कविता

  • नर हो न निराश करो मन को मैथिलीशरण गुप्त

    नर हो न निराश करो मन को मैथिलीशरण गुप्त (MAITHILI SHARAN GUPT)   कुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो, न निराश करो मन को संभलो कि सुयोग न…

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    GULABI CHUDIYA-NAGARJUN

    गुलाबी चूड़ियाँ नागार्जुन जब भी कभी नागार्जुन जी का नाम दिमाग में आया सबसे पहले गुलाबी चूड़ियाँ ही याद आई …… कभी कभी पुरानी यादें लौट आती है आज भी याद है स्कूल में हिंदी की क्लास में एक ट्रक ड्राईवर के बारें में ऐसे पिता का वात्सल्य जो परदेस में रह रहा है घर…

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    नर हो न निराश करो मन को – मैथिलीशरण गुप्त

    नर हो, न निराश करो मन को  मैथिलीशरण गुप्त (MAITHILI SHARAN GUPT)   कुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो, न निराश करो मन को संभलो कि सुयोग न…

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    KABHI YU BHI AA-BASHIR BADRA

    कभी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न हो बशीर बद्र (BASHIR BADR) कभी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़ दे मगर उसके बाद सहर न हो वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है मुझे ये सिफ़तभी अताकरे तुझे भूलने की दुआ…

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    VEERO KA KAISA HO VASANT-SUBHADRA KUMARI CHAUHAN

    वीरों का हो कैसा वसन्त सुभद्रा कुमारी चौहान (SUBHADRA KUMARI CHAUHAN) आ रही हिमालय से पुकार है उदधि गरजता बार बार प्राची पश्चिम भू नभ अपार; सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्त वीरों का हो कैसा वसन्त फूली सरसों ने दिया रंग मधु लेकर आ पहुंचा अनंग वधु वसुधा पुलकित अंग अंग; है वीर देश में…

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    AA GAYE TUM – NIDHI SAXENA

    आ गए तुम(कविता ) निधि सक्सेना आ गए तुम!! द्वार खुला है अंदर आ जाओ.. पर तनिक ठहरो ड्योढी पर पड़े पायदान पर अपना अहं झाड़ आना.. मधुमालती लिपटी है मुंडेर से अपनी नाराज़गी वहीँ उड़ेल आना .. तुलसी के क्यारे में मन की चटकन चढ़ा आना.. अपनी व्यस्ततायें बाहर खूंटी पर ही टांग आना…

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    KABHI YUN MILE KOI -BASHIR BADR

    कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत, कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो   बशीर बद्र (BASHIR BADR ) कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत, कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो मुझे अपनी कोई ख़बर न हो, तुझे अपना कोई पता न हो वो फ़िराक़ हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन वो ग़ुलाब बन के…

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    ADARSH PREM -HARIVANSH RAI BACHCHAN

    आदर्श प्रेम / हरिवंशराय बच्चन प्यार किसी को करना लेकिन कह कर उसे बताना क्या अपने को अर्पण करना पर और को अपनाना क्या गुण का ग्राहक बनना लेकिन गा कर उसे सुनाना क्या मन के कल्पित भावों से औरों को भ्रम में लाना क्या ले लेना सुगंध सुमनों की तोड उन्हे मुरझाना क्या प्रेम…

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    SHAKTI AUR KSHAMA -RAMDHARI SINGH DINAKAR

    शक्ति और क्षमा (कविता )  रामधारी सिंह “दिनकर” क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल सबका लिया सहारा पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो, कहाँ, कब हारा? क्षमाशील हो रिपु-समक्ष तुम हुये विनत जितना ही दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही। अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है पौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर…

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    यह कदम्ब का पेड़ -सुभद्राकुमारी चौहान

    यह कदम्ब का पेड़ रचनाकार: सुभद्राकुमारी चौहान यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे। मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।। ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली। किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।। तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता। उस नीची डाली से अम्मा…