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Thursday, March 19, 2026
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यह साधारण कामवाली बाई कैसे बन गई एक मशहूर लेखिका !

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कहते है की जब तक आपके अन्दर हिम्मत और आत्मविश्वास नहीं है तभी तक आप कमजोर है . जिस दिन आपके अन्दर मेहनत करने की हिम्मत और आत्मविश्वास आ जायेगा उस दिन आपको आसमान में उड़ने से कोई नहीं रोक सकता है . हम आज ऐसी ही एक महिला की कहानी बताने जा रहे है जो आपको अन्दर तक हिलाकर रख देगी . कभी नरक से भी बदतर जिंदगी जीने वाली मामूली-सी नौकरानी बेबी हालदार कैसे लेखिका बन गई ,यह बेहद प्रेरणादायक और संघर्षपूर्ण दास्तान है। पढ़िए अंगारों पर चलते हुए अपने कहानी के द्वारा बेबी हालदार ने लाखो लोगो के दिलो में जगह कैसे बनायीं .

Baby Haldar Biography in hindi – बेबी हालदार का जीवन परिचय

बचपन

बेबी हालदार का जन्म 1973 में कश्मीर में हुआ था . उनके पिता नरेन्द्रनाथ मुर्शिदाबाद में छोड़कर नौकरी करने चले गए . शुरू में बेबी के पिता घर खर्च के लिए पैसे समय पर भेज देते थे लेकिन कुछ समय बाद कई कई महीने तक पैसे नहीं आते थे . जिससे उनके इनलोगों को आर्थिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा . लेकिन इन सारे कष्टों के बाद भी बेबी की माँ ने बच्चों को पढाना लिखाना जारी रखा . रिटायर होने के बाद नरेन्द्रनाथ कई कई दिनों तक घर से गायब रहते थे जिसको लेकर घर में अक्सर झगडा हुआ करता था .

माँ उनको अकेला छोड़कर चली गयी

एक दिन बेबी के पिता कहीं गए और उसके कुछ दिन बाद उनकी मां इतनी दुखी हुयी की गोद में छोटे बेटे को लेकर यह कह कर चली गई कि बाज़ार जा रही हैं. इसके बाद उनकी मां घर नहीं लौटीं. लेकिन तमाम कठिनाइयों के बावजूद बेबी ने स्कूल जाना नहीं छोड़ा। कभी-कभी तो बिना कुछ खाए स्कूल जाना पड़ता। एक दिन सहेली के सामने उसके मुंह से निकल गया कि खाने के लिए कुछ नहीं है। नरेंद्रनाथ ने यह बात सुन ली। बेबी जब स्कूल से लौटी तो उन्होंने उसे इतना मारा कि तीन दिन वह उठ नहीं सकी और कई दिन स्कूल नहीं जा सकी।

उनके पिता ने की तीसरी शादी


नरेंद्रनाथ ने दूसरा विवाह कर लिया। दूसरी मां उनकी कोई बात नहीं सुनती, समय पर खाना नहीं देती, बिना कारण बच्चों को पिटवाती।नरेंद्रनाथ को दुर्गापुर में एक फैक्टरी में नौकरी मिल गई। वहां उन्होंने तीसरी शादी कर ली। वह दूसरी बीवी से झूठ बोलकर बच्चों को साथ ले गए। दुर्गापुर जाने के बाद नरेंद्रनाथ ने बच्चों की पढ़ाई शुरू नहीं करवाई। लेकिन बेबी में पढऩे की इच्छा देखकर उन्होंने कुछ दिन बाद उसे पढऩे के लिए जेठा (ताऊ) के पास भेज दिया। बेबी को ताऊ पास जाने के कारण उनकी तीसरी माँ को घर के कामकाज में दिक्कत लगी और उसने बेबी की पढाई छुड़ाकर घर पर बुला लिया .

तीसरी माँ उनको देती थी दुःख

पढाई बंद होने के कारण बेबी को इतनी चिंता हुयी को वो बीमार पड़ गयी और उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा . अस्पताल में एक दिन वह सवेरे सोकर उठी तो उसने देखा कि उसका बिस्तर रक्त से लाल हो गया है। वह भय से रोने लगी। उसका रोना सुनकर नर्स आई तो वो समझ गयी की यह खून देखकर रो रही है . उसने बेबी को समझाया की लड़की जब बड़ी हो जाती है तो उसके साथ ऐसा ही होता है . इस घटना के बाद नरेन्द्रनाथ का बेबी के प्रति व्यवहार बदल गया . अब उन्होंने बेबी को डांटना बंद कर दिया . ये देखकर बेबी की तीसरी माँ को जलन होने लगी और उसने अपने पति और बेबी से किसी न किसी बात को लेकर झगडा करने लगी . जिससे सारा घर अशांत रहने लगा .

12 साल के उम्र में कर दी गयी शादी

तीसरी माँ के ही इशारे पर बेबी के पिता ने उनकी शादी 12 साल की उम्र में ही उनसे दुगने उम्र के एक क्रूर आदमी से कर दी . दुल्हन बनते समय हालदार ने अपनी सहेली से कहा था –

‘ चलो, अच्छा हुआ, मेरी शादी हो रही है। अब कम से कम पेट भरकर खाना तो मिलेगा।’ लेकिन उनका यह सोचना भी कितना दुर्भाग्यपूर्ण रहा था। 

शादी के बाद हुआ वैवाहिक रेप

शादी की रात पति ने उनके साथ रेप किया।  चौदह वर्ष से भी कम उम्र में बेबी गर्भवती हो गई। बेबी के पेट में दर्द उठना शुरू हो गया। छह दिन पूरे होने के बाद भी जब कुछ नहीं हुआ तो उसे अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। सभी लोग उसे अकेला छोड़कर वापस आ गए।बेबी अकेली पड़ी-पड़ी दर्द से रोने-चिल्लाने लगी। इससे आसपास के रोगियों को असुविधा होने लगी तो उसे दूसरे कमरे में ले जाकर एक टेबिल पर लिटा दिया गया और उसके हाथ-पैर बांध दिए गए।

14 से भी कम उम्र में बनी माँ

अचानक उसके पेट में इतने जोर से दर्द उठा कि पागल सी हो गई। नर्स दौड़कर डॉक्टर को बुला लायी। डॉक्टर ने बेबी के पेट को बेल्ट से बांध दिया और फिर पेट में कुछ टटोलने के बाद बताया कि बच्चा उलट गया है। नर्स एक और डॉक्टर को बुला लायी। दर्द के मारे बेबी इतनी जोर से हाथ-पैर झटक रही थी कि सब बंधन खुल गए। चारों लोगों ने मिलकर उसे फिर बांध दिया। डॉक्टर ने बच्चे को सर से पकड़कर बाहर निकाल दिया। बेबी का रोना-चिल्लाना बंद हो गया और वह बिलकुल शांत हो गई। अगले दिन उसका पति उसे घर ले आया।

कुत्ते बिल्ली की तरह जिंदगी

एक दिन बेबी को पता चला कि उसकी दीदी नहीं रही। दीदी को जीजा ने गला घोंट कर मार डाला था। वह अपनी दीदी को देखने जाना चाहती थी। लेकिन पति ने उसे नहीं जाने दिया। उसे लगा- वह एक आदमी की बंदिनी है इसलिए नहीं जा पायी। वह जो कहे वही उसे सुनना होगा, जो कहे वही करना होगा, लेकिन क्यों? जीवन तो उसका है, न कि पति का। फिर उसे पति के कहे अनुसार सिर्फ इसलिए चलना होगा कि वह पति के पास है? कि वह मुट्ठी भर भात देता है। पति उसे जिस तरह रखता है, उस तरह तो कुत्ते-बिल्ली को रखा जाता है। जब वहां उसे सुख-शांति नहीं मिलती तो क्या जरूरी है कि वह पति के पास रहे?

