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Thursday, March 19, 2026
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AZIM PREMJI BIOGRAPHY IN HINDI

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अजीम प्रेमजी

 ( चेयरमैन, विप्रो लिमिटेड )

हम हर बात के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। 
यह सोच बदलनी होगी। अगर आप समर्थ हैं। 
आपके पास दौलत है, तो समाज के लिए कुछ करिए। 
जब आपके पास पैसा और ताकत, दोनों हों,
 तब समाज के प्रति आपकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
 
उन दिनों देश में आजादी का आंदोलन चरम पर था। जनता अंग्रेजों की सत्ता से निजात पाने को बेताब थी। गलियों में ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे गूंज रहे थे। 24 जुलाई, 1945 को मुंबई के एक प्रतिष्ठित निजारी इस्माइली शिया मुस्लिम परिवार में अजीम प्रेमजी का जन्म हुआ।
उनके पिता मोहम्मद हाशिम प्रेमजी तेल और साबुन का कारोबार करते थे। बेटे का जन्म परिवार के लिए खुशियों की सौगात लेकर आया। अजीम जब दो साल के थे, तब देश आजाद हुआ। लेकिन देश विभाजन की मांग ने आजादी के जश्न को रोशन होने से पहले ही बुझा दिया। हिंदू-मुस्लिम दंगे शुरू हो गए। सांप्रदायिक नफरत और हिंसा के बीच तमाम मुस्लिम परिवार अपनी सरजमीं छोड़ पाकिस्तान रवाना होने लगे। उदारवादी विचारों वाले अजीम के पिता देश के हालात से बहुत आहत थे।विभाजन के बाद पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें पाकिस्तान आने का न्योता दिया। करीबी रिश्तेदारों की तरफ से मशवरे आए। कहा गया, हिन्दुस्तान में गैरों के बीच रहकर क्या करोगे? पाकिस्तान चले आओ, यहां अपनी कौम के लोगों के बीच जीने का मौका मिलेगा। लेकिन हाशिम ने भारत में ही रहने का फैसला किया। जिस साल अजीम का जन्म हुआ, उसी साल पिता ने महाराष्ट्र के जलगांव जिले में ‘वेस्टर्न इंडियन वेजिटेबल प्रोडक्ट्स लिमिटेड’ की स्थापना की। यह कंपनी ‘सनफ्लावर वनस्पति’ और कपड़े धोने के साबुन’ बनाती थी।

स्कूली पढ़ाई के बाद वह 12वीं कक्षा में पहुंच चुके थे। पिता चाहते थे कि कारोबार की कमान संभालने से पहले बेटा अमेरिका जाकर तालीम हासिल करे। अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी पहुंचकर अजीम को नया माहौल मिला। उन दिनों अमेरिकियों के लिए कंप्यूटर आम चीज थी, जबकि भारत में कंप्यूटर का चलन बिल्कुल न था। पहली बार उन्होंने आईटी के महत्व को जाना। सुनहरे भविष्य के सपनों के साथ वह पढ़ाई में जुट गए। परदेस में पढ़ाई पूरी करने के बाद वह स्वदेश लौटकर कुछ नया काम शुरू करना चाहते थे।

इस बीच अचानक पिताजी के इंतकाल की खबर आई। बीच में ही पढ़ाई छोड़कर अजीम घर लौट आए। वह कहते हैं, तब मैं 21 साल का था। कई लोगों ने कहा कि विदेश में पढ़ाई की है। तेल-साबुन के बिजनेस में मत पड़ो। बेहतर है कि मोटे वेतन और बढ़िया सुविधाओं वाली नौकरी कर लो। पीछे मुड़कर देखता हूं, तो लगता है कि बिजनेस संभालने का मेरा फैसला सही था। उन्होंने पिता के कारोबार की कमान थाम ली। काम करने का अंदाज ऐसा कि सब कहने लगे, बेटा तो पिता से भी ज्यादा तरक्की करेगा।

