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Friday, October 2, 2026
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SAKDIYAH MAROOF BIOGRAPHY IN HINDI

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सादिया मारूफ (SAKDIYAH MAROOF)

(इंडोनेशियाई कॉमेडियन)
मुल्क में लड़कियों पर बहुत सारी पाबंदियां थीं।
 मैं हास्य-व्यंग्य के जरिये कट्टरपंथियों पर हमले करने लगी।
 मगर मुङो हमेशा इस बात का खौफ रहता था 
कि कहीं घरवालों को इसकी भनक न लग जाए।
 खुशनसीब हूं कि तमाम लोगों ने मेरा साथ दिया।
इंडोनेशिया के कट्टर मुस्लिम परिवार में जन्मी सादिया को बचपन से ही अनेक पाबंदियों का सामना करना पड़ा। उनका परिवार सेंट्रल जावा के पेकालोनगन शहर में रहता था। घर में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, पर परंपरावादी परिवार में बेटियों को बाहर घूमने-फिरने व करियर बनाने की आजादी नहीं थी। होश संभालते ही लड़कियों को घर-गृहस्थी के काम-काज सिखाए जाते, ताकि ससुराल में दिक्कत न आए। सादिया को ये पाबंदियां कभी रास नहीं आईं। घरवालों ने सोचा, बच्ची बड़ी होगी, तो संभल जाएगी। सादिया जब 10वीं कक्षा में थीं, तभी एक दिन उनके लिए रिश्ता आया।

जब यह बात सादिया को पता चली, तो वह भड़क गईं। साफ शब्दों में कह दिया- मैं शादी नहीं करने वाली। मुङो यूनिवर्सिटी में पढ़ना है। शादी के बारे में बाद में सोचूंगी। अम्मी ने यह बात अब्बू को बताई, तो वह चिंतित हो गए। खानदान में 16 साल की उम्र के बाद बेटियों को मायके में रखने का रिवाज कभी नहीं रहा। शादी में देर हुई, तो पता नहीं, बाद में अच्छे रिश्ते मिले या नहीं।घर में कोहराम मच गया। बच्ची शादी से मना कर रही है। अगर रिश्तेदारों में बात फैली, तो क्या होगा? मगर क्या करते, बेटी की जिद थी। अब्बू उन्हें यूनिवर्सिटी भेजने को तैयार हो गए।

 सादिया बताती हैं- अब्बू ने पढ़ने की इजाजत दी, पर कई शर्तो के साथ। उन्होंने कहा कि मैं कॉलेज में सिर्फ पढ़ाई करूंगी, किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लूंगी, कभी कॉलेज से बाहर घूमने नहीं जाऊंगी। और हां, सबसे अहम बात कि किसी लड़के से बात नहीं करूंगी। अब्बू की सारी शर्ते मानने के बाद 2007 में वह योगियाकार्ता की गजा मादा यूनिवर्सिटी आ गईं।

वहां पहुंचकर पहली बार उन्हें आजादी का एहसास हुआ। पढ़ाई के साथ उन्होंने वे सारे काम किए, जिसके लिए उन्हें मना किया गया था। सादिया ने गाना सीखा। लड़कियों के संग बाहर घूमने गईं। मौका मिला, तो गंभीर मसलों पर लड़कों के संग बहस भी की। घर में लड़कियों से उम्मीद की जाती थी कि वे धीमी आवाज में बोलेंगी। मगर कॉलेज में कोई नहीं था टोकने वाला।

 कई बार वह कॉलेज की दीवार फांदकर शाम को सहेलियों के संग बाहर जाने लगीं। शाम को खुली हवा में घूमने का एहसास अद्भुत था। इससे पहले यह मौका कभी नहीं मिला था उन्हें। सादिया बताती हैं कि यूनिवर्सिटी में पहली बार लड़कियों के सामने चीखने और तेज आवाज में अपनी खुशी जाहिर करने का मौका मिला। उस खुशी को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। हालांकि कैंपस में लड़कों और लड़कियों के बीच दूरी बनाए रखने की परंपरा जारी थी।
सेमिनार के दौरान लड़के व लड़कियां अलग-अलग बैठते थे। बीच में परदा होता था, ताकि वे एक-दूसरे से बात न कर सकें। सादिया बताती हैं- लड़कों और लड़कियों के बीच परदा डालने की बात मुङो बहुत अजीब लगी। ऐसा बेतुका नियम बनाने वालों पर मुङो हंसी आती थी। एक बार स्टेज पर एक कार्यक्रम के दौरान मैंने इस मसले पर व्यंग्य किया। हर शाम अब्बू का फोन आता।

