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Friday, March 20, 2026
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जानिए एक ब्राम्हण परिवार के लड़के ने कैसे शौचालय को बनाया इंटरनेशनल ब्रांड

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Bindeshwar Pathak

दोस्तों किसी की जीवन में कुछ ऐसी घटनाये घटती है जिसके कारण उनके जीवन का मकसद बिलकुल स्पष्ट हो जाता है की हमें क्या करना है . आज मै एक ऐसे ही सामाजिक कार्यकर्ता एवं उद्यमी के बारे में बताने जा रहा हु जिनके बचपन में कुछ ऐसी घटना घटी जिसने उनके जीवन में नया मोड़ ला दिया . उन्होंने खुले में शौचालय जाते महिलाओ और पुरुषो की झुकी नजरो को उठाने के लिए  सुलभ इन्टरनेशनल की स्थापना कर डाली . जी हाँ मै बात कर रहा हूँ बिहार के महान उद्यमी बिन्देश्वर पाठक के बारे में . उनकी कंपनी न सिर्फ  स्वच्छता अभियान का हिस्सा बन रही है बल्कि मानव अधिकार, पर्यावरणीय स्वच्छता, ऊर्जा के गैर पारंपरिक स्रोतों और शिक्षा द्वारा सामाजिक परिवर्तन आदि क्षेत्रों में कार्य करने वाली एक अग्रणी संस्था है। पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित बिन्देश्वर पाठक द्वारा किए गए कार्यों की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है और पुरस्कृत किया गया है।

बिन्देश्वर पाठक जीवन परिचय – BINDESHWAR PATHAK HINDI BIOGRAPHY

जीवन परिचय

डॉ बिन्देश्वर पाठक  का जन्म 2 अप्रैल 1943 को बिहार के वैशाली जिले के एक गांव में  रूढि़वादी ब्राह्णण परिवार में हुआ. डॉ बिन्देश्वर पाठक जी कहते है की मै एक ऐसे बड़े घर में पला बढ़ा जिसमें 9 कमरे थे, पर एक भी शौचालय नहीं था.  मैं सोते हुए या अद्र्धनिद्रा में हर सुबह कुछ आवाजें सुनता था. कोई बाल्टी उठा रहा था, कोई पानी भर रहा था और महिलाएं सूर्योदय से पहले शौच के लिए बाहर जा रही होती थीं. कोई महिला बीमार पड़ जाती तो उसे एक मिट्टी के बर्तन में ही शौच करना पड़ता था. कई महिलाओं के सिर में दर्द रहता क्योंकि उन्हें दिनभर अपने शौच को रोककर रखना पड़ता था. मैंने यह सब देखा है. मैंने उन पुरुषों की झुकी हुई नजरें भी देखी हैं, जो दिन के समय खुले में शौच के लिए बैठे होते थे.

बचपन की कुछ घटनाओ से मिली सुलभ इंटरनेशनल शुरू करने की प्रेरणा

डॉ बिन्देश्वर पाठक से जब पूछा जाता है की एक ब्राह्मण परिवार का लड़का शौचालय जैसे समाज सुधार के क्ष्रेत्र में कैसे आया तो वो कहते है –  ये मेरे बचपन की कुछ घटनाओं से जाना जा सकता है. मेरा जन्म 1943 में बिहार के वैशाली जिले के एक गांव में एक रूढि़वादी ब्राह्णण परिवार में हुआ. जब मैं 6 वर्ष का था तो मैंने एक कथित अस्पृश्य महिला को छू दिया और रूढि़वादी अस्पृश्यता को मानने वाली मेरी दादी ने शुद्ध करने की बात कहकर जबरन मुझे गाय का गोबर और गौ मूत्र पिलाया. उसका कड़वा स्वाद आज भी मेरे मुंह में है. मुझे बाद में समझ आया, यही कहानी भारत के 7,00,000 गांवों और सैकड़ों शहरों की है. मेरी शिक्षा चार स्कूलों में हुई. उनमें से किसी में भी शौचालय नहीं था.

पढाई लिखाई

डॉ बिन्देश्वरी पाठक ने  सन 1964 में समाज शास्त्र में स्नातक की उपाधि ली। उन्हें  1968-69 में बिहार गांधी जन्म शताब्दी समारोह समिति के भंगी मुक्ति विभाग में काम करने का मौका मिला. समिति ने उन्हें  सुरक्षित और सस्ती शौचालय तकनीक विकसित करने और दलितों के सम्मान के लिए काम करने को कहा ताकि उन्हें मुख्य धारा में शामिल किया जाए. एक उच्च जाति के एक पढ़े-लिखे युवक के लिए यह एक गलत कदम माना जाता था. लेकिन इसने उनके व्यक्तित्व में बड़ा बदलाव किया और उनके  जीवन का रुख ही मोड़ दिया. सन 1980 में उन्होने स्नातकोत्तर तथा सन 1984 में पटना विश्वविद्यालय से पीएच डी की उपाधि अर्जित की। उनके शोध-प्रबन्ध का विषय था – बिहार में कम लागत की सफाई-प्रणाली के माध्यम से सफाईकर्मियों की मुक्ति (लिबरेशन ऑफ स्कैवेन्जर्स थ्रू लो कास्ट सेनिटेशन इन बिहार)।  उच्चकोटि के लेखक और वक्ता के रूप में श्री पाठक ने कई पुस्तके भी लिखीं। स्वच्छता और स्वास्थ्य पर आधारित विभिन्न कार्यशालाओं और सम्मेलनों में श्री पाठक  ने अभूतपूर्व योगदान दिया।

बेतिया की दलित बस्ती ने उनके  जीवन को एक नया मोड़ दिया

डॉ बिन्देश्वरी पाठक कहते है – मेरे जीवन में नया मोड़ तब आया, जब मैं बेतिया की दलित बस्ती में तीन महीने के लिए उनके बीच रहने गया. उस समय देश में जाति-प्रथा चरम पर थी. उनके साथ रहते हुए मैंने कई चीजें देखीं, जिन्होंने मेरी आंखें खोल दीं. इस वर्ग की पीड़ा दर्दनाक थी. तब मैंने अपना जीवन स्कैवेंजरों के लिए समर्पित करने की ठान ली. मैंने उस अपमान और तानों को नजरअंदाज किया जो मुझ पर आ रहे थे. अब मेरे सामने सवाल था पश्चिमी देशों में इस्तेमाल हो रही महंगी कलश और सीवर व्यवस्था के विकल्प के रूप में प्रभावी और सस्ती शौचालय व्यवस्था का विकास कैसे किया जाए, ताकि स्कैवेंजिंग प्रथा रोकी जा सके और उन्हें किसी अन्य काम में पुनर्वासित किया जा सके.

Bindeshwar Pathak

मैं कोई इंजीनियर या वैज्ञानिक नहीं था

डॉ बिन्देश्वरी पाठक कहते है – मैं कोई इंजीनियर या वैज्ञानिक नहीं था. इस वजह से शौचालय-प्रणाली का आविष्कार करने के लिए उपयुक्त नहीं था. लेकिन मैंने अपने दिमाग का इस्तेमाल किया, गहन शोध किया और इस विषय पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की किताब की मदद से 1968 में एक टू-पिट पोर-कलश, डिस्पोजल कंपोस्ट शौचालय का आविष्कार किया, जो सरलतापूर्वक स्थानीय वस्तुओं से, कम लागत पर बनाया जा सकता. यह आगे चलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव-अपशिष्ट के निपटान के लिए बेहतरीन वैश्विक तकनीकों में से एक माना गया. पहली बार इसकी सार्थकता दिखाने के लिए मुझे लंबा संघर्ष करना पड़ा. 1973 में मुझे यह अवसर मिला.

शौचालय का प्रयोग  हुआ सफल

शौचालय का प्रयोग सफल हुआ और इसने लोगों का ध्यान आकर्षित किया . श्री पाठक ने 1970 में सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की .  1974 में शहरी क्षेत्रों में ‘भुगतान और उपयोग’ के आधार पर सामुदायिक शौचालयों की अवधारणा विकसित की. इसे सबसे पहले बिहार और फिर पूरे भारत में लोकप्रियता मिली.  स्वच्छता के साथ ही इस संस्था ने दलित बच्चों की शिक्षा के लिए पटना, दिल्ली और अन्य जगहों पर स्कूल खोले जिससे स्कैवेंजिंग और निरक्षरता के उन्मूलन में सहायता मिली. महिलाओं और बच्चों को आर्थिक अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से इस संस्था ने  व्यावसायिक प्रशिक्षण-केंद्रों की स्थापना की. कई सांस्कृतिक भी पहल की: जैसे  जाति-बंधन को तोडऩे के उद्देश्य से स्कैवेंजरों को मंदिरों में ले जाने, उच्च वर्गों और स्कैवेंजरों का एक दूसरे के घर में आने-जाने, अंतरजातीय सम्मेलन और गोष्ठियां आयोजित कीं. इससे जातिवादी मानसिकता में बदलाव आया, सामाजिक बंधन शिथिल हुए और जाति-प्रथा को तोडऩे की प्रक्रिया शुरू हुई.

सुलभ इंटरनेशनल

सुलभ इंटरनेशनल एक सामाजिक सेवा संगठन है जो मुख्यतः मानव अधिकार, पर्यावरणीय स्वच्छता, ऊर्जा के गैर पारंपरिक स्रोतों और शिक्षा द्वारा सामाजिक परिवर्तन आदि क्षेत्रों में कार्य करती है। इस संस्था के 50,000 समर्पित स्वयंसेवक हैं। श्री पाठक ने सुलभ शौचालयों के द्वारा बिना दुर्गंध वाली बायोगैस के प्रयोग की खोज की। इस सुलभ तकनीकि का प्रयोग भारत सहित अनेक विकाशसील राष्ट्रों में बहुतायत से होता है। सुलभ शौचालयों से निकलने वाले अपशिष्ट का खाद के रूप में प्रयोग को भी प्रोत्साहित किया।

Bindeshwar Pathak

सुलभ इण्टरनेशनल सोशल सर्विस आर्गनाइजेशन

1980 आते आते सुलभ भारत ही नहीं विदेशों तक पहुंच गया। सन, 1980 में इस संस्था का नाम सुलभ इण्टरनेशनल सोशल सर्विस आर्गनाइजेशन हो गया। सुलभ को लिए अन्तर्राष्ट्रीय गौरव उस समय प्राप्त हुआ जब संयुक्त राष्ट्र संघ की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद द्वारा सुलभ इण्टरनेशनल को विशेष सलाहकार का दर्जा प्रदान किया गया। श्री पाठकने  राजस्थान के अलवर में भी व्यावसायिक प्रशिक्षण-केंद्र की स्थापना की है. यहां दलित महिलाओं को सिलाई, कढ़ाई और ब्यूटी केयर में प्रशिक्षण दिया जाता है, जो पहले सिर पर मैला ढोने का काम करती थीं.