उन दिनों देश आईटी क्षेत्र में काफी पीछे था। अमेरिका से लौटे अजीम को इस क्षेत्र में बेशुमार संभावनाएं नजर आईं। उन्होंने इसी क्षेत्र में कंपनी के विस्तार का फैसला किया। सवाल उठा, भारत जैसे देश में, जहां बिजली-पानी के लिए तरसना पड़ता है, वहां भला कंप्यूटर कौन चलाएगा? पर अजीम तय कर चुके थे।

1980 में उन्होंने अपनी कंपनी का नाम बदलकर विप्रो लिमिटेड कर दिया। उनकी कंपनी अमेरिका के सेंटिनल कंप्यूटर कॉरपोरेशन के साथ मिलकर मिनी-कंप्यूटर बनाने लगी। लोगों की आशंकाएं गलत साबित हुईं। कारोबार बढ़ चला। देखते-देखते विप्रो देश की बड़ी कंपनी बन गई।

अजीम कहते हैं- यदि लोग आपके लक्ष्य पर हंस नहीं रहे हैं, तो इसका मतलब यह है कि लक्ष्य बहुत छोटे हैं। इसलिए किसी के हंसने की परवाह मत कीजिए

अजीम भारत के धनाढ्यों में शुमार होने लगे। सन 1999 से लेकर सन 2005 तक वह भारत के सबसे धनी व्यक्ति रहे। सबसे बड़ी बात यह रही कि उन्होंने धन-दौलत के साथ सम्मान भी कमाया। अपनी कंपनी के कर्मचारियों के लिए वह दुनिया के सबसे अच्छे बॉस, तो आम लोगों के लिए सबसे अच्छे इंसान साबित हुए।

साल 2001 में ‘अजीम प्रेमजी फाउंडेशन’ की स्थापना की। इसका मकसद गरीब व बेसहारा लोगों की मदद करना है। यह फाउंडेशन कई राज्यों में सरकार के साथ मिलकर शिक्षा क्षेत्र में काम करता है। अजीम कहते हैं- हमारे देश में लाखों बच्चे स्कूल नहीं जाते। देश को आगे ले जाने के लिए शिक्षा सबसे जरूरी जरिया है।

जून, 2010 में दुनिया के दो सबसे बड़े दौलतमंद कारोबारी बिल गेट्स और वारेन बफेट ने ‘द गिविंग प्लेज’ अभियान शुरू किया। यह अभियान दुनिया के अमीर लोगों को इस बात के लिए प्रेरित करता है कि वे अपनी अकूत संपत्ति का कुछ हिस्सा परोपकार पर खर्च करें। अजीम इस अभियान में शामिल होने वाले पहले भारतीय बने।

सन 2010 में उन्होंने देश में स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए करीब दो अरब डॉलर का दान दिया। साल 2013 में उन्होंने अपनी दौलत का 25 फीसदी दान में दे दिया। अजीम कहते हैं, मुङो लगता है कि अगर ईश्वर ने हमें दौलत दी है, तो हमें दूसरों के बारे में जरूर सोचना चाहिए। ऐसा करके ही हम एक बेहतर दुनिया बना पाएंगे। टाइम मैग्जीन ने दो बार उन्हें दुनिया के शीर्ष 100 प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल किया। उन्हें पद्म भूषण व पद्म विभूषण से सम्मानित किया चुका है।प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

हम हर बात के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। यह सोच बदलनी होगी। अगर आप समर्थ हैं। आपके पास दौलत है, तो समाज के लिए कुछ करिए। जब आपके पास पैसा और ताकत, दोनों हों, तब समाज के प्रति आपकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है।