वह सिर्फ पढ़ाई के बारे में बात करते और अपनी शर्ते याद दिलाते। सादिया भी एक आज्ञाकारी बेटी की तरह उनकी हां में हां मिलाती रहतीं। कभी हिम्मत नहीं हुई कि वह उनसे अपने मन की बात कह सकें। मगर यूनिवर्सिटी के अंदर वह खुद को आजाद महसूस कर रही थीं। मुल्क में धर्म के नाम पर महिलाओं पर लगी पाबंदियों पर पहली बार उन्हें जुबान खोलने का मौका मिला। सीधे सरकार या संस्था पर सवाल उठाने की आजादी नहीं थी, इसलिए वह व्यंग्य के जरिये अपनी बात कहने लगीं। कॉलेज के दोस्तों को उनका अंदाज पसंद आने लगा। सब तरफ उनकी चर्चा होने लगी

। कई बार उन्होंने स्टेज पर खड़े होकर महिलाओं पर लगी पाबंदियों का मजाक उड़ाया। कॉमेडी के जरिये वह ऐसे मसलों पर अपनी राय जाहिर करने लगीं, जिनके बारे में पहले कभी किसी की मुंह खोलने की हिम्मत नहीं हुई। सादिया बताती हैं- हमारे मुल्क में कभी किसी लड़की ने स्टेज पर खड़े होकर हास्य-व्यंग्य की बातें नहीं कीं। मैंने पहली बार यह दुस्साहस किया। मेरी बातें लोगों के दिलों तक पहुंचने लगीं।धीरे-धीरे शोहरत बढ़ने लगी। कॉलेज के बाहर भी शो होने लगे। वह देश की पहली महिला स्टैंड-अप कॉमेडियन बन गईं।
नेशनल टीवी ने उनके शो का लाइव प्रसारण किया गया। सादिया बताती हैं, हमारे मुल्क में तो लड़कियों को सपने देखने की भी इजाजत नहीं है। जब मैंने कॉमेडी शो करने शुरू किए, तो मुङो हर पल यही खौफ रहता कि कहीं घरवालों को इसकी भनक न लग जाए या कट्टरपंथी जमातें खफा न हो जाएं। उनकी कॉमेडी सिर्फ लोगों को हंसाने के लिए नहीं थी। इसका मकसद था, महिला-विरोधी मानसिकता पर चोट करना। इस पहल के लिए उन्हें ओस्लो फ्रीडम फोरम अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

 कई बार देश से बाहर भी शो करने का मौका मिला। ऑस्ट्रेलिया के एक अखबार ने उनका इंटरव्यू किया। इससे घरवालों को पता चल गया कि सादिया कॉमेडियन बन गई हैं। पहले वे नाराज हुए, पर बाद में उन्हें यकीन हो गया कि बेटी सही रास्ते पर चल रही है।

मुल्क में लड़कियों पर बहुत सारी पाबंदियां थीं। मैं हास्य-व्यंग्य के जरिये कट्टरपंथियों पर हमले करने लगी। मगर मुङो हमेशा इस बात का खौफ रहता था कि कहीं घरवालों को इसकी भनक न लग जाए। खुशनसीब हूं कि तमाम लोगों ने मेरा साथ दिया।
सादिया मारूफ
इंडोनेशियाई कॉमेडियन
वाया – हिंदुस्तान

NIKKI HALEY BIOGRAPHY IN HINDI

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निक्की हेली
(यूएन में अमेरिकी राजदूत)
 
