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Thursday, March 19, 2026
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NICE SAYING (PAGE-7 )

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अच्छी बातें  (NICE THOUGHT)

PAGE -7

तलाश सिर्फ सुकून कि होती हैं ..
नाम रिश्ते का चाहे जो भी हो ..!!

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यहाँ मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता है..
कई झूठे इकट्ठे हों तो सच्चा टूट जाता है..
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हमारे दोस्तों में कोई दुश्मन हो भी सकता है..
ये अँग्रेज़ी दवाएँ है, रिएक्शन हो भी सकता है..
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लोग रोने के लिये कंधा नही देते
मरने तक इंतजार करते है…
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रोता वही है जिसने महसूस किया हो सच्चे रिश्ते को..
वरना मतलब के रिश्तें रखने वाले को तो कोई भी नही रूला सकता..
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खामोशियां ही बेहतर है
शब्दों से लोग रूठते बहुत है।
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दिल की बातें तो आखों से होती हैं,
अल्फाजों से तो अक्सर झगड़ा होता है..
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कलम में जोर जितना है जुदाई की बदौलत है…
मिलने के बाद लिखने वाले लिखना छोड़ देते है…
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अजीब दस्तूर है ज़माने का,
अच्छी यादें पेनड्राइव में और बुरी यादें दिल में रखते है!!!!
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न पूरी तरह से क़ाबिल, न पूरी तरह से पूरा है,
हर एक शख्स कहीं न कही से अधूरा है…!!
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फासलों का एहसास तब हुआ..
जब मैंने कहा हम ठीक हैं…
और उन्होंने मान लिया.!!
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कभी साथ है तो कभी खिलाफ है…
वक्त का भी आदमी जैसा हाल है!
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ऐ मुसीबत मेरे पास सोच समजकर आना,,
मेरी माँ की दुवा कही तेरे लिए मुसीबत ना बन जाए…
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अगर बनना है तो उस तालाब की तरह बनो..!
जहाँ शेर भी पानी पिता है और बकरी भी…
“मगर सर झुका के….! ”
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हर धड़कते पत्थर को, लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती है, दिल को दिल बनाने में…
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शायरी वही जिसे पढ़ कर दिल को यूँ लगे कि,
अरे हाँ यही बात तो मैं कहना चाहता था !!
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ऐ मौसम तू चाहे कितना भी बदल जा पर तुझे
इंसानो की तरह बदलने का हुनर आज भी नहीं आता ..
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दोस्तों की गालियों में ही उनका प्यार छुपा होता है…
वरना प्यार से बात तो अनजान भी करते हैं…
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होने वाले “खुद” ही “अपने” हो जाते हैं,
किसी को “कह कर” “अपना” बनाया नहीं जाता..
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झुठे हैं वो जो कहते हैं हम सब मिट्टी से बने हैं
मैं कई अपनों से वाकीफ हूं जो पत्थर के बने हैं!
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हसरतेँ पुरी ना हो तो ना सहीँ,
ख्वाब देखना तो कोई गुनाह नही ।
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जब कभी टूट कर बिखरो तो बताना हमको,
हम तुम्हें रेत के जर्रों से भी चुन सकते हैं…!!!
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जिंदगी में बेशक हर मौके का जरुर फायदा उठाओ,
मगर किसी के हालात और मजबूरी का नहीं !!
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मुस्कुराहट एक कमाल की “पहेली” है,,,,,
जितना बताती है, उससे कहीं ज्यादा छुपाती हैं..!!
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तुझे तराश तराश कर हीरा बना दिया मैंने . .
अब मुझसे ही तेरी कीमत अदा नहीं होती ..
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इतनी चाहत तो लाखो रुपये पाने की भी नही होती..
जितनी बच्चों को देखकर बचपन में जाने की होती हैं..।।
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उम्र भर तैयार है,,,हम मुस्कुराने काे..
बस शर्त ये है कि,,,तुम साथ मुस्कराना….!!
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शोहरत……बेशक चुपचाप गुजर जाये…
कमबख्त….. बदनामी बड़ा शोर करती है..
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इंकार जैसी लज़्जत…
इक़रार में कहां…
ना.. ना.. में छुपी हो जब मोहब्बत…
फिर  हाँ.. हाँ..  मे  वो बात कहाँ….
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काश दर्द के भी पैर होते।
थक के रुक तो जाते कंही।
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सही वक़्त पर पिए गए “कड़वे घूंट”
अक़्सर ज़िन्दगी “मीठी” कर दिया करते है।
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निकाल कर जिस्म से…अपनी जान दे देता है..
बडा ही मजबूत है…वो पिता…जो कन्यादान देता है…
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कागज़ के नोटों से आखिर किस किस को खरीदोगे,
किस्मत परखने के लिए यहाँ आज भी,
सिक्का हीं उछाला जाता है
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मुझे उसकी ये मासुम अदा बहुत भाती है……
नाराज मुझ से होती है और गुस्सा सबको दिखाती है…..
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सर पर जो हाथ फेरे तो हिम्मत मिल जाये,
माँ एक बार मुस्कुरा दे तो जन्नत मिल जाये !
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जब अल्फ़ाज़ पन्नों पे शोर करने लगें…
समझ लेना सन्नाटे बढ़ गये हैं दिल मे !
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हम तो फूलों की तरह अपनी आदत से बेबस हैं
तोड़ने वाले को भी खुशबू की सजा देते है …
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“मतलब” का वजन बहुत ज्यादा होता है,
तभी तो “मतलब” निकलते ही रिश्ते हल्के हो जाते है.
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Thanks for reading

HIMMAT AUR JINDAGI-RAMDHARI SINGH DINKAR

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हिम्मत और ज़िन्दगी (कहानी )