पुरस्कार और सम्मान

 
  • बिजनेस वीक द्वारा प्रेमजी को महानतम उद्यमियों में से एक कहा गया है
  • सन 2000 में मणिपाल अकादमी ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया सन
  • सन 2005 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया
  • 2006 में ‘राष्ट्रीय औद्योगिक इंजीनियरिंग संस्थान, मुंबई, द्वारा उन्हें लक्ष्य बिज़नेस विजनरी से सम्मानित किया गया
  • 2009 में उन्हें कनेक्टिकट स्थित मिडलटाउन के वेस्लेयान विश्वविद्यलाय द्वारा उनके उत्कृष्ट लोकोपकारी कार्यों के लिए डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया
  • सन 2011 में उन्हें भारत सरकार द्वारा देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया
  • सन 2013 में उन्हें ‘इकनोमिक टाइम्स अचीवमेंट अवार्ड’ दिया गया
  • सन 2015 में मैसोर विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया
निजी जीवनअजीम प्रेमजी का विवाह यास्मीन के साथ हुआ और दंपत्ति के दो पुत्र हैं – रिषद और तारिक। रिषद वर्तमान में विप्रो के आई.टी. बिज़नेस के ‘मुख्य रणनीति अधिकारी’ हैं।

टाइम लाइन (जीवन घटनाक्रम)

1945: 24 जुलाई को अजीम रेमजी का जन्म मुंबई में हुआ

1966: अपने पिता की मृत्यु के बाद अमेरिका से पढ़ाई छोड़ भारत वापस आ गए

1977: कंपनी का नाम बदलकर ‘विप्रो प्रोडक्ट्स लिमिटेड’ कर दिया गया

1980: विप्रो का आई.टी. क्षेत्र में प्रवेश

1982: कंपनी का नाम ‘विप्रो प्रोडक्ट्स लिमिटेड’ से बदलकर ‘विप्रो लिमिटेड’ कर दिया गया

1999-2005: सबसे धनी भारतीय रहे

2001: उन्होंने ‘अजीम प्रेमजी फाउंडेशन’ की स्थापना की

2004: टाइम मैगज़ीन द्वारा दुनिया के टॉप 100 प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल किया

2010: एशियावीक के विश्व के 20 सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों की सूचि में नाम

2011: टाइम मैगज़ीन द्वारा दुनिया के टॉप 100 प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल किया

2013: प्रेमजी ने अपने धन का 25 प्रतिशत भाग दान कर दिया और अतिरिक्त 25 प्रतिशत अगले पांच सालों में दान करने की भी घोषणा की

साभार – हिंदुस्तान अख़बार

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BOB DYLAN BIOGRAPHY IN HINDI

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बॉब डिलन

( नोबेल पुरस्कार विजेता )