 
मेरे माता-पिता भारत से अमेरिका आए थे।
 वे सिख हैं। बचपन में हम गुरुद्वारे जाया करते थे। 
ये बातें हमने कभी नहीं छिपाईं।
 भारत से रिश्ता होना मेरे लिए गर्व की बात है। 
मैंने हमेशा प्रवासियों के हक की आवाज उठाई।
 आगे भी मैं इन मुद्दों पर काम करूंगी।
निक्की के माता-पिता पंजाब के रहने वाले थे। उनका परिवार अमृतसर शहर में रहता था। पिता अजित सिंह रंधावा पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। पीएचडी करने के लिए उन्होंने कई विदेशी यूनिवर्सिटी में आवेदन किए। उनका सपना पूरा हुआ। ब्रिटिश यूनिवर्सिटी ऑफ कोलंबिया से स्कॉलरशिप मिल गई और वह पत्नी राजकौर के संग कनाडा चले गए। 1969 में अमेरिका की साउथ कैरोलिना में प्रोफेसर की नौकरी मिल गई। दो साल बाद उनके घर बेटी पैदा हुई। सब उसे प्यार से निक्की बुलाने लगे, जबकि स्कूल में उनका नाम नम्रता रंधावा था। वे साउथ कैरोलिना के बैमबर्ग शहर में रहते थे। पड़ोस में ज्यादातर लोग ईसाई धर्म को मानने वाले थे।
हर रविवार को नन्ही निक्की मम्मी-पापा के संग गुरुद्वारे जाया करती थीं। स्कूल के दिनों से ही उन्हें नस्ली भेदभाव का एहसास होने लगा। तब वह पांच साल की थीं। स्कूल में बच्चों की फैशन प्रतियोगिता हुई। बच्चों को सुंदर ड्रेस के साथ मंच पर कैटवॉक करना था। निक्की और उनकी छोटी बहन सिमरन ने भी इसमें हिस्सा लिया। मां ने दोनों बेटियों को बड़ी शिद्दत से तैयार किया। उन्हें कैटवॉक करने और बोलने का अभ्यास भी कराया। नियम के मुताबिक, प्रतियोगिता में एक श्वेत और एक अश्वेत लड़की को मिस लिटिल बैमबर्ग का खिताब मिलना था। मगर जज ने निक्की की दावेदारी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह लड़की तो न तो श्वेत है और न अश्वेत। नन्ही निक्की सुबकते हुए लौट आईं। वह नहीं समझ पाईं कि ऐसा क्यों हुआ?
 यही नहीं, स्कूल में साथी बच्चों की छेड़छाड़ से बचने के लिए उनके छोटे भाई को अपने केश कटवाने पड़े। हालांकि उनके परिवार ने इन बातों को कभी अपने बच्चों के मन पर हावी नहीं होने दिया। मां ने बच्चों को भारतीय परंपराओं के साथ-साथ अमेरिकी रिवाज में ढालने की कोशिश की, ताकि वे बाकी बच्चों के संग आसानी से सामंजस्य बिठा सकें। निक्कीबताती हैं, बचपन में हम गुरुद्वारे जाया करते थे। बाद में हम चर्च भी जाने लगे। हम सिख हैं,यह बात हमने कभी किसी से नहीं छिपाई। बल्कि यह तो मेरे लिए गर्व की बात रही है।
उनकी मां ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की थी। अमेरिका जाने के बाद उन्होंने शिक्षाशास्त्र में मास्टर डिग्री हासिल की और साउथ कैरोलिना के एक पब्लिक स्कूल में पढ़ाने लगीं। पढ़ाई के अलावा उन्हें फैशन डिजाइनिंग में भी दिलचस्पी थी। इसी क्षेत्र में कुछ नया करने के इरादे से उन्होंने 1976 में लेडीज कपड़ों की एक दुकान खोली। दुकान चल पड़ी। शुरुआत में यह एक छोटी-सी बुटीक थे, 1980 में यह इग्जोटिका इंटरनेशनल ब्रांड बन गई। स्कूल के बाद जब भी निक्की को मौका मिलता, वह मां की बुटीक में पहुंच जातीं उनकी मदद करने। जल्द ही वह ग्राहकों से बात करना और मोलभाव करना सीख गईं। मां ने उन्हें अकाउंट की जिम्मेदारी दे दी।
 इस बीच निक्की ने क्लेमसन यूनिवर्सिटी से अकांउटिंग में स्नातक डिग्री हासिल की। एक वेस्ट मैनेजमेंट कंपनी में नौकरी मिली, पर यहां मन नहीं लगा। वर्ष 1994 में वह मां की कंपनी में चीफ फाइनेंस ऑफिसर बनीं। मां के अनुभव और बेटी के नए नजरिये ने बिजनेस को नई बुलंदियों तक पहुंचाया। वर्ष 1996 में उनकी मुलाकात माइकल हेली से हुई, जो उस समय आर्मी नेशनल गार्ड में अफसर थे। दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई। बाद में यह दोस्ती प्यार में बदल गई। वे एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करते थे। उन्होंने सिख और ईसाई धर्म के रीति-रिवाज के मुताबिक शादी की। शादी समारोह दो बार हुआ, पहले गुरुद्वारे में और फिर चर्च में। इसके बाद नम्रता रंधावा निक्की हेली के नाम से मशहूर हो गईं। उनके दो बच्चे हैं- रेना और नलिन। बतौर बिजनेस वुमेन निक्की ने खूब शोहरत बटोरी। उनकी कामयाबी महिलाओं के लिए मिसाल बनी।
उद्यमियों की समस्याओं खासकर टैक्स कम करवाने के लिए उन्होंने कड़ा संघर्ष किया। वर्ष 1998 में उन्हें ऑरेंजबर्ग काउंटी के चैंबर ऑफ कॉमर्स के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में शामिल किया गया। साल 2003 में वह नेशनल एसोसिएशन ऑफ वुमेन बिजनेस ऑनर्स की कोषाध्यक्ष बनीं। बाद में साउथ कैरोलिना चेप्टर के महिला बिजनेस एसोसिएशन की अध्यक्ष बनीं। अब वह पूरे प्रांत में लोकप्रिय हो चुकी थीं। 2004 में रिपब्लिकन पार्टी की ओर से उन्होंने साउथ कैरोलिना हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव का चुनाव लड़ा। वर्ष 2010 में वह इस राज्य की पहली भारतीय-अमेरिकी महिला गवर्नर बनीं। साल 2014 में वह फिर गवर्नर चुनी गईं। पिछले सप्ताह अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें संयुक्त राष्ट्र में राजदूत नियुक्त करने का एलान किया।
 इतिहास में पहली बार किसी भारतीय-अमेरिकी महिला को यह जिम्मेदारी मिली है। निक्की कहती हैं, अमेरिका में बड़ा बदलाव हो रहा है। ट्रंप चाहते हैं कि मौजूदा माहौल में मैं संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका का नजरिया पेश करूं। खुशी है कि मुङो इस जिम्मेदारी के काबिल माना गया। ट्रंप ने निक्की की तारीफ करते हुए उन्हें बेहतरीन नेता बताया।
साभार – हिंदुस्तान अख़बार