रामधारी सिंह दिनकर 

 
ज़िन्दगी के असली मज़े उनके लिए नही हैं जो फूलों की छाँव में सोते हैं. बल्कि फूलों की छाँव के नीचे अगर जीवन का कोई स्वाद छिपा है तो वह भी उन्ही के लिए है जो दूर रेगिस्तान से आ रहे हैं जिनका कंठ सूखा हुआ, होंठ फटे हुए और सारा बदन पसीने से तर है. पानी में जो अमृत वाला तत्व है, उसे वह जानता है जो धूप में खूब सूख चूका है, वह नही जो रेगिस्तान में कभी पड़ा ही नहीं है.
सुख देने वाली चीज़ें पहले भी थीं और अब भी हैं. फर्क यह है कि जो सुखों का मूल्य पहले चुकाते हैं और उनके मज़े बाद में लेते हैं उन्हें स्वाद अधिक मिलता है. जिन्हें आराम आसानी से मिल जाता है, उनके लिए आराम ही मौत है.
जो लोग पाँव भीगने के खौफ से पानी से बचते रहते हैं, समुन्द्र में डूब जाने का ख़तरा उन्ही के लिए है. लहरों में तैरने का जिन्हे अभ्यास है वो मोती ले कर बाहर आयेँगे.
चाँदनी की ताज़गी और शीतलता का आनंद वह मनुष्य लेता है जो दिनभर धूप में थक कर लौटा है, जिसके शरीर को अब तरलाई की ज़रुरत महसूस होती है और जिसका मन यह जानकार संतुष्ट है कि दिन भर का समय उसने किसी अच्छे काम में लगाया है.
इसके विपरीत वह आदमी भी है जो दिन भर खिड़कियाँ बंद करके पंखों के नीचे छिपा हुआ था और अब रात में उसकी सेज बाहर चाँदनी में लगायी गयी है. भ्रम तो शायद उसे भी होता होगा कि वह चाँदनी के मज़े ले रहा है, लेकिन सच पूछिये तो वह खुशबूदार फूलों के रस में रात दिन सड़ रहा है.
 उपवास और संयम ये आत्महत्या के साधन नही हैं. भोजन का असली स्वाद उसी को मिलता है जो कुछ दिन बिना खाए भी रह सकता है. ‘त्यक्तेन भुंजीथाः’, जीवन का भोग त्याग से करो, ये केवल परमार्थ का उपदेश नही है, क्योंकि सयम से भोग करने पर जीवन से जो आनद प्राप्त होता है, वह नीरा भोगी बनकर भोगने से नही मिल पाता।
बड़ी चीज़ें बड़े संकटों में विकास पाती हैं, बड़ी हस्तियां बड़ी मुसीबतों में पलकर दुनिया पर कब्ज़ा करती हैं. अकबर ने तेरह साल की उम्र में अपने बाप के दुश्मन को परास्त कर दिया था जिसका एक मात्र कारण यह था कि अकबर का जन्म रेगिस्तान में हुआ था, और वह भी उस समय, जब उसके बाप के पास एक कस्तूरी को छोड़ के और कोई दौलत नही थी .
महाभारत में देश के प्रायः अधिकाँश वीर कौरवों के पक्ष में थे. मगर फिर भी जीत पांडवों की हुई; क्योंकि उन्होंने लाक्षागृह की मुसीबत झेली थी, क्योंकि उन्होंने वनवास के जोखिम को पार किया था.
श्री विंस्टन चर्चिल ने कहा है कि ज़िन्दगी कि सबसे बड़ी सिफ़्फ़त हिम्मत है. आदमी के और सारे गुण उसके हिम्मती होने से ही पैदा होते हैं.
 ज़िन्दगी की दो सूरते हैं. एक तो यह की आदमी बड़े से बड़े मकसद के लिए कोशिश करे, जगमगाती हुई जीत पर पंजा डालने के लिए हाथ बढ़ाये, और अगर असफलताएं कदम – कदम पर जोश की रौशनी के साथ अंधियाली का जाल बुन रही हों, तब भी वह पीछे को पाँव न हटाये।
दूसरी सूरत यह है कि उन गरीब आत्माओं का हमजोली बन जाए जो न तो बहुत अधिक सुख पाती हैं और न ही जिन्हे बहुत अधिक दुःख पाने का ही संयोग है, क्योंकि वे आत्माएं ऐसी गोधूलि में बसती हैं जहां न तो जीत हंसती है और न ही कभी हार के रोने की आवाज़ सुनाई पड़ती है. इस गोधूलि वाली दुनिया के लोग बंधे हुए घाट का पानी पीते हैं, वे ज़िन्दगी के साथ जुआ नही खेल सकते। और कौन कहता है कि पूरी ज़िन्दगी को दांव पे लगा देने में कोई आनंद नही है?
अगर रास्ता आगे ही आगे निकल रहा है तो फिर असली मज़ा तो पाँव बढ़ाते जाने में ही है.
साहस की ज़िन्दगी सबसे बड़ी ज़िन्दगी होती है. ऐसी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी पहचान यह है कि यह बिलकुल निडर, बिलकुल बेख़ौफ़ होती है. साहसी मनुष्य की पहली पहचान यह है कि वह इस बात की चिंता नही करता कि तमाशा देखने वाले लोग उसके बारे में क्या सोच रहे हैं. जनमत की उपेक्षा करके जीने वाला आदमी दुनिया की असली ताकत होता है और मनुष्यता को प्रकाश भी उसी आदमी से मिलता है. अड़ोस – पड़ोस को देख कर चलना, यह साधारण जीव का काम है. क्रान्ति करने वाले लोग अपने उद्देश्य की तुलना न तो पडोसी के उद्देश्य से करते हैं और न ही अपनी चाल को ही पडोसी की चाल देखकर मद्धिम बनाते हैं.
 साहसी मनुष्य उन सपनोँ मेँ भी रस लेता है, जिन सपनो का कोई व्यावहारिक अर्थ नहीँ है.
साहसी मनुष्य सपने उधार नहीँ लेता, वह अपने विचारोँ में रमा हुआ अपनी ही किताब पढ़ता है.
झुण्ड मेँ चलना और झुण्ड मेँ चरना, यह भैंस और भेड़ का काम है. सिंह तो बिल्कुल अकेला होने पर भी मगन रहता है.
अर्नाल्ड बेनेट ने एक जगह लिखा है की जो आदमी यह महसूस करता है कि किसी महान निश्चय के समय वह साहस से काम नहीं ले सका, ज़िन्दगी की चुनौती को कबूल नहीं कर सका, वह सुखी नही हो सकता। बड़े मौके पर साहस नहीं दिखाने वाला आदमी बराबर अपनी आत्मा के भीतर एक आवाज़ सुनता रहता है, एक ऐसी आवाज़ जिसे वही सुन सकता है और जिसे वह रोक भी नही सकता। यह आवाज़ उसे बराबर कचोटती रहती है, “तुम साहस नही दिखा सके, तुम कायर की तरह भाग खड़े हुए.”
सांसारिक अर्थ में जिसे हम सुख कहते हैं, उसका न मिलना, फिर भी, इससे कहीं श्रेष्ठ है कि मरने के समय हम अपनी आत्मा से यह धिक्कार सुनें कि तुम में हिम्मत की कमी थी, कि तुम में साहस का अभाव था, कि तुम ठीक वक्त पर ज़िन्दगी से भाग खड़े हुए.
ज़िन्दगी को ठीक से जीना हमेशा ही जोखिम झेलना है और जो आदमी सकुशल जीने के लिए जोखिम का हर जगह पर एक घेरा डालता है, वह अंततः अपने ही घेरों के बीच कैद हो जाता है और ज़िन्दगी का कोई मज़ा उसे नहीं मिल पाता, क्योंकि जोखिम से बचने की कोशिश में, असल में, उसने ज़िन्दगी को ही आने में रोक रखा है.
ज़िन्दगी से, अंत में, हम उतना ही पाते हैं जितनी कि उसमें पूंजी लगाते हैं. यह पूंजी लगाना ज़िन्दगी के संकटों का सामना करना है, उसके उस पन्ने को उलट कर पढ़ना है जिसके सभी अक्षर फूलों से ही नहीं, कुछ अंगारों से भी लिखे गए हैं.
ज़िन्दगी का भेद कुछ उसे ही मालुम है जो यह जानकार चलता है कि ज़िन्दगी कभी भी ख़त्म न होने वाली चीज़ है.
 अरे! ओ जीवन के साधकों! अगर किनारे की मरी हुई सीपियों से ही तुम्हे संतोष हो जाये तो समुन्द्र के अंतराल में छिपे हुए मौक्तिक कोष को कौन बाहर लाएगा?
दुनिया में जितने भी मज़े बिखेरे गए हैं उनमें तुम्हारा भी हिस्सा है. वह चीज़ भी तुम्हारी हो सकती है जिसे तुम अपनी पहुँच के पार मान कर लौटे जा रहे हो.
कामना का आँचल छोटा मत करो, ज़िन्दगी के फल को दोनों हाथों से दबाकर निचोड़ो, रस की निर्झरी तुम्हारे बहाये भी बह सकती है.
यह अरण्य झुरमुट जो काटे अपनी राह बना ले,
क्रीतदास यह नहीं किसी का जो चाहे अपना ले.
जीवन उनका नहीं युधिष्ठिर! जो उससे डरते हैं.
वह उनका जो चरण रोप निर्भय होकर लड़ते हैं.