 
ज्यादातर लोग वे बातें करते हैं, जिन पर उनका यकीन ही नहीं होता। इसलिए वे कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। दरअसल, वे अपनी सुविधा के अनुसार काम करते हैं। इससे किसी का भला नहीं होगा, न आपका और न समाज का।
अमेरिका के एक साधारण यहूदी परिवार में जन्मे बॉब के बचपन का नाम रॉबर्ट ऐलन जिमरमन था। बाद में उन्होंने अपना नाम बॉब डिलन रख लिया। पिता अबराम और मां बीट्रीस का संगीत से कोई नाता न था। अलबत्ता उनके घर में रेडियो पर गीत जरूर सुने जाते थे। नन्हे बॉब को बचपन से गीत सुनने की लत लग गई। खेल-कूद की दुनिया से दूर वह घंटों रेडियो से चिपके रहते थे। वह 1940 का दौर था। उन दिनों अमेरिकी समाज में अश्वेतों की दशा खराब थी। वे भेदभाव और दुर्भावना के शिकार थे। बॉब का बालमन कभी इसे स्वीकार नहीं कर पाया।
स्कूल के दिनों में उन्होंने दोस्तों के संग मिलकर एक म्यूजिक बैंड बनाया। गीतों के जरिये वह मन की बातें बयान करने लगे। तब बॉब डिलन दसवीं में थे। स्कूल में म्यूजिक टैलेंट शो हुआ। उन्होंने तैयारी की, पर ऑडिशन में रिजेक्ट हो गए। दुख हुआ, पर इससे संगीत के प्रति उनकी दीवानगी कम नहीं हुई। साल 1959 में मिनीसोटा यूनिवर्सिटी में पढ़ने पहुंचे। यहां उनके विचारों को नया आसमान मिला। बड़ी खूबसूरती से उन्होंने अपने विचारों को गीतों में ढाला। शुरुआती दिनों में बॉब कॉलेज के पास एक कॉफी हाउस में गाया करते थे। सुनने वालों के लिए हमेशा यह कौतुहल रहा कि मासूम-सी सूरत वाला यह युवा प्रेम गाने की बजाय विद्रोही विचारों को स्वर क्यों दे रहा है?
 1961 में कॉलेज की पढ़ाई के बाद संगीत में करियर बनाने के इरादे से वह न्यूयॉर्क पहुंचे। यहां एक म्यूजिक क्लब में काम मिला। 1961 में पहला म्यूजिक एलबम आया। बॉब बाकी गायकों की तरह दूसरों के लिखे गीत नहीं, बल्कि अपने गीत गाते थे। उनके गीतों में हमेशा एक खास किस्म का अक्खड़पन रहा। इसी अंदाज में वह आम लोगों के दुख-दर्द बयां करने लगे। उनके गीतों में राजनीतिक, सामाजिक, दार्शनिक और साहित्यिक विधा का खूबसूरत मेल दिखा। गीत लिखने के अलावा वह पेंटिंग के भी शौकीन रहे। बॉब के ज्यादातर मशहूर गीत 1960 के दशक में लिखे गए।
यह वह दौर था, जब अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नेतृत्व में अश्वेत आंदोलन चरम पर था। अश्वेत समुदाय के लोग नागरिक अधिकारों की मांग को लेकर सड़कों पर थे। बॉब के गीतों में इस आक्रोश को आवाज मिली। वह मार्टिन लूथर किंग के विचारों के कायल थे। कहते हैं कि लूथर किंग के ऐतिहासिक भाषण आई हैव अ ड्रीम के दौरान वह उनके साथ मंच पर मौजूद थे। यही वह दौर था, जब श्वेत नागरिक भी वियतनाम में अमेरिकी दखल के खिलाफ उठ खड़े हुए थे। बॉब ने इस जन-असंतोष को अपने गीतों में बड़ी संजीदगी के साथ पेश किया। कुछ लोग उन्हें विद्रोही गीतकार भी कहते हैं। लोक संगीत से लेकर पॉप व रॉक ऐंड रोल गीतों में उन्होंने हालात और समय के मिजाज को व्यक्त किया। उनके गीत ब्लोइंग इन द विंड और द टाइम्स दे आर अ चेंजिंग उस दौर के आंदोलनों के नारे बन गए। जब भी मौका मिला, उन्होंने सामाजिक असमानता के प्रति नाराजगी जाहिर की।
बॉब कहते हैं, समानता सिर्फ लोगों की बातों में दिखती है। हम सबमें बस एक ही समानता है कि हम सबको मरना है। बाकी सब असमान है। अमेरिकी अवाम के लिए वह सिर्फ गायक कभी नहीं रहे। उनका संगीतमय सफर अपने आप में एक आंदोलन रहा। उनकी कविताओं और गीतों में व्यवस्था बदलने की बेचैनी दिखी, तो प्रशासन को चुनौती देने का साहस भी नजर आया। दासता के खिलाफ वह हमेशा मुखर रहे। बॉब कहते हैं, कोई आजाद नहीं है। यहां तक कि परिंदे भी आसमान की जंजीरों में जकड़े हैं। पिछले साठ साल में उन्होंने शोहरत की बुलंदियों को छुआ। वह दुनिया में सबसे अधिक बिकने वाले गीतकारों में शुमार हैं। सबसे बड़ा सम्मान तो यह है कि दुनिया ने उन्हें आम जनता का गीतकार माना।
 सबसे ज्यादा शोहरत मिली 1965 में, जब उनके छह मिनट के गीत लाइक अ रोलिंग स्टोन ने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। उनकी कविताओं में ऐसा जादू था, जिसे सुनकर पॉप संगीत पर थिरकने वाले युवा लोक गीतों के दीवाने हो गए। बॉब ने दुनिया का पहला प्रेम-विरोधी गीत इट एंट मी बेब लिखा। इसे पूरी दुनिया ने सराहा। उनके गीत विजन्स ऑफ जोआना को दुनिया का सबसे महान गीत कहा गया। संगीत के इस लंबे सफर में उन्होंने खुद को सुर्खियों से दूर रखने की पूरी कोशिश की। बॉब कहते हैं, सुर्खियां एक तरह से बोझ हैं, इसलिए मैं खुद को इससे दूर रखता हूं।
 आसमान छूती बुलंदियों और शोहरत के बीच बॉब ने हमेशा सत्ता से दूरी बनाए रखी। वह कभी सत्ता के दबाव में नहीं आए। वह हमेशा बड़े लोगों के करीब आने से बचते रहे। राष्ट्रपति बराक ओबामा एक किस्सा बताते हैं- एक बार मैं बॉब के शो में गया। वह अपना कार्यक्रम देकर मंच से उतरे, दर्शकों के बीच बैठे, मुझसे हाथ मिलाया और बाहर चले गए। उन्होंने मेरे साथ बैठने या फोटो खिंचवाने की जरूरत नहीं समझी। मुङो उनका यह अंदाज अच्छा लगा। इस साल बॉब को साहित्य के नोबेल के लिए चुना गया है। वह एकमात्र ऐसे शख्स हैं, जिन्हें ऑस्कर, नोबेल और ग्रैमी, तीनों अवॉर्ड से नवाजा गया है।
साभार – हिंदुस्तान अख़बार