AZIM PREMJI BIOGRAPHY IN HINDI

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अजीम प्रेमजी

 ( चेयरमैन, विप्रो लिमिटेड )

हम हर बात के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। 
यह सोच बदलनी होगी। अगर आप समर्थ हैं। 
आपके पास दौलत है, तो समाज के लिए कुछ करिए। 
जब आपके पास पैसा और ताकत, दोनों हों,
 तब समाज के प्रति आपकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
 
उन दिनों देश में आजादी का आंदोलन चरम पर था। जनता अंग्रेजों की सत्ता से निजात पाने को बेताब थी। गलियों में ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे गूंज रहे थे। 24 जुलाई, 1945 को मुंबई के एक प्रतिष्ठित निजारी इस्माइली शिया मुस्लिम परिवार में अजीम प्रेमजी का जन्म हुआ।
उनके पिता मोहम्मद हाशिम प्रेमजी तेल और साबुन का कारोबार करते थे। बेटे का जन्म परिवार के लिए खुशियों की सौगात लेकर आया। अजीम जब दो साल के थे, तब देश आजाद हुआ। लेकिन देश विभाजन की मांग ने आजादी के जश्न को रोशन होने से पहले ही बुझा दिया। हिंदू-मुस्लिम दंगे शुरू हो गए। सांप्रदायिक नफरत और हिंसा के बीच तमाम मुस्लिम परिवार अपनी सरजमीं छोड़ पाकिस्तान रवाना होने लगे। उदारवादी विचारों वाले अजीम के पिता देश के हालात से बहुत आहत थे।विभाजन के बाद पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें पाकिस्तान आने का न्योता दिया। करीबी रिश्तेदारों की तरफ से मशवरे आए। कहा गया, हिन्दुस्तान में गैरों के बीच रहकर क्या करोगे? पाकिस्तान चले आओ, यहां अपनी कौम के लोगों के बीच जीने का मौका मिलेगा। लेकिन हाशिम ने भारत में ही रहने का फैसला किया। जिस साल अजीम का जन्म हुआ, उसी साल पिता ने महाराष्ट्र के जलगांव जिले में ‘वेस्टर्न इंडियन वेजिटेबल प्रोडक्ट्स लिमिटेड’ की स्थापना की। यह कंपनी ‘सनफ्लावर वनस्पति’ और कपड़े धोने के साबुन’ बनाती थी।