पति ने पत्थर मरकर सर फोड़ा

एक दिन पति ने गांव के किसी आदमी से बात करते देखकर उनके सिर पर पत्थर मारकर लहूलुहान कर दिया।  वह बच्चे को गोद में उठाकर घर आ गई। उसने अपने पति से पूछा कि उसकी क्या गलती थी, जो उसे इस तरह मारा? इतना सुनते ही उसके पति ने एक मोटा बांस उठाया और उसके पीछे दे मारा। इसके कुछ देर बाद ही बेबी के पेट में भयंकर दर्द होने लगा। दर्द इतना ज्यादा हो रहा था की दर्द के मारे वह न उठ सकती थी, न कुछ खा सकती थी और न ही सो सकती थी। रात को भी वह चीखती-चिल्लाती रही लेकिन उसका पति आराम से सोता रहा।

पति की मार से पेट का बच्चा गिरा

तब बेबी अपने बच्चे को साथ ले, अपना पेट पकड़े, मां-रे, बाबा-रे चिल्लाती हुई सामने रहने वाले महादेव के पास गई। बेबी ने महादेव को भेजकर अपने घर से भाई को बुलवाया। बेबी का बड़ा भाई उसे ठेले में लादकर अपने साथ ले गया। उस समय रात के करीब दो बज रहे थे। पति की मार से पेट का बच्चा गिर गया।

पति से तंग आकर घर छोड़ा

लगभग रोजाना ही उम्रदराज पति की गालियां सुनते सुनते और उसके हाथों पिटते रहने के कारण बेबी की जिंदगी नर्क हो चली थी । इस तरह बर्दाश्त कर गुजर-बसर करते उनके ससुराल में ढाई दशक बीत गए। आखिरकार, वर्ष 1999 में एक दिन वह अपनी अज्ञात मंजिल की तरफ निकल ही पड़ीं। तीनो बच्चों को साथ लेकर वह रेलवे स्टेशन पहुंचीं और एक ट्रेन के शौचालय में बैठे-बैठे दिल्ली, फिर वहां से गुड़गांव पहुंच गईं। गुड़गांव में उनका कोई भी परिचित नहीं। अपना और बच्चों का पेट पालने के लिए वो बाई का कम करने के लिए हर दरवाजे की कुंडिया खटकाने लगी . लेकिन जब लोगो को पता चलता की वह पति का घर छोड़कर आई है तो किसी ने उसे काम नहीं दिया .

जीवन को मिली नयी दिशा

एक दिन उन्होंने उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के प्रौत्र एवं रिटायर्ड प्रोफेसर प्रबोध कुमार के दरवाजे पर दस्तक दी। यही वो दस्तक थी, जिसने उनके जीवन की दिशा मोड़ दी। यहां से वह उस मंजिल की तरफ कूच करने वाली थी, जिसके बारे में उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था .

प्रबोध कुमार ने उसके अन्दर छुपे दर्द को पहचाना

एक दिन डस्टिंग करते समय वह कोई किताब उलट-पलट रही थी, तभी गृहस्वामी प्रबोध कुमार आ गए। उन्होंने उसे किताबें उलटते-पलटते देखा, लेकिन कहा कुछ नहीं। अगले दिन वह चाय लेकर आई तो प्रबोध कुमार ने पूछा, ”तुम कुछ लिखना-पढऩा जानती हो?”
बेबी ऊपरी हंसी हंसकर जाने लगी तो उन्होंने फिर पूछा, ”बिलकुल भी नहीं जानतीं?”
बेबी ने बोला – ”छठी तक।” अगले दिन प्रबोध कुमार ने पूछा, ” तुमने स्कूल में जो किताबें पढ़ीं, उनमें किन लेखकों व कवियों को पढ़ा? कुछ याद है?”
बेबी ने झट से कहा, ”हां, कई तो हैं। जैसे- रवींद्रनाथ ठाकुर, काजी नजरुल इस्लाम, शरतचंद्र, सत्येंद्रनाथ दत्त, सुकुमार राय।”

बेबी को अपनी कहानी लिखने के लिए प्रेरित किया


नजरुल का नाम सुनकर प्रबोध कुमार के चेहरे पर चमक आ गई। उन्होंने पूछा, “नजरुल का कोई गीत याद है?” तो सुनाओ . बेबी ने सहजता से नजरुल के एक-दो गीत सुना दिए।
प्रबोध कुमार सोचने लगे- चौबीस घंटे पेट के लिए व्यस्त रहने के बावजूद इसे गीत याद है। इसमें कुछ तो है। एक दिन प्रबोध कुमार ने उनको तसलीमा नसरीन की एक किताब पढ़ने के लिए दी। जब वह पूरी किताब पढ़कर खत्म कर चुकीं तो प्रबोध कुमार ने उनसे कहा कि तुम्हारे ऊपर अब तक जो कुछ बीता है, उसे रोज इस कॉपी में थोडा थोडा लिखो ।

बेबी को अपनी कहानी लिखने का धुन चढ़ा

यह बात पहले तो उनको बड़ी अटपटी लगी लेकिन जब कलम उठा लिया तो इस काम में उनको मजा आने लगा। अब बेबी को लिखने की धुन लग चुकी थी। खाने की मेज पर, रसोई में काम करते हुए और घर में काम करते जहां भी समय मिलता, वह लिखने बैठ जाती। बेबी को सहजता से लिखते हुए देखते प्रबोध कुमार सोचते- हम जब लिखते हैं तो मेज-कुर्सी लगाकर, सिगरेट पीकर मूड बनाना पड़ता है। यह कितनी सहजता से लिखे जा रही है। जिसके अंदर कुछ कहने को है, वह तो कहेगा ही, उसे इन सब चीजों की जरूरत नहीं रहती है।

अपना लिखा पढ़कर खुद रोती थी बेबी

बांग्ला में वह अपना ही लिखा पढ़कर रोती रहतीं। यह उनके जीवन का चमत्कृत कर देने वाला अनुभव था। स्कूल के दिनों के बाद उन्होंने दूसरी बार कलम थामा था। वह कहती हैं- ‘जब मैंने हाथ में पेन थामा तो घबरा गई थी। मैंने स्कूली दिनों के बाद कभी पेन नहीं थामा था। जैसे ही मैंने लिखना शुरू किया तो मुझमें नई ऊर्जा आ गई। किताब लिखना अच्छा एक्सपीरियंस रहा।’ बाद में प्रबोध कुमार ने स्वयं उनकी रचना को बांग्ला से हिंदी में अनूदित किया। बताया जाता है कि अनुवाद करते समय वह भी बार-बार रोए। 

उनकी पुस्तक आलो आंधारी को मिला भरपूर प्यार

आखिरकार उनकी पुस्तक ‘आलो-आंधारि जो की मूल रूप में बांग्ला में लिखी गई थी , पूरी हो गयी । इसका हिंदी अनुवाद प्रबोध कुमार ने किया जिसका प्रकाशन 2002 में किया गया . सीधी सधी भाषा में लिखी होने के कारण इसका पहला संस्करण हाथो हाथ बिक गया . ‘आलो-आंधारि किताब को 2006 का बेस्ट सेलर का ख़िताब दिया गया था . आज यह किताब 21भारतीय भाषाओ और 13 विदेशी भाषाओ में छप चुकी है . एक गुमनाम लड़की जिसके जीने मरने से किसी को कुछ फर्क पड़ने वाला नहीं था वो आज लोगो के लिए एक मिसाल है .