दिल्ली में की म्युजियम ऑफ ट्वॉयलेट्स नामक संग्रहालय की स्थापना 

2008 में प्रशिक्षण पाने वाली करीब तीन दर्जन महिलाओं को हम न्यूयॉर्क ले गए, ताकि वे संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में फैशन शो में शिरकत कर इंटरनेशनल इयर ऑफ सैनिटेशन में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें. इसके बाद सुलभ ने बायोगैस, जैव-उर्वरक, द्रव और कचरा-प्रबंधन, गरीबी-उन्मूलन के काम में पदार्पण किया.  सुलभ इंटरनेशनल सेंटर फॉर ऐक्शन सोशियोलॉजी, सुलभ इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ एन्वायर्नमेंटल सैनिटेशन और दिल्ली में एक अनोखे संग्रहालय म्युजियम ऑफ ट्वॉयलेट्स की स्थापना की. यह प्राचीनकाल की शौचालयों की विकास की कहानी बताता है. बहरहाल, सुलभ ने देश में जो भी योगदान दिए हैं, वह शौचालयों की संख्या में खो जाते हैं, लेकिन सुलभ का  लक्ष्य सिर्फ शौचालय ही नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव तथा मानवीय विकास है.

पुरस्कार एवं सम्मान

श्री पाठक को भारत सरकार द्वारा 1991 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन् 2003 में श्री पाठक का नाम विश्व के 500 उत्कृष्ट सामाजिक कार्य करने वाले व्यक्तियों की सूची में प्रकाशित किया गया। श्री पाठक को एनर्जी ग्लोब पुरस्कार भी मिला। श्री पाठक को इंदिरा गांधी पुरस्कार, स्टाकहोम वाटर पुरस्कार इत्यादि सहित अनेक पुरस्कारों द्वारा सम्मानित किया गया है। उन्होने पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने के लिये प्रियदर्शिनी पुरस्कार एवं सर्वोत्तम कार्यप्रणाली (बेस्ट प्रक्टिसेस) के लिये दुबई अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त किया है। इसके अलावा सन 2009 में अंतर्राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा संगठन (आईआरईओ) का अक्षय उर्जा पुरस्कार भी प्राप्त किया

चुनौतियाँ 

2019 तक खुले में शौच की परंपरा खत्म करना संभव है, लेकिन चुनौतियां अधिक हैं. सिर्फ राज्य और कॉर्पोरेट घरानों के तालमेल से यह मुमकिन नहीं होगा, जैसा कि प्रधानमंत्री ने संकेत दिया है. इसमें जीवंत लोगों की भागीदारी और सुनियोजित योजनाओं की भी जरूरत है. यदि स्वच्छता को राष्ट्रीय प्रयोजन के तौर पर अपनाने की राजनैतिक इच्छाशक्ति हो और जरूरी पूंजी का इंतजाम हो तथा 50,000 प्रशिक्षित प्रेरकों के साथ मिलकर एक प्रभावी आंदोलन किया जाए तो देश के हर घर में शौचालय उपलब्ध होगा. और तब हम 2019 तक खुले में शौच को अलविदा कह सकेंगे.

BIRTHDAY SPECIAL – जानिए लोकसभा की पहली महिला अध्यक्ष मीरा कुमार के बारे में

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लोकसभा की पहली महिला अध्यक्ष मीरा कुमार

MEIRA KUMAR -मीरा कुमार  

 

अपने पिता स्वर्गीय जगजीवन राम के अधूरे सपने और संकल्प को पूरा करने के लिए भारतीय विदेश सेवा की नौकरी छोड़कर राजनीति में आईं मीरा कुमार स्वभाव से अत्यंत सौम्य, मृदुभाषी और मिलनसार हैं।राजीतिक पृष्ठभूमि वाली  मीरा कुमार को गुस्सा नहीं आता है। गुस्से में भी वह नहीं चीखती हैं। सौम्य हैं। हंसमुख हैं। पढ़ाकू भी हैं। मीरा कुमार अब तक पांच बार सांसद बन चुकी हैं वर्ष 2017 में मीरा कुमार को यूपीए द्वारा अपना राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया गया पर वो रामनाथ कोविंद से हार गयी 

 

प्रारंभिक जीवन 

मीरा कुमार का जन्म 31 मार्च, 1945 को बाबू जगजीवन राम और इन्द्राणी देवी के यहाँ सासाराम बिहार में हुआ था मीरा कुमार की प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के महारानी गायत्री देवी स्कूल में हुई। मीरा कुमार ने दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ और मिरांडा हाउस कॉलेजों से एम ए और एल एल बी तक शिक्षा ग्रहण की। वर्ष 1973 में वह भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के लिए चुनी गईं। कुछ वर्षो तक स्पेन, ब्रिटेन और मॉरीशस में उच्चायुक्त रहीं लेकिन उन्हें अफसरशाही रास नहीं आई और उन्होंने राजनीति में कदम बढ़ाने का फैसला किया। मीरा कुमार अंग्रेजी, स्‍‍पेनिश, हिंदी, संस्कृत, भोजपुरी भाषाओ में निपुण है। मीरा कुमार वर्ष 1968 में बिहार की पहली महिला कैबिनेट मंत्री सुमित्रा देवी के बड़े पुत्र मंजुल कुमार से परिणय सूत्र में बंधी।मीरा कुमार के एक पुत्र (अंशुल) एवं दो पुत्रियाँ (स्‍‍वाति और देवांगना) हैं।

राजनीतिक सफर –

मीरा कुमार ने अपना राजनीतिक सफर की शुरुआत उत्तर प्रदेश से किया। भारतीय राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित करने वाले बाबू जगजीवन राम के घर में पली-बढ़ी मीरा कुमार कांग्रेस के टिकट पर पहली बार 1985 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर लोकसभा क्षेत्र से उप चुनाव लड़ी और तब उन्होंने मायावती और रामविलास पासवान को पराजित कर राजनीति में धमाकेदार शुरुआत की ।हालांकि इसके बाद हुए चुनाव में वह बिजनौर से पराजित हुई। इसके बाद उन्होंने अपना क्षेत्र बदला और 11 वीं तथा 12 वीं लोकसभा के चुनाव में वह दिल्ली के करोलबाग संसदीय क्षेत्र से विजयी होकर फिर संसद पहुंचीं।

कांग्रेस कमेटी का महासचिव पद भी संभाला

मीरा कुमार पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के प्रयास से 1990 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव बनीं। 1996 में वे दूसरी बार सांसद बनीं और तीसरी पारी उन्होंने 1998 में शुरु की। 2004 में बिहार के सासाराम से लोक सभा सीट जीती। उस समय इन्हें पहली बार केन्द्र में मंत्री पद भी प्राप्त हुआ और सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया।

राजग की हवा में भी सासाराम सीट को बरकरार रखा

15 वीं लोकसभा चुनाव में बिहार में जहां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की हवा बह रही थी, उसमें भी मीरा कुमार ने सासाराम सीट को बरकरार रखा तथा अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी मुनिलाल को 45 हजार से ज्यादा मतों से पराजित किया। फलस्वरूप केन्द्र में उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा देते हुए जल संसाधन मंत्रालय सौंपा गया था।

पहली महिला स्पीकर

संसद के स्पीकर पद पर पहुंचने वाली वे पहली महिला हैं। वह भी दलित। इक्कीसवीं सदी में दुनिया के 187 मौजूदा लोकतांत्रिक देशों में से केवल 32 देशों में ही महिलाएं इस पद तक पहुंचने में सफल हो पाई हैं । आस्ट्रिया दुनिया का पहला देश है, जहां किसी महिला को संसद का स्पीकर चुना गया। द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले आस्ट्रियाई संसद बंदुेस्रात में पहली बार महिला स्पीकर पद पर आसीन हुई थी।

MIERA KUMAR BIHAR

प्रिय पुस्तक अभिज्ञान शांकुतलम्

मीरा कुमार कहती है कि मैं हमेशा कुछ न कुछ पढ़ती रहती हूं और मेरी प्रिय पुस्तक महाकवि कालिदास की अभिज्ञान शांकुतलम् है। पहली बार इस सदन की सदस्य बनने पर मैं पीछे की बेंच पर बैठा करती थी। जब मैं स्कूल की छात्रा थी, तब कई बार दर्शक दीर्घा से मैंने लोकसभा की कार्यवाही को देखा । उस समय स्वतंत्रता संग्राम के पुरोधा इस सदन में बैठकर देश के लोगों के हित में फैसले लेते थे। खासकर दलितों, वंचितों और कमजोर तथा हाशिए पर खड़े लोगों के लिए वह बड़ी मशक्कत करते थे।

कला और साहित्य से  विशेष लगाव 

भारतीय इतिहास में विशेष रुचि रखने वाली मीरा कुमार को कला और साहित्य से भी विशेष लगाव है।उन्हें देश-विदेश की ऐतिहासिक इमारतों का भ्रमण करने का भी शौक है। विदेश सेवा में कार्यरत होने के कारण बड़े पैमाने पर उन्होंने विदेश यात्राएं की हैं। हस्तशिल्प प्रेमी होने के अलावा मीरा कुमार एक अच्छी कवियित्री भी हैं. वह अपना खाली समय किताबें पढ़ने और शास्त्रीय संगीत सुनने में व्यतीत करती हैं। उनकी लिखी कई कविताएं प्रकाशित भी हुई हैं।

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जानिए विश्व की सबसे मीठी और अपनेपन वाली बोली भोजपुरी के बारे में

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नमस्कार दोस्तों , रउआ सब लोग के हमार ब्लॉग में स्वागत बा . हम इ ब्लॉग पर लेकर आइला कुछ प्रेरणादायक अउर कुछ रोचक जानकारी से भरल पोस्ट . का भईल रउआ सबके समझ में ना आईल . लेकिन अगर हम गायेंगे – ” कवन दिशा में लेके चला रे बटोहिया ” . तो आप लोग कहेंगे – अरे ये तो भोजपुरी है . जी हां आज हम भोजपुरी भाषा के बारे में बात करेंगे जिसे कई विद्वान  दुनिया की सबसे मीठी बोली मानते है . यह एकमात्र ऐसी बोली है जो दुनिया के कई देशो में बोली जाती है .

