कबाड़ के धंधे से माइंस और मेटल के सबसे बड़े कारोबारी तक का सफ़र – अनिल अग्रवाल

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anil agarwal biography hindi

आज की कहानी है बिहार में जन्मे एक शख्स की जिसने कबाड़ के धंधे से छोटा व्यापार शुरू कर माइंस और मेटल के सबसे बड़े कारोबारी होने का गौरव हासिल किया . जिसने 15 साल की उम्र में अपने पिता के बिजनेस के लिए स्कूल छोड़ दिया था और मुंबई जाकर पिता के बिजनेस में हाथ बंटाने लगे थे . हम बात कर रहे है स्क्रैप डीलर के तौर अपने करियर की शुरुआत करने वाले वेदांता रिसोर्सेज के मालिक अनिल अग्रवाल की . जिन्होंने अपनी दौलत का 75 फीसदी हिस्सा भारत में बेहतर शिक्षा के लिए दान देने की घोषणा कर के सबको आश्चर्यचकित कर दिया था . नकी दरियादिली पर वेदांता समूह ही नहीं, हिन्दुस्तान समेत समूची इंसानियत को नाज होगा . अनिल अग्रवाल की जिंदगी किसी रोचक उपन्यास से कम नहीं है . पढ़िए उनकी बायोग्राफी 

ANIL AGRAWAL BIOGRAPHY IN HINDI 

अनिल अग्रवाल का जीवन परिचय 

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अनिल अग्रवाल का जन्म 24 जनवरी 1954 को पटना में माध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था . उनके पिताजी द्वारिका प्रसाद अग्रवाल का 1960 में लोहे की जाली और गेट बनाने का कारोबार था . अनिल अग्रवाल बताते है की – जब मै 6 साल का था तो मुझे 10 किलोमीटर दूर स्थित स्कूल पैदल चलकर न जाना पड़े इसलिए  मेरे पिताजी ने मुझे मेरी पहली साईकिल उपहार के तौर पर दी . वो मेरे जिंदगी के सबसे रोमांचक लम्हों में से एक है .

अंग्रेजी में थे बेहद कमजोर

अनिल अग्रवाल ने पटना के  मिलर हाई स्कूल से  1972 में स्कूल की  पढाई पूरी की . उनके भीतर शुरू से ही कुछ कर गुजरने की  महत्वाकांक्षाएं हिलोरें मारती रहती थी . वो जो कुछ भी देखते उसे पाने की ललक पैदा हो जाती थी . परिवार की सहमति से उन्होंने कॉलेज छोड़ पिता के कारोबार में हाथ बटाने के बारे में सोचा . उन्नीस वर्ष की उम्र में वो पढाई छोड़ मुम्बई में कारोबार करने के लिए 1975 में मुम्बई के लिए विमान पकड़ा . यह उनकी पहली हवाई यात्रा थी . वे अंग्रेजी में बहुत कमजोर थे इसलिए वो पुरे सफ़र में बिलकुल खामोश बैठे रहे .

बिजनेस का पता ओबरॉय होटल 

एक शाम अनिल अग्रवाल मुम्बई के नरीमन  प्वॉइंट पर टहल रहे थे . सामने उन्होंने ओबेरॉय होटल देखा . वहां  की खूबसूरती देखकर उन्होंने सोचा की काश मै भी इस होटल में एक दिन गुजार पाता . लेकिन उनकी  सबसे बड़ी दिक्कत थी की उन्हें अंग्रेजी बोलना बिलकुल नहीं आता था . फिर वे ओबरॉय होटल में कैसे घुस पाते . एक पहचान वाले की मदद से जब वो पहली होटल के अन्दर गए तो उन्होंने सोचा ओबरॉय होटल मेरे बिजनेस के लिए अच्छा पता साबित हो सकता है . उस वक्त वो जिस कमरे में ठहरे थे उसका रोजाना किराया 200 रुपये था . बिजनेस बढ़ने के लिए वो वहां तकरीबन तिन महीने तक रहे . लेकिन पैसे बचाने के लिए खाना खाने व कपड़े धुलाने का काम बाहर ही करते थे .

