मूलमंत्र कविता – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
मूलमंत्र – कविता द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी केवल मन के चाहे से ही मनचाही होती नहीं किसी की। बिना चले कब कहाँ हुई है मंज़िल पूरी यहाँ किसी की।। पर्वत की चोटी छूने को पर्वत पर चढ़ना पड़ता है। सागर से मोती लाने को गोता खाना ही पड़ता है।। उद्यम किए बिना तो चींटी भी अपना…