कई साहित्यिक समारोहों का बनी हिस्सा

लेखिका बनने के बाद बेबी ने पेरिस और फ्रैंकफर्ट जैसी जगहों का ना सिर्फ दौरा किया बल्कि कई साहित्यिक समारोहों का भी हिस्सा बनीं. इस समय उनका बड़ा बेटा जवान हो चुका है। वह पढ़ाई कर रहा है। हालदार ने किताबों की रॉयल्टी से अब तो अपना खुद का बसेरा भी बना लिया है, लेकिन प्रबोध कुमार की चौखट से उनका आज भी नाता टूटा नहीं है। वह कहती हैं – ‘मैं आज भी अपने आप को प्रबोध कुमार की मासी समझती हूँ। मैं उनका घर और अपने हाथों से झाड़ू कभी नहीं छोडूंगी। साथ ही लगातार लिखती रहूंगीं। प्रबोध कुमार की बदौलत ही तो मैंने खुद को पहचाना है।’

जानिए भारतीय T20 महिला टीम की सबसे कम उम्र की कप्तान स्मृति मंधाना के बारे में

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smriti mandhana hindi biography

भारत में पुरुष क्रिकेटरों को जीतना पब्लिसिटी और मान सम्मान मिलता है उतना महिला क्रिकेटरों को नहीं मिल पाता है लेकिन महिला क्रिकेट ने भी कुछ सालों में अच्छी खासी पहचान बना ली हैं . आज हम आपको भारतीय महिला क्रिकेट टीम की ऐसी खिलाडी के बारे में बताने जा रहे हैं जिसने महिला क्रिकेट की यह छवि बदलने में काफी अहम् भूमिका निभाई है . आज हम बात कर रहे हैं बाए हाथ की बल्लेबाज स्मृति मंधाना के बारे में.

Smriti Mandhana Biography in Hindi | स्मृति मंधाना का जीवन परिचय

स्मृति मंधाना का जन्म 18 जुलाई 1996 को मुम्बई के मारवाड़ी परिवार में हुआ था । उनके माता का नाम स्मिता और पिता का नाम श्रीनिवास मंधाना हैं । उनके पिता सांगली के केमिकल फैक्ट्री में डिस्ट्रीब्यूटरका कम करते है और उनकी माता स्मिता गृहिणी हैं। स्मृति ने अपनी प्रारंभिक पढाई माधवनगर से प्राप्त की थी।

भाई को क्रिकेट खेलते देखकर क्रिकेटर बनने का निश्चय किया

स्मृति मंधाना जब दो साल की थी तभी से अपने भाई श्रवण को देखकर बाएं हाथ से प्लास्टिक का बैट पकड़ना शुरू कर दिया था । स्मृति से चार साल बड़े भाई को उनके पिता बैटिंग की प्रैक्टिस कराते थे। स्मृति की मां चाहती थीं कि स्मृति टेनिस खेले। बचपन से अपने भाई को क्रिकेट खेलते देखकर एवं लोकल न्यूजपेपर्स में श्रवण के मैच की खबरें सुनकर स्मृति ने क्रिकेटर बनने का निश्चय किया । उनके पिता ने स्मृति में छिपे टैलेंट को पहचानते हुए उन्हें क्रिकेट पर फोकस करने की सलाह दी।

स्मृति के क्रिकेट खेलने पर लोग करते थे कमेंट

स्मृति ग्यारहवीं में साइंस लेना चाहती थी लेकिन उनकी मां ने पढ़ाई के बजाय खेल पर फोकस करने के लिए आसान विषय चुनने की सलाह दी। स्मृति के क्रिकेट खेलने पर शुरू में लोग कमेंट करते थे कि भारत में वुमंस क्रिकेट का कोई भविष्य नहीं है , लड़कियों को क्रिकेट खिलाने से कोई फायदा नहीं होगा । लेकिन स्मृति के पिता ने बिना लोगों की परवाह किए उनकी ट्रेनिंग जारी रखी। पिता और भाई दोनों सांगली जिले की ओर से क्रिकेट खेलते थे।

संगकारा की बैटिंग स्टाइल कॉपी करने पर कोच ने डांटा

श्रवण की तरह स्मृति भी राइट हैंडर थीं, लेकिन उनके पिता चाहते थे कि श्रवण और स्मृति बाएं हाथ से ही बैटिंग करें। इसीलिए उनके पिता ने स्मृति को दाएं हाथ से कभी बैटिंग ही नहीं करने दी। छह साल की उम्र से प्रोफेशनल ट्रेनिंग ले रहीं स्मृति इस बात से अनजान थीं कि पिता की यह जिद ही एक दिन उन्हें देश की नामी क्रिकेटर बना देगी। स्मृति कहती है की उन्होंने अपने भाई श्रवण के सारे शॉट कॉपी किए। बचपन में श्रीलंकाई क्रिकेटर कुमार संगकारा की बैटिंग स्टाइल को कॉपी करने पर उन्होंने कोच से डांट भी खाई थी। उनके कोच हमेशा नैचुरल गेम खेलने लिए प्रेरित करते थे।

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घरेलु मैच में दोहरा शतक लगाने वाली पहली महिला खिलाडी बनी

स्मृति जब 9 साल की थीं तो महाराष्ट्र अंडर 15 टीम के लिए उनका चयन हो गया था। इसके बाद 11 साल की उम्र में वे महाराष्ट्र अंडर 19 टीम का हिस्सा बनीं। स्मृति ने डोमेस्टिक मैच में नाम तब कमाया  । जब ये अक्टूबर 2013 में वेस्ट जोन अंडर 19 टूर्नामेंट के दौरान महाराष्ट्र की तरफ से एकदिवसीय मैचों में दोहरा शतक लगाया। ऐसा करने वाली वह पहली भारतीय महिला खिलाड़ी थीं। इन्होंने 150 गेंदों में 224 रन बनाए थे।

राहुल द्रविड़ के बैट से ही बनाए शुरुआती शतक

सितंबर 2016 में वूमेन बिग बैस लीग में के लिए इन्होंने ब्रिस्बेन हीट के साथ एक साल का करार किया। 2016 में आईसीसी वूमेन टीम ऑफ द ईयर में चुनी जाने वाली वह एकलौती भारतीय खिलाड़ी थीं। स्मृति क्रिकेट के तीनो फॉर्मेट में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं । स्मृति ने अप्रैल 2013 में वनडे क्रिकेट मैच से इंटरनेशनल क्रिकेट में डेब्यू किया था। जिसके बाद उन्होंने टेस्ट में अपना करियर अगस्त 2014 को इंग्लैंड के खिलाफ वोर्म्स्ली पार्क में की थी. इस टेस्ट की दोनों परियों में स्मृति ने 22 और 51 का योगदान दिया था.  उन्होंने अपने क्रिकेट कॅरिअर में शुरुआती शतक राहुल द्रविड़ के बैट से ही बनाए हैं। राहुल द्रविड़ ने अपना बैट उनके भाई श्रवण को साइन करके दिया था।

आईसीसी 2016 में महिला टीम में शामिल होने वाली एकमात्र भारतीय महिला खिलाड़ी

वर्ल्डकप 2017 में जब स्मृति ने क्वालीफ़ायर मुकाबले में इंग्लैंड के खिलाफ 90 रनों की बहुमूल्य पारी खेली थी तब से स्मृति को सभी लोग जानने लगे . इसके बाद उन्होंने वेस्टइंडीज के खिलाफ उन्होंने 106 रन की आतिशी पारी भी खेली. मंधाना वुमन टीम की उन अहम् खिलाडियों में शामिल थी जिन्होंने टीम को फाइनल तक पहुँचाने में योगदान दिया था. स्मृति 2016 में आईसीसी महिला टीम में शामिल होने वाली एकमात्र भारतीय महिला खिलाड़ी थी।

गेम इंप्रूव होने की वजह चोटिल होना

स्मृति ने एक इंटरव्यू में बताया कि उनका गेम इंप्रूव होने की वजह उनका चोटिल होना भी रहा है ।
2017 में वुमंस क्रिकेट वर्ल्ड कप से छह महीने पहले उनके घुटने में चोट लग गई थी। इस कारण से नेशनल क्रिकेट अकेडमी, बेंगलुरु में उन्होंने छह महीने तक ट्रीटमेंट के दौरान आराम किया। स्मृति ने बताया कि पहले वे आउट हो जाती थीं, तो उसके कारणों पर घंटों सोचती और तनाव में आ जातीं, लेकिन चोटिल होने के दौरान खाली समय में उन्होंने ज्यादा सोचने और छोटी-छोटी चीजों का तनाव लेने के बजाय वर्तमान पर फोकस करना शुरू कर दिया। इससे उनकी गेम भी बेहतर हो गई।

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सांगली की मीठी भेल है फेवरेट