ASHA KHEMKA BIOGRAPHY IN HINDI

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बिहार से ब्रिटेन तक का सफ़र 

आशा खेमका

(नॉटिंघमशायर कॉलेज की सीईओ और प्रिंसिपल)

पंद्रह साल की उम्र में मेरी शादी हो गई। हमारे मायके में बेटियों को पढ़ाने का रिवाज नहीं था। पति डॉक्टर थे। पच्चीस साल की उम्र में उनके संग ब्रिटेन पहुंची, तो दोबारा पढ़ने का मौका मिला। टीवी देखकर अंग्रेजी सीखी और फिर कॉलेज में पढ़ाने लगी।

उन दिनों आशा 13 साल की थीं। पढ़ाई में खूब मन लगता था उनका। लेकिन एक दिन अचानक उनका स्कूल जाना बंद करवा दिया गया। कहा गया, पढ़कर क्या करोगी?

 अब तुम घर के काम-काज सीखो। शादी के बाद घर ही तो संभालना है तुम्हें। उनका परिवार संपन्न था। पिताजी का बिहार के चंपारण शहर में अपना फलता-फूलता कारोबार था। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। परिवार में सबका मानना था कि महिलाओं को घर संभालने चाहिए और मर्दो को व्यापार। इसीलिए बेटियों को पढ़ाने का रिवाज नहीं था। उन्हें बस इतना ही पढ़ाया जाता कि वे किताब पढ़ सकें और खत लिख सकें। 14-15 साल की उम्र में लड़कियों की शादी करा दी जाती थी।
बात 1966 की है। तब आशा 15 साल की थीं। अचानक एक दिन मां ने उन्हें एक सुंदर सी साड़ी थमाते हुए कहा- ‘आज तुम्हें कुछ लोग देखने आ रहे हैं। इसे पहनकर तैयार हो जाओ।’ आशा हैरान थीं। कौन आ रहा है घर में? पूछने पर पता चला कि परिवार ने उनकी शादी का फैसला किया था। वह आगे पढ़ना चाहती थीं, पर किसी ने उनकी बात नहीं सुनी। आशा चुपचाप सज-धजकर ड्राइंग रूम में बैठ गईं। लड़के वाले आए, उन्हें पसंद किया और शादी पक्की हो गई। परिवार में सब खुश थे। खासकर मां।
उन्होंने चहककर बताया- ‘तेरा होने वाला दूल्हा मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है। कुछ दिनों में वह डॉक्टर बन जाएगा और तू डॉक्टरनी।’ मगर आशा बिल्कुल खुश नहीं थीं। ससुराल जाने के ख्याल से खूब रोईं। मां ने समझाया, ‘तेरे ससुराल वाले बहुत अच्छे हैं। सुखी रहेगी तू वहां।’ मां की बात सही साबित हुई। वाकई उन्हें ससुराल में बहुत अच्छा माहौल मिला। पति को पढ़ने का बड़ा शौक था। वह चाहते थे कि उनकी पत्नी भी पढ़ी-लिखी हो। उन्होंने पत्नी को आगे पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। इस बीच आशा तीन बच्चों की मां बनीं।
आशा बताती हैं- ‘21 साल की उम्र में मैं पहले बच्चे की मां बनी। अगले तीन साल में दो और बच्चे हुए। इस तरह 24 साल में मैं तीन बच्चों की मां बन गई। एक साथ तीन छोटे बच्चों को संभालना मुश्किल था। मगर इस दौरान परिवार के लोगों ने मेरा बहुत साथ दिया।’
वर्ष 1978 में उनके पति को ब्रिटेन के एक बड़े अस्पताल में सर्जन की नौकरी मिल गई। शुरुआत में आशा विदेश जाने के ख्याल से बहुत उत्साहित नहीं थीं। मगर पति के करियर का सवाल था, इसलिए राजी हो गईं। ब्रिटेन में पति बकिंघम अस्पताल में बतौर ऑर्थोपेडिक सर्जन नौकरी करने लगे।
 तब आशा को अंग्रेजी का बिल्कुल ज्ञान नहीं था। वह अंग्रेजी का एक अक्षर भी नहीं समझती थीं। जबकि पति फर्राटेदार अंग्रेजी में बातें किया करते। जल्द ही आशा को एहसास हुआ कि ब्रिटेन में सबके साथ घुलने-मिलने के लिए अंग्रेजी सीखना जरूरी है। पति ने उन्हें अंग्रेजी के टीवी शो देखने की सलाह दी। उनके अंदर अंग्रेजी सीखने की लगन बढ़ती गई। फिर उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू करने की इच्छा जताई। हालांकि मन में हिचक थी कि पता नहीं, ब्रिटेन की पढ़ाई समझ में आएगी या नहीं? 12वीं तो वह पहले की पास कर चुकी थीं।
 कार्डिफ यूनिवर्सिटी में स्नातक में दाखिला लिया। आत्म-विश्वास बढ़ता गया। ताज्जुब की बात यह थी कि हिंदी मीडियम से पढ़ी होने के बावजूद उन्हें अंग्रेजी माध्यम के कोर्स समझने में कोई खास दिक्कत नहीं आई। परिवार के लोग उनका हौसला देखकर दंग थे।
आशा बताती हैं- ‘यह सब आसान नहीं था, पर मेरे पति ने बहुत सहयोग किया। उन्होंने न केवल मेरा उत्साह बढ़ाया, बल्कि हर कदम पर मेरी मदद भी की। उनके बिना मैं यह मुकाम कभी हासिल नहीं कर पाती।’ पढ़ाई पूरी करने के बाद आशा ऑसवेस्ट्री कॉलेज में पढ़ाने लगीं।
 अपने छात्रों के लिए वह आदर्श टीचर थीं। एक ऐसी टीचर, जो बच्चों को अतिरिक्त समय देकर उनकी मदद करने को हर पल तैयार रहती।
 वर्ष 2006 में वह वेस्ट नॉटिंघम कॉलेज की ¨प्रसिपल बनीं। यह कॉलेज इंग्लैंड के सबसे बड़े कॉलेजों में एक है। उनके नेतृत्व में कॉलेज ने कामयाबी की नई दास्तान लिखी। उनकी मेहनत की वजह से कॉलेज ब्रिटेन के सर्वाधिक प्रतिष्ठित कॉलेजों में शुमार होने लगा।
वर्ष 2008 में आशा को ‘ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर’ से सम्मानित किया गया। 2013 में उन्हें ब्रिटेन के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक ‘डेम कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर’ से सम्मानित किया गया। आशा इस सम्मान को पाने वाली दूसरी भारतीय महिला हैं। इससे पहले धार की महारानी लक्ष्मी देवी को 1931 में यह सम्मान मिला था।