भोजपुरी भाषा की सबसे बड़ी खासियत यह है की जो इसे समझते है उनको तो मज़ा आता ही है पर जिसे समझ में नहीं आता है वो भी इसके मिठास से दूर नहीं रह पाते  है

भोजपुरी भाषा का उद्गम और विकास

भोजपुरी भाषा का नामकरण बिहार राज्य के आरा (शाहाबाद ) जिले में स्थित भोजपुर नामक गाँव के आधार पर हुआ है . पहले आरा और बक्सर जिला एक ही में थे जिसे भोजपुर के नाम से जाना जाता था . मध्य काल में मध्य प्रदेश के उज्जैन से भोजवंशी परमार राजा आकर आरा में बस गए. उन्होंने अपनी इस राजधानी को अपने पूर्वज राजा भोज के नाम पर रखा था. इसी वजह से यहां बोले जाने वाली भाषा का नाम “भोजपुरी” पड़ गया.

भोजपुरी भाषा का इतिहास सातवीं सदी से प्रारंभ होता है। भोजपुरी साहित्यकारों की मानें तो सातवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के समय के संस्कृत कवि बाणभट्ट के विवरणों में ईसानचंद्र और बेनीभारत का उल्लेख है जो भोजपुरी कवि थे। नवीं शताब्दी में पूरन भगत ने भोजपुरी साहित्य को आगे बढ़ाने का काम किया। नाथसंप्रदाय के गुरु गोरखनाथ ने सैकड़ों वर्ष पहले गोरख बानी लिखा था। बाबा किनाराम और भीखमराम की रचना में भी भोजपुरी की झलक मिलती है।

भोजपुरी भाषा के शेक्सपियर -भिखारी ठाकुर

भोजपुरी भाषा का जिक्र हो और भिखारी ठाकुर की बात न हो ये भी भला हो सकता है . 18 दिसंबर 1887 को छपरा के कुतुबपुर दियारा गांव में एक निम्नवर्गीय नाई परिवार में जन्म लेने वाले भिखारी ठाकुर ने विमुख होती भोजपुरी संस्कृति को नया जीवन दिया। भिखारी ठाकुर ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे, उसके बावजूद उन्होंने कई कृतियों की रचना की। उनके द्वारा रचित नाटक बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी-बेचवा बेटी-बियोग, बिदेसिया की प्यारी सुंदरी, नशाखोर पति आदि आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितना पहले हुआ करते थे।

हिंदी की एक छोटी बहन है भोजपुरी

भोजपुरी एक आर्य भाषा है जो बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में प्रमुखता से बोली जाती है . आधिकारिक और व्यवहारिक रूप से भोजपुरी हिन्दी की एक उपभाषा या बोली है। भोजपुरी अपने शब्दावली के लिये मुख्यतः संस्कृत एवं हिन्दी पर निर्भर है कुछ शब्द इसने उर्दू से भी ग्रहण किये हैं। भोजपुरी बहुत ही सुंदर, सरस, तथा मधुर भाषा है। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश के सभी हिस्सों में भोजपुरी बोलने वाले मिल जाएंगे. बिहार की तिन बोलिया भोजपुरी ,मगही और मथिली में विस्तार क्षेत्र के हिसाब से भोजपुरी को सबसे उच्च स्थान प्राप्त है .

विश्व के आठ देशो में है इस भाषा का विस्तार

भोजपुरी का विस्तार न सिर्फ भारत में बल्कि विश्व के कई महाद्वीपों तक है . आपको यह जानकर थोडा आश्चर्य जरुर होगा की विश्व में करीब 8 देश ऐसे हैं, जहां भोजपुरी धड़ल्ले से बोली जाती है और सुनी भी जाती है . भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, फिजी, मॉरिशस, अमेरिका, त्रिनिनाद और टोबैगो तथा सुरीनाम आदि देशो में भोजपुरी भाषा बोली जाती है . परिस्थितियों के कारण बिहार के लोगों को अन्य देशों में जाना पड़ा. ऐसे में वे वहीं के हो गए, मगर अपनी बोली को अपने साथ सदैव बनाए रखा. भोजपुरी बोलने वालो की  जनसंख्या 20 करोड़ से भी ज्यादा है । ये लोग भारत ही नहीं बल्कि विश्व के विभिन्न हिस्सों मे अपना विशेष प्रभाव भी रखते हैं । संख्या के हिसाब से भोजपुरी विश्व की 10वीं सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है.

‘एक मारिशस की हिन्दी यात्रा’

मारिशस के हिन्दी विद्वान सोमदत्त बखोरी ने अपनी पुस्तक ‘एक मारिशस की हिन्दी यात्रा’ मे लिखते हैं कि भोजपुरी केवल घर कि भाषा नहीं थी ,ये सारे गाँव कि भाषा थी . भोजपुरी के दम पर लोग हिन्दी समझ लेते थे और हिन्दी सीखना चाहते थे . वह सहायक सिद्ध होती थी . मॉरीशस ने जून, 2011 में ही भोजपुरी भाषा को संवैधानिक मान्यता दे दी थी. भोजपुरी की लोकप्रियता की मिठास का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि संगम नगरी मे मारिशस से आयी एक विदुषी ने कहा था कि भोजपुरी की मिठास की प्रगाढ़ता ही है कि उसने मारिशस जैसे टापू को भी स्वर्ग बना दिया . आज हम निःसंकोच कह सकते हैं कि इस देश मे बहुत जगह हिन्दी फली फुली है तो भोजपुरी के प्रतापों से.

भोजपुरी भाषा को राष्ट्रिय दर्जा नहीं पाने का नुकसान

भोजपुरी भाषाभाषियों की संख्या भारत की समृद्ध भाषाओं- बँगला, गुजराती और मराठी आदि बोलनेवालों से कम नहीं है। फिर भी अभी तक इस भाषा को संविधान की आठवी अनुसूची में नहीं शामिल किया जा सका है . अपने देश में संवैधानिक दर्जा नहीं मिल पाने के कारण भोजपुरिया लोगो को बहुत सारी सुख सुविधाओ से वंचित रखा जाता है . भोजपुरी रचनाओ को साहित्य पुरस्कार ,फिल्मों को राष्ट्रीय अवार्ड,भोजपुरी लेखकों को राष्ट्रीय पुरस्कारों की श्रेणी से बाहर रखा जाता है . संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओ में भोजपुरी को परीक्षा का आधार नहीं बनाया जा सकता . इस भाषा और साहित्य के विकास के लिए सर्कार से आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं की जा सकती . भोजपुरी फिल्मे देश के राष्ट्रिय चैनल दूरदर्शन पर नहीं दिखाई जा सकती है . जो की भोजपुरी के 20 करोड़ जनमानस के साथ अन्याय है ।

“ना बोलला के मतलब इनकार ना होखेला,
हर नाकामयाबी के मतलब हार ना होखेला,
का होगइल भोजपुरी के भाषिक दर्जा ना मिलल त,
खाली दर्जा पावल ही भाषा से प्यार ना होखेला”

भोजपुरी और हिन्दुस्तान

भारत में राष्ट्रीय भाषा हिन्दी के बाद सबसे ज्यादा बोले जाने वाली बोलियों मे भोजपुरी है। समय समय पर इसको भाषा बनाने की मांग उठती रही है ।1969 से ही अलग-अलग समय पर सत्ता में आई सरकारों ने भोजपुरी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का आश्वासन दिया था। लेकिन दशकों गुजर जाने के बाद भी भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है। इसके लिए विभिन्न आंदोलन भी हुये लेकिन ये आंदोलन तुच्छ राजनीति का शिकार हो गए। अगर भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाता है तो निसंदेह उसके सुखद परिणाम होंगे। एक तो भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा हासिल हो जाएगा और दूसरे, भोजपुरी भाषा से जुड़ी ढेरों संस्थाएं अस्तित्व में आएंगी जिससे क्षेत्रीय भाषा का विकास होगा और साथ ही कला, साहित्य और विज्ञान को समझने-संवारने में मदद मिलेगी। संवैधानिक दर्जा मिलने से भोजपुरी भाषा की पढ़ाई के लिए बड़े पैमाने पर विश्वविद्यालय, कालेज और स्कूल खुलेंगे जिससे कि रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि होगी।

अंतर्राष्ट्रीय होती भोजपुरी

हिन्दुस्तान में भोजपुरी महज एक बोली नहीं, बल्कि एक इंडस्ट्री है. व्यवसाय, मनोरंजन और साहित्य में भोजपुरी ने पूरे हिन्दुस्तान में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है. ये भोजपुरी बाज़ार का ही आकर्षण है कि अब यहाँ पर चैनल भी आने लगे हैं . महुआ चैनल की सफलता एवं लोकप्रियता के बाद अनेक भोजपुरी चैनल आ गए हैं । जिसमे गंगा,हमार टीवी जैसे चैनल प्रमुख हैं । भोजपुरी को इंटरनेट फ्रेंडली बनाने का भी प्रयास किया जा रहा है । बीएचयू के भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान व भोजपुरी अध्ययन केंद्र मिलकर इंटरनेट फ्रेंडली बनाने मे जुटे हैं। खबरिया पत्रकारों मे भी बड़े नाम हैं रवीश कुमार,पुण्य प्रसून,उर्मिलेश जैसे पत्रकार भी भोजपुरी भाषी हैं जो आज हिन्दी पत्रकारिता की रीढ़ बन चुके हैं ।आज भोजपुरी सिनेमा करीब 20,000 करोड़ रुपये की हो गई है. टीवी के 52 चैनल सिर्फ़ भोजपुरी के ही हैं. इस आधार पर हम कह सकते हैं कि भोजपुरी के बिना हिन्दुस्तानी बोली की कल्पना ही नहीं की जा सकती है.

