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Friday, March 20, 2026
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ताई -विश्‍वंभरनाथ शर्मा कौशिक (हिंदी कहानी )

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taai hindi kahani
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ताई -विश्‍वंभरनाथ शर्मा कौशिक (हिंदी कहानी )

 

”ताऊजी, हमें लेलगाड़ी (रेलगाड़ी) ला दोगे?” कहता हुआ एक पंचवर्षीय बालक बाबू रामजीदास की ओर दौड़ा।

बाबू साहब ने दोंनो बाँहें फैलाकर कहा- ”हाँ बेटा,ला देंगे।” उनके इतना कहते-कहते बालक उनके निकट आ गया। उन्‍होंने बालक को गोद में उठा लिया और उसका मुख चूमकर बोले- ”क्‍या करेगा रेलगाड़ी?”

बालक बोला- ”उसमें बैठकर बली दूल जाएँगे। हम बी जाएँगे,चुन्‍नी को बी ले जाएँगे। बाबूजी को नहीं ले जाएँगे। हमें लेलगाड़ी नहीं ला देते। ताऊजी तुम ला दोगे, तो तुम्‍हें ले जाएँगे।”

बाबू- “और किसे ले जाएगा?”

बालक दम भर सोचकर बोला- ”बछ औल किछी को नहीं ले जाएँगे।”

पास ही बाबू रामजीदास की अर्द्धांगिनी बैठी थीं। बाबू साहब ने उनकी ओर इशारा करके कहा- ”और अपनी ताई को नहीं ले जाएगा?”

बालक कुछ देर तक अपनी ताई की और देखता रहा। ताईजी उस समय कुछ चि‍ढ़ी हुई सी बैठी थीं। बालक को उनके मुख का वह भाव अच्‍छा न लगा। अतएव वह बोला- ”ताई को नहीं ले जाएँगे।”

ताईजी सुपारी काटती हुई बोलीं- ”अपने ताऊजी ही को ले जा मेरे ऊपर दया रख।” ताई ने यह बात बड़ी रूखाई के साथ कही। बालक ताई के शुष्‍क व्‍यवहार को तुरंत ताड़ गया। बाबू साहब ने फिर पूछा- ”ताई को क्‍यों नहीं ले जाएगा?”

बालक- ”ताई हमें प्‍याल(प्‍यार), नहीं कलतीं।”

बाबू- ”जो प्‍यार करें तो ले जाएगा?”

बालक को इसमें कुछ संदेह था। ताई के भाव देखकर उसे यह आशा नहीं थी कि वह प्‍यार करेंगी। इससे बालक मौन रहा।

बाबू साहब ने फिर पुछा- ”क्‍यों रे बोलता नहीं? ताई प्‍यार करें तो रेल पर बिठाकर ले जाएगा?”

बालक ने ताउजी को प्रसन्‍न करने के लिए केवल सिर हिलाकर स्‍वीकार कर लिया, परंतु मुख से कुछ नहीं कहा।

बाबू साहब उसे अपनी अर्द्धांगिनी के पास ले जाकर उनसे बोले- ”लो, इसे प्‍यार कर लो तो तुम्‍हें ले जाएगा।” परंतु बच्‍चे की ताई श्रीमती रामेश्‍वरी को पति की यह चुगलबाजी अच्‍छी न लगी। वह तुनककर बोली- ”तुम्‍हीं रेल पर बैठकर जाओ, मुझे नहीं जाना है।”

बाबू साहब ने रामेश्‍वरी की बात पर ध्‍यान नहीं दिया। बच्‍चे को उनकी गोद में बैठाने की चेष्‍टा करते हुए बोले- ”प्‍यार नहीं करोगी, तो फिर रेल में नहीं बिठावेगा।–क्‍यों रे मनोहर?”

मनोहर ने ताऊ की बात का उत्‍तर नहीं दिया। उधर ताई ने मनोहर को अपनी गोद से ढकेल दिया। मनोहर नीचे गिर पड़ा। शरीर में तो चोट नहीं लगी, पर हृदय में चोट लगी। बालक रो पड़ा।

बाबू साहब ने बालक को गोद में उठा लिया। चुमकार-पुचकारकर चुप किया और तत्‍पश्‍चात उसे कुछ पैसा तथा रेलगाड़ी ला देने का वचन देकर छोड़ दिया। बालक मनोहर भयपूर्ण दॄष्टि से अपनी ताई की ओर ताकता हुआ उस स्‍थान से चला गया।

मनोहर के चले जाने पर बाबू रामजीदास रामेश्‍वरी से बोले- ”तुम्‍हरा यह कैसा व्‍य‍वहार है? बच्‍चे को ढकेल दिया। जो उसे चोट लग जाती तो?”

रामेश्‍वरी मुँह मटकाकर बोली- ”लग जाती तो अच्‍छा होता। क्‍यों मेरी खोपड़ी पर लादे देते थे? आप ही मेरे उपर डालते थे और आप ही अब ऐसी बातें करते हैं।”

बाबू सा‍हब कुढ़कर बोले- ”इसी को खोपड़ी पर लादना कहते हैं?”

रामेश्‍वरी– ”और नहीं किसे कहते हैं, तुम्‍हें तो अपने आगे और किसी का दु:ख-सुख सूझता ही नहीं। न जाने कब किसका जी कैसा होता है। तुम्‍हें उन बातों की कोई परवाह ही नहीं, अपनी चुहल से काम है।”

बाबू- ”बच्‍चों की प्‍यारी-प्‍यारी बातें सुनकर तो चाहे जैसा जी हो,प्रसन्‍न हो जाता है। मगर तुम्‍हारा हृदय न जाने किस धातु का बना हुआ है?”

रामेश्‍वरी– ”तुम्‍हारा हो जाता होगा। और होने को होता है, मगर वैसा बच्‍चा भी तो हो। पराये धन से भी कहीं घर भरता है?”

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बाबू साहब कुछ देर चुप रहकर बोले- ”यदि अपना सगा भतीजा भी पराया धन कहा जा सकता है, तो फिर मैं नहीं समझता कि अपना धन किसे कहेंगे?”

रामेश्‍वरी कुछ उत्‍तेजित हो कर बोली- ”बातें बनाना बहुत आसान है। तुम्‍हारा भतीजा है, तुम चाहे जो समझो, पर मुझे यह बातें अच्‍छी नहीं लगतीं। हमारे भाग ही फूटे हैं, नहीं तो यह दिन काहे को देखने पड़ते। तुम्‍हारा चलन तो दुनिया से निराला है। आदमी संतान के लिए न जाने क्‍या-क्‍या करते हैं- पूजा-पाठ करते हैं, व्रत रखते हैं,पर तुम्‍हें इन बातों से क्‍या काम? रात-दिन भाई-भतीजों में मगन रहते हो।”

बाबू साहब के मुख पर घृणा का भाव झलक आया। उन्‍होंने कहा- ”पूजा-पाठ, व्रत सब ढकोसला है। जो वस्‍तु भाग्‍य में नहीं, वह पूजा-पाठ से कभी प्राप्‍त नहीं हो सकती। मेरो तो यह अटल विश्‍वास है।”

श्रीमतीजी कुछ-कुछ रूँआसे स्‍वर में बोलीं– “इसी विश्‍वास ने सब चौपट कर रखा है। ऐसे ही विश्‍वास पर सब बैठ जाएँ तो काम कैसे चले? सब विश्‍वास पर ही न बैठे रहें, आदमी काहे को किसी बात के लिए चेष्‍टा करे।”

बाबू साहब ने सोचा कि मूर्ख स्‍त्री के मुँह लगना ठीक नहीं। अतएव वह स्‍त्री की बात का कुछ उत्‍तर न देकर वहाँ से टल गए।

2

बाबू रामजीदास धनी आदमी हैं। कपड़े की आढ़त का काम करते हैं। लेन-देन भी है। इनसे एक छोटा भाई है उसका नाम है कृष्‍णदास। दोनों भाइयों का परिवार एक में ही है। बाबू रामदास जी की आयु 35 के लगभग है और छोटे भाई कृष्णदास की आयु 21 के लगभग । रामदासजी निस्‍संतान हैं। कृष्‍णदास के दो संतानें हैं। एक पुत्र-वही पुत्र, जिससे पाठक परिचित हो चुके हैं- और एक कन्‍या है। कन्‍या की वय दो वर्ष के लगभग है।

रामदासजी आपने छोटे भाई और उनकी संतान पर बड़ा स्‍नेह रखते हैं- ऐसा स्‍नेह कि उसके प्रभाव से उन्‍हें अपनी संतानहीनता कभी खटकती ही नहीं। छोटे भाई की संतान को अपनी संतान समझते हैं। दोनों बच्‍चे भी रामदास से इतने हिले हैं कि उन्‍हें अपने पिता से भी अधिक समझते हैं।

परंतु रामदास की पत्‍नी रामेश्वरी को अपनी संतानहीनता का बड़ा दु:ख है।वह दिन-रात संतान ही के सोच में घुली रहती हैं। छोटे भाई की संतान पर पति का प्रेम उनकी आँखो में काँटे की तरह खटकता है।

रात के भोजन इत्‍यादि से निवृत्‍त होकर रामजीदास शैया पर लेटे शीतल और मंद वायु का आनंद ले रहे हैं। पास ही दूसरी शैया पर रामेश्‍वरी, हथेली पर सिर रखे, किसी चिंता में डूबी हुई थी। दोनों बच्‍चे अभी बाबू साहब के पास से उठकर अपनी माँ के पास गए थे। बाबू साहब ने अपनी स्‍त्री की ओर करवट लेकर कहा- “आज तुमने मनोहर को बुरी तरह ढकेला था कि मुझे अब तक उसका दु:ख है। कभी-कभी तो तुम्‍हारा व्‍यव‍हार अमानुषिक हो उठता है।”

रामेश्‍वरी बोली- ”तुम्‍ही ने मुझे ऐसा बना रक्‍खा है। उस दिन उस पंडित ने कहा कि हम दोनों के जन्‍म-पत्र में संतान का जोग है और उपाय करने से संतान हो सकती है। उसने उपाय भी बताये थे, पर तुमने उनमें से एक भी उपाय करके न देखा। बस, तुम तो इन्‍ही दोनों में मगन हो। तुम्‍हारी इस बात से रात-दिन मेरा कलेजा सुलगता रहता है। आदमी उपाय तो करके देखता है। फिर होना न होना भगवान के अधीन है।”

बाबू साहब हँसकर बोले- ”तुम्‍हारी जैसी सीधी स्‍त्री भी क्‍या कहूँ? तुम इन ज्‍योतिषियों की बातों पर विश्‍वास करती हो, जो दुनिया भर के झूठे और धूर्त हैं। झूठ बोलने ही की रोटियाँ खाते हैं। ”

रामेश्‍वरी तुनककर बोली- ”तुम्‍हें तो सारा संसार झूठा ही दिखाई पड़ता है। ये पोथी-पुराण भी सब झूठे हैं? पंडित कुछ अपनी तरफ से बनाकर तो क‍हते नहीं हैं। शास्‍त्र में जो लिखा है, वही वे भी कहते हैं, वह झूठा है तो वे भी झूठे हैं। अँग्रेजी क्‍या पढ़ी, अपने आगे किसी को गिनते ही नहीं। जो बातें बाप-दादे के जमाने से चली आई हैं, उन्‍हें भी झूठा बताते हैं।”

बाबू साहब- ”तुम बात तो समझती नहीं, अपनी ही ओटे जाती हो। मैं यह नहीं कह सकता कि ज्‍योतिष शास्‍त्र झूठा है। संभव है,वह सच्‍चा हो, परंतु ज्‍योतिषियों में अधिकांश झूठे होते हैं। उन्‍हें ज्‍योतिष का पूर्ण ज्ञान तो होता नहीं, दो-एक छोटी-मोटी पुस्‍तकें पढ़कर ज्‍योतिषी बन बैठते हैं और लोगों को ठगतें फिरते हैं। ऐसी दशा में उनकी बातों पर कैसे विश्‍वास किया जा सकता है?”