आशा एक चैरिटेबल ट्रस्ट ‘द इंस्पायर ऐंड अचीव फाउंडेशन’ भी चलाती हैं। इस फाउंडेशन का मकसद 16 से 24 साल के युवाओं को शिक्षा और रोजगार में मदद करना है। हाल में उन्हें ‘एशियन बिजनेस वूमन ऑफ द ईयर’ के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। आशा कहती हैं- ‘मैं बहुत खुश हूं कि ब्रिटेन में मुङो आगे बढ़ने और कुछ कर दिखाने का मौका मिला। मगर मैं अपनी जड़ों को कभी नहीं भूल सकती। मैं बिहार की रहने वाली हूं और मुङो इस बात पर गर्व है।’

साभार – हिंदुस्तान

GINNI MAHI BIOGRAPHY IN HINDI

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गिन्नी माही (GINNI MAHI)

 

पॉप गायिका
 
मैंने बचपन में दादी से सुना था कि समाज में दलितों के साथ भेदभाव किया जाता था।
 हमारे घर में संत रविदास और डॉ भीमराव अंबेडकर से जुड़ी तमाम किताबें थीं।
 मम्मी-पापा से मैंने उनके बारे में सुना था।
 इसी से मुङो उनके गीत गाने की प्रेरणा मिली।
 
गिन्नी पंजाब प्रांत के जिस इलाके में पली-बढ़ीं, वहां बड़ी संख्या में दलित समाज के लोग रहते थे। उनका संयुक्त परिवार था। मम्मी-पापा के अलावा दादी, चाचा, ताऊ और चचेरे भाई-बहन सब एक साथ रहते थे। एक ही मकान में। यह मकान उनके दादाजी ने बनवाया था। सबका खाना एक चूल्हे में ही पकता।
 पापा और ताऊ अक्सर संत रविदास और बाबा साहेब से जुड़े कार्यक्रमों में जाते थे। जब भी मौका मिलता, नन्ही गिन्नी भी चल देती उनके साथ। पापा अक्सर संत रविदास और अंबेडकर से जुड़ी तमाम किताबें और पत्रिकाएं खरीदकर लाते थे। वह इन्हीं महापुरुषों की कहानियां सुनकर बड़ी हुईं।
समय के साथ इन महापुरुषों के बारे में उनकी दिलचस्पी बढ़ती गई। वह उनके बारे में लिखी किताबें पढ़ने लगीं। जब कोई बात समझ में नहीं आती, तो दादी से पूछ लेतीं। दादी बड़े प्यार से पोती को किस्सों के जरिये सामाजिक ताने-बाने का पाठ समझातीं।
 गिन्नी बताती हैं, हम भी दलित समाज से हैं, पर सच कहूं, तो मेरे साथ कभी किसी तरह का भेदभाव नहीं हुआ। दादी बताती थीं कि कैसे पुराने जमाने में दलितों के साथ भेदभाव होता था। उनका अपमान होता था। मैंने पापा से बाबा साहेब और संत रविदास के किस्से सुने थे, इसलिए वे मेरे रोल मॉडल बन गए।
 गिन्नी तब सात साल की थीं। दादी और मम्मी को सुनकर धार्मिक गीत गुनगुनाने लगीं। घरवालों ने गौर किया कि बेटी तो बहुत अच्छा गाती है। तब पापा ने संगीत की शिक्षा दिलवाने का फैसला किया। जालंधर के लाला जगत नारायण स्कूल में उनका दाखिला हो गया। पापा ने हिदायत दी कि संगीत के साथ पढ़ाई भी करनी है। संगीत के चक्कर में पढ़ाई मत भूल जाना।
ट्रेनिंग शुरू होते ही उनकी दिनचर्या काफी व्यस्त हो गई। सुबह साढ़े पांच बजे उठकर दो घंटे रियाज करना, फिर जल्दी से तैयार होकर स्कूल के लिए निकलना। स्कूल की पढ़ाई के बाद संगीत की शिक्षा और देर शाम घर लौटकर दो घंटे का रियाज। थक जाती थीं, पर वह बहुत खुश थीं। दो साल की शिक्षा के बाद उन्हें जालंधर के जंडियाला गांव में आयोजित एक मेले में गाने का मौका मिला। वह पहली बार स्टेज पर गाने जा रही थीं। मम्मी-पापा, दादी, ताऊ सभी चिंतित थे। पता नहीं,बच्ची सबके सामने गा पाएगी या नहीं? भीड़ देखकर कहीं घबरा न जाए? मगर गिन्नी बिल्कुल परेशान नहीं थीं।
 स्टेज पर पहुंचते ही वह आत्म-विश्वास के साथ गाने लगीं। उनके कोमल स्वर का जादू कुछ यूं बिखरा कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए। शुरुआत में वह धार्मिक गीत गाया करती थीं। फिर संत रविदास और बाबा साहेब की प्रशंसा भरे गीत गाने लगीं। गिन्नी कहती हैं, हर शो से पहले दादी मुङो आशीर्वाद देकर विदा करती हैं। स्टेज पर पहुंचकर मैं उन्हें याद करती हूं और मेरा आत्म-विश्वास बढ़ जाता है।
आस-पास के इलाकों में उनके गीत मशहूर होने लगे। इस बीच एक लोकल म्यूजिक कंपनी ने उन्हें गाने का मौका दिया। उनके दो अलबम गुरां दी दीवानी और गुरुपर्व है कांशी वाले दा को बहुत पसंद किया गया। जैसे-जैसे गिन्नी के गीतों की मांग बढ़ने लगी, परिवार ने महसूस किया कि बेटी के साथ एक टीम होनी चाहिए। उन्होंने कुछ गीतकारों से संपर्क किया, जो दलित समाज को जागृत करने वाले गीत लिख सकें।
पापा ने उनके नाम पर गिन्नी म्यूजिकल ग्रुप बनाया। शोहरत बढ़ती गई। खासकर उनके गीतों का पॉप अंदाज युवाओं को खूब पसंद आया। यू-ट्यूब पर भी उनके गीत खूब पसंद किए गए। बाबा साहब दे गीत ने खूब शोहरत दिलाई। इस गीत में उन्होंने यह बताया कि बाबा साहेब को जिंदगी में किन मुश्किलों से जूझना पड़ा। मैं धीह हां बाबा साहिब दी, जिन्हां लिखया सी सविधान पंक्तियों ने खूब धमाल मचाया। गिन्नी कहती हैं, मैं किसी जाति को नीचा दिखाना नहीं चाहती। चाहती हूं, जाति के नाम पर होने वाली कुरीतियां बंद हों। पूरे पंजाब में उनके गीतों की चर्चा होने लगी।
 यू-ट्यूब के जरिये विदेश में भी उन्हें सुना गया। वर्ष 2013 में ब्रिटेन और इटली में शो करने का ऑफर आया। उस समय वह दसवीं में पढ़ रही थीं। उन्होंने जाने से मना कर दिया। गिन्नी कहती हैं, विदेश जाने से मेरी पढ़ाई पर असर पड़ता, इसलिए मैंने तय किया कि मैं पंजाब से बाहर नहीं जाऊंगी। बाबा साहेब चाहते थे कि बेटियां शिक्षित हो। इसलिए मैं खूब पढ़ना चाहती हूं।
इस बीच कुछ राजनीति दलों ने भी उनसे संपर्क किया। कई बार राजनीति मंच पर गाने के प्रस्ताव भी मिले, लेकिन परिवार ने बेटी को राजनीति से दूर रखा। पिता राकेश चंद्र माही कहते हैं, राजनीति से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। मैंने अपनी बेटी को कभी राजनीतिक मंचों पर नहीं गाने दिया। हमारा मिशन बहुत पवित्र है। हम जातिवाद को खत्म करना चाहते हैं।
 गिन्नी अपने गीतों में ड्रग्स और कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ भी आवाज उठाती हैं। उनका मानना है कि बेटियों की शिक्षा के बगैर कोई समाज तरक्की नहीं कर सकता। गिन्नी कहती हैं, मैं लोगों से अपील करती हूं कि अपनी बेटियों को स्कूल जरूर भेजें। बेटियां पढ़ेंगी, तभी समाज का विकास होगा। तभी सामाजिक कुरीतियां बंद होंगी और तभी जात-पांत का भेद खत्म होगा।प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी
साभार -हिंदुस्तान अख़बार