कुछ अफ़सोस भी है

जितना ज्यादा विकास भोजपुरी भाषा का हुआ है उतना विकास किसी भाषा का नहीं हुआ है . बहुत सारी हिंदी फिल्मो में भोजपुरी भाषा या भोजपुरी भाषा से जुड़े किसी पात्र को जगह दी जा रही है ताकि फिल्म को मजेदार बनाया जा सके . टेलीविजन जगत में भी भोजपुरी का बोलबाला हो गया है . चाहे वो निमकी मुखिया का कैरक्टर हो या भाभीजी घर पर है की अंगूरी भाभी का . सभी जगह इनकी चुलबुली और मीठी  भोजपुरी भाषा को पसंद किया जा रहा है  . लेकिन बहुत सारे लोग फिल्मो में भोजपुरी बोलने वालो को अनपढ़ , गवार या गुंडा दिखाते है . जबकि ऐसा नहीं है . बिहार के बाहर अगर किसी से भोजपुरी में बोल दिया जाए तो वो ऐसे देखने लगता है जैसे हम किसी दुसरे ग्रह से आये है . भोजपुरी भाषा की सबसे बड़ी दुश्मन भोजपुरी इंडस्ट्री बन चुकी है. आज कल भोजपुरी गानों के नाम पर केवल फूहड़ता परोसी जा रही है. और इनकी कमाई भी काफी हो रही है . मै भोजपुरी इंडस्ट्री से जुड़े सभी लोगो से हाथ जोड़कर निवेदन करना चाहता हु की पैसे के कारण भोजपुरी भाषा को अश्लील मत बनाईये . अगर आपको भोजपुरी भाषा और बिहार से प्यार है तो अच्छे गाने बनाये जिसे परिवार के सभी सदस्य सुन सके . जो भी भोजपुरी भाषा के नाम पर अश्लील सामग्री प्रस्तुत कर रहे है हमें उनका विरोध करना होगा तभी हम अपनी भोजपुरी भाषा को वो सम्मान दिला पाएंगे जिसकी वो अधिकारी है

नीतीश ने भरोसा जताया तो इस IAS ने बदल दी पुरे बिहार की तस्वीर

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दोस्तों आज हम बताने जा रहे है बिहार के एक ऐसे लाल की जिन्हें जिस काम की अपेक्षा की जाती है, वे उसे पूरा कर दिखाते हैं.  वे बिना थके अपेक्षाओं से भी आगे बढ़कर अपने काम को अंजाम देते हैं.अपनी लगन, निष्ठा और साहस के साथ वे इस बात की मिसाल हैं कि नौकरशाह को जनसेवा के प्रति कितना समर्पित होना चाहिए. बिहार में सड़कों और बिजली  की सूरत बदलने का श्रेय इन्हे ही जाता है . जी हा हम बात कर रहे है  नागरिक प्रशासन के लिए प्रधानमंत्री का एक्सलेंस अवार्ड से सम्मानित  1991 बैच के आइएएस ऑफिसर अमृत प्रत्यय की 

Meet Pratyaya Amrit, the Inspiring IAS Officer Who Has Placed Bihar Firmly on the Road to Success

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टूटी हुई कुर्सियां ,दिवारों में सीलन,और फटे हुए परदे ; हम  कोई कबाड़ खाने की तस्वीर बयां नहीं कर रहे बल्कि कुछ सालो पहले  बिहार राज्य पुल निर्माण निगम (BRPNN) के दफ्तर का ऐसा ही हाल था. वर्ष 2006 में इसकी हालत बहुत खराब थी। राज्य सरकार तक ने इसे बंद करने का मन बना लिया था .इसी दफ्तर में बैठकर बिहार को रफ्तार देने की जिम्मेदारी थमाते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने IAS अधिकारी प्रत्यय अमृत तो बिहार राज्य पुल निर्माण निगम BRPNN का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया था.

साल 2006 में जब प्रत्यय अमृत ने जिम्मेदारी संभाली थी तब BRPNN के खाते में महज 47 करोड़ रूपय थे.  लेकिन IAS प्रत्यय अमृत ने महज दो साल में वो कारनामा कर दिखाया जिसे देख कर सरकार भी हैरान थी. कल तक आर्थिक तंगी से परेशान BRPNN दो साल के भीतर ही कोसी बाढ़ के दौरान मुख्यमंत्री राहत कोष के लिए 20 करोड़ रुपये दान करने की स्थिति में था. प्रत्यय अमृत ने अपने दम पर ना सिर्फ दिवालिया हो चुके एक उपक्रम को चलाया बल्कि उसे इतना आगे ले गए की  जुलाई 2009 में बिहार राज्य पुल निगम, आइएसओ 9001:2000 और 1410:2004 प्रमाणित कंपनी बन गई . जहां एक ओर बिहार में 30 साल में 300 पुल बने थे वहीं प्रत्यय अमृत के निर्देशन में  महज तीन साल में 314 पुलों का निर्माण हो गया।

प्रत्यय अमृत जीवन परिचय – PRATYAYA AMRIT HINDI BIOGRAPHY

पढाई लिखाई 

प्रत्यय अमृत गोपालगंज जिला के  हथुआ सब डिविजन के भरतपुरा गांव का निवासी है . उनके पिताजी  बीएनमंडल यूनिवर्सिटी के वॉयस चांसलर थे. उनकी मां भी प्रोफेसर थीं. उनकी  पढ़ाई लिखाई  मुजफ्फरपुर से शुरू हुई. 10वीं आसनसोल से हुई. दिल्ली से बारहवीं और हिंदू कॉलेज से बीए व एमए किया. उन्होंने  हिस्ट्री से ऑनर्स किया था. पोस्ट ग्रेजुएशन के अगले ही दिन उन्हें  वैंकटेश्वर कॉलेज में लेक्चररशिप का जॉब मिल गया था. कुछ महीनों तक उन्होंने  वहां भी पढ़ाया है. उसके बाद 1990 में आइपीएस और 1991 में आइएएस बने .

प्रत्यय अमृत की बहन भी आइएएस है

प्रत्यय अमृत कहते है की अन्य घरों की तरह ही उनके घर का भी माहौल था. शुरुआत से ही उनको माता-पिता का गाइडलाइन मिला है. उन दिनों लोग अपने बच्चों को हॉस्टल में रख कर नहीं पढ़ाते थे. हमारी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद हमारे पैरेंट्स ने हम भाई-बहनों को हॉस्टल में रख कर पढ़ाया. हम तीनों भाई-बहन सोचते थे कि जिस कठिनाई में रख कर पैरेंट्स हमें पढ़ा रहे हैं, ऐसे में हमें कुछ कर दिखाना चाहिए. उसके बाद हम लोग परिश्रम करते रहे. माता-पिता का आशीर्वाद रहा. हम आइएएस बने. हम सबने पढ़ाई की एक स्ट्रेटजी तैयार की थी. मैं हमेशा ग्रुप स्टडी को पसंद करता हूं. ध्यान रख कर लाइट माइंड के दोस्तों के साथ ऐसा ग्रुप बनायें. प्रत्यय अमृत की बहन भी आइएएस है.

 

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एक फोन ने बदल दी बिहार की किस्मत

आपने अक्सर सुना होगा की एक फोन ने किसी शख्स की किस्मत बदल दी. लेकिन ऐसा पहली बार हुआ जब एक फोन ने पुरे राज्य की किस्मत बदल दी हो. 1991 बैच के अधिकारी प्रत्यय अमृत उस समय दिल्ली में डेपुटेसन पर थे. तभी बिहार के एक अधिकारी ने उन्हे फोन कर पूछा कि क्या वो बिहार आना चाहते हैं. बिहार में उन्हें एक मृत पड़ी संस्थान बिहार राज्य पुल निर्माण निगम को चलाने की जिम्मेदारी दी जा रही थी, लेकिनबिहारी होने के कारण  बिहार प्रेम उन्हें वापस बिहार खींच लाया. फिर क्या था एक बिहारी ने जो कर के दिखाया वो आज सबके सामने है

मुश्किल था काम को अंजाम देना

ऐसा नहीं है की प्रत्यय अमृत ने ये सब बड़ी आसानी से कर दिखाया बल्कि उन्हें अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा. प्रत्यय अमृत ने जब काम संभाला था तब विभाग के कर्मचारियों का मनोबल टूट चुका था. प्रत्यय अमृत के पास पेंडिंग पड़ी योजनाओं की एक लंबी सूची थी. जिसमें से कुछ तो 17 साल से लंबित पड़े प्रोजेक्ट थे. पिछले एक दशक में जिस विभाग को चूस कर खोखला बना दिया गया था उसी विभाग को चमकाकर प्रत्यय अमृत ने बिहार को रफ्तार देने का काम किया.  बिहार राज्य पुल निर्माण निगम के प्रबंध निदेशक (BRPNN) के रूप में, उन्होंने तीन साल में लगभग 300 प्रमुख पुल परियोजनाओं के पूरा होने का निरीक्षण किया था. ऐसे माहोल में जहां एक ईंट लगाना भी मुश्किल था वहां 300 पुल का काम पूरा करवाना किसी पहाड़ को हिलाने से कम नहीं था.

कर्मचारियों को किया प्रोत्साहित 

प्रत्यय का मानना है कि कर्मचारियों को काम करने के लिए बेहतर सुविधा और माहौल जरुर मुहैया करानी चाहिए, तभी आप अधिक से अधिक परिणाम पा सकते हैं। प्रत्यय ने चुनौती को समझते हुए सबसे पहले अपनी टीम को मजबूत करने की ठानी. उन्होंने अपनी टीम के अधिकारियों और इंजीनियरों को  आउट-ऑफ-द-बॉक्स समाधान निकालने की छूट दी. जब अधिकारियों को काम करने की आजादी मिली तो किसी ने अपने बॉस को निराश नहीं किय़ा. हलांकी तारीफ टीम लीडर की भी करनी होगी क्योंकि जब जब उन्हें लगा की टीम ने कोई बड़ा काम किया है तब-तब उन्होंने अपनी टीम को सम्मानित भी किया. इंजीनियरों और कर्मचारियों में जो विश्वास प्रत्यय अमृत ने दिखाया उसका ही परिणाम था कि BRPNN आज इतनी बहतर स्थिति में है .

बना दिया रिकार्ड

BRPNN ने अपने स्थापना के तीस सालों में जहां सिर्फ 314 पुल बनाए थे वहीं 2006 में प्रत्यय अमृत के आने के बाद सिर्फ तीन साल में ही 336 पुल बनाकर ऐसा रिकार्ड बना दिया जिससे सभी लोग आश्चर्यचकित हो उठे . तीन साल में बने इसी 336 पुल की बदौलत ही  नीतीश कुमार ने पूरे बिहार में सड़कों का जाल बिछाया. जिससे बिहार की पुरानी तस्वीर बदल गई. IAS अधिकारी प्रत्यय अमृत को जब BRPNN का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया था उस वक्त विभाग के खाते में महज 47 करोड़ रूपय थे. लेकिन आज विभाग का कारोबार 768 करोड़ तक पहुंच गया है.जो संस्था बंद होने के कगार पर थी, उसने कोशी बाढ़ पीड़ितों के लिए 20 करोड़ रुपए की मदद दी.ये प्रत्यय अमृत के प्रयासों का ही परिणाम था कि जुलाई 2009 में बिहार राज्य पुल निगम, आइएसओ 9001:2000 और 1410:2004 प्रमाणित कंपनी बन गई। हलांकि इस काम के लिए उन्हें मेहनत भी बहुत करनी पड़ी है. जानकारों की माने तो अमृत ने इस काम को अंजाम तक पहुंचाने के लिए 40 हज़ार किलोमीटर कर का सफर किया.