Jitne Wala Hi Nahi-Nice Saying Images

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जितने वाला ही नहीं बल्कि कहाँ हारना है

ये जानने वाला भी “सिकंदर ” होता है 

Wo Dost Meri Najaro Me Bahut Mayne Rakhte Hai-Nice Saying Images

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वो “दोस्त “मेरी नजरों में बहुत मायने रखते है 

वक्त आने पर सामने जो मेरे आईना रखते है 

Sab Kuch Mil Jaye To Jine Ka Kya Maza Hai-Nice Saying Image

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सब कुछ मिल जाये 

तो जीने क्या मजा 

जीने के लिए एक कमी भी जरुरी है

Mujhe Itna Bhi Niche Mat Girao-Nice Saying Images

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मुझे इतना निचे भी मत गिराना 

हे इश्वर !

की मै पुकारू और तू सुन न पाए 

और इतना ऊँचा भी मत उठाना 

की तू पुकारे और मै सुन न पाऊ

Juba Bhi na Bole To Koi Mushkil Nahi-Nice Saying Image

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जुबाँ न भी बोले तो मुश्किल नहीं

फ़िक्र तब होती है

जब ख़ामोशी भी बोलना छोड़  दे 

Duniya ki Har Chij Thokar Lagne se Tut Jaya Karti Hai-Nice Saying Images

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दुनिया की हर चीज

ठोकर लगने से टूट जाया करती है दोस्तों …..

एक कामयाबी ही है

जो ठोकर खाकर ही मिलती है 

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Yu to Sikhane Ko Jindagi Bahut Kuchh Sikhati Hai-Nice Saying Images

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यूँ तो सिखाने को जिंदगी 

बहुत कुछ सिखाती है ….

मगर झूठी हंसी हंसने का हुनर 

तो बस मोहब्बत ही सिखाती है 

Sabab Talash Karo

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सबब तलाश करो 

अपने हार  जाने का 

किसी की जीत पर 

रोने से कुछ नहीं होगा 

Thanks for reading