वी के मूर्ति -दादा साहेब फाल्के से सम्मानित प्रथम सिनेमैटोग्राफर

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आज हम आपको एक ऐसे शख्सियत के बारे मैं बताने जा रहे हैं जिन्होंने पर्दे के पीछे से ही वो चमत्कार कर दिखाया जो शायद किसी और से संभव नहीं था। गुरुदत्त को हिंदी सिनेमा के मशहूर फिल्मकार और ट्रैजिक नायक बनाने में उनका महत्वपूर्ण हाथ है। लेकिन उनका यह मानना है की यदि गुरु दत्त के साथ उन्हें काम करने का मौका नहीं मिला होता तो वह कभी भी कैमरे के जादूगर नहीं बन पाते । हम बात कर रहे हैं सिनेमा के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के से सम्मानित पहले सिनेमैटोग्राफर वी के मूर्ति के बारे में जिन्हें इस अवार्ड से जब नवाजा गया तो उसे गुरुदत्त को समर्पित कर दिया। वह गांधीजी से काफी प्रभावित थे और अपने जवानी के दिनों में आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया और जेल भी गए । तो चलिए जानते हैं इनके बारे में –

Biography of V K Murthy

जन्म तथा बचपन

वी के मूर्ति यानी वेंकटरामा पंडित कृष्णमूर्ति का जन्म 26 नवंबर 1923 को मैसूर,कर्नाटक में हुआ था। जीवन के शुरुआती दिनों में इन्हें काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा । क्योंकि बचपन में ही इनके माता-पिता का देहांत हो गया था । वे बताते हैं कि – संगीत उनका पहला प्यार था और उसी ने मुझे जीवन जीने की ताकत दी । संगीत में उनकी इतनी रुचि थी कि वे अपने रास्ते से डगमगाए नहीं। उन्होंने सबसे पहले वायलिन सिखा और गणपति समारोह में वायलिन बजाकर और बच्चों को वायलिन सिखा कर अपना पेट भरना शुरू कर दिया।

हीरो बनने आये थे मुम्बई

आपको जानकर यह हैरानी होगी कि शुरुआती दिनों में वीके मूर्ति न तो संगीतकार बनना चाहते थे और ना ही सिनेमैटोग्राफर। वे हीरो बनने के लिए मुंबई आए थे। अपने एक रिश्तेदार के घर में रहकर हाफ पेंट में ही मुंबई के स्टूडियो का चक्कर लगाना शुरू कर दिए थे। क्योंकि वह हिंदी नहीं जानते थे इसलिए उनको वहां काम नहीं मिला और वे पढ़ाई पूरी करने के लिए वापस बेंगलुरु लौट आए।

शिक्षा

उन्होंने सबसे पहले स्कूल की पढ़ाई खत्म की और उसके बाद सिनेमैटोग्राफी का कोर्स भी किया। उन्होंने विश्वेश्वरैया द्वारा स्थापित बेंगलुरु इंस्टिट्यूट से सिनेमैटोग्राफी की शिक्षा ली और इसमें डिप्लोमा किया ।

फिल्मी सफर

काफी संघर्ष के बाद 1946 में उन्हें जयंत देसाई की फिल्म महाराणा प्रताप में द्रोणाचार्य के सहायक के रूप में सिनेमैटोग्राफर का काम मिला । इसके बाद उन्होंने चार पांच साल तक फाली मिस्त्री के साथ काम किया। एक स्वतंत्र कैमरामैन के रूप में वीके मूर्ति की पहली फिल्म जाल थी जो 1952 में गुरु दत्त के साथ फिल्माई गई थी।

गुरुदत्त से मुलाकात

उनकी जिंदगी गुरुदत्त से मिलने के बाद बिल्कुल ही बदल गई । गुरुदत्त से उनकी पहली मुलाकात बाजी की दौरान हुई थी। उन्होंने सहायक सिनेमैटोग्राफर के तौर पर एक कठिन शार्ट का सुझाव गुरुदत्त को दिया था । जिसको उनका कैमरामैन नहीं कर सका । उसके बाद उन्होंने गुरुदत्त से इस शॉट को शूट करने का आग्रह किया जिसे गुरुदत्त ने मान लिया। इस शॉट को वीके मूर्ति ने बहुत ही खूबसूरती से पूरा किया जिससे गुरुदत्त इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने साथ काम करने का उन्हें ऑफर दे दिया। इसके बाद उन दोनों की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई हिट फिल्में दिए। जिनमें वीके मूर्ति ने एक जादूगर की तरह कैमरे का प्रयोग किया।

कैमरे के जादूगर

कहा यह जाता है कि उनके कैमरे में यह जादू था कि वह मुस्कुराते होठों की उदासी, आंखों के काले घेरे की स्याह नमी , गुलाब सर्दियों की गुनगुनाती गर्माहट और किताबों में छुपी चिट्ठियों से उठती प्रेम की खुशबू आदि सब कुछ कैद कर सकते थे। वीके मूर्ति और गुरुदत्त की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कागज के फूल, प्यासा ,चौदहवीं का चांद, सीआईडी, साहिब बीवी गुलाम ,आर पार ,जिद्दी जैसी अनेक अनमोल फिल्में दी जो हिंदी सिनेमा के लिए मील का पत्थर साबित हुई। जब तक गुरुदत्त जिंदा रहे उन्होंने किसी अन्य डायरेक्टर के साथ काम नहीं किया।

पुरस्कार

वी के मूर्ति का कागज के फूल मूवी का एक गाना ‘वक्त ने किया है क्या हंसी सितम’ को फिल्माते हुए बीम शॉट(beam Shot) को को काफी क्लासिकल माना जाता है । जिसे उन्होंने साधारण दर्पण की एक जोड़ी का उपयोग करते हुए सूट किया था । कागज के फूल और साहिब बीवी और गुलाम में उन्होंने प्रकाश का इस तरह से प्रयोग किया था जैसे लग रहा था की प्रकाश और छाया कहानी का ही हिस्सा है । इन दोनों फिल्मों ने 1959 और 1962 में मूर्ति को सर्वश्रेष्ठ सिनेमैटोग्राफर का फिल्म फेयर पुरस्कार दिलवाया । वर्ष 2005 में इन्हें आईफा लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से भी सम्मानित किया गया।

दादा साहेब फाल्के पुरस्कार

वीके मूर्ति ने दूरदर्शन के लिए एक टेली धारावाहिक भारत की एक खोज जिसके निर्माता श्याम बेनेगल थे में प्रमुख छायाकार के रूप में काम किया । वी के मूर्ति प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार के लिए चुने जाने वाले पहले सिनेमैटोग्राफर थे । जो उन्हें उस समय की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल द्वारा 2008 में प्रदान किया गया।

निधन

7 अप्रैल 2014 को 91 वर्ष की उम्र में बेंगलुरु के शंकर पुरम आवास पर उनका निधन हो गया । उन्हें उम्र संबंधी परेशानियां थी । भारतीय सिनेमा के विकास में वी के मूर्ति का महत्वपूर्ण योगदान है

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