इनके काम से आम जनता भी रहती है खुश 

प्रत्यय अमृत के काम को जनता ने हमेशा सराहा है। जब ये कटिहार के जिलाधिकारी थे, पहली बार सरकारी और प्राइवेट संस्थाओं को जिला अस्पताल से मिलकर काम करने के लिए कहा। इसी तरह प्रत्यय अमृत जब छपरा के जिलाधिकारी थे तो पहली बार एशिया के सबसे बड़े पशु मेला सोनपुर में सीसीटीवी कैमरा को लगवाया, जो सुरक्षा के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण कदम था। वर्ष 2011 में प्रत्यय अमृत को बिहार स्टेट रोड डेवलपमेंट कारपोरेशन का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया। मैनेजिंग डायेरेक्टर के तौर पर प्रत्यय अमृत ने निर्णय लिया कि संस्था के फंड का कुछ हिस्सा, आर्थिक रुप से पिछड़ी लड़कियों के पढ़ाई और उनको आत्मनिर्भर बनाने पर खर्च किया जाए। प्रत्यय अमृत को 2011 में पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के लिए प्रधानमंत्री एक्सिलेंस अवार्ड भी मिल चुका है।

 

 

हर मुश्किल को आसान बनाने वाले कुशल प्रशासक हैं ऑफिसर अमृत प्रत्यय

यह जुलाई माह का एक दिन था. राजधानी पटना में दीघा-एम्स की सड़क के निर्माण में लगी कंपनी की गड्ढ़ा खोदने वाली भीमकाय मशीन अर्थमूवर ने गलती से बिजली के मोटे-मोटे केबल तारों को क्षतिग्रस्त कर दिया. इन केबलों के जरिए 220/132/33 केवी के खगौल ग्रिड सब-स्टेशन से दीघा ग्रिड को बिजली पहुंचाई जाती है. बिजली की यह लाइन पश्चिमी पटना के 2,00,000 से ज्यादा उपभोक्ताओं को बिजली की आपूर्ति करती है. केबलों के टूटने से पूरा पश्चिमी पटना अंधेरे में डूब गया. 132 केवी का खगौल केबल 2 दिसंबर, 2013 और 30 मार्च, 2014 को दो बार टूट चुका था. दोनों ही बार केबल की मरम्मत करने में हफ्ते भर से ज्यादा समय लगा था.

सात दिन की जगह मात्र 36 घंटे के भीतर बिजली बहाल करवाई 

लेकिन 1991 बैच के आइएएस अधिकारी प्रत्यय अमृत को जिन्होंने एक माह पहले ही ऊर्जा सचिव का कार्यभार संभाला था, को पिछले रिकॉर्डों से कुछ भी लेना-देना नहीं था. उन्होंने विशेषज्ञों और आधुनिक केबलों को जोडऩे वाले उपकरणों का इंतजार करने की जगह कोई नया उपाय आजमाने का फैसला किया. वे इस कोशिश में कामयाब भी रहे और महज 36 घंटे के भीतर बिजली बहाल हो गई. उस वक्त तक मध्य प्रदेश के सतना से केबल विशेषज्ञ पहुंच भी नहीं पाए थे. उन्होंने यह सब कैसे किया. अपने इंजीनियरों के साथ सोच-विचार करने के बाद अमृत ने इंजीनियरों से कहा कि वे दीघा ग्रिड को बिजली की सप्लाई करने के लिए क्षतिग्रस्त केबल से एक अस्थायी लाइन स्थापित करें.

मुश्किल समस्या को बड़ी आसानी से किया हल 

जमीन खोदने वाली मशीन अर्थमूवर ने केबल को क्षतिग्रस्त कर दिया था, लेकिन बारीकी से जांच करने पर पाया गया कि एक सर्किट के दो केबल और दूसरे सर्किट का एक केबल अब भी सही-सलामत था. अमृत ने इंजीनियरों से कहा कि वे इन्हीं तीन केबलों से एक वैकल्पिक सर्किट बनाएं और दीघा ग्रिड को दी जाने वाली बिजली बहाल करें. यह काफी मुश्किल और खतरनाक काम था. यह प्रयोग अगर असफल रहता तो स्थिति और भी बिगड़ सकती थी. लेकिन उनकी कोशिश काम कर गई. वहीं दूसरी ओर केबल मरम्मत के लिए सात दिन का जो अनुमान लगाया गया था, वह सही साबित हुआ. केबल की मरम्मत का काम पूरा होने के लिए आठ केबल-ज्वाइंट किट की जरूरत होती है, जिन्हें स्वीडन से मंगाना पड़ा और वे तीन दिन बाद ही पटना पहुंच पाए. केबल की मरम्मत करने में हफ्ते भर से ज्यादा समय लग गया. पर उपभोक्ताओं को मुसीबत नहीं झेलनी पड़ी, क्योंकि अमृत की कोशिशों से तैयार वैकल्पिक सर्किट से उन्हें बराबर बिजली मिलती रही.

कबाड़’ की चीजों का किया ‘जुगाड़’ तो बन गया पटना का ‘एनर्जी कैफे’

एनर्जी कैफे को बिहार के विद्युत विभाग के मुख्यालय में बनाया गया है। इस कैफे का बनाने के लिए बिजली विभाग के सारे खराब और कबाड़ सामान का दोबारा इस्तेमाल किया गया है यहां तक की यहां  के फर्नीचर  तक  पुराने कबाड़ से बने और एनर्जी कैफे नाम दिया गया है। आपको बता दें कि इस कैफे को बनाने का आइडिया बिहार के आईएएस और बिजली विभाग के सीएमडी  रहें प्रत्यय अमृत का था।  इस कैफे को प्रोफेशनल आर्टिस्ट मंजीत और नेहा सिंह ने डिजाइन किया है ।

दोनो लोगो को प्रत्यय ने टाॅस्क दिया था कि यहां पर जितनी भी  चीजें है कबाड़ की उन्हें फिर से इस्तेमाल करके उन्हें आकर्षक बनाना है। दोनाे ने मिलकर पुराने ड्रम को काटकर कुर्सी का रूप तो क्वायल लपेटने वाले लकड़ी के मोटे गठ्ठर को सेंटर टेबल बना डाला। दोनों ने बताया कि कबाड़ को फिर से आकर्षक बनाना बहुत मुश्किल था लेकिन हमनें चीजो को नया रूप दे ही दिया । इलेकिट्रक पैनल्स को कुर्सी और टेबल बनाया तो इंसुलेटर भी काम आ गया।दोनो ने आॅयल ड्रम को बैठने का टूल तैयार किया और इंसुलेटर से डस्टबिन इसके अलावा बिजली के तारो से मार्डन आर्ट बनाये।  मीनू का बनाने के लिए दीवाल घड़ी के साथ लकड़ी के पुराने टुकड़े का इस्तेमाल किया।

कैफे का एक सोफा लोगों को अपनी तरफ खास आकर्षित करता है। दरअसल एक पुरानी एंबेसेडर कार को आधा काट कर उसे सोफा में बदला गया है और उसमें गद्दे लगाये गये हैं।

फेम इंडिया मैगजीन-एशिया पोस्ट सर्वे में मिला प्रमुख स्थान 

स्वभाव से बहुत सरल प्रत्यय अमृत कभी भी हार न मानने वाले व्यक्ति हैं। उनका मानना है कि किसी भी काम को टालना नहीं चाहिए, उसे तुरंत करना चाहिए। यही जीवन में सफलता की कूंजी है। फेम इंडिया मैगजीन-एशिया पोस्ट सर्वे के ‘असरदार आईएएस 2018’ के सर्वे में विभिन्न पैरामीटर में की गई रेटिंग में प्रत्यय अमृत को प्रमुख स्थान पर पाया है।

बिहार दिवस की शुभकामनाये || Happy Bihar Diwas Quotes , Images

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happy bihar diwas quotes

HAPPY BIHAR DIWAS -QUOTES, IMAGES

आज बिहार को अलग हुए पूरे 106 साल हो गये हैं. लोग उत्साह और जोश में डूबे हैं. ब्रिटिश शासन में बिहार बंगाल प्रांत का हिस्सा था, जिसके शासन की बागडोर कलकत्ता में थी. हालांकि इस दौरान पूरी तरह से बंगाल का दबदबा रहा लेकिन इसके बावजूद बिहार से कुछ ऐसे नाम निकले, जिन्होंने राज्य और देश के गौरव के रूप में अपनी पहचान बनाई.
1912 में बंगाल प्रांत से अलग होने के बाद बिहार और उड़ीसा एक समवेत राज्य बन गए, जिसके बाद भारतीय सरकार के अधिनियम, 1935 के तहत बिहार और उड़ीसा को अलग-अलग राज्य बना दिया गया.

 

हम लेकर आये है बिहार दिवस की शुभकामनाओ के कुछ कोट्स ,लाइन , शायरी और इमेज जिन्हें पढ़ कर आपको जरुर अच्छा लगेगा 

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जहवाँ के लड़कन न माने हार।।
वही तो है अपना बिहार।।।

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ऐ बिहार, तू बेमिसाल
तुझ से हैं हम तुझमें मगन! 
हरियाली तेरे कदम चूमती, बहती पावन पवित्र गंगा, सीमा पर तुझको घेरे है
अवध झारखंड और बंगा, देकर कुर्बानी प्राणों की, 
सचिवालय पर लहरा दिया तिरंगा
आओ संभालें इसका चैन औ’ अमन
शत शत नमन तुझे शत शत नमन| हार्दिक शुभकामनाएं.

 #BiharDiwas

happy bihar diwas quotes

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Being a bihari myself feel proud ,not even single corner of the world has left where bihari toiling hard.
salute to motherland who produced numerous IAS ,IPS , engineer .

#BiharDiwas

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विश्व को लोकतंत्र की राह दिखाने वाले ज्ञान व संस्कृति की भूमी बिहार की समस्त जनता को बिहार दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ!