स्कूली पढ़ाई के बाद वह 12वीं कक्षा में पहुंच चुके थे। पिता चाहते थे कि कारोबार की कमान संभालने से पहले बेटा अमेरिका जाकर तालीम हासिल करे। अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी पहुंचकर अजीम को नया माहौल मिला। उन दिनों अमेरिकियों के लिए कंप्यूटर आम चीज थी, जबकि भारत में कंप्यूटर का चलन बिल्कुल न था। पहली बार उन्होंने आईटी के महत्व को जाना। सुनहरे भविष्य के सपनों के साथ वह पढ़ाई में जुट गए। परदेस में पढ़ाई पूरी करने के बाद वह स्वदेश लौटकर कुछ नया काम शुरू करना चाहते थे।

इस बीच अचानक पिताजी के इंतकाल की खबर आई। बीच में ही पढ़ाई छोड़कर अजीम घर लौट आए। वह कहते हैं, तब मैं 21 साल का था। कई लोगों ने कहा कि विदेश में पढ़ाई की है। तेल-साबुन के बिजनेस में मत पड़ो। बेहतर है कि मोटे वेतन और बढ़िया सुविधाओं वाली नौकरी कर लो। पीछे मुड़कर देखता हूं, तो लगता है कि बिजनेस संभालने का मेरा फैसला सही था। उन्होंने पिता के कारोबार की कमान थाम ली। काम करने का अंदाज ऐसा कि सब कहने लगे, बेटा तो पिता से भी ज्यादा तरक्की करेगा।

उन दिनों देश आईटी क्षेत्र में काफी पीछे था। अमेरिका से लौटे अजीम को इस क्षेत्र में बेशुमार संभावनाएं नजर आईं। उन्होंने इसी क्षेत्र में कंपनी के विस्तार का फैसला किया। सवाल उठा, भारत जैसे देश में, जहां बिजली-पानी के लिए तरसना पड़ता है, वहां भला कंप्यूटर कौन चलाएगा? पर अजीम तय कर चुके थे।

1980 में उन्होंने अपनी कंपनी का नाम बदलकर विप्रो लिमिटेड कर दिया। उनकी कंपनी अमेरिका के सेंटिनल कंप्यूटर कॉरपोरेशन के साथ मिलकर मिनी-कंप्यूटर बनाने लगी। लोगों की आशंकाएं गलत साबित हुईं। कारोबार बढ़ चला। देखते-देखते विप्रो देश की बड़ी कंपनी बन गई।

अजीम कहते हैं- यदि लोग आपके लक्ष्य पर हंस नहीं रहे हैं, तो इसका मतलब यह है कि लक्ष्य बहुत छोटे हैं। इसलिए किसी के हंसने की परवाह मत कीजिए।

अजीम भारत के धनाढ्यों में शुमार होने लगे। सन 1999 से लेकर सन 2005 तक वह भारत के सबसे धनी व्यक्ति रहे। सबसे बड़ी बात यह रही कि उन्होंने धन-दौलत के साथ सम्मान भी कमाया। अपनी कंपनी के कर्मचारियों के लिए वह दुनिया के सबसे अच्छे बॉस, तो आम लोगों के लिए सबसे अच्छे इंसान साबित हुए।

साल 2001 में ‘अजीम प्रेमजी फाउंडेशन’ की स्थापना की। इसका मकसद गरीब व बेसहारा लोगों की मदद करना है। यह फाउंडेशन कई राज्यों में सरकार के साथ मिलकर शिक्षा क्षेत्र में काम करता है। अजीम कहते हैं- हमारे देश में लाखों बच्चे स्कूल नहीं जाते। देश को आगे ले जाने के लिए शिक्षा सबसे जरूरी जरिया है।