रामेश्‍वरी– ”हूँ, सब झूठे ही हैं, तुम्‍हीं एक बड़े सच्‍चे हो। अच्‍छा, एक बात पूछती हूँ। भला तुम्‍हारे जी में संतान का मुख देखने की इच्‍छा क्‍या कभी नहीं होती?”

इस बार रामेश्‍वरी ने बाबू साहब के हृदय का कोमल स्‍थान पकड़ा। वह कुछ देर चुप रहे। तत्‍पश्‍चात एक लंबी साँस लेकर बोले- ”भला ऐसा कौन मनुष्‍य होगा, जिसके हृदय में संतान का मुख देखने की इच्‍छा न हो? परंतु क्‍या किया जाए? जब नहीं है, और न होने की कोई आशा ही है, तब उसके लिए व्‍यर्थ चिंता करने से क्‍या लाभ? इसके सिवा जो बात अपनी संतान से होती, वही भाई की संतान से हो भी रही है। जितना स्‍नेह अपनी पर होता, उतना ही इन पर भी है जो आनंद उसकी बाल क्रीड़ा से आता, वही इनकी क्रीड़ा से भी आ रहा है। फिर नहीं समझता कि चिंता क्‍यों की जाय।”

रामेश्‍वरी कुढ़कर बोली- ”तुम्‍हारी समझ को मैं क्‍या कहूँ? इसी से तो रात-दिन जला करती हूँ, भला तो यह बताओ कि तुम्‍हारे पीछे क्‍या इन्‍हीं से तुम्‍हारा नाम चलेगा?”’

बाबू साहब हँसकर बोले- ”अरे, तुम भी कहाँ की क्षुद्र बातें लायी। नाम संतान से नहीं चलता। नाम अपनी सुकृति से चलता है। तुलसीदास को देश का बच्‍चा-बच्‍चा जानता है। सूरदास को मरे कितने दिन हो चुके। इसी प्रकार जितने महात्‍मा हो गए हैं, उन सबका नाम क्‍या उनकी संतान की बदौलत चल रहा है? सच पूछो, तो संतान से जितनी नाम चलने की आशा रहती है, उतनी ही नाम डूब जाने की संभावना रहती है। परंतु सुकृति एक ऐसी वस्‍तु है, जिसमें नाम बढ़ने के सिवा घटने की आशंका रहती ही नहीं। हमारे शहर में राय गिरधारीलाल कितने नामी थे। उनके संतान कहाँ है। पर उनकी धर्मशाला और अनाथालय से उनका नाम अब तक चला आ रहा है, अभी न जाने कितने दिनों तक चला जाएगा।

रामेश्‍वरी– ”शास्‍त्र में लिखा है जिसके पुत्र नहीं होता, उनकी मुक्ति नहीं होती ?”

बाबू- ”मुक्ति पर मुझे विश्‍वास नहीं। मुक्ति है किस चिड़िया का नाम? यदि मुक्ति होना भी मान लिया जाए, वो यह कैसे माना जा सकता है कि सब पुत्रवालों की मुक्ति हो ही जाती है ! मुक्ति का भी क्‍या सहज उपाय है? ये कितने पुत्रवाले हैं, सभी को तो मुक्ति हो जाती होगी ?”

रामेश्‍वरी निरूत्तर होकर बोली- ”अब तुमसे कौन बकवास करे ! तुम तो अपने सामने किसी को मानते ही नहीं।”

3

मनुष्‍य का हृदय बड़ा ममत्‍व–प्रेमी है। कैसी ही उपयोगी और कितनी ही सुंदर वस्‍तु क्‍यों न हो, जब तक मनुष्‍य उसको पराई समझता है, तब तक उससे प्रेम नहीं करता। किंतु भद्दी से भद्दी और बिलकुल काम में न आनेवाली वस्‍तु को यदि मनुष्‍य अपनी समझता है, तो उससे प्रेम करता है। पराई वस्‍तु कितनी ही मूल्‍यवान क्‍यों न हो, कितनी ही उपयोगी क्‍यों न हो, कितनी ही सुंदर क्‍यों न हो, उसके नष्‍ट होने पर मनुष्‍य कुछ भी दु:ख का अनुभव नहीं करता, इसलिए कि वह वस्‍तु, उसकी नहीं, पराई है। अपनी वस्तु कितनी ही भद्दी हो, काम में न आनेवाली हो, नष्‍ट होने पर मनुष्‍य को दु:ख होता है, इसलिए कि वह अपनी चीज है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि मनुष्‍य पराई चीज से प्रेम करने लगता है। ऐसी दशा में भी जब तक मनुष्‍य उस वस्‍तु को अपना बनाकर नहीं छोड़ता, अथवा हृदय में यह विचार नहीं कर लेता कि वह वस्‍तु मेरी है, तब तक उसे संतोष नहीं होता। ममत्‍व से प्रेम उत्‍पन्‍न होता है, और प्रेम से ममत्‍व । इन दोनों का साथ चोलीदामन का-सा है। ये कभी पृथक नहीं किए जा सकते।

यद्यपि रामेश्‍वरी को माता बनने का सौभाग्‍य प्राप्‍त नहीं हुआ था, तथापि उनका हृदय एक माता का हृदय बनने की पूरी योग्‍यता रखता था। उनके हृदय में वे गुण विद्यमान तथा अंतर्निहित थे, जो एक माता के हृदय में होते हैं, परंतु उसका विकास नहीं हुआ था। उसका हृदय उस भूमि की तरह था, जिसमें बीज तो पड़ा हुआ है, पर उसको सींचकर और इस प्रकार बीज को प्रस्‍फुटित करके भूमि के उपर लानेवाला कोई नहीं। इसीलिए उसका हृदय उन बच्‍चों की और खिंचता तो था, परंतु जब उसे ध्‍यान आता था कि ये बच्‍चे मेरे नहीं, दूसरे के है, तब उसके हृदय में उनके प्रति द्वेष उत्पन्‍न होता था, घृणा पैदा होती थी। विशेकर उस समय उनके द्वेष की मात्रा और भी बढ़ जाती थी, जब वह यह देखती थी कि उनके पतिदेव उन बच्‍चों पर प्राण देते हैं, जो उनके(रामेश्‍वरी के) नहीं हैं।

शाम का समय था। रामेश्‍वरी खुली छत पर बैठी हवा खा रही थी। पास उनकी देवरानी भी बैठी थी । दोनों बच्‍चे छत पर दौड़-दौड़कर खेल रहे थे। रामेश्‍वरी उनके खेल को देख रही थी। इस समय रामेश्‍वरी को उन बच्‍चों का खेलना-कूदना बड़ा भला मालुम हो रहा था। हवा में उड़ते हुए उनके बाल, कमल की तरह खिले उनके नन्‍हें -नन्‍हें मुख, उनकी प्‍यारी-प्‍यारी तोतली बातें, उनका चिल्लाना, भागना, लौट जाना इत्‍यादि क्रीड़ाएँ उसके हृदय को शीतल कर रहीं थीं। स‍हसा मनोहर अपनी बहन को मारने दौड़ा। वह खिलखिलाती हुई दौड़कर रामेश्‍वरी की गोद में जा गिरी। उसके पीछे-पीछे मनोहर भी दौड़ता हुआ आया और वह भी उन्‍हीं की गोद में जा गिरा। रामेश्‍वरी उस समय सारा द्वेष भूल गई। उन्‍होंने दोनों बच्‍चों को उसी प्रकार हृदय से लगा लिया, जिस प्रकार वह मनुष्‍य लगाता है, जो कि बच्‍चों के लिए तरस रहा हो। उन्‍होंने बड़ी सतृष्‍णता से दोनों को प्‍यार किया। उस समय यदि कोई अपरिचित मनुष्‍य उन्‍हें देखता, तो उसे यह विश्‍वास होता कि रामेश्‍वरी उन बच्‍चों की माता है।

दोनों बच्‍चे बड़ी देर तक उसकी गोद में खेलते रहे। सहसा उसी समय किसी के आने की आहट पाकर बच्‍चों की माता वहाँ से उठकर चली गई।

”मनोहर, ले रेलगाड़ी।” कहते हुए बाबू रामजीदास छत पर आए। उनका स्‍वर सुनते ही दोनों बच्‍चे रामेश्‍वरी की गोद से तड़पकर निकल भागे। रामजीदास ने पहले दोनों को खूब प्‍यार किया, फिर बैठकर रेलगाड़ी दिखाने लगे।

इधर रामेश्वरी की नींद टूटी। पति को बच्‍चों में मगन होते देखकर उसकी भौहें तन गईं । बच्‍चों के प्रति हृदय में फिर वही घृणा और द्वेष भाव जाग उठा।

बच्‍चों को रेलगाड़ी देकर बाबू साहब रामेश्‍वरी के पास आए और मुस्‍कराकर बोले- ”आज तो तुम बच्‍चों को बड़ा प्‍यार कर रही थीं। इससे मालूम होता है कि तुम्‍हारे हृदय में भी उनके प्रति कुछ प्रेम अवश्‍य है।”