#BiharDiwas

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Bihar diwas,the day to rememorise the contribution of bihar in country building,the place of budhha,Great Ashoka,Mahavir,Nalanda &Vikramshila unv,Maghadh(the center of politics),Aryabhatta,and so on…worldless.salute to Bihar
#bihardiwas

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Bihari, is not an insult,it’s my identity
Take pride in being a Bihari.
#BiharDiwas

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बुद्ध,सम्राट अशोक,महावीर,गुरु गोविंद सिंह,वीर कुंवर सिंह,रेणु,दिनकर,डॉ राजेंद्र प्रसाद,विद्यापति,भिखारी ठाकुर,नालंदा विश्वविद्यालय जैसे अनगिनत महापुरुषों/स्थलों से जाना जाने वाला बिहार, हां ये है मेरा बिहार।
बिहार दिवस की बधाइयाँ
#BiharDiwas

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Greetings to the people of Bihar on the occasion of . May the State continue to achieve new milestones, on its journey towards development and prosperity. It was on this day when the British carved out the State of Bihar from Bengal Presidency in 1912

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Bihar often considered as a land of labourers. But we should appreciate the fact that they are hardy enough to adapt themselves to any situations. Fact proves that Bihar is the state which is considered as the 2nd most IAS producing factory. Proud to be BIHARI Happy

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विश्व को प्रथम लोकतंत्र, अहिंसा, सदभाव, करूणा व प्रेम का सन्देश देने वाली ज्ञान एवं संघर्ष की भूमि बिहार के स्थापना दिवस पर आप सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

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Everyone started from 1 But we started from zero… Yes we the people of Bihar…. Chankya..aryabhatt all are the superpower of our country belongs to the land of diverse culture means Bihar.

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ज्ञान, स्वाभिमान और परिश्रम की भूमि बिहार प्रदेश के सभी वासियों को की हार्दिक शुभकामनाएं। अपने गौरवशाली इतिहास से बिहार न सिर्फ देश के प्रमुख राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्रों में से एक रहा बल्कि भारतवर्ष के विकास और निर्माण में भी बिहार का अद्वितीय योगदान रहा है।

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Happy Bihar Diwas To The Manufacturer/Producer/Creator Of Most Of The IAS, IPS And The Bank PO’s In The Country. Happy 106th Birthday Bihar.❤

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हम हैं बिहारी सारे जग में हम भारत की शान मेहनत अपना दीन धरम मेहनत है ईमान बिहार दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाए जय बिहार

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वईसे तो हम बिहारी 365 दिन, सब पर भारी फिर भी रस्मी तौर पर हम सब बिहरियन को बिहार दिवस की बधाई ..??

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जोश है, होश है, हौसलों से यारी है। दुःख से, दर्द से, उबरने की बारी है। गर्व से, शौर्य से, बोल तू “बिहारी” है। हां हम “बिहारी” है।।

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बिहार दिवस सिर्फ बिहार के लिए नही अपितु पुरे देश के हर्ष का दिन है ।? उस हर बिहारी को सलाम जो मजदूर हो सकता है पर मजबूर नहीं हो सकता ? देश की हर इमारत को बनाने में किसी बिहारी का खून पसीना जरूर लगता है

#BiharDiwas

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सीधी-सादी बोली अपनी, सीधे-सादे लोग,

लालच, झूठ और मक्कारी के हमको नहीं हैं रोग|

अपने अंदर जिन्दा रक्खा है हमने इंसान,

हम हैं बिहारी, सारे जग में हम भारत की शान,

मेहनत अपना दीन धरम है, मेहनत है ईमान||

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पीछे का इतिहास देख लो, आगे की तैयारी हूँ।

हाँ, मैं बिहारी हूँ।

दिवस की शुभकामनाएँ।

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कल्पना चावला की जीवनी | Kalpana Chawla Biography In Hindi

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दोस्तों मै आज आपको एक ऐसी भारतीय महिला के बारे में बताने जा रहा हूँ  जिसका मानना था की वो अंतरिक्ष के लिए ही बनी है | उसने न सिर्फ इस बात को सच कर दिखाया बल्कि अंतरिक्ष की दुनिया में इतनी उपलब्धिया हासिल की वो आज तमाम छात्र छात्राओं की आदर्श बन गयी है | जी हाँ हम बात कर रहे है अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय महिला  कल्पना चावला के बारे में | भले ही 1 फरवरी 2003 को कोलंबिया स्पेस शटल के दुर्घटनाग्रस्त होने के साथ कल्‍पना की उड़ान रुक गई लेकिन आज भी वह दुनिया के लिए एक मिसाल हैं |

कल्पना चावला जीवन परिचय  – Kalpana Chawla Biography In Hindi

कल्पना चावला का जन्म करनाल पंजाब में 17 मार्च 1962 को हुआ था जो अभी हरियाणा का हिस्सा है | कल्पना चावला अपने परिवार में 4 भाई बहनों में से सबसे छोटी थी | कल्पना चावला के पिता का नाम श्री बनारसी लाल चावला और माता का नाम संजयोती देवी था | उसके पिता उसे एक डॉक्टर या अध्यापक बनाना चाहते थे किंतु कल्पना चावला शुरू से ही अंतरिक्ष में घूमने की कल्पना करती थी | Kalpana Chawla बचपन में ही कल्पना भरी बातें किया करती थी. हमेशा आकाश और उनकी ऊचाइयों ले बारे में सोचती रहती थी और अपने पापा से चाँद-तारों और विमानों के बारे में बात किया करती थी |

प्रारंभिक शिक्षा 

कल्पना चावला ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा टैगोर बाल निकेतन सीनियर सेकेंडरी स्कूल करनाल  से की थी . अपने सपने को साकार करने के लिए कल्पना चावला ने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज चंडीगढ़ में ‘एरोनौटिकल इंजीनियरिंग’ पढने के लिए ‘बी.इ.’ में दाखिला लिया और सन 1982 में ‘एरोनौटिकल इंजीनियरिंग’ की डिग्री भी हासिल कर ली। इसके पश्चात कल्पना अमेरिका चली गयीं और सन 1982 में ‘टेक्सास विश्वविद्यालय’ में ‘एयरोस्पेस इंजीनियरिंग’ में स्नातकोत्तर करने के लिए दाखिला लिया। उन्होंने इस कोर्स को सन 1984 में सफलता पूर्वक पूरा किया। उनके अन्तरिक्ष यात्री बनने की इच्छा इतनी प्रबल थी कि उन्होंने सन 1986 में ‘एयरोस्पेस इंजीनियरिंग’ में दूसरा स्नातकोत्तर भी किया और उसके बाद कोलराडो विश्वविद्यालय से सन 1988 में ‘एयरोस्पेस इंजीनियरिंग’ विषय में पी.एच.डी. भी पूरा किया।

कल्पना चावला करियर

Kalpana Chawla को 1988 में NASA एम्स अनुसंधान केंद्र के लिए ओवेर्सेट मेथड्स इंक के उपाध्यक्ष के रूप में शामिल कर लिया गया, कल्पना ने NASA में रहकर अपने जीवन में बहुत सारे रिसर्च भी किए. कल्पना चावला की लगन और मेहनत को देखते हुए बाद में उन्हें अंतरिक्ष मिशन की Top 15 की टीम में शामिल कर लिया गया और देखते ही देखते उन 6 लोगो की टीम भी Kalpana Chawla का नाम शामिल हो गया, जिनको अंतरिक्ष में भेजा जाना था. इसी तरह कल्पना चावला के सपनों को अब पँख लग चुके थे.

The STS-107 crew includes, from the left, Mission Specialist David Brown, Commander Rick Husband, Mission Specialists Laurel Clark, Kalpana Chawla and Michael Anderson, Pilot William McCool and Payload Specialist Ilan Ramon. (NASA photo)

 

 

Kalpana Chawla का पहला अंतरिक्ष मिशन

अप्रैल 1991 में वे एक देशियकृत संयुक्त राज्य अमेरिका की नागरिक बनी। कल्पना जी मार्च 1995 में नासा के अन्तरिक्ष यात्री कोर में शामिल हुई और उन्हें 1996 में अपनी पहली उडान के लिए चुना गया था। उनका पहला अन्तरिक्ष मिशन 19 नवम्बर 1997 को छह-अन्तरिक्ष यात्री दल के हिस्से के रूप में अन्तरिक्ष शटल कोलंबिया की उडान एसटीएस-87 से शुरू हुआ। कल्पना जी अन्तरिक्ष में उड़ने वाली प्रथम भारत में जन्मी महिला थी और अन्तरिक्ष में उड़ने वाली भारतीय मूल की दूसरी व्यक्ति थी। राकेश शर्मा ने 1984 में सोवियत (Soyuz T-11) अन्तरिक्ष यान में उडान भरी थी। कल्पना जी ने अपने पहले मिशन में अन्तरिक्ष में 360 से अधिक घंटे बिताए। कल्पना जी ने अपने पहले मिशन में 10.67 मिलियन किलोमीटर का सफ़र तय कर के, पृथ्वी की 252 परिक्रमाये की।

अन्तरिक्ष के सफ़ेद आसमान की यात्रा करते समय ये शब्द उन्होंने कहे थे। “आप ये आप ही की बुद्धि का परिणाम हो”। 

Kalpana Chawla का दूसरा अंतरिक्ष मिशन 

सन 2002 में कल्पना को उनके दूसरे अंतरिक्ष उड़ान के लिए चुना गया। उन्हें कोलंबिया अंतरिक्ष यान के एसटीएस-107 उड़ान के दल में शामिल किया गया। कुछ तकनीकी और अन्य कारणों से यह अभियान लगातार पीछे सरकता रहा और अंततः 16 जनवरी 2003 को कल्पना ने कोलंबिया पर चढ़ कर एसटीएस-107 मिशन का आरंभ किया। यह 16 दिन का मिशन था. इस मिशन पर Kalpana Chawla ने अपनी टीम के सभी साथियों के साथ मिलकर 80 परीक्षण प्रयोग किए. लेकिन फिर वह हुआ जिसे सोचकर सबकी आँखे भर आती है.

हाथों में फूल और गुलदस्ते लिए स्वागत के लिए खड़े विज्ञानिक और अंतरिक्ष प्रेमी सहित पूरा विश्व उस दुर्घटना को देखकर शौक में डूब गया. अंतरिक्ष को धरती पर उतरने में महज 16 मिनट रह गए थे, तभी अचानक स्टल ब्लास्ट हो गया और कल्पना चावला के साथ सभी अंतरिक्ष यात्री मारे गए.

