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Thursday, March 19, 2026
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आज़ादी अभी अधूरी है- अटल बिहारी वाजपेयी

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स्वतंत्रता दिवस की पुकार – अटल बिहारी वाजपेयी

हिंदी कविता 

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का 16 अगस्त 2018 को निधन हो गया .  उन्हें  एक बार नहीं बल्कि तीन बार भारत के प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ. लेकिन वो सिर्फ नेता नहीं थे, उन विरले नेताओं में से थे, जिनका महज साहित्य में झुकाव ही नहीं था बल्कि  वो खुद लिखते भी थे. विविध मंचों से और यहां तक कि संसद में भी उन्होंने  अपनी कविताओं का पाठ कर सबको चकित कर दिया था . उनकी  कविताओं का एक एल्बम भी आ चुका है जिन्हें जगजीत सिंह ने भी अपनी अावाज़ दी है. पढ़िए उनकी कविता -स्वतंत्रता दिवस की पुकार

 

पन्द्रह अगस्त का दिन कहता – आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाक़ी हैं, राखी की शपथ न पूरी है॥ 

जिनकी लाशों पर पग धर कर आजादी भारत में आई। 
वे अब तक हैं खानाबदोश ग़म की काली बदली छाई॥ 

कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आंधी-पानी सहते हैं। 
उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं॥ 

हिन्दू के नाते उनका दुख सुनते यदि तुम्हें लाज आती। 
तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जहाँ कुचली जाती॥ 

इंसान जहाँ बेचा जाता, ईमान ख़रीदा जाता है। 
इस्लाम सिसकियाँ भरता है,डालर मन में मुस्काता है॥ 

भूखों को गोली नंगों को हथियार पिन्हाए जाते हैं। 
सूखे कण्ठों से जेहादी नारे लगवाए जाते हैं॥ 

लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया। 
पख़्तूनों पर, गिलगित पर है ग़मगीन ग़ुलामी का साया॥ 

बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है। 
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥ 

दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएँगे। 
गिलगित से गारो पर्वत तक आजादी पर्व मनाएँगे॥ 

उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें। 
जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें॥

ऊँचाई – अटल बिहारी वाजपेयी

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ऊँचाई – अटल बिहारी वाजपेयी

हिंदी कविता 

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का 16 अगस्त 2018 को निधन हो गया .  उन्हें  एक बार नहीं बल्कि तीन बार भारत के प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ. लेकिन वो सिर्फ नेता नहीं थे, उन विरले नेताओं में से थे, जिनका महज साहित्य में झुकाव ही नहीं था बल्कि  वो खुद लिखते भी थे. विविध मंचों से और यहां तक कि संसद में भी उन्होंने  अपनी कविताओं का पाठ कर सबको चकित कर दिया था . उनकी  कविताओं का एक एल्बम भी आ चुका है जिन्हें जगजीत सिंह ने भी अपनी अावाज़ दी है. पढ़िए उनकी कविता – ऊँचाई

ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।

जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।

ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,

किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

आओ फिर से दिया जलाएँ – अटल बिहारी वाजपेयी

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आओ फिर से दिया जलाएँ – अटल बिहारी वाजपेयी

हिंदी कविता 

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का 16 अगस्त 2018 को निधन हो गया .  उन्हें  एक बार नहीं बल्कि तीन बार भारत के प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ. लेकिन वो सिर्फ नेता नहीं थे, उन विरले नेताओं में से थे, जिनका महज साहित्य में झुकाव ही नहीं था बल्कि  वो खुद लिखते भी थे. विविध मंचों से और यहां तक कि संसद में भी उन्होंने  अपनी कविताओं का पाठ कर सबको चकित कर दिया था . उनकी  कविताओं का एक एल्बम भी आ चुका है जिन्हें जगजीत सिंह ने भी अपनी अावाज़ दी है. पढ़िए उनकी कविता – आओ फिर से दिया जलाएँ .

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

क़दम मिला कर चलना होगा – अटल बिहारी वाजपेयी

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क़दम मिला कर चलना होगा – अटल बिहारी वाजपेयी

हिंदी कविता 

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का 16 अगस्त 2018 को निधन हो गया .  उन्हें  एक बार नहीं बल्कि तीन बार भारत के प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ. लेकिन वो सिर्फ नेता नहीं थे, उन विरले नेताओं में से थे, जिनका महज साहित्य में झुकाव ही नहीं था बल्कि  वो खुद लिखते भी थे. विविध मंचों से और यहां तक कि संसद में भी उन्होंने  अपनी कविताओं का पाठ कर सबको चकित कर दिया था . उनकी  कविताओं का एक एल्बम भी आ चुका है जिन्हें जगजीत सिंह ने भी अपनी अावाज़ दी है. पढ़िए उनकी कविता – कदम मिलकर चलना होगा .

बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,

पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,

निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,

पावस बनकर ढ़लना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,

नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

मौत से ठन गई – अटल बिहारी वाजपेयी 

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मौत से ठन गई – अटल बिहारी वाजपेयी 

हिंदी कविता 

 

ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

 

जानिए जींस में छोटा पॉकेट क्यों दिया जाता है

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वैसे तो आजकल जींस पहनना फैशन का अहम हिस्सा बन चूका है फिर भी अगर आप जींस पहनते होंगे तो जींस के दाये तरफ दी गयी छोटी सी पॉकेट के बारे में जरुर सोचा होगा . आपके मन में भी ये सवाल आया होगा की आखिर जींस में इतनी छोटी पॉकेट क्यों दी जाती है . बहुत सारे लोगो से पूछने पर वे ये बताते है की ये पॉकेट खुदरा सिक्के रखने के लिए बनायीं गयी है लेकिन ये सच नहीं है . तो चलिए हम आपको आज बताते है की ये छोटी सी पॉकेट देने के पीछे की क्या कहानी है ….

मजदूरो के लिए बना था जींस 

जींस का इतिहास काफी पुराना है . आपको जानकर यह आश्चर्य होगा की जिस जींस को हमलोग अपने लुक्स को बेहतर बनाने के लिए पहनते है दरअसल उसका अविष्कार मजदूरो के लिए किया गया था . जींस को शुरुआत में नाविक एवं श्रमिक ही पहनते थे . जींस की जेब पर लगने वाले छोटे बटन भी मजदूरो को ध्यान में रखकर ही लगाये जाते थे . क्युकी मजदुर भरी भरकम करते थे . इसलिए इस बटनों को लगा देने से जींस की सिलाई मजबूत हो जाती थी और जींस कई दिनों तक काम में लायी जा सकती थी .लेकिन कालांतर में इन जींस के बटनों को डिजाईन मान लिया गया

चैन वाली घडियो को रखने के लिए बना था पॉकेट 

जींस में सबसे पहले छोटा पॉकेट 1873 में जींस बनाने वाली कम्पनी लेवी स्ट्रास ने दी थी .लेवी स्ट्रॉस की इस कपंनी को अब लिवाइस नाम से जाना जाता है. आपने देखा होगा कि जींस की दाईं ओर एक छोटी से पॉकेट होती है जिसमें एक दो सिक्कों के अलावा शायद ही कुछ रखा जा सकता है. दरअसल ये पॉकेट इसलिए दी गयी थी ताकि  अमेरिकी काऊबॉय इसमे अपनी चेन वाली घड़ियाँ सुरक्षित रख सके . उस समय पॉकेट में चेन वाली घडियो की रखने का फैशन था . इन्ही  घडियो को टूटने से बचने के लिए लिवाइस ने यह छोटी पॉकेट जींस में देना शुरू कर दिया था. जिसके कारण इस पॉकेट को वाच पॉकेट बोला जाता था .

कौन थे काऊबॉयज 

नॉर्थ अमेरिका में जानवरों की देखभाल करने वाले  और उन्हें हांकने वालो को काऊबॉयज बोला जाता था . ये घोड़े पर चढ़कर अपने कम को अंजाम देते थे .सबसे पहले ये स्पेन में शुरू हुआ .फिर धीरे धीरे कई यूरोपीय देश और अमेरिका में पंहुचा .काऊबॉयज  अपने साथ चेन वाली घडिया लेकर चलते थे और इसे वेस्टकोट  पर पहने थे . इन्ही के लिए लिवाइस ने यह छोटी पॉकेट जींस में देना शुरू किया

अब खुले पैसे रखने के लिए होता है इस्तेमाल

चूँकि अब चेन वाली घडियो का चलन बंद हो गया है लेकिन जींस बनाने वाली कम्पनी ने बिना वजह जाने ही आज भी जींस में पॉकेट बना देती है ताकि जींस स्टाइलिश दिखे . अधिकतर जींस में कम से कम पांच पॉकेट जरूर होते हैं। दो पीछे दो आगे और एक सामने वाली छोटी वॉच पॉकेट. आजकल लोग इस छोटे पॉकेट का इस्तेमाल खुले पैसे ,सिम कार्ड , मेमोरी चिप्स ,टिकट ,पर्सनल चीजो को रखने के लिए करते है .लिवाइस ने यह भी बताया  यह पॉकेट पॉपुलर होने के बाद फ्रंटियर पॉकेट ,मैच पॉकेट आदि के नाम से ज्यादा पुकारा जाता है।

जानिए ट्रेन में बजने वाली इन ग्यारह तरह के सीटियों का मतलब

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भारतीय रेलवे से हम कई बार सफ़र करते है और कभी कभी ट्रेन में बजने वाली सीटियाँ हमें बहुत परेशान करती है | चलते समय तो हॉर्न तो बजाये ही जाते है लेकिन ट्रेन जब प्लेटफॉर्म पर कड़ी रहती है तब भी हॉर्न बजाये जाते है | आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ट्रेन से निकलने वाली अलग अलग तरह की सीटियो के भी अलग अलग मायने है | आज हम भारतीय रेलवे के कुछ ऐसे ही रोचक नियम बताने जा रहे हैं जिसे शायद ही आप जानते होंगे |