रामेश्‍वरी को पति की यह बात बहुत बुरी लगी। उसे अपनी कमजोरी पर बड़ा दु:ख हुआ। केवल दु:ख ही नहीं, अपने उपर क्रोध भी आया। वह दु:ख और क्रोध पति के उक्‍त वाक्‍य से और भी बढ़ गया। उसकी कमजोरी पति पर प्रगट हो गई, यह बात उसके लिए असह्य हो उठी।

रामजीदास बोले- ”इसीलिए मैं कहता हूँ कि अपनी संतान के लिए सोच करना वृथा है। यदि तुम इनसे प्रेम करने लगो, तो तुम्‍हें ये ही अपनी संतान प्रतीत होने लगेंगे। मुझे इस बात से प्रसन्‍नता है कि तुम इनसे स्‍नेह करना सीख रही हो।”

यह बात बाबू साहब ने नितांत हृदय से कही थी, परंतु रामेश्‍वरी को इसमें व्‍यंग की तीक्ष्‍ण गंध मालूम हुई। उन्‍होंने कुढ़कर मन में कहा- ”इन्‍हें मौत भी नहीं आती। मर जाएँ, पाप कटे! आठों पहर आँखो के सामने रहने से प्‍यार को जी ललचा ही उठता है। इनके मारे कलेजा और भी जला करता है।”

बाबू साहब ने पत्‍नी को मौन देखकर कहा- ”अब झेंपने से क्‍या लाभ। अपने प्रेम को छिपाने की चेष्‍टा करना व्‍यर्थ है। छिपाने की आवश्‍यकता भी नहीं।”

रामेश्‍वरी जल-भभुनकर बोली- “मुझे क्‍या पड़ी है, जो मैं प्रेम करूँगी? तुम्‍हीं को मुबारक रहे। निगोड़े आप ही आ-आ के घुसते हैं। एक घर में रहने में कभी-कभी हँसना बोलना पड़ता ही है। अभी परसों जरा यों ही ढकेल दिया, उस पर तुमने सैकड़ों बातें सुनाईं। संकट में प्राण हैं, न यों चैन, न वों चैन।”

बाबू साहब को पत्‍नी के वाक्‍य सुनकर बड़ा क्रोध आया। उन्‍होंने कर्कश स्‍वर में कहा- “न जाने कैसे हृदय की स्‍त्री है ! अभी अच्‍छी–खासी बैठी बच्‍चों से प्‍यार कर रही थी। मेरे आते ही गिरगिट की तरह रंग बदलने लगी । अपनी इच्‍छा से चाहे जो करे, पर मेरे कहने से बल्लियों उछलती है। न जाने मेरी बातों में कौन-सा विष घुला रहता है। यदि मेरा कहना ही बुरा मालुम होता है, तो न कहा करूँगा। पर इतना याद रखो कि अब कभी इनके विषय में निगोड़े-सिगोड़े इत्‍यादि अपशब्‍द निकाले, तो अच्‍छा न होगा । तुमसे मुझे ये बच्‍चे कहीं अधिक प्‍यारे हैं।”

रामेश्‍वरी ने इसका कोई उत्‍तर न दिया । अपने क्षोभ तथा क्रोध को वे आँखो द्वारा निकालने लगीं।

जैसे-ही-जैसे बाबू रामजीदास का स्‍नेह दोनों बच्‍चों पर बढ़ता जाता था, वैसे-ही-वैसे रामेश्‍वरी के द्वेष और घृणा की मात्रा भी बढ़ती जाती थी। प्राय: बच्‍चों के पीछे पति-पत्‍नी में कहा सुनी हो जाती थी, और रामेश्‍वरी को पति के कटु वचन सुनने पड़ते थे। जब रामेश्‍वरी ने यह देखा कि बच्‍चों के कारण ही वह पति की नज़र से गिरती जा रही हैं, तब उनके हृदय में बड़ा तूफा़न उठा । उन्‍होंने यह सोचा- पराये बच्चों के पीछे यह मुझसे प्रेम कम करते जाते हैं, हर समय बुरा-भला कहा करते हैं, इनके लिए ये बच्‍चे ही सब कुछ हैं, मैं कुछ भी नहीं। दुनिया मरती जाती है, पर दोनों को मौत नहीं। ये पैदा होते ही क्‍यों न मर गए। न ये होते, न मुझे ये दिन देखने पड़ते। जिस दिन ये मरेंगे, उस दिन घी के दिये जलाउँगी। इन्‍होंने ही मेरे घर का सत्‍यानाश कर रक्‍खा है।च्‍चों और मुस्‍कराकर बोले-”आज

4

इसी प्रकार कुछ दिन व्‍यतीत हुए। एक दिन नियमानुसार रामेश्‍वरी छत पर अकेली बैठी हुई थीं उनके हृदय में अनेक प्रकार के विचार आ रहे थे। विचार और कुछ नहीं, अपनी निज की संतान का अभाव, पति का भाई की संतान के प्रति अनुराग इत्‍यादि। कुछ देर बाद जब उनके विचार स्‍वयं उन्‍हीं को कष्‍टदायक प्रतीत होने लगे, तब वह अपना ध्‍यान दूसरी और लगाने के लिए टहलने लगीं।

वह टहल ही रही थीं कि मनोहर दौड़ता हुआ आया । मनोहर को देखकर उनकी भृ‍कुटी चढ़ गई। और वह छत की चहारदीवारी पर हाथ रखकर खड़ी हो गईं।

संध्या का समय था । आकाश में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ रही थीं । मनोहर कुछ देर तक खड़ा पतंगों को देखता और सोचता रहा कि कोई पतंग कटकर उसकी छत पर गिरे, क्‍या आनंद आवे ! देर तक गिरने की आशा करने के बाद दौड़कर रामेश्‍वरी के पास आया, और उनकी टाँगों में लिपटकर बोला- ”ताई, हमें पतंग मँगा दो।” रामेश्‍वरी ने झिड़क कर कहा- ”चल हट, अपने ताऊ से माँग जाकर।”

मनोहर कुछ अप्रतिभ-सा होकर फिर आकाश की ओर ताकने लगा। थोड़ी देर बाद उससे फिर रहा न गया। इस बार उसने बड़े लाड़ में आकर अत्‍यंत करूण स्‍वर में कहा- ”ताई मँगा दो, हम भी उड़ाएँगे।”

इन बार उसकी भोली प्रार्थना से रामेश्‍वरी का कलेजा कुछ पसीज गया। वह कुछ देर तक उसकी और स्थिर दृष्टि से देखती रही । फिर उन्‍होंने एक लंबी साँस लेकर मन ही मन कहा- यह मेरा पुत्र होता तो आज मुझसे बढ़कर भाग्‍यवान स्‍त्री संसार में दूसरी न होती। निगोड़ा-मरा कितना सुंदर है, और कैसी प्‍यारी- प्‍यारी बातें करता है। यही जी चाहता है कि उठाकर छाती से लगा लें।

यह सोचकर वह उसके सिर पर हाथ फेरनेवाली थीं कि इतने में उन्‍हें मौन देखकर बोला- ”तुम हमें पतंग नहीं मँगवा दोगी, तो ताऊजी से कहकर तुम्‍हें पिटवायेंगे।”

यद्यपि बच्‍चे की इस भोली बात में भी मधुरता थी, तथापि रामेश्‍वरी का मुँह क्रोध के मारे लाल हो गया। वह उसे झिड़क कर बोली- ”जा कह दे अपने ताऊजी से देखें, वह मेरा क्‍या कर लेंगे।”

मनोहर भयभीत होकर उनके पास से हट आया, और फिर सतृष्‍ण नेत्रों से आकाश में उड़ती हुई पतंगों को देखने लगा।

इधर रामेश्‍वरी ने सोचा- यह सब ताउजी के दुलार का फल है कि बालिश्‍त भर का लड़का मुझे धमकाता है। ईश्‍वर करे, इस दुलार पर बिजली टूटे।

उसी समय आकाश से एक पतंग कटकर उसी छत की ओर आई और रामेश्‍वरी के उपर से होती हुई छज्‍जे की ओर गई। छत के चारों ओर चहार-दीवारी थी । जहाँ रामेश्‍वरी खड़ी हुई थीं, केवल वहाँ पर एक द्वार था, जिससे छज्‍जे पर आ-जा स‍‍कते थे। रामेश्‍वरी उस द्वार से सटी हुई खड़ी थीं। मनोहर ने पतंग को छज्‍जे पर जाते देखा । पतंग पकड़ने के लिए वह दौड़कर छज्‍जे की ओर चला। रामेश्वरी खड़ी देखती रहीं । मनोहर उसके पास से होकर छज्‍जे पर चला गया, और उससे दो ‍फिट की दूरी पर खड़ा होकर पतंग को देखने लगा। पतंग छज्‍जे पर से होती हुई नीचे घर के आँगन में जा गिरी । एक पैर छज्जे की मुँड़ेर पर रख‍कर मनोकर ने नीचे आँगन में झाँका और पतंग को आँगन में गिरते देख, वह प्रसन्‍नता के मारे फूला न समाया। वह नीचे जाने के लिए शीघ्रता से घूमा, परंतु घूमते समय मुँड़ेर पर से उसका पैर फिसल गया। वह नीचे की ओर चला । नीचे जाते-जाते उस‍के दोनों हाथों में मुँड़ेर आ गई । वह उसे पकड़कर लटक गया और रामेश्वरी की ओर देखकर चिल्‍लाया ”ताई!”

रामेश्‍वरी ने धड़कते हुए हृदय से इस घटना को देखा। उसके मन में आया कि अच्‍छा है, मरने दो, सदा का पाप कट जाएगा। यही सोच कर वह एक क्षण रूकी। इधर मनोहर के हाथ मुँड़ेर पर से फिसलने लगे। वह अत्‍यंत भय तथा करुण नेत्रों से रामेश्‍वरी की ओर देखकर चिल्‍लाया- “अरी ताई!” रामेश्‍वरी की आँखें मनोहर की आँखों से जा मिलीं। मनोहर की वह करुण दृष्टि देखकर रामेश्‍वरी का कलेजा मुँह में आ गया। उन्‍होंने व्‍याकुल होकर मनोहर को पकड़ने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। उनका हाथ मनोहर के हाथ तक पहुँचा ही कि मनोहर के हाथ से मुँड़ेर छूट गई। वह नीचे आ गिरा। रामेश्‍वरी चीख मार कर छज्‍जे पर गिर पड़ीं।

रामेश्‍वरी एक सप्‍ताह तक बुखार से बेहोश पड़ी रहीं। कभी-कभी जोर से चिल्‍ला उठतीं, और कहतीं- “देखो-देखो, वह गिरा जा रहा है- उसे बचाओ, दौड़ो- मेरे मनोहर को बचा लो।” कभी वह कहतीं- “बेटा मनोहर, मैंने तुझे नहीं बचाया। हाँ, हाँ, मैं चाहती तो बचा सकती थी- देर कर दी।” इसी प्रकार के प्रलाप वह किया करतीं।

मनोहर की टाँग उखड़ गई थी, टाँग बिठा दी गई। वह क्रमश: फिर अपनी असली हालत पर आने लगा।

एक सप्‍ताह बाद रामेश्‍वरी का ज्‍वर कम हुआ। अच्‍छी तरह होश आने पर उन्‍होंने पूछा- “मनोहर कैसा है?”