 

कल्पना चावला मृत्यु – Kalpana Chawla Death 

1 फ़रवरी  2003 को कोलंबिया अंतरिक्षयान पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते ही टूटकर बिखर गया। देखते ही देखते अन्तरिक्ष यान और उसमे सवार सातो यात्रियों के अवशेष टेक्सास नमक शहर पर बरसने लगे और सफल कहलाया जाने वाला अभियान भीषण सत्य बन गया।

पहले ही तय थी कल्पना चावला की मौत

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कोलंबिया स्पेस शटल के उड़ान भरते ही पता चल गया था कि ये सुरक्षित जमीन पर नहीं उतरेगा, तय हो गया था कि सातों अंतरिक्ष यात्री मौत के मुंह में ही समाएंगे. फिर भी उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी गई. बात हैरान करने वाली है, लेकिन यही सच है.

इसका खुलासा मिशन कोलंबिया के प्रोग्राम मैनेजर ने किया था. यात्रा के हर पल मौते के साये में स्पेस वॉक करती रहीं कल्पना चावला और उनके 6 साथी. उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगने दी गई कि वो सुरक्षित धरती पर नहीं आ सकते. वो जी जान से अपने मिशन में लगे रहे, वो पल-पल की जानकारी नासा को भेजते रहे लेकिन बदले में नासा ने उन्हें पता तक नहीं लगने दिया कि वो धरती को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर जा चुके हैं, उनके शरीर के टुकड़ों को ही लौटना बाकी है.

लडकियों की आदर्श – Kalpana Chawla

कल्पना चावला भले ही हमारे बिच नहीं है पर  आज के भी वो बहुत सारी लडकियों की आदर्श है। आज की लडकियों को ये सोचना चाहिये की जब कल्पना चावला एक माध्यम वर्गीय परिवार से होने के बावजूद अंतरिक्ष में जा सकती है   तो वो क्यू नहीं? जिस समय भारत का तंत्रज्ञान ज्यादा मजबूत नहीं था, जिस समय लोगो को अन्तरिक्ष की समझ भी नहीं थी उस समय कल्पना चावला ने अन्तरिक्ष में जाके पुरे विश्व जगत में भारत का परचम लहराया।

पुरस्कार – Kalpana Chawla Award :

मरणोपरांत
1) कांग्रेशनल अंतरिक्ष पदक के सम्मान।
2) नासा अन्तरिक्ष उडान पदक।
3) नासा विशिष्ट सेवा पदक।

जानिए धरती पर बसे हसीन ख्वाबो के शहर पेरिस (CITY OF LIGHT) के बारे में 10 महत्वपूर्ण तथ्य

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हरेक प्रेमी जोडा चाहता है कि जिंदगी में एक बार वह एफिल टावर के नीचे कुछ खुशगवार पल बताएं | एक ऐसा शहर जो पूरी दुनिया के कला प्रेमियों को रोमांचित करता है | जहां आकर दुनिया का हरेक कलाकार खुद को पूरा महसूस करता है |पेरिस न सिर्फ फ्रांस देश की राजधानी है बल्कि कला, फैशन और संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र भी है। पेरिस  सैलानियों के लिए किसी सपने जैसी है. हर साल डेढ़ करोड़ से भी अधिक लोग प्रेम की नगरी पेरिस को देखने पहुंचते हैं |  पिछले साल 2017 में 2 करोड़ 30 लाख लोगों ने पेरिस की यात्रा की थी, जिसके कारण यह शहर  पर्यटन के मामले में दुनिया में नंबर 1 शहर बन गया है । 105 वर्गकिलोमीटर में फैले इस शहर की आबादी लगभग 22 लाख है, जो इसे फ्रांस का सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर बनाती है। पेरिस को “The City of Lights” के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि ये हमेशा से ही ज्ञान-विज्ञान का एक प्रमुख केंद्र रहा है।

पेरिस शहर से जुड़े रोचक तथ्य – Amazing Facts of Paris in Hindi

1 – एफिल टॉवर

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पेरिस अगर सबसे ज्यादा किसी चीज के लिए मशहूर है तो वो है एफिल टॉवर (Eiffel Tower) | एफिल टॉवर का वजन तकरीबन 7000 टन का है और इस पर हर साल होने वाले पेंट का वजन 50 टन होता है | इसका ऊपरी छोर लगभग 324 मीटर की ऊँचाई पर है। इसका निर्माण 1887-89 में हुआ था और ये 1930 तक दुनिया का सबसे ऊँचा निर्माण रहा।

2 – कला का शहर

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पेरिस में 200 से ज्यादा संग्रहालय है. 1793 में खुला म्यूजे दु लूव्र दुनिया के कुछ सबसे खास संग्रहालयों में से एक है. यहां कला के 35 हजार से ज्यादा नमूने रखे गए हैं. यहीं लियोनार्डो द विंची की विश्व प्रसिद्ध पेंटिंग मोना लिसा भी मौजूद है. यह  दुनिया का सबसे ज्यादा visit किया जाने वाला संग्रहालय है।  हर साल लगभग 1 करोड़ लोग इसे देखने के लिए आते हैं।

3 – बच्चो से ज्यादा कुत्तो की संख्या 

पेरिस एक  ऐसा शहर है जिसमें बच्‍चों की संख्‍या से ज्‍यादा कुत्‍तों की संख्‍या है | पेरिस के निवासी कुत्तों को बहुत पसंद करते हैं। एक अनुमान के अनुसार यहां के लोगों के पास लगभग 5 लाख कुत्ते हैं, जो जहां बच्चों की आबादी से भी ज्यादा है। लोगों को अपने कुत्ते रेस्टोरेंट में ले जाने की अनुमति भी होती है।

4 – प्रेम की नगरी

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पेरिस के उत्तर में 130 मीटर ऊंची मोंमार्त्र पहाड़ी पर प्रेम की दीवार है. 40 वर्ग मीटर की इस दीवार पर कलाकारों ने 612 टाइल्स पर 300 भाषाओं में ‘आई लव यू’ लिखा है.

5 – खाने के शौकीन

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फ्रांस निवासी खानपान के बेहद शौकीन हैं. फ्रांसीसी खाने का मजा लेना है तो पेरिस को नहीं भूला जा सकता| छोटे बड़े सभी तरह के रेस्तरां मेहमानों का खूब ख्याल रखते हैं और लज्जत से भर देते हैं| यहां बने ज्‍यादातर रेस्‍टोरेंट और बार खुले में बने हैं, इनकी संख्‍या 9057 है | एस्‍प्रेसो और स्‍ट्राॅन्ग ब्‍लैक कॉफी फ्रांस में मशहूर है. पेरिस में 181 जगहों पर आप इस कॉफी का लुत्‍फ उठा सकते हैं | हर साल बेस्ट बेकर (रोटी बनाने वाला) चुनने के लिए यहां प्रतियोगिता आयोजित की जाती है, और जो प्रतियोगिता जीत जाता है, उसे राष्ट्रपति के लिए खाना बनाने का मौका मिलता है।

6 – शूटिंग और फैशन का शहर

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फिल्मों की शूटिंग पेरिस में बड़े पैमानें पर होती है। गार्डन, म्यूजियम और स्विमिंग पूल के सिवाए, हर जगह शूटिंग करनी फ्री है। जर्मन अभिनेत्री रोमी श्नाइडर कहती हैं, “पेरिस में मैंने जीना, प्यार करना, एक जगह से दूसरी जगह जाना और खासकर तैयार होना सीखा.” | पेरिस में 1803 स्मारक और 173 म्यूजियम हैं। इसके सिवाए 1200 एकड़ में फैले पार्क और गार्डन भी हैं।

 7 – दार्शनिकों का शहर

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सोचना, बहस करना और दुनिया में नएपन की पहल के लिए पेरिस का साँ जर्मेन दे प्रे का कैफे दे फ्लॉ कलाकारों के बीच हमेशा से मशहूर रहा है. 1930 में कला वर्ग से जुड़े असामान्य जीवनशैली वाले बोहेमियन लोग देर रात यहां विभिन्न मुद्दों पर चर्चा के लिए इकट्ठा हुआ करते थे.

8 – अपनी मातृभाषा से प्यार 

अगर आप पेरिस में किसी से अंग्रेज़ी में कुछ पूछते हैं, तो तब चौंकिएगा मत, जब आपको उत्तर फ्रेंच भाषा में मिले। ऐसा इसलिए क्योंकि यहां के लोग अपनी भाषा से बहुत प्यार करते हैं, और अंग्रेज़ी बोलना पसंद नहीं करते।

9 – शहर की खूबसूरती

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सेन नदी के किनारे 1991 से यूनेस्को की विश्व धरोहरों की सूची में शामिल हैं. दक्षिणी और उत्तरी किनारों को शहर के 37 पुल जोड़ते हैं. टूरिज्‍म की बात करें तो यह दुनिया की सबसे पसंदीदा जगहों में से एक है.  पतझड़ पेरिस की यात्रा करने का सबसे अच्छा सीज़न माना जाता है, क्योंकि इस समय शहर अधिक शांत और सुंदर होता है। इसके सिवाए कई museums, galleries और घूमने वाली जगहों पर भी entry fees नही लगती। पतझड़ की ऋतु 23 सितंबर से 22 दिसंबर तक मानी जाती है। यहां की मशहूर जगहों में एफिल टावर, नोटर डेम, डिजनीलैंड जैसी जगह हैं |  अगर आप चलकर पेरिस के उत्तर से दक्षिण तक की यात्रा करते हैं, तो आपको 2 घंटे 15 मिनट का समय लगेगा।

 10 – प्रदुषण 

शहर की सरकार ने समय-समय पर वाहनों की वजह से बढ़ते हुए प्रदूषण को कंट्रोल करने के लिए यहां कई बार वही नियम लागू किया था, जो दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने किया था। यानि कि odd day, odd number वाली cars चलेंगी और even day को even number वाली। पेरिस में साइकिलों की गिणती दिन-ब-दिन बढ़ रही है, जो कि यहां के पर्यावरण के लिए काफी अच्छा साबित हो सकता है। शहर में साइकिल चलाने के लिए लगभग 500 किलोमीटर के बराबर लंबी लेने हैं।

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पढ़िए मौत सामने होते हुए भी बदमाशो के चंगुल से छूटने वाली वीरता पुरस्कार से सम्मानित लक्ष्मी की कहानी