जून, 2010 में दुनिया के दो सबसे बड़े दौलतमंद कारोबारी बिल गेट्स और वारेन बफेट ने ‘द गिविंग प्लेज’ अभियान शुरू किया। यह अभियान दुनिया के अमीर लोगों को इस बात के लिए प्रेरित करता है कि वे अपनी अकूत संपत्ति का कुछ हिस्सा परोपकार पर खर्च करें। अजीम इस अभियान में शामिल होने वाले पहले भारतीय बने।

सन 2010 में उन्होंने देश में स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए करीब दो अरब डॉलर का दान दिया। साल 2013 में उन्होंने अपनी दौलत का 25 फीसदी दान में दे दिया। अजीम कहते हैं, मुङो लगता है कि अगर ईश्वर ने हमें दौलत दी है, तो हमें दूसरों के बारे में जरूर सोचना चाहिए। ऐसा करके ही हम एक बेहतर दुनिया बना पाएंगे। टाइम मैग्जीन ने दो बार उन्हें दुनिया के शीर्ष 100 प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल किया। उन्हें पद्म भूषण व पद्म विभूषण से सम्मानित किया चुका है।प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

हम हर बात के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। यह सोच बदलनी होगी। अगर आप समर्थ हैं। आपके पास दौलत है, तो समाज के लिए कुछ करिए। जब आपके पास पैसा और ताकत, दोनों हों, तब समाज के प्रति आपकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है।

पुरस्कार और सम्मान

 
  • बिजनेस वीक द्वारा प्रेमजी को महानतम उद्यमियों में से एक कहा गया है
  • सन 2000 में मणिपाल अकादमी ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया सन
  • सन 2005 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया
  • 2006 में ‘राष्ट्रीय औद्योगिक इंजीनियरिंग संस्थान, मुंबई, द्वारा उन्हें लक्ष्य बिज़नेस विजनरी से सम्मानित किया गया
  • 2009 में उन्हें कनेक्टिकट स्थित मिडलटाउन के वेस्लेयान विश्वविद्यलाय द्वारा उनके उत्कृष्ट लोकोपकारी कार्यों के लिए डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया
  • सन 2011 में उन्हें भारत सरकार द्वारा देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया
  • सन 2013 में उन्हें ‘इकनोमिक टाइम्स अचीवमेंट अवार्ड’ दिया गया
  • सन 2015 में मैसोर विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया
निजी जीवनअजीम प्रेमजी का विवाह यास्मीन के साथ हुआ और दंपत्ति के दो पुत्र हैं – रिषद और तारिक। रिषद वर्तमान में विप्रो के आई.टी. बिज़नेस के ‘मुख्य रणनीति अधिकारी’ हैं।

टाइम लाइन (जीवन घटनाक्रम)

1945: 24 जुलाई को अजीम रेमजी का जन्म मुंबई में हुआ

1966: अपने पिता की मृत्यु के बाद अमेरिका से पढ़ाई छोड़ भारत वापस आ गए

1977: कंपनी का नाम बदलकर ‘विप्रो प्रोडक्ट्स लिमिटेड’ कर दिया गया

1980: विप्रो का आई.टी. क्षेत्र में प्रवेश

1982: कंपनी का नाम ‘विप्रो प्रोडक्ट्स लिमिटेड’ से बदलकर ‘विप्रो लिमिटेड’ कर दिया गया

1999-2005: सबसे धनी भारतीय रहे

2001: उन्होंने ‘अजीम प्रेमजी फाउंडेशन’ की स्थापना की

2004: टाइम मैगज़ीन द्वारा दुनिया के टॉप 100 प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल किया

2010: एशियावीक के विश्व के 20 सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों की सूचि में नाम

2011: टाइम मैगज़ीन द्वारा दुनिया के टॉप 100 प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल किया

2013: प्रेमजी ने अपने धन का 25 प्रतिशत भाग दान कर दिया और अतिरिक्त 25 प्रतिशत अगले पांच सालों में दान करने की भी घोषणा की

साभार – हिंदुस्तान अख़बार

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BOB DYLAN BIOGRAPHY IN HINDI

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बॉब डिलन

( नोबेल पुरस्कार विजेता )