रामजीदास ने उत्‍तर दिया- “अच्‍छा है।”

रामेश्‍वरी- “उसे पास लाओ।”

मनोहर रामेश्‍वरी के पास लाया गया। रामेश्‍वरी ने उसे बड़े प्‍यार से हृदय से लगाया। आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई, हिचकियों से गला रुँध गया। रामेश्‍वरी कुछ दिनों बाद पूर्ण स्‍वस्‍थ हो गईं। अब वह मनोहर और उसकी बहन चुन्‍नी से द्वेष नहीं करतीं। और मनोहर तो अब उसका प्राणाधार हो गया। उसके बिना उन्‍हें एक क्षण भी कल नहीं पड़ती।

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dopahar ka bhojan hindi kahani

दोपहर का भोजन -अमरकांत (हिंदी कहानी )

 

सिद्धेश्वरी ने खाना बनाने के बाद चूल्हे को बुझा दिया और दोनों घुटनों के बीच सिर रख कर शायद पैर की उँगलियाँ या जमीन पर चलते चीटें-चीटियों को देखने लगी।

अचानक उसे मालूम हुआ कि बहुत देर से उसे प्यास नहीं लगी हैं। वह मतवाले की तरह उठी ओर गगरे से लोटा-भर पानी ले कर गट-गट चढ़ा गई। खाली पानी उसके कलेजे में लग गया और वह हाय राम कह कर वहीं जमीन पर लेट गई।

आधे घंटे तक वहीं उसी तरह पड़ी रहने के बाद उसके जी में जी आया। वह बैठ गई, आँखों को मल-मल कर इधर-उधर देखा और फिर उसकी दृष्टि ओसारे में अध-टूटे खटोले पर सोए अपने छह वर्षीय लड़के प्रमोद पर जम गई।

लड़का नंग-धड़ंग पड़ा था। उसके गले तथा छाती की हड्डियाँ साफ दिखाई देती थीं। उसके हाथ-पैर बासी ककड़ियों की तरह सूखे तथा बेजान पड़े थे और उसका पेट हंडिया की तरह फूला हुआ था। उसका मुख खुला हुआ था और उस पर अनगिनत मक्खियाँ उड़ रही थीं।

वह उठी, बच्चे के मुँह पर अपना एक फटा, गंदा ब्लाउज डाल दिया और एक-आध मिनट सुन्न खड़ी रहने के बाद बाहर दरवाजे पर जा कर किवाड़ की आड़ से गली निहारने लगी। बारह बज चुके थे। धूप अत्यंत तेज थी और कभी एक-दो व्यक्ति सिर पर तौलिया या गमछा रखे हुए या मजबूती से छाता ताने हुए फुर्ती के साथ लपकते हुए-से गुजर जाते।

दस-पंद्रह मिनट तक वह उसी तरह खड़ी रही, फिर उसके चेहरे पर व्यग्रता फैल गई और उसने आसमान तथा कड़ी धूप की ओर चिंता से देखा। एक-दो क्षण बाद उसने सिर को किवाड़ से काफी आगे बढ़ा कर गली के छोर की तरफ निहारा, तो उसका बड़ा लड़का रामचंद्र धीरे-धीरे घर की ओर सरकता नजर आया।

उसने फुर्ती से एक लोटा पानी ओसारे की चौकी के पास नीचे रख दिया और चौके में जा कर खाने के स्थान को जल्दी-जल्दी पानी से लीपने-पोतने लगी। वहाँ पीढ़ा रख कर उसने सिर को दरवाजे की ओर घुमाया ही था कि रामचंद्र ने अंदर कदम रखा।

रामचंद्र आ कर धम-से चौकी पर बैठ गया और फिर वहीं बेजान-सा लेट गया। उसका मुँह लाल तथा चढ़ा हुआ था, उसके बाल अस्त-व्यस्त थे और उसके फटे-पुराने जूतों पर गर्द जमी हुई थी।

सिद्धेश्वरी की पहले हिम्मत नहीं हुई कि उसके पास आए और वहीं से वह भयभीत हिरनी की भाँति सिर उचका-घुमा कर बेटे को व्यग्रता से निहारती रही। किंतु, लगभग दस मिनट बीतने के पश्चात भी जब रामचंद्र नहीं उठा, तो वह घबरा गई। पास जा कर पुकारा – बड़कू, बड़कू! लेकिन उसके कुछ उत्तर न देने पर डर गई और लड़के की नाक के पास हाथ रख दिया। साँस ठीक से चल रही थी। फिर सिर पर हाथ रख कर देखा, बुखार नहीं था। हाथ के स्पर्श से रामचंद्र ने आँखें खोलीं। पहले उसने माँ की ओर सुस्त नजरों से देखा, फिर झट-से उठ बैठा। जूते निकालने और नीचे रखे लोटे के जल से हाथ-पैर धोने के बाद वह यंत्र की तरह चौकी पर आ कर बैठ गया।

सिध्देश्वर ने डरते-डरते पूछा, ‘खाना तैयार है। यहीं लगाऊँ क्या?’

रामचंद्र ने उठते हुए प्रश्न किया, ‘बाबू जी खा चुके?’

सिद्धेश्वरी ने चौके की ओर भागते हुए उत्तर दिया, ‘आते ही होंगे।’

रामचंद्र पीढ़े पर बैठ गया। उसकी उम्र लगभग इक्कीस वर्ष की थी। लंबा, दुबला-पतला, गोरा रंग, बड़ी-बड़ी आँखें तथा होठों पर झुर्रियाँ।

वह एक स्थानीय दैनिक समाचार पत्र के दफ्तर में अपनी तबीयत से प्रूफरीडरी का काम सीखता था। पिछले साल ही उसने इंटर पास किया था।

सिद्धेश्वरी ने खाने की थाली सामने ला कर रख दी और पास ही बैठ कर पंखा करने लगी। रामचंद्र ने खाने की ओर दार्शनिक की भाँति देखा। कुल दो रोटियाँ, भर-कटोरा पनियाई दाल और चने की तली तरकारी।

रामचंद्र ने रोटी के प्रथम टुकड़े को निगलते हुए पूछा, ‘मोहन कहाँ हैं? बड़ी कड़ी धूप हो रही है।’

मोहन सिद्धेश्वरी का मँझला लड़का था। उम्र अठ्ठारह वर्ष थी और वह इस साल हाईस्कूल का प्राइवेट इम्तहान देने की तैयारी कर रहा था। वह न मालूम कब से घर से गायब था और सिद्धेश्वरी को स्वयं पता नहीं था कि वह कहाँ गया है।

किंतु सच बोलने की उसकी तबीयत नहीं हुई और झूठ-मूठ उसने कहा, ‘किसी लड़के के यहाँ पढ़ने गया है, आता ही होगा। दिमाग उसका बड़ा तेज है और उसकी तबीयत चौबीस घंटे पढ़ने में ही लगी रहती है। हमेशा उसी की बात करता रहता है।’

रामचंद्र ने कुछ नहीं कहा। एक टुकड़ा मुँह में रख कर भरा गिलास पानी पी गया, फिर खाने लग गया। वह काफी छोटे-छोटे टुकड़े तोड़ कर उन्हें धीरे-धीरे चबा रहा था।

सिद्धेश्वरी भय तथा आतंक से अपने बेटे को एकटक निहार रही थी। कुछ क्षण बीतने के बाद डरते-डरते उसने पूछा, ‘वहाँ कुछ हुआ क्या?’

रामचंद्र ने अपनी बड़ी-बड़ी भावहीन आँखों से अपनी माँ को देखा, फिर नीचा सिर करके कुछ रुखाई से बोला, ‘समय आने पर सब ठीक हो जाएगा।’

सिद्धेश्वरी चुप रही। धूप और तेज होती जा रही थी। छोटे आँगन के ऊपर आसमान में बादल में एक-दो टुकड़े पाल की नावों की तरह तैर रहे थे। बाहर की गली से गुजरते हुए एक खड़खड़िया इक्के की आवाज आ रही थी। और खटोले पर सोए बालक की साँस का खर-खर शब्द सुनाई दे रहा था।

रामचंद्र ने अचानक चुप्पी को भंग करते हुए पूछा, ‘प्रमोद खा चुका?’

सिद्धेश्वरी ने प्रमोद की ओर देखते हुए उदास स्वर में उत्तर दिया, ‘हाँ, खा चुका।’

‘रोया तो नहीं था?’

सिद्धेश्वरी फिर झूठ बोल गई, ‘आज तो सचमुच नहीं रोया। वह बड़ा ही होशियार हो गया है। कहता था, बड़का भैया के यहाँ जाऊँगा। ऐसा लड़का..’

पर वह आगे कुछ न बोल सकी, जैसे उसके गले में कुछ अटक गया। कल प्रमोद ने रेवड़ी खाने की जिद पकड़ ली थी और उसके लिए डेढ़ घंटे तक रोने के बाद सोया था।

रामचंद्र ने कुछ आश्चर्य के साथ अपनी माँ की ओर देखा और फिर सिर नीचा करके कुछ तेजी से खाने लगा।

थाली में जब रोटी का केवल एक टुकड़ा शेष रह गया, तो सिद्धेश्वरी ने उठने का उपक्रम करते हुए प्रश्न किया, ‘एक रोटी और लाती हूँ?’

रामचंद्र हाथ से मना करते हुए हडबड़ा कर बोल पड़ा, ‘नहीं-नहीं, जरा भी नहीं। मेरा पेट पहले ही भर चुका है। मैं तो यह भी छोडनेवाला हूँ। बस, अब नहीं।’

सिद्धेश्वरी ने जिद की, ‘अच्छा आधी ही सही।’

रामचंद्र बिगड़ उठा, ‘अधिक खिला कर बीमार कर डालने की तबीयत है क्या? तुम लोग जरा भी नहीं सोचती हो। बस, अपनी जिद। भूख रहती तो क्या ले नहीं लेता?’