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दोस्तों आज हम एक ऐसी साहसिक लड़की के बारे में बताने जा रहे है जिसे टीवी नामक बीमारी होते हुए भी तिन बदमाशो के सामने घुटने नहीं टेके | उसके सामने मौत या बलात्कार का खौफ होते हुए भी वो बदमाशो के चंगुल से न सिर्फ भाग पाने में कामयाब हुयी बल्कि उनलोगों को सलाखों के पीछे भी पहुचाया | जानिए छत्तीसगढ़ के रायपुर की रहने वाली लक्ष्मी की कहानी ………

दो साल पहले की बात है। छत्तीसगढ़ के रायपुर की रहने वाली लक्ष्मी पढ़-लिखकर पुलिस अफसर बनना चाहती थीं, पर बीमारी ने उनके हौसले पस्त कर दिए। सबने सोचा सामान्य सी खांसी है ,घरेलु उपचार से ठीक हो जाएगी | पर  कई हफ्ते बीत गए पर रानी की खांसी ठीक नहीं हुयी । उन्हें भूख भी कम लगती थी और  वजन भी कम हो गया था । तब परिवार वालो को उनकी तबियत को लेकर चिंता हुयी ।

15 साल की उम्र में हुआ टीवी

वे उसे लेकर डॉक्टर के पास गए। डॉक्टर ने बलगम जांच कराने की सलाह दी। रिपोर्ट आई, तो मां घबरा गईं। डॉक्टर ने बताया, आपकी बेटी को टीबी है। पर उन्होंने समझाया कि यह लाइलाज बीमारी नहीं है। इसका इलाज संभव है, थोडा वक्त लगेगा  पर लक्ष्मी बिल्कुल ठीक हो जाएगी। मजदूरी कर घर चलाने वाले माता-पिता बेटी के इलाज के लिए हर कष्ट सहने को तैयार थे। उनका इलाज शुरू हुआ। तबियत में सुधार होने लगा, पर कमजोरी बहुत थी।

एक खौफनाक हादसे ने जिंदगी बदल दी 

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था | तभी  लक्ष्मी की  जिंदगी में एक खौफनाक वाकया हुआ। एक ऐसी घटना, जिसने उनकी जिंदगी को बदल दीया । बात है  2 अगस्त 2016 की । लक्ष्मी घर का कुछ सामान लेने पास के गणेश नगर बाजार गईं। रास्ते में एक दोस्त मिल गया। लक्ष्मी  सड़क किनारे खड़े होकर उससे बात करने लगीं। अचानक तीन युवक वहां आए। तीनों ने उन्हें घेर लिया और बदसलूकी करने लगे। वे उस इलाके के छंटे हुए बदमाश थे।

रानी का किया अपहरण 

विरोध करने पर और उग्र हो गए। तीनों ने उनके दोस्त को पीटकर भगा दिया और लक्ष्मी को जबरन अपनी बाइक पर बैठा लिया। वह चिल्लाती रहीं, पर उसकी  मदद करने कोई  नहीं आया। लक्ष्मी रो-रोकर मदद की गुहार करती रही | उनसे छोड़ने की गुहार  करती रहीं कि घरवाले मेरा इंतजार कर रहे होंगे मुझे छोड़ दो । इस पर बदमाशों ने कहा, चिंता मत करो, हम तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देंगे। लेकिन रास्ते में उन्होंने बाइक की रफ्तार बढ़ा दी। जब तीनों सूने इलाके की ओर बढ़ने लगे, तो लक्ष्मी को यकीन हो गया कि उनका अपहरण हो गया है। अब वह समझ चुकी थीं कि डरने या चिल्लाने से कुछ नहीं होगा। वह बचाव के रास्ते सोचने लगीं। इस बीच उनके घर खबर पहुंच चुकी थी कि आपकी बेटी को बदमाश उठा ले गए हैं।

खौफ के बावजूद हिम्मत नहीं हारी  

उन बदमाशो ने रानी को एक खंडहर में ले गए। चारों तरफ सन्नाटा था। अंधेरा हो चुका था। खौफ के मारे लक्ष्मी का दिल कांप रहा था। लेकिन रानी ने  हिम्मत नहीं हारी। सोचा विरोध करने से कुछ नहीं होगा।यहाँ मेरी सहायता करने वाला कोई नहीं आने वाला मुझे खुद ही कुछ उपाय करना होगा | चूंकि तीनों बदमाश उसी इलाके से थे, इसलिए लक्ष्मी उनसे दोस्ताना अंदाज में बातें करने लगीं। उनका बर्ताव ऐसा था, मानों उन्हें उस खंडहर में लड़कों के संग वक्त बिताने में कोई आपत्ति नहीं है। इस वजह से बदमाश कुछ देर के लिए भ्रमित हो गए। मन मे था, पर लक्ष्मी ने इसे जाहिर नहीं होने दिया। उनका व्यवहार सामान्य था, मगर दिमाग में लगातार यही चल रहा था किस तरह वहां से भागा जाए। इस बीच उनकी नजर बदमाशों की बाइक पर पड़ी। उन्होंने देखा कि बाइक पर चाभी लगी हुई है। लक्ष्मी ने झट से चाभी निकालकर दूर फेंक दी। उनमें से एक युवक ने शराब पी रखी थी। उसके इरादे ठीक नहीं थे। जैसे ही उसने लक्ष्मी की ओर बढ़ने की कोशिश, वह उसे धक्का देकर भागने लगीं। नशे की वजह से वह लड़का उठ नहीं पाया, बाकी दो बदमाशों ने उनका पीछा किया, पर वह उन्हें पीछे छोड़ते हुए खंडहर से भागने में कामयाब रहीं। लक्ष्मी कहती हैं- उन दिनों मैं बीमार थी। कमजोरी महसूस हो रही थी। पर मैं भागती रही। वहां रुकने का मतलब था मौत या बलात्कार!

बीमारी के बावजूद रानी उनके चंगुल से भाग निकली 

जब बदमाश उन्हें पैदल दौड़कर पकड़ नहीं पाए, तो अपनी बाइक की ओर लपके। लेकिन उसकी चाभी तो पहले ही लक्ष्मी ने कहीं  फेंक दी थी। खंडहर से बाहर आने के बाद सड़क तक पहुंचने में कुछ समय लगा। रास्ते में राहगीरों ने एक बदहवास लड़की को भागते हुए देखा, पर किसी ने मदद नहीं की। तभी सड़क पार सामने पुलिस स्टेशन दिखा। वह भागकर वहां पहुंचीं और पूरी कहानी सुनाई। पुलिस वाले 16 साल की लड़की का हौसला देखकर दंग थे। लक्ष्मी ने उनसे कहा- सर, वे लड़के वहीं होंगे। मैंने उनके बाइक की चाभी निकाल ली थी। बिना बाइक के वे दूर नहीं भाग पाएंगे। ये सुनते ही पुलिस वाले उन्हें साथ लेकर चल पड़े खंडहर की ओर। तीनों लड़कों को पकड़ लिया गया।

लक्ष्मी कहती हैं-

वे तीन अपराधी थे। पता नहीं, कहां से मेरे पास इतनी हिम्मत आ गई? मुझे खुद नहीं पता कि मैंने किस तरह उनका मुकाबला किया? 

मिला वीरता पुरस्कार 

अगले दिन अखबारों में लक्ष्मी के साहस की कहानी छपी। पूरे शक्तिपुर में उनकी तारीफ होने लगी। छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें वीरता के लिए सम्मानित किया। लक्ष्मी कहती हैं- लड़कियों को बहादुर बनना चाहिए, तभी वे अपनी रक्षा कर पाएंगी। मैं पुलिस अफसर बनना चाहती हूं, ताकि गुंडों को सबक सिखा सकूं। केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस के मौके पर लक्ष्मी यादव समेत देश के 18 बच्चों को वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया। इसी के कारण उन्हें राष्ट्रपति रामनाथ र्कोंवद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने का मौका मिला।

लक्ष्मी कहती हैं- कभी नहीं सोचा था कि मुझे दिल्ली में सम्मानित किया जाएगा। मैं देश की बेटियों से कहना चाहती हूं, चाहे जितनी मुश्किल आए, डरना मत। 

सेल्फी विथ सेनेटरी पैड

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कुछ लोगो को लगता है कि मासिक धर्म , सेनेटरी पैड को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने से देश में प्रगतिशीलता के बड़े बड़े झंडे गाड़े जा सकते है । सेनेटरी पैड के साथ सेल्फी खिंचवाने से देश में क्रांति आ जायेगी । आधुनिक लड़कियों के हिसाब से वो हर चीज से आजादी चाहती है। उनका यह मानना है कि जब तक लडकिया कम कपडे पहनकर नहीं घूमेंगी वो गुलाम ही मानी जायेगी । जो लडकिया जितनी ही कम कपड़े पहनकर घूमेगी वो उतनी ही आजाद मानी जायेगी ।

कुछ लोगो ने आधुनिकता के नाम पर पाश्चात्य सभ्यता संस्कृति को अपनाना शुरू कर दिया है जहाँ पर बलात्कार एक आम बात है । आधुनिकता का मतलब अपनी सोच में अपने रहन सहन में बदलाव लाना है न की अपने कपड़ो में । कम कपडे पहनने से कोई मॉडर्न नहीं बन जाता ।

महिलाये पुरुषों से किसी मामले में कम नहीं है । लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि परिवार वाले अगर आपको कुछ सलाह सलाह दे रहे है तो वो आपकी आजादी पर खतरा हो गया । इस देश को आगे ले जाना है तो पुरुषों और महिलाओं का एक दूसरे का सम्मान करना होगा । मुझे नही लगता कि हाथ में सेनेटरी पैड लेकर सेल्फी खिंचवाने से कोई सम्मान आएगा ।

सोशल मीडिया पर एक कैम्पेन चला है सेनेटरी पैड को टैक्स फ्री करने के लिए । अच्छा कैम्पेन है लेकिन केवल भावनाओ में बहकर कैम्पेन का हिस्सा नहीं बनना चाहिए बल्कि उसके दूरगामी प्रभाव के बारे में भी सोचना चाहिए । खुद अरुण जेटली के अनुसार अगर सेनेटरी पैड्स को टैक्स फ्री कर दिया गया तो भारतीय बाजारों से इंडियन सेनेटरी पैड्स गायब हो जायेगी और उसकी जगह चायनीज़ पैड्स का कब्ज़ा हो जायेगा ।

यह पोस्ट सारी पैडधारी सेल्फी खिंचवाने वाली महिलाओं को समर्पित

#पुरुषवादी_पोस्ट