हम अक्सर ट्रेन के तेज बजने वाले हॉर्न से परेशान रहते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर  हॉर्न की एक अपनी अलग  कहानी होती हैं।

1. एक छोटा हॉर्न (सिटी )

 अगर आप रेलवे स्टेशन पर खड़े हैं और किसी ट्रेन से एक धीमी सीटी की आवाज आती है तो आप समझ जाइये कि  ट्रेन यार्ड में धुलाई और सफाई के लिए जाने वाली है | ट्रेन का केयरटेकर यानि मोटरमैन रेलगाड़ी को वाशिंगलाइन पर ले जाकर साफ सुथरा करके उसे अगली यात्रा के लिए तैयार करने के लिए ले जा रहा है।

2. दो छोटे हॉर्न (सिटी )

अगर ट्रेन से दो बार सीटी बजने की आवाज आती है तो इसका मतलब है कि रेलगाड़ी यात्रा के लिए तैयार है | ट्रेन की सफाई हो चुकी है और मोटरमैन इसके जरिए गार्ड को संकेत देता है कि वह ट्रेन को यात्रा शुरू करने के लिए रेलवे सिग्नल दे.

3. तीन छोटे हॉर्न (सिटी )

यह आपातकाल स्थिति में बजाया जाता है . रेलगाड़ी से अगर तीन सीटी की आवाज आये तो समझ लीजिए कि ट्रेन  पर से मोटरमैन का  कंट्रेाल ख़त्म हो गया है । इसके बाद गाड़ी को रोकने के लिए गार्ड किसी भी तरह वैक्‍यूम ब्रेक लगाकर उसे रोकने की कोशिश करता है। वैसे तीन बार सीटी बजाने का वक्त बहुत कम ही आता है।

4. चार छोटे हॉर्न (सिटी )

ट्रेन में कुछ टेक्‍निकल प्रॉब्‍लम आ जाये तो चार बार सीटी बजायी जाती है | इसका मतलब है की ट्रेन आगे नहीं जाएगी |  टेक्‍निकल टीम की देखरेख में ट्रेन को यार्ड या स्‍टॉप पर ही छोड़ दिया जाता है।

5. एक लंबा और एक छोटा हॉर्न (सिटी )

जब एक सीटी देर तक और एक धीमी आवाज में बजाई जाती है तो इसका मतलब ये है कि मोटरमैन इंजन को शुरू करने से पहले गार्ड को ब्रेक पाइप सिस्टम सेट करने के लिए सिग्नल दे रहा है. रेलगाड़ी अभी अगली यात्रा के लिए तैयार नही है और रेल का ‘ब्रेक पाइप सिस्‍टम’ सेट किया जाने के बाद  ही ट्रेन को जर्नी के लिए फिट माना जाएगा।

6. दो लंबे और दो छोटे हॉर्न (सिटी )

इस तरह की सीटी से मोटरमैन गार्ड को संकेत देता है कि रेलगाड़ी पूरी तरह से तैयार है और अब वो आकर इसका कंट्रोल अपने हाथ में ले।

7. लगातार बजने वाला हॉर्न 

अगर आपके सामने ये हॉर्न बजे तो आप समझ जाएं कि अभी यह ट्रेन इस स्टेशन पर नहीं रुकेगी |

8. दो छोटे और एक लंबा हॉर्न 

इस तरह के हॉर्न का इस्तेमाल तब किया जाता है जब कोई पैसेंजर चेन खींचकर रेल रोक दे या फिर किसी खास वजह से ट्रेन का वैक्‍यूम ब्रेक लगाया गया हो |

9. दो बार रुककर हॉर्न 

ये हॉर्न रेलवे क्रॉसिंग के पास बजाया जाता है | जब ट्रेन रेलवे क्रॉसिंग से गुजरती है, तो रेलवे ट्रैक के आसपास खड़े यात्री सावधान करने के लिए इस तरह की सीटी का इस्तेमाल होता है।

10. दो लंबे और एक छोटा हॉर्न

इस तरह की सीटी बजने का मतलब होता है कि गाड़ी ट्रैक यानि पटरी बदलकर दूसरे ट्रैक पर जा रही है।

11. रुक- रुक कर 6 बार छोटे हॉर्न 

अगर आप ट्रेन में हैं और 6 बार रुक-रुककर सीटी बजे तो समझ लीजिए कि कोई खतरे घंटी हैl ऐसी सीटी का मतलब होता है कि एलर्ट रहिए क्‍योंकि ट्रेन खतरनाक कंडीशन में है और उसे तत्‍काल सहायता की जरूरत है।
तो दोस्तों कैसी लगी आपको ये जानकारी कमेंट करके जरुर बताये | अब आगे से आप जब भी कभी ट्रेन में सफर करें तो सीटी की इन आवाजों से आप आसानी से समझ जाएंगे कि किस सीटी का क्या मतलब है।