सिद्धेश्वरी जहाँ-की-तहाँ बैठी ही रह गई। रामचंद्र ने थाली में बचे टुकड़े से हाथ खींच लिया और लोटे की ओर देखते हुए कहा, ‘पानी लाओ।’

सिद्धेश्वरी लोटा ले कर पानी लेने चली गई। रामचंद्र ने कटोरे को उँगलियों से बजाया, फिर हाथ को थाली में रख दिया। एक-दो क्षण बाद रोटी के टुकड़े को धीरे-से हाथ से उठा कर आँख से निहारा और अंत में इधर-उधर देखने के बाद टुकड़े को मुँह में इस सरलता से रख लिया, जैसे वह भोजन का ग्रास न हो कर पान का बीड़ा हो।

मँझला लड़का मोहन आते ही हाथ-पैर धो कर पीढ़े पर बैठ गया। वह कुछ साँवला था और उसकी आँखें छोटी थीं। उसके चेहरे पर चेचक के दाग थे। वह अपने भाई ही की तरह दुबला-पतला था, किंतु उतना लंबा न था। वह उम्र की अपेक्षा कहीं अधिक गंभीर और उदास दिखाई पड़ रहा था।

सिद्धेश्वरी ने उसके सामने थाली रखते हुए प्रश्न किया, ‘कहाँ रह गए थे बेटा? भैया पूछ रहा था।’

मोहन ने रोटी के एक बड़े ग्रास को निगलने की कोशिश करते हुए अस्वाभाविक मोटे स्वर में जवाब दिया, ‘कहीं तो नहीं गया था। यहीं पर था।’

सिद्धेश्वरी वहीं बैठ कर पंखा डुलाती हुई इस तरह बोली, जैसे स्वप्न में बड़बड़ा रही हो, ‘बड़का तुम्हारी बड़ी तारीफ कर रहा था। कह रहा था, मोहन बड़ा दिमागी होगा, उसकी तबीयत चौबीसों घंटे पढ़ने में ही लगी रहती है।’ यह कह कर उसने अपने मँझले लड़के की ओर इस तरह देखा, जैसे उसने कोई चोरी की हो।

मोहन अपनी माँ की ओर देख कर फीकी हँसी हँस पड़ा और फिर खाने में जुट गया। वह परोसी गई दो रोटियों में से एक रोटी कटोरे की तीन-चौथाई दाल तथा अधिकांश तरकारी साफ कर चुका था।

सिद्धेश्वरी की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे। इन दोनों लड़कों से उसे बहुत डर लगता था। अचानक उसकी आँखें भर आईं। वह दूसरी ओर देखने लगी।

थोड़ी देर बाद उसने मोहन की ओर मुँह फेरा, तो लड़का लगभग खाना समाप्त कर चुका था।

सिद्धेश्वरी ने चौंकते हुए पूछा, ‘एक रोटी देती हूँ?’

मोहन ने रसोई की ओर रहस्यमय नेत्रों से देखा, फिर सुस्त स्वर में बोला, ‘नहीं।’

सिद्धेश्वरी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘नहीं बेटा, मेरी कसम, थोड़ी ही ले लो। तुम्हारे भैया ने एक रोटी ली थी।’

मोहन ने अपनी माँ को गौर से देखा, फिर धीरे-धीरे इस तरह उत्तर दिया, जैसे कोई शिक्षक अपने शिष्य को समझाता है, ‘नहीं रे, बस, अव्वल तो अब भूख नहीं। फिर रोटियाँ तूने ऐसी बनाई हैं कि खाई नहीं जातीं। न मालूम कैसी लग रही हैं। खैर, अगर तू चाहती ही है, तो कटोरे में थोड़ी दाल दे दे। दाल बड़ी अच्छी बनी है।’

सिद्धेश्वरी से कुछ कहते न बना और उसने कटोरे को दाल से भर दिया।

मोहन कटोरे को मुँह लगा कर सुड़-सुड़ पी रहा था कि मुंशी चंद्रिका प्रसाद जूतों को खस-खस घसीटते हुए आए और राम का नाम ले कर चौकी पर बैठ गए। सिद्धेश्वरी ने माथे पर साड़ी को कुछ नीचे खिसका लिया और मोहन दाल को एक साँस में पी कर तथा पानी के लोटे को हाथ में ले कर तेजी से बाहर चला गया।

दो रोटियाँ, कटोरा-भर दाल, चने की तली तरकारी। मुंशी चंद्रिका प्रसाद पीढ़े पर पालथी मार कर बैठे रोटी के एक-एक ग्रास को इस तरह चुभला-चबा रहे थे, जैसे बूढ़ी गाय जुगाली करती है। उनकी उम्र पैंतालीस वर्ष के लगभग थी, किंतु पचास-पचपन के लगते थे। शरीर का चमड़ा झूलने लगा था, गंजी खोपड़ी आईने की भाँति चमक रही थी। गंदी धोती के ऊपर अपेक्षाकृत कुछ साफ बनियान तार-तार लटक रही थी।

मुंशी जी ने कटोरे को हाथ में ले कर दाल को थोडा सुड़कते हुए पूछा, ‘बड़का दिखाई नहीं दे रहा?’

सिद्धेश्वरी की समझ में नहीं आ रहा था कि उसके दिल में क्या हो गया है – जैसे कुछ काट रहा हो। पंखे को जरा और जोर से घुमाती हुई बोली, ‘अभी-अभी खा कर काम पर गया है। कह रहा था, कुछ दिनों में नौकरी लग जाएगी। हमेशा, बाबू जी, बाबू जी किए रहता है। बोला, बाबू जी देवता के समान हैं।’

मुंशी जी के चेहरे पर कुछ चमक आई। शरमाते हुए पूछा, ‘ऐं, क्या कहता था कि बाबू जी देवता के समान हैं? बड़ा पागल है।’

सिद्धेश्वरी पर जैसे नशा चढ़ गया था। उन्माद की रोगिणी की भाँति बड़बड़ाने लगी, ‘पागल नहीं है, बड़ा होशियार है। उस जमाने का कोई महात्मा है। मोहन तो उसकी बड़ी इज्जत करता है। आज कह रहा था कि भैया की शहर में बड़ी इज्जत होती हैं, पढ़ने-लिखनेवालों में बड़ा आदर होता है और बड़का तो छोटे भाइयों पर जान देता हैं। दुनिया में वह सब कुछ सह सकता है, पर यह नहीं देख सकता कि उसके प्रमोद को कुछ हो जाए।’

मुंशी जी दाल-लगे हाथ को चाट रहे थे। उन्होंने सामने की ताक की ओर देखते हुए हँस कर कहा, ‘बड़का का दिमाग तो खैर काफी तेज है, वैसे लड़कपन में नटखट भी था। हमेशा खेल-कूद में लगा रहता था, लेकिन यह भी बात थी कि जो सबक मैं उसे याद करने को देता था, उसे बर्राक रखता था। असल तो यह कि तीनों लड़के काफी होशियार हैं। प्रमोद को कम समझती हो?’ यह कह कर वह अचानक जोर से हँस पड़े।

मुंशी जी डेढ़ रोटी खा चुकने के बाद एक ग्रास से युद्ध कर रहे थे। कठिनाई होने पर एक गिलास पानी चढ़ा गए। फिर खर-खर खाँस कर खाने लगे।

फिर चुप्पी छा गई। दूर से किसी आटे की चक्की की पुक-पुक आवाज सुनाई दे रही थी और पास की नीम के पेड़ पर बैठा कोई पंडूक लगातार बोल रहा था।

सिद्धेश्वरी की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहे। वह चाहती थी कि सभी चीजें ठीक से पूछ ले। सभी चीजें ठीक से जान ले और दुनिया की हर चीज पर पहले की तरह धड़ल्ले से बात करे। पर उसकी हिम्मत नहीं होती थी। उसके दिल में जाने कैसा भय समाया हुआ था।

अब मुंशी जी इस तरह चुपचाप दुबके हुए खा रहे थे, जैसे पिछले दो दिनों से मौन-व्रत धारण कर रखा हो और उसको कहीं जा कर आज शाम को तोड़ने वाले हों।

सिद्धेश्वरी से जैसे नहीं रहा गया। बोली, ‘मालूम होता है, अब बारिश नहीं होगी।’

मुंशी जी ने एक क्षण के लिए इधर-उधर देखा, फिर निर्विकार स्वर में राय दी, ‘मक्खियाँ बहुत हो गई हैं।’

सिद्धेश्वरी ने उत्सुकता प्रकट की, ‘फूफा जी बीमार हैं, कोई समाचार नहीं आया।

मुंशी जी ने चने के दानों की ओर इस दिलचस्पी से दृष्टिपात किया, जैसे उनसे बातचीत करनेवाले हों। फिर सूचना दी, ‘गंगाशरण बाबू की लड़की की शादी तय हो गई। लड़का एम.ए. पास है।’

सिद्धेश्वरी हठात चुप हो गई। मुंशी जी भी आगे कुछ नहीं बोले। उनका खाना समाप्त हो गया था और वे थाली में बचे-खुचे दानों को बंदर की तरह बीन रहे थे।

सिद्धेश्वरी ने पूछा, ‘बड़का की कसम, एक रोटी देती हूँ। अभी बहुत-सी हैं।’

मुंशी जी ने पत्नी की ओर अपराधी के समान तथा रसोई की ओर कनखी से देखा, तत्पश्चात किसी छँटे उस्ताद की भाँति बोले, ‘रोटी? रहने दो, पेट काफी भर चुका है। अन्न और नमकीन चीजों से तबीयत ऊब भी गई है। तुमने व्यर्थ में कसम धरा दी। खैर, कसम रखने के लिए ले रहा हूँ। गुड़ होगा क्या?’