 
ज्यादातर लोग वे बातें करते हैं, जिन पर उनका यकीन ही नहीं होता। इसलिए वे कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। दरअसल, वे अपनी सुविधा के अनुसार काम करते हैं। इससे किसी का भला नहीं होगा, न आपका और न समाज का।
अमेरिका के एक साधारण यहूदी परिवार में जन्मे बॉब के बचपन का नाम रॉबर्ट ऐलन जिमरमन था। बाद में उन्होंने अपना नाम बॉब डिलन रख लिया। पिता अबराम और मां बीट्रीस का संगीत से कोई नाता न था। अलबत्ता उनके घर में रेडियो पर गीत जरूर सुने जाते थे। नन्हे बॉब को बचपन से गीत सुनने की लत लग गई। खेल-कूद की दुनिया से दूर वह घंटों रेडियो से चिपके रहते थे। वह 1940 का दौर था। उन दिनों अमेरिकी समाज में अश्वेतों की दशा खराब थी। वे भेदभाव और दुर्भावना के शिकार थे। बॉब का बालमन कभी इसे स्वीकार नहीं कर पाया।
स्कूल के दिनों में उन्होंने दोस्तों के संग मिलकर एक म्यूजिक बैंड बनाया। गीतों के जरिये वह मन की बातें बयान करने लगे। तब बॉब डिलन दसवीं में थे। स्कूल में म्यूजिक टैलेंट शो हुआ। उन्होंने तैयारी की, पर ऑडिशन में रिजेक्ट हो गए। दुख हुआ, पर इससे संगीत के प्रति उनकी दीवानगी कम नहीं हुई। साल 1959 में मिनीसोटा यूनिवर्सिटी में पढ़ने पहुंचे। यहां उनके विचारों को नया आसमान मिला। बड़ी खूबसूरती से उन्होंने अपने विचारों को गीतों में ढाला। शुरुआती दिनों में बॉब कॉलेज के पास एक कॉफी हाउस में गाया करते थे। सुनने वालों के लिए हमेशा यह कौतुहल रहा कि मासूम-सी सूरत वाला यह युवा प्रेम गाने की बजाय विद्रोही विचारों को स्वर क्यों दे रहा है?
 1961 में कॉलेज की पढ़ाई के बाद संगीत में करियर बनाने के इरादे से वह न्यूयॉर्क पहुंचे। यहां एक म्यूजिक क्लब में काम मिला। 1961 में पहला म्यूजिक एलबम आया। बॉब बाकी गायकों की तरह दूसरों के लिखे गीत नहीं, बल्कि अपने गीत गाते थे। उनके गीतों में हमेशा एक खास किस्म का अक्खड़पन रहा। इसी अंदाज में वह आम लोगों के दुख-दर्द बयां करने लगे। उनके गीतों में राजनीतिक, सामाजिक, दार्शनिक और साहित्यिक विधा का खूबसूरत मेल दिखा। गीत लिखने के अलावा वह पेंटिंग के भी शौकीन रहे। बॉब के ज्यादातर मशहूर गीत 1960 के दशक में लिखे गए।
यह वह दौर था, जब अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नेतृत्व में अश्वेत आंदोलन चरम पर था। अश्वेत समुदाय के लोग नागरिक अधिकारों की मांग को लेकर सड़कों पर थे। बॉब के गीतों में इस आक्रोश को आवाज मिली। वह मार्टिन लूथर किंग के विचारों के कायल थे। कहते हैं कि लूथर किंग के ऐतिहासिक भाषण आई हैव अ ड्रीम के दौरान वह उनके साथ मंच पर मौजूद थे। यही वह दौर था, जब श्वेत नागरिक भी वियतनाम में अमेरिकी दखल के खिलाफ उठ खड़े हुए थे। बॉब ने इस जन-असंतोष को अपने गीतों में बड़ी संजीदगी के साथ पेश किया। कुछ लोग उन्हें विद्रोही गीतकार भी कहते हैं। लोक संगीत से लेकर पॉप व रॉक ऐंड रोल गीतों में उन्होंने हालात और समय के मिजाज को व्यक्त किया। उनके गीत ब्लोइंग इन द विंड और द टाइम्स दे आर अ चेंजिंग उस दौर के आंदोलनों के नारे बन गए। जब भी मौका मिला, उन्होंने सामाजिक असमानता के प्रति नाराजगी जाहिर की।
बॉब कहते हैं, समानता सिर्फ लोगों की बातों में दिखती है। हम सबमें बस एक ही समानता है कि हम सबको मरना है। बाकी सब असमान है। अमेरिकी अवाम के लिए वह सिर्फ गायक कभी नहीं रहे। उनका संगीतमय सफर अपने आप में एक आंदोलन रहा। उनकी कविताओं और गीतों में व्यवस्था बदलने की बेचैनी दिखी, तो प्रशासन को चुनौती देने का साहस भी नजर आया। दासता के खिलाफ वह हमेशा मुखर रहे। बॉब कहते हैं, कोई आजाद नहीं है। यहां तक कि परिंदे भी आसमान की जंजीरों में जकड़े हैं। पिछले साठ साल में उन्होंने शोहरत की बुलंदियों को छुआ। वह दुनिया में सबसे अधिक बिकने वाले गीतकारों में शुमार हैं। सबसे बड़ा सम्मान तो यह है कि दुनिया ने उन्हें आम जनता का गीतकार माना।
 सबसे ज्यादा शोहरत मिली 1965 में, जब उनके छह मिनट के गीत लाइक अ रोलिंग स्टोन ने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। उनकी कविताओं में ऐसा जादू था, जिसे सुनकर पॉप संगीत पर थिरकने वाले युवा लोक गीतों के दीवाने हो गए। बॉब ने दुनिया का पहला प्रेम-विरोधी गीत इट एंट मी बेब लिखा। इसे पूरी दुनिया ने सराहा। उनके गीत विजन्स ऑफ जोआना को दुनिया का सबसे महान गीत कहा गया। संगीत के इस लंबे सफर में उन्होंने खुद को सुर्खियों से दूर रखने की पूरी कोशिश की। बॉब कहते हैं, सुर्खियां एक तरह से बोझ हैं, इसलिए मैं खुद को इससे दूर रखता हूं।
 आसमान छूती बुलंदियों और शोहरत के बीच बॉब ने हमेशा सत्ता से दूरी बनाए रखी। वह कभी सत्ता के दबाव में नहीं आए। वह हमेशा बड़े लोगों के करीब आने से बचते रहे। राष्ट्रपति बराक ओबामा एक किस्सा बताते हैं- एक बार मैं बॉब के शो में गया। वह अपना कार्यक्रम देकर मंच से उतरे, दर्शकों के बीच बैठे, मुझसे हाथ मिलाया और बाहर चले गए। उन्होंने मेरे साथ बैठने या फोटो खिंचवाने की जरूरत नहीं समझी। मुङो उनका यह अंदाज अच्छा लगा। इस साल बॉब को साहित्य के नोबेल के लिए चुना गया है। वह एकमात्र ऐसे शख्स हैं, जिन्हें ऑस्कर, नोबेल और ग्रैमी, तीनों अवॉर्ड से नवाजा गया है।
साभार – हिंदुस्तान अख़बार