छोटे से कमरे में वेदांता रिसोर्सेज की रखी नीव 

बहुत सारी खोजबीन और रिसर्च करने के बाद 1976 में उन्होंने वेदांता रिसोर्सेज की बुनियाद रखने का फैसला किया . उनका पहला दफ्तर कलबादेवी में 8/10 वर्गफीट का था ,जिसमे मुश्किल से तिन आदमी एक साथ बैठ सकते थे . उन्होंने फोन भी ऊपर मंजिल वाले से किराये पर लिया था .  शुरू-शुरू में वे लोग  दूसरे राज्यों की केबल कंपनियों से स्क्रैप खरीदते, और उन्हें मुंबई में बेचते थे। उन्होंने  तकरीबन दस वर्षों तक यह काम किया और अपना व्यापर बढ़ने के लिए बैंक से कर्ज लेने की सोची . उन्होंने बहुत से बैंक से संपर्क किया लेकिन एक नौजवान लड़का जो बिहार के मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता है और जिसने सिर्फ हाई स्कूल ही पास किया है तो कोई भी बैंक इतना बड़ा रिस्क लेने को तैयार नहीं हुआ . फिर उन्हें सिंडिकेट बैंक से 50 हज़ार रुपये का कर्ज मिला जिसके लिए उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी .

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अनिल अग्रवाल कहते है –

उन दिनों मेरा आधा समय सिंडिकेट बैंक में ही बीतता था। मैं बाहर बैठा-बैठा शीशे से मैनेजर का चेहरा झांकता रहता। यदि उसके चेहरे पर उस समय मुस्कान होती, तो मैं समझ जाता कि उससे 50 हजार का चैक क्लीयर करने के लिए गुजारिश करने का यही सबसे माकूल वक्त है।

अनिल ने इन पैसो से  “Shamsher Sterling Corporation” का अधिग्रहण किया जो Enamelled Copper Wire बनाती थी .अगले दस वर्षो तक ये इस कंपनी को ठोस आधार देने और आगे बढाने का काम करते रहे . कुछ सालो बाद  उन्होंने सोचा की अच्छे पैसे तभी कमाए जा सकते है जब उनकी कम्पनी के लिए Raw materials – अलुमिनियम और कॉपर का मूल्य नियंत्रित रहे . इसलिए उन्होंने अलुमिनियम और कॉपर खरीदने की जगह उनका निर्माण करना शुरू कर दिया .

मिलने लगी सफलता 

1986 में उन्होंने Jelly-filled cables के निर्माण में 7 करोंड़ रुपये लगाये और अधिकारिक तौर पर स्टरलाइट इंडस्ट्रीज का निर्माण किया . जाहिर है, उनका कारोबार तेजी से बढ़ रहा था, इसलिए अपने व्यापार को और मजबूत करने के लिए  अनिल ने एल्यूमीनियम शीट्स और फोइल बनाने के लिए एक संयंत्र बनाया और साथ ही उन्होंने 1993 इस्वी  में औरंगाबाद में ऑप्टिकल फाइबर का उत्पादन करने के लिए स्टरलाइट संचार के तहत एक और संयंत्र स्थापित किया

अनिल अग्रवाल कहते है –

मुंबई ने मुझे सिखाया कि कैसे इंग्लिश बोलना चाहिए, कैसे बेहतर तरीके से तैयार होना चाहिए और व्यापार के दूसरे सारे गुर भी इस शहर ने मुझे सिखाए। मुंबई का वह तजुर्बा वाकई अनमोल साबित हुआ।

टर्निंग पॉइंट 

अनिल अग्रवाल के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया . साल 2003 में भारत में ख़राब  कारोबारी माहौल और  पूंजी जुटाने में बाधा आने के कारण निराश होकर अनिल लन्दन चले गए . एक ऐसी जगह जहां दुनिया की सबसे बड़ी खनन और धातु कंपनियों का मुख्यालय था जिससे अनजाने में ही उनकी कम्पनी का चेहरा बदल गया . वहां एक ब्रिटिश अखबार से पता चला कि दक्षिण अफ्रीकी डीलमेकर ब्रायन गिल्बर्टसन, जिन्होंने साल 2001 में बिलिटन द्वारा 57 बिलियन डॉलर में बीएचपी के अधिग्रहण की रूपरेखा तैयार की थी, ताकि दुनिया में खनन क्षेत्र की सबसे विशाल कंपनी खड़ी की जा सके, अपने नए नेतृत्व से कुछ नाराज हैं।

साईकल प्रेम काम आया 

अनिल ने उन्हें फोन कर कहा की मुझे अपनी कम्पनी को लिस्ट कराने के लिए आपकी मदद की दरकार है . इसके जवाब में गिल्बर्टसन ने उनकी हॉबीज के बारे में पूछ लिया. अनिल ने जवाब दिया मेरी हॉबी वही है जो सामने वाला चाहता है . गिल्बर्टसन बोले- मैं तो साइकिल चलाता हूं। मैंने जवाब दिया कि मैं भी साइकिल चलाता हूं। फिर क्या था, दोनों ऑक्सफोर्ड से लंदन तक साइकिल पर थे।