सिद्धेश्वरी ने बताया कि हंडिया में थोडा सा गुड़ है।

मुंशी जी ने उत्साह के साथ कहा, ‘तो थोडे गुड़ का ठंडा रस बनाओ, पीऊँगा। तुम्हारी कसम भी रह जाएगी, जायका भी बदल जाएगा, साथ-ही-साथ हाजमा भी दुरूस्त होगा। हाँ, रोटी खाते-खाते नाक में दम आ गया है।’ यह कह कर वे ठहाका मार कर हँस पड़े।

मुंशी जी के निबटने के पश्चात सिद्धेश्वरी उनकी जूठी थाली ले कर चौके की जमीन पर बैठ गई। बटलोई की दाल को कटोरे में उड़ेल दिया, पर वह पूरा भरा नहीं। छिपुली में थोड़ी-सी चने की तरकारी बची थी, उसे पास खींच लिया। रोटियों की थाली को भी उसने पास खींच लिया। उसमें केवल एक रोटी बची थी। मोटी-भद्दी और जली उस रोटी को वह जूठी थाली में रखने जा रही थी कि अचानक उसका ध्यान ओसारे में सोए प्रमोद की ओर आकर्षित हो गया। उसने लड़के को कुछ देर तक एकटक देखा, फिर रोटी को दो बराबर टुकड़ों में विभाजित कर दिया। एक टुकड़े को तो अलग रख दिया और दूसरे टुकड़े को अपनी जूठी थाली में रख लिया। तदुपरांत एक लोटा पानी ले कर खाने बैठ गई। उसने पहला ग्रास मुँह में रखा और तब न मालूम कहाँ से उसकी आँखों से टप-टप आँसू चूने लगे।

सारा घर मक्खियों से भनभन कर रहा था। आँगन की अलगनी पर एक गंदी साड़ी टँगी थी, जिसमें पैबंद लगे हुए थे। दोनों बड़े लड़कों का कहीं पता नहीं था। बाहर की कोठरी में मुंशी जी औंधे मुँह हो कर निश्चिंतता के साथ सो रहे थे, जेसे डेढ़ महीने पूर्व मकान-किराया-नियंत्रण विभाग की क्लर्की से उनकी छँटनी न हुई हो और शाम को उनको काम की तलाश में कहीं जाना न हो।

नेत्रहीन सीईओ जिसने खड़ी कर दी 50 करोड़ की कंपनी – Inspirational Story of Blind CEO Srikanth Bolla

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दोस्तों आज हम एक ऐसे व्यक्ति की बात कर रहे है जिसे दृष्टिहीनता के कारण बचपन से ही समाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा  जिसके जन्म लेते ही गांव के लोगों ने उसके माता पिता को सलाह दी थी कि यह बिना आंखों का एक बेकार बच्चा है जो आगे चल कर आप पर ही बोझ बनेगा | हम बात कर रहे हैं आंध्र प्रदेश में जन्मे Shrikant Bholla कि जिन्होंने नेत्रहीन होते हुए भी  हैदराबाद में Bollant Industries के नाम से एक कंपनी शुरू की है | श्रीकांत शतरंज और क्रिकेट जैसे खेलों के भी दृष्टिहीन श्रेणी के राष्ट्रीय खिलाड़ी रहे हैं।

जन्म होते ही परिवार में छाया मायूसी का माहौल

श्रीकांत के जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जिसकी वार्षिक आय 20000 से भी कम थी | श्रीकांत के जन्म के बाद  परिवार में जश्न की जगह मायूसी का माहौल था। पूरे गांव में खबर फैल चुकी थी कि बच्चे की आंखों में रोशनी नहीं है। हालांकि उनके किसान माता-पिता को इस बात को स्वीकार करने में वक्त लगा। कई डॉक्टरों के पास गए। सबने एक ही जवाब दिया, आपका बच्चा नेत्रहीन है। यह कभी नहीं देख पाएगा।

माता पिता को हर समय रहती थी श्रीकांत की चिंता

श्रीकांत का बचपन आंध्र प्रदेश के सीतारामपुरम गांव में बीता। घर की कमाई का एकमात्र स्रोत था, खेती। श्रीकांत को हमेशा से दुलार की जगह दया मिली। गांव वाले जब भी देखते, तो यही कहते, न जाने क्या होगा इस बच्चे का? कुछ लोग तो यह भी कहते कि माता-पिता को उनके पिछले जन्म की सजा मिली है। श्रीकांत जैसे-जैसे बड़े होते गए, परिवार की चिंता बढ़ती गई। मां को हमेशा डर लगा रहता, बेटा भटककर कहीं चला न जाए? कहीं गिर न जाए? एक बार किसी ने पिताजी को सलाह दी, मर जाने दो इस बच्चे को। बड़ा होकर यह परिवार के लिए बोझ बन जाएगा।

स्कूल में होता था उनसे भेद भाव 

गांव वालो की बात पर माता पिता ने कभी ध्यान नहीं दिया । श्रीकांत जब  पांच साल के हुए, तो पिताजी उन्हें अपने संग खेत ले जाने लगे। सोचा, शायद बेटा खेती-किसानी के कुछ काम सीख जाए। मगर इतने छोटे बच्चे के लिए हल चलाना या फसल काटना जैसे काम बहुत मुश्किल थे। फिर उनके पिता ने सोचा शायद यह पढ़ाई में अच्छा कर सके इसलिए उन्होंने उनका नामांकन गांव की स्कूल में जो कि उनके घर से लगभग 5 किलोमीटर दूर था उसमें करवा दिया | रोज पैदल जाना पड़ता था। स्कूल  का अनुभव काफी दुखद रहा। उन्हें क्लास की सबसे पिछली सीट पर बैठाया जाता। कोई बच्चा उनसे दोस्ती करने को तैयार नहीं था। टीचर को भी नेत्रहीन बच्चे में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उन्हें पीटी क्लास में आने से मना कर दिया गया, क्योंकि वह देख नहीं सकते थे।

श्रीकांत बताते हैं,

तब मैं छह साल का था। कोई मेरे साथ खेलता नहीं था। टीचर को भी मुझसे मतलब नहीं था। एक बच्चे के लिए कितना असहनीय होता है यह सब। अकेलापन सबसे बड़ी सजा है। मैं यह सोचता था कि दुनिया का सबसेगरीब बच्चा मैं ही हूं, और वो सिर्फ इसलिए नहीं कि मेरे पास पैसे की कमी थी, बल्कि इसलिए की मैं अकेला था

 

एपीजे अब्दुल कलाम के लीड इंडिया प्रोजेक्ट से जुड़ने का मिला मौका 

फिर पिताजी को नेत्रहीन बच्चों के स्कूल के बारे में पता चला। वह बेटे को लेकर हैदराबाद पहुंचे और वहां उनका दाखिला करा दिया। इस स्कूल का माहौल बिल्कुल अलग था। यहां सारे बच्चे नेत्रहीन थे। उनके ढेर सारे दोस्त बन गए। यहां कोई किसी को नहीं चिढ़ाता था। नेत्रहीन बच्चों के लिए विशेष टीचर थे। कुछ ही महीने में उन्होंने पढ़ना-लिखना सीख लिया। स्कूल में उन्हें पढ़ाई के साथ क्रिकेट और शतरंज खेलने का भी मौका मिला। हर कक्षा में वह अव्वल आने लगे। दसवीं में उन्होंने स्कूल में टॉप किया। उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के लीड इंडिया प्रोजेक्ट से जुड़ने का मौका मिला। घरवालों की खुशी का ठिकाना नहीं था।

अंधे होने के कारण विज्ञान विषय नहीं मिल पा रहा था 

श्रीकांत में दसवीं की परीक्षा आंध्र प्रदेश स्टेट बोर्ड से 90% से ज्यादा अंकों के साथ उत्तीर्ण की थी लेकिन फिर भी बोर्ड का कहना था कि 11 में दृष्टिहीन बच्चे विज्ञान विषय को नहीं चल सकते | वह साइंस पढ़ना चाहते थे, पर नेत्रहीन होने की वजह से 11वीं में साइंस विषय नहीं मिला। श्रीकांत भड़क गए। उन्होंने स्कूल से पूछा कि वह विज्ञान क्यों नहीं पढ़ सकते? जवाब मिला कि नियम के मुताबिक, नेत्रहीन बच्चों को साइंस पढ़ाने का प्रावधान नहीं है। श्रीकांत अड़ गए। उन्होंने इस मुद्दे पर कानूनी लड़ाई लड़ी। छह महीने के बाद उन्हें विज्ञान पढ़ने की अनुमति मिल गई। टीचर और शिक्षा बोर्ड की सभी आशंकाओं को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने 12वीं में 98 फीसदी अंक हासिल किए।

IIT के प्रतियोगिता परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया 

लेकिन जिंदगी भी कभी-कभी मजाक कर ढंग से रुकावटों की नकल उतारने लगती है, खासकर उन लोगों के लिए जिनका कोई बड़ा उद्देश्य होता है |अब वह इंजीनिर्यंरग पढ़ना चाहते थे। मगर देश के किसी आईआईटी संस्थान में नेत्रहीन छात्र के दाखिले का प्रावधान नहीं था। उन्होंने देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में नामांकन के लिए आवेदन किया लेकिन सभी ने आवेदन यह कहकर लौटा दिया कि आप दृष्टिहीन हैं इसलिए आप IIT के प्रतियोगिता परीक्षा में नहीं बैठ सकते |

विदेश में लिया दाखिला

फिर उन्होंने विदेशी यूनिवर्सिटी में दाखिले का प्रयास शुरू किया। चार अमेरिकी यूनिवर्सिटी ने उनके आवेदन स्वीकार कर लिए। उन्होंने बीटेक के लिए मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी को चुना। एमआईटी में पढ़ने वाले वह पहले अंतरराष्ट्रीय नेत्रहीन छात्र थे। पढ़ाई पूरी होते ही उनके पास कई अमेरिकी कंपनियों के ऑफर आ गए। मगर वह तय कर चुके थे कि उन्हें स्वदेश लौटना है।

श्रीकांत कहते हैं,

मैं दूसरे की कंपनी में नौकरी नहीं करना चाहता था। मैं खुद की कंपनी बनाना चाहता था, इसलिए सोचा कि यह काम मैं अपने देश जाकर करूंगा। जब घरवालों को पता चला कि वह स्वदेश लौट रहे हैं, तो उन्हें अच्छा नहीं लगा। उनका कहना था कि अपने देश में उन्हें वही दिक्कतें झेलनी पड़ेंगी, जो वह बचपन से सहते आए हैं। दोस्तों ने भी अमेरिका में ही बसने की सलाह दी। श्रीकांत कहते हैं, जब मैं अमेरिका से वापस आने लगा, तो कई लोगों ने कहा, बेवकूफ मत बनो। यहां तक कि मेरे माता-पिता भी चाहते थे कि मैं वहीं अच्छी-सी नौकरी करूं और शादी करके अपना घर बसाऊं। मगर मैंने अपने दिल की सुनी।