JHULAN GOSWAMI BIOGRAPHY IN HINDI

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झूलन  गोस्वामी
 
महिला क्रिकेटर
मैं क्रिकेटर बनना चाहती थी,
मगर मम्मी-पापा को समझ में नहीं आ रहा था
कि मुङो क्रिकेट में भेजें या नहीं।
मां को मेरा देर-सबेर घर लौटना पसंद नहीं था।
एक दिन मैं मैच के बाद शाम को देर से घर पहुंची,
तो उन्होंने मुङो घंटों घर के बाहर खड़ा रखा।

वह अपने इलाके की सबसे लंबी लड़की थीं। सड़क पर चलतीं, तो लोग पीछे मुड़कर जरूर देखते। पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के छोटे से कस्बे चकदा में पली-बढ़ीं झूलन को बचपन में क्रिकेट का बुखार कुछ यूं चढ़ा कि बस वह जुनून बन गया। एयर इंडिया में नौकरी करने वाले पिता को क्रिकेट में खास दिलचस्पी नहीं थी। हालांकि उन्होंने बेटी को कभी खेलने से नहीं रोका। मगर मां को उनका गली में लड़कों के संग गेंदबाजी करना बिल्कुल पसंद न था।

बचपन में वह पड़ोस के लड़कों के साथ सड़क पर क्रिकेट खेला करती थीं। उन दिनों वह बेहद धीमी गेंदबाजी करती थीं। लिहाजा लड़के उनकी गेंद पर आसानी से चौके-छक्के जड़ देते थे। कई बार उनका मजाक भी बनाया जाता था। टीम के लड़के उन्हें चिढ़ाते हुए कहते- झूलन, तुम तो रहने ही दो। तुम गेंद फेंकोगी, तो हमारी टीम हार जाएगी। एक दिन यह बात उनके दिल को लग गई। फैसला किया कि अब मैं तेज गेंदबाज बनकर दिखाऊंगी। तेज गेंदबाजी के गुर सीखे और लड़कों को पटखनी देने लगीं। जल्द ही झूलन की गेंदबाजी चर्चा का विषय बन गई।यह बात पिता तक पहुंची। उन्होंने सवाल किया, तो झूलन ने कहा- हां, मैं क्रिकेटर बनना चाहती हूं। प्लीज आप मुङो ट्रेनिंग दिलवाइए। यह सुनकर पिता को अच्छा नहीं लगा।
 तब झूलन 13 साल की थीं। वह चाहते थे कि बेटी पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करे। मगर बेटी क्रिकेट को करियर बनाने का इरादा बना चुकी थी। आखिरकार उन्हें बेटी की जिद माननी पड़ी। उन दिनों नदिया में क्रिकेट ट्रेनिंग के खास इंतजाम नहीं थे। लिहाजा झूलन ने कोलकाता की क्रिकेट अकादमी में ट्रेनिंग लेने का फैसला किया। माता-पिता के मन में बेटी को क्रिकेटर बनाने को लेकर कई तरह की आशंकाएं थीं। क्रिकेट में आखिर क्या करेगी बच्ची? कैसा होगा उसका भविष्य? मगर क्रिकेट अकादमी पहुंचकर उनकी सारी आशंकाएं दूर हो गईं।
 झूलन बताती हैं- कोच सर ने मम्मी-पापा को समझाया कि अब लड़कियां भी क्रिकेट खेलती हैं। आप चिंता न करें। आपकी बेटी बहुत बढ़िया गेंदबाज है। एक दिन वह आपका नाम रोशन करेगी। कोच की बात सुनने के बाद मम्मी-पापा की फिक्र काफी हद तक कम हो गई।खेल के साथ पढ़ाई भी करनी थी। इसीलिए तय हुआ कि झूलन हफ्ते में सिर्फ तीन दिन कोलकाता जाएंगी ट्रेनिंग के लिए। सुबह पांच बजे चकदा से लोकल ट्रेन पकड़कर कोलकाता स्टेशन पहुंचतीं। इसके बाद सुबह साढ़े सात बजे तक बस से क्रिकेट अकादमी पहुंचना होता था। दो घंटे के अभ्यास के बाद फिर बस और ट्रेन से वापस घर पहुंचतीं और किताबें लेकर स्कूल के लिए चल पड़तीं। शुरुआत में पापा संग जाते थे। बाद में वह अकेले ही सफर करने लगीं।
झूलन बताती हैं- घर से अकादमी तक आने-जाने में चार घंटे बरबाद होते थे। काफी थकावट भी होती थी। मगर इसने मुङो शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत मजबूत बना दिया। आप जितना संघर्ष करते हैं, आपकी क्षमता उतनी ही बढ़ती जाती है। ट्रेनिंग के दौरान कोच ने उनकी तेज गेंदबाजी पर खास फोकस किया। पांच फुट 11 इंच लंबा कद उनके लिए वरदान साबित हुआ। समय के साथ अभ्यास के घंटे बढ़ते गए। स्कूल जाना कम हो गया। अब क्रिकेट जुनून बन चुका था।
 झूलन बताती हैं- मुङो जमे हुए बल्लेबाज को आउट करने में बड़ा मजा आता था। सच कहूं, तो लंबे कद के कारण गेंद को उछाल देने में काफी आसानी होती है। इसलिए मेरी राह आसान हो गई।कड़ी मेहनत रंग लाई। लोकल टीमों के साथ कुछ मैच खेलने के बाद बंगाल की महिला क्रिकेट टीम में उनका चयन हो गया। बेटी मशहूर हो रही थी, पर मां के लिए अब भी वह छोटी बच्ची थीं। जब तक वह घर लौटकर नहीं आ जातीं, मां को चैन नहीं पड़ता था।
 एक दिन वह मैच खेलकर देर से घर पहुंचीं, तो हंगामा हो गया। झूलन बताती हैं- मैं देर से पहुंची, तो मां बहुत नाराज हुईं। उन्होंने दरवाजा नहीं खोला। मुङो कई घंटे घर के बाहर खड़े रहना पड़ा। तब से मैंने तय किया कि मैं कभी मां को बिना बताए घर देर से नहीं लौटूंगी। उन्हें मेरी फिक्र थी, इसलिए उनका गुस्सा जायज था।
झूलन ने 18 साल की उम्र में अपना पहला टेस्ट मैच लखनऊ में इंग्लैंड के खिलाफ खेला। इसके बाद अगले साल चेन्नई में इंग्लैंड के खिलाफ पहला वन-डे अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने का मौका मिला। सबसे बड़ी कामयाबी मिली 2006 में, जब उनकी बेहतरीन गेंदबाजी के बल पर इंडियन टीम ने एक टेस्ट मैच में इंग्लैंड को हराकर बड़ी जीत हासिल की।
 इस मैच में उन्होंने 78 रन देकर 10 विकेट हासिल किए। इसके बाद तेज गेंदबाजी की वजह से लोग उन्हें ‘नदिया एक्सप्रेस’ कहने लगे।
2007 में उन्हें आईसीसी की तरफ से महिला क्रिकेटर ऑफ द ईयर अवॉर्ड दिया गया। वर्ष 2010 में अजरुन अवॉर्ड और 2012 में पद्मश्री से सम्मानित की गईं। उनकी गेंदबाजी की गति 120 किलोमीटर प्रति घंटा है। इसलिए उन्हें दुनिया की सबसे तेज महिला गेंदबाज होने का रुतबा हासिल है। हाल में उन्होंने एक नया रिकॉर्ड अपने नाम किया है। अब वह दुनिया की सबसे ज्यादा विकेट लेने वाली महिला क्रिकेटर बन गई हैं।