शरणार्थी कैंप में रहने वाले इस लड़के ने क्रोएशिया को फुटबॉल विश्वकप के फाइनल में पहुचायाँ

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क्या आपने कभी क्रोएशिया ( Croatia ) का नाम सुना था ? बहुत सारे लोगो का जवाब होगा नहीं | क्रोएशिया यूरोप का एक छोटा सा देश है। यह 1991 में दुनिया के नक्शे पर आया। लेकिन  क्रोएशिया ने फीफा फुटबॉल विश्वकप 2018 के फाइनल में पहुचकर सभी लोगो को चकित कर दिया | तो चलिए हम आपको बताते है क्रोएशिया फुटबॉल टीम के कप्तान लूका मोड्रिक  की कहानी की कैसे उन्होंने शरणार्थी से क्रोएशिया टीम के कप्तान तक का सफ़र तय किया |

लुका मेड्रिक जीवन परिचय – Biography Of Luka Modric

1991 में यूगोस्लोवाकिया से क्रोएशिया अलग हुआ

क्रोएशिया पहले यह यूगोस्लोवाकिया का हिस्सा हुआ करता था। यूगोस्लोवाकिया में जदर नाम का एक इलाका था जिसमे  9 सितंबर, 1985 को लूका का जन्म हुआ। अब जदर क्रोएशिया में है। क्रोएशिया को आजादी इतनी आसानी से नहीं मिली बल्कि एस्वके लिए लाखो लोगो को अपनी क़ुरबानी देनी पड़ी | देश ने भारी खून खराबा झेला जिसमे लुका का परिवार भी शामिल था

देश ने झेला हिंसा का कहर 

मुल्क को आजादी आसानी से नसीब नहीं हुई। देश ने भारी खून-खराबा झेला। लाखों लोग मारे गए। हजारों घर जलाए गए। लूका के परिवार पर भी हिंसा का कहर टूटा।

लुका के दादा को गोलियों से भुन दिया 

लुका के  माता-पिता एक फैक्टरी में काम करते थे। उस दिन वे काम पर गए थे। दादा जी घर पर थे। अचानक विद्रोही लड़ाकों ने गांव पर धावा बोल दिया। उन्होंने तमाम घरों में आग लगा दी। इनमें लूका का घर भी शामिल था। विद्रोही लोगों को घर से निकालकर मारने भी लगे। लूका के दादा को भी गोलियों से भून दिया गया। चारों तरफ तांडव मचा था। कोई किसी को बचाने वाला नहीं था। मासूम लूका को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्यों हो रहा है। माता-पिता की आंखों में दहशत देख वह भी सहम गए।

 शरणार्थी कैंप में लेनी पड़ी शरण 

घर जलाए जाने के बाद लुका के परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। अपनी जान बचाने के लिए उन्हें  शरणार्थी कैंप में शरण लेनी पड़ी । कैंप के हालात भी बदतर थे। खाने-पीने की चीजों का संकट था। यहां तक कि पीने का साफ पानी भी उपलब्ध नहीं था। तमाम मुश्किलों के बावजूद भी लोग अपनी  जान बचाने के लिए शरणार्थीं कैंप में रहने को मजबूर थे।

लूका बताते हैं,

हमें महीनों बिना बिजली और पानी के रहना पड़ा। बीमार लोगों के इलाज का इंतजाम नहीं था। मगर हम मजबूर थे। हमारे सिर पर मौत का खतरा मंडरा रहा था।

बचपन दहशत के साये में बिता 

इस तरह से उनका बचपन दहशत के साये में बीता। गोलियों और ग्रेनेड की आवाजें रोजमर्रा की बात थी। कोई नहीं जानता था कि क्या होने वाला है? लूका जब भी माता-पिता से पूछते, अब क्या होगा? हम कहां जाएंगे?, तो वह उन्हें हर बार यह कहकर तसल्ली देते कि बेटा, जल्द सब कुछ ठीक हो जाएगा। हिंसा ने लोगों से रोजगार छीन लिया। तमाम फैक्टरी और कारखाने बंद हो गए। उनके माता-पिता के पास भी अब कमाई का कोई जरिया नहीं था। घर जल चुका था। नया घर बनाने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। रोजगार की तलाश में उन्हें काफी भटकना पड़ा। कई शरणार्थी कैंप बदले।

लुका के पढाई लिखाई का रखा गया ध्यान 

लेकिन इन तमाम मुश्किलों  के बीच भी माता-पिता ने लुका  की पढ़ाई का पूरा ख्याल किया। कैंप के करीब ही एक प्राइमरी स्कूल में उनका दाखिला करवा दिया गया।