50 करोंड़ टर्नओवर वाली कम्पनी के बने सीईओ

स्वदेश लौटकर उन्होंने हैदराबाद में दिव्यांगों के लिए सेंटर खोला। यह संस्थान दिव्यांगों की पढ़ाई में मदद करता है। 2012 में उन्होंने बोलेंट इंडस्ट्री की शुरुआत की। यह ऐसी  कंपनी है जिसका मुख्य उद्देश्य अशिक्षित और अपंग लोगों को रोजगार देना है | उपभोक्ताओं को पर्यावरण के अनुकूलन पैकेज सोल्यूशन का प्रदान करना है | श्रीकांत ने यह कार्य कर  उन सभी की बातों को झुठला दिया है , जिसको सामाजिक दृष्टि हीन व्यक्ति द्वारा किए जाने को महज एक कल्पना मानता है | यही नहीं इस कंपनी का सालाना टर्नओवर 50 करोड़ से भी ज्यादा का है | शुरुआती पांच साल में कंपनी ने जबर्दस्त तरक्की की। 2017 में फोब्र्स  ने उन्हें एशिया के 30 साल से कम उम्र के उद्यमियों की सूची में शामिल किया। आज पांच शहरों में उनकी कंपनी के प्लांट हैं। आज उनके पास कंपनी की चार उत्पादन इकाइयां है एक हुबली कर्नाटक में, दूसरी निजामाबाद तेलंगाना में, तीसरी भी तेलंगाना के हैदराबाद में है और चौथी जो कि सो प्रतिशत सौर ऊर्जा द्वारा संचालित होती है आंध्र प्रदेश के श्री सिटी में है जो कि चेन्नई से 55 किलोमीटर की दूरी पर है |

श्रीकांत कहते हैं -जब मैं बिना सहारे के चलता हूं, तो लोग पूछते हैं कि बिना आंखों के कैसे देख लेते हो? मैं उनसे कहता हूं कि देखने के लिए नजर नहीं, नजरिया चाहिए।

आरबीआई ने जारी किया 10 रुपये का नया नोट, पुराने नोट रहेंगे मान्य

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आज यानि 5 जनवरी को रिजर्व  बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने  को 10 रुपये का नया नोट जारी कर दिया। नया नोट चॉकलेटी ब्राउन कलर का है। हालांकि आरबीआई के अनुसार 10 रुपये के पुराने नोट पहले की तरह ही चलन में रहेंगे । इसलिए लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है |

कोणार्क स्थित सूर्य मंदिर

नोट के आगे की तरफ पहले की तरह ही गांधी जी की तस्वीर होगी, जबकि नोट के पिछले हिस्से में कोणार्क स्थित सूर्य मंदिर की तस्वीर लगी है। नोट के पिछले हिस्से में ही स्वच्छ भारत अभियान का लोगो भी लगा है। इस नोट की एक और खासियत यह है कि इसमें सीरियल नंबर बढ़ते क्रम में है। यानि सबसे पहले नंबर का आकार सबसे छोटा और इसी तरह आगे नंबरों का साइज बढ़ता जा रहा है। सूत्रों के अनुसार सरकार ने 1 अरब 10 रुपये के नए नोट छाप लिए हैं ताकि यह बाजार में आसानी से उपलब्ध हो पाएं।

नकली नोटों पर लगाम लगाना मुख्य  उद्देश्य

10 रुपये के नोट में आखिरी बार बदलाव साल 2005 में हुआ था जब 10 रुपयें के नोट में काफी सारे बदलाव किए गए था। रिजर्व बैंक इससे पहले 50 और 500 रुपये को नोटो में भी बदलाव कर चुका है। इसके अलावा सरकार 200 और 2,000 रुपये का नया नोट भी जारी कर चुकी है। नोटों में यह बदलाव नकली नोटों पर लगाम लगाने के उद्देश्य से किए जा रहे हैं।

 

नए नोट के फीचर्स

पीछे की तरफ के फीचर्स
1.नोट की छपाई का साल बाईं तरफ।
2.स्वच्छ भारत का लोगों और स्लोगन।
3.कोणार्क सूर्य मंदिर की फोटो।
4.देवनागरी लिपी में 10 लिखा है।

आगे की तरफ के फीचर्स
1.नए नोट में 10 देवनागरी लिपी में भी लिखा है।
2. बीच में गांधी जी की तस्वीर लगी है।
3. महात्मा गांधी की तस्वीर के बगल में आरबीआई गवर्नर के हस्ताक्षर और आरबीआई का चिह्न है।
4. दाहिने हिस्से में अशोक स्तंभ बना है।
5. नए नोट में बेहतर सिक्यॉरिटी फीचर मौजूद हैं।
6. सीरियल नंबर का आकार बढ़ते हुए क्रम में है।

कब तलक ख़्वाबों से धोका खाओगी  – कफ़ील आज़र अमरोहवी

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कब तलक ख़्वाबों से धोका खाओगी – कफ़ील आज़र अमरोहवी

 

कब तलक ख़्वाबों से धोका खाओगी
कब तलक स्कूल के बच्चों से दिल बहलाओगी

कब तलक मुन्ना से शादी के करोगी तज़्किरे
ख़्वाहिशों की आग में जलती रहोगी कब तलक

छुट्टियों में कब तलक हर साल दिल्ली जाओगी 
कब तलक शादी के हर पैग़ाम को ठुकराओगी 


चाय में पड़ता रहेगा और कितने दिन नमक
बंद कमरे में पढ़ोगी और कितने दिन ख़ुतूत 


ये उदासी कब तलक
कब तलक नज़्में लिखोगी
रोओगी यूँ रात की ख़ामोशियों में कब तलक 


बाइबल में कब तलक ढूँडोगी ज़ख़्मों का इलाज
मुस्कुराहट में छुपाओगी कहाँ तक अपने ग़म 


कब तलक पूछोगी टेलीफ़ोन पर मेरा मिज़ाज 


फ़ैसला कर लो कि किस रस्ते पे चलना है तुम्हें
मेरी बाँहों में सिमटना है हमेशा के लिए
या हमेशा दर्द के शो’लों में जलना है तुम्हें
कब तलक ख़्वाबों से धोके खाओगी

ऐ वतन याद है किसने तुझे आजाद किया – जानकी वल्लभ शास्त्री

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ऐ वतन याद है किसने तुझे आजाद किया

जानकी वल्लभ शास्त्री

ऐ वतन याद है किसने तुझे आज़ाद किया ?
कैसे आबाद किया ? किस तरह बर्बाद किया ?

कौन फ़रियाद सुनेगा, फलक नहीं अपना,
किस निजामत ने तुझे शाद या नौशाद किया ?

तेरे दम से थी कायनात आशियाना एक,
सब परिंदे थे तेरे, किसने नामुराद किया ?

तू था ख़ुशख़ल्क, बुज़ुर्गी न ख़ुश्क थी तेरी,
सदाबहार, किस औलाद ने अजदाद किया ?

नातवानी न थी फ़ौलाद की शहादत थी,
किस फितूरी ने फ़रेबों को इस्तेदाद किया ?

ग़ालिबन था गुनाहगार वक़्त भी तारीक़,
जिसने ज़न्नत को ज़माने की जायदाद किया ?

माफ़ कर देना ख़ता, ताकि सर उठा के चलूँ,
काहिली ने मेरी शमशेर को शमशाद किया ?

 

बेसन की सोंधी रोटी पर  खट्टी चटनी जैसी माँ – निदा फ़ाज़ली

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बेसन की सोंधी रोटी पर  खट्टी चटनी जैसी माँ – निदा फ़ाज़ली

 

बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ

याद आती है चौका-बासन
चिमटा फुकनी जैसी माँ

बाँस की खुर्री खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे

आधी सोई आधी जागी
थकी दोपहरी जैसी माँ

चिड़ियों के चहकार में गूंजे
राधा-मोहन अली-अली

मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ

बिवी, बेटी, बहन, पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में

दिन भर इक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ

बाँट के अपना चेहरा, माथा,
आँखें जाने कहाँ गई

फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है-द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

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इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

 

देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की 
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥

नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नये राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥

लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
तोड़ो बन्धन, रुके न चिन्तन
गति, जीवन का सत्य चिरन्तन
धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।

चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना
सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे
सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥

 

22 साल बाद भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाली वर्ल्ड चैम्पियन के मेहनत और लगन की प्रेरक कहानी

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मणिपुर में जन्मीं सैखोम मिराबाई चानू ने अमेरिका के आनाहिम में हुई चैम्पियनशिप में  नया विश्व कीर्तिमान स्थापित करते हुए स्नैच में कुल 194 किलोग्राम- 85 किग्रा और क्लिन एण्ड जर्क में 109 किग्रा वजन उठा कर वर्ल्ड चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल किया। उन्होंने देश को इस स्पर्धा में दूसरी बार गोल्ड दिलवाया है।  पोडियम पर खड़े होकर तिरंगा देख कर चानू के आँखों में खुशी के आँसू आ गए थे। परंतु यह सब इतना आसान नहीं था। रियो अोलंपिक के अवसाद से उबरने और तीन प्रयासों में विफल होने के बाद उनके नाम के आगे DNF (Did Not Finish) लिखा जाना उनके सपनों का चकनाचूर हो जाने जैसा था।

बचपन आभाव में बिता 

मणिपुर के छोटे से गांव की चानू का बचपन अभाव में बीता। परिवार के लिए भरपेट खाना मिलना बड़ी बात थी। मेहनत-मजूदरी करके किसी तरह गुजारा चल रहा था। उन दिनों गांव में भारोत्तोलन चैंपियन कुंजरानी देवी की बड़ी चर्चा थी। दरअसल, कुंजरानी भी मणिपुर की ही हैं। साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली इस खिलाड़ी ने कई रिकॉर्ड बनाए। चानू उनके किस्से सुनते हुए बड़ी हुईं।

कुंजरानी के किस्से सुन सुनकर बड़ी हुयी 

एक बार पिता किसी काम से इंफाल गए। चानू उनके साथ थीं। वहां भारोत्तोलन प्रतियोगिता चल रही थी। मैदान में भार उठाती महिलाएं और चारों तरफ शोर मचाती भीड़। नजारा अद्भुत था। तभी एक महिला की ओर इशारा करते हुए पापा ने बताया, ये कुंजरानी हैं। चानू को खेल दिलचस्प लगा। बड़ी मासूमियत से पूछा, क्या मैं भी उनकी तरह वजन उठा सकती हूं? पापा हंस पड़े। नन्ही चानू के मन में लगातार यह सवाल उठता रहा कि एक औरत इतना वजन कैसे उठा सकती है? तब वह मात्र 13 साल की थीं। कक्षा पांच पास कर चुकी थीं। एक दिन पापा से बोलीं, मैं भी वजन उठाने वाले खेल में हिस्सा लेना चाहती हूं। पापा ने यह कहकर बात टाल दी कि इसके लिए काफी ट्र्रेंनग लेनी पड़ती है। चानू के मन में भारोत्तोलक बनने का सपना बस चुका था।