झूलन गोस्वामी की BIOGRAPHY सुनने के लिए निचे क्लिक करे
 

साभार – हिंदुस्तान अख़बार

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CHHOTA JADOOGAR JAYSHANKAR PRASAD

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छोटा जादूगर (कहानी )

जयशंकर प्रसाद

उसके मुँह पर तिरस्‍कार की हँसी फूट पड़ी। उसने कहा, ”तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्‍य दूँगा। मुझे शरबत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्‍नता होती!”

 

कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूँज रहा था। मैं खड़ा था उस छोटे फुहारे के पास, जहाँ एक लड़का चुपचाप शराब पीनेवालों को देख रहा था। उसके गले में फटे कुरते के ऊपर से एक मोटी-सी सूत की रस्‍सी पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्‍ते थे। उसके मुँह पर गंभीर विषाद के साथ धैर्य की रेखा थी। मैं उसकी ओर न जाने क्‍यों आकर्षित हुआ। उसके अभाव में भी संपन्‍नता थी।

मैंने पूछा, ”क्‍यों जी, तुमने इसमें क्‍या देखा?”

”मैंने सब देखा है। यहाँ चूड़ी फेंकते हैं। खिलौनों पर निशाना लगाते हैं। तीर से नंबर छेदते हैं। मुझे तो खिलौनों पर निशाना लगाना अच्‍छा मालूम हुआ। जादूगर तो बिलकुल निकम्‍मा है। उससे अच्‍छा तो ताश का खेल मैं ही दिखा सकता हूँ।” उसने बड़ी प्रगल्‍भता से कहा। उसकी वाणी में कहीं रूकावट न थी।

मैंने पूछा, ”और उस परदे में क्‍या है? वहाँ तुम गए थे?”

”नहीं, वहाँ मैं नहीं जा सका। टिकट लगता है।”

मैंने कहा, ”तो चलो, मैं वहाँ पर तुमको लिवा चलूँ।” मैंने मन-ही-मन कहा, ‘भाई! आज के तुम्‍हीं मित्र रहे।’

उसने कहा, ”वहाँ जाकर क्‍या कीजिएगा? चलिए, निशाना लगाया जाए।”

मैंने उससे सहमत होकर कहा, ”तो फिर चलो, पहले शरबत पी लिया जाए।” उसने स्‍वीकार-सूचक सिर हिला दिया।

मनुष्‍यों की भीड़ से जाड़े की संध्‍या भी वहाँ गरम हो रही थी। हम दोनों शरबत पीकर निशाना लगाने चले। राह में ही उससे पूछा, ”तुम्‍हारे घर में और कौन हैं?”

”माँ और बाबूजी।”

”उन्‍होंने तुमको यहाँ आने के लिए मना नहीं किया?”

”बाबूजी जेल में हैं।”

”क्‍यों?”

”देश के लिए।” वह गर्व से बोला।

”और तुम्‍हारी माँ?”

”वह बीमार है।”

”और तुम तमाशा देख रहे हो?”

उसके मुँह पर तिरस्‍कार की हँसी फूट पड़ी। उसने कहा, ”तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्‍य दूँगा। मुझे शरबत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्‍नता होती!”

मैं आश्‍चर्य से उस तेरह-चौदह वर्ष के लड़के को देखने लगा।

”हाँ, मैं सच कहता हूँ बाबूजी! माँजी बीमार हैं, इसीलिए मैं नहीं गया।”

”कहाँ?”

”जेल में! जब कुछ लोग खेल-तमाशा देखते ही हैं, तो मैं क्‍यों न दिखाकर माँ की दवा करूँ और अपना पेट भरूँ।”

मैंने दीर्घ नि:श्‍वास लिया। चारों ओर बिजली के लट्टू नाच रहे थे। मन व्‍यग्र हो उठा। मैंने उससे कहा, ”अच्‍छा चलो, निशाना लगाया जाए।”

हम दोनों उस जगह पर पहुँचे जहाँ खिलौने को गेंद से गिराया जाता था। मैंने बारह टिकट खरीदकर उस लड़के को दिए।

वह निकला पक्‍का निशानेबाज। उसकी कोई गेंद खाली नहीं गई। देखनेवाले दंग रह गए। उसने बारह खिलौनों को बटोर लिया, लेकिन उठाता कैसे? कुछ मेरी रूमाल में बँधे, कुछ जेब में रख लिये गए।

लड़के ने कहा, ”बाबूजी, आपको तमाशा दिखाऊँगा। बाहर आइए, मैं चलता हूँ।” वह नौ-दो ग्‍यारह हो गया। मैंने मन-ही-मन कहा, ‘इतनी जल्‍दी आँख बदल गई!”

में घूमकर पान की दुकान पर आ गया। पान खाकर बड़ी देर तक इधर-उधर टहलता-देखता रहा। झूले के पास लोगों का ऊपर-नीचे आना देखने लगा। अकस्‍मात् किसी ने ऊपर के हिंडोले से पुकारा, ”बाबूजी!”

मैंने पूछा, ”कौन?”

”मैं हूँ छोटा जादूगर।”

कलकत्‍ते के सुरम्‍य बोटैनिकल-उद्यान में लाल कमलिनी से भरी हुई एक छोटी-सी झील के किनारे घने वृक्षों की छाया में अपनी मंडली के साथ बैठा हुआ मैं जलपान कर रहा था। बातें हो रही थीं। इतने में वही छोटा जादूगर दिखाई पड़ा। हाथ में चारखाने का खादी का झोला, साफ जाँघिया और आधी बाँहों का कुरता। सिर पर मेरी रूमाल सूत की रस्‍सी से बँधी हुई थी। मस्‍तानी चाल में झूमता हुआ आकर वह कहने लगा –

”बाबूजी, नमस्‍ते! आज कहिए तो खेल दिखाऊँ?”

”नहीं जी, अभी हम लोग जलपान कर रहे हैं।”

”फिर इसके बाद क्‍या गाना-बजाना होगा, बाबूजी?”

”नहीं जी, तुमको….” क्रोध से मैं कुछ और कहने जा रहा था। श्रीमतीजी ने कहा, ”दिखलाओ जी, तुम तो अच्‍छे आए। भला, कुछ मन तो बहले।” मैं चुप हो गया, क्‍योंकि श्रीमतीजी की वाणी में वह माँ की-सी मिठास थी, जिसके सामने किसी भी लड़के को रोका नहीं जा सकता। उसने खेल आरंभ किया।

उस दिन कार्निवल के सब खिलौने उसके खेल में अपना अभिनय करने लगे। भालू मनाने लगा। बिल्‍ली रूठने लगी। बंदर घुड़कने लगा। गुड़िया का ब्‍याह हुआ। गुड्डा वर काना निकला। लड़के की वाचालता से ही अभिनय हो रहा था। सब हँसते लोट-पोट हो गए।

मैं सोच रहा था। बालक को आवश्‍यकता ने कितना शीघ्र चतुर बना दिया। यही तो संसार है।

ताश के सब पत्‍ते लाल हो गए। फिर सब काले हो गए। गले की सूत की डोरी टुकड़े-टुकड़े होकर जुड़ गई। लट्टू अपने से नाच रहे थे। मैंने कहा, ”अब हो चुका। अपना खेल बटोर लो, हम लोग भी अब जाएँगे।”

श्रीमतीजी ने धीरे से उसे एक रूपया दे दिया। वह उछल उठा।

मैंने कहा, ”लड़के!”

”छोटा जादूगर कहिए। यही मेरा नाम है। इसी से मेरी जीविका है।”

मैं कुछ बोलना ही चाहता था कि श्रीमतीजी ने कहा, ”अच्‍छा, तुम इस रुपए से क्‍या करोगे?”

”पहले भरपेट पकौड़ी खाऊँगा। फिर एक सूती कंबल लूँगा।”

मेरा क्रोध अब लौट आया। मैं अपने पर बहुत क्रुद्ध होकर सोचने लगा, ‘ओह! कितना स्‍वार्थी हूँ मैं। उसके एक रुपया पाने पर मैं ईर्ष्‍या करने लगा था न!”

वह नमस्‍कार करके चला गया। हम लोग लता-कुंज देखने के लिए चले।

उस छोटे से बनावटी जंगल में संध्‍या साँय-साँय करने लगी थी। अस्‍ताचलगामी सूर्य की अंतिम किरण वृक्षों की पत्तियों से विदाई ले रही थी। एक शांत वातावरण था। हम लोग धीरे-धीरे मोटर से हावड़ा की ओर आ रहे थे।

रह-रहकर छोटा जादूगर स्‍मरण हो आता था। तभी सचमुच वह एक झोंपड़ी के पास कंबल कंधे पर डाले मिल गया। मैंने मोटर रोककर उससे पूछा, ”तुम यहाँ कहाँ?”

”मेरी माँ यहीं है न! अब उसे अस्‍पताल वालों ने निकाल दिया है।” मैं उतर गया। उस झोंपड़ी में देखा तो एक स्‍त्री चिथड़ों से लदी हुई काँप रही थी।

छोटे जादूगर ने कंबल ऊपर से डालकर उसके शरीर से चिमटते हुए कहा, ”माँ!”

मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े।

बड़े दिन की छुट्टी बीत चली थी। मुझे अपने ऑफिस में समय से पहुँचना था। कलकत्‍ते से मन ऊब गया था। फिर भी चलते-चलते एक बार उस उद्यान को देखने की इच्‍छा हुई। साथ-ही-साथ जादूगर भी दिखाई पड़ जाता तो और भी…. मैं उस दिन अकेले ही चल पड़ा। जल्‍द लौट आना था।

दस बज चुके थे। मैंने देखा कि उस निर्मल धूप में सड़क के किनारे एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंगमंच सजा था। मैं मोटर रोककर उतर पड़ा। वहाँ बिल्‍ली रूठ रही थी। भालू मनाने चला था। ब्‍याह की तैयारी थी, यह सब होते हुए भी जादूगर की वाणी में वह प्रसन्‍नता की तरी नहीं थी। जब वह औरों को हँसाने की चेष्‍टा कर रहा था, तब जैसे स्‍वयं काँप जाता था। मानो उसके रोएँ रो रहे थे। मैं आश्‍चर्य से देख रहा था। खेल हो जाने पर पैसा बटोरकर उसने भीड़ में मुझे देखा। वह जैसे क्षण भर के लिए स्‍फूर्तिमान हो गया। मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए पूछा, ”आज तुम्‍हारा खेल जमा क्‍यों नहीं?”

”माँ ने कहा है कि आज तुरंत चले आना। मेरी अंतिम घड़ी समीप है।” अविचल भाव से उसने कहा।

”तब भी तुम खेल दिखलाने चले आए!” मैंने कुछ क्रोध से कहा। मनुष्‍य के सुख-दु:ख का माप अपना ही साधन तो है। उसके अनुपात से वह तुलना करता है।

उसके मुँह पर वहीं परिचित तिरस्‍कार की रेखा फूट पड़ी।

उसने कहा, ”क्‍यों न आता?”

और कुछ अधिक कहने में जैसे वह अपमान का अनुभव कर रहा था।

क्षण भर में मुझे अपनी भूल मालूम हो गई। उसके झोले को गाड़ी में फेंककर उसे भी बैठाते हुए मैंने कहा, ”जल्‍दी चलो।” मोटरवाला मेरे बताए हुए पथ पर चल पड़ा।

कुछ ही मिनटों में मैं झोंपड़े के पास पहुँचा। जादूगर दौड़कर झोंपड़े में माँ-माँ पुकारते हुए घुसा। मैं भी पीछे था, किंतु स्‍त्री के मुँह से, ‘बे…’ निकलकर रह गया। उसके दुर्बल हाथ उठकर गिर गए। जादूगर उससे लिपटा रो रहा था। मैं स्‍तब्‍ध था। उस उज्‍ज्‍वल धूप में समग्र संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नृत्‍य करने लगा।

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BHOJPURI QUOTES-नीमन विचार

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BHOJPURI QUOTES-नीमन विचार

 
 
 
 
अबर आदमी से दुश्मनी जादे खतरनाक होखेला 
 
काहे से की ऊ ओह समय वर करेला 
जेकरा बारे में हमनी के कभी सोच भी ना सकीला सन
ABAR AADMI SE DUSHMANI 
JADE KHATARNAK HOKHE
KAHE SE KI U OH SAMAY WAR KARELA
 JEKRA BARE ME KABHI SOCH BHI NA SAKILA SAN
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BHOJPURI QUOTES-नीमन विचार

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BHOJPURI QUOTES-नीमन विचार

बकलोल से तारीफ सुनला के जगह

 बुद्धिमान से डाट सुनल  ज्यादा नीमन होखेला 

BAKLOL SE TARIF SUNLA KE JAGAH
 BUDHIMAN SE DANT SUNAL JYADA NIMAN HOKHELA
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BIHARI TAG LINE

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बिहारी टैग लाइन



हम बिहारी हैं 

हमलोग लेटते नहीं ओठंगते हैं 

HAM BIHARI HAI
HAM LETATE NAHI
OTHANGHATE HAI
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PRIYANKA BHARTI BIOGRAPHY IN HINDI

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प्रियंका भारती

सामाजिक कार्यकर्ता

 
ससुराल में शौचालय नहीं था। 
दिन में बाहर जाना पड़ता था।
 रास्ते में गांव के मर्द जब ललचाई निगाहों से घूरते, 
तो दिल अंदर तक कांप जाता था।
 ससुराल वालों से कहा कि घर में शौचालय बनवा दो,
 मगर वे टाल गए।
फिर मैं ससुराल छोड़कर मायके आ गई।
 
 
 

प्रियंका तब 14 साल की थीं। यह बात 2007 की है। उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के एक छोटे से गांव की रहने वाली यह बच्ची उन दिनों पांचवीं कक्षा में पढ़ रही थी। गांव की बाकी लड़कियों की तरह उसकी भी शादी हो गई। मां और सहेलियों का साथ छूटने के ख्याल से वह खूब रोईं। मां ने समझाया, क्यों चिंता करती हो? अभी तो बस शादी हो रही है, गौना पांच साल बाद होगा। तब तक तुम हमारे साथ ही रहोगी। मन को तसल्ली मिली।

शादी के दिन सुंदर साड़ी और गहने मिले पहनने को। बहुत अच्छा लगा प्रियंका को। दो दिन के जश्न के बाद बारात वापस चली गई। प्रियंका खुश थीं कि ससुराल नहीं जाना पड़ा।शादी के बाद पढ़ाई जारी रही। इस बीच मां उन्हें घर के कामकाज सिखाने लगीं। देखते-देखते पांच साल बीत गए। अब वह बालिग हो चुकी थीं। गौने की तैयारियां शुरू हो गईं। आखिर विदाई की घड़ी आ ही गई।
यह बात 2012 की है। एक छोटे समारोह के बाद उनकी विदाई हो गई। ससुराल पहुंचीं, तो अगली ही सुबह एक बड़ी दिक्कत से सामना हुआ। उन्होंने ङिाझकते हुए सास से पूछा, मां जी, शौचालय जाना है। सास ने कहा, कुछ देर रुको, मैं चलती हूं तुम्हारे साथ। उन्हें अजीब लगा। सास उनके साथ कहां जाने की बात कर रही हैं? थोड़ी देर बाद सास के साथ बहू चल पड़ी खेत की ओर। तब जाकर पता चला कि घर में शौचालय नहीं है।
पगडंडियों का रास्ता कठिन था। खेतों में पानी भरा था। पगडंडी पर फिसलन काफी ज्यादा थी। सुर्ख लाल साड़ी में लिपटी नई-नवेली बहू राहगीरों के लिए उत्सुकता का विषय थी। प्रियंका बताती हैं- मेरे एक हाथ में लोटा था और दूसरे हाथ से मैं घूंघट संभाल रही थी। कई लोग मुङो पलटकर देख रहे थे। मुङो बड़ी शर्म आ रही थी। पहली सुबह किसी तरह बीती।
उस दिन उन्होंने पति और सास से कई बार कहा, घर में शौचालय बनना चाहिए। मगर किसी ने ध्यान नहीं दिया। गांव में शौच के लिए बाहर जाना आम बात थी। ससुराल वालों को शौचालय बनवाने की मांग गैर-जरूरी लगी। इसी तरह दो दिन बीत गए। फिर उन्होंने पति से साफ कह दिया कि उन्हें शौच के लिए घर के बाहर जाना मंजूर नहीं है।
प्रियंका बताती हैं, तीसरे दिन मैंने बाहर जाने से मना कर दिया। मेरे पेट में दर्द होने लगा। मैंने तय कर लिया था कि जब तक घर में शौचालय नहीं बनेगा, मैं शौच नहीं जाऊंगी। इस बीच रस्म के मुताबिक उनका भाई ससुराल आया। प्रियंका अपने सामान की पेटी लेकर भाई के सामने खड़ी हो गईं और बोली- मैं भी चलूंगी तुम्हारे साथ। भाई ने खूब समझाया।
 ससुराल वालों ने कहा कि गांव में सभी महिलाएं बाहर शौच को जाती हैं, फिर तुम्हें इतनी दिक्कत क्यों है?मगर प्रियंका ने एलान कर दिया कि जब तक शौचालय नहीं बनेगा, वह ससुराल नहीं लौटेंगी। उधर मायके वालों को बेटी का यूं इस तरह ससुराल छोड़कर आना अच्छा नहीं लगा। मां ने भी कहा कि यह जिद ठीक नहीं है। सबका एक ही सवाल था, अगर तुम्हारी सास और ननद बाहर शौच के लिए जा सकती हैं, तो तुम क्यों नहीं?
पूरे गांव में खबर फैल गई कि प्रियंका ससुराल से भाग आई है। कुछ लोगों ने यह अफवाह भी उड़ा दी कि इस लड़की का गांव में किसी से प्रेम-प्रसंग है, इसलिए वह अपने पति को छोड़कर भाग आई है। रिश्तेदार ताने मारने लगे।मगर प्रियंका जिद पर अड़ी रहीं।
 इस बीच ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय पर काम करने वाले एक एनजीओ को उनके बारे में सूचना मिली। एनजीओ टीम प्रियंका के घर पहुंची। टीम ने उनके कदम की तारीफ करते हुए कहा कि आपने ससुराल छोड़कर बड़ी हिम्मत दिखाई। अगर गांव की हर बहू-बेटी ऐसा फैसला करने लगे, तो हर घर में शौचालय बन जाएगा। उन्होंने घरवालों को भी समझाया कि आपकी बेटी ने ससुराल छोड़कर कोई गलती नहीं की है। उसकी जिद जायज है।
 एनजीओ ने प्रियंका के ससुरालवालों से संपर्क किया और अपने खर्च पर उनके घर में शौचालय बनावाया। इसके बाद प्रियंका की ससुराल वापसी हुई। इस मौके पर एक बड़ा समारोह हुआ, जिसमें शौचालय का उद्घाटन किया गया।
 प्रियंका बताती हैं, मुङो नहीं पता था कि मेरी जिद सुर्खियां बन जाएगी। जब ससुराल लौटी, तो गांव में भोज हुआ। मुङो मंच पर बुलाकर सम्मानित किया गया। ससुराल वाले भी घर में शौचालय बनने से बहुत खुश थे। इस घटना के कुछ समय बाद एनजीओ ने उन्हें अपना ब्रांड अंबेस्डर बना लिया।
 उनकी कहानी पर एक विज्ञापन फिल्म भी बनी, जिसमें प्रियंका को अभिनेत्री विद्या बालन के साथ दिखाया गया। विज्ञापन की शूटिंग के लिए प्रियंका मुंबई गईं। इस समय वह स्नातक की पढ़ाई कर रही हैं। पिछले पांच साल से वह गांव-गांव जाकर ग्रामीणों को घर में शौचालय बनवाने और बेटियों को पढ़ाने का संदेश दे रही हैं। वह सिलाई केंद्र भी चलाती हैं, जहां महिलाओं को सिलाई की ट्रेनिंग दी जाती है। इस काम में उनके पति भी सहयोग करते हैं। प्रियंका बताती हैं- अब मेरा एक ही सपना है गांवों में साफ-सफाई रहे, महिलाओं को शौच के लिए बाहर न जाना पड़े और हर बेटी को पढ़ने का मौका मिले।
साभार -हिंदुस्तान अख़बार