लूका बताते हैं,

हमारे घर की माली हालत अच्छी नहीं थी। हम लंबे समय तक इधर-उधर भटकते रहे। हमने कई साल शरणार्थी शिविर में गुजारे। वह दौर वाकई बहुत मुश्किल था। हम नहीं जानते थे कि कब तक जिंदा रहेंगे।

बचपन में लगा फुटबॉल  का शौख 

कुछ समय बाद उन्हें एक होटल में शरण मिली। वहां कई और शरणार्थी परिवार थे। माता-पिता अच्छी तरह समझते थे कि मासूम बच्चों के दिल हिंसा  का गहरा असर पड़ा रहा है। इसलिए उन्होंने बच्चों के मन से खौफ निकलने के लिए उनकी खेल कूद का भी ध्यान रखा । लुका 10 साल की उम्र में होटल के लॉन में फुटबॉल खेलने लगे। कई और शरणार्थी बच्चे उनके संग खेलते थे।

लूका बताते हैं,

बचपन से मुझे फुटबॉल का शौक लग गया। मैंने तय कर लिया कि मैं फुटबॉलर बनूंगा। घरवालों ने मेरा साथ दिया।

कोच ने कहा कि तुम फुटबॉल नहीं खेल पाओगे

इस बीच उनके पिता सेना में शामिल हो गए। बेटे के शौक को देखते हुए उन्होंने उसे कोच के पास भेजा। पर कोच ने उन्हें ट्र्रेंनग देने से मना कर दिया। कोच ने कहा कि तुम फुटबॉल नहीं खेल पाओगे। तुम बहुत कमजोर और शर्मीले हो। फुटबॉल के लिए ऐसा लड़का चाहिए, जो स्मार्ट हो और गेंद के पीछे तेज भाग सके। यह सुनकर लूका बहुत निराश हुए। पर उन्होंने हार नहीं मानी। साल 2002 में एक स्थानीय कोच की मदद से उन्हें डायनामो जेग्रेब क्लब में जाने का मौका मिला। तब वह  17 साल के थे। वहां के ट्रेनर ने ट्रायल लिया। उम्मीद के मुताबिक लूका का प्रदर्शन शानदार था। उन्हें क्लब में दाखिला मिला गया। इसी साल उन्हें शहर की युवा टीम की तरफ से खेलने का मौका मिला।

अपनी टीम को विश्वकप के फाइनल तक पहुचाया 

समय के साथ उनके खेल में जबर्दस्त निखार आया। मार्च 2006 में वह पहली बार अर्जेंटीना के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मैदान में उतरे। 2007 में उन्हें प्लेयर ऑफ द ईयर का तमगा मिला। 2012 में वह स्पैनिश क्लब रियाल मैड्रिड से जुड़े। चार साल इंग्लैंड में क्लब फुटबॉल खेला। अब वह क्रोएशिया की फुटबॉल टीम के कप्तान हैं। हाल में क्रोएशियाई टीम ने फीफा वल्र्ड कप केफाइनल में पहुंचकर रिकॉर्ड बना दिया। इससे पहले आज तक वह ऐसा नहीं कर सकी थी। उन्हें इस टूर्नामेंट में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का खिताब मिला।

 

लूका कहते हैं,

युद्ध ने मुझे एक मजबूत इंसान बनाया। मगर मैं उस वक्त को हमेशा अपने साथ लेकर जीना नहीं चाहता। अब मैं फुटबॉल के जरिए अपने देश को सबसे आगे देखना चाहता हूं।

संसाधनों की कमी के बावजूद भारत को गोल्ड दिलाने वाली हिमा दास की प्रेरणादायक कहानी

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आज हम बात करने वाले है फ़िनलैंड में जाकर देश का तिरंगा लहराने वाली एक ऐसी भारतीय लड़की के बारे में जिसने संसाधनों की कमी के बावजूद स्वर्ण पदक जीत कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया | हम बात कर रहे है असम के साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली भारतीय रेसर हिमा दास के बारे में जो आईएएएफ वर्ल्ड अंडर 20 चैंपियनशिप में  400 मीटर दौड़ गोल्ड मैडल जितने वाली प्रथम भारतीय महिला बन गयी है |

Hima Das Biography in Hindi | हिमा दास का जीवन परिचय

जन्म और प्रारंभिक जीवन

हिमा का जन्म 9 जनवरी 2000 को असम राज्य के नौगांव जिले के ढिंग गाँव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था | हिमा दास के पिता का नाम जोमाली दास ( Hima Das father name ) और माता का नाम रोंजित दास ( Hima Das mother name ) है। उनका परिवार एक संयुक्त परिवार था जिसमे कुल 16 सदस्य थे | हिमा के पांच भाई बहन है और ये उनके परिवार में सबसे छोटी लड़की है । जिले में ज्यादातर किसान धान की खेती करते हैं। उनके परिवार का गुजारा भी धान की खेती से होता था।