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अनिल कहते है –  कोई ताकत थी, जिसने वह दूरी तय करने में मेरी मदद की। उस मुलाकात के बाद ब्रायन गिल्बर्टसन हिन्दुस्तान आए। उन्होंने मेरी तमाम परिसंपत्तियों का आकलन किया और उससे प्रभावित हुए। मैंने उन्हें एक बेहतर पैकेज ऑफर किया और फिर वह चेयरमैन बन गए।

लंदन स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी

अनिल ने सबको चौकाते हुए वेदांत समूह को सफलतापूर्वक लंदन स्टॉक एक्सचेंज (एलएसई) में सूचीबद्ध किया और 876 मिलियन डॉलर जुटाए . यह और भी जबरदस्त था कि, वेदांत न केवल लंदन स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होने वाली पहली भारतीय कंपनी बन गई बल्कि एक दशक से भी कम समय में खनन और धातुओं में वैश्विक खिलाड़ी बनने वाला पहला भारतीय व्यापार समूह बन गया।

अनिल अग्रवाल कहते है –  मेरे पिता जी ने मुझे दो नसीहतें दी थीं, जो मेरी जिंदगी को हमेशा राह दिखाती रही हैं। उनकी पहली सलाह तो यह थी कि तब तक प्रयास करते रहो, जब तक कि कामयाबी न मिल जाए, मगर कभी भी उसूलों की कीमत पर नहीं। और दूसरी सलाह थी गरीबों-वंचितों के साथ हमेशा हमदर्दी का भाव रखने की। मेरे पिता ने राजस्थान में एक पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज खोला और उस राज्य की औरतों के सशक्तीकरण में इस संस्थान ने चमत्कारिक रोल अदा किया है। पिता जी की सोच ने मुझे और मेरे परिवार को हमेशा ही प्रेरित किया है।

21 वर्ष में की शादी 

साइकलिंग  के लिए उनके बचपन के जुनून ने उन्हें एक और फायदा दिया . उनकी पत्नी  किरण गुप्ता, एक पुराने परिवार की  मित्र और एक साथी साइकिल चालक थी । उन  दोनों ने बहुत ही कम उम्र में शादी कर कर लिया – वह 21 वर्ष का थे  और किरण  16 वर्ष की थी । लेकिन वे अपने जीवन का आनंद लेते रहे और वर्तमान में लंदन में रहते हैं।

अपनी कमाई का  75 फीसदी दान देकर किया सबको आश्चर्यचकित

वर्ष 2014 में लंदन में अपने परिवार की सहमति के बाद अनिल अग्रवाल ने ऐलान करते हुए  कहा कि वह अपनी कमाई की 75 फीसदी रकम भारत में निशुल्क शिक्षा के कई बड़े प्रोजेक्ट में दान देना चाहते हैं. वे भारत में ऑक्सफोर्ड से बड़ी कई यूनिवर्सिटी बनाना चाहते हैं जो ‘नो प्रॉफिट नो लॉस’ के नियम पर चलेंगी. अग्रवाल ने कहा की वह कई वर्षों से चैरिटी की दिशा में बढ़ रहे थे और आखिरकार परिवार की सहमति के बाद वह देश को यह रकम समर्पित करने में सफल हुए हैं. जानकारी के मुताबिक, अनिल द्वारा दान की यह राशि‍ करीब 21000 करोड़ रुपये है. यह राशि‍ अब तक किसी भी भारतीय के द्वारा दान की जाने वाली सबसे बड़ी रकम है.

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अनिल अग्रवाल कहते है –

मेरा मानना है कि किसी भी असंभव लगते लक्ष्य को हासिल करने के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि पहले आप अपने लक्ष्य की कल्पना करैं, फिर सामथ्र्य का आकलन करें और उसके बाद पूरी प्रतिबद्धता के साथ गोल हासिल के लिए मैदान में उतर जाएं। कारोबारी दुनिया एक ऐसा निरंतर चलने वाला खेल है; जिसमें कोई हमेशा नंबर एक या दो नहीं हो सकता। पर हमारा लक्ष्य हमेशा यही होना चाहिए कि हम अपनी क्षमताओं का अधिकतम विस्तार करें।

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