Jitne Wala Hi Nahi-Nice Saying Images

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जितने वाला ही नहीं बल्कि कहाँ हारना है

ये जानने वाला भी “सिकंदर ” होता है 

Wo Dost Meri Najaro Me Bahut Mayne Rakhte Hai-Nice Saying Images

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वो “दोस्त “मेरी नजरों में बहुत मायने रखते है 

वक्त आने पर सामने जो मेरे आईना रखते है 

Sab Kuch Mil Jaye To Jine Ka Kya Maza Hai-Nice Saying Image

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सब कुछ मिल जाये 

तो जीने क्या मजा 

जीने के लिए एक कमी भी जरुरी है

Mujhe Itna Bhi Niche Mat Girao-Nice Saying Images

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मुझे इतना निचे भी मत गिराना 

हे इश्वर !

की मै पुकारू और तू सुन न पाए 

और इतना ऊँचा भी मत उठाना 

की तू पुकारे और मै सुन न पाऊ

Juba Bhi na Bole To Koi Mushkil Nahi-Nice Saying Image

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जुबाँ न भी बोले तो मुश्किल नहीं

फ़िक्र तब होती है

जब ख़ामोशी भी बोलना छोड़  दे 

Duniya ki Har Chij Thokar Lagne se Tut Jaya Karti Hai-Nice Saying Images

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दुनिया की हर चीज

ठोकर लगने से टूट जाया करती है दोस्तों …..

एक कामयाबी ही है

जो ठोकर खाकर ही मिलती है 

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