बचपन में फुटबॉल की शौक़ीन 

हिमा ने बचपन से ही बाढ़ दंश झेला है | बारिश में अक्सर गाँव और आसपास के इलाकों में बढ़ आ जाती थी जिसके कारण उनकी फासले ख़राब हो जाती थी और परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता था। इन सब कठिनाईयों के बावजूद भी इनके किसान पिता ने कभी बच्चों को पढ़ने-लिखने से नहीं रोका। छह भाई-बहनों में सबसे छोटी हिमा को बचपन में फुटबॉल का शौक चढ़ गया। तब वह गली-मोहल्लों के लड़कों के संग फुटबॉल खेला करती थीं। उन्होंने बच्चों के संग मिलकर अपनी मोहल्ला टीम भी बना ली थी।

मैच जीतने पर इनाम के तौर पर पेन या टॉफी मिलती, जिसे पाकर हिमा बहुत खुश हो जाती थीं। अच्छे प्रदर्शन के कारण हिम बाद में जिला स्तर पर खेलने लगीं।अब उन्हें  इनाम के तौर पर  सौ या दो सौ रुपये मिलने लगे।  यह इनामी राशी हिमा के लिए बहुत बड़ी थीजिसके कारण वह फुटबॉलर बनने का सपना देखने लगीं। टीवी पर बड़े फुटबॉलरों को देखकर उनकी तरह खेलने की कोशिश करने लगीं। अच्छी बात यह थी कि घरवालों ने कभी उन्हें खेलने से नहीं रोका।

स्कूल टीचर ने दी धावक बनने की सलाह 

जिला स्तर के टूर्नामेंट के दौरान खेल टीचर ने देखा कि यह लड़की बहुत तेज दौड़ती है। उन्होंने हिमा को धावक बनने की सलाह दी। हिमा कहती हैं- फुटबॉल में काफी दौड़ना पड़ता है, इसलिए मेरा स्टेमिना बढ़ता गया। पर मुझे नहीं पता था कि मैं धावक बन सकती हूं। यह एहसास स्कूल टीचर ने कराया। इसके बाद वह राज्य स्तरीय 100 मीटर दौड़ में हिस्सा लेने लगीं। हालांकि तब तक वह तय नहीं कर पाई थीं कि उन्हें धावक बनना है या नहीं? मन में फुटबॉलर बनने का सपना अब भी कायम था। वह चाहती थीं कि नेशनल फुटबॉल टीम में उन्हें मौका मिले।

निपुण दास ने उनके अंदर छिपी प्रतिभा को पहचाना 

पिछले साल जनवरी में हिमा गुवाहाटी के एक कैंप में ट्रेनिंग के लिए पहुंचीं। प्रैक्टिस के दौरान रोजाना सुबह ट्रैक पर भागना पड़ता था। एक दिन कोच निपुण दास ने उन्हें ट्रैक पर दौड़ते देखा। उन्हें लगा कि यह लड़की तो कमाल की धावक है। अगर इसे सही ट्रेनिंग और मौका मिला, तो यह पूरी दुनिया जीत लेगी।

निपुण बताते हैं-

मैंने हिमा को ट्रैक पर दौड़ते देखा। उसकी स्पीड बहुत ज्यादा थी। तब मैंने सोचा कि मैं इस लड़की को ट्रेनिंग दूंगा।

उनका परिवार ट्रेनिंग का खर्च उठाने में था असमर्थ 

प्रैक्टिस के बाद कोच ने हिमा से  बात की और गुवाहाटी में ट्रेनिंग लेने की सलाह दी। हिमा ने कहा, पापा इजाजत नहीं देंगे। इसके बाद कोच उनके घर गए और माता-पिता से बात की। ट्रेनिंग सेंटर गांव से करीब 150 किमी दूर था। पापा बेटी को ट्रेनिंग दिलाने को राजी थे, पर उसका परिवार उसके खर्च उठाने में असमर्थ था । उन्होंने कोच से कहा कि वह हिमा के बाहर रहने-खाने का खर्च नहीं उठा सकते हैं। कोच को हिमा में असीम संभावनाएं दिख रही थीं। वह चाहते थे कि देश को एक बेहतरीन खिलाड़ी मिले, इसलिए वह उनका सारा खर्च उठाने को राजी हो गए।

निपुण बताते हैं,

मैंने घरवालों से कहा कि आपकी बेटी बहुत काबिल है। उसे आगे बढ़ने से मत रोकिए। उसकी ट्रेनिंग और रहने-खाने का खर्च मैं उठाऊंगा। आप बस गुवाहाटी जाने की उसे इजाजत दे दीजिए

पिता ने दी गुवाहाटी जाने की इजाजत 

यह सुनते ही घरवाले खुश हो गए। मां को बेटी से दूर रहने का मलाल तो था, पर वह जानती थीं कि बाहर जाकर वह कुछ कमाल करने वाली है। पिता ने उन्हें गुवाहाटी जाने की इजाजत दे दी।