घर की आर्थिक स्थिति थी ख़राब 

पिता पढ़े-लिखे तो नहीं थे, पर खेल की अहमियत समझते थे। मणिपुर की तमाम लड़कियां खेल में नाम कमा चुकी थीं। इसलिए जब बेटी ने जिद पकड़ी, तो उन्होंने सोचा, चलो उसे मौका दिया जाए। गांव से 60 किमी दूरी पर एक ट्रेनिंग सेंटर था। वहीं 2007 में ट्र्रेंनग शुरू हुई। शुरुआत से ही प्रदर्शन अच्छा रहा। ट्र्रेंनग के पहले ही दिन उन्हें समझाया गया कि वजन उठाने के लिए व्यायाम और खान-पान पर ध्यान देना होगा। कोच ने उन्हें डाइट चार्ट दिया। फल-सब्जी के अलावा रोज दूध और चिकन खाना जरूरी था। डाइट चार्ट देखते ही होश उड़ गए। घर में चिकन पूरे साल में कभी-कभार ही बनने की नौबत आती थी। घर के हालात ऐसे नहीं थे कि यह सब खाने-पीने का खर्च उठाया जा सके। घर में बिना किसी से कुछ कहे चानू ट्र्रेंनग करती रहीं। रोजाना 60 किमी का सफर तय करके सेंटर पहुंचतीं। दो घंटे व्यायाम के बाद वजन उठाने का अभ्यास करतीं। शाम को लौटतीं, तो तेज भूख लगती। जो सबके लिए बनता, वही खाकर सो जातीं। पर्याप्त डाइट नहीं मिलने के कारण सेहत बिगड़ने लगी। चानू बताती हैं, हमारे पास इतने पैसे भी नहीं थे कि रोज एक गिलास दूध मिल सके। मैंने तय कर लिया था कि चाहे जो हो, खेल तो नहीं छोड़ूंगी।

घरवालो ने कहा खेल छोड़ दो 

एक दौर ऐसा भी आया, जब घरवालों ने कहा कि खेल छोड़ दो। पर चानू नहीं मानीं। डटी रहीं। ट्र्रेंनग के पहले ही वर्ष में स्थानीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का मौका मिल गया। तब तक सब मान चुके थे कि यह लड़की अच्छा खेलेगी। खेल के कारण पढ़ाई के लिए बहुत कम समय मिलता था। किसी तरह 10वीं पास किया। बड़ी कामयाबी मिली साल 2011 में, जब चानू ने दक्षिण एशियाई जूनियर खेल में गोल्ड मेडल जीता। अब पूरा देश उन्हें पहचानने लगा था। कुंजरानी देवी बनने का सपना हकीकत बन चुका था। खेल कोटे से रेलवे में नौकरी भी मिल गई। हालात बदलने लगे। 2013 में जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में सर्वश्रेष्ठ भारोत्तोलक का खिताब अपने नाम किया। मेडल जीतकर लौटीं, तो गांव में बड़ा जश्न हुआ।  जूनियर र्चैंपयनशिप के बाद बारी राष्ट्रमंडल खेलों की थी। नए कोच ने कहा कि मुकाबला कड़ा होगा, और मेहनत करो। 2014 में ब्रिटेन के ग्लासगो शहर में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में चानू ने सिल्वर मेडल जीता। इसके बाद तो हौसले और बुलंद हो गए।

चानू कहती हैं,

‘खिलाड़ी का जीवन अलग होता है। हमारे लिए हर खेल के बाद एक नई चुनौती आती है। हमारे काम के घंटे तय नहीं होते। हर मैच के बाद और ज्यादा मेहनत करनी होती है।’

 

साल 2016 करियर का सबसे बड़ा लक्ष्य लेकर आया। बारी थी रियो ओलंपिक की। वह मौका गंवाना नहीं चाहती थीं। कई महीने घर से दूर रहीं। पूरी शिद्दत से तैयारी की। परंतु उतने बड़े मंच पर वे अवाक रह गई और दो प्रतिभागीयों, जिन्होंने बारबेल से तीन क्लिन एण्ड जर्क प्रयास को भी पूरा न कर पायी उनमें से एक मिराबाई चानू थी। चानू बताती हैं, ओलंपिक में जाना मेरा सपना था। मैंने क्वालिफाई भी कर लिया, पर मेडल नहीं जीत पाई। इससे बड़ी मायूसी हुई।

“वह इतनी अवसादग्रस्त हो गई थी कि हमलोंगो के लिए उसे नियंत्रित कर पाना कठिन था। हमलोग लगभग 2 सालों से तैयारी कर रहे थे और मेडल की आशा कर रहे थे। रियो से लौटकर वह पाँच दिनों के लिए घर गई फिर पटियाला (नेशनल ट्रेनिंग सेंटर) आ गई और फिर 14 महिनों तक वह घर वापस नहीं गई” ,शर्मा ने बताया।

निराशाजनक प्रदर्शन पर उठे सवाल 

रियो में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद सवाल भी उठे। कुछ लोगों ने कहा कि तैयारी ठीक से नहीं की थी। चानू ने लोगों को जवाब देने की बजाय चूक तलाशने पर ध्यान केंद्रित किया, ताकि अगले लक्ष्य के लिए बेहतर तैयारी की जा सके।

“ओलंपिक एक दुर्भाग्य था, उसके बाद मैं कई हफ्तों तक न ठीक से खाना खा पाती या फिर सो पाती। यहाँ तक की आज भी उन दिनों को सोचकर मैं अवसादित हो जाती हूँ।” आनाहिम से एक साक्षात्कार में बात करते हुए उन्होंने कहा, “सौभाग्यवश, मेरे उस बुरे पल के वक्त देशवासी सो रहे थे।” और बुधवार की रात उनके बेहतरीन प्रदर्शन के वक्त भी जनता नींद में थी।

 

वो मेरे ख़ुशी के आंसू थे 

ओलंपिक के बाद एक साल तक कोच विजय शर्मा के नेतृत्व में ट्रेनिंग ली। पिछले सप्ताह ही विश्व चैंपियनशिप में 194 किलोग्राम वजन उठाकर चानू ने गोल्ड मेडल अपने नाम किया है। गर्व से भरे उस क्षण का नजारा पूरे देश ने देखा। वह नजारा, जब चानू अमेरिका के ऐनाहिम शहर में तिरंगा ओढ़कर पोडियम पर खड़ी थीं और उनकी आंखों से अनवरत आंसू बह रहे थे। चानू बड़ी विनम्रता से कहती हैं- देश के लिए  मेडल जीतना गर्व की बात होती है। वे तो मेरी खुशी के आंसू थे।

जानिए अपने SBI Account CIF Number कैसे Check करें?

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क्या आपको अपने SBI Account का  CIF Number पता है |

बहुत बार हमको अपने बैंक के CIF नंबर की जरुरत होती है लेकिन बहुत सारे  लोगो को अपने बैंक के CIF नंबर के बारे में जानकारी ही नहीं होती है तो चलिए आज हम इस पोस्ट में आपको  State Bank of India बैंक अकाउंट का CIF ढूँढने के 4 आसान तरीके बताएँगे।

बैंक सीआईएफ संख्या क्या है? What is Bank CIF Number in hindi?

CIF (Customer Information File) एक बहुत महत्वपूर्ण संख्या होता है जिसकी मदद से किसी बैंक खाते को Track किया जाता है या ढूँढा जाता है। अगर हम साधारण भाषा में समझे तो Bank CIF Number में ही किसी भी Customer की पूरी जानकारी को Save करके रखा जाता है। इन सभी जानकारी की मदद से बैंक के कर्मचारी किसी व्यक्ति के अकाउंट के सभी Transaction और काम को पूरा करते हैं। कभी-कभी एक Branch से दुसरे Branch में अपने बैंक अकाउंट को Transfer करते समय भी CIF नंबर की आवश्यकता पड़ती है।

अपने बैंक अकाउंट का SBI Account CIF Number ढूँढने के 4 आसान तरीके

1  बैंक पासबुक Bank passbook

पहला और सबसे आसान तरिका है आपके भारतीय स्टेट बैंक का पासबुक । उसके पहले पेज पर आपको Bank A/C नंबर के ऊपर आपको CIF Number लिखा हुआ मिल जायेगा।

 

2. SBI Anywhere App की मदद से

  • सबसे पहले अपने SBI Anywhere Android या iOS के App पर Login करें। आप अपने SBI Internet banking के Username और Password की मदद से इस App में Login कर सकते हैं।
  • Login करने के बाद आपको Services लिखा हुआ Tab मिलेगा उस पर Click करें।
  • उसके बाद आपको एक नया Page दिखेगा वहां Online Nomination पर Click करें।
  • अगले Page पर अपना Bank Account नंबर चुने जिसका आप CIF नंबरजानना चाहते हैं उसके बाद नीचे आपको उसका CIF Number दिख जायेगा।

3. भारतीय स्टेट बैंक इन्टरनेट बैंकिंग SBI Internet Banking

अगर आपके पास एक Active SBI Internet Banking अकाउंट है तो आप इस तरीके की मदद से अपने SBI बैंक अकाउंट का CIF नंबर ढूंढ सकते हैं।

  • सबसे पहले SBI के Online banking के Website पर जाकर Login करें : https://retail.onlinesbi.com/retail/login.htm
  • Login करने के बाद अपने Bank Account नंबर के नीचे लिखे हुए View Nomination and PAN Details पर Click करें। अगले Page पर आपको SBI Account Number के साथ CIF नंबर लिखा हुआ मिल जायेगा।

 

4. इ-स्टेटमेंट E-Statement

आप चाहें तो अपने Internet Banking के माध्यम से अपने बैंक खाते का इ-स्टेटमेंट डाउनलोड कर सकते हैं उसमें भी आपको आपके बैंक अकाउंट का CIF नंबर लिखा हुआ मिल जायेगा।

  • सबसे पहले अपने SBI Netbanking Account में Login करें। Login होने के बाद बाई तरफ के Menu पर Account statement पर Click करें।
  • उसके बाद अगले Page पर अपने उस Bank account को चुनें जिसका आप CIF Number देखना चाहते हैं। फिर आप जितने भी महीने का Statement चाहते हैं चुन लें। उसके बाद साल और महिना Select करें और View पर Tick करके Go पर क्लिक करें।
  • अगले Page पर आपको उस अकाउंट के उस निर्धारित किये हुए समय का Statement और Account से जुडी जानकारी प्राप्त होगी जहाँ पर CIF Number भी लिखा हुआ आपको दिख जायेगा।