स्मृति को खाली समय में प्लेस्टेशन-4 पर फीफा खेलना पसंद है , इसके अलावा उन्हें बॉलीवुड फिल्में देखना, म्यूजिक सुनना और खाना बनाना पसंद है। खाने में सांगली की मीठी भेल उनकी फेवरिट है। पसंदीदा शो भी कुकिंग का रिएलिटी शो ‘मास्टरशेफ ऑस्ट्रेलिया’ है। जब उनकी मां ने पहली बार लैपटॉप खरीदकर दिया, तो स्मृति ने सबसे पहले उसमें अपने ड्रीम रेस्तरां का मैन्यू ही टाइप किया था। स्मृति ‘एसएम-18’ नाम से क्रिकेट एकेडमी भी चला रही हैं

स्मृति मंधाना के बारे में महत्वपूर्ण रोचक तथ्य: (Interesting Facts about Smriti Mandhana in Hindi)

  • Mandhana was the first Indian woman to score a double hundred in a one day game, playing for Maharashtra against Gujarat in October 2013.
  • She idolises Matthew Hayden and Kumar Sangakkara.
  • She played with bat gifted by Rahul Dravid when she scored unbeaten 224 in West Zone U-19 Cricket League against Gujarat.
  • It was Smriti’s brother who inspired her to take up cricket at an age of 6. That turned
  • She wears the same number of jersey (18) as Virat Kohli.
  • She is the brand ambassador for POWER brand of Bata.
  • She is a big fan of fellow cricketer Jhulan Goswami and looks up to her as a role model.
  • Smriti was named in the 2019 Forbes Top 30 Under 30 for her exceptional performance.
  • She started 2019 being the top ranked batswoman in ICC’s rankings.
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  • She was the only Indian batsman to be named in the ICC Women’s team of the year.
  • Her first ODI century was against Australia in Hobart where she knocked a punch of 102 runs.
  • Smriti Mandhana is the 2nd Indian cricketer to sign a 1-year deal with Brisbane Heat for the Women’s Big Bash League, following Indian skipper Harmanpreet Kaur.

रामधारी सिंह दिनकर की जीवनी | Ramdhari Singh Dinkar biography in Hindi

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कुछ ऐसी कविताये होती है जो हमें आंदोलित कर देती है और उसकी गूंज कई सालो तक हमारे मन में बसी रहती है . रामधारी सिंह दिनकर ऐसे ही कवियों में से एक हैं . देशभक्ति और ओजस्वी कविताओ के लिए प्रसिद्ध रामधारी सिंह दिनकर हिंदी के प्रसिद्ध लेखक, कवी एवं निबंधकार थे . एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की भी अभिव्यक्ति है . वीर रस और राष्ट्रवाद की भावना को बढाने वाली प्रेरणादायक देशभक्तिपूर्ण रचना के कारण उन्हें राष्ट्रकवि (“राष्ट्रीय कवि”) के रूप में सम्मान दिया गया . भारतीय स्वतंत्रता अभियान के समय में उन्होंने अपनी कविताओ से ही जंग छेड़ दी थी . उनकी लिखी कविताएं किसी अनपढ़ किसान को भी उतनी ही पसंद है जितनी कि उन पर रिसर्च करने वाले स्कॉलर को.

जिस मिट्टी ने लहू पिया,
वह फूल खिलायेगी ही,
अम्बर पर घन बन छायेगा
ही उच्छवास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है।
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।

जीवनी

रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितम्बर 1908 को बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया ग्राम में हुआ था। इनके पिता रवि सिंह एक सामान्य से किसान थे और माता मनरूप देवी सामान्य ग्रहणी थीं। जब ये मात्र 2 वर्ष के थे उसी समय इनके पिता का देहांत हो गया। विधवा माँ ने किसी तरह बच्चों का पालन पोषण किया।  दिनकर का बचपन देहात में बीता, जहाँ दूर तक फैले खेतों की हरियाली, बांसों के झुरमुट, आमों के बग़ीचे और कांस के विस्तार थे। प्रकृति की इस सुषमा का प्रभाव दिनकर के मन में बस गया।

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प्रारंभिक शिक्षा

दिनकर ने हाई स्कूल की शिक्षा इन्होंने ‘मोकामाघाट हाई स्कूल’ से प्राप्त की। इसी बीच इनका विवाह भी हो चुका था तथा ये एक पुत्र के पिता भी बन चुके थे। दिनकर जब मोकामा हाई स्कूल के छात्र थे तो आर्थिक स्थिति ख़राब होने के कारण उन्हें बिच ही में स्कूल से वापस आना पड़ता था । 1928 में मैट्रिक के बाद दिनकर ने पटना विश्वविद्यालय से 1932 में इतिहास में बी. ए. ऑनर्स किया।

सरकार के हिंदी सलाहकार

पटना विश्वविद्यालय से बी. ए. ऑनर्स करने के बाद अगले ही वर्ष एक स्कूल में यह ‘प्रधानाध्यापक’ नियुक्त हुए, पर 1934 में बिहार सरकार के अधीन इन्होंने ‘सब-रजिस्ट्रार’ का पद स्वीकार कर लिया।  आगे चलकर भागलपुर विश्वविद्यालय में उपकुलपति का कार्यभार संभाला बाद में भारत सरकार के हिंदी सलाहकार के रूप में भी कार्य किया। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। दिनकर ज्यादातर इकबाल, रबिन्द्रनाथ टैगोर, कीट्स और मिल्टन के कार्यो से काफी प्रभावित हुए थे। भारतीय आज़ादी अभियान के समय में दिनकर की कविताओ ने देश के युवाओ को काफी प्रभावित किया था।

कार्य –

रामधारी सिंह दिनकर एक ओजस्वी राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत कवि के रूप में जाने जाते थे।
‘दिनकर’ स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने गये। भारतीय स्वतंत्रता अभियान के समय में उन्होंने अपनी कविताओ से ही जंग छेड़ दी थी। रामधारी सिंह दिनकर देशभक्ति पर कविताये लिखकर लोगो को देश के प्रति जागरूक करते थे। उनकी कविताओं में छायावादी युग का प्रभाव होने के कारण शृंगार के भी प्रमाण मिलते हैं। 

अमर काव्यो के रचयिता

दिनकर के प्रथम तीन काव्य-संग्रह हैं– ‘रेणुका’ (1935 ई.), ‘हुंकार’ (1938 ई.) और ‘रसवन्ती’ (1939 ई.) इन काव्य संग्रहों के अतिरिक्त दिनकर ने अनेक प्रबन्ध काव्यों की रचना भी की है, जिनमें ‘कुरुक्षेत्र’ (1946 ई.), ‘रश्मिरथी’ (1952 ई.) तथा ‘उर्वशी’ (1961 ई.) प्रमुख हैं। ‘कुरुक्षेत्र’ में महाभारत के शान्ति पर्व के मूल कथानक का ढाँचा लेकर दिनकर ने युद्ध और शान्ति के, गम्भीर और महत्त्वपूर्ण विषय पर अपने विचार भीष्म और युधिष्ठर के संलाप के रूप में प्रस्तुत किये हैं। दिनकर के काव्य में विचार तत्त्व इस तरह उभरकर सामने पहले कभी नहीं आया था। कुरुक्षेत्र में उन्होंने स्वीकार किया की निश्चित ही विनाशकारी था लेकिन आज़ादी की रक्षा करने के लिये वह बहुत जरुरी था।

रश्मिरथी – महाभारत बेहतरीन हिंदी वर्जन

‘कुरुक्षेत्र’ के बाद उनके नवीनतम काव्य ‘उर्वशी’ में फिर हमें विचार तत्त्व की प्रधानता मिलती है। ‘उर्वशी’ जिसे कवि ने स्वयं ‘कामाध्याय’ की उपाधि प्रदान की है– ’दिनकर’ की कविता को एक नये शिखर पर पहुँचा दिया है। उर्वशी का विषय आध्यात्मिक, उनके आध्यात्मिक संबंधों से अलग प्यार, जुनून और पुरुष और महिला के संबंध को दर्शाता है। उर्वशी नाम एक अप्सरा (उर्वशी) नाम से लिया गया है, जो हिंदू पौराणिक भगवान इंद्र की अदालत के स्वर्गीय युवती थी। उनका द्वारा रचित रश्मिरथी, हिन्दू महाकाव्य महाभारत का सबसे बेहतरीन हिंदी वर्जन माना जाता है।

विभिन्न लेखकों के विचार

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा था की –
दिनकर जी उन लोगो के बीच काफी प्रसिद्ध थे जिनकी मातृभाषा हिंदी नही थी और अपनी मातृभाषा वालो के लिये वे प्यार का प्रतिक थे।

हरिवंशराय बच्चन के अनुसार वे भारतीय ज्ञानपीठ अवार्ड के हकदार थे।

रामवृक्ष बेनीपुरी ने लिखा था की दिनकर की कविताओ ने स्वतंत्रता अभियान के समय में युवाओ की काफी सहायता की है।

नामवर सिंह ने लिखा था की वे अपने समय के सूरज थे। अपनी युवावस्था में, भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उनकी काफी प्रशंसा की थी।

हिंदी लेखक राजेन्द्र यादव के उपन्यास ‘सारा आकाश’ में उन्होंने दिनकरजी की कविताओ की चंद लाइने भी ली है, जो हमेशा से ही लोगो की प्रेरित करते आ रही है।

आपातकालीन समय में जयप्रकाश नारायण ने रामलीला मैदान पर एक लाख लोगो को जमा करने के लिये दिनकर जी की प्रसिद्ध कविता भी सुनाई थी : सिंघासन खाली करो के जनता आती है।

अवार्ड और सम्मान –

कविताओ के साथ-साथ दिनकरजी ने सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों पर भी अपनी कविताये लिखी है, जिनमे उन्होंने मुख्य रूप से सामाजिक-आर्थिक भेदभाव को मुख्य निशाना बनाया था।

उन्हें काशी नागरी प्रचारिणी सभा, उत्तर प्रदेश सरकार और भारत सरकार की तरफ से महाकाव्य कविता कुरुक्षेत्र के लिये बहुत से अवार्ड मिल चुके है।

संस्कृति के चार अध्याय के लिये उन्हें 1959 में साहित्य अकादमी अवार्ड मिला। भारत सरकार ने उन्हें 1959 में पद्म भुषण से सम्मानित किया था।

भागलपुर यूनिवर्सिटी ने उन्हें LLD की डिग्री से सम्मानित किया था। राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर की तरफ से 8 नवम्बर 1968 को उन्हें साहित्य-चौदमनी का सम्मान दिया गया था।

उर्वशी के लिये उन्हें 1972 में ज्ञानपीठ अवार्ड देकर सम्मानित किया गया था। इसके बाद 1952 में वे राज्य सभा के नियुक्त सदस्य बने। दिनकर के चहेतों की यही इच्छा है की दिनकर जी राष्ट्रकवि अवार्ड के हक़दार है।

मुख्य कविताये

  • विजय सन्देश (1928)
  • प्राणभंग (1929)
  • रेणुका (1935)
  • हुंकार (1938)
  • रसवंती (1939)
  • द्वन्दगीत (1940)
  • कुरुक्षेत्र (1946)
  • धुप छाह (1946)
  • सामधेनी (1947)
  • बापू (1947)
  • इतिहास के आंसू (1951)
  • धुप और धुआं (1951)
  • मिर्च का मज़ा (1951)
  • रश्मिरथी (1952)
  • दिल्ली (1954)
  • नीम के पत्ते (1954)
  • सूरज का ब्याह (1955)
  • नील कुसुम (1954)
  • चक्रवाल (1956)
  • कविश्री (1957)
  • सीपे और शंख (1957)
  • नये सुभाषित (1957)
  • रामधारी सिंह ‘दिनकर’
  • उर्वशी (1961)
  • परशुराम की प्रतीक्षा (1963)
  • कोयला एयर कवित्व (1964)
  • मृत्ति तिलक (1964)
  • आत्मा की आंखे (1964)
  • हारे को हरिनाम (1970)
  • भगवान के डाकिये (1970)

मनोज बाजपेयी की जीवनी | Manoj Bajpayee Biography in Hindi

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मनोज बाजपेयी भारतीय फिल्म के उन अभिनेताओ  में से है जिन्होंने फर्श से अर्श तक का सफ़र तय किया . मनोज बाजपेयी बॉलीवुड के ऐसे स्टार में से एक हैं जो किसी भी रोल में अपनी एक अलग पहचान बना लेते हैं। फिल्मों में अपने रोल से लोगों को दिल और दिमाग पर चढ़ जाने वाले मनोज की हर फिल्म अपने आप में खास और अलग है। गैंग ऑफ वासेपुर, अलीगढ़, सत्या, राजनीति या दूसरी कोई भी फिल्म को उठा ले। इन सभी फिल्मों से मनोज ने अपनी ऐसी पहचान बनाई जो आज भी लोगों के जह़न में बसी हुई है। लेकिन क्या आपको पता है की एक बार दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में तीन बार अस्वीकृत होने के बाद उन्होंने आत्महत्या करने की कोशिश की. तो चलिए  हम आपको बताते है मनोज वाजपेयी जी के बारे में …………

प्रारंभिक जीवन

मनोज  वाजपेयी का जन्म बिहार के पश्चिमी चंपारण के नरकटियागंज के एक छोटे से गाँव बेलवा में  23 अप्रैल 1969  को हुआ था . मनोज बाजपेयी अपने 6 भाई बहनों में दुसरे नंबर पर आते है .इनके पिता एक किसान थे जबकि माँ घर की देखभाल करती थी.  ये बचपन से ही फिल्म अभिनेता बनना चाहते थे लेकिन इनके परिवार की स्थिति ऐसी थी की बहुत मुश्किल से ही इनकी पढाई लिखाई पूरी हो पाई

पढाई लिखाई 

मनोज बाजपेई  ने   स्कूली पढाई बेतिया जिले के राजा हाई स्कूल से किया  . इन्होने अपनी 12th क्लास की पढ़ाई महारानी जानकी कॉलेज, बेतिया से पूरा किया .स्‍नातक की पढ़ाई के लिए दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के रामजस कॉलेज आ गए. वे नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा  से चार बार खारिज कर दिए गए उसके बाद उन्होंने बैरी डरामा स्कूल से बैरी जॉन के साथ थीयेटर किया|

संघर्ष 

चंपारण की गलियों से निकलकर बॉलीवुड तक का सफ़र मनोज वाजपेयी के लिए बहुत संघर्ष भरा रहा है . मनोज बाजपेयी की बहन पूनम दुबे बताती है की  मनोज भाई एनएसडी के बाद दिल्ली में काम के लिए लगातार स्ट्रगल कर रहे थे और  जब हम दोनों सुबह घर से निकलते, तो वो मुझे हाथ में दो रुपए का सिक्का देकर बस में बिठा देते थे और खुद पैदल चलकर अपने थिएटर ग्रुप तक जाते थे। उन्होंने एनएसडी की पढाई के दौरान एक रुपया भी घर से नहीं लिया .मै हमेशा अपने भाई के लिए दुआ करती रहती थी की उन्हें अपनी मंजिल जल्द से जल्द मिले . उस समय बिहार के चंपारण जिले के बहार किसी लड़की ने पढने क लिए कदम नहीं रखा था .लेकिन मेरे भाई के कारण ही मै फैशन डिजाइनिंग करने वाली पहली लड़की बन पाई .

कैरियर 

मनोज वाजपेयी के  कैरियर की शुरुआत दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक स्वाभिमान के साथ हुयी  .इसी धारावाहिक से आशुतोष राणा और रोहित रॉय को भी पहचान मिली . इनकी पहली  डेब्यू फिल्म ‘द्रोहकाल’ साल 1994 में रिलीज हुई थी, जिसमे इन्होने सिर्फ एक मिनट के लिए रोल किया था.  उसके बाद ‘बैंडिट क्वीन’ (1994) में डाकू मान सिंह की एक छोटी सी भूमिका अदा की .जिसमे इनको काफी प्रशंसा मिली .

इसके बाद मनोज बाजपेयी ने कुछ छोटे छोटे रोल किया पर उन्हें अपने मनमुताबिक रोल नहीं मिल पाया और इन्होने मुम्बई छोड़ने का मन बना लिया पर  1998 मे राम गोपाल वर्मा की फिल्म सत्या  में कम करने के  बाद मनोज ने कभी वापस मुड कर नहीं देखा। इस फिल्म मे उनके द्वारा निभाये गये भीखू म्हात्रे के किरदार के लिये उन्हे कई पुरस्कार मिले जिसमे सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्मफेयर का सर्वोत्तम अभिनेता पुरस्कार (समीक्षक) मुख्य हैं।

1999 में फिल्म शूल में मनोज वाजपेयी द्वारा निभाए गए  किरदार समर प्रताप सिंह के लिये उन्हे फिल्मफेयर का सर्वोत्तम अभिनेता पुरस्कार मिला। अमृता प्रीतम के मशहूर उपन्यास ‘पिंजर’ पर आधारित फ़िल्म पिंजर के लिये उन्हे एक बार फिर राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उसके बाद तो चारो तरफ मनोज वाजपेयी की एक्टिंग की चर्चा हों लगी . चाहे वो   2010 मे आयी प्रकाश झा निर्देशित फिल्म राजनीति मे उनके द्वारा निभाये  वीरू भैया का किरदार हो या 2012 मे आयी फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर  मे मनोज सरदार खान का  किरदार . अपनी एक्टिंग से उन्होंने हर किरदार को जीवंत कर दिया . इसके अलावा स्पेशल 26 में इनके द्वारा निभाए किरदार को भी लोगो ने काफी पसंद किया

मनोज बाजपेयी की निजी जीवन 

बॉलीवुड फिल्म अभिनेता मनोज बाजपेयी ने दिल्ली में एक लड़की से शादी की, लेकिन इन्होने अपने स्ट्रगल पीरियड में तलाक ले लिया और उसके बाद इनका अफेयर्स फिल्म अभिनेत्री नेहा (शबाना राजा) से चला . मनोज और नेहा की लव स्टोरी 1998 में शुरु हुई, कई सालों तक एक दूसरे को डेट करने के बाद दोनों ने अप्रैल 2006 में शादी कर ली।

पद्म श्री सम्मान

16 मार्च एक्टर मनोज बाजपेयी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों पद्म श्री सम्मान दिया गया। मनोज बाजपेयी को राष्ट्रपति भवन में इस सम्मान से नवाजा गया। इस दौरान वहां खेल जगत के भी कई नामी लोगों को इस सम्मान से नवाजा गया। इस दौरान मनोज अपनी पत्नी शबाना बाजपेयी के साथ पहुंचे थे।

मनोज ने अपनी इस खुशी साझा करते हुए कहा, “मेरे दोस्त, रिश्तेदार और प्रशंसक इससे बहुत खुश हैं। मैंने देखा है कि अब तक किसी ने भी सोशल मीडिया पर मेरी आलोचना नहीं की है और न ही किसी ने मेरा नाम पद्मश्री पुरस्कार विजेताओं में से एक के रूप में घोषित होने के बाद कोई विवाद खड़ा किया। मैं वास्तव में खुश हूं और यह अच्छी बात है कि मुझे सम्मान मिलने पर किसी ने आपत्ति नहीं जताई।” 

कबाड़ के धंधे से माइंस और मेटल के सबसे बड़े कारोबारी तक का सफ़र – अनिल अग्रवाल

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anil agarwal biography hindi

आज की कहानी है बिहार में जन्मे एक शख्स की जिसने कबाड़ के धंधे से छोटा व्यापार शुरू कर माइंस और मेटल के सबसे बड़े कारोबारी होने का गौरव हासिल किया . जिसने 15 साल की उम्र में अपने पिता के बिजनेस के लिए स्कूल छोड़ दिया था और मुंबई जाकर पिता के बिजनेस में हाथ बंटाने लगे थे . हम बात कर रहे है स्क्रैप डीलर के तौर अपने करियर की शुरुआत करने वाले वेदांता रिसोर्सेज के मालिक अनिल अग्रवाल की . जिन्होंने अपनी दौलत का 75 फीसदी हिस्सा भारत में बेहतर शिक्षा के लिए दान देने की घोषणा कर के सबको आश्चर्यचकित कर दिया था . नकी दरियादिली पर वेदांता समूह ही नहीं, हिन्दुस्तान समेत समूची इंसानियत को नाज होगा . अनिल अग्रवाल की जिंदगी किसी रोचक उपन्यास से कम नहीं है . पढ़िए उनकी बायोग्राफी 

ANIL AGRAWAL BIOGRAPHY IN HINDI 

अनिल अग्रवाल का जीवन परिचय 

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अनिल अग्रवाल का जन्म 24 जनवरी 1954 को पटना में माध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था . उनके पिताजी द्वारिका प्रसाद अग्रवाल का 1960 में लोहे की जाली और गेट बनाने का कारोबार था . अनिल अग्रवाल बताते है की – जब मै 6 साल का था तो मुझे 10 किलोमीटर दूर स्थित स्कूल पैदल चलकर न जाना पड़े इसलिए  मेरे पिताजी ने मुझे मेरी पहली साईकिल उपहार के तौर पर दी . वो मेरे जिंदगी के सबसे रोमांचक लम्हों में से एक है .

अंग्रेजी में थे बेहद कमजोर

अनिल अग्रवाल ने पटना के  मिलर हाई स्कूल से  1972 में स्कूल की  पढाई पूरी की . उनके भीतर शुरू से ही कुछ कर गुजरने की  महत्वाकांक्षाएं हिलोरें मारती रहती थी . वो जो कुछ भी देखते उसे पाने की ललक पैदा हो जाती थी . परिवार की सहमति से उन्होंने कॉलेज छोड़ पिता के कारोबार में हाथ बटाने के बारे में सोचा . उन्नीस वर्ष की उम्र में वो पढाई छोड़ मुम्बई में कारोबार करने के लिए 1975 में मुम्बई के लिए विमान पकड़ा . यह उनकी पहली हवाई यात्रा थी . वे अंग्रेजी में बहुत कमजोर थे इसलिए वो पुरे सफ़र में बिलकुल खामोश बैठे रहे .

बिजनेस का पता ओबरॉय होटल 

एक शाम अनिल अग्रवाल मुम्बई के नरीमन  प्वॉइंट पर टहल रहे थे . सामने उन्होंने ओबेरॉय होटल देखा . वहां  की खूबसूरती देखकर उन्होंने सोचा की काश मै भी इस होटल में एक दिन गुजार पाता . लेकिन उनकी  सबसे बड़ी दिक्कत थी की उन्हें अंग्रेजी बोलना बिलकुल नहीं आता था . फिर वे ओबरॉय होटल में कैसे घुस पाते . एक पहचान वाले की मदद से जब वो पहली होटल के अन्दर गए तो उन्होंने सोचा ओबरॉय होटल मेरे बिजनेस के लिए अच्छा पता साबित हो सकता है . उस वक्त वो जिस कमरे में ठहरे थे उसका रोजाना किराया 200 रुपये था . बिजनेस बढ़ने के लिए वो वहां तकरीबन तिन महीने तक रहे . लेकिन पैसे बचाने के लिए खाना खाने व कपड़े धुलाने का काम बाहर ही करते थे .

छोटे से कमरे में वेदांता रिसोर्सेज की रखी नीव 

बहुत सारी खोजबीन और रिसर्च करने के बाद 1976 में उन्होंने वेदांता रिसोर्सेज की बुनियाद रखने का फैसला किया . उनका पहला दफ्तर कलबादेवी में 8/10 वर्गफीट का था ,जिसमे मुश्किल से तिन आदमी एक साथ बैठ सकते थे . उन्होंने फोन भी ऊपर मंजिल वाले से किराये पर लिया था .  शुरू-शुरू में वे लोग  दूसरे राज्यों की केबल कंपनियों से स्क्रैप खरीदते, और उन्हें मुंबई में बेचते थे। उन्होंने  तकरीबन दस वर्षों तक यह काम किया और अपना व्यापर बढ़ने के लिए बैंक से कर्ज लेने की सोची . उन्होंने बहुत से बैंक से संपर्क किया लेकिन एक नौजवान लड़का जो बिहार के मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता है और जिसने सिर्फ हाई स्कूल ही पास किया है तो कोई भी बैंक इतना बड़ा रिस्क लेने को तैयार नहीं हुआ . फिर उन्हें सिंडिकेट बैंक से 50 हज़ार रुपये का कर्ज मिला जिसके लिए उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी .

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अनिल अग्रवाल कहते है –

उन दिनों मेरा आधा समय सिंडिकेट बैंक में ही बीतता था। मैं बाहर बैठा-बैठा शीशे से मैनेजर का चेहरा झांकता रहता। यदि उसके चेहरे पर उस समय मुस्कान होती, तो मैं समझ जाता कि उससे 50 हजार का चैक क्लीयर करने के लिए गुजारिश करने का यही सबसे माकूल वक्त है।

अनिल ने इन पैसो से  “Shamsher Sterling Corporation” का अधिग्रहण किया जो Enamelled Copper Wire बनाती थी .अगले दस वर्षो तक ये इस कंपनी को ठोस आधार देने और आगे बढाने का काम करते रहे . कुछ सालो बाद  उन्होंने सोचा की अच्छे पैसे तभी कमाए जा सकते है जब उनकी कम्पनी के लिए Raw materials – अलुमिनियम और कॉपर का मूल्य नियंत्रित रहे . इसलिए उन्होंने अलुमिनियम और कॉपर खरीदने की जगह उनका निर्माण करना शुरू कर दिया .

मिलने लगी सफलता 

1986 में उन्होंने Jelly-filled cables के निर्माण में 7 करोंड़ रुपये लगाये और अधिकारिक तौर पर स्टरलाइट इंडस्ट्रीज का निर्माण किया . जाहिर है, उनका कारोबार तेजी से बढ़ रहा था, इसलिए अपने व्यापार को और मजबूत करने के लिए  अनिल ने एल्यूमीनियम शीट्स और फोइल बनाने के लिए एक संयंत्र बनाया और साथ ही उन्होंने 1993 इस्वी  में औरंगाबाद में ऑप्टिकल फाइबर का उत्पादन करने के लिए स्टरलाइट संचार के तहत एक और संयंत्र स्थापित किया

अनिल अग्रवाल कहते है –

मुंबई ने मुझे सिखाया कि कैसे इंग्लिश बोलना चाहिए, कैसे बेहतर तरीके से तैयार होना चाहिए और व्यापार के दूसरे सारे गुर भी इस शहर ने मुझे सिखाए। मुंबई का वह तजुर्बा वाकई अनमोल साबित हुआ।

टर्निंग पॉइंट 

अनिल अग्रवाल के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया . साल 2003 में भारत में ख़राब  कारोबारी माहौल और  पूंजी जुटाने में बाधा आने के कारण निराश होकर अनिल लन्दन चले गए . एक ऐसी जगह जहां दुनिया की सबसे बड़ी खनन और धातु कंपनियों का मुख्यालय था जिससे अनजाने में ही उनकी कम्पनी का चेहरा बदल गया . वहां एक ब्रिटिश अखबार से पता चला कि दक्षिण अफ्रीकी डीलमेकर ब्रायन गिल्बर्टसन, जिन्होंने साल 2001 में बिलिटन द्वारा 57 बिलियन डॉलर में बीएचपी के अधिग्रहण की रूपरेखा तैयार की थी, ताकि दुनिया में खनन क्षेत्र की सबसे विशाल कंपनी खड़ी की जा सके, अपने नए नेतृत्व से कुछ नाराज हैं।

साईकल प्रेम काम आया 

अनिल ने उन्हें फोन कर कहा की मुझे अपनी कम्पनी को लिस्ट कराने के लिए आपकी मदद की दरकार है . इसके जवाब में गिल्बर्टसन ने उनकी हॉबीज के बारे में पूछ लिया. अनिल ने जवाब दिया मेरी हॉबी वही है जो सामने वाला चाहता है . गिल्बर्टसन बोले- मैं तो साइकिल चलाता हूं। मैंने जवाब दिया कि मैं भी साइकिल चलाता हूं। फिर क्या था, दोनों ऑक्सफोर्ड से लंदन तक साइकिल पर थे।

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अनिल कहते है –  कोई ताकत थी, जिसने वह दूरी तय करने में मेरी मदद की। उस मुलाकात के बाद ब्रायन गिल्बर्टसन हिन्दुस्तान आए। उन्होंने मेरी तमाम परिसंपत्तियों का आकलन किया और उससे प्रभावित हुए। मैंने उन्हें एक बेहतर पैकेज ऑफर किया और फिर वह चेयरमैन बन गए।

लंदन स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी

अनिल ने सबको चौकाते हुए वेदांत समूह को सफलतापूर्वक लंदन स्टॉक एक्सचेंज (एलएसई) में सूचीबद्ध किया और 876 मिलियन डॉलर जुटाए . यह और भी जबरदस्त था कि, वेदांत न केवल लंदन स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होने वाली पहली भारतीय कंपनी बन गई बल्कि एक दशक से भी कम समय में खनन और धातुओं में वैश्विक खिलाड़ी बनने वाला पहला भारतीय व्यापार समूह बन गया।

अनिल अग्रवाल कहते है –  मेरे पिता जी ने मुझे दो नसीहतें दी थीं, जो मेरी जिंदगी को हमेशा राह दिखाती रही हैं। उनकी पहली सलाह तो यह थी कि तब तक प्रयास करते रहो, जब तक कि कामयाबी न मिल जाए, मगर कभी भी उसूलों की कीमत पर नहीं। और दूसरी सलाह थी गरीबों-वंचितों के साथ हमेशा हमदर्दी का भाव रखने की। मेरे पिता ने राजस्थान में एक पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज खोला और उस राज्य की औरतों के सशक्तीकरण में इस संस्थान ने चमत्कारिक रोल अदा किया है। पिता जी की सोच ने मुझे और मेरे परिवार को हमेशा ही प्रेरित किया है।

21 वर्ष में की शादी 

साइकलिंग  के लिए उनके बचपन के जुनून ने उन्हें एक और फायदा दिया . उनकी पत्नी  किरण गुप्ता, एक पुराने परिवार की  मित्र और एक साथी साइकिल चालक थी । उन  दोनों ने बहुत ही कम उम्र में शादी कर कर लिया – वह 21 वर्ष का थे  और किरण  16 वर्ष की थी । लेकिन वे अपने जीवन का आनंद लेते रहे और वर्तमान में लंदन में रहते हैं।

अपनी कमाई का  75 फीसदी दान देकर किया सबको आश्चर्यचकित

वर्ष 2014 में लंदन में अपने परिवार की सहमति के बाद अनिल अग्रवाल ने ऐलान करते हुए  कहा कि वह अपनी कमाई की 75 फीसदी रकम भारत में निशुल्क शिक्षा के कई बड़े प्रोजेक्ट में दान देना चाहते हैं. वे भारत में ऑक्सफोर्ड से बड़ी कई यूनिवर्सिटी बनाना चाहते हैं जो ‘नो प्रॉफिट नो लॉस’ के नियम पर चलेंगी. अग्रवाल ने कहा की वह कई वर्षों से चैरिटी की दिशा में बढ़ रहे थे और आखिरकार परिवार की सहमति के बाद वह देश को यह रकम समर्पित करने में सफल हुए हैं. जानकारी के मुताबिक, अनिल द्वारा दान की यह राशि‍ करीब 21000 करोड़ रुपये है. यह राशि‍ अब तक किसी भी भारतीय के द्वारा दान की जाने वाली सबसे बड़ी रकम है.

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अनिल अग्रवाल कहते है –

मेरा मानना है कि किसी भी असंभव लगते लक्ष्य को हासिल करने के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि पहले आप अपने लक्ष्य की कल्पना करैं, फिर सामथ्र्य का आकलन करें और उसके बाद पूरी प्रतिबद्धता के साथ गोल हासिल के लिए मैदान में उतर जाएं। कारोबारी दुनिया एक ऐसा निरंतर चलने वाला खेल है; जिसमें कोई हमेशा नंबर एक या दो नहीं हो सकता। पर हमारा लक्ष्य हमेशा यही होना चाहिए कि हम अपनी क्षमताओं का अधिकतम विस्तार करें।

नारी – केदारनाथ मिश्र ” प्रभात “

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नारी – केदारनाथ मिश्र ” प्रभात “

 

किसने देखी है ऐसी शक्ति विधानों में

ऐसा आकर्षण मिला किसे उद्यानों में

बरसे जैसा सौंदर्य तुम्हारी चितवन से

तुम सचमुच हो देवार्ह दिव्य तन से, मन से |

 

सुख में अनछुई किरण बन सदा झलकती  हो

दुःख मे कोमल आँसू की भांति छलकती हो

वह दीपक कैसा , जिसकी स्नेहील शिखा न हो

जिसके हर कम्पन में अर्पण सुख लिखा न हो

कैसी निष्ठा जो मरू को सरस हिलोर न दे

उर -उर बंध जाये , ऐसी रेशम डोर न दे |

 

तुम जहाँ मधुर हो , वहां कोकिला गाती है

तुम जहाँ मृदुल हो , वहां चांदनी भाती है

तुम जहाँ क्षमा हो , गंगा वहां उमड़ती है

तुम क्षेमा जहाँ ,घटा घनघोर घुमड़ती है |

 

तुम जहाँ मौन हो ,वहां सिन्धु की ज्वार उठे

तुम जहाँ मुखर हो ,वहां बसंत पुकार उठे

तुम जहाँ स्वप्न हो , छाया वहां मचलती है

तुम जहाँ सत्य हो ,वहां तपस्या चलती है |

 

तुफानो में तुम झुक जाती हो ,टूटती नहीं

प्यालिया छलकती भावों को , फूटती नहीं

तुम रहती मन के पास की प्यासा राह चले

तुम रहती मन के पास की तम में दीप जले

तुम रहती मन के पास की पथ भरी न लगे

चन्द्रमा न हो , पर रजनी अंधियारी न लगे |

 

तुम रहती मन के पास की आँसू आग न बने

सम्पूर्ण शुन्य दीपित हो , दीपक राग न बने

तुम रहती मन के पास की पृथ्वी खिली रहे

नभ के तारो से हिय की धड़कन मिली रहे |

 

नक्षत्र व्योम के छंद चितेरे झांक रहे

भू की कविता तुम , नयन भविष्यत झांक रहे

नर से नारी सेवा के लिए विभक्त हुयी

 

 

 

 

अपने ओसरवां कोशिल्या रानी

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अपने ओसरवां कोशिल्या रानी

अपने ओसरवां कोशिल्या रानी राम के उलारेली राम के दुलारेली हो
आरे उलटी उलटी राम के देखेली देखत नीक लागेला

भीखिया मांगत दुई ब्राह्मण रानी से अरज करें
रानी कवन कवन तप कईलू त राम गोदी बिहसेले

माघ ही मॉस नहईलीं अगिनी नाही तपली हो
ए ब्राह्मन जेठ नाही बेनिया दोलावली त राम गोद बिहसेलें हो

कातिक मॉस नहईलीं तुलसी दियना बरीलें हो
ए ब्राह्मन कातिक में आवलाँ के दान कईलीं त राम गोदी बिहसेलें हो

भूखल रहलीं एकादशी त द्वादशी के पारण करीं
ए ब्राह्मण भूखले में विप्र के जेववलीन त राम गोद बिहसेलें हो

रुकुमिनी लिपी अईली पोति अईली

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रुकुमिनी लिपी अईली पोति अईली

 

रुकुमिनी लिपी अईली पोति अईली छतीस दियना बारि अईली हो
आरे बीनू रे होरील के ओबरिया त झहर झहर करे

एक रे पहर रुकुमिनी सूतेली सपन एक देखेली हो
आरे पांचही आम के घवदिया खोईन्छा कहू डालेला

दूसरा पहर रुकुमिनी सूतली त सपन एक देखेली हो
आरे कोरी नदीयवा के दहिया जंगलवा कहू धईल

तीसरा पहर रुकुमिनी सूतेली सपन एक देखेली
आरे लाल बरन के घुनघुनावान सेजीयावा पर धईल.

चौथा पहर रुकुमिनी सूतेली सपन एक देखेली हो
आरे सावरेन वरन के होरीलवा सेजीयवा पर खेलेला हो

मचिया ही बईठल कौशिल्या रानी

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मचिया ही बईठल कौशिल्या रानी

 

मचिया ही बईठल कौशिल्या रानी, सिहाँसन राजा दशरथ हो
राजा बिनु रे बदरी कहीं कजरी कहाँ जाई बरसेले हो

बोलिया त बोलेली रानी बोलही नाहीं पावेली हो
रानी बीनू हो ग़रभ के तिरियवा होरीला नाही जनमत सुनत सुख सोहर हो

एतना बचन रानी सुनली सुनहि नाही पावेली हो
रानी हाथे गोड़े तानेली चदरिया सुतेली कोपवाघर हो (कोपभवन)

सोने के खडौउआ राजा दशरथ केकयी महल चले
रानी तोरे बहिना बड़े रे वियोगावा त चली के मनावहु हो

एक हाथ लेली केकयी दतुअनि दुसरे हाथ पानी हो
केकयी झटकि के चढ़ेली अटरिया त बहिना मनावन हो

उठहु इ बहिना उठहु कहल मोर मानहु
बहिना उठिके करहु दतुअनिया होरिल तोरे होईहे सुनीह सुख सोहर हो

कवनाहिं मासे गंगा बढ़ियईहें सवार दहे लगिहन हो
बहिनी कवनही मासे राम जनमिहें त बचन पूरन होईहें

सावन मासे गंगा बढ़ियईहें सेवर दहे लगिहें
बहिनी कातिक मासे राम जनमिहें त बचन पूरन होईहें

बहिनी कातिक मासे राम जनमेलें त बचन पूरण भईलें
सब सखि तेल लगावेली मंगल गावेली

रानी केकयी के जीयरा भे रोग सुनीके नाहि आवेली
सोने के खड़उआँ राजा दशरथ केकयी महल चलें

रानी कवन अवगुन मोसे भईलें सुनीके नाहि आवेलू हो
ना हम तेल लगाईब ना ही मंगल गाईबी राजा हो
ब्रम्हा के बान्हल पिरितिया उलटी राउरे दिहली।

छापक पेड़ छिउलिया,त पतवन धन बन हो

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छापक पेड़ छिउलिया,त पतवन धन बन हो

 

छापक पेड़ छिउलिया त पतवन धन बन हो
ताहि तर ठाढ़ हरिनवा त हरिनी से पूछेले हो

चरतहीं चरत हरिनवा त हरिनी से पूछेले हो
हरिनी! की तोर चरहा झुरान कि पानी बिनु मुरझेलू हो

नाहीं मोर चरहा झुरान ना पानी बिनु मुरझींले हो
हरिना आजु राजा के छठिहार तोहे मारि डरिहें हो

मचियहीं बइठली कोसिला रानी, हरिनी अरज करे हो
रानी! मसुआ तो सींझेला रसोइया खलरिया हमें दिहितू न हो

पेड़वा से टांगबी खलरिया त मनवा समुझाइबि हो
रानी हिरि-फिरि देखबि खलरिया जनुक हरिना जिअतहिं हो

जाहू! हरिनी घर अपना खलरिया ना देइबि हो
हरिनी खलरी के खंझड़ी मढ़ाइबि राम मोरा खेलिहें नू हो

जब-जब बाजेला खंजड़िया सबद सुनि अहंकेली हो
हरिनी ठाढ़ि ढेकुलिया के नीचे हरिन बिसूरेली हो