400 मीटर दौड़ के लिए हुई ट्रेनिंग 

अब कड़ी ट्रेनिंग का वक्त था। ट्रेनिंग सेंटर में प्रैक्टिस के साथ खान-पान और व्यायाम के कड़े नियम पालन करने पड़े। कोच ने शुरुआत में उन्हें 100 मीटर की रेस कराई, जिसे हिमा ने रिकॉर्ड समय में पूरा किया। इसके बाद 200  मीटर रेस में हिस्सा लिया, यहां भी वह अव्वल रहीं। अब ट्रेनर को यकीन हो चला था कि यह लड़की 400 मीटर की दौड़ में हिस्सा लेने लायक बन चुकी है।

कॉमनवेल्थ गेम्स में मिला छठा स्थान 

नेशनल टीम में खेलने के बाद अप्रैल में गोल्ड कोस्ट में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा लेने का मौका मिला। यहां 400 मीटर स्पद्र्धा में वह छठे स्थान पर रहीं। इस टूर्नामेंट में उन्होंने 52:32 सेकंड में दौड़ पूरी की। एक साल के अंदर किस्मत बदल चुकी थी। उन्हें जूनियर एशियन चैंपियनशिप और वल्र्ड यूथ चैंपियनशिप में भी खेलने का मौका मिला। कामयाबी का सिलसिला चल पड़ा।

भारत को दिलाया गोल्ड मेडल

इस हफ्ते हिमा ने एक ऐसा धमाल किया जिसके कारण सभी भारतीयों का सर गर्व से ऊँचा हो गया | उन्होंने गुरुवार को फिनलैंड में आईएएएफ वल्र्ड अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 400 मीटर दौड़ स्पद्र्धा में गोल्ड मेडल जीतकर रिकॉर्ड बना दिया। उन्होंने यह दौड़ मात्र 51: 45 सेकंड में पूरी की। 18 साल की उम्र में यह रिकॉर्ड बनाने वाली वह देश की पहली महिला धावक हैं। फिनलैंड में जब उन्हें तिरंगा पहनाकर गोल्ड मेडल दिया गया, तो उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े।

अंतिम 100 मीटर में लगा देती है अपनी जान 

रेस के शुरुआती 35 सेकेंड तक हिमा शीर्ष तीन में भी नहीं थीं, शायद ही किसी ने उन्हें फ़िनलैंड के ट्रैक पर लाइव दौड़ते हुए देखा होगा.लेकिन एक शख्स थे जिन्हें हिमा की इस रेस का बेसब्री से इंतज़ार था. वे थे उनके कोच निपुण दास. हिमा के यूं अंतिम वक़्त में रफ़्तार पकड़ने पर निपुण दास कहते हैं, “रेस में जब आखिरी 100 मीटर तक हिमा चौथे स्थान पर थी तो मुझे यक़ीन हो गया था कि वह इस बार गोल्ड ले आएगी, मैं उसकी तकनीक को जानता हूं वह शुरुआत में थोड़ी धीमी रहती है और अपनी पूरी ऊर्जा अंतिम 100 मीटर में लगा देती है. यही उसकी खासियत है.

निपुण कहते हैं,

“हिमा को ट्रैक के कर्व (मोड़) पर थोड़ी समस्या होती है यह बहुत हल्की सी दिक्कत है. यही वजह है कि शुरुआत में वह हमेशा पीछे ही रहती है लेकिन जब ट्रैक सीधा हो जाता है तो वह तेज़ी से रिकवर करते हुए सबसे आगे निकल जाती है.”

हिमा के गोल्ड मेडल जितने के बात प्रधानमंत्री सहित कई राजनेताओ ने ट्वीट करके हिमा को बधाई दी । आशा करते है की आनेवाले समय में हिमा कई रिकॉर्ड बनाये और भारत का नाम ऊचा करे।

जानिए- क्या होता है ट्रेन के नीले, लाल रंग के डिब्बों का मतलब ?

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  ट्रेन में तो आपने बहुत बार सफ़र किया है लेकिन क्या आपने कभी  गौर किया है की ट्रेन का रंग नीला या लाल या कोई और रंग का क्यों होता है .

आपने गौर किया होगा की ट्रेनों के डब्बे पुराने समय में मेहरून रंग के हुआ करते थे और अब ज्यादातर नीले रंग के होते है और तेज रफ़्तार गाड़ियां जैसे राजधानी आदि के लाल रंग के होते है ।इस रंग के पीछे भी कई कारण होते हैं और हर कोच के लिए अलग रंग तय होता है. कोच की डिजाइन और विशेषता के आधार पर इनका रंग तय किया जाता है. आइए जानते हैं किस तरह के कोच में कौन-सा रंग किया जाता है…

आइसीएफ कोच

देश में दो तरह की कोच वाली ट्रेनें उपयोग में लाई जा रही हैं एक है आइसीएफ कोच जिसका मतलब होता है इंटीग्रल कोच फैक्ट्री जो चेन्नई में स्थित है. आइसीएफ कोच की स्पीड 70 से 140 किमी प्रति घंटा होती है। इनके कोच मेल एक्सप्रेस या सुपरफास्ट ट्रेनों में लगाए जाते हैं. चेन्नई स्थित आइसीएफ की स्थापना 1952 में की गई थी. ये फैक्ट्री भारतीय रेलवे के अधीन काम करती है, यहाँ हर तरह के कोच बनाए जाते हैं जिसमें एसी, स्लीपर, जनरल, डेमू और मेमू कोच शामिल हैं !

 

एलएचबी कोच

जबकि दूसरा है एलएचबी कोच जिसका मतलब होता है (Linke Hofmann Busch)। ये आइसीएफ कोच से अलग होती हैं. देश की सबसे तेज ट्रेन गतिमान एक्सप्रेस, शताब्दी एक्सप्रेस और राजधानी एक्सप्रेस में LHB (Linke Hofmann Busch) कोच का प्रयोग किया जाता है. जबकि की क्षमता 160 से 180 किमी प्रति घंटे की होती है. ICF कोच के मुकाबले LHB कोच काफी बेहतरीन होते है। बता दें, LHB कोच को फास्ट स्पीड ट्रेन के लिए ही डिजाइन किया गया है. LHB कोच में रेलवे यात्रियों की यात्रा काफी सुरक्षित माना जाता है, और इन कोचों में दुर्घटना होने की आशंका कम रहती है! स्टेलनेस स्टील तथा एल्युमिनियम से बने और एंटी टेलीस्कोपिक सिस्टम से लैस एलएचबी कोच के डिब्बे पटरी से आसानी से नही उतरते। भारत में उत्तम तकनीक से डिब्बे तैयार किये जाते है पर फिर भी लापरवाही के चलते यहाँ पर रेलें दुर्घटना ग्रस्त हो जाती है। आपको बता दें भारत दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क्स में से एक है।

नीला रंग

आपने देखा होगा कि अधिकतर ट्रेनों का रंग नीला होता है. बता दें कि 90 के दशक में सभी भूरे लाल रंग के ट्रेनों को बदल कर निला कर दिया गया था!

लाल रंग

ICF वातानुकूलित ट्रेन में लाल रंग के कोच का उपयोग होता है. अधिकतम राजधानी एक्सप्रेस ट्रेनों के रंग लाल होते हैं. इनमें सभी कोच वातानुकूलित होते हैं!

हरा रंग

गरीब रथ ट्रेन में हरे रंग के कोच का उपयोग होता है. आपने देखा होगा कि भारतीय रेल ने जितनी भी गरीब रथ ट्रेनों की शुरुआत की है उन सभी का रंग हरा होता है!

भूरा रंग

मीटर गेज ट्रेन में भूरे रंग के कोच का उपयोग होता है.

सफेद- लाल -नीले रंग की ट्रेन

इन रंगों के अलावा कभी-आपने पटरियों पर सफेद-नीले या सफेद-लाल रंग के ट्रेनों को भी देखा होगा। इनके संबंध में आपको बता दें कि कुछ रेलवे जोन ने अपने स्वयं के रंगों को नामित किया है, जैसे कि केंद्रीय रेलवे की कुछ ट्रेनें सफेद-लाल-नीली रंग योजना का पालन करती हैं. आपको जानकर हैरानी होगी कि दूरंतो कोच का रंग पीला और हरा है जो कि ममता बनर्जी की एक पेंटिंग से प्रेरित है!

ट्रेन के कोच पर अलग-अलग रंग की धारियों का मतलब

अकसर ट्रेन में सफर करते वक्त आपने रंगीन कोचों के साथ किसी-किसी ट्रेनों के कोचों पर बनी अलग-अलग रंग की धारियों को भी देखा होगा जैसे कि पीली या सफेद इत्यादि। क्या आपने कभी सोचा है कि ये रंगीन कोच पर बनी धारीयाँ क्या दर्शाती हैं. हमारे भारतीय रेलवे में बहुत सारी चीजों को समझाने के लिए एक विशेष प्रकार के सिंबल का उपयोग किया जाता है जैसे कि ट्रैक के किनारे बने सिंबल, प्लेटफार्म पे सिंबल!

-ब्लू (blue) रंग के ICF कोच पर कोच के अंत में खिड़की के ऊपर पीली या सफेद कलर की लाइनों या धारियों को लगाया जाता है जो कि वास्तव में इस कोच को अन्य कोच से अलग करने के लिए उपयोग किए जाते हैं। ये लाइनें द्वितीय श्रेणी के अनारक्षित कोच को इंगित करते हैं!