौके पर प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. यशपाल के हाथों पुरस्कार

2015 में राष्ट्रीय एकता शिविर मिजोरम में नेहरू युवा केंद्र मिजोरम के जोनल डायरेक्टर एसआर विष्णोई के हाथों पुरस्कार

2008 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय के गीत एवं नाटक प्रभाग के निदेशक एन नवचंद्र सिंह के हाथों पुरस्कार

2008 में ही धनबाद में आयोजित सातवें राष्ट्रीय बाल अधिकार अधिवेशन में चेयरमैन डॉ. जेवी कुलकर्णी के हाथों पुरस्कार

राज्य शिक्षा शोध द्वारा आयोजित 30वें जवाहर लाल नेहरू बाल विज्ञान प्रदर्शनी में निदेशक रवींद्र राम के हाथों पुरस्कार

अहमदाबाद में अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में पुरस्कार

कन्याकुमारी में सूर्यग्रहण कैंप में वैज्ञानिक बीके त्यागी के हाथों पुरस्कार।

क्या कहते है उनके गुरु

मंटू के गुरु प्रो. नारेंद्र नायक कहते है-

अपनी सांस्कृतिक विरासत अक्षुण्ण रखने में कोई नुकसान नहीं है। नुकसान तब होता है जब लोग चमत्कारी बाबाओं के ढोंग, दकियानूसी परंपराओं के चक्कर में पड़ते हैं। मंटू जैसे युवा समाज को नई राह दिखा रहे हैं।

मारबो रे सुगवा धनुख से,सुगा गिरे मुरझाए -KALPANA PATOWARY

0
छठ गीत का जब भी जिक्र आता है तो सबसे पहले किसी गाने की तरफ यदि ध्यान जाता है तो वह है असम की लोकगायिका कल्पना जी द्वारा गाये गए गीत ‘मरबो रे सुगवा धनुख से’  का | छठ पर्व के समय चारो तरफ यही गीत ही ज्यादातर गूंजता रहता है क्युकी  इस गीत को इतनी मधुरता से गया गया है की यह सीधे दिल को छू लेता है | इस गाने में एक तोते का जिक्र है जो फलो के पेड़ पर मंडरा रहा है | ये फल छठ पूजा के लिए है जिसे आदित्य भगवान यानि सूर्य देवता को अर्पण किया जाना है |लेकिन डर है की कही तोता इस फल को जूठा नहीं कर दे | इसलिए गाना गाने वाला एक पल तोता को धनुष से मारने के बारे में सोचते है |लेकिन फिर यह सोचता है की यदि तोता मर  गया तो तोता की पत्नी अर्थात सुगनी उसके वियोग में रोने लगेगी और इस तरह आदित्य भगवन उनलोगों पर सहाय नहीं हो पाएंगे |

 

मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए -LYRICS 

 

ऊ जे केरवा जे फरेला खबद से,

ओह पर सुगा मेड़राए।

मारबो रे सुगवा धनुख से,

सुगा गिरे मुरझाए।

ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,

आदित होई ना सहाय॥

ऊ जे नारियर जे फरेला खबद से,

ओह पर सुगा मेड़राए।

मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।

ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,

आदित होई ना सहाय॥

अमरुदवा जे फरेला खबद से,

ओह पर सुगा मेड़राए।

मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।

ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥

शरीफवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।

मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।

ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥

ऊ जे सेववा जे फरेला खबद से,

ओह पर सुगा मेड़राए।

मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।

ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,

आदित होई ना सहाय॥

सभे फलवा जे फरेला खबद से,

ओह पर सुगा मेड़राए।

मारबो रे सुगवा धनुख से,

सुगा गिरे मुरझाए।

ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,

आदित होई ना सहाय॥

कुछ शब्दों के अर्थ (Meanings of some words):-

आदित = आदित्य = सूर्य/सूरज/the sun

मेड़राए = मंडराए=hover

मारबो = मारुंगा/मारुंगी / will beat you

फरेला = फलता है/फला (पेड़ पर फल) =growing of fruits on the trees

सुगवा = तोता = parrot

 

Hinglish lyrics of the song:

 

oo je kerwa je pharela khabad se, ohi par suga madaraye

marbo re sugwa dhanukh se, suga gire murjhaye

oo je sugni je royele viyog se, aadit hoyi na sahay

oo je nariyar je pharela khabad se, ohi par suga med

marbo re sugwa dhanukh se, suga gire murjhaye

oo je sugni je royele viyog se, aadit hoyi na sahay

amarudwa je pharela khabad se, oh par suga medaraye

marbo re sugwa dhanukh se, suga gire murjhaye

oo je sugni je royele viyog se, aadit hoyi na sahay

sharifwa je pharela khabad se, oh par suga medaraye

marbo re sugwa dhanukh se, suga gire murjhaye

oo je sugni je royele viyog se, aadit hoyi na sahay

narangiya je pharela khabad se, oh par suga medaraye

marbo re sugwa dhanukh se, suga gire murjhaye

oo je sugni je royele viyog se, aadit hoyi na sahay

oo je sewua je pharela khabad se, oh par suga medaraye

marbo re sugwa dhanukh se, suga gire murjhaye

oo je sugni je royele viyog se, aadit hoyi na sahay

sabhe phalwa je pharela khabad se, oh par suga medaraye

marbo re sugwa dhanukh se, suga gire murjhaye

oo je sugni je royele viyog se, aadit hoyi na sahay

दुनिया की सबसे प्रसिद्ध बंदूक AK-47 को एके-47 ही क्यों कहा जाता है, जानिए

0
Mikhail Kalashnikov, with his AK-47, in 2002.

AK-47 से एक मिनट में बिना रूके 600 गोलियां दागी जा सकती है

 

परमाणु बम के बाद यदि कोई ज्यादा खतरनाक हथियार है तो वो है AK-47 l AK-47 के नाम सुनने से ही डर लगने लगता है। यह दुनिया के एकमात्र बंदूक जो सबसे ज्यादा बेची और नक़ल की गई है ।जितनी तरक्की और प्रसिद्धी AK-47 ने पाई है दुनिया में शायद ही कोई और बन्दुक भविष्य में इतनी प्रसिद्धी  पा सके  । आज हम   AK-47 से जुड़े हर महत्वपूर्ण तथ्य को हम आपके सामने रखेंगे और  बताएँगे की इसका नाम  AK-47 क्यों पड़ा

कैसे हुआ था इस बन्दुक का अविष्कार

AK–47 को  रूस के एक सैनिक मिखाइल कलाशनिकोव (Mikhail Kalashnikov )ने 1947 में बनाया था। जिस समय मिखाइल कलाशनिकोव ने AK–47 को बनाया था तब वह युद्ध में घायल होने की वजह से अस्पताल में भर्ती थे और उनकी आयु मात्र 21 साल थी।वह बताते  है-जब में अस्पताल में था तो मेरे बगल वाले बेड पर लेते जवान ने मुझसे प्रश्न किया की क्यों हमारे जवानों के पास केवल रायफल ही होते है  जबकि जर्मन के पास ऑटोमेटिक रायफल । इसलिए मैंने जवानों के लिए मशीन गन बनाने के बारे में सोचा  फिर 1942 से 1947 तक 5 साल की कड़ी मेहनत के बाद एक चीज़ बनाई जिसे आज हम AK–47 कहते है ।

कैसे पड़ा नाम AK–47

AK–47 का पूरा नाम है – Avtomat Kalashnikova (आटोमैटिक कलाशनिकोव )। इसमें ‘आटोमैटिक’ का अर्थ है – स्वैचालित, ‘कलाशनिकोव’ मिखाइल कलाशनिकोव के नाम पर है ।यानि मतलब AK का मतलब है – automatic weapon of Kalashnikov । इसका निर्माण 1947 में हुआ था इस तरह इसका नाम AK–47 पड़ा।

खेती के लिए उपकरण बनाना चाहते थे 

मिखाइल कलाशनिकोव जब छोटे थे तब वह ऐसे उपकरण बनाने के बारे में सोचा करते थे  जिन से खेती करने में आसानी हो, पर तकदीर ने उनके हाथ से  एक ऐसा हथियार बनवा दिया जिसके नाम संसार में सबसे ज्यादा हत्याएं करने का रिकार्ड दर्ज है। इस राइफल का सबसे ज्यादा गलत इस्तेमाल तालिबानी आतंकवादियों द्वारा अफ़गानिस्तान में हुआ था।

ठंढे मौसम को देख कर बनाया था

मिखाइल कैलाशनिकोव ने AK–47 का निर्माण उन रूसी सैनिकों के लिए बनाया था जिन्हें आर्कटिक (Arctic) के ठंडे मौसम में मोटे – मोटे दस्ताने पहन कर पुरानी किस्म की राइफल चलानी पड़ती थी। इस राइफल में सभी रायफलों का मिश्रण है यह  हर प्रकार के पर्यावरण में आसानी से चलाई जा सकती है और वहन की जा सकती है । AK–47 की खूबियों के कारण जल्द ही यह राइफल पूरी दूनिया में मशहूर हो गई और सभी देशों की सेनाएं इसका उपयोग करने लगी। AK–47 किसी भी मौसम में काम करने की क्षमता रखता है ।

क्यों करते है आतंकवादी AK–47 बंदूक का इस्तेमाल 

AK–47 को रिलोड होने में मात्र 2.5 सेकंड का समय लगता है. और बंदूक की नली से गोली छूटने की रफ्तार 710 मीटर प्रति सेकंड है. इसे चलाने के लिए किसी खास ट्रेनिंग की भी ज़रूरत नही है ।इस बंदूक का निशाना पानी के अंदर भी नहीं चूकता, इसकी गोली की रफ्तार इतनी तेज होती है कि पानी का घर्षण भी उसे रोक नहीं पाता और सीधा निशाने पर जाकर लगती है  इसकी साफ-सफाई और मेंटेनेंस करना भी बहुत आसान है. यही कुछ कारण है, जिनकी वजह से यह आतंकवादियों की पहली पसंद बनी हुई है.

AK-47 से जुडी कुछ  में कुछ रोचक जानकारी

1. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि वर्तमान में 106 देशों की सेना की ओर से AK-47 का  इस्तेमाल कीया  जाता  है।

2. AK-47 एकमात्र रायफल है  जो आज भी हाथों से बनाई जाती है जिसमें किसी भी प्रकार की मशीनें प्रयोग में नहीं लाई जाती।

3. AK-47 से हर साल ढ़ाई लाख लोगों की हत्याएं की जाती है। इनमें से 2 लाख हत्याएं इस्लामिक आतंकवादियों जैसे कि ISIS और अलकायदा द्वारा की जाती हैं।

4. AK-47 राइफल में आटोमैटिक और सैमीआटोमैटिक दोनो तरह के गुण होते है। आटोमैटिक का मतलब है एक बार ट्रिगर दबाकर रखने से गोलियां लगातार चलती रहती है और सैमी आटोमैटिक का मतलब है एक बार ट्रिगर दबाने से एक गोली ही चलती है।

5. AK-47 की लंबाई मात्र 3 फुट होती है और एक पूरी तरह से गोलियो से भरी हुई AK-47 का वज़न मात्र साढ़े 4 किलो होता है।

6. AK-47 से एक मिनट में बिना रूके 600 गोलियां दागी जा सकती है। मतलब कि एक सैकेंड में 10 गोलियां। इसका सेहरा AK-47 की शानदार गैस चेम्बर और स्प्रिंग को जाता है।

7. एक AK-47 की लाईफ 6000 से 15000 राउंड तक होती है. AK-47 की एक मैगज़ीन में 30 राउंड होते है.

8. AK-47 का AKM वर्जन, इस समय दुनिया का सबसे हल्का राइफल है. फुल लोड होने के बाद भी इस राइफल का वज़न केवल 3.1 किलो है. इससे एक मिनट में 640 राउंड किए जा सकते है.

9. AK-47 की रेंज 300 से 400 मीटर तक होती है . यदि शूटर जबरदस्त हुआ तो 800 मीटर पर भी लक्ष्य को मार सकता है.

10. मिखाइल कलाशनिकोव के अनुसार वह AK-47 से एक लाख से भी ज्यादा गोलियां दाग चुके हैं जिसके कारण वह बहरे हो गए हैं।

11. इस समय विश्व में लगभग 10 करोड़ AK-47 राइफलस हैं। यह संख्या बाकी किसी भी बड़े हथियार से कहीं ज्यादा है।

12. लगभग सभी देशों में किसी आम नागरिक का अपने पास AK-47 रखना गैरकानूनी है। भारत में यह कानून कितना सख्त है इस बात का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते है कि संजय दत्त को भी AK-47 रखने की वजह से 5 साल की सज़ा भुगतनी पड़ी।

13. AK-47 दुनिया की इकलौती ऐसी राइफल है जिसे बच्चे भी आसानी से चला सकते है। यही कारण है कि आप AK-47 चलाते हुए कई बच्चों की तस्वीर देख सकते है।

14. AK-47 की भेदन शक्ति इतनी ज्यादा है कि यह कुछ दीवारो, यहाँ तक की कार के धातु के दरवाजें को भेद कर उसके पीछे बैठे इंसान को मार सकती है।

15. केवल रूस ही दुनिया को AK-47 सप्लाई नही करता, बल्कि 30 अन्य देशों को भी इसे बनाने का लाइसेंस प्राप्त है। जैसे:- भारत, चीन, इज़रायल, मिस्त्र, नाइजीरिया आदि। इनमें चीन सबसे ज्यादा AK-47 बनाता है।.

16. AK-47 दुनिया की अकेली ऐसी राइफल है, जो किसी भी वातावरण में काम कर सकती है. मतलब पानी, रेत या मिट्टी etc. कही भी.

17. AK-47 दुनिया की इकलौती ऐसी राइफल है जिसे बच्चे भी आसानी से चला सकते है. यही कारण है कि आप AK-47 चलाते हुए कई बच्चों की तस्वीर देख सकते है.

18. किसी अन्य बंदूक की बज़ाय दुनिया में सबसे ज्यादा AK-47 को काॅपी किया जाता है.यह दुनिया की सबसे ज्यादा ब्लैक (अवैध) रूप से बेची जाने वाली राइफल है. यह केवल 8 पुर्जों से मिलकर बनी होती है और इन्हें एक मिनट से भी कम समय में जोड़ा जा सकता है.

19. AK-47 एक गैस संचालित, सिलेक्टिव फायर राइफल है. सिलेक्टिव फायर मतलब, शूटर चाहे तो एक-एक करके फायरिंग कर सकता है या फिर एक ही बार में पूरी मैगज़ीन खाली कर सकता है.

20. आधुनिक एके-47 पर एक ग्रेनेड लांचर भी जोड़ा जा सकता है.

21. AK- 47, 300 मीटर की दूरी तक सटीक निशाना लगाती है. यदि शूटर जबरदस्त हुआ तो 800 मीटर पर भी लक्ष्य को मार सकता है.

22. सद्दाम हुसैन को एक सोने की एके-47 गिफ्ट में मिली थी. जो 2003 में इराक पर हुए आक्रमण के बाद अमेरिकी सैनिको द्वारा ज़ब्त कर ली गई.

23. ओसामा बिन लादेन अपने विडियो में एक AK- 47 पकड़े हुए दिखाई देता था. ऐसा माना जाता है, कि शायद अमेरिका ने ही लादेन की पहली एके-47 दी हो. अफगानिस्तान में सेवियत संघ से लड़ने के लिए.

24. किसी भी देश का आम नागरिक अपने पास एके-47 नही रख सकता. भारत में यह कानून और भी सख़्त है. एके-47 रखने के जुर्म में संजय दत्त को भी जेल हो गयी थी.

25. Mikhail Kalashnikov ने अपने सबसे बड़े अविष्कार AK- 47 की बिक्री से कभी पैसा नही कमाया. 2013 में 94 साल की उम्र में इनकी मौत हो गई.

अगर एक कागज़ को बीच में से 42 बार मोड दें, तो आप चांद पर पहुँच सकते है-कैसे तो पढ़े ये लेख

0

कागज़ के टुकड़े को 7 जा 8 बार से ज्यादा मोड़ना संभव नहीं 

क्या आपको पता है की एक कागज के टुकड़े को बिच से 7 जा 8 बार से ज्यादा नही मोड़ा जा सकता है ।चाहे वह कागज कितना भी पतला हो या कितना भी लम्बा चौड़ा हो | यह बात तो  बहुत लोगो को पता ही  होगी क्योकि किसी साधारण कागज़ के टुकड़े को 7  या 8वीं बार मोड़ते समय वह या  तो वो बहुत छोटा हो जाता है या फिर कागज़ में खिचाव इतना हो जाता है कि उसे मोड़ना असंभव हो जाता है।

लेकिन यदि हम मान लेते है की  कागज़ के टुकड़े को 7 जा 8 बार से ज्यादा मोड़ना संभव हो जाए तो जानते है क्या होगा?

कागज़ को सिर्फ 42 बार मोड़ देने से उसकी मोटाई पृथ्वी और चंद्रमां के बीच की दूरी (3 लाख 84 हज़ार कि.मी.) से भी ज्यादा हो जाएगी ! हा ये बिलकुल सच है बिश्वास नहीं है तो हम आपको बताते है की कैसे होगा ये –

आइए जानते हैं कैसे ?

एक साधारण कागज़ की मोटाई एक सेंटीमीटर के 100वें हिस्से जितनी होती है यानि कि 1 मिलीमीटर का 10वां हिस्सा (0.1 मिलीमीटर)।

कागज़ को 1 बार मोड़ने से उसकी मोटाई 2 गुणा हो जाएगी, 2 बार मोड़ने से 4 गुणा, 3 बार मोड़ने से 8 गुणा और 4 बार मोड़ने से 16 पेज़ों जितनी मोटाई हो जाएगी। यानि कागज को केवल 4 बार मोड़ने पर उसकी मोटाई 1.6 mm हो जाएगी

कागज़ को इसी तरह मोड़ते जाने से 9 बार मोड़ने पर कागज़ की मोटाई 512 गुणा हो जाएगी यानि कि एक मोटी किताब जितनी (51.2 mm)। 13 बार मोड़ने पर कागज़ की मोटाई एक ढ़ाई फुट के टेबल जितनी हो जाएगी (819.2mm)। 20 बार मोड़ने पर 0.1 मिलीमीटर मोटाई वाले कागज़ की मोटाई कुतुबमीनार ( 72.5मीटर ) से भी 30 मीटर ज्यादा हो जाएगी (104.85m)।

इसी तरह से 30 बार मोड़ने पर कागज़ की मोटाई 107 किलोमीटर और 42 बार मोड़ने पर 4 लाख 39 हज़ार 804 किलोमीटर हो जाएगी जो कि पृथ्वी और चांद के बीच की दूरी से भी 55 हज़ार किलोमीटर ज्यादा है !

अब अगर कागज़ को 42 से ज्यादा बार मोड़ा जाए तो क्या होगा?

– 51 बार मोड़ देने से कागज़ पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी जितना मोटा हो जाएगा (2.25×10^8)
– 94 बार मोड़ देने से कागज़ अब तक के ज्ञात ब्रह्मांड जितना मोटा हो जाएगा।

क्या आप जानते है नई गाड़ी की नंबर प्लेट पर A/F का क्या मतलब होता है ?

0

IAS इंटरव्यू में पूछा नई गाड़ी की नंबर प्लेट पर A/F का क्या मतलब है ?

भारत में आईएएस की परीक्षा सबसे मुश्किल परीक्षाओं में से एक मानी जाती हैं। आईएएस के इंटरव्यू में बहुत सारे ऐसे प्रश्न पूछे जाते है जिनका जवाब बहुत सारे लोगो को मालूम ही नहीं होता है | आईएएस के इंटरव्यू में कैंडिडेट से बहुत सारे ऐसे प्रश्न पूछे जाते है जिसके वजह से कैंडिडेट से कई बड़ी गलतियां भी हो जाती हैं, उनमें से एक गलती यह है कि कई लोग इस इंटरव्यू में अपना धैर्य नहीं रख पाते और सोचे बिना ही गलत जवाब दे देते है.आईएएस की परीक्षा में कई बार कुछ ऐसे सवाल पूछे जाते हैं जिनका कुछ मतलब भी नहीं होता है .

इसलिए मै आज आपको आईएएस इंटरव्यू में पूछे जाने वाले एक ऐसे सवालों के बारे में बताऊंगा. जिन्हें देखते तो बहुत लोग है और उनके बारे में सोचते भी है पर उनका जवाब उन्हें नहीं मालूम होता है

नई गाड़ी की नंबर प्लेट पर A/F का क्या मतलब है ?

जवाब-नयी गाड़ी की नंबर प्लेट पर A/F का मतलब “Applied For” होता है.इसका मतलब यह है कि गाड़ी के मालिक ने गाड़ी के नए नंबर के लिए अप्लाई किया हुआ है और जब तक गाड़ी का परमानेंट नम्बर नही मिल जाता है तब तक उसको नम्बर प्लेट पर A/F या Applied For लिखने की छूट दी गयी है.

Motor Vehicle Act 1989 के अनुसार सभी गाडियों को रजिस्ट्रेशन करवाना आवश्यक होता है | इसलिए जब तक नयी गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नंबर नहीं मिल जाता तब तक यह A/F के नंबर प्लेट पर चला सकते है | लेकिन अगर परमानेंट नंबर मिल गया है तो A/F नंबर के साथ गाड़ी चलाना गैर क़ानूनी